असगर अली इंजीनियर से बातचीत
संवाद
मुसलमानों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं
इस्लामिक विषयों
के विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर
से
रेयाज उल हक की बातचीत
‘सेंटर
फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म’
के अध्यक्ष और इस्लामिक विषयों के
विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर की पहचान मजहबी कट्टरवाद के खिलाफ लगातार लड़ने वाले
शख्स के रुप में है. असगर अली इंजीनियर मानते हैं कि जहां-जहां इस्लाम पर जुल्म हुआ
है, वहां के लोग लड़ाई के लिए खड़े हुए हैं. वे मानते हैं कि कट्टरपंथ मजहब से
नहीं, सोसायटी से पैदा होता है. इनकी राय में भारतीय मुसलमान इसलिए अतीतजीवी है
क्योंकि यहां के 90 प्रतिशत मुसलमान पिछड़े हैं और उनका सारा संघर्ष दो जून की रोटी
के लिए है. इसलिए उनके भीतर भविष्य को लेकर कोई ललक नहीं है. यहां प्रस्तुत है, डॉ.
असगर अली इंजीनियर से की गई बातचीत के अंश.
•
अगर धर्म के आधार पर देखा जाये तो दुनिया भर में अमरिकी प्रभुत्व के खिलाफ
संघर्ष में इसलामी राष्ट्रों के लोग ही सबसे अगली कतारों में हैं. इसके क्या कारण
देखते हैं आप ?
विश्व के जिन हिस्सों पर जुल्म हो रहा है, वे सारे वही हिस्से हैं, जहां
मुसलमान हैं. आज अमरिकी हमला वियतनाम, कोरिया या चीन पर नहीं हो रहा है. तो वहां के
लोग क्यों लडेंगे अमेरिका के खिलाफ ? फलस्तीन में या इराक में जो कुछ हो रहा है, उसे
भुगतनेवाले तो मुसलमान ही हैं न ? तो लडनेवाले भी मुसलमान ही होंगे.
• इसके क्या कारण हो सकते हैं कि मुसलमानों को ही टारगेट बनाया जा रहा है?
• • इसलिए कि अमेरिका मध्यपूर्व पर अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहता है. वहां
तेल का भंडार है, जिस पर वह अपना कब्जा जमाना चाहता है. वहां जो भी जुल्म होता है,
उसमें वह इस्राइल की हिमायत करता है. इसके जरिये वह अरबों को दबा कर रखना चाहता है.
इस्राइल अमेरिका की पुलिस चौकी है, जिसके जरिये अमरिकी अरबों पर कंट्रोल रखना चाहते
हैं. जब इस पुलिस चौकी द्वारा फलस्तीन के लोगों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं
उनके खिलाफ. इसी तरह अमेरिका इराक पर कब्जा करता है क्योंकि वहां बेशुमार तेल है.
सऊदी अरब के बाद वहां सबसे ज्यादा तेल है. इसलिए वह वहां अपना कब्जा जमाये रखना
चाहता है. तो बदले की कार्रवाई तो होगी ही.
• भारत और शेष विश्व के मुसलिम समाज में एक फर्क दिखता है. पूरी दुनिया के
मुसलिम समाज में ऐसे साम्राज्यवादी जुल्म के खिलाफ हर तरह के संघर्ष चल रहे हैं.
लेकिन भारत के मुसलमान इस साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में दूर-दूर तक नहीं दिखते या
बहुत कम. वे विरोध जताने के लिए एक साधारण-सा जुलूस तक नहीं निकाल पाते हैं. ऐसा
क्यों ?
• • इसलिए कि किसी जमाने में जब विरोध किया तो उसका रद्दे अमल सख्त हुआ. जैसे
इस्राइल का येरुशेलम पर हमला हुआ था 1968 में, तो मुसलमानों ने बहुत बडा जुलूस
निकाला. उसका बहुत ही बुरा रद्दे अमल हुआ. उस समय जनसंघ ने काफी प्रोपेगेंडा किया
कि मुसलमानों की वफादारी भारत के साथ नहीं है बल्कि मक्का-मदीना के साथ है, बैतुल
मुकस (येरूशेलम) के साथ है. इसका लोगों पर बहुत खराब असर पडा.
