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 पहला पन्ना
 

 
 विचार 
समृद्ध, सवर्ण और शहर
देश के हर हिस्से में भाजपा के पक्ष में एक किस्म का ध्रुवीकरण हुआ है. इसे हम इन तीन शब्दों में गूंथ सकते हैं- समृद्ध, सवर्ण और शहर. समृद्ध वर्ग और सवर्ण जातियों से आने वाले लोग भाजपा के स्वाभाविक समर्थक बने हुए हैं, तो इसलिए कि मोदी सरकार की नीतियां समाज में उनके दबदबे को मजबूत करने वाली हैं. चूंकि शहरी व्यवस्था में ऐसे वर्गों का वर्चस्व है, इसलिए शहर भाजपा के गढ़ बने हुए हैं.
सत्येंद्र रंजन के विचार
 
 मुद्दा 
रास्ता शुरू होता है
भारत-पाकिस्तान रिश्तों के मद्देनजर मोदी का भावी कदम दरअसल दक्षिणपंथी विचारधारा के अंतरविरोधों को और उजागर करनेवाला हो सकता है. देखना है कि मोदी इन अंतरविरोधों को उजागर करने का जोखिम उठाते हुए किस तरह शांतिप्रिय अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी छवि विकसित कर पाते हैं? मोदी अभी जहां खड़े हैं वहां एक तरफ शांति के नोबेल पुरस्कार की माया है तो दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्रवाद के राम.
मुकेश भूषण के विचार
     
 मुद्दा 
किसानों को चाहिए मदद
सरकारें किसानों को कृषि कार्य से दूर करना चाहती हैं. उनकी कोशिश कृषि को इतना अलाभकारी बना देने की है. जबकि सोनीपत जिले में लगभग 500 किसान एक शैक्षिक संस्थान बनाने के लिए अपनी जमीन देने का प्रस्ताव दे रहे हैं. किसानों को दरिद्र बनाए रखने के लिए बरसों से किए जा रहे प्रयास का यह आंखें खोलने वाला सच है. कृषि सरकार की सहायता का इंतजार कर रही है. पता नहीं यह इंतजार कब समाप्त होगा?
देविंदर शर्मा का लेख
 
 मुद्दा 
जनमत की बात करिये सरकार
कई बार अदालतों का फैसला पसंद न आने पर भी सिर झुकाकर उसका सम्मान करना ही समझदारी है. लेकिन पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश का सम्मान करना संभव नहीं है. हरियाणा की पंचायतों के चुनाव में उम्मीदवारों की शैक्षणिक और अन्य योग्यता का सवाल सिर्फ कुछ लोगों के व्यक्तिगत फायदे-नुकसान वाला मुकदमा नहीं है. यह संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की मर्यादा का सवाल है.
योगेंद्र यादव के विचार
     
 मुद्दा 
नेपाल पर भारत की चुप्पी
आज भारत सरकार नेपाल के नेतृत्व को झुकाने में सफल हो सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम बहुत बुरे होंगे. ऐसे में भारत सरकार के पास एक ही ईमानदार रास्ता है कि वह इस खेल से अलग हो जाए. भारत-नेपाल सीमा को खुलवाए. चूंकि भारत सरकार चाहे तो सीमाबंदी खत्म हो सकती है या कम से कम नेपाल को इतना भरोसा तो दिलाए कि सीमाबंदी खत्म करने के लिए वह जो कर सकती है, वह कर रही है.
योगेंद्र यादव का लेख
 
 विचार 
लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल
साठ का दशक भारतीय संसद का स्वर्णकाल कहा था, जहॉं विपक्ष संख्या में नगण्य था परन्तु जीवंत, विचारवान व सत्याग्रही था. जहॉं, संसद देश व गरीब की चर्चा का मुखर मंच था. जिसकी बहस देश को प्रभावित करती थी तथा देश की जनता को संसद से उम्मीद थी. यह लोकतंत्र के लिये शुभ लक्षण था. अब जनता संसद से निराश है. संसद, अब जैंसे केवल सांसदों के हित, वैष्वीकरण और विषमता की पोषक बन गई है.
रघु ठाकुर का लेख
 
     
 

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 विचार 
स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे
केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट विलेज की परिकल्पना की है. हालांकि ये स्मार्ट विलेज प्रोजेक्ट देश के कस्बों और गांवों में फैसे इस अंधेरे में कब और कैसे उजाला फैलाएगा, भ्रष्ट व्यवस्था के चलते कहना मुश्किल है. पर यह स्पष्ट इन गाँवों को फिलहाल मोबाइल कनेक्टिविटी की नहीं, जीवन के लिए जरुरी प्राथमिक सुविधाओं की कनेक्टिविटी चाहिए.
वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध का लेख
 
 विचार 
पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी
क्या 1947 में भारत के बंटवारे को रोका जा सकता था? क्या ये बंटवारा पूरी तरह “फूट डालो-राज करो” की ब्रिटिश नीति का परिणाम था, अथवा कांग्रेस नेताओं की कथित अदूरदर्शिता और सत्ता पाने की बेसब्री की इसमें प्रमुख भूमिका रही? क्या मुस्लिम लीग महज ब्रिटिश हाथों का खिलौना थी, या वह किसी लंबी परिघटना का नेतृत्व कर रही थी, जिसका परिणाम 1930-40 के दशकों में आकर अपरिहार्य हो गया था?
सत्येंद्र रंजन का विश्लेषण
 
