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 पहला पन्ना
 

 
 राष्ट्र 
पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत!
दिल्ली का संसद मार्च लाल झंडे से पटा हुआ था. दिल्ली में शायद पहली बार ज़मीन और किसान के मसले पर तमिलनाडु से लेकर कश्‍मीर तक के तमाम जनांदोलन, भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी, माकपा, लिबरेशन सभी एक मंच पर समान अधिकार से मौजूद थे. और उस मंच पर वे अन्‍ना हज़ारे भी थे जो लगातार इस बात की रट लगाए थे कि वे राजनीतिक दलों के साथ मंच साझा नहीं करेंगे.
अभिषेक श्रीवास्तव की रिपोर्ट
 
 मुद्दा 
परमाणु समझौते का नाटक
भारत-अमरीका के बीच परमाणु समझौते में मुद्दा यह है कि मोदी सरकार उन विदेशी कंपनियों को ये लाभ देना क्यों चाहती है? बिजली के विभिन्न स्रोतों में परमाणु ऊर्जा भी एक विकल्प है. मगर चाहे स्रोत जो हो, उससे बिजली पाने के लिए अपने नागरिकों की हिफाजत की ऐसी अनदेखी होनी चाहिए? क्षतिपूर्ति का सारा बोझ अपने देश के करतादाताओं पर डालने की कोशिश कर मोदी सरकार देश की कैसी सेवा कर रही है?
सत्येंद्र रंजन का लेख
     
 विचार 
हमें चाहिए अपने जैसा नेता
हमें वे नेता नहीं चाहिए, जो इतिहास में जगह बनाना चाहते हैं बल्कि ऐसे नेता चाहते हैं, जिन्हें हममें से एक होने में कोई शर्मिंदगी महसूस न हो. हम हमेशा महात्मा की खोज में रहते हैं और हममें से यदि कोई उसे गोली मार भी दे तो हम छह दशक उसका कोई कच्चा-पक्का प्रतिरूप खोजने में लगा देते हैं. कोई ऐसा व्यक्ति, जो हमारा नेतृत्व करें, हमें निराश करे, खुद को संभाले और फिर कोशिश करे.
प्रीतीश नंदी का लेख
 
 मुद्दा 
हवा का रूख भांपने की कवायद
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे स्वाधीनता संग्राम के मूल तत्वों, नीतियों और मूल्यों को संविधान का हिस्सा बनाया था. लेकिन आज जो लोग संविधान से कुछ शब्दों को हटाने या उनकी आवश्यकता या औचित्य पर बहस की आवश्यकता बता रहे हैं वे भारतीय राष्ट्रवाद के विरोधी हैं और देश को धार्मिक राष्ट्रवाद की ओर ले जाना चाहते हैं.
राम पुनियानी का लेख
     
 विचार 
गांधी की नज़रों में संघ
आज सत्ता में आने के बाद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से स्वयं को किसी भी प्रकार से जोड़ने के लिए बेचैन है. यह तब, जब वह इस आंदोलन से दूर रहा था और उसने इस आंदोलन की इसलिये आलोचना की थी क्योंकि उसमें सभी समुदायों की हिस्सेदारी थी. आज आरएसएस गांधी से प्रमाणपत्र चाहता है. इसलिये उनके कहे वाक्य को अधूरा प्रस्तुत किया जा रहा है.
राम पुनियानी का लेख.
 
 विचार 
योजनाबद्ध झूठ का विस्तारवाद
इन दिनो कई अंग्रेजी भक्तों का मत है कि देवनागरी के बजाए रोमन लिपि अपना कर हिन्दी भाषा को वैश्विक रुप दिया जा सकता है लेकिन इसके बजाय हिंदी भाषा को जितना सरल और व्यापक बनाया जाएगा, भाषा उतनी ही मजबूत और जनोन्मुखी होगी. जो भारत में हिन्दी के अलावा अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्द हैं उन्हें हिन्दी भाषा में समाविष्ट करना उचित होगा और उससे हिन्दी का फैलाव भी होगा.
रघु ठाकुर का लेख
 
     
 

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क्या हमें सेंसर बोर्ड की जरूरत है?
सेंसर बोर्ड की मुखिया लीला सैमसन के मूर्खतापूर्ण आधार पर दिए त्यागपत्र के बाद सरकार के लिए अब ठीक मौका है कि वह फिल्म सेंसर करने के तरीके में आमूल परिवर्तन लाए. आज के दौर में केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड (सीबीएफसी) तो एक तरह का अराजकतावाद है. टेलीविजन खुद ही अपने को सेंसर करता है. फिल्मों को भी ऐसा करने की इजाजत होनी चाहिए.
प्रीतीश नंदी का लेख
 
