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 पहला पन्ना
 

 
 राजनीति 
जमीनी राजनीति की तस्‍वीर बदलती महिलाएं
पंचायत चुनाव में आधी सीटें महिलाओं के आरक्षित है और बाकी आधी सीटें महिलाओं की पुरूषों की होने का भ्रम पैछा किया जाता रहा है. किन्‍तु मध्‍यप्रदेश की कई महिलाएं इस भ्रम को तोडकर अनारिक्षत सीटों पर दावेदारी कर रही है. जिन सीटों पर समाज के कतिपय दबंग लोग अपनी जीत पक्‍की मान रहे थे. उन पर कई महिलाएं अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते हुए कडी टक्‍कर दे रही है.
राजेन्‍द्र बंधु की रिपोर्ट.
 
  
क्या हमें सेंसर बोर्ड की जरूरत है?
सेंसर बोर्ड की मुखिया लीला सैमसन के मूर्खतापूर्ण आधार पर दिए त्यागपत्र के बाद सरकार के लिए अब ठीक मौका है कि वह फिल्म सेंसर करने के तरीके में आमूल परिवर्तन लाए. आज के दौर में केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड (सीबीएफसी) तो एक तरह का अराजकतावाद है. टेलीविजन खुद ही अपने को सेंसर करता है. फिल्मों को भी ऐसा करने की इजाजत होनी चाहिए.
प्रीतीश नंदी का लेख
     
 मुद्दा 
कहां रहेंगे घर वापसी करने वाले?
कई विषम परिस्थितियों में जिन्हें हिंदू समाज छोड़ना पड़ा, उन्हें फिर से हिंदू समाज में वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है. इस प्रयास को घरवापसी का नाम दिया गया है. परंतु जो उन्हें वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं, उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि जब ये लोग वापस आ जायेंगे तो उनके साथ वैसा व्यवहार नहीं होगा, जो उनसे उच्च जाति के लोग, हिंदू समाज छोड़ने के पहले करते थे?
एल एस हरदेनिया का लेख
 
 राजनीति 
जंगल में तो आदिवासी भी रहते हैं प्रधानमंत्री जी
अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को जंगल जाकर नक्सलियों के बीच रहने की सलाह देते समय प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को यह तो पता ही होगा कि देश के 23 फीसदी हिस्से में जंगल है और देश की कुल आबादी में आठ फीसदी की हिस्सेदारी करने वाले आदिवासियों की अधिकांश आबादी इन्हीं जंगलों में रहती है. इस कटाक्ष का जो भी सियासी अर्थ हों, मगर प्रधानमंत्री के इस बयान को बारीकी से देखने-समझने की जरूरत है.
सुदीप ठाकुर का लेख
     
 मुद्दा 
विपक्ष को संजीवनी
नरेंद्र मोदी सरकार ने “सबका साथ-सबका विकास” और “अच्छे दिन” लाने के अपने नारों की हकीकत पर से साल भर के अंदर ही परदा हटा दिया है. लेकिन विपक्ष इसका लाभ तभी उठा सकता है, अगर वह दो-टूक रुख लेकर “अध्यादेश राज” के विरोध में उतरे. लेकिन कॉरपोरेट सेक्टर को एक सीमा से ज्यादा नाराज ना करने की प्रवृत्ति अगर कांग्रेस में बनी रही, तो वो यह बेशकीमती मौका गंवा देगी.
सत्येंद्र रंजन का लेख
 
 मुद्दा 
भारतीय कृषि का संकटकाल
किसानों को सहारा देने के बजाय ऐसे हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं जिससे सरकारी खरीद की प्रतिक्रिया ही समाप्त हो जाए. इसके तहत एमएसपी को खत्म करने के सुझाव दिए जा रहे हैं. इसका मतलब होगा किसानों को बाजार की मनमानी के हवाले कर देना. लागत और मूल्य आयोग खुद ही एमएसपी को समाप्त करने की मांग कर रहा है ताकि बाजार ही यह तय कर सके कि किसानों को उनकी उपज की क्या कीमत मिलनी चाहिए.
देविंदर शर्मा का लेख
 
     
 

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 मुद्दा 
गोड़से के महिमामंडन का पुनरूत्थान
नाथूराम गोड़से सनकी नहीं था. जो कुछ उसने किया, वह हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा गांधी के खिलाफ फैलाए जा रहे जहर का तार्किक परिणाम था. एक अर्थ में, गांधी की हत्या, भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दुत्व की राजनीति का पहला बड़ा हमला था. इसने उसके आगे की राह प्रशस्त की और पिछले कुछ दशकों में हिन्दुत्ववादी राजनीति कहां से कहां जा पहुंची है, हम सब इससे वाकिफ हैं
राम पुनियानी का लेख
 