इसके अलावा हिंदुस्तान में उस जमाने के मुकाबले में इतनी तबदीलियां आयी हैं कि मुसलमान
खुद दुनिया के भविष्य के बारे में सोचने से ज्यादा यह महसूस करता है कि उसके अपने
भविष्य का क्या होगा. इसलिए वह कश्मीर के भी आंदोलन का खुल कर समर्थन नहीं करता. आप
देखेंगे कि कश्मीर की हिमायत में भी दूसरे राज्यों के मुसलमान कोई जुलूस नहीं
निकालते. अब वे यह समझते हैं कि उनके हक उनके इलाके से जुडे हुए हैं और उन्हें अपना
भविष्य देखना है. इसलिए उनकी वफादारी भी किसी एक पार्टी से खत्म हो गयी. किसी जमाने
में उनकी वफादारी सिर्फ कांग्रेस के साथ थी, लेकिन अब हालत यह है कि यहां बिहार में
कांग्रेस चुनाव लडती भी है तो वह राजद को वोट देता है. केरल में कम्युनिस्टों को
वोट देता है. आंध्र प्रदेश में तेलुगुदेशम को वोट देता है. जो क्षेत्रीय हित हैं,
वे भी इसमें काम करते हैं.
• ऐसा क्यों है कि इसलाम विरोधी जो कुछ भी लिखा जा रहा है, उसकी बडी तारीफ
हो रही है? हर जगह उसे काफी प्रचार मिल रहा है? वीएस नायपाल हों या सलमान रुश्दी...
• • मीडिया पर कंट्रोल उनलोगों का है, जो उन इलाकों से फायदा उठाना चाहते हैं,
जहां इसलामी हुकूमतें हैं या जहां के लोग इसलाम को मानते हैं. जो बड़ी-बड़ी
बहुराष्ट्रीय कंपनियां अमेरिका में हैं, उन्हीं के हक में मीडिया होता है. सब फायदा
उठाना चाहते हैं मुसलिम राष्ट्रों के तेल से, क्योंकि वे जानते हैं कि तेल की
सप्लाइ बंद हो गयी तो सारा ऑटोमोबाइल खडा हो जायेगा सडकों पर. उनके कारखाने बंद हो
जायेंगे. कितने रोजगार खत्म हो जायेंगे. इसलिए इस तेल पर अमेरिका का प्रभुत्व होना
ही चाहिए. फिर मीडिया वही करता है जो अमरिकी शासक वर्ग के हक में है. इन्हीं के
दुष्प्रचार से लोगों में यह धारणा बनती है कि इसलाम कोई ऐसा मजहब है जो हिंसक है.
• सोवियत संघ में मुसलिम बहुसंख्यावाले राष्ट्र भी शामिल थे. लेकिन दुनिया
के दूसरे मुसलिम देशों में मार्क्सवाद अपनी प्रभावी उपस्थिति तक दर्ज नहीं करा पाया
है, इसके क्या कारण हैं?
• • वह सब ताकत से हुआ था. यह नहीं था कि मध्य एशिया के मुसलमानों ने
कम्युनिज्म को कबूल कर लिया था. काफी संघर्ष हुआ वहां भी. लेकिन जब सोवियत रूस
कामयाब हुआ उन सब पर कब्जा करने में तो उनके पास इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं था कि
वे सोवियत संघ में शामिल हो जायें. क्योंकि वहां जम्हूरियत तो थी नहीं, तानाशाही
थी, जिन्होंने मुखालिफत की उन्हें सख्त सजाएं दी गयीं. जेल में डाल दिया या गोली
मार दी गयी.
लेकिन इतना ही नहीं थी. मार्क्सवाद के फायदे भी उन्हें नजर आये. शिक्षा-सार्वभौमिक
शिक्षा-मिली, बेरोजगारी दूर हुई, खुशहाली आयी. तो बाद में फायदों को भी महसूस किया,
इसलिए उसके हामी हो गये.
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• पडोस के पाकिस्तान में 1947 के पूर्व वामपंथ था, वहां कम्युनिस्ट पार्टी
अच्छी स्थिति में थीं, लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि 1947 के बाद वहां वामपंथ का
उल्लेखनीय अस्तित्व नहीं रहा.
