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संवाद | गोविंद मिश्र-राजी सेठ
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संवाद
आयोजनः गीताश्री
विमर्श और साहित्य अलग-अलग चीजे
हैं- गोविंद मिश्र
अब यह एग्रेसिव, घरफोड़ू नारी चाहते
हैं- राजी सेठ
सुप्रसिद्ध साहित्यकार गोविंद मिश्र
और राजी सेठ ने इस संवाद में अपने समय की चिंता और दुख को तो साझा किया ही है, हाल
के दिनों में चले खास तरह के विमर्शों पर भी सवाल खड़े किए हैं.
गोविंद मिश्र: राजी, तुम्हारे इस कमरे में हम सन 70
या 75 के आस-पास से बैठ रहे हैं. मुझे याद आता है जब जैनेंद्र जी थे, अज्ञेय थे,
भवानी भाई थे, कैसी अच्छी-अच्छी बैठकें होती थीं यहां. उस वक्त जो माहौल था, कैसे
एक किताब अच्छी-सी आती थी और 7-8 लोग जमीन पर ही बैठकर बात किया करते थे. तुम्हें
याद है वह रमेश जी, जिनका घर तिलक मार्ग में था?
राजी सेठ: हां, हां, खूब याद है.
गोविंद मिश्र: उनके घर कैसी गोष्ठियां होती थीं. मेरी
किताब पर उन्हीं के घर कैसी गोष्ठी हुई थी. और फिर 'लाल-पीली जमीन' पर अज्ञेय जी ने
अपने ही घर गोष्ठी कराई थी. अच्छा, उस वक्त एक बात थी कि कोई यह नहीं कहता था कि
तुम यह लिखो. एक किताब आती थी, उसके हर पक्ष पर चर्चा होती थी. खूब आलोचना होती थी.
आज यह वक्त आ गया है कि साहब आप नारी पर ही लीखिए, दलित पर ही लिखिए. यह सब समझाने
वाले एक लेखक को हैं कौन? यह एक परिवर्तन मुझे महसूस होता है. दूसरे, पुराने वक्त
में कोई भी किताब आती तो जैनेंद्र जी चले आते थे अध्यक्षता करने. कहते थे, “
गोविंद, क्या पता इन्हीं में से कौन अच्छा साहित्यकार निकल आए.” आज गढ़ बन गए हैं
छोटे-छोटे.
राजी सेठ: हां, यह मलाल तो मुझे भी बहुत कचोटता है.
गोविंद मिश्र: हां, और यह लोग सिर्फ अपने-अपने की
तारीफ करते हैं. पत्रिकाओं का यह हाल है कि बाजार जैसी हो गई हैं. उनका जब भूखा पेट
है कि उन्हें लगातार कुछ-कुछ चाहिए और हमें यह भी एक खबर मिली है कि संपादकीय पैसे
लेकर किसी की प्रशंसा में लिखे जाते हैं.
(इतना कहकर गोविंद जी राजी सेठ की ओर अर्थपूर्ण ढंग से देखते
हैं. फिर दोनों ही हंस पड़ते हैं.)
गोविंद मिश्र: यह जो माहौल अब बदला है, तुम दिल्ली
में रहती हो, तुम्हें चुभता नहीं है?
राजी सेठ: नहीं, मैं दिल्ली में नहीं रहती क्योंकि
मैं दिल्ली से एक खास मानसिक दूरी बनाकर रखती हूं. यह माहौल मुझे माफिक ही नहीं
आता. लेकिन, आपने जो गोष्ठियों की बात कही न, वह गलत है.
गोविंद मिश्र: दिल्ली की ही नहीं, दूसरे शहरों में से
कई एक में यही हाल है. यही संस्कृति आ गई है.
राजी सेठ: दूसरे शहरों का तो मैं नहीं जानती पर जहां
तक गोष्ठियों की बात है तो पहले किसी की किताब आती थी तो हम खुश होते थे, एक-दूसरे
का आदर करते थे. सोचते थे कि अब इसे देखेंगे, खूब लिखेंगे, पर...
गोविंद मिश्र: (बीच में काटते
हुए) मुझे तो लगता है इससे साहित्य का बड़ा नुकसान हो रहा है. लेखन की इतनी
बड़ी दुनिया को अगर आप सीमित कर देंगे कि अब सिर्फ दलित पर ही साहित्य होगा या फिर
नारी विमर्श, नारी मुक्ति, नारी केंद्र पर ही साहित्य होगा, गलत है.
राजी सेठ: सही, लेकिन थोड़ा तो उनकी यह कोशिश है कि हम समय को दाखिल करें. अब
समय को दाखिल करने का यह मतलब थोड़े ही है कि लेखक को खारिज कर दो.
गोविंद मिश्र: क्यों, क्या अब के समय में भी बूढ़ा उसी
तरह अकेलापन नहीं जीता?
राठी सेठ: हां, नहीं तो क्या! और आपने तो इस पर बहुत
लिखा है.
गोविंद मिश्र: देखिए, समय तो आएगा ही आएगा लेखन में
लेकिन बुढ़ापे का अकेलापन, बचपन की समस्याएं, प्रेम, जाने कितनी परेशानियां हैं, जो
लेखन में भी रहेंगी.
राजी सेठ: लेकिन आप यह बताइए कि क्या प्राचीन काल से
लेकर अब तक कोई ऐसा समय रहा है लेखन में जब नारी न रही हो केंद्र में. हर समय जिस
रूप में भी रही, वैदिक काल से लेकर अब तक लेकिन अब यह खास तरह की नारी चाहते हैं.
गोविंद मिश्र: किस तरह की?
राजी सेठ: जैसे एग्रेसिव, घरफोड़ू.
गोविंद मिश्र: अब बताइए! मुझे तो यह सब ऐसे लगता है, जैसे अस्पताल में होते
हैं न, अलां कूल्हे के स्पेशलिस्ट तो फलां सीने के स्पेशलिस्ट. अब यह बन रहे हैं
एग्रेसिव नारी स्पेशलिस्ट तो वह बन रहे हैं प्रेम वाली नारी के स्पेशलिस्ट! अब क्या
यह होगा साहित्य में !
