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 पहला पन्ना
 

 
 मुद्दा 
दवा माफिया का बढ़ता शिकंजा
छत्तीसगढ़ और म. प्र. के दवा घोटालों की जॉंच सी.बी.आई. के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में होना चाहिये क्योंकि यह दवा घोटाला छत्तीसगढ़ से गुजरात तक फैला हुआ है. अकेले सी. बी. आई. जॉंच पर भी अब भरोसा नही किया जा सकता क्योंकि उसकी विश्वसनीयता निरंतर गिर रही है तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और टिप्पणी के बावजूद सी. बी. आई. अपने तोता की भूमिका से हटने को तैयार नही है.
समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर का लेख
 
 मुद्दा 
बंद गली से आगे
जब विकास के `गुजरात मॉडल\' का स्वांग पिछले चुनाव में प्रस्तुत किया गया, तो जनता परिवार समर्थक मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भी उस बह गया और जनता परिवार के दल और नेता असहाय होकर यह देखते रहे. `विकास\' और `अच्छे दिन\' के शोर की आड़ में धुर नव-उदारवाद और बहुसंख्यक वर्चस्ववाद के पक्ष में जनादेश जुटा लिया गया है, तो ऐसे में जनता परिवार जैसी विपक्षी ताकतें हताश हैं.
सत्येंद्र रंजन का लेख
     
 विचार 
नेहरू की विरासत पर हमला
अब तक हिंदू सांप्रदायिक तत्व चिल्ला चिल्लाकर यह कहते आए हैं कि भारत के विभाजन और मुसलमानों के तुष्टिकरण के लिए गांधी जिम्मेदार थे. अब वे नेहरू को खलनायक बनाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें गांधी की जरूरत है. परंतु केवल सफाई पसंद नेता के रूप में न कि सत्य और अहिंसा में अटूट विश्वास रखने वाले महान राष्ट्रपिता बतौर जो हिंदू-मुस्लिम एकता राष्ट्रीय एकीकरण अहिंसा और सत्य के पैरोकार थे
राम पुनियानी का लेख
 
 मुद्दा 
मंत्री के लिए संविधान
संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रत्येक व्यक्ति को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकारी है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि स्वास्थ्य का अधिकार जीवन के अधिकार का एक अखण्ड हिस्सा है. ऐसे में मंत्री कैसे कह सकते हैं कि सरकार द्वारा भारत के सैंकड़ों नागरिकों के प्राण छीनने पर कुछ डॉक्टरों को तथाकथित जांच के बाद थोड़ी बहुत सजा देकर या दोषमुक्त कर पीड़ितों के साथ न्याय किया जा सकता है.
कनक तिवारी का लेख
     
 मुद्दा 
खेती भी है मेक इन इंडिया
किसानों को उनकी फसल पर मिलने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले मंहगाई भत्ते की तुलना में काफी कम है. अगर इसे खत्म किया जाता है तो बड़ी संख्या में किसान खेती छोड़ शहरों की तरफ पलायन करने लगेंगे. मोदी सरकार को चाहिए कि वह कृषि क्षेत्र के प्रति व्यावहारिक सोच अपनाए. आखिर देश में खेती करना भी \\\'मेक इन इंडिया’ से कम नहीं है.
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का लेख
 
 राजनीति 
काले इरादों की किरकिरी
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का प्रत्यक्ष कटाक्ष यह है कि कोर्ट को सरकार की निष्पक्ष और त्वरित जांच प्रक्रिया में भरोसा नहीं है. उससे बुरा कटाक्ष यह है कि कोर्ट को सरकार की नीयत पर भरोसा नहीं रहा. उससे भी बुरा संवैधानिक फलितार्थ यह है कि देश का सबसे बड़ा न्यायालय देश की सबसे बड़ी सरकार पर अगर अविश्वास प्रकट कर दे तो संविधान कौन से रास्ते सुझाएगा.
संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी के विचार
 
     
 

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 विचार 
वामपंथी कहां हैं?
हमारे देश में एक कहावत है कि कांटे से ही कांटा निकल सकता है. कांग्रेसी विचारधारा नरसिंह राव, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के युग में अतीत से पूरी तौर पर अलग रही. उससे भाजपा ने भी सहकार किया है. विचारधाराच्युत पार्टी सहधर्मी विचारधारा की पार्टी का विकल्प नहीं हो सकती. कई देशों में वामपंथियों ने वैकल्पिक सत्ता बनने की कोशिश की है. भले ही असफलता मिलती रही हो.
कनक तिवारी का लेख
 