• • कम्युनिज्म को वहां सख्ती से दबाया गया. कम्युनिस्ट पार्टी को गैर कानूनी
करार दिया गया. यहां से कम्युनिस्ट पार्टी ने जिन लोगों को भेजा था, जैसे-फैज अहमद
फैज, सज्जाद जहीर आदि को कि वे वहां पार्टी को संगठित करें. इन सबको जेल में डाल
दिया गया. साजिश के इल्जाम लगे. मौत की सजा हो गयी. वे तो बडी मुश्किल से बचे जहीर
भाई और फैज वरना फांसी की सजा हो चुकी थी उन लोगों को तो वहां. इस तरह कम्युनिज्म
को वहां दबाया गया, बुरी तरह से. पाबंदी लगा दी गयी और आज भी पाबंदी है कम्युनिस्ट
पार्टी पर पाकिस्तान में.
• वे कौन से कारण थे कि इसलाम का विकास पूर्वी दुनिया में हुआ और लगभग पूरा
पश्चिम इससे अछूता रह गया.
• • रुक गया. पश्चिम की तरफ फैलाव हुआ था, फ्रांस तक पहुंचा था. दक्षिणी फ्रांस
तक पहुंचा था और तुर्की सल्तनत भी काफी फैला हुआ था. युगोस्लाविया का पूरा इलाका
तुर्की सल्तनत का हिस्सा था. पश्चिम की तरफ फैलाव हुआ, लेकिन एक हद तक बढने के बाद
शिकस्त हो गयी जंग में.
• तो क्या सिर्फ सैन्य कारण ही थे? इसकी और कोई वजह नहीं थी?
• • सैनिक टकराव हुआ. मुसलमानों ने कहीं जबरदस्ती करके तब्दीली-ए-मजहब तो नहीं
कराया. इसलिए पश्चिमी देशों में जैसे स्पेन पर तो 400 सालों तक हुकूमत रही मुसलमानों
की. उन्होंने वहां कभी भी जबरन धर्मांतरण नहीं कराया. पूरा कृषक वर्ग ईसाई था.
अर्बन एरिया में लोग मुसलमान थे, इसलिए जब फौजी शिकस्त हुई तो कृषक वर्ग फौज के साथ
हो गया क्योंकि वह ईसाई था. सामाजिक पहलू भी था इसका.
• मुसलिम कट्टरपंथ को देखने का सही नजरिया क्या हो सकता है? इसके कारणों और
जडों की पडताल किस तरह की जानी चाहिए? क्या मुसलिम कट्टरपंथ जैसी कोई पृथक और
स्वायत्त परिघटना है? क्या यह इसलाम के चरित्र में ही निहित है?
• • कट्टरपंथ मजहब से पैदा नहीं होता. वह सोसायटी से पैदा होता है. जैसे अभी
हिंदू कट्टरपंथ है तो वह क्यों पैदा हुआ? इसकी वजह है. जब दलित, पिछडों और आदिवासियों
ने अपने हक मांगने शुरू किये तो ब्राह्मणों को अपना पावर खतरे में पडता दिखायी दिया.
जब पावर खतरे में नजर आया तो मजहब का सहारा लिया गया कि इसी से हम सबको साथ जोड
लें, लेकिन वह हो नहीं पा रहा है. इसलिए यह कट्टरपंथ और बढता चला जा रहा है ताकि वह
उन चीजों से लोगों का ध्यान हटाये और हिंदू धर्म के नाम पर सबको एक करने की कोशिश
करे. इसकी बुनियादी वजह यह है.
देखिए कि एक समय मुसलिम लीग क्यों मजबूत हुई, क्योंकि जो मुसलिम एलीट या यूपी,
बिहार वगैरह का था, उसको अपना पावर खतरे में नजर आया कि आजाद हिंदुस्तान में उसके
हाथ से पावर निकल जायेगा. इस तरह वे मुसलिम लीग में गये कि मुसलिम लीग ही उन्हें बचा
सकेगी. और मुसिलम लीग ने पाकिस्तान बनाया और वे एलीट लोग यहां से पाकिस्तान चले गये
कि उनका भविष्य वहां महफूज रहेगा. यही हिंदू कट्टरपंथियों के साथ हो रहा है.