 विचार 
नए साल का प्रण
श्रेष्ठता का दावा करने वाले विद्वानों की एक जमात है जो कहते हैं कि अंग्रेज़ों के आने के पहले हमारे यहाँ सब ठीक था. ये विद्वान ज्यादातर ऐसे तबकों से आते हैं, जिन्होंने सदियों से बहुसंख्यक लोगों को दबा रखा है. लेकिन अब इनका हाल बुरा है. ऐसे कई पहले ही बिक चुके हैं और जय विकास, जय विनाश का नारा लगा रहे हैं. नए साल में हमारा प्रण यही हो कि खुद को इनके एकांगी नज़रिए से बचाए रखें.
लाल्टू का लेख
 
 मुद्दा 
धर्मपरिवर्तन ही है घर वापसी
क्या हमें धर्मपरिवर्तन पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है? हमारे देश में पहले से ही ऐसे कानून हैं, जिनमें जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लोभ-लालच से धर्मपरिवर्तन करवाने वालों के लिए सजा का प्रावधान है. जो हमें करना है वह यह है कि हम स्वैच्छिक और जबरन धर्मपरिवर्तन के बीच विभेद करेंगे. घरवापसी, जबरन धर्मपरिवर्तन का ही पर्यायवाची है.
राम पुनियानी का लेख
         
 मुद्दा 
क्रॉस पर हमला
मदर टेरेसा के संबंध में मोहन भागवत की टिप्पणी के बाद से ईसाईयों पर हमले बढते जा रहे हैं और हरियाणा व कोलकाता की घटनाएं इसका प्रतीक हैं. विहिप खुलकर और हमलों की धमकी दे रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में इस पर अपनी समझीबूझी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जायेगा. परंतु हम सब जानते हैं कि मोदी अकसर जो कहते हैं, वह उनका मंतव्य नहीं होता
राम पुनियानी का लेख
 
 मुद्दा 
किसानों के मन की बात
प्रधानमंत्रीजी कृपया किसानों को दिहाड़ी मजदूर मत बनाइए और न ही वे शहरों में रिक्शा खींचना चाहते हैं. किसानों की जमीन ही उनकी एकमात्र आर्थिक सुरक्षा है. उद्योगों को मिलने वाली मदद राशि का यदि थोड़ा हिस्सा भी उन्हें दिया जाए तो उनके आर्थिक सपने साकार हो सकते हैं. यदि महज 2 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष कृषि को दिया जाए तो यही वास्तव में सबका साथ, सबका विकास होगा
देविंदर शर्मा का लेख
 
 बहस 
गांधी विचार के हत्यारे
आज जब सरकारें सुविधाजनक रूप से गांधी जयंती को राष्ट्रीय अवकाशों की सूची में शामिल करना भूल रही है, जब गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के उग आए हैं और द हिंदू की तो रिपोर्ट है कि हिंदू महासभा ने विभिन्न पूजास्थलों में रखने के लिए गोडसे की 500 प्रतिमाएं बुलवाई हैं तो गांधी पर जस्टिस काटजू के प्रहार मौजूदा व्यवस्था (और उसके क्षुद्र सहयोगियों) के साथ बड़ी सफाई से फिट होते हैं.
प्रीतीश नंदी का लेख
             
 विचार 
युद्ध के विरुद्ध
आज दुनिया में अधिकांश धनकुबेरों की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. विश्वभर में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद शोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.
रघु ठाकुर का लेख
 
 विचार 
किसके साथ किसका विकास
क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं, जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं. इन्हीं पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. इनके घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनों का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.
प्रदीप शर्मा के विचार
 
 मुद्दा 
क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?
पारंपरिक रूप से सबसे अधिक सहिष्णु रहा हिंदु धर्म कट्टरपंथियों द्वारा फैलाये जा रही घृणा व धार्मिक तनाव के चलते धीरे-धीरे अपना सौम्य चेहरा बदलता दिख रहा है. जैसे-जैसे धर्म के नाम पर यह राजनीति परवान चढ़ती जायेगी, समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी. हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग-अलग चीजें हैं.
राम पुनियानी के विचार
 
 अंतराष्ट्रीय 
मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल
भारत को विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्देश दिया जा रहा है कि अपनी खाद्यान्न खरीद प्रणाली को खत्म कर दे. इस दोषपूर्ण कदम के खासे गंभीर परिणाम निकलेंगे. इससे न केवल कड़ी मेहनत से हासिल भारत की खाद्य सुरक्षा पद्धति तहस नहस होगी बल्कि कोई साठ लाख किसानों की आजीविका पर भी बन आएगी. इसे लेकर अमरीकी खाद्य निर्यात लॉबी का प्रधानमंत्री मोदी पर जबरदस्त दबाव रहेगा.
देविंदर शर्मा का लेख
             
 

लाल्टू

पाँच कविताएं

अनवर सुहैल

तीन कविताएं

कुतुब एक्सप्रेस

रामकुमार तिवारी

रेत का पुल

मोहन राणा

अरविंद कुमार

बृहत् समांतर कोश का आविर्भाव

 
 

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