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 पहला पन्ना
 

 
 विचार: 
सवाल विकास की समझ का
विचारणीय है कि क्या अपने देश में सही अर्थ में विकास हो रहा है? जब विकास की चर्चा होती है, तो क्या उन बेड़ियों को तोड़ने की बात उसमें शामिल होती है, जिन्होंने आबादी के बहुत बड़े हिस्से को सदियों से जकड़ रखा है? एक वाक्य में कहें तो आज के दौर में न्याय और समता के मूल्यों से अलग विकास की कोई बात नहीं हो सकती. क्या विकास की ऐसी संस्कृति भारत में आगे बढ़ रही है?
सत्येंद्र रंजन का लेख
 
 विचार: 
प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग
प्रतिरोध के लिए विश्वसनीय और जरख़ेज जमीन के सिकुड़ते जाने के पीछे अलग-अलग इलाकों से जुड़े परिस्थिति-मूलक कारण तो हैं ही, इसके पार्श्व में हमारे समय की सांस्कृतिक एवं सभ्यातामूलक विशिष्टताएं भी हैं. इस परिवेश की कुछ लाक्षणिकताएं हैं- दुनिया को एक सा कर देने की मुहिम, मध्यवर्ग की सांस्कृतिक उदासीनता, किसानों की बदहाली, सुरक्षा, सक्षमता की गति आदि का जीवन का केन्द्रीय तत्व बन जाना
मनोज कुमार झा का लेख
     
 मुद्दा: 
गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक
यदि वर्ग धारणा को भी गरीबी उन्मूलन के विचार-विमर्श में सम्मिलित किया जाता तो इसे सामाजिक भेदभाव तक सीमित कर छोड़ा नहीं जाता. गरीबों को उनके पास उपलब्ध संसाधनों की कमी के आधार पर नहीं आंका जाता है, अगर ऐसा किया जाए तो यह निश्चित है कि समाज में वर्ग विशेष के पास संपत्ति और संसाधनों के सिमटने पर विचार करना होगा. वैश्विक गरीबी की समस्या का निराकरण करने के लिए अभी तक अपनाई गई रणनीति बदलनी होगी.
पीयूष पंत का लेख
 
 मुद्दा 
जनमत की बात करिये सरकार
कई बार अदालतों का फैसला पसंद न आने पर भी सिर झुकाकर उसका सम्मान करना ही समझदारी है. लेकिन पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश का सम्मान करना संभव नहीं है. हरियाणा की पंचायतों के चुनाव में उम्मीदवारों की शैक्षणिक और अन्य योग्यता का सवाल सिर्फ कुछ लोगों के व्यक्तिगत फायदे-नुकसान वाला मुकदमा नहीं है. यह संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की मर्यादा का सवाल है.
योगेंद्र यादव के विचार
     
 मुद्दा 
नेपाल पर भारत की चुप्पी
आज भारत सरकार नेपाल के नेतृत्व को झुकाने में सफल हो सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम बहुत बुरे होंगे. ऐसे में भारत सरकार के पास एक ही ईमानदार रास्ता है कि वह इस खेल से अलग हो जाए. भारत-नेपाल सीमा को खुलवाए. चूंकि भारत सरकार चाहे तो सीमाबंदी खत्म हो सकती है या कम से कम नेपाल को इतना भरोसा तो दिलाए कि सीमाबंदी खत्म करने के लिए वह जो कर सकती है, वह कर रही है.
योगेंद्र यादव का लेख
 
 विचार 
लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल
साठ का दशक भारतीय संसद का स्वर्णकाल कहा था, जहॉं विपक्ष संख्या में नगण्य था परन्तु जीवंत, विचारवान व सत्याग्रही था. जहॉं, संसद देश व गरीब की चर्चा का मुखर मंच था. जिसकी बहस देश को प्रभावित करती थी तथा देश की जनता को संसद से उम्मीद थी. यह लोकतंत्र के लिये शुभ लक्षण था. अब जनता संसद से निराश है. संसद, अब जैंसे केवल सांसदों के हित, वैष्वीकरण और विषमता की पोषक बन गई है.
रघु ठाकुर का लेख
 
     
 

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 विचार 
स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे
केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट विलेज की परिकल्पना की है. हालांकि ये स्मार्ट विलेज प्रोजेक्ट देश के कस्बों और गांवों में फैसे इस अंधेरे में कब और कैसे उजाला फैलाएगा, भ्रष्ट व्यवस्था के चलते कहना मुश्किल है. पर यह स्पष्ट इन गाँवों को फिलहाल मोबाइल कनेक्टिविटी की नहीं, जीवन के लिए जरुरी प्राथमिक सुविधाओं की कनेक्टिविटी चाहिए.
वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध का लेख
 
