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 पहला पन्ना
 

 
 मुद्दा:पर्यावरण 
इक्कीसवीं सदी का कचरा
पिछले कुछ वर्षों से दुनियाभर में निश्चित रूप से पर्यावरण के बारे में जागरूकता काफी बढी है और यह शुभ संकेत है. एक ऐसे समय में जब पूरी पृथ्वी प्रदूषण के दुष्प्रभावों को झेल रहा है. हमें पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से लेकर पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए ताकि आने वाली पीढी के लिए हम अपने इस सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित रख सकें.
डॉ. गरिमा भाटिया का विश्लेषण
 
 विचार: 
जन आंदोलन की जगह
आंदोलन नहीं होते तो हम आज आजाद नहीं होते. कल तक देश की सत्ता पर थोड़े से घरानों का राज था और अब इन पर कंपनियों का भी राज हो गया है. ऐसे में कोई कब तक चुप बैठे. इस दमनचक्र के चलते देश के जिन किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और वंचितों का वजूद ही खतरों में पड़ गया है. ऐसे में जिन्हें अपनी जमीन से उखड़ना पड़ रहा है उनके लिए तो आंदोलन ही जरिया है
प्रसून लतांत के विचार
     
 विचार:बात पते की 
नेहरू और नई चुनौतियां
यह विडंबना ही है कि भाजपा नेता नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पचासवीं पुण्य तिथि की पूर्व संध्या पर कार्य-भार संभाला. नेहरू के राजनीतिक फलक से विदा होने के पचास वर्ष बाद उनके विचारों के प्रतिवाद यानी एंटी-थीसीस की प्रतिनिधि ताकतें देश की राजसत्ता पर संपूर्ण संसदीय बहुमत के साथ काबिज हो गई हैं.
सत्येंद्र रंजन का विश्लेषण
 
 आधी दुनिया: 
मुश्किल है लैंगिक न्याय की राह
मुस्लिम महिलाओं के कई संगठन और संस्थाएं, न्यायपूर्ण पर्सनल लॉ की मांग उठाती रही हैं. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन द्वारा हाल ही में जारी किया गया नया निकाहनामा, मुस्लिम महिलाओं पर पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जकड़ को ढीला करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के इस कदम का सभी को खुले दिल से स्वागत करना चाहिए.
राम पुनियानी के विचार
     
 विचार:उ.प्र. 
आप तो ऐसे न थे
आम आदमी पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर काफी असंतोष है कि उत्तर प्रदेश के संयोजक ने स्थानीय स्तर पर कोई राय-मशविरा किए बगैर लोगों को टिकट देने में मनमानी की. संदीप पांडेय के विचार
 
 मुद्दा:कृषि 
जीएम पर झूठ मत बोलिए
बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसेंटो पहले ही स्वीकार कर चुकी है कि भारत में बॉलवर्म कीटों पर रासायनिक कीटनाशकों का असर नहीं हो रहा है. जीएम फसलों से न तो पैदावार में वृद्धि हो रही है और न ही कीटनाशकों का इस्तेमाल घट रहा है. कृषि एवं खाद्य विशेषज्ञ देविंदर शर्मा के विचार
 
     
 

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 साहित्य: 
पेंग्विन का आत्मसमर्पण
वेंडी डॉनिगर की द हिंदूज़: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री वापस लेने वाला यदि दिल्ली-6 स्थित कोई पिद्दीजान तलुआचाटू प्रकाशक होता तो उसकी ऐसी वणिक-सुलभ कायरता अपनी स्वाभाविकता में फ़ौरन समझ में आ जाती, लेकिन पेन्ग्विन? विष्णु खरे के विचार
 
 राजनीति:दिल्ली 
निदो की मौत से उठते सवाल
निदो तानिया की मौत उसी राजधानी दिल्ली में हुई है, जिसने हाल के दिनों में आम आदमी पार्टी की सरकार के कथित राजनीतिक प्रयोगों की वजह से सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं और राष्ट्रीय राजनीति के एक बड़े फलक को प्रभावित किया है.अभिनव श्रीवास्तव की राय
 
