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 पहला पन्ना
 

 
 राजनीति 
सौ दिनों की हकीकत
‘अच्छे दिन’ चाहने वालों में उन तबकों का बड़ा हिस्सा है- जिनकी पहचान मोदी ने नव-मध्य वर्ग के रूप में की थी. उनके लिए असली मुद्दे महंगाई और रोजगार हैं. महंगाई के मुद्दे पर भाजपा सरकार लगभग यू-टर्न ले चुकी है. वो वही भाषा बोलने लगी है, जो यूपीए के मंत्री और नेता बोलते थे. ऐसे में आम आदमी का यह भरोसा टूटता जा रहा है कि उनके पास महंगाई पर काबू पाने का कोई विशेष फॉर्मूला है.
सत्येंद्र रंजन का लेख
 
 मुद्दा 
धर्म की सीमा में क्यों बंधे प्रेम?
देश में सांप्रदायिक राजनीति के परवान चढ़ने के साथ ही, अंतर्धामिक विवाह कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गये हैं. अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना, सांप्रदायिक राजनीति के एजेण्डे का ही हिस्सा है. जाहिर है कि काल्पनिक ‘लव जिहाद’ के खिलाफ अभियान से एक तरफ मुसलमान घृणा के पात्र बनते हैं तो दूसरी ओर महिलाओं के खिलाफ पितृसत्तात्मक व्यवस्था को मजबूती मिलती है.
राम पुनियानी के विचार
     
 विचार 
खतरे में है मनरेगा
ग्रामीण गरीबों और कमजोर समुदायों का आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक सशक्तिकरण का कार्यक्रम मनरेगा अब खतरे में है. भाजपा-मोदी के इस रूख को समझना मुश्किल नहीं है. चुनाव में उसने बेरोजगारों को रोजगार देने का वादा किया था लेकिन वह तो चुनावी हितों से प्रेरित था. सत्ता में आने के बाद यदि इन चुनावी वादों को पूरा करने जाएँ तो कार्पोरेटों के हितों पर चोट पहुंचती है.
संजय पराते का विश्लेषण
 
 मुद्दा 
क्यों हाशिए पर योजना आयोग?
मोदी सरकार ने योजना आयोग को आप्रसंगिक बता इसे समाप्त करने का निर्णय लिया है. दुनिया भर का अनुभव यही है कि देश की उन्नति हमेशा उच्च आदर्शों से प्रेरित नियोजन से ही संभव हुई है. इसीलिए योजना आयोग की भूमिका या विकास के समाजवादी रास्ते की अवधारणा कभी अप्रासंगिक नहीं होगी. मुद्दा सिर्फ यह है कि फिलहाल अपनाए गए रास्ते की विफलताएं सामने आने में कितना वक्त लगता है.
सत्येंद्र रंजन के विचार
     
 विचार 
अंग्रेजी दूतों का दिलचस्प हिंदी प्रेम
अंग्रेजी माध्यमों से पढ़ कर नौकरशाही में आए लोगों को जब दिल्ली दरबार अचानक हिंदी में काम करने का फरमान सुनाता है तो हम हिंदी-प्रेमी मुग्ध हो जाते हैं. उत्तर भारत में जो हिंदी प्रेम का गाना गा रहे हैं, उनमें से शायद ही किसी के बच्चे हिंदी स्कूल में पढ़ते होंगे. अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाने वाले उम्मीद करते हैं कि मिजोरम और चेन्नई वासी हिंदी बोलें.
मृणाल वल्लरी का विश्लेषण
 
 मुद्दा 
क्या ‘हिन्दू’ हमारी राष्ट्रीय पहचान है?
आरएसएस के मुताबिक भारत में रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं, जबकि जिन ग्रंथों को हिन्दू धर्मग्रंथ कहा जाता है, उनमें भी 8वीं सदी ईस्वी तक, हिन्दू शब्द का जिक्र नहीं मिलता. दरअसल, हिन्दू शब्द अस्तित्व में तब आया जब अरब और मध्यपूर्व से मुसलमान यहां पहुंचे. उन्होंने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दू कहा. इस प्रकार, हिन्दू मूलतः एक भौगोलिक अवधारणा है.
राम पुनियानी के विचार
 
     
 

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प्रीतीश नंदी

 
 
खिलाफत से कौन डरता है?



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 मुद्दा 
बेशक, बेझिझक, बिंदास हिंदी बोलिए!
हमें अंग्रेजी नहीं जानने-बोलने के कारण नहीं, बल्कि हिंदी या अपनी मातृभाषा नहीं जानने-बोलने के कारण शर्मिंदा महसूस करने की जरूरत है आप भले हवाई जहाज या राजधानी एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे हों- अपने सहयात्रियों से हिंदी में नि:संकोच बात करके देखिए, आपका खुद से ओढ़ा हुआ अकेलापन छूमंतर हो जाएगा! इसलिए इंगलिश-विंगलिश नहीं; बेशक, बेझिझक, बिंदास हिंदी बोलिए!!!
राहुल राजेश के विचार
 
 मुद्दा 
इक्कीसवीं सदी का कचरा
पिछले कुछ वर्षों से दुनियाभर में निश्चित रूप से पर्यावरण के बारे में जागरूकता काफी बढी है और यह शुभ संकेत है. एक ऐसे समय में जब पूरी पृथ्वी प्रदूषण के दुष्प्रभावों को झेल रहा है. हमें पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से लेकर पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए ताकि आने वाली पीढी के लिए हम अपने इस सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित रख सकें.
डॉ. गरिमा भाटिया का विश्लेषण
 