 विचार 
नए साल का प्रण
श्रेष्ठता का दावा करने वाले विद्वानों की एक जमात है जो कहते हैं कि अंग्रेज़ों के आने के पहले हमारे यहाँ सब ठीक था. ये विद्वान ज्यादातर ऐसे तबकों से आते हैं, जिन्होंने सदियों से बहुसंख्यक लोगों को दबा रखा है. लेकिन अब इनका हाल बुरा है. ऐसे कई पहले ही बिक चुके हैं और जय विकास, जय विनाश का नारा लगा रहे हैं. नए साल में हमारा प्रण यही हो कि खुद को इनके एकांगी नज़रिए से बचाए रखें.
लाल्टू का लेख
 
 मुद्दा 
धर्मपरिवर्तन ही है घर वापसी
क्या हमें धर्मपरिवर्तन पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है? हमारे देश में पहले से ही ऐसे कानून हैं, जिनमें जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लोभ-लालच से धर्मपरिवर्तन करवाने वालों के लिए सजा का प्रावधान है. जो हमें करना है वह यह है कि हम स्वैच्छिक और जबरन धर्मपरिवर्तन के बीच विभेद करेंगे. घरवापसी, जबरन धर्मपरिवर्तन का ही पर्यायवाची है.
राम पुनियानी का लेख
         
 मुद्दा 
परमाणु समझौते का नाटक
भारत-अमरीका के बीच परमाणु समझौते में मुद्दा यह है कि मोदी सरकार उन विदेशी कंपनियों को ये लाभ देना क्यों चाहती है? बिजली के विभिन्न स्रोतों में परमाणु ऊर्जा भी एक विकल्प है. मगर चाहे स्रोत जो हो, उससे बिजली पाने के लिए अपने नागरिकों की हिफाजत की ऐसी अनदेखी होनी चाहिए? क्षतिपूर्ति का सारा बोझ अपने देश के करतादाताओं पर डालने की कोशिश कर मोदी सरकार देश की कैसी सेवा कर रही है?
सत्येंद्र रंजन का लेख
 
 विचार 
हमें चाहिए अपने जैसा नेता
हमें वे नेता नहीं चाहिए, जो इतिहास में जगह बनाना चाहते हैं बल्कि ऐसे नेता चाहते हैं, जिन्हें हममें से एक होने में कोई शर्मिंदगी महसूस न हो. हम हमेशा महात्मा की खोज में रहते हैं और हममें से यदि कोई उसे गोली मार भी दे तो हम छह दशक उसका कोई कच्चा-पक्का प्रतिरूप खोजने में लगा देते हैं. कोई ऐसा व्यक्ति, जो हमारा नेतृत्व करें, हमें निराश करे, खुद को संभाले और फिर कोशिश करे.
प्रीतीश नंदी का लेख
 
 मुद्दा 
हवा का रूख भांपने की कवायद
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे स्वाधीनता संग्राम के मूल तत्वों, नीतियों और मूल्यों को संविधान का हिस्सा बनाया था. लेकिन आज जो लोग संविधान से कुछ शब्दों को हटाने या उनकी आवश्यकता या औचित्य पर बहस की आवश्यकता बता रहे हैं वे भारतीय राष्ट्रवाद के विरोधी हैं और देश को धार्मिक राष्ट्रवाद की ओर ले जाना चाहते हैं.
राम पुनियानी का लेख
             
 विचार 
युद्ध के विरुद्ध
आज दुनिया में अधिकांश धनकुबेरों की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. विश्वभर में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद शोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.
रघु ठाकुर का लेख
 
 विचार 
किसके साथ किसका विकास
क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं, जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं. इन्हीं पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. इनके घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनों का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.
प्रदीप शर्मा के विचार
 
 मुद्दा 
क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?
पारंपरिक रूप से सबसे अधिक सहिष्णु रहा हिंदु धर्म कट्टरपंथियों द्वारा फैलाये जा रही घृणा व धार्मिक तनाव के चलते धीरे-धीरे अपना सौम्य चेहरा बदलता दिख रहा है. जैसे-जैसे धर्म के नाम पर यह राजनीति परवान चढ़ती जायेगी, समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी. हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग-अलग चीजें हैं.
राम पुनियानी के विचार
 
 अंतराष्ट्रीय 
मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल
भारत को विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्देश दिया जा रहा है कि अपनी खाद्यान्न खरीद प्रणाली को खत्म कर दे. इस दोषपूर्ण कदम के खासे गंभीर परिणाम निकलेंगे. इससे न केवल कड़ी मेहनत से हासिल भारत की खाद्य सुरक्षा पद्धति तहस नहस होगी बल्कि कोई साठ लाख किसानों की आजीविका पर भी बन आएगी. इसे लेकर अमरीकी खाद्य निर्यात लॉबी का प्रधानमंत्री मोदी पर जबरदस्त दबाव रहेगा.
देविंदर शर्मा का लेख
             
 

लाल्टू

पाँच कविताएं

अनवर सुहैल

तीन कविताएं

कुतुब एक्सप्रेस

रामकुमार तिवारी

रेत का पुल

मोहन राणा

अरविंद कुमार

बृहत् समांतर कोश का आविर्भाव

 
 

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