तोगड़िया, आडवाणी और सिंघल ये सब उसी की उपज हैं. वे सोचते हैं कि अगर वे हिंदू
धर्म का सहारा नहीं लेंगे तो ये दलित, पिछडे और आदिवासी सब पावर में आ जायेंगे. इनको
पावर से दूर रखने के लिए हिंदू धर्म की बात करते हैं. वे कट्टरपंथ की बात करते हैं
ताकि वे उनके साथ जुड जायें मजहब के नाम पर. चूंकि भारत में लोकतंत्र है इसलिए
कट्टरपंथ का मुकाबला लोकतंत्र के जरिये हो सकता है. दलित, पिछडे इसको समझ रहे हैं.
वे लोकतांत्रिक तरीके से इसका मुकाबला कर सकते हैं, क्योंकि अगर लोकतंत्र नहीं हुआ
और इस तरह की राजनीति बढी तो वे तो सबको जेल में डाल देंगे, फांसी चढा देंगे, गोली
मार देंगे. चुप हो जायेंगे लोग. तब तक के लिए जब तक फिर लोकतंत्र नहीं आता.
• आमतौर पर एक मुसलमान अतीतजीवी क्यों दिखायी पडता है? उसमें भविष्य के प्रति
कोई योजना या ललक क्यों नहीं दिखाती?
• • इसलिए कि वह इतना पिछडा हुआ है. हिंदुस्तान के मुसलमानों को ही देखिए. यहां
के 90 फीसदी मुसलमान दलित और पिछडे हैं. उनकी आर्थिक स्थिति बदल नहीं रही है तो कैसे
भविष्य की लालसा पैदा होगी? लेकिन उनमें वे लोग, जो अच्छी हालत में हैं, जिन्होंने
पैसा कमाया है, वे काफी डायनेमिक हैं. वे आगे जाना चाहते हैं. इसके लिए वे पावर में
भी जाना चाहते हैं. समाज का एक ऐसा तबका जो बिल्कुल पिछडा हुआ है, जिसे बुनियादी
शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है, जिसकी बुनियादी जरूरतें भी नहीं पूरी हो पा रही हैं,
उसका क्या भविष्य है? उसे क्या लालसा होगी? उसका भविष्य इस चिंता तक ही सीमित रहता
है कि सुबह रोटी मिल गयी तो शाम को मिलेगी या नहीं. इसी संघर्ष में वह उलझा रहता
है. उसमें भविष्य की लालसा कैसे होगी?
• प्रगतिशील आंदोलन हो या इप्टा या फिर वामपंथी राजनीति, शुरुआती दिनों में
इन सबमें मुसलमान आगे-आगे थे. इनमें से कुछ आंदोलनों की तो शुरुआत ही मुसलमानों ने
की. लेकिन धीरे-धीरे वे किनारे पर चले गये. आज वे कहीं नहीं दिखते. न अगली, न पिछली
कतारों में. इसके क्या कारण हैं?
• • पूरा मूवमेंट कमजोर हुआ है. सिर्फ मुसलमान ही इनमें नहीं जा रहे हैं, ऐसी
बात नहीं. हिंदू भी नहीं जा रहे हैं. ईसाई भी नहीं जा रहे हैं. दूसरे लोग भी नहीं
जा रहे हैं. आज का नौजवान ही नहीं जा रहा है. वह पॉप डांसेज की तरफ जा रहा है. पॉप
म्यूजिक की तरफ जा रहा है. कैरियर की तरफ जा रहा है.
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उस जमाने में एक आदर्श था. आदर्श इसलिए कि आजादी मिली नहीं थी. जीवन में काफी
संघर्ष था. जब संघर्ष का पीरियड होता है तो लोग वामपंथी बनते हैं. जब पैसा आ जाता
है, अच्छी पोस्ट मिल जाती है तो फिर वे दक्षिणपंथी बन जाते हैं. इसमें सिर्फ
मुसलमानों की बात नहीं है, सबका सवाल है.