 आधी दुनिया 
वह सुबह कभी तो आएगी
क्या हम कह सकते हैं कि अपनी कमियाँ मानने से शर्माए बिना सरकार चलाई जाएगी, वह सुबह कभी तो आएगी! अगर बु्द्धिजीवियों से पूछो तो वह कहेंगे कि हमारी संस्कृति में यह नहीं था, यह तो औपनिवेशिक काल की देन है. कुछ और हमें बतलाएँगे कि स्त्रियों के साथ हिंसा जैसी घटनाएँ तो दीगर मुल्कों में सरेआम होती रहती हैं. उन्हें हमारी ओर उँगली उठाने की जगह अपनी ओर देखना चाहिए
लाल्टू के विचार
         
 विचार 
विभाजनकारी राजनीति के हथियार
नफरत फैलाने वाली भाषा विभाजनकारी राजनीति का वो हथियार हैं जिसका इस्तेमाल कर आरएसएस-भाजपा गठबंधन राजनीतिक रोटियां सेंकने का प्रयास कर रहा है. लव जिहाद के नाम पर ढ़ेर सारी अफवाहें और झूठ फैला कर ये एक ओर मुसलमानों का दानवीकरण करते हैं तो दूसरी ओर पितृसत्तामक मूल्यों को थोप के महिलाओं और लड़कियों के जीवन पर और कड़ा नियंत्रण करने का प्रयास कर रहे हैं.
राम पुनियानी का विश्लेषण
 
 विचार 
कश्मीर त्रासदी का कैलाइडोस्कोप
धार्मिक आश्रमों, मन्दिरों, मस्जिदों, संस्थाओं, साधु सन्यासियों, मुल्लाओं और पादरियों की अरबों रुपयों की संपत्ति को लेकर धर्मध्वज लाखों करोड़ों रुपयों की विज्ञापनबाजी करते हैं. केदार घाटी और कश्मीर की त्रासदियों को लेकर निर्मम और कंजूस बने रहे. पातंजलि फार्मेसी का घी, दवाइयां बेचने वाले बाबा राजनीति की कढ़ाही में उबलते दूध की मलाई तो उतार लेते हैं. कश्मीर को लेकर वे भी गायब हैं.
कनक तिवारी का लेख
 
 विचार 
आईसिस और तेल की राजनीति
अमरीका बांटो और राज करो की नीति का इस्तेमाल ठीक उसी तरह कर रहा है जैसे कि पहले साम्राज्यवादी ताकतें किया करती थीं. भारत में साम्राज्यवादियों ने सांप्रदायिक राजनीति के बीच बोये. पश्चिम एशिया में पिछले कुछ दशकों के दौरान, अमरीकी साम्राज्यवादियों का लक्ष्य रहा है नस्लीय और सांप्रदायिक विभाजनों को और गहरा करना, और उनके आधार पर छोटे-छोटे देशों का गठन करवाना.
राम पुनियानी के विचार
             
 विचार 
जन आंदोलन की जगह
आंदोलन नहीं होते तो हम आज आजाद नहीं होते. कल तक देश की सत्ता पर थोड़े से घरानों का राज था और अब इन पर कंपनियों का भी राज हो गया है. ऐसे में कोई कब तक चुप बैठे. इस दमनचक्र के चलते देश के जिन किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और वंचितों का वजूद ही खतरों में पड़ गया है.
प्रसून लतांत के विचार
 
 बहस 
दंगे और इंसाफ की लाचारी
भारत में राज्य प्रायोजित हिंसा की रपट पुलिस थानों में पीड़ित व्यक्ति दर्ज़ कराने की हिम्मत नहीं रखता. वह थाने जाता है तो जान माल की धमकी मिलती है, जो क्रियान्वित की जा सकती है. किसी तरह प्राथमिकी दर्ज़ भी कर ली गई, तब भी जांच तो थाने अधिकारियों को ही करनी होती है. कनक तिवारी के विचार
 
 मुद्दा 
हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई!
यह बात हम सब बेहतर जानते हैं कि यूरोप के लोगों को अपनी ग़लतियों को समझने के लिए पिछली सदी में भयंकर तबाही और विनाश से गुजरना पड़ा. जो आज मोदी और संघ परिवार के समर्थन में हैं, देर सबेर वो अपनी ग़लती समझेंगे, पर तब तक देर हो चुकी होगी. लाल्टू के विचार
 
 राजनीति 
उम्र का उन्माद
इस बात को बार-बार दोहराए जाने की जरूरत महसूस होती है कि आधुनिकता का संबंध विचार से होता है. वह किसी तरह के नये रूप-रंग में नहीं निहित होती है. युवा उतना ही रूढ़ीवादी हो सकता है, जितना कोई बुजुर्ग. और कोई उम्र की आखिरी देहलीज पर भी आधुनिक हो सकता है. अनिल चमड़िया के विचार
             
 

लाल्टू

तीन कविताएं

रेत का पुल

मोहन राणा

कुतुब एक्सप्रेस

रामकुमार तिवारी

पंखुरी सिन्हा

तीन कविताएं

अरविंद कुमार

बृहत् समांतर कोश का आविर्भाव

 
 

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