राजी सेठ: कारण अगर देखा जाए तो चीजें डीसेंटर हो गई
हैं. सेंटर तोड़ दिए गए हैं, परिधि पर जितनी चीजें आई हैं, उनको लाओ. और यह माना गया
कि स्त्री, दलित परिधि पर रहे हैं हमेशा से, तो अब उनको केंद्र में लाओ, अंदर लाओ.
गोविंद मिश्र: लेकिन परिधि पर जो रहे, वह न?
राजी सेठ: हां.
गोविंद मिश्र: तो एक बात बताइए, मैंने देखा कि एक बड़ी
समस्या है कि परिवारों से विदेश चले गए बच्चे. आपके यहां भी तो यह समस्या है न ?
राजी सेठ: हां.
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गोविंद मिश्र: तो क्या वे मां-बाप अकेले नहीं हुए ?
उनका अकेलापन त्रासद नहीं हुआ ? क्या वह इसलिए अकेले नहीं माने जाएंगे कि उनके पास
थोड़ी स्वतंत्रता है, संपन्नता है ? अभी मुझे कुछ दिन पहले का भोपाल का ही एक वाकया
याद आता है. एक बुढ़ी मां की आंखों का ऑपरेशन होना था, उसके दोनों बेटे बाहर थे.
सिर्फ कार से डॉक्टर के पास तक ले जाना था, पर उसी के लिए कोई नहीं था. मेरी तरफ
उन्होंने जिस लाचारी से देखा था, वह निगाह मैं भूला नहीं हूं. तो क्या यह विवशता,
यह लाचारी, यह अकेलापन परिधि पर नहीं है ?
राजी सेठ: अगर इस प्वाइंट-ऑफ-व्यू से देखें तो
साहित्य हमेशा से ही वंचित के हक में, दरिद्र के हक में, अभावग्रस्त के हक में रहा
है. यह साहित्य का एक बेसिक आधार है लेकिन अभी क्यों बदला ? वह इसलिए बदल गया कि
सिध्दांत बदल गए. सोच आ गई, सब चीजों को विकेंद्रीकृत करो.
गोविंद मिश्र: यानी सीधे-सीधे विदेश से आए सिध्दांत
की नकल करते हैं.
राजी सेठ: बिल्कुल-बिल्कुल.
गोविंद मिश्र: क्या हमारा अपना विशाल पारिवारिक ढांचा
छोटा पड़ गया. अभी परसों मैं साहित्य अकादमी में बोलने गया तो महादेवी को एक बार फिर
से खूब पढ़ा और देखो राजी कैसे उनके पारिवारिक आकार में तोते, गिलहरी, मोर, गाय,
छोटे-छोटे प्राणी, लोग सब कुछ आ जाते हैं. मैं सोच रहा था, कैसा बड़ा संसार था एक
लेखक का, जिसे लेकर इन्होंने सीमित कर दिया एक एग्रेसिव नारी या एक दलित-विमर्श पर.
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लिखने से कुछ नहीं बदलता है और बदलने के लिए हम लोग लिखते नहीं.
साहित्य की खूबसूरती यह है कि हर व्यक्ति नया जीव है, उसके अपने नए
अनुभव, नई संवेदनाएं हैं. |
राजी सेठ: यह सब रहा है और सब कुछ शामिल रहा है. यह
करुणा भी. अब आप इतना-सा हिस्सा बता दीजिए साहित्य का, जिसमें करुणा जो कि साहित्य
का मेन स्टेज है, कहां है? यह मान लिया गया है कि जो जितनी जोर से हथौड़ा मारेगा,
जितने ज्यादा वार करेगा, वही अच्छा साहित्य है.
गोविंद मिश्र: एको रस: करुणेव! बड़ी मुश्किल चीज है
करुणा को लाना.
गीताश्री: गोविंद जी, क्या आप लोग साहित्य में किसी
विमर्श के खिलाफ हैं? क्या आप चाहते हैं कि चाहे स्त्री विमर्श हो या दलित विमर्श,
कुछ हो या जो जैसा चला आ रहा है, चलता रहे ?
गोविंद मिश्र: देखिए, विमर्श और साहित्य यह अलग-अलग
चीजे हैं. सर्जनात्मक साहित्य के परिवेश पर हम बात कर रहे हैं. विमर्श तो एक खास
तार्किक ढंग में बहस है. साहित्य संवेदनात्मक तरीके से जो भी चीज एक लेखक को
निचोड़ती, लथेड़ती, विचलित करती है, उस पर वह लिखता है. पहले कोई किसी को क्यों नहीं
बोलता था कि इस पर लिखो? पहले हरेक की संवेदना अलग तरह से झिंझोड़ती थी. बड़ी एकरसता
हो जाएगी, अगर कहने से लिखा जाने लगे. प्रेमचंद तो लिख-लिखके मर गए. समाज फिर भी
नहीं बदला. दहेज पर दहेज फिर भी लिया जाता है समाज में. अगर मां-बाप मना करें तो भी
आईएएस लड़का तक दहेज लेता है. लिखने से क्या बदला है समाज में. लिखने से कुछ नहीं
बदलता है और बदलने के लिए हम लोग लिखते नहीं. साहित्य की खूबसूरती यह है कि हर
व्यक्ति नया जीव है, उसके अपने नए अनुभव, नई संवेदनाएं हैं. लेखक उसी अनुभव को लेकर
आए जिसमें उसकी आत्मा झंकृत होती है, तब उस चीज का असर होता है, आज मुश्किल यह है
कि मशीनी बनाते चले जा रहे हैं साहित्यकार. हमें आप विषय तब दोगे और एक संकरे कमरे
में बंद कर दोगे.
राजी सेठ: कभी-कभी मैं अपने आप को इन सबसे अलग करके
देखती हूं, तो एक भी कहानी ऐसी नहीं है जिसे आप स्त्री विमर्श के पाले में न डाल
सकें लेकिन मैं बिल्कुल स्त्री विमर्श में नहीं जाती हूं.
गोविंद मिश्र: सियाराम शरण गुप्त ने जिस समय 'नारी'
नाम का उपन्यास लिखा था, उस समय नारी-विमर्श नाम की चीज जानी ही नहीं जाती थी.
