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 पहला पन्ना
 

 
 मुद्दा 
सांप्रदायिकता के साए में बचपन
अहमदाबाद के दो स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के धर्म के अनुसार यूनिफार्म दिए गए हैं यानी हिंदू विद्यार्थी बहुल स्कूल में भगवा रंग का यूनिफार्म है जबकि मुस्लिम विद्यार्थियों की अधिकता वाले स्कूल में हरे रंग का यूनिफार्म. इससे ये सवाल उठता है कि अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था में इस तरह की रूढि़बद्ध धारणाएँ घर करती गयीं तो हम भविष्य में कैसा समाज बनायेगें, इसकी कल्पना ही की जा सकती है.
राम पुनियानी का लेख
 
 मुद्दा 
किसानों की आमदनी बढ़ाना जरूरी
देश में पिछले 20 सालों में लगभग तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है और ये सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. आसान और कम ब्याज पर ऋण की सुविधाओं से भी किसान कर्ज के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सकते. किसान को कर्ज नहीं, आमदनी चाहिए. हम वर्षों से किसानों को बेहतर कमाई से वंचित करते रहे हैं. एक के बाद एक आने वाली सरकारें जानबूझकर किसानों को गरीब बने देखना चाहती हैं.
देविंदर शर्मा का विश्लेषण
     
 राज्य 
विकास के भूगोल में गायब आमेरा
विदिशा जिले के गंजबासौदा विकासखंड में जंगली इलाकों में रहने वाले सहरिया जनजाति को आजादी के 62 साल बीतने के बाद भी न तो बुनियादी सुविधाएं मिली हैं और न ही इनमें फैले कुपोषण को दूर करने व पोषण आहार में बढो़तरी के जमीनीस्तर पर प्रयास हो रहे हैं. यहां शासन प्रति वर्ष पांच करोड़ रुपए कुपोषण को दूर करने पर खर्च कर रहा है. इसके बावजूद यहां कुपोषण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.
अशोक गंगराडे की रिपोर्ट
 
 विचार 
बराबरी का समाज चाहते थे अंबेडकर
आज बाबा साहब अंबेडकर का नाम लेकर राजनैतिक रोटियॉ सेंकने वाले कुछ लोग ’’नवब्राम्हणवाद’’ स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं. ऐसे लोग जातिप्रथा की विषमता को मिटाना नहीं चाहते बल्कि अपनी जाति को श्रेष्ठ बनाना या शीर्ष पर बिठाना चाहते हैं. यह पुराने ब्राम्हणवाद का नव ब्राम्हणवाद में रुपांतरण करना होगा. ये विचार बाबा साहब के सामाजिक समता के सिद्धांतों से बिल्कुल विपरीत है.
रघु ठाकुर का लेख
     
 राज्य 
युक्तियुक्तकरण या उदारीकरण
युक्तियुक्तकरण के नाम पर रमन सिंह सरकार ने बीपीएल परिवारों को दिए जाने वाले अनाज में कटौती कर छत्तीसगढ़ की 2.5 करोड़ जनता को बाज़ार में धकेल दिया गया है - लुट-पिटकर अनाज मगरमच्छों की तिजोरियों को भरने के लिए. रमन-मोदी जोड़ी का असली मकसद भी यही है. किसानों का एक-एक दाना धान खरीदने के वादे से इंकार के बाद यही होना था कि गरीबों के मुंह से निवाला छीनने की कसरत की जाएं.
संजय पराते का लेख
 
 मुद्दा 
क्रॉस पर हमला
मदर टेरेसा के संबंध में मोहन भागवत की टिप्पणी के बाद से ईसाईयों पर हमले बढते जा रहे हैं और हरियाणा व कोलकाता की घटनाएं इसका प्रतीक हैं. विहिप खुलकर और हमलों की धमकी दे रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने हाल में इस पर अपनी समझीबूझी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जायेगा. परंतु हम सब जानते हैं कि मोदी अकसर जो कहते हैं, वह उनका मंतव्य नहीं होता
राम पुनियानी का लेख
 
     
 

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 मुद्दा 
किसानों के मन की बात
प्रधानमंत्रीजी कृपया किसानों को दिहाड़ी मजदूर मत बनाइए और न ही वे शहरों में रिक्शा खींचना चाहते हैं. किसानों की जमीन ही उनकी एकमात्र आर्थिक सुरक्षा है. उद्योगों को मिलने वाली मदद राशि का यदि थोड़ा हिस्सा भी उन्हें दिया जाए तो उनके आर्थिक सपने साकार हो सकते हैं. यदि महज 2 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष कृषि को दिया जाए तो यही वास्तव में सबका साथ, सबका विकास होगा
देविंदर शर्मा का लेख
 
