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 पहला पन्ना
 

 
 मुद्दा 
चक्रव्यूह में फंसते जा रहे किसान
हमने किसानों को चक्रव्यूह में कैद कर लिया है और इस शिकंजा को हम लगातार कसते जा रहे हैं. अब समय आ गया है कि ज्यादा तेज रासायनिक कीटनाशकों और अब जेनेटिक मोडिफाइड फसलों के साथ उन पर शिकंजा कसने के बजाय उन्हें चक्रव्यूह से बाहर निकाला जाए. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भारतीय किसान की भी वही गत होगी, जो महाभारत की रणभूमि में चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु की हुई थी.
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का लेख
 
 आधी दुनिया 
चुनावी जश्न यानी ऑल-मेल मामला
आखिर क्या बात है कि चुनावी जश्न से महिलाएं बिहार जैसी इलाकों में बाहर हो जाती है. जश्न का स्पेस जेन्डर-न्यूट्रल नहीं बन पाता है क्योंकि समाज और खास कर मर्द का मानस औरत के साथ जश्न मनाने का गैर-इरोटिक तरकीबें ढ़ूंढ़ पाने में अभी तक बहुत कामयाब नहीं रहा है. अब गाँव या शहर में होने वाला नृत्य महिलाओं को आमंत्रित नहीं कर पाता है बल्कि उनके लिए आक्रामक प्रकृति का होता है.
मनोज कुमार झा की टिप्पणी
     
 विचार 
बिहार चुनाव को बूझिए
अगर हम ये मान भी लें कि आप जानते नहीं हैं कि कोई संगठित विकल्प नहीं है, तो भी क्या कांग्रेस के निकम्मेपन को हटाकर सांप्रदायिक राजनीति को आगे बढ़ाना कोई समझदारी का काम है? किसी भी चुनाव क्षेत्र से दसों प्रार्थी खड़े होते हैं, क्या सचमुच कांग्रेस और भाजपा या दूसरी भ्रष्ट पार्टियों के अलावा हमें कोई विकल्प नहीं दिखता? बेशक यह इसी वजह से है कि हम सांप्रदायिक सोच के गुलाम हो चुके हैं.
लाल्टू के विचार
 
 मुद्दा 
सरकारी बेरुखी के शिकार किसान
हमेशा से बेरुखी का शिकार रहे किसानों की भलाई के लिए दो कदम तुरंत उठाए जाने की जरूरत है. पहला कि, देश के सभी किसानों को एक आर्थिक बेलआउट पैकेज तुरंत दिया जाए. दूसरा, एक किसान आय समिति का गठन हो जो किसान के घर तक पहुंचने वाले न्यूनतम सुनिश्चित मासिक आय पैकेज पर काम करे और उसे लागू करे. इन दोनों कदमों के बिना किसानों की हालत सुधारना बहुत मुश्किल है.
देविंदर शर्मा का लेख
     
 मुद्दा 
नफरत की संस्कृति का विरोध जरूरी
1905 में बंगभंग के विरोध में रवींद्रनाथ साथी रचनाकारों के साथ सड़क पर उतर आए थे. बंगाल की अखंडता को लेकर तब उन्होंने कविताएँ और गीत लिखे थे जो आज तक पढ़े गाए जाते हैं. आज वक्त है कि हमारे कवि लेखकों को सड़क पर उतरना होगा. लोगों तक संवेदना के जरिए इंसानियत को बचाए रखने का पैगाम देना है. विविधताओं भरी हमारी साझी विरासत को बचाए रखना है. तर्कशील तरक्कीपसंद भारत को बचाए रखना है.
लाल्टू का लेख
 
 विचार 
लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल
साठ का दशक भारतीय संसद का स्वर्णकाल कहा था, जहॉं विपक्ष संख्या में नगण्य था परन्तु जीवंत, विचारवान व सत्याग्रही था. जहॉं, संसद देश व गरीब की चर्चा का मुखर मंच था. जिसकी बहस देश को प्रभावित करती थी तथा देश की जनता को संसद से उम्मीद थी. यह लोकतंत्र के लिये शुभ लक्षण था. अब जनता संसद से निराश है. संसद, अब जैंसे केवल सांसदों के हित, वैष्वीकरण और विषमता की पोषक बन गई है.
रघु ठाकुर का लेख
 
     
 

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 विचार 
स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे
केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट विलेज की परिकल्पना की है. हालांकि ये स्मार्ट विलेज प्रोजेक्ट देश के कस्बों और गांवों में फैसे इस अंधेरे में कब और कैसे उजाला फैलाएगा, भ्रष्ट व्यवस्था के चलते कहना मुश्किल है. पर यह स्पष्ट इन गाँवों को फिलहाल मोबाइल कनेक्टिविटी की नहीं, जीवन के लिए जरुरी प्राथमिक सुविधाओं की कनेक्टिविटी चाहिए.
वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध का लेख
 