राजी सेठ: मैथिली शरण गुप्त ने यशोधरा लिखी, कैकयी
लिखी, क्या किसी खांचे में विभक्त करके ही सार्थक लेखन हो सकता है.
गोविंद मिश्र: चलो, कुछ उपन्यास-कहानियों की बात करते
हैं. ये चीजें जो उपन्यास, कहानियां लिखे जा रहे हैं....
राजी सेठ: ... अब ?
गोविंद मिश्र: हां, और यह जो नई पीढ़ी आई है न,
20-23-30 वाली, तो मुझे लगता है एक तो इनमें चमत्कृत करने की प्रवृति बहुत है. तुम
जानती हो, मैं संवेदना पर शुरू से ही जोर देता रहा हूं. तो मैं थोड़ा विचलित होता
हूं. चमत्कृत अगर यह लोग करना चाहते तो एक छोटी-सी कहानी में तो कर देंगे लेकिन जब
यह उपन्यास लिखने जाएंगे तब तो इसमें एक्सपोज होंगे, तब बिना संवेदनात्मक आधार के
आप इसे पठनीय नहीं बना पाएंगे, बांध नहीं पाएंगे. तुम्हें नहीं लगता राजी कि यह
चमत्कृत करने की प्रवृति कुछ ज्यादा हो रही है ?
राजी सेठ: पर यह भी तो देखिए न कि किस टाइम में ये
लोग लिख रहे हैं. इस टाइम को आप भूल नहीं सकते कि उनके सामने किस तरह का टाइम है,
किस तरह का परिवेश है, किस तरह के विचार हैं, कहां से सारे कोर्सेस आ रहे हैं.
गोविंद मिश्र: विचार तो इनके अपने कुछ हैं नहीं, सब
आयातित हैं.
राजी सेठ: नहीं, मान लो वे हैं. कुछ टाइम के बाद वह
झड़ जाएंगे. वह सभी एक्सपेरिमेंट के लिए आजाद हैं. दलित विमर्श, नारी विमर्श जहां से
निकला है, वहां से यह बात निकली है.
गोविंद मिश्र: शिल्प वाली ?
राजी सेठ: हां शिल्प वाली और आविष्कार तो होना ही है.
यह बात अलग है कि बाद में टिकता क्या है.
गोविंद मिश्र: दलित वालों के पास शिल्प तो कुछ है
नहीं. वे तो यह कहते हैं कि दलित पैदा हुआ हूं, इसलिए मैं ही इस पर लिख सकता हूं.
राजी सेठ: देखिए, यहां हमें यह मानना होगा कि यह तो
नहीं हो सकता कि हम जो लिखते थे, उसके बाद वाली पीढ़ी या और बाद वाली पीढ़ी आविष्कार
न करे. वह तो होना ही है. समय को तो उसके अंदर प्रवेश करना ही है. अब यह उनके ऊपर
है कि वे उसे किस तरह से हैंडिल करते हैं, फूहड़ तरीके से या अच्छे तरीके से.
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गोविंद मिश्र: पर मुझे तो बहुत बिखराव लगता है इन
कहानियों में. जब हम लोग कहानी उठाते थे तो धीरे-धीरे एक एंड की तरफ ले जाते थे
लेकिन....
राजी सेठ: (बात काटते हुए)
देखिए, यह तो मैं शुरू से कह रही हूं कि इनकी सारी चेष्टा पिछले पचास सालों से
विषयों को विकेंद्रित करने की है और हमारा अपना जितना साहित्य है उसको रिसोर्स
मटीरियल बना दो. उसको हिस्ट्री का एक पूरा कुंड बना दो और उसमें से हम निकाल-निकाल
के लिख रहे हैं. जब आपकी मंशा यही है, योर क्रियेटिव इंटनेशन इज दिस, तो उसमें यही
तो बनेगा जो बन रहा है.
गोविंद मिश्र: लेकिन यह तो साहित्य नहीं है ?
राजी सेठ: आप यह कह सकते हो कि जिसमें मनुष्य का
भाव पक्ष, संवेदना पक्ष केंद्र में नहीं होगा तो मनुष्य केंद्र में नहीं होगा
तो वह नही टिकेगा.
गोविंद मिश्र: एक बात और है वहां कि मनुष्य को आप इस
तरह डिसइंटीग्रेट करके नहीं देख सकते. मनुष्य को उसकी टोटेलिटी में देखना
चाहिए.
राजी सेठ: तो फिर आप यह बताइए कि अगर मान लें कि
हमारे पास दो वर्ग हैं. आपके पास इंटरनेट है. बटन दबाते ही सारी दुनिया इंटरनेट
पर आप के सामने आ जाता है. मेरे पास कंप्यूटर नहीं है.
गोविंद मिश्र: (बीच में ही)
पर वह दुनिया मशीन पर आ रही है केवल.
राजी सेठ: सुनिए तो सही, मेरे पास कंप्यूटर नहीं
है. दो वर्ग हो गए लेखकों के. एक वो, जिसके पास पूंजी हैं, करुणा है, अनुभव है.
एक वह, जो विचलित भी हो रहा है. प्रभावित भी हो रहा है लेकिन इंटरनेट में तो
उसे आप कैसे रोकेंगे.
गोविंद मिश्र: हम उसे रोकना नहीं चाहते.
राजी सेठ: लेकिन हो यही रहा है.
गोविंद मिश्र: नहीं, हम रोकना नहीं, केवल इतना चाहते
हैं कि वह भी मनुष्य से सोर्स ले. अब देखिए, मैंने कंप्यूटर नहीं रखा है. मेरे
लिखने का सोर्स यह है कि मेरा संपर्क लोगों से है. सीधे उस व्यक्ति से हमारा
जुड़ाव है, अब उससे थोड़ी प्यार मोहब्बत हो जाती है तो यह भी एक बात है. अब एक
तरीका तो यह है. दूसरा यह है कि आप इंटरनेट पर हिस्ट्री निकाल लें. चाहे वॉरेन
हैस्टिंग की निकाल लीजिए. फिर उस पर आपने एक कहानी बना दी. हो गया. मेरा कहना
सिर्फ यह है कि सब अपने तरीके से लिखें, लेकिन एक इस चीज पर ध्यान रखा जाए कि
साहित्य का बुनियादी, यह आज से नहीं सब देशों में सब भाषाओं में, यह हो रहा है
कि मनुष्य केंद्र में हो मशीन नहीं. और दूसरा कि पाठक के ........
