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 पहला पन्ना
 

 
 मुद्दा:समाज 
राजनीति में विचार की जगह
चार विधानसभाओं के चुनाव नतीजों, मीडिया और जनमत सर्वेक्षणों ने यह धारणा बना दी कि नरेन्द्र मोदी के पीएम बनने की अब सिर्फ रस्म-अदायगी होनी है. जहां तक भाजपा विरोधी खेमे की बात है, तो यह साफ है कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय राजनीतिक दलों या नेताओं के लिए अनुलंघनीय विभाजक रेखा है, यह भ्रम 1998-2004 के भाजपा नेतृत्त्व वाले शासन के दौर में ही मिट गया था.
सत्येंद्र रंजन का विश्लेषण
 
 राजनीति:बात पते की 
उम्र का उन्माद
इस बात को बार-बार दोहराए जाने की जरूरत महसूस होती है कि आधुनिकता का संबंध विचार से होता है. वह किसी तरह के नये रूप-रंग में नहीं निहित होती है. युवा उतना ही रूढ़ीवादी हो सकता है, जितना कोई बुजुर्ग. और कोई उम्र की आखिरी देहलीज पर भी आधुनिक हो सकता है. राजनीति में विचारधारा प्रमुख होती है. लेकिन संसदीय राजनीति उन्माद और अंधवाद को अपना हथियार बनाए हुए है.
अनिल चमड़िया के विचार
     
 विचार:उ.प्र. 
आप तो ऐसे न थे
आम आदमी पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर काफी असंतोष है कि उत्तर प्रदेश के संयोजक ने स्थानीय स्तर पर कोई राय-मशविरा किए बगैर लोगों को टिकट देने में मनमानी की. उन्होंने अपने लोगों को उत्तर प्रदेश में संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर बैठा रखा है. सवाल यह है कि आखिर आम आदमी पार्टी संजय सिंह की कार्यशैली को किन कारणों से बर्दाश्त कर रही है?
संदीप पांडेय के विचार
 
 मुद्दा:दिल्ली 
चुनाव में किसान
यह चुनावी उपहार का समय है. आप जितने ज्यादा संगठित हैं और जितना अधिक आपका जनाधार है, आपके लिए लोकसभा चुनाव के इस दौर में संभावनाएं भी उतनी ही अधिक हैं. कुल आबादी का 54 फीसदी हिस्सा किसानों का है. किसान और भूमिहीन कृषि मजदूरों की कुल आबादी तकरीबन 60 करोड़ है. लेकिन आश्चर्य यह कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद देश में किसान अभी भी उपेक्षित हैं.
कृषि एवं खाद्य विशेषज्ञ देविंदर शर्मा के विचार
     
 राजनीति:गुजरात 
गरीबी की गेंद
योजना आयोग के बजाये गुजरात सरकार के खाद्यान और नागरिक आपूर्ति विभाग ने गरीबी मापने का एक नया फार्मूला पेश किया है. इसके बाद एक बार फिर गरीबी पर बहस छिड़ गई है. राहुल राजेश के विचार
 
 साहित्य: 
पेंग्विन का आत्मसमर्पण
वेंडी डॉनिगर की द हिंदूज़: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री वापस लेने वाला यदि दिल्ली-6 स्थित कोई पिद्दीजान तलुआचाटू प्रकाशक होता तो उसकी ऐसी वणिक-सुलभ कायरता अपनी स्वाभाविकता में फ़ौरन समझ में आ जाती, लेकिन पेन्ग्विन? विष्णु खरे के विचार
 
     
 

 
     
 

 
     
   
         
 विचार:समाज 
उदासी का सम्मान करने वाले
सेण्टी मारने जैसा किसी के दुःख का उपहास करने के लिए प्रयुक्त शब्द ने कई दिनों तक माथे को बिच्छुओं से भर दिया था. अलबता बाद में जाना कि सेन्टीमेंटल शब्द से इसका रिश्ता है, जो कि लगभग ऋणात्मक लक्षण के रूप में स्वीकृत हो चुका है. मनोज कुमार झा का आलेख
 
 राजनीति:दिल्ली 
निदो की मौत से उठते सवाल
निदो तानिया की मौत उसी राजधानी दिल्ली में हुई है, जिसने हाल के दिनों में आम आदमी पार्टी की सरकार के कथित राजनीतिक प्रयोगों की वजह से सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं और राष्ट्रीय राजनीति के एक बड़े फलक को प्रभावित किया है.अभिनव श्रीवास्तव की राय
 