• इन जगहों में मुसलमानों के पीछे हो जाने में संसदीय राजनीति की कोई भूमिका
देखते हैं आप? ऐसा तो नहीं कि बहुमत की विवशता के कारण ऐसे मंचों पर मुसलमानों को
एक नीति के तहत पीछे रखा गया हो?
• • नहीं. संसदीय राजनीति के कारण यह कमजोर हुए हैं, ऐसा नहीं है. बल्कि मैं तो
ये कहूंगा कि ये जो लेफ्ट फोर्सेज हैं, वे अभी तक पूरी तरह घुल-मिल नहीं कर पाये नये
सिस्टम में. संसदीय सिस्टम में उनको कैसे ऑपरेट करना चाहिए, यह वे नहीं समझ पाये.
अब धीरे-धीरे वे ऐसा कर रहे हैं. उनको पहले ही यह कर लेना चाहिए था.
लोकतंत्र में अगर आप यह कहें कि धर्म जनता के लिए अफीम है, तो आप कहीं सरवाइव नहीं
करेंगे. तानाशाही में वह चल सकता है, लोकतंत्र में नहीं चल सकता. क्योंकि लोकतंत्र
में लोग आजाद होते हैं अपने मजहब को मानने के लिए या मजहब के नाम पर लोगों में
संगठन पैदा करने के लिए. तो इसमें कम्युनिज्म हाशिये पर चला जायेगा, जब तक कि वह
इक्जिस्ट करना नहीं सीखेगा. अब वे सीख रहे हैं. इसलिए पश्चिम बंगाल में तीन दशक से
हुकूमत बनी हुई है. केरल में आते रहते हैं हुकूमत में. यह जो उन्होंने अपनी पिछली
कांग्रेस में तय किया है कि यूपी-बिहार में जायेंगे. बहुत अच्छी बात है जाना चाहिए.
लेकिन मजहब को अफीम कह कर नहीं जा सकते. इसका फायदा भाजपा उठायेगी, वीएचपी उठायेगा,
आरएसएस उठायेगा. इसलिए बहुत केयरफुली, मजहब के बारे में. मजहबी समाज में बहुत ही
खराबियां आ गयी हैं. उन खराबियों की बात करो. मजहब पर मत हमला करो. जिसे हम अंगरेजी
में कहते हैं न Don't through away baby alongwith bath water.. हमें गंदा पानी
फेंकना है, बेबी को नहीं फेंकना है. एक जमाने में वामपंथियों ने बेबी को फेंक दिया
उठा कर. हमें समझना होगा कि धर्म के आसपास जो खराबियां पैदा हुई हैं, वे धर्म के
कारण नहीं हुई हैं. वे पश्चिमी हितों के कारण हुई हैं. क्योंकि निहित स्वार्थ धर्म
को अपने लिए इस्तेमाल करना चाहता है. इसलिए खराबियां पैदा हुईं और हम गाली देते हैं
धर्म को. यह सही नहीं है. लोगों को हम फिर साथ नहीं ले पायेंगे इस तरीके से.
• लेकिन क्या इस समझ का कोई आधार नहीं है कि कभी मानव समाज भविष्य में
बौद्धिक रूप से इतना विकसित हो जायेगा कि धर्म की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी और धर्म
समाप्त हो जायेगा?
• • मैं समझता हूं कि धर्म की शक्ल कोई भी हो वह बात अलग है, लेकिन एक
आध्यात्मिक ताकत की हमेशा जरूरत रहेगी. मुझे खाना मिल जाये, कपडा मिल जाये. मकान
मिल जाये. यहां तक कि कार मिल जाये, दो नौकर मिल जायें तब भी क्या आप समझते हैं कि
मेरी जिंदगी सार्थक हो जायेगी. कहीं-न-कहीं मैं इस पूरे ब्रह्मांड से अपने आपको कैसे
जोडूंगा? मेरी क्या दिशा होगी? मैं जिंदगी को क्या अर्थ दूंगा? इसकी जरूरत तो हमेशा
रहेगी, चाहे शक्ल बदलती रहे.