राजी सेठ: मैं तो यह कह रही हूं कि प्रभाव किन
चीजों का पड़ रहा है. क्यों ऐसा हो रहा है ?
गोविंद मिश्र: अच्छा, हमें तो इसके आगे डर इस चीज का लग रहा है कि इधर
तुमने इस पर गौर किया है कि यह जो एकदम नई पीढ़ी है न, यह उपन्यास लिखने से
कतराती है. हमारी कितनी ही विधाएं आज गायब हो गई हैं-डायरी, पत्र, संस्मरण,
लेख, यह सब साहित्य हुआ करते थे. धीरे-धीरे सिर्फ कहानी और कविता ही रह गए हैं
साहित्य के नाम पर.
गीताश्री: नहीं उपन्यास और अन्य चीजें भी आ रही
हैं. अब अजय पावरिया और अनामिका, जिन लोगों ने दूसरी विधाओं में काम किया है.
हाल के दिनों में कई उपन्यास भी आए हैं. मैत्रेयी पुष्पा रेगुलर लिख रही हैं तो
कुछ लोग तो अब भी सतत रूप से डटे हुए हैं.
गोविंद मिश्र: इन लोगों के ठीक बाद जो पीढी है, उनमें
क्या नया है. एक उपन्यास शुध्दिपत्र आया है, लेकिन सिर्फ कुछ शब्द खींच देना
काफी नहीं होता, उसे गुनना भी होता है.
राजी सेठ: एक और बात, जो मुझे अभी-अभी सूझी है कि
इतनी पत्रिकाएं हैं. इन पत्रिकाओं को तो मैं एक जबड़ा मान रही हूं कि मेरा मुंह
खुला है, और ...
गोविंद मिश्र: लाओ, और सनसनीखेज लाओ, कुछ बुलबुले
पैदा करें.
राजी सेठ: हां, किसी भी लेखक की जो फर्स्ट रेट
राइटिंग होती है, वह मुश्किल से होती है, एकांत में होती है, टाइम लेके होती
है. इसीलिए सेकिंड रेट राइटिंग ही पत्रिकाओं में जा रही है.
गोविंद मिश्र: मुझे तो लगता है थर्ड रेट.
गीताश्री: आपको लगता है कि बाजार के दबाव में ऐसा
हो रहा है?
गोविंद मिश्र: अगर बाजार के दबाव की बात हो रही है तो
एक दबाव तो यही कि हम आपके सामने बैठे हैं. एक दबाव यह भी है कि आज हर व्यक्ति
पत्रिका में, ग्लैमर में जाना चाहता है, जल्दी छपना चाहता है. जल्दी-जल्दी
पद्मश्री, पद्मविभूषण बटोर लेना चाहता है. जल्दी में महान हो जाना चाहता है और
पद्मभूषण, पद्मविभूषण से आगे तो साहित्यकारों को मिलता भी नहीं. वह तो
ब्यूरोक्रेट चाट जाते हैं.
राजी सेठ: पहले एक रचना के बाद हम हफ्तों पलटकर
नहीं देखते थे और बाद तक उसे गुनते थे. अब सब कुछ तुरत-फुरत. कुछ लिखा, इधर कि
उधर कहीं से फोन आ जाता है कि तुरंत भेजो.
गोविंद मिश्र: पहले हमको तीन-तीन साल कोई छापता नहीं
था. बढ़िया रचनाएं भी प्रकाशित होने में समय लेती थीं. सधन्यवाद-तब शब्दों के
साथ भी खेद सहित वापस आ जाती थी. एक रिवाज चलता था हमारा. क्या आज की पीढ़ी इस
रिवाज से गुजर पाती है. पत्र पत्रिकाएं इतनी हो गई हैं कि इधर लिखा, उधर छपने
को तैयार. कूड़ा लिखो, तब भी छपने को तैयार. हम लोगों को यह सुविधा नहीं थी.
पांच-पांच, छह-छह साल लगते थे धर्मयुग में, साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपने में.
राजी सेठ: यह जो हम कह रहे हैं, इस कहने का मतलब
है, वह स्ट्रगल था.
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गोविंद मिश्र: और नहीं तो क्या. स्ट्रगल था, रियाज था
वह हमारा. जैसे गायक संगीत का रियाज करता है, हम शब्दों का रियाज करते थे.
लेकिन इसमें एक कंसेप्ट है. इसमें हम, (जोर देते हुए)
खास तौर से हम और तुम भी अवेयर हो कि एक जीवन लग जाता है. रचना पूरे जीवन की और
तब जाके, वह भी इत्तेफाक से कुछ गहन गढ़ता है. प्रेमचंद ने जीवन भर कितना कुछ
लिखा और कहीं तब जा के गोदान और तीन-चार कहानियां दीं. सबका यही हाल: दोस्तों
क्योंकि और दूसरे....
राजी सेठ: (काटते हुए)
तब क्या वह क्लासिक माने जाते थे? नहीं.
गोविंद मिश्र: बिल्कुल, यह क्लासिक तो इत्तेफाक से
निकलते हैं. इसमें मुख्य चीज है कि यह हम लेखकों को तय करना है कि बाजार के
पीछे पड़ना है, पुरस्कार के पीछे पड़ना है कि यह पुरस्कार, वह पुरस्कार मिल जाए.
या लगे रहें लगातार और यह निगाह हो कि कैसे हम अपनी श्रेष्ठतम रचना दें. जब तक
नजर सच्चाई से इस पर न रहेगी, कुछ अच्छा न लिखा जाएगा.
