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Gurukul ICS Bilaspur
 
 पहला पन्ना
 

 
 मुद्दा:राजस्थान 
साहित्य का ओपेरा संस्करण
जिस समय जयपुर में मार्कण्डेय कार्टजू जब बोल रहे थे-देश और लोगों की असली समस्याओं से भटकाने के लिए जनता को धर्म, फिल्म, क्रिकेट और गैर जिम्मेदार मीडिया की अफीम का नशा दिया जा रहा है, उसी समय जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजन स्थल डिग्गी पैलेस टीवी एंकर ओप्रा विन्फ्रे के प्रशंसकों से घिरा हुआ था. बरखा दत्त चहकते हुये पूछ रही थीं- क्या आप मुझे हायर करेंगी?
आशीष कुमार अंशु की टिप्पणी
 
 राजनीति:उ.प्र. 
तब तो मतलब है चुनाव आयोग का
विधानसभा चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार के खर्च की सीमा 16 लाख तय की गई है, किंतु राजनीतिक दलों के लिए प्रचार की कोई सीमा नहीं है. राजनीतिक दलों के मद से अखबारों में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों और प्रचार के दौरान हेलीकॉप्टरों या चार्टर्ड हवाई जहाजों के इस्तेमाल पर कोई अंकुश नहीं है. खर्च की सीमा सिर्फ छोटे दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए है.
मैगसेसे से सम्मानित संदीप पांडेय के विचार
     
 मुद्दा:बात पते की 
मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?
सरकार जितना अधिक कृषि के बुनियादी आधारों को ध्वस्त करके किसानों को खेती छोड़ने और उन्हें शहर में पलायन करने को मजबूर करेगी, भूख और कुपोषण का कहर उतना ही अधिक विकराल होगा. गरीबों और भूखों की सहानुभूति में केवल जबानी जमाखर्च से कुछ नहीं होगा. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वास्तव में कुपोषण से शर्मिदा हैं तो उन्हें आर्थिक नीतियों में बदलाव करना होगा.
खाद्य और कृषि मामलों के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा के विचार
 
 बहस:बात पते की 
नामकरण की राजनीति
महात्मा गांधी रोड हमेशा एमजी रोड बन जाता है. स्वामी विवेकानंद रोड हमेशा एसवी रोड बन जाता है. बहुत से लोग इन सड़कों का पूरा नाम भी नहीं जानते. आज 7500 से अधिक सड़कें, संस्थान और शासकीय योजनाएं ऐसी हैं, जिनका नाम जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के नाम पर है. लेकिन क्या हम इन विभूतियों को इन संस्थाओं और सड़कों के कारण ही याद रखते हैं?
प्रीतीश नंदी के विचार
     
 कला:समाज 
बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल
चतुर्भुज स्थान के शुक्ला रोड की सात गलियों में कभी संगीत के सात सुरों की रौनक थी. ठुमरी थी, दादरा था, साजिन्दे थे, रात-रात भर चलने वाली महफ़िल थी. अब तो बस सब तरफ धूल-धूल...प्रभात रंजन का स्मरण लेख
 
 मुद्दा:बिहार 
भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल
बिहार की नीतीश सरकार ने अपनी दूसरी पारी भूमि सुधार पर केन्द्रित की है. लेकिन यह बात साबित हो चुकी है कि भूमि-सुधार के मोर्चो पर नीतीश कुमार की सरकार बहुत कमजोर रही है. पटना से कुमार कृष्णन की रिपोर्ट
 
     
 

खबरें और भी हैं

राष्ट्रीय शोक में मोबाइल इस्तेमाल करने पर फांसी
कांग्रेस ने कहा-मोदी इज ग्रेट
एंजेलिना और ब्रैड पिट अब जा कर करेंगे शादी
कौन इंदिरा और कौन राजीव गांधी?
करतार सिंह दुग्गल नहीं रहे
माई सैंडल नाटक पर चुनाव तक प्रतिबंध
भाजपा बांटेगी मुफ्त गाय और लैपटॉप
वीना मलिक को सांसद बनाने की मांग
केरल के राज्यपाल एमओएच फारूक नहीं रहे
 
     
 

 
     
 
       


   
 

प्रीतीश नंदी

 
 
एक ना की जरुरत


 

हितेन्द्र पटेल

 
 
हिन्दी जातीयता के सवाल



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 मुद्दा:झारखंड 
जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !
तीन साल का कौशल कोल अपने कच्चे घर की दीवारों से ही टकराकर हर रोज दसियों बार गिरता है. चोट लगती है लेकिन अब वो रोता नहीं. कथित विकास की कीमत चुकाने की कौशल जैसे बच्चों की यह बेहद भयावह कहानी गिरिडीह, झारखंड से लौटकर संदीप कुमार की कलम से
 