पहली बात तो यह है कि धर्म से हमारी मुराद क्या है, यह तय करना चाहिए. हमलोग कुछ
शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, उनको समझे बगैर, उन्हें परिभाषित किये बगैर. हम उन्हें
यों ही मान लेते हैं और फिर जब हमें उनमें खराबियां नजर आने लगती हैं तो हम कहने
लगते हैं कि धर्म की जरूरत नहीं है. अगर आपकी बुद्धि विकसित हो जाये तो आपको धर्म
की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी. बुद्धि कितनी भी विकसित हो जाये, बुद्धि को
मार्गदर्शन की जरूरत है. बुद्धि का इस्तेमाल आप बुरे कामों के लिए भी कर सकते हैं.
एटम बम भी बना सकते हैं और आणविक ऊर्जा का इस्तेमाल अच्छे कामों के लिए भी कर सकते
हैं. सिर्फ बुद्धि ही काफी नहीं है. बुद्धि का रास्ता दिखानेवाली कोई चीज भी होनी
चाहिए. और वह आध्यात्मिक शक्ति है. उसको आप क्या रूप देंगे, यह आप पर निर्भर करता
है. ठीक है, यह समाज के साथ विकसित होता रहेगा. लेकिन कभी इसकी जरूरत नहीं रहेगी और
सिर्फ बुद्धिवाद से इनसान जियेगा, यह मैं मानने के लिए तैयार नहीं.
• आपने अपने एक व्याख्यान में कहा था कि धर्म सोशल सिचुएशन को एक शेप देना
चाहता है. तो क्या धर्म अब तक अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त कर सका है?
• • नहीं कर सका.
• क्यों?
• • इसलिए कि निहित स्वार्थ उसको इस्तेमाल करने लगा. धर्म तो समाज को एक शेप
देने आया है. वह सामाजिक उत्पाद भी है और समाज को बनाता भी है. उसका इरादा तो सही
मायनों में समाज को बनाना है. जैसे इसलाम की बात करें. गरीब-अमीर में भेदभाव को
मिटाने की बात है. कुरान में बार-बार आता है कि दौलत जमा मत करो, इसको गरीबों पर
खर्च करो. अगर मुसलमान ऐसा न करें, तो इसमें कुरान का क्या दोष?
इसी तरह स्त्री और पुरुष को समान अधिकार दिया कुरान ने. स्त्री को दासी मत समझो,
उसको बराबर का दर्जा दो. इसके बावजूद अगर मुसलमानों ने औरतों को दासी का दर्जा दिया
तो कुरान क्या करेगा? इसी तरह गुलामी की प्रथा को खत्म किया कुरान ने. लेकिन अगर
मुसलमानों ने उसे बाकी रखा तो कुरान क्या करे? इसलाम तो समाज को बनाने आया था,
लेकिन निहित स्वार्थों ने उसे नाकाम कर दिया.
इसलाम ही क्यों? हम मुसलमान मानते हैं कि एक लाख चौबीस हजार पैगंबर आये दुनिया में.
फिर भी दुनिया वही है, क्योंकि इनसान अपने स्वार्थों के लिए दुनिया को फिर से उसी
शेप में ले आता है जो पैगंबर के आने से पहले थी.
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इसलिए कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसका
हित नहीं सधेगा. पुरुष प्रधान समाज में स्त्री को बराबर दर्जा दे देंगे, तो पुरुष
की प्रधानता खत्म हो जायेगी. इसलिए वह ऐसा नहीं होने देता. अगर दौलत बराबर तकसीम कर
देंगे तो गरीब-अमीर का भेदभाव समाप्त हो जायेगा. लेकिन जो अमीर है, उनके अधिकार में
क्या बचेगा? इसलिए वे ऐसा नहीं होने देंगे. वे अपने पावर का, अपनी प्रभावशाली शक्ति
का इस्तेमाल करते हैं. इसको रोकते हैं. दूर क्यों जाइए. इसलाम के आने के 30 साल के
अंदर ही सब गड़बड़ हो गया. खून-खराबा हुआ. मेरा मतलब विरोध हो गया. वही राजतंत्र आ
गया. इमाम हुसैन को कुरबानी देनी पडी. इसके बावजूद तबदीली नहीं आयी. हुकुमत बनू
उमैया के हाथ में रही.