राजी सेठ: पर इन सब पर प्रभाव भी तो कितनी ही
चीजों का है. बाजार का, ग्लोबलाइजेशन का. वैसे देखिए यहां एक बात आपको बताएं,
अभी ग्लोबलाइजेशन की बहुत चर्चा है, कहां तो सोचिए कि कौन से जमाने में ले गए
थे वेदों को जर्मनी में. तो क्या यह ग्लोबलाइजेशन नहीं था ?
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सोसायटी ने अपना एक विशेषांक निकाला था, पीपुल हू चेंज हिस्ट्री, उसमें
चंडाल भी थे, अभिनेता थे, उसमें संत-महात्मा, चंद्रास्वामी जैसे लोग भी
थे. बस एक लेखक ही नदारद था. |
गोविंद मिश्र: वह साहित्य लेखन में तो झड़ जाएगा,
लेकिन जो मूल्य ......उनका क्या? जैसे हमारे नेता हमारे सामने फेंकते है चीजें...
राजी सेठ: (बीच में)
क्योंकि आपने ऐसा जीवन जिया है तो इसीलिए आपको इतनी ज्यादा तकलीफ है.
गोविंद मिश्र: अब इन नेताओं को देखो, कैसे बुलाते हैं
साहित्यकारों को. एक वो समय था, जब महादेवी ललकार देती थीं मुख्यमंत्री को, और
मुख्यमंत्री को दो दिन में पद छोड़ना पडता था. जगन्नाथ पहाड़िया राजस्थान के
मुख्यमंत्री थे. उन्होंने सिर्फ इतना कहा महादेवी को कि आपका लेखन हमें समझ में
नहीं आता. और बस...
राजी सेठ: आपने अपने व्यक्तित्व में दो व्यक्ति एक
साथ जिए हैं. एक तो अफसरी की चोटी तक पहुंचे. और लेखन में भी आपको शायद न पता हो,
जब मैंने आप पर लेख लिखा था तो सिधांशु जी ने ऐतराज किया था कि राजी को यह सब लिखने
की क्या जरूरत है. पर मुझे वही लिखना है, क्योंकि मैं अहमियत जानती हूं इसकी. तो
आपको इसलिए कष्ट होता है कि यह जो पद क्रय है वह बिगाड़ दिया जाता है. आप ऑफिसर को
महत्व दे रहे हैं, साहित्यकार को नहीं. साहित्यकार को आज कौन महत्व देता है.
गोविंद मिश्र: मैं समझता हूं कि साहित्यकार को महत्व,
सबसे पहले साहित्यकार को ही अपने भीतर से देना पड़ेगा. मेरे पूरे काल में मुझे
विश्वास भी था और मैं कहता भी था कि मेरा लेखक वाला कद हम कुर्सी वाले कद से कहीं
बड़ा है.
राजी सेठ: हां और आपने सिध्द भी किया. लेखक की अहमियत
की ही बात पर मैं बताती हूं, बंबई में एक पत्रिका निकलती है, सोसायटी. उन्होंने
अपना एक विशेषांक निकाला था, पीपुल हू चेंज हिस्ट्री यानी इतिहास की धारा बदलने
वाले लोग. आपको विश्वास नहीं होगा, उसमें चंडाल भी थे, अभिनेता थे, उसमें
संत-महात्मा, चंद्रास्वामी जैसे लोग भी थे. सब लोग थे, बस एक लेखक ही नदारद था. और
यह तो तब की बात है जब अज्ञेय जी थे. जैनेंद्र जी भी थे. भगवती बाबू थे, नागर जी
थे, उनमें कोई उन्हें इतिहास की धारा बदलने में सामर्थ्यशाली नहीं दिखा.
कहकहे देर तक गूंजते रहे.
गोविंद मिश्र: हम जो हैं न, वो ...होते जा रहे हैं,
कल्पनाविहीनता हममें ज्यादा प्रवेश कर रही है. जैसे यह कि जो चीज ठोस दिखाई देती
है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है. मसलन-पैसा, कोठी, यहां तक कि प्रतिष्ठा की बात उसके
बाद आती है. लेकिन वह भी दिखाई जाती है.
लेकिन एकदम जो चीज होती है, वह है मात. कि मुझे अपने दुख के समय कौन खड़ा रखता है.
तो यह सुख आपको कोई चीज नहीं दे सकती. न आपका पैसा, न आपकी कुर्सी, न आपकी
प्रतिष्ठा, न समाज. कुछ भी आपको दुख सहने की शक्ति नहीं देता है, लेकिन अगर आपको
विश्वास है कि हम साहित्य में हैं, ले-लेकर उसमें अपना दुख मानकर सहते हैं और तब
लिखते हैं, तब हममें अपना दुख सहने की ताकत आती है. तो हम सूक्ष्मता से जीते हैं,
इसे. पढ़े-लिखे हैं लोग, लेकिन हमारी नजर में ...
गीताश्री: यह हिंदी में ही है वरना, मराठी साहित्य
देखिए. बांग्ला साहित्य देखिए, वहां गर्व करते हैं लोग उन पर. यह हिंदी समाज का ही
दुर्भाग्य है.
गोविंद मिश्र: यह हिंदी साहित्य की बात ऐसी है कि यह
जितने प्रदेश हैं हिंदी भाषी, जैसे यूपी, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार,
यह सब बड़े तिकड़मी प्रदेश हैं उद्यमी नहीं. गुजरात का उद्यमी है, पंजाब का उद्यमी
होगा, लेकिन इन्हें देखिए सब के सब पिछड़े, क्योंकि इनका मिजाज ही यही है. तो यह है
हिंदी का दुर्भाग्य, हिंदी के प्रति प्रेम अगर देखना है तो आप हिंदी प्रदेश के बाहर
जाइये. मुझे जितना प्रेम और आदर जितना हिंदी प्रदेश के बाहर मिला, उतना वहां नहीं.
राजी सेठ: अब बिहार में ही देखिए कितने पाठक हैं
हमारे.
गोविंद मिश्र: अब साहित्य में भी यही हाल है कि जब हम
थर्ड क्लास आदमी को पदमविभूषण मिला तो हमें भी मिल जाए. भोपाल के ही एक शान थे, नाम
नहीं लूंगा. उन्हें जब पद्मश्री एनाउंस हुआ तो वो बोले कि मेरे जीवन की सबसे सुंदर
शाम थी वह. (हंसते चले जाते हैं.) मैंने कहा, अरे
गधे, तुमने क्या कभी प्रेम नहीं किया. प्रेमिका से मिलने वाली शाम को ही याद करते.