 बहस:आधी दुनिया 
एसिड अटैक और प्रेम की प्रतिहिंसा
जब तक लड़कियों में ना कहने का साहस नहीं था, समाज अपनी यथास्थिति बनाये रखते हुए, लड़कियों को उनकी कमतर स्पेस में रखते हुए संतुष्ट था. एक पुरूष के लिये उसके प्रेम को नकारा जाना उसकी ज़िंदगी की सबसे शर्मनाक और अपमानजनक स्थिति है, जिसे वह आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता. सुधा अरोड़ा का विश्लेषण
         
 मुद्दा:बात पते की 
मोदी से पूछिए न !
नरेन्द्र मोदी का हालिया इंटरव्यू एक मुख्य चैनल में तीन इंटव्यूकारों ने लिया. सभी प्रश्न ढीले ढाले, संयत भाषा में, सहमी हुई मुद्रा में एक के बाद एक तयशुदा तकनीक के तहत पूछे. उत्तर प्रामाणिक तौर पर दमखम के साथ आंकड़ों की अंकगणित को भी साधते हुए नरेन्द्र मोदी द्वारा सधी हुई शैली में दिए गए. मुशायरा सफल रहा. दरी बिछाने, दरी उठाने वाले बेहद व्यावसायिक नज़र आए.
गांधीवादी चिंतक कनक तिवारी के विचार
 
 मुद्दा:बात पते की 
हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई!
यह बात हम सब बेहतर जानते हैं कि यूरोप के लोगों को अपनी ग़लतियों को समझने के लिए पिछली सदी में भयंकर तबाही और विनाश से गुजरना पड़ा. जो आज मोदी और संघ परिवार के समर्थन में हैं, देर सबेर वो अपनी ग़लती समझेंगे, पर तब तक देर हो चुकी होगी. अगली पीढ़ियाँ अचंभित होती रहेंगीं कि इतना कुछ उजागर होने के बावजूद भी उनके माता-पिता इस अँधेरे में कैसे फँस गए.
लाल्टू के विचार
 
 बहस:बात पते की 
कहां गई वह भाजपा ?
पार्टी की ओर से एक अधिकृत नारा दिया गया है- अबकी बार मोदी सरकार. ऐसा लगता है, मोदी किसी व्यक्ति का नाम न होकर पार्टी का नाम है! चाटुकारिता और व्यक्तिपूजा को प्रोत्साहित करने के लिए भाजपा सरकार को मोदी सरकार बना दिया है. जब वाजपेयी और आडवाणी को नेता हेतु प्रोजेक्ट किया गया था, तब भी वाजपेयी सरकार और आडवाणी सरकार के नारे पार्टी ने जारी नहीं किए थे.
दामोदर दत्त दीक्षित के विचार
             
 मुद्दा:मध्यप्रदेश 
परमाणु ऊर्जा के खिलाफ चुटका
मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल मंडला जिले के चुटका में परमाणु विद्युत परियोजना का हजारों लोगों ने जब विरोध किया तो जुझारू संघर्ष व विरोध की तीव्रता को देखते हुये सरकार को अपना तामझाम समेटने पर मजबूर होना पड़ा.अशोक मालवीय की रिपोर्ट
 
 मुद्दा:समाज 
अशालीनता को भी लांघती टिप्पणी
क्या फांसी पर चढ़ाए जा रहे व्यक्ति से हम यह कह सकते हैं कि उसकी मौत अब अपरिहार्य है अतएव वह अब इसका आनंद लेने लगे? क्या हलाल होते बकरे से यह उम्मीद की जा सकती है कि चाकू की रगड़ के साथ वह नाचने लगे. चिन्मय मिश्र के विचार
 
 बहस:छत्तीसगढ़ 
बस्तर के सवाल-जवाब
1859 में बस्तर के आदिवासियों ने पेड़ काटने के खिलाफ आह्वान किया- एक पेड़ के बदले एक सिर. अंग्रेजों ने निर्देश जारी किये कि जंगल की कटाई करने वाले मजदूरों के साथ हथियारबंद सिपाही भेजे जायें. राजीव रंजन प्रसाद का विश्लेषण
 
 मुद्दा:मध्यप्रदेश 
अन्नपूर्णा नहीं हैं ये सरकारें!
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना में महज 20 किलो गेहूं और चावल मिलता है; यानी एक सदस्य को एक दिन के लिए 133 ग्राम गेहूं. इससे 4 रोटियां बनती हैं. सचिन कुमार जैन का विश्लेषण
             
 

लाल्टू

तीन कविताएं

रेत का पुल

मोहन राणा

कुतुब एक्सप्रेस

रामकुमार तिवारी

पंखुरी सिन्हा

तीन कविताएं

अरविंद कुमार

बृहत् समांतर कोश का आविर्भाव

 
 

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