ये सारे निहित स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं. इसलिए जरूरत है इसको बार बार रिवाइव
करने की. जो असली पैगाम है, वह है बराबरी का, इंसाफ का, भलाई का, करुणा का. बुद्ध
क्या सीख लेकर आये थे? करुणा का. आप किसी भी बौद्ध देश में जाइए, सारा शोषण,
अमीर-गरीब का सारा फर्क सब कुछ है वहां. कौन दुनिया छोड देता है? कितने बौद्ध दुनिया
छोड देते हैं? वे तो मुट्ठी भर भिक्षुक होते हैं और उनके अंदर भी भ्रष्टाचार होता
है, क्योंकि वे भी सुखी जीवन चाहते हैं. मैं थाइलैंड जाता रहता हूं बार-बार. इतना
भ्रष्टाचार देखता हूं भिक्षुकों के अंदर. जो बडे-बडे मठ बने हुए हैं, करोड़ों की
दौलत इकट्ठा हो गयी है, उनके पास भी. कोसंबी (डीडी कोसंबी) ने खुद लिखा है कि बौद्ध
धर्म हिंदुस्तान से क्यों निकाला गया. इसलिए कि शक्तिशाली प्रतिष्ठान बन गया. उसने
भी शोषण शुरू कर दिया. उसका फायदा ब्राह्मणों ने उठाया और बुद्धिज्म का नुकसान हुआ.
अगर बुद्धिज्म अपनी निष्ठा पर कायम रहता, जिसकी वजह से लोगों ने बुद्ध धर्म अपनाया
था, तो कभी इस देश से नहीं जाता.
धर्म को निहित स्वार्थ एक शक्तिशाली प्रतिष्ठान बना देते हैं और इसका इस्तेमाल करते
हैं. वे खराबियां, जिन्हें धर्म दूर करना चाहता है, सारी वापस आ जाती हैं. हमारा
संघर्ष यही होना चाहिए कि सामाजिक न्याय हो, भेदभाव खत्म हो, सबके साथ इंसाफ हो,
सबकी जरूरतें पूरी हों. और हमें इस लडाई को लडते रहना है, निरंतर और सबको मिल कर.
ऐसा नहीं कि मैं सिर्फ इसलाम के नाम पर लडूं , आप सिर्फ हिंदू धर्म के नाम पर लडें,
कोई बौद्ध धर्म के नाम पर लडे. नहीं, हम सबको साथ आना चाहिए. क्योंकि सभी यह कह रहे
हैं कि सामाजिक इंसाफ हो, बराबरी हो, भेदभाव खत्म हो. जो भी भेदभाव है, उसके खिलाफ
हमें लडना चाहिए.
कम्युनिस्टों की गलती यही थी कि उन्होंने यूरोप की बातें यहां भी लागू करनी चाहीं.
लेकिन इस पर उन्होंने कभी जेनुइली सोचा नहीं. यह भी डोग्मा बन गया उनके लिए कि धर्म
जनता के लिए अफीम है. इससे नुकसान हुआ उनको. हमें मार्क्सवाद को भी अपनी लडाई में
अपना एक सहयोगी-साथी समझना होगा. अगर किसी मार्क्सवादी का विश्वास नहीं है धर्म पर,
तो हमें कोई ऐतराज नहीं है. यह उसका मसला है. लेकिन इन चीजों में हमें साथ आना
चाहिए. संघर्ष के दौरान साथियों के बीच कॉमन क्या है, यह देखना चाहिए. जो चीज कॉमन
है, उसके लिए साथ आकर लडो. जो चीज कॉमन नहीं, उस पर बहस करो. बातचीत करो, यह हमारा
मानना है.
• वामपंथी राजनीति का एक पहलू भारत में सांप्रदायिकता के खिलाफ हर स्तर पर
संघर्ष का भी है. लेकिन मुसलिम समाज की अन्य समस्याओं को लेकर यहां उतनी बेचैनी नहीं
दिखती. मुसलिम समाज का इस धारा से भी खास जुडाव नहीं दिखता. यह कैसा रिश्ता है, कुछ
समझ पाते हैं आप?