पद्मश्री मिल गया. हमारे यहां विद्यानिवास मिश्र, निर्मल वर्मा को शायद पद्मविभूषण
मिला है. मैं चूंकि जानता हूं कि कोई भी ब्यूरोक्रेट, एडीशनल सेक्रेटरी पदमभूषण से
कम नहीं लेता. जबकि वही विद्यानिवास मिश्र, निर्मल वर्मा के आगे कुछ नहीं होंगे.
लेकिन अब हमारे साहित्यकार दो कौड़ी के लालच में फंस जाते हैं. हमें तो अपमान लगता
है कि कोई पद्मश्री दे आपको.
राजी सेठ: सच कहा, कोई पुरस्कार हो, लेना अपमान लगता
है. लगता है जैसे सिध्द करना पड़ेगा.
गोविंद मिश्र: हमें इसकी परेशानी नहीं होती कि कोई
अपना जोड़-तोड़ कर रहा रहा है. जिसका जैसा मिजाज और कद है उसी हिसाब से उसका लेखन आ
जाएगा.
अब अमृतलाल नागर जी थे, भांग घोंट-घोंटकर एक उपन्यास छेड़ा, झट दूसरे में लग गए.
सूरदास पर लिखना है तो वहां चले गए.
राजी सेठ: नहीं लेकिन दिमागी असर तो पड़ ही रहा है न
इसके लिखने वालों पर कि क्या मांगा जा रहा है.
आगे पढ़ें
गोविंद जी: मेरा कहना यह है कि अब साहित्यकार का कद
होना चाहिए.
राजी सेठ: यह तो आप कह रहे हैं न !
गोविंद जी: सबका होना चाहिए.
राजी सेठ: देखिए- देखिए, जब आप ‘होना चाहिए’ कहते हैं
तो आप आदर्श और कल्पना में फर्क करते हैं. पर सवाल इस वक्त का है कि यह पीढी क्या
कर रही है. अलग-अलग संग्रह ऐसे खड़ा कर दिया है मानो टॉलस्टॉय अवतरित हो गए हैं.
गोविंद मिश्र: पर लेखक के हित में भी नहीं होता.
राजी सेठ: हां, यह लेखकों की जड़ों में पानी डाल
रहे हैं, पीढ़ी वहीं ....जाएगी.
गोविंद मिश्र: एक-एक संग्रह ऐसा उछाल दिया जाता है कि
जाने कैसी महान कृति आई है. और आपकी पत्रिकाओं के संपादक बैठे हैं शरण देने को
कि आओ हम बैठे हैं. तुम्हें बड़ा लेखक बनाने को.
राजी सेठ: ......होती है इस सबसे.
गोविंद मिश्र: समय ठीक है, लेकिन लेखक जो लिखना शुरू
करता है, वह अपने पुराने लेखकों को भी पढ़ेगा, अपनी भाषा के बाहर भी पढ़ेगा. उनको
यह सब पढ़ने के बाद उसका जो प्रभाव है वह पैदा होना चाहिए और उसे अपने ऊपर यह
विश्वास होना चाहिए कि रुपये का प्रभाव भले ही पड़े लेकिन उसके बाद जो कुछ आए वह
सही मायनों में वह होना चाहिए. तभी तो एक्सेप्शनल लेखक निकलेंगे. हमारा मानना
यह है कि 15-25 लेखक वाले मामले हर पीढ़ी में होते हैं. यह हम कह देते हैं राजी.
तुमने अफसरी वाली बात कही थी ना, यहां मैं अपना व्यक्तिगत उदाहरण दे रहा हूं.
तो शाहजहां रोड पर घर था हमारा.
राजी सेठ: याद है, मैं वहां से फूल चुरा कर भी
लाई थी. (सभी हंस पड़ते हैं)
गोविंद मिश्र: मेरे घरवालों को यह शिकायत थी कि छह
महीने घर में क्यों रहते हैं. मैं सबके विरोध के बावजूद.... आज दस वर्षों बाद
मैं उस निर्णय पर बिल्कुल पछतावा नहीं करता. मैंने बिल्कुल ठीक किया. तो लेखक
का इतना वजूद होना चाहिए कि चाहे जो हो, वह नजर सिर्फ लेखन पर रखे.
गीताश्री: लेकिन जो जरूरतें समय की होती हैं,
उन्हें कैसे कोई नई पीढ़ी का लेखक दबाकर रख सकता है.
राजी सेठ: यह अपने व्यक्तित्व का वजन लेखन में
आने से होता है. भौतिक साधनों में संतुलित दूरी बनाकर होता है. सच्चा लेखक बनने
में होता है.
गोविंद मिश्र: हां, लेकिन यह न हो कि आप साहित्यकार
का तमगा लगाए बस दिल्ली की बैठकों में बैठकी करते फिरे.
राजी सेठ: अरे गोविंद जी, किन गोष्ठियों की बात
करते हैं. कभी आपने सुना है, कैसी गोष्ठियां होती हैं. पीने-पिलाने के लिए कुछ
लोग एक हो जाते हैं.
गाली-गलौच होती है, एक-दूसरे की टांग खींची जाती है, बस. हमने तो कभी देखा नहीं कि
इन गोष्ठियों से किसी साहित्य को पोषण मिलता हो, हमने तो कभी देखा नहीं, इसीलिए हम
इनमें जाते भी नहीं. सो, यह तो सवाल ही आपने बेकार उठाया.
गोविंद मिश्र: अच्छा एक चीज याद है तुम्हें कि
जैनेंद्र जी या अज्ञेय जी ने कभी कुछ लिखा नहीं हमारे लेखन के बारे में लेकिन इनके
पास होना या इनको चीजें सुना देना ही बहुत होता था, यह लगता था कि हमारे लेखन में
कुछ क्वालिटी आई.