 बहस:बात पते की 
कभी पूजे जाते थे पलायन करने वाले
पलायन की चपेट में चकरघिन्नी होते लोगों को यह जानकारी चौंका सकती है कि एक जमाने में हुनरमंद पलायन करने वालों को पूजा भी जाता था.उन्हें उनकी श्रेष्ठ कलाओं, तकनीक के कारण सम्मान दिया जाता था. राकेश दीवान का विश्लेषण
 
 मुद्दा 
लुप्त होने के कगार पर हैं असुर
छत्तीसगढ़ के जशपुर के पांच गांवों में बसने वाली असुर आदिवासियों की कुल आबादी केवल 305 रह गई है. हाल यह है कि सरकार के पास इस जनजाति से संबंधित कोई खास दस्तावेज नहीं है. जशपुर से लौटकर सुनील शर्मा की रिपोर्ट
         
 राजनीति:बात पते की 
थप्पड़ के नाम पर
पिछले 30 साल में न मैंने किसी को थप्पड़ मारा है, न ही किसी को मारने के लिए कहा, फिर भी थप्पड़ को मेरे साथ जोड़ा जा रहा है. थप्पड़ के बारे में मेरे बयान को बगैर सोचे, न समझते हुए इस देश के बहुत बड़े अपराधी के रूप में मेरा चित्र रंगाया जा रहा है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है. एक दुर्भाग्यपूर्ण साजिश के तहत मेरी बदनामी करने के प्रयास किये जा रहे हैं.
अन्ना हजारे के विचार
 
 बहस:बात पते की 
ये कहां आ गये हम
जब हम नेशनल इंटीग्रेशन कमेटी बनाते हैं तो इसका मतलब यही निकलता है कि हमने मान लिया कि इस देश में सांस्कृतिक एकता का पहले से ही कोई पुष्ट सांस्कृतिक आधार नहीं है. राष्ट्रीय एकता तो इस तरह के सरकारी आयोजनों से आगे भविष्य में बन सकने वाली बात है. यह बदहवासी ही तो है. हम राज्य और राष्ट्र की दो अलग-अलग अवधारणाओं को आपस में गडमड करने के आदी हो गए हैं.
साहित्यकार रमेशचंद्र शाह के विचार
 
 बाईलाइन:बात पते की 
चुनाव आकलन का नमक
इस चुनाव में सर्वेक्षण कराने वाली कंपनियां पार्टियों को वही कह रही हैं, जो वे सुनना चाह रहे हैं. यहां बांसुरी वाला सिद्धांत काम आता है- जो पैसे देगा, उसी के लिए बांसुरी बजायी जायेगी. ऐसे में संख्या का खेल खेलने वाले क्लाइंट को निराश नहीं करना चाह रहे और मांग के हिसाब से व्याख्या कर रहे हैं. परिणामों के बाद वैसे भी किसी को कुछ भी याद नहीं रहता.
एम जे अकबर का विश्लेषण
             
 मुद्दा:बात पते की 
आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम
क्या आपको पता है कि आप अपने पास के डाकघर से केन्द्रीय सरकार के दफ्तरों में सूचना अधिकारियों को बिना किसी डाक खर्च के अपना आवेदन, प्रथम अपील और दूसरी अपील कर सकते हैं? अनिल चमड़िया का विश्लेषण
 
 मुद्दा:समाज 
मैं आदमखोर नहीं था
मैं जंगल का आदमी था. पेड़-पौधे और प्रकृति से प्रेम करने वाला. मेरे आस-पास जंगली जानवर रहते थे. मेरे पास एक पालतू चीता था और दर्जनों ऐसे ही जानवर..फिर मुझ पर एक फिल्म बनाई गई- मैन ईटर ऑफ मनातू. मनातू, झारखंड से विनय कुमार शर्मा की रिपोर्ट
 
 बहस:बात पते की 
रामकथा पर रार क्यों ?
दिल्ली के अकादमिक जगत में इन दिनों ए के रामानुजन के रामायण से संबंधित एक निबंध पर लगातार विवाद चल रहा है. विचारद्रोही प्रवृत्तियां समाज में हावी हैं. सुभाष गाताडे के विचार
 
 मुद्दा:मध्यप्रदेश 
आत्महत्या की फसल
नई फसल आने से किसानों के घर रौनक होती है. खुशियां मनाई जाती हैं. लेकिन मध्यप्रदेश में होशंगाबाद जिले के किसानों के घर गहरा दुख, नैराश्य और मातम छाया हुआ है. होशंगाबाद से बाबा मायाराम की रिपोर्ट
             
 

श्रद्धांजलि

अदम गोंडवी

कविताएं

आलोक धन्वा

आमीन

आलोक श्रीवास्तव

कहानी का लोकतंत्र

पल्लव

मुझ पर भरोसा रखना

विन्सेंट वान गॉग के पत्र भाई थियो के नाम

 
 

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