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 पहला पन्ना
 

 
 विचार 
अंग्रेजी दूतों का दिलचस्प हिंदी प्रेम
अंग्रेजी माध्यमों से पढ़ कर नौकरशाही में आए लोगों को जब दिल्ली दरबार अचानक हिंदी में काम करने का फरमान सुनाता है तो हम हिंदी-प्रेमी मुग्ध हो जाते हैं. उत्तर भारत में जो हिंदी प्रेम का गाना गा रहे हैं, उनमें से शायद ही किसी के बच्चे हिंदी स्कूल में पढ़ते होंगे. अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाने वाले उम्मीद करते हैं कि मिजोरम और चेन्नई वासी हिंदी बोलें.
मृणाल वल्लरी का विश्लेषण
 
 विचार 
धरती पर भगवान
दक्षिण एशिया में इन दिनों जहां एक ओर धार्मिकता में तेजी से वृद्धि हो रही है वहीं धर्म और राजनीति का घालमेल भी बढ़ रहा है. राजनैतिक दुरूपयोग के लिए सामान्यतः धर्मों के पुरातनपंथी, दकियानूसी संस्करणों का इस्तेमाल किया जाता है. जैसे इस्लाम का वहाबी संस्करण व हिन्दू धर्म का ब्राह्मणवादी संस्करण. कुछ देशों में बौद्ध धर्म भी कट्टरवादी संस्करण का जोर बढ़ रहा है.
राम पुनियानी के विचार
     
 विचार 
खतरे में है मनरेगा
ग्रामीण गरीबों और कमजोर समुदायों का आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक सशक्तिकरण का कार्यक्रम मनरेगा अब खतरे में है. भाजपा-मोदी के इस रूख को समझना मुश्किल नहीं है. चुनाव में उसने बेरोजगारों को रोजगार देने का वादा किया था लेकिन वह तो चुनावी हितों से प्रेरित था. सत्ता में आने के बाद यदि इन चुनावी वादों को पूरा करने जाएँ तो कार्पोरेटों के हितों पर चोट पहुंचती है.
संजय पराते का विश्लेषण
 
 मुद्दा 
बेशक, बेझिझक, बिंदास हिंदी बोलिए!
हमें अंग्रेजी नहीं जानने-बोलने के कारण नहीं, बल्कि हिंदी या अपनी मातृभाषा नहीं जानने-बोलने के कारण शर्मिंदा महसूस करने की जरूरत है आप भले हवाई जहाज या राजधानी एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे हों- अपने सहयात्रियों से हिंदी में नि:संकोच बात करके देखिए, आपका खुद से ओढ़ा हुआ अकेलापन छूमंतर हो जाएगा! इसलिए इंगलिश-विंगलिश नहीं; बेशक, बेझिझक, बिंदास हिंदी बोलिए!!!
राहुल राजेश के विचार
     
 विचार 
अच्छे दिन आ गए !
भाजपा सांसद गिरिराज सिंह के यहां पचास हजार रुपए चोरी हुए. पुलिस ने सवा करोड़ चोर से बरामद कर लिए. सारे सांसद ऐसा चमत्कार कर दें तो विदेशों से कालाधन लाने की क्या ज़रूरत है? लोगों ने लोकसभा के पुराने ढांचे में नई मोदी सरकार को चुना था. अर्थात् पुरानी बोतल में नई शराब डाली थी. भाजपा सरकार की नई बोतल में मनमोहन सरकार की पुरानी नीतियों की शराब मंत्री छकने लगे हैं.
संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी के विचार.
 
 विचार 
सांप्रदायिक समाज में धर्मनिरपेक्षता
लोकसभा चुनाव में सफलता से प्रफुल्लित भाजपा कहती है कि केवल उसे ही धर्मनिरपेक्षता की सही समझ है. उसके अनुसार धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सबके साथ न्याय किसी का तुष्टीकरण नहीं और किसी के साथ भेदभाव नहीं. यह विडम्बना है कि धर्मनिरपेक्षता की यह परिभाषा जो प्रजातांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष समाज की मूल अवधारणा के विरूद्ध है को कई लोग सच्ची धर्मनिरपेक्षता बता रहे हैं.
राम पुनियानी का विश्लेषण
 
     
 

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प्रीतीश नंदी

 
 
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 विचार 
एक आत्ममुग्ध चुटकुला
वेदप्रताप वैदिक के मुलाकात के प्रचार से तो आतंकवादी घोषित हाफिज़ सईद का चेहरा उजला होने की कोशिश झलकती है कि वह डेमोक्रैट आदमी है. लाहौर के साधारण से मकान में रहता है. मेहमान के लिए मामूली फाइबर की कुर्सियां हैं. मेहमान को मोटर गाड़ी तक छोड़ने आता है. कार का दरवाज़ा भी खोलता है. ऐसे बेचारे हाफिज़ सईद पर अमेरिका और भारत ने करोड़ों रुपयों का दांव क्यों लगा रखा है.
गांधीवादी चिंतक कनक तिवारी के विचार
 