 बहस 
गांधी विचार के हत्यारे
आज जब सरकारें सुविधाजनक रूप से गांधी जयंती को राष्ट्रीय अवकाशों की सूची में शामिल करना भूल रही है, जब गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के उग आए हैं और द हिंदू की तो रिपोर्ट है कि हिंदू महासभा ने विभिन्न पूजास्थलों में रखने के लिए गोडसे की 500 प्रतिमाएं बुलवाई हैं तो गांधी पर जस्टिस काटजू के प्रहार मौजूदा व्यवस्था (और उसके क्षुद्र सहयोगियों) के साथ बड़ी सफाई से फिट होते हैं.
प्रीतीश नंदी का लेख
 
 विचार 
राजनीति की बिसात पर गौमांस
क्या समाज के किसी वर्ग की खानपान की आदतों को राजनीति का विषय बनाया जा सकता है? क्या कोई पशु, जिसे समाज का एक तबका, माता की तरह पूजता हो, राजनीति की बिसात का मोहरा बन सकता है? यद्यपि अकल्पनीय परंतु यह सच है कि गाय, भारतीय राजनैतिक परिदृष्य में एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है. आज एक बार फिर गाय का इस्तेमाल समाज को साम्प्रदायिक आधार पर धु्रवीकृत करने के लिए किया जा रहा है
राम पुनियानी का लेख
         
 मुद्दा: 
इतिहास से हम डरते क्यों हैं
आजादी की लड़ाई के दौर में सुभाषचंद्र बोस ने विचार की दृष्टि से भी और रणनीति की दृष्टि से भी गलत निर्णय लिये जिसका परिणाम देश ने भी और स्वंय सुभाष ने भी भुगता. लेकिन इससे इतिहास में सुभाष की जगह पर कोई आंच नहीं आ सकती है! वे हमारे नेताजी थे, हैं और रहेंगे. आज जरूरी है सच्चाई से घबराए बिना उनसे जुड़े जितने राजनीतिक दस्तावेज हैं, वे सब सार्वजनिक कर दिए जाएं.
कुमार प्रशांत का विश्लेषण
 
 राज्य 
इस अप्रायोजित को भी देखें
क्या प्रधानमंत्रीजी सहित तमाम सरकारें बच्चों के बुनियादी हकों के लिए, उनके अधिकार वास्तव में दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. क्या हम उजला ही उजला देखना चाहते हैं या उस सच को भी देखना चाहते हैं, जो सचमुच प्रायोजित नहीं है. जिस बस्तर में देश के मुखिया को बच्चों से मिलवाया जा रहा था उसी बस्तर के कुछ बच्चों को दस दिन पहले महाराष्ट्र की होटलों में काम करवाने के लिए बंधक बनाया गया था.
राकेश कुमार मालवीय का लेख
 
 राज्य 
सरकारी स्कूल बंद करने का मतलब
कम दर्ज संख्या के आधार पर पूरे देश में 40000 स्कूलों को बंद किया जा रहा है. इनमें छत्तीसगढ़ के लगभग 2000 स्कूल हैं. इन स्कूलों के बंद होने से छत्तीसगढ़ में लगभग 50-60 हजार बच्चों के प्रभावित होने और 4000 लोगों के रोजगार खोने की आशंका है. सरकारी स्कूलों को बंद करने का यह कदम केवल छत्तीसगढ़ में 40-50 करोड़ रुपयों का पूंजीपतियों के लिए शिक्षा \\\'बाज़ार\\\' भी पैदा करेगा.
संजय पराते का लेख
             
 विचार 
युद्ध के विरुद्ध
आज दुनिया में अधिकांश धनकुबेरों की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. विश्वभर में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद शोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.
रघु ठाकुर का लेख
 
 विचार 
किसके साथ किसका विकास
क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं, जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं. इन्हीं पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. इनके घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनों का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.
प्रदीप शर्मा के विचार
 
 मुद्दा 
क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?
पारंपरिक रूप से सबसे अधिक सहिष्णु रहा हिंदु धर्म कट्टरपंथियों द्वारा फैलाये जा रही घृणा व धार्मिक तनाव के चलते धीरे-धीरे अपना सौम्य चेहरा बदलता दिख रहा है. जैसे-जैसे धर्म के नाम पर यह राजनीति परवान चढ़ती जायेगी, समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी. हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग-अलग चीजें हैं.
राम पुनियानी के विचार
 
 अंतराष्ट्रीय 
मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल
भारत को विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्देश दिया जा रहा है कि अपनी खाद्यान्न खरीद प्रणाली को खत्म कर दे. इस दोषपूर्ण कदम के खासे गंभीर परिणाम निकलेंगे. इससे न केवल कड़ी मेहनत से हासिल भारत की खाद्य सुरक्षा पद्धति तहस नहस होगी बल्कि कोई साठ लाख किसानों की आजीविका पर भी बन आएगी. इसे लेकर अमरीकी खाद्य निर्यात लॉबी का प्रधानमंत्री मोदी पर जबरदस्त दबाव रहेगा.
देविंदर शर्मा का लेख
             
 

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