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 पहला पन्ना
 

 
 विचार 
युद्ध के विरुद्ध
आज दुनिया में अधिकांश धनकुबेरों की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. विश्वभर में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद शोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.
रघु ठाकुर का लेख
 
 विचार 
किसके साथ किसका विकास
क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं, जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं. इन्हीं पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. इनके घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनों का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.
प्रदीप शर्मा के विचार
     
 विचार 
कांग्रेसियों मोदी को समझो !
मातृ संस्था को दरकिनार कर खुद का कद उससे बड़ा बनाने की कोशिश करना लोकतंत्र में घातक प्रयोग है. गुजरात के मुख्यमंत्री का नकाब उतारकर प्रधानमंत्री बनकर अन्य प्रान्तों के जायज़ दावों के मुकाबले गृहप्रदेश को तरजीह देना लोकतंत्र के सिद्धान्तों के खिलाफ है. सामूहिक उत्तरदायित्व की संवैधानिक जिम्मेदारियों वाली मंत्रिपरिषद के सदस्यों की मुश्कें कसना अधिनायकवादी चरित्र है.
कनक तिवारी का लेख
 
 विचार 
वैचारिक सफाई ही बापू को सच्ची श्रद्धांजलि
आज जब गोडसे को मानने वाली विचारधारा हावी होती दिखाई दे रही है और ‘लव-जिहाद’ जैसे काल्पनिक और सांप्रदायिक मुद्दों को लहकाया जा रहा है तब अमन और मोहब्बत पसंद हर धर्म, संप्रदाय और जाति के लिए यह बहुत आवश्यक है कि वह गांधी के जीवन संघर्ष और संदेश को समझे, हम इंसानियत में उसके भरोसे को समझने का प्रयास करें. और इसके लिये बाहरी सफाई के साथ-साथ कहीं ज्यादा जरुरी वैचारिक सफाई है.
मनीष शांडिल्य के विचार
     
 विचार 
अंग्रेजी दूतों का दिलचस्प हिंदी प्रेम
अंग्रेजी माध्यमों से पढ़ कर नौकरशाही में आए लोगों को जब दिल्ली दरबार अचानक हिंदी में काम करने का फरमान सुनाता है तो हम हिंदी-प्रेमी मुग्ध हो जाते हैं. उत्तर भारत में जो हिंदी प्रेम का गाना गा रहे हैं, उनमें से शायद ही किसी के बच्चे हिंदी स्कूल में पढ़ते होंगे. अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाने वाले उम्मीद करते हैं कि मिजोरम और चेन्नई वासी हिंदी बोलें.
मृणाल वल्लरी का विश्लेषण
 
 विचार 
खतरे में है मनरेगा
ग्रामीण गरीबों और कमजोर समुदायों का आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक सशक्तिकरण का कार्यक्रम मनरेगा अब खतरे में है. भाजपा-मोदी के इस रूख को समझना मुश्किल नहीं है. चुनाव में उसने बेरोजगारों को रोजगार देने का वादा किया था लेकिन वह तो चुनावी हितों से प्रेरित था. सत्ता में आने के बाद यदि इन चुनावी वादों को पूरा करने जाएँ तो कार्पोरेटों के हितों पर चोट पहुंचती है.
संजय पराते का विश्लेषण
 
     
 

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 मुद्दा 
बेशक, बेझिझक, बिंदास हिंदी बोलिए!
हमें अंग्रेजी नहीं जानने-बोलने के कारण नहीं, बल्कि हिंदी या अपनी मातृभाषा नहीं जानने-बोलने के कारण शर्मिंदा महसूस करने की जरूरत है आप भले हवाई जहाज या राजधानी एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे हों- अपने सहयात्रियों से हिंदी में नि:संकोच बात करके देखिए, आपका खुद से ओढ़ा हुआ अकेलापन छूमंतर हो जाएगा! इसलिए इंगलिश-विंगलिश नहीं; बेशक, बेझिझक, बिंदास हिंदी बोलिए!!!
राहुल राजेश के विचार
 
 मुद्दा 
इक्कीसवीं सदी का कचरा
पिछले कुछ वर्षों से दुनियाभर में निश्चित रूप से पर्यावरण के बारे में जागरूकता काफी बढी है और यह शुभ संकेत है. एक ऐसे समय में जब पूरी पृथ्वी प्रदूषण के दुष्प्रभावों को झेल रहा है. हमें पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से लेकर पर्यावरण सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए ताकि आने वाली पीढी के लिए हम अपने इस सबसे सुंदर ग्रह पृथ्वी को सुरक्षित रख सकें.
डॉ. गरिमा भाटिया का विश्लेषण
 