• • वामपंथियों ने सांप्रदायिकता के खिलाफ ईमानदार लडाई लडी, यह दो सौ फिसदी सच
है. सौ नहीं दो सौ फीसदी. मैं तो अपने हर भाषण में कहता हूं कि अगर कोई असली
धर्मनिरपेक्ष है तो वह वामपंथ ही है. इसमें कोई शक की बात नहीं है. लेकिन इसमें कई
दिस विल डयरेक्टली ट्रांसलेट इन टू लेफ्ट पॉलिटिक्स इज डिफरेंट मैटर. इसमें कई
फैक्टर काम करते हैं. मुसलमानों को तो कम्युनिस्टों को अपना शुभेक्षु समझना चाहिए.
बहुत से तो समझते भी हैं. लेकिन सारे मुसलमान कम्युनिस्टों के पीछे आ जायेंगे, ऐसा
नहीं होता. क्योंकि सोसायटी में कई फैक्टर काम करते हैं. सारे फैक्टर असर्ट करते
हैं. किस पर किस फैक्टर का असर होगा, यह आप नहीं कह सकते हैं. कांग्रेस कैसे उनके
वोट ले जायेगी, राजद कैसे वोट ले जायेगा या समाजवादी पार्टी कैसे वोट ले जायेगी, यह
बहुत ही चीजों पर निर्भर करता है.
यह हर वामपंथी को बार-बार विश्लेषित करना चाहिए कि कितने मुसलमानों ने राजद को वोट
दिये, कितनों ने समाजवादी पार्टी को वोट दिये, कितने मुसलमानों ने यहां तक कि जदयू
को वोट दिया, ये विश्लेषित करते रहना चाहिए. उससे सीख कर अपने आंदोलन को आगे बढाना
चाहिए. तभी वामपंथी आंदोलन आगे बढेगा. नहीं तो नहीं बढेगा. खाली यह आशा रखना कि हम
सेकुलरिज्म की लडाई लड रहे हैं तो स्वतः लोग हमारे पीछे आ जायेंगे, ऐसा नहीं होता.
अभी मैं कितना भी किसी का फायदा करूं और जब चुनाव लडूंगा तो कोई जरूरी नहीं कि वे
सारे लोग मेरे पीछे आ जायेंगे. तो कई कारण हो जाते हैं. हमने प्रैक्टिकली देखा है
कि कुछ लोगों को हमने मदद काफी फायदा पहुंचाया. काफी गंभीर स्थिति से निकाला. इसके
बावजूद बाद के सिचुएशन में वे हमारे पीछे नहीं आते. जैसे बोहरा धर्मगुरु के खिलाफ
मेरी बरसों लंबी लडाई में वे लोग जिनकी हमने काफी मदद की हमारे पीछे नहीं आते,
क्योंकि उनका हित नहीं है हमारे पीछे आने में. उनका स्वार्थ दूसरा है. लेकिन जब वे
कठिनाई में आते हैं तो उनका हित हमारे पास आने में होता है कि हमारी कठिनाई हल कर
दें लेकिन जैसे ही हल निकलता है, वे फिर चले जाते हैं.
29.04.2009,
14.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
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| | असगर साहब ने जो विचार दिए है -वह मंत्रवत है भारतीय समाज के जिस रूप की वोर उनका इशारा है उसके लिए जो जिम्मेदार है उनकी रक्षा करता है भारतीय वामपंथ धर्मं के प्रति जितना भी सजग हो वामपंथ लेकिन जाती के प्रति कही न कही होशियारी करता है अन्यथा मायावती न पैदा होती ! | |
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| | असगर साहब के विचारों को देश के धर्मनिरपेक्ष लोगों को गाइड लाइन बनाना चाहिए. | |
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| | bharat sagar (sagar_shandar@yahoo.co.in) Kaladi ( Distt. Ernakulam ) KERALA | |
| | श्री असगर साहब के विचारों को देश के धर्मनिरपेक्ष लोगों को गाइड लाइन बनाना चाहिए. | |
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| | Pravin Patel (tribalwelfare@gmail.com) Bilaspur | |
| | Ravivar needs contratulations to bring in the facts that throuws enough light on the current socio, economic and political compulsion of the muslims in India and how they are trapped in the international scenerio. I met Asgar Ali at a meeting in Kolkatta before a year and half and can say, what ever he speaks, he is exposing his heart through his words.
Ravivar editorial team, keep it up. | |
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