 मुद्दा 
आलू और आलू जैसी नीति
एक साल भी नहीं बीता जब आलू की कम कीमतों के कारण किसानों ने इसे सड़कों पर फेंक दिया था. बावजूद इसके सरकार ने पहली बार आलू के आयात की अनुमति दी है. इसके लिए आधिकारिक स्तर यही सफाई दी गई है कि आयात करने से आलू की घरेलू आपूर्ति बढ़ेगी और इसके दाम घट जाएंगे. जबकि इस वर्ष आलू का उत्पादन तकरीबन सामान्य रहा है और इसमें मामूली गिरावट ही दर्ज की गई है
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का विश्लेषण
 
 मुद्दा 
मीडिया में जंगल की जमीन
आदिवासियों के कारण जंगलों का नुक्सान नहीं होता. आदिवासी तो अपनी जरूरत के मुताबिक लकड़ी और वनोपज लेता है. उसके घर में तो आप साल और सागौन के फर्नीचर नहीं पाएंगे. उसके जीवन में तो कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता. लोहा, कोयला के अलावा लघु वनोपज के आधार पर देखें तो इस देश में सर्वाधिक संपन्न तबका तो आदिवासियों को होना चाहिए, लेकिन उनके पास आज बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं.
सुदीप ठाकुर का लेख
         
 मुद्दा 
तटस्थता का चक्रव्यूह
तमाम वाकपटुता, चाटुकारिता और शाइस्तगी के बावजूद बीरबल चुटकुलेबाज ही तो कहे जाते हैं. सत्ता से बेरुख समकालीन गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस क्या लिख दिया देश की झोपड़ियों में अब भी स्वर्णमहल से टकराने की ताब है. निजी जीवन समारोहमय हो और सामाजिक जीवन मनुष्य की चीख, यंत्रणाओं, घबराहट, डर और कुंठाओं से भरा हो. यह कैसा चक्रव्यूह है. यह कैसी तटस्थता है.
कनक तिवारी का लेख
 
 राजनीति 
सभी भारतीय रामज़ादे नहीं
भाजपा को संसद में और दुनिया को दिखाने के लिए उसे ‘विकास‘ का मुखौटा पहनना पड़ता है. दूसरी ओर, अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए उसे अपने पितृसंगठन व उससे जुड़े अन्य संगठनों और पार्टी के भीतर के कई तत्वों के विघटनकारी एजेण्डे पर भी चलना पड़ता है. इसीलिए जहां भी चुनाव होने वाले होते हैं वहां पार्टी अपने इस विभाजनकारी एजेण्डे का इस्तेमाल वोट पाने के लिए करती है
राम पुनियानी का लेख
 
 मुद्दा 
रोहतक के सवाल
हरियाणा की एक बस में लड़कियों से हुई छेड़छाड़ जैसे मामलों में प्रत्यक्षदर्शी अपने ठीक सामने उपस्थित संघर्ष से दो-दो हाथ करने के बजाय व्यवस्था की कमजोरियों को कोसते रहना ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है. ऐसा तब तक चलता रहेगा, जब तक कि आम नागरिक व्यवस्था की ओर से अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हुए स्वयं को अपने दोहरे चरित्र से मुक्त नहीं कर लेता.
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का लेख
             
 विचार 
युद्ध के विरुद्ध
आज दुनिया में अधिकांश धनकुबेरों की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. विश्वभर में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद शोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.
रघु ठाकुर का लेख
 
 विचार 
किसके साथ किसका विकास
क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं, जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं. इन्हीं पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. इनके घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनों का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.
प्रदीप शर्मा के विचार
 
 मुद्दा 
क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?
पारंपरिक रूप से सबसे अधिक सहिष्णु रहा हिंदु धर्म कट्टरपंथियों द्वारा फैलाये जा रही घृणा व धार्मिक तनाव के चलते धीरे-धीरे अपना सौम्य चेहरा बदलता दिख रहा है. जैसे-जैसे धर्म के नाम पर यह राजनीति परवान चढ़ती जायेगी, समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी. हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग-अलग चीजें हैं.
राम पुनियानी के विचार
 
 अंतराष्ट्रीय 
मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल
भारत को विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्देश दिया जा रहा है कि अपनी खाद्यान्न खरीद प्रणाली को खत्म कर दे. इस दोषपूर्ण कदम के खासे गंभीर परिणाम निकलेंगे. इससे न केवल कड़ी मेहनत से हासिल भारत की खाद्य सुरक्षा पद्धति तहस नहस होगी बल्कि कोई साठ लाख किसानों की आजीविका पर भी बन आएगी. इसे लेकर अमरीकी खाद्य निर्यात लॉबी का प्रधानमंत्री मोदी पर जबरदस्त दबाव रहेगा.
देविंदर शर्मा का लेख
             
 

लाल्टू

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