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 पहला पन्ना
 

 
 विचार:दिल्ली 
बलि का या निर्बली का बकरा?
पवन कुमार बंसल और अश्वनी कुमार की विदाई के बाद एक बात बहुत साफ समझने की है कि भारतीय न्यायालयों में सुनवाई की पेशियां होती रहती हैं. सियासत में यदि किसी की गरदन कटनी हो तो पेशियां नहीं होतीं. उसकी मांसपेशियों को फौरन बर्खास्तगी के खंजर के सामने पेश कर दिया जाता है. मंत्री की कुर्सी तो वैसे ही बकरे की मां होती है. वह चाहे तब भी खैर कहां मना पाती है?
संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी के विचार
 
 विचार: 
काश, काटजू कम बोलते!
ये संभव है कि देश की नब्बे फीसदी जनता मूर्ख हो, लेकिन वही भारत भाग्य विधाता है और तमाम सुधारों का लक्ष्य भी वही है. लोकतंत्र में आप ना तो अपनी सुविधा से अपनी अलग जनता चुन सकते हैं और ना ही जो यथार्थ है उसे झुठला सकते हैं. दुर्भाग्य से जस्टिस काटजू ऐसा ही करते नजर आते हैं. नतीजतन वे अपना प्रभाव खोते गए हैं. काश, वे कम बोलते!
सत्येंद्र रंजन के विचार
     
 मुद्दा:महाराष्ट्र 
मराठवाड़ा: उम्मीद के सत्संग, मौत के खूंटे!
मराठवाड़ा के बीड में 1972 के बाद का सबसे बड़ा सूखा बताए जा रहे इस दौर में भी भक्ति और सियासत के कारोबार पर कोई फर्क नहीं पड़ता. अखंड रामनाम सप्ताह में जाने के लिए बाज़ार में दाढ़ी और बाल बनवाते अपनी ज़मीन हार चुके किसान-मज़दूर कतार में बैठे दिख जाएंगे. उनके लिए कुल मामला आखिरी उम्मी़द का है, चाहे वो आसाराम से आए, अजित पवार से या फिर घर में लगे खूंटे से!
अभिषेक श्रीवास्तव की रिपोर्ट
 
 बहस:समाज 
आइये लाइक करें ऊर्फ मुद्दा गायब
देहरादून या चंडीगढ़ में बैठी कोई दुनियाबी तौर पर नैन, नक्श से सुंदर लड़की हर रोज अपनी फोटो अपनी वॉल पर अपडेट करती है और अपने सैकड़ों साथियों को ‘टैग’ करके पूछती है कि मैं कैसी दिखती हूं? मुझे कितना नंबर देंगे? उसकी फोटो को हजार से ज्यादा लोग ‘लाइक’ करते हैं और दो-तीन सौ लोग सुंदर, अतिसुंदर, मृगनयनी, भोर की ताजगी, मनमोहिनी की टिप्पणी चस्पा कर देते हैं.
स्वतंत्र मिश्र का विश्लेषण
     
 बहस:बात पते की 
अफजल गुरु की याद में
श्रीनगर के मजार-ए-शोहदा में, अफजल की समाधि के पत्थर पर लिखा है- देश का शहीद, शहीद मोहम्मद अफजल, शहादत की तिथि 9 फरवरी 2013, शनिवार. इनका नश्वर शरीर भारत सरकार की हिरासत में है... अरुंधती राय के विचार
 
 बहस:बात पते की 
धर्म की दीवार में औरतें
केरल के कन्नूर जिले की एक और नन सिस्टर मैरी चांडी ने स्वास्ति नामक आत्मकथा लिखकर चर्च के अंदर घुट-घुट कर मरती ननों पर बहस को आगे बढ़ाने का काम किया है. आर एल फ्रांसिस के विचार
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प्रीतीश नंदी

 
 
जिंदगी उलझी सुलझी


 


 

संदीप पांडेय

 
 
शिक्षा, शिक्षक और अधिकार



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 बहस:अर्थ-बेअर्थ 
पेंशन बिल यानी कामगारों की तबाही
वित्त मंत्री रहते प्रणब मुखर्जी जब वॉशिंगटन गए थे तो उन्होंने अमरीकी राजकोष सचिव को आश्वस्त किया था कि हम पेंशन के निजीकरण, बैंकिंग क्षेत्र सुधार और बीमा क्षेत्र में ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को जल्दी लागू करेंगे. पीयूष पंत का विश्लेषण
 