 मुद्दा 
इक्कीसवीं सदी का कचरा
पिछले कुछ वर्षों से दुनियाभर में निश्चित रूप से पर्यावरण के बारे में जागरूकता काफी बढी है और यह शुभ संकेत है. एक ऐसे समय में जब पूरी पृथ्वी प्रदूषण के दुष्प्रभावों को झेल रहा है. हमें पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से लेकर पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए ताकि आने वाली पीढी के लिए हम अपने इस सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित रख सकें.
डॉ. गरिमा भाटिया का विश्लेषण
 
 आधी दुनिया 
वह सुबह कभी तो आएगी
क्या हम कह सकते हैं कि अपनी कमियाँ मानने से शर्माए बिना सरकार चलाई जाएगी, वह सुबह कभी तो आएगी! अगर बु्द्धिजीवियों से पूछो तो वह कहेंगे कि हमारी संस्कृति में यह नहीं था, यह तो औपनिवेशिक काल की देन है. कुछ और हमें बतलाएँगे कि स्त्रियों के साथ हिंसा जैसी घटनाएँ तो दीगर मुल्कों में सरेआम होती रहती हैं. उन्हें हमारी ओर उँगली उठाने की जगह अपनी ओर देखना चाहिए
लाल्टू के विचार
         
 मुद्दा 
धर्म की सीमा में क्यों बंधे प्रेम?
देश में सांप्रदायिक राजनीति के परवान चढ़ने के साथ ही, अंतर्धामिक विवाह कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गये हैं. अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना, सांप्रदायिक राजनीति के एजेण्डे का ही हिस्सा है. जाहिर है कि काल्पनिक ‘लव जिहाद’ के खिलाफ अभियान से एक तरफ मुसलमान घृणा के पात्र बनते हैं तो दूसरी ओर महिलाओं के खिलाफ पितृसत्तात्मक व्यवस्था को मजबूती मिलती है.
राम पुनियानी के विचार
 
 राजनीति 
नए दौर और नए मोदी की हकीकत
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार लगभग हर रोज अपने ताजे फैसलों से यह सन्देश देने की कोशिश में जुटी हुयी है कि देश की राजनीति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था को वह किसी पुरानी जकड़न से बाहर निकाल रही है. मीडिया के एक बड़े तबके ने भी सार्वजनिक दायरों में यह भ्रम बहुत आसानी से फैला दिया है कि मोदी सरकार वास्तव में कोई बदलाव वाली और उत्थानवादी परिघटना है.
अभिनव श्रीवास्तव के विचार
 
 विचार 
राहुल गांधी के नाम दसवां खत
यूरो-अमेरिकी, पूंजीवादी, जनविरोधी, निजीकरण-समर्थक मूल्यों को तरजीह देने के कारण कांग्रेस अपने पाथेय तक पहुंचने के बदले तफरीह करती दिखाई दे रही है. कुछ विचारक मानते हैं कि यदि मतदाता को आर्थिक प्रलोभन देकर उसका चरित्र खरीदा जा सकता है. ऐसा विश्वास सभी पार्टियों का है लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में कोई योगदान नहीं किया. उनसे कांग्रेस की तुलना कैसे हो सकती है?
कनक तिवारी का पत्र
             
 विचार 
जन आंदोलन की जगह
आंदोलन नहीं होते तो हम आज आजाद नहीं होते. कल तक देश की सत्ता पर थोड़े से घरानों का राज था और अब इन पर कंपनियों का भी राज हो गया है. ऐसे में कोई कब तक चुप बैठे. इस दमनचक्र के चलते देश के जिन किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और वंचितों का वजूद ही खतरों में पड़ गया है.
प्रसून लतांत के विचार
 
 बहस 
दंगे और इंसाफ की लाचारी
भारत में राज्य प्रायोजित हिंसा की रपट पुलिस थानों में पीड़ित व्यक्ति दर्ज़ कराने की हिम्मत नहीं रखता. वह थाने जाता है तो जान माल की धमकी मिलती है, जो क्रियान्वित की जा सकती है. किसी तरह प्राथमिकी दर्ज़ भी कर ली गई, तब भी जांच तो थाने अधिकारियों को ही करनी होती है. कनक तिवारी के विचार
 
 मुद्दा 
हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई!
यह बात हम सब बेहतर जानते हैं कि यूरोप के लोगों को अपनी ग़लतियों को समझने के लिए पिछली सदी में भयंकर तबाही और विनाश से गुजरना पड़ा. जो आज मोदी और संघ परिवार के समर्थन में हैं, देर सबेर वो अपनी ग़लती समझेंगे, पर तब तक देर हो चुकी होगी. लाल्टू के विचार
 
 राजनीति 
उम्र का उन्माद
इस बात को बार-बार दोहराए जाने की जरूरत महसूस होती है कि आधुनिकता का संबंध विचार से होता है. वह किसी तरह के नये रूप-रंग में नहीं निहित होती है. युवा उतना ही रूढ़ीवादी हो सकता है, जितना कोई बुजुर्ग. और कोई उम्र की आखिरी देहलीज पर भी आधुनिक हो सकता है. अनिल चमड़िया के विचार
             
 

लाल्टू

तीन कविताएं

रेत का पुल

मोहन राणा

कुतुब एक्सप्रेस

रामकुमार तिवारी

पंखुरी सिन्हा

तीन कविताएं

अरविंद कुमार

बृहत् समांतर कोश का आविर्भाव

 
 

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