 विचार 
नर्मदा आंदोलन का मतलब
बांध पहले भी बने थे, शहर पहले भी उजड़े थे, विस्थापन की पीड़ा पहले भी रही थी. लेकिन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन से पहले इस दर्द के पास जुबां नहीं थी, इस पीड़ा की अपनी भाषा नहीं थी. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पूरे देश को यह दर्द समझाया, साथ ही यह बताया की यह दर्द लाइलाज नहीं है. अगर नर्मदा बचाओ आंदोलन न होता तो न इतने आंदोलन होते, न ही इन आंदोलनों में इतनी नैतिक व राजनैतिक ऊर्जा होती.
योगेंद्र यादव का लेख
         
 विचार 
अब राजनीतिक ध्रुवीकरण का वक्त
मोदी सरकार के 23 महीनों में भारत में सबसे प्रमुख घटनाक्रम वैचारिक ध्रुवीकरण का अधिक-से-अधिक स्पष्ट होना रहा है. इस दौरान अधिकांश विचारधाराएं दो धुरियों पर गोलबंद होने की तरफ बढ़ी हैं. इन दो सालों के हालात ने इन विपरीत विचारधाराओं के वैचारिक संघर्ष की दिशा स्पष्ट की है. इससे वैचारिक ध्रुवीकरण हुआ है. तो आगे राजनीतिक ध्रुवीकरण का मार्ग भी प्रशस्त होगा, यह आशा रखने का पर्याप्त आधार है.
सत्येंद्र रंजन का लेख
 
 मुद्दा 
जो सवाल करे वो देशद्रोही
हिंदुत्व के नाम पर जातीय (प्रकारांतर में आर्थिक) शोषण को मजबूत रखने की कोशिशों का सफल होना आज कठिन है. बाबा साहेब अंबेडकर के सपनों और उद्देश्य को नाकाम करने के लिए उनकी जय बोलने का पाखंड नहीं चल सकता. सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के बरक्स न्याय और प्रगति की विचारधाराओं से प्रेरित राष्ट्रवाद की शक्तियां जाग्रत हो रही हैँ. कन्हैया कुमार से इस विश्वास को मजबूती दी है.
सत्येंद्र रंजन का लेख
 
 मुद्दा 
बजट की झूठी फसलों का सच
खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के लिए एनडीए सरकार कृषि लागत के ऊपर 50 फीसदी लाभ देने के अपने वादे से पीछे हट गयी है. न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिहाज से देखें, तो किसानों की आय में सिर्फ 3.2 से 3.6 फीसदी की मामूली वार्षिक वृद्धि हुई है. साफ है कि संगठित क्षेत्र में हर व्यक्ति के वेतन में भारी वृद्धि होती रही, और जान-बूझकर किसानों की अवहेलना की जाती रही
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का लेख
             
 विचार 
युद्ध के विरुद्ध
आज दुनिया में अधिकांश धनकुबेरों की संपत्ति का बड़ा स्रोत हथियारों की बिक्री है. विश्वभर में आंतकवाद, हिंसा, युद्ध और साम्राज्यवाद शोषण और पूंजीवाद बंदूक की नली से निकल रहे हैं. भले ही एक जमाने में माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है परन्तु सच्चाई यह है कि अब बंदूक की नली से विषमता और पूंजीवाद, युद्ध और हिंसा, नवसाम्राज्यवाद और नवपूंजीवाद निकल रहा है.
रघु ठाकुर का लेख
 
 विचार 
किसके साथ किसका विकास
क्या हम उसी रास्ते पर देश को ले जा रहे हैं, जिस पर चल कर 2014 में यूरोप और अमरीका वर्तमान कंगाली की कगार पर हैं. इन्हीं पैमानो पर चलकर एशियाई शेर देश अभी भी घायल है या किसी अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश की छांव तले बैठे हुए अपने घाव चाट रहे हैं. इनके घावों एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की छावों, दोनों का क्रमश: विकास हो रहा है. सबके साथ सबके विकास का यह दृश्य काफी डरावना है.
प्रदीप शर्मा के विचार
 
 मुद्दा 
क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?
पारंपरिक रूप से सबसे अधिक सहिष्णु रहा हिंदु धर्म कट्टरपंथियों द्वारा फैलाये जा रही घृणा व धार्मिक तनाव के चलते धीरे-धीरे अपना सौम्य चेहरा बदलता दिख रहा है. जैसे-जैसे धर्म के नाम पर यह राजनीति परवान चढ़ती जायेगी, समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी. हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग-अलग चीजें हैं.
राम पुनियानी के विचार
 
 अंतराष्ट्रीय 
मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल
भारत को विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्देश दिया जा रहा है कि अपनी खाद्यान्न खरीद प्रणाली को खत्म कर दे. इस दोषपूर्ण कदम के खासे गंभीर परिणाम निकलेंगे. इससे न केवल कड़ी मेहनत से हासिल भारत की खाद्य सुरक्षा पद्धति तहस नहस होगी बल्कि कोई साठ लाख किसानों की आजीविका पर भी बन आएगी. इसे लेकर अमरीकी खाद्य निर्यात लॉबी का प्रधानमंत्री मोदी पर जबरदस्त दबाव रहेगा.
देविंदर शर्मा का लेख
             
 

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