 बहस:समाज 
हिन्दू फांसी
पिछले बीसेक वर्षों में पूरी दुनिया में ताकतवर और ताकतवर बनने की चाह पैदा करने वाले शासकों में आक्रमकता इस रूप में बढ़ी है कि मारो भी और दफना दो. यह आक्रमकता अपने फैसले में न्यूनतम मानव अधिकार की भी जगह को स्वीकार नहीं करती है. अनिल चमड़िया का विश्लेषण
 
 विचार:आधी दुनिया 
कॉरपोरेट का होमसाइंस
लड़कियों के पास लुभाने को कुछ होता भी है, मगर नौकरी न पाने वाले सामान्य युवक के पास कुछ भी नहीं होता. ये उच्च विचार वरिष्ठ साहित्यकार और प्रगतिशील माने जाने वाले एक लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी के हैं. मृणाल वल्लरी के विचार
         
 मुद्दा:स्वास्थ्य 
क्यों महंगा है इलाज
भारत में दवा की कीमतों के अलावा चिकित्सकीय उपकरणों, जांच के उपकरण एवं प्रत्यारोपित किये जाने वाले यंत्रों की कीमत अत्याधिक है. इन्हें कम करने की आवश्यकता है क्योंकि इनके बगैर इलाज की कल्पना नही की जा सकती. जब इनकी कीमतें बढ़ी रहेंगी तो सस्ते इलाज की बात करना बेमानी ही है. करोड़ों रुपये का निवेश करने के बाद कोई भी अधिक से अधिक लागत वसूलना चाहेगा.
जे के कर का विश्लेषण
 
 बहस:कृषि 
कहां है किसानों का पैसा
यह भारत के लिये अत्यंत शर्मनाक है कि पिछले 15 सालों में 2.90 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और 42 प्रतिशत किसान खेती छोड़ने के कगार पर हैं. इस संकट से उबारने के लिए किसानों को निम्न ब्याज दरों पर ऋण मुहैया कराने की सख्त जरूरत है, किंतु गरीब किसानों को ऋण देने के बजाय सरकार उनके नाम पर जारी राशि को बड़े उद्योगपतियों को नाममात्र की ब्याज दरों पर बांट देती है.
देविंदर शर्मा का विश्लेषण
 
 बाईलाइन:बात पते की 
सेक्स, सिक्स और सट्टा
टी-20 में शामिल लोगों को मालूम था कि इसके जन्म के समय से ही इससे दुर्गंध आ रही है. कुछ सट्टेबाज शायद इसी बदबू के कारण इसकी ओर आकर्षित हुए. आइपीएल में सभी भ्रष्ट नहीं हैं. अधिकांश मालिक मजे और मनोरंजन के नये तरीके के जरिये कानूनी तरीके से पैसा कमाने की चाह में इससे जुड़े. लेकिन यहां एक चुप्पी थी और हर चुप्पी की कीमत थी. श्रीसंत के अलावा भी तो सब चुप थे.
एम जे अकबर के विचार
             
 बहस:बात पते की 
एफडीआई: संघर्ष अभी बाकी है
विधायी वोटों का बहुमत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई के पक्ष में हो तथा संसद की भावना और आम जनता का बहुमत एफडीआई के खिलाफ हो, तो ऐसी स्थिति कब तक झेली जा सकती है? संजय पराते का विश्लेषण
 
 मुद्दा:मध्यप्रदेश 
नदियों को जोड़ने की नादानी
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के अंतिम दिनों का एक्शन रिप्ले प्रदर्शित कर रहे हैं. स्वर्णिम मध्यप्रदेश के प्रचार में भी नदी जोड़ का सहारा लिया जा रहा है और शुरुआत की गई है नर्मदा-क्षिप्रा लिंक से.मकरन्द पुरोहित/रेहमत मंसूरी का विश्लेषण
 
 मुद्दा:बात पते की 
धोखे का आधार
आधार के तर्क के उलट तीन से पांच सालों में आँखों की पुतलियों के निशान बदल जाते हैं. इसी तरह 5 सालों के बाद उंगलियों के निशान भी बदल जाते हैं. सचिन कुमार जैन का विश्लेषण
 
 बहस:बात पते की 
जनाक्रोश का अश्वमेधी घोड़ा
भारत की लोकतांत्रिक राजनीति के सामने विकल्पों के तलाश में लगे जनाक्रोश का अश्वमेधी घोड़ा खड़ा है और सत्तावर्ग अब अपनी मनमर्जी की चाबुक फटकार कर उसे अपने रथ में नहीं हांक सकता. योगेंद्र यादव के विचार
             
 

रामजी यादव

कहानीः अंतिम इच्छा

पंखुरी सिन्हा

तीन कविताएं

तीन कवितायें

इला कुमार

मनोज शर्मा

समय में तुम

मनोज कुमार झा

उस साँवले समय में

 
 

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