राजी सेठ: जैनेंद्र जी ने तो हमारी पहली पुस्तक पढ़कर
पत्र लिखा था कि अरे हम तो कहां भूले बैठे थे. तुममें एक उपन्यासकार के सारे गुण
हैं, सो मन लगाकर लिखो और आकर मुझसे मिल जाओ. तब पहली बार मैं उनसे मिलने गई थी और
मेरी आवाज तक नहीं निकल रही थी.
गोविंद मिश्र: आज हमारे पत्र को कोई चाहता ही नहीं
है, न मिलने को आते हैं लोग.
राजी सेठ: (हंसते हुए)
अब पत्र कौन लिखता है, अपने ही बच्चे तक नहीं लिखते.
गोविंद मिश्र: मैं तो पत्र थोड़े बहुत लिखता हूं.
जहां-जहां अच्छी चीज दिल छुई है. मैं अपने स्तर पर एक मशाल जलाए रखता हूं. भले ही
पोस्टकार्ड लिखूं.
राजी सेठ: मैंने आज तक यही किया है. एक पत्रिका ने भी
यह छापा है कि राजी सेठ हर पत्र का जवाब देती हैं.
गीताश्री: आज की भाषा भी तो बिगड़ गई है.
राजी सेठ: पूरी भ्रष्ट हो गई. आपने नवभारत टाइम्स और
हिंदुस्तान अखबार तो देखे हैं. इनमे किस तरह की भाषा इस्तेमाल होती है! एक वाक्य के
अंदर अगर सात शब्द हैं तो छह अंग्रेजी के होंगे, एक हिंदी का.
गोविंद मिश्र: हिंगलिश.
राजी सेठ: जी हां हिंगलिश, लेकिन आप यह बताइए कि यह
जो भाषा का सवाल है, यह कैसे साल्व करेंगे. आज की पीढ़ी जो भाषा इस्तेमाल कर रही है,
जो अपनी तरह दुरुह, अपनी तरह जटिल, अपनी तरह छिजी हुई.
गोविंद मिश्र: तुम्हें याद है अपने दोनों के एक
परिचित थे शैलेश मटियानी. वह एक बात बहुत बढ़िया कहा करते थे कि किसी लेखक का
चारीत्रिक पतन कहां तक हुआ है, यह मैं उसकी लिखी हुई भाषा को पढ़कर बता सकता हूं. तो
वह कौन भाषा में उतर आता है.
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राजी सेठ: नई पीढ़ी, उनको क्या चीज प्रभावित कर रही
है? आपका जो एटीटयूड है, वह तो साफ है. आपका लेखन के बारे में एडीटयूड साफ है, आपका
मनुष्यता के बारे में साफ है लेकिन सवाल यह उठता है कि हम उनकी तब्दिलियों को कैसे
देख रहे हैं, उनकी भाषा को कैसे देख रहे हैं, उनकी संवेदना को कैसे देख रहे हैं ?
गोविंद मिश्र: तुम्हें क्या लगता है कि भाषा में
क्या...
राजी सेठ: मुझे यह लगता है कि वह अपने लिए जो भाषा
बना रहे हैं, वह हमारे काम की नहीं है.
गोविंद मिश्र: हम अपने काम की न बात करें, पाठकों के
काम की बात करें.
राजी सेठ: नहीं, लेकिन पाठक भी तो उसी समाज में रह
रहे हैं न. आप यह भी तो देखिए कि उनको पढ़ने वाला पाठक भी तो वही है, वह क्या उसी
समाज का हिस्सा नहीं है?
गोविंद मिश्र: अब देखिए, एक उदाहरण दूं.
( कैमरामैन की तरफ इशारा करते हुए) यह कितनी फोटो लिए
जा रहा है और इस्तेमाल होनी है कितनी ? यह आज के समाज का जो वेस्टफुल नजरिया है,
उसी का एक उदाहरण है कि इतना परोस दो कि...
गीताश्री: (बीच में टोककर)
मगर यह तो मशीन है.
गोविंद मिश्र: और ऐसा मशीनी ही तो लेखन हो गया है.
भोपाल में रमेश दवे मिलने आ गए. वह भी एक पत्रिका शुरू कर रहे हैं. मैंने कहा,
'भईया, पहले से ही बारह-तेरह पत्रिकाएं पहले ही थीं और एक तुमने भी जोड़ दिया. अब सब
लोग तो आपको लेखन सामग्री दे नहीं सकते. आप इधर से लेंगे, उधर से लेंगे.' स्कूलों
को दुकान बना दिया गया है.
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स्त्री का काम तो रचना का, सृजन का इसके लिए समय ही नहीं होता. हमें
यही नहीं पता होता कि सुबह टाइम मिलेगा, दोपहर को मिलेगा या शाम को
मिलेगा. मिलेगा या मिलेगा भी नहीं. |
राजी सेठ: भारती जी की वह किताब है न कविता की, है
सपना अभी भी. यह तो पता है कि खुद दुनिया से चले जाएंगे लेकिन जो कहना चाहते हैं
उसका दस परसेंट भी व्यक्त नहीं होगा. यही तकलीफ है.
गोविंद मिश्र: तुमने सपने की बात की तो मैं सपना एक
देखता हूं. इसी भीड़भाड़ में जब अंधेरा बहुत होता है न, वहां इतनी तेज रोशनियों वाली
जो कार आ गई है न, जो कि चकाचौंध मारती है और जब एक-दूसरे से रास्ता मांगती हैं
रास्ता तो और जोर से फोकस मारती हैं. इसी दुनिया में जब रोशनियों का अंधेरा फैल
जाएगा और उसी दीये की कांपती लौ रोशनी दिखाएगी. और वह होगी किताब ही, वह होगा अच्छा
साहित्य ही. आज जब यह हो गया है कि टीवी लोग बटन दबा के देखते हैं, कोई चीज पूरी
नहीं देखते हैं, आखिर में इस छटपटाहट में आदमी बौखला जाएगा, पागलपन के कगार पर
पहुंचेगा, फिर किताब ढूंढना शुरू करेगा. लेकिन यह तय है जिस रास्ते हम अभी जा रहे
हैं वह आदमी की नस्ल को पृथ्वी से खत्म करने वाला है. वह-वह चीजें खत्म करता चला जा
रहा है, जिन-जिन पर जीवन टिका है. यानी! आप देख लीजिएगा आगे कैसी-कैसी समस्या होने
वाली हैं क्योंकि पानी को कैसे रखना है, कैसे इस्तेमाल करना है, हमें यही तमीज नहीं
है.