 बहस:आधी दुनिया 
एसिड अटैक और प्रेम की प्रतिहिंसा
जब तक लड़कियों में ना कहने का साहस नहीं था, समाज अपनी यथास्थिति बनाये रखते हुए, लड़कियों को उनकी कमतर स्पेस में रखते हुए संतुष्ट था. एक पुरूष के लिये उसके प्रेम को नकारा जाना उसकी ज़िंदगी की सबसे शर्मनाक और अपमानजनक स्थिति है, जिसे वह आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता. सुधा अरोड़ा का विश्लेषण
         
 विचार: 
सांप्रदायिक समाज में धर्मनिरपेक्षता
लोकसभा चुनाव में सफलता से प्रफुल्लित भाजपा कहती है कि केवल उसे ही धर्मनिरपेक्षता की सही समझ है. उसके अनुसार धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सबके साथ न्याय किसी का तुष्टीकरण नहीं और किसी के साथ भेदभाव नहीं. यह विडम्बना है कि धर्मनिरपेक्षता की यह परिभाषा जो प्रजातांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष समाज की मूल अवधारणा के विरूद्ध है को कई लोग सच्ची धर्मनिरपेक्षता बता रहे हैं.
राम पुनियानी का विश्लेषण
 
 विचार 
प्रधानमंत्री के नाम दसवां खत
क्या आप देश को भगवाधारियों जटाजूट वालों आश्रमधारकों, संप्रदायवादियों, ज्योतिषियों, नवधनाड्यों, सी.बी.आई., इंटेलीजेंस ब्यूरो, कालेबाजारियों, जमाखोरों, सेवानिवृत्त, नौकरशाहों वगैरह से मुक्त कराने के लिए नई पीढ़ी का नेतृत्व आगे बढ़ाएंगे जिनके कारण आपका फेस इतिहास में बुक हो गया है. नरेन्द्र नाम के बावजूद विवेकानन्द के विचार धर्मनिरपेक्षता को लेकर आपके उलट हैं
कनक तिवारी का पत्र
 
 मुद्दा:राष्ट्र 
अब हिंदी की हैसियत बढ़ेगी
एक लंबे अंतराल के बाद या कहें कि ऐसा पहली बार हुआ है कि सरकार ने हिंदी की महत्ता और अपरिहार्यता स्वीकारी है. भारत सरकार की राजभाषा नीति अब तक प्रोत्साहन, पुरस्कार और प्रशंसा के माध्यम से ही कार्यालयों में हिंदी में कामकाज को बढ़ावा देती आ रही है. लेकिन इस लचीली और नरम नीति के कारण आजादी के 65 सालों बाद भी राजभाषा हिंदी को देश के सरकारी तंत्र में उचित स्थान नहीं मिल सका है.
राहुल राजेश के विचार
             
 मुद्दा:मध्यप्रदेश 
परमाणु ऊर्जा के खिलाफ चुटका
मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल मंडला जिले के चुटका में परमाणु विद्युत परियोजना का हजारों लोगों ने जब विरोध किया तो जुझारू संघर्ष व विरोध की तीव्रता को देखते हुये सरकार को अपना तामझाम समेटने पर मजबूर होना पड़ा.अशोक मालवीय की रिपोर्ट
 
 विचार:समाज 
उदासी का सम्मान करने वाले
सेण्टी मारने जैसा किसी के दुःख का उपहास करने के लिए प्रयुक्त शब्द ने कई दिनों तक माथे को बिच्छुओं से भर दिया था. अलबता बाद में जाना कि सेन्टीमेंटल शब्द से इसका रिश्ता है, जो कि लगभग ऋणात्मक लक्षण के रूप में स्वीकृत हो चुका है. मनोज कुमार झा का आलेख
 
 बहस:छत्तीसगढ़ 
बस्तर के सवाल-जवाब
1859 में बस्तर के आदिवासियों ने पेड़ काटने के खिलाफ आह्वान किया- एक पेड़ के बदले एक सिर. अंग्रेजों ने निर्देश जारी किये कि जंगल की कटाई करने वाले मजदूरों के साथ हथियारबंद सिपाही भेजे जायें. राजीव रंजन प्रसाद का विश्लेषण
 
 मुद्दा:मध्यप्रदेश 
अन्नपूर्णा नहीं हैं ये सरकारें!
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना में महज 20 किलो गेहूं और चावल मिलता है; यानी एक सदस्य को एक दिन के लिए 133 ग्राम गेहूं. इससे 4 रोटियां बनती हैं. सचिन कुमार जैन का विश्लेषण
             
 

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