 आधी दुनिया 
वह सुबह कभी तो आएगी
क्या हम कह सकते हैं कि अपनी कमियाँ मानने से शर्माए बिना सरकार चलाई जाएगी, वह सुबह कभी तो आएगी! अगर बु्द्धिजीवियों से पूछो तो वह कहेंगे कि हमारी संस्कृति में यह नहीं था, यह तो औपनिवेशिक काल की देन है. कुछ और हमें बतलाएँगे कि स्त्रियों के साथ हिंसा जैसी घटनाएँ तो दीगर मुल्कों में सरेआम होती रहती हैं. उन्हें हमारी ओर उँगली उठाने की जगह अपनी ओर देखना चाहिए
लाल्टू के विचार
         
 मुद्दा 
दवा माफिया का बढ़ता शिकंजा
छत्तीसगढ़ और म. प्र. के दवा घोटालों की जॉंच सी.बी.आई. के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में होना चाहिये क्योंकि यह दवा घोटाला छत्तीसगढ़ से गुजरात तक फैला हुआ है. अकेले सी. बी. आई. जॉंच पर भी अब भरोसा नही किया जा सकता क्योंकि उसकी विश्वसनीयता निरंतर गिर रही है तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और टिप्पणी के बावजूद सी. बी. आई. अपने तोता की भूमिका से हटने को तैयार नही है.
समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर का लेख
 
 मुद्दा 
बंद गली से आगे
जब विकास के `गुजरात मॉडल\' का स्वांग पिछले चुनाव में प्रस्तुत किया गया, तो जनता परिवार समर्थक मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भी उस बह गया और जनता परिवार के दल और नेता असहाय होकर यह देखते रहे. `विकास\' और `अच्छे दिन\' के शोर की आड़ में धुर नव-उदारवाद और बहुसंख्यक वर्चस्ववाद के पक्ष में जनादेश जुटा लिया गया है, तो ऐसे में जनता परिवार जैसी विपक्षी ताकतें हताश हैं.
सत्येंद्र रंजन का लेख
 
 विचार 
नेहरू की विरासत पर हमला
अब तक हिंदू सांप्रदायिक तत्व चिल्ला चिल्लाकर यह कहते आए हैं कि भारत के विभाजन और मुसलमानों के तुष्टिकरण के लिए गांधी जिम्मेदार थे. अब वे नेहरू को खलनायक बनाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें गांधी की जरूरत है. परंतु केवल सफाई पसंद नेता के रूप में न कि सत्य और अहिंसा में अटूट विश्वास रखने वाले महान राष्ट्रपिता बतौर जो हिंदू-मुस्लिम एकता राष्ट्रीय एकीकरण अहिंसा और सत्य के पैरोकार थे
राम पुनियानी का लेख
             
 विचार 
जन आंदोलन की जगह
आंदोलन नहीं होते तो हम आज आजाद नहीं होते. कल तक देश की सत्ता पर थोड़े से घरानों का राज था और अब इन पर कंपनियों का भी राज हो गया है. ऐसे में कोई कब तक चुप बैठे. इस दमनचक्र के चलते देश के जिन किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और वंचितों का वजूद ही खतरों में पड़ गया है.
प्रसून लतांत के विचार
 
 बहस 
दंगे और इंसाफ की लाचारी
भारत में राज्य प्रायोजित हिंसा की रपट पुलिस थानों में पीड़ित व्यक्ति दर्ज़ कराने की हिम्मत नहीं रखता. वह थाने जाता है तो जान माल की धमकी मिलती है, जो क्रियान्वित की जा सकती है. किसी तरह प्राथमिकी दर्ज़ भी कर ली गई, तब भी जांच तो थाने अधिकारियों को ही करनी होती है. कनक तिवारी के विचार
 
 मुद्दा 
हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई!
यह बात हम सब बेहतर जानते हैं कि यूरोप के लोगों को अपनी ग़लतियों को समझने के लिए पिछली सदी में भयंकर तबाही और विनाश से गुजरना पड़ा. जो आज मोदी और संघ परिवार के समर्थन में हैं, देर सबेर वो अपनी ग़लती समझेंगे, पर तब तक देर हो चुकी होगी. लाल्टू के विचार
 
 राजनीति 
उम्र का उन्माद
इस बात को बार-बार दोहराए जाने की जरूरत महसूस होती है कि आधुनिकता का संबंध विचार से होता है. वह किसी तरह के नये रूप-रंग में नहीं निहित होती है. युवा उतना ही रूढ़ीवादी हो सकता है, जितना कोई बुजुर्ग. और कोई उम्र की आखिरी देहलीज पर भी आधुनिक हो सकता है. अनिल चमड़िया के विचार
             
 

लाल्टू

तीन कविताएं

रेत का पुल

मोहन राणा

कुतुब एक्सप्रेस

रामकुमार तिवारी

पंखुरी सिन्हा

तीन कविताएं

अरविंद कुमार

बृहत् समांतर कोश का आविर्भाव

 
 

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