राजी सेठ: सारे रिसोर्सेज ही खत्म कर रहे हैं.
गोविंद मिश्र: यह तमीज इसलिए नहीं कि साहित्य हमने
पढ़ना बंद कर दिया. पेड़-पौधों की इज्जत करना बंद कर दिया. अब आप कहते हैं कि हम
पुरानी बातें क्यों करते हैं, यह नहीं बताऊंगा नहीं तो लोग सीखेंगे कैसे? वेदों में
ऐसे ही नहीं इंद्र को देवता मानते थे. अपना नाम सब गाने पर तुले हैं. आज गोविंद
मिश्र अपना नाम पहले रखना चाहते हैं, रचना का बाद में.
राजी सेठ: एक भी ऋचा में नाम नहीं है लेखक का, क्योंकि स्वयं को पीछे रखना
है.
गोविंद मिश्र: तो उस दीया की कल्पना करो. तुम न सही, तुम्हारे नाती-पोते उस
वक्त तक यह दीया आएगा वापस, फिर हम वहीं से शुरू करेंगे.
राजी सेठ: यहां मैं एक बात कहना चाहूंगी कि जिस तरह
गोविंद जी बस्ता उठाकर लिखने या घूमने चल पड़ते हैं, मैं कर सकती हूं ऐसा ? महिला
लेखिकाएं कर सकती हैं ऐसा ? स्त्री का काम तो रचना का, सृजन का इसके लिए समय ही
नहीं होता. हमें यही नहीं पता होता कि सुबह टाइम मिलेगा, दोपहर को मिलेगा या शाम को
मिलेगा. मिलेगा या मिलेगा भी नहीं. जब मैं इस घर में ब्याह के आई थी, तब मुझे कहा
गया था कि हमें अपने घर में टैगोर-प्रेमचंद नहीं चाहिए. और इसी घर में, इन्हीं के
सहयोग से मैंने डेढ़ दर्जन किताबें प्रकाशित करवाई. मेरा लिखा सत्तर प्रतिशत साहित्य
अभी भी अप्रकाशित रखा हुआ है, उत्तराधिकारी इस साहित्य का कोई है नहीं. और मैं भी
लेखन के मामले में बहुत खुली लेकिन प्रकाशन के मामले में बहुत चूजी हूं.
गोविंद मिश्र: आपका केस मैं पुष्पा जी को रेफर कर देता हूं. डॉक्टर को रेफर
कर दूं? (छेड़ते हुए).
राजी सेठ: मैत्रेयी पुष्पा जैसा थोक मुझे नहीं लिखना.
गोविंद मिश्र: अच्छा सुनो, मैं यह बात तो मानता हूं
कि हमारे समाज में स्त्रियों को दिक्कत है लेकिन ऐसा नहीं है कि पुरुष लेखक भी
पूर्णत: स्वतंत्र हैं. उन्हें भी पत्नी कभी भी झोला पकड़ा देती है और कहती है जाओ
सब्जी लाओ.
राजी सेठ: नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है. अभी तुम लोगों ने
मेरा वह-वह लेख शायद पढ़ा नहीं है जो-जो मैंने अभी तक स्त्री पर लिखे हैं. जिस तरह
का मेरा एटीटयूड इसके बारे में रहा है. सती प्रथा है, विधवा विवाह है, यह सारी
प्रथाएं किसने शुरू करवाईं? स्वामी दयानंद ने, मदन मोहन मालवीय ने, गोखले ने, नेहरू
जी ने. यह भी एक सामाजिक समस्या है. यह तो सामाजिक असमानता है,.... कल्चरल, क्योंकि
आर्थिक कारण थे, घर थे. क्या अब हमें घर नहीं संभालने होते. बच्चे नहीं पालने होते
? मैं समझती हूं हम उसमें ज्यादा दक्ष हैं, जो काम पुरुष आधे घंटे में करेगा, मैं
उसे 10 मिनट में कर दूंगी. हमें -- में प्रॉब्लम ----- है, हमें साहित्य से भी
प्रॉब्लम --- है. हमारी पॉब्लम अगर रचना है, अगर रचना के लिए हमें जितना स्पेस
चाहिए उतना नहीं मिलता जबकि सारे सहयोगी हैं.
मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हूं कि मेरे पति यह कहते हैं कि मैं भी अगर तुम्हारे
------- में जाऊं तो तुम मुझे भी माफ मत करना. यू कैन राइट अबाउट मी, व्हॉट्स आई
रांग थिंग्स डू टू यू. मैं तो ऐसे परिवार में हूं. और पचास साल पहले जब मैं इस
परिवार में ब्याह कर आई थी तो पहला वाक्य मुझे कहा गया था- हमें अपने घर में
टैगोर-शेक्सपीयर नहीं चाहिए. क्योंकि मुझे रात में पढ़ने की आदत है. अगर मैं इसी
परिवार के अंदर चौदह किताबें छाप चुकी हूं, मैंने अगर सिध्द किया है कि मेरे
व्यक्तित्व में वजन है, प्रॉब्लम क्या है? लेकिन अगर आप लड़ना चाहते, आप परिवार को
तोड़ना नहीं चाहते, आप पुरुष को शत्रु नहीं मानते तो कोई प्रॉब्लम नहीं है. हम दूसरे
लोगों, इतने लोगों के साथ एडजेस्ट करते हैं, पर परिवार के साथ क्यों नहीं. हम
परिवार को बढ़िया दे क्या रहे हैं कि परिवार बढ़िया हो जाए. 70 परसेंट मेरा वर्क अभी
अनपब्लिश्ड है जो लिखा जा चुका है. मैं सिर्फ 30 प्रतिशत ही प्रकाशित करवा पाई हूं.
क्या यह तकलीफ कम है? और मेरा कोई वारिस भी नहीं.
28.07.2008,
00.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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