 विचार 
पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी
क्या 1947 में भारत के बंटवारे को रोका जा सकता था? क्या ये बंटवारा पूरी तरह “फूट डालो-राज करो” की ब्रिटिश नीति का परिणाम था, अथवा कांग्रेस नेताओं की कथित अदूरदर्शिता और सत्ता पाने की बेसब्री की इसमें प्रमुख भूमिका रही? क्या मुस्लिम लीग महज ब्रिटिश हाथों का खिलौना थी, या वह किसी लंबी परिघटना का नेतृत्व कर रही थी, जिसका परिणाम 1930-40 के दशकों में आकर अपरिहार्य हो गया था?
सत्येंद्र रंजन का विश्लेषण
 
 विचार 
नर्मदा आंदोलन का मतलब
बांध पहले भी बने थे, शहर पहले भी उजड़े थे, विस्थापन की पीड़ा पहले भी रही थी. लेकिन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन से पहले इस दर्द के पास जुबां नहीं थी, इस पीड़ा की अपनी भाषा नहीं थी. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पूरे देश को यह दर्द समझाया, साथ ही यह बताया की यह दर्द लाइलाज नहीं है. अगर नर्मदा बचाओ आंदोलन न होता तो न इतने आंदोलन होते, न ही इन आंदोलनों में इतनी नैतिक व राजनैतिक ऊर्जा होती.
योगेंद्र यादव का लेख
         
 मुद्दा 
हमारे कुलभूषण को छोड़ दो
वास्तव में फांसी की सजा हत्या ही होती है. कुलभूषण जाधव की मौत की सजा का मसला इसका राजनीतिक लाभ उठाने तक सीमित नहीं है बल्कि भविष्य में भी ऐसी मौतों को रोकने की एक आवाज के रूप में लेना चाहिए. भारत में नागरिक समूह कुलभूषण को फांसी की सजा दिए जाने का पूरजोर विरोध कर रहे है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान में भी फांसी की सजा को रद्द करने की मांग उठती रही है.
अनिल चमड़िया का लेख
 
 मुद्दा 
कश्मीर में समाधान की राह
क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि लोहे के छर्रों की बौछार करने वाली बंदूकों का इस्तेमाल भारत के किसी अन्य राज्य में किया जाएगा? उ.प्र. में एक भाजपा सांसद जब दल बल के साथ पुलिस अधीक्षक के आवास पर हमला बोल देता है तो उसे देशद्रोह नहीं माना जाता लेकिन कश्मीरी जब सेना पर पत्थर फेंकता है तो वह देशद्रोह है. आखिर क्या अंतर है दोनों घटनाओं में?
संदीप पांडे का लेख
 
 मुद्दा 
गलत कर्ज नीति के कारण कृषि संकट
देश भर में किसानों की आत्महत्या का भयावह संकट मुख्यत: बना हुआ इसलिए है, क्योंकि किसान को गरीब बनाए रखने के जान-बूझकर प्रयास किए जा रहे हैं. न सिर्फ किसानों को उनकी उपज की वाजिब कीमत न देकर बल्कि किसानों व ग्रामीण गरीबों की कीमत पर धनी लोगों को सस्ते और आसान कर्ज देकर को फायदा पहुंचाने की गलत कर्ज नीति से भी ऐसा किया जा रहा है
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का लेख
             
 विचार 
युद्ध के विरुद्ध
आज दुनिया में अधिकांश धनकुबेरों की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. विश्वभर में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद शोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.
रघु ठाकुर का लेख
 
 विचार 
किसके साथ किसका विकास
क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं, जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं. इन्हीं पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. इनके घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनों का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.
प्रदीप शर्मा के विचार
 
 मुद्दा 
क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?
पारंपरिक रूप से सबसे अधिक सहिष्णु रहा हिंदु धर्म कट्टरपंथियों द्वारा फैलाये जा रही घृणा व धार्मिक तनाव के चलते धीरे-धीरे अपना सौम्य चेहरा बदलता दिख रहा है. जैसे-जैसे धर्म के नाम पर यह राजनीति परवान चढ़ती जायेगी, समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी. हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग-अलग चीजें हैं.
राम पुनियानी के विचार
 
 अंतराष्ट्रीय 
मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल
भारत को विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्देश दिया जा रहा है कि अपनी खाद्यान्न खरीद प्रणाली को खत्म कर दे. इस दोषपूर्ण कदम के खासे गंभीर परिणाम निकलेंगे. इससे न केवल कड़ी मेहनत से हासिल भारत की खाद्य सुरक्षा पद्धति तहस नहस होगी बल्कि कोई साठ लाख किसानों की आजीविका पर भी बन आएगी. इसे लेकर अमरीकी खाद्य निर्यात लॉबी का प्रधानमंत्री मोदी पर जबरदस्त दबाव रहेगा.
देविंदर शर्मा का लेख
             
 

साहेब, आप सच बयां करते हैं

वरुण शर्मा

कुछ भी अचानक नहीं

सुदीप ठाकुर

पुस्तक अंश

नदी को सोचने दो

कविता

शहरोज़ की दो कवितायें

पुष्पा तिवारी

पत्नी का पत्र प्रेमिका के नाम

 
 

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