 विचार 
पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी
क्या 1947 में भारत के बंटवारे को रोका जा सकता था? क्या ये बंटवारा पूरी तरह “फूट डालो-राज करो” की ब्रिटिश नीति का परिणाम था, अथवा कांग्रेस नेताओं की कथित अदूरदर्शिता और सत्ता पाने की बेसब्री की इसमें प्रमुख भूमिका रही? क्या मुस्लिम लीग महज ब्रिटिश हाथों का खिलौना थी, या वह किसी लंबी परिघटना का नेतृत्व कर रही थी, जिसका परिणाम 1930-40 के दशकों में आकर अपरिहार्य हो गया था?
सत्येंद्र रंजन का विश्लेषण
 
 विचार 
नर्मदा आंदोलन का मतलब
बांध पहले भी बने थे, शहर पहले भी उजड़े थे, विस्थापन की पीड़ा पहले भी रही थी. लेकिन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन से पहले इस दर्द के पास जुबां नहीं थी, इस पीड़ा की अपनी भाषा नहीं थी. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पूरे देश को यह दर्द समझाया, साथ ही यह बताया की यह दर्द लाइलाज नहीं है. अगर नर्मदा बचाओ आंदोलन न होता तो न इतने आंदोलन होते, न ही इन आंदोलनों में इतनी नैतिक व राजनैतिक ऊर्जा होती.
योगेंद्र यादव का लेख
         
 मुद्दा 
किसानों को चाहिए मदद
सरकारें किसानों को कृषि कार्य से दूर करना चाहती हैं. उनकी कोशिश कृषि को इतना अलाभकारी बना देने की है. जबकि सोनीपत जिले में लगभग 500 किसान एक शैक्षिक संस्थान बनाने के लिए अपनी जमीन देने का प्रस्ताव दे रहे हैं. किसानों को दरिद्र बनाए रखने के लिए बरसों से किए जा रहे प्रयास का यह आंखें खोलने वाला सच है. कृषि सरकार की सहायता का इंतजार कर रही है. पता नहीं यह इंतजार कब समाप्त होगा?
देविंदर शर्मा का लेख
 
 मुद्दा 
जनमत की बात करिये सरकार
कई बार अदालतों का फैसला पसंद न आने पर भी सिर झुकाकर उसका सम्मान करना ही समझदारी है. लेकिन पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश का सम्मान करना संभव नहीं है. हरियाणा की पंचायतों के चुनाव में उम्मीदवारों की शैक्षणिक और अन्य योग्यता का सवाल सिर्फ कुछ लोगों के व्यक्तिगत फायदे-नुकसान वाला मुकदमा नहीं है. यह संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की मर्यादा का सवाल है.
योगेंद्र यादव के विचार
 
 मुद्दा:पाकिस्तान 
रास्ता शुरू होता है
भारत-पाकिस्तान रिश्तों के मद्देनजर मोदी का भावी कदम दरअसल दक्षिणपंथी विचारधारा के अंतरविरोधों को और उजागर करनेवाला हो सकता है. देखना है कि मोदी इन अंतरविरोधों को उजागर करने का जोखिम उठाते हुए किस तरह शांतिप्रिय अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी छवि विकसित कर पाते हैं? मोदी अभी जहां खड़े हैं वहां एक तरफ शांति के नोबेल पुरस्कार की माया है तो दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्रवाद के राम.
मुकेश भूषण के विचार
             
 विचार 
युद्ध के विरुद्ध
आज दुनिया में अधिकांश धनकुबेरों की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. विश्वभर में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद शोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.
रघु ठाकुर का लेख
 
 विचार 
किसके साथ किसका विकास
क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं, जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं. इन्हीं पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. इनके घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनों का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.
प्रदीप शर्मा के विचार
 
 मुद्दा 
क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?
पारंपरिक रूप से सबसे अधिक सहिष्णु रहा हिंदु धर्म कट्टरपंथियों द्वारा फैलाये जा रही घृणा व धार्मिक तनाव के चलते धीरे-धीरे अपना सौम्य चेहरा बदलता दिख रहा है. जैसे-जैसे धर्म के नाम पर यह राजनीति परवान चढ़ती जायेगी, समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी. हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग-अलग चीजें हैं.
राम पुनियानी के विचार
 
 अंतराष्ट्रीय 
मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल
भारत को विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्देश दिया जा रहा है कि अपनी खाद्यान्न खरीद प्रणाली को खत्म कर दे. इस दोषपूर्ण कदम के खासे गंभीर परिणाम निकलेंगे. इससे न केवल कड़ी मेहनत से हासिल भारत की खाद्य सुरक्षा पद्धति तहस नहस होगी बल्कि कोई साठ लाख किसानों की आजीविका पर भी बन आएगी. इसे लेकर अमरीकी खाद्य निर्यात लॉबी का प्रधानमंत्री मोदी पर जबरदस्त दबाव रहेगा.
देविंदर शर्मा का लेख
             
 

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