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सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु नागर से अभिषेक कश्यप की बातचीत
संवाद
लिखूंगा वही जो लिखना चाहता हूं
सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु नागर
से
अभिषेक कश्यप की बातचीत
जाने-माने कवि, कथाकार, व्यंग्यकार विष्णु नागर हिंदी
साहित्य में अपने खास तरह के मुहावरे के लिए जाने जाते हैं. उनकी रचनाओं में
व्यंग्य की तल्खी झकझोरती है तो दिलचस्प अंदाज-ए-बयां मन मोह लेता है. उनके पाठकों
का दायरा बहुत बड़ा है. वे हिंदी के उन गिने-चुने लेखकों में हैं, आम तौर पर साहित्य
से नाता न रखनेवाले पाठक भी जिनकी रचनाओं के मुरीद हैं. यहां पेश है उनसे बातचीत के
कुछ अंश
•
बचपन की कौन-सी
स्मृतियां हैं, कौन-से ऐसे दृश्य हैं जो आपको बार-बार याद आते हैं?
यूं तो पूरा बचपन ही याद आता है. बचपन में मेरा मन पढने में बिल्कुल नहीं लगता था.
हां, भटकने में मेरी दिलचस्पी थी. सो स्कूल से भाग कर अपने छोटे-से कस्बे में मैं
यहां-वहां भटकता रहता था. कभी नदी किनारे जाकर बैठ जाता था. एक छोटी-सी पहाड़ी थी,
वहां जाकर बैठ जाता था. मंदिर की सीढियों पर जाकर बैठ जाता था. पिता की तो बचपन में
ही मृत्यु हो गई थी. मैंने उन्हें देखा भी नहीं. मां के साथ रहता था, जो भटकने की
मेरी इस आदत को लेकर चिंतित थीं.
एक दिन मैं यूं ही भटक रहा था कि मुझे शौच आया. मैं अपेक्षया सूने रास्ते से घर लौट
रहा था कि मेरे एक पड़ोसी, जो मेरी मां को बहन मानते थे, मुझे खोजते हुए उधर से निकले.
उन्होंने मुझे बड़े प्यार से साइकिल पर बिठाया. घर ले आए और मेरी मां से बोले -'हाथ-पैर
बांध कर इसे खूब पीटो!' वैसा ही हुआ. मां ने मेरी खूब पिटाई की. रस्सी से मेरे दोनों
हाथ बांध दिए गए. स्कूल ले जानेवाली लोहे की पेटी मेरे हाथ में पकड़ाई गई और इसी हाल
में सरेबाजार मुझे स्कूल ले जाया गया. इसका मनोवैज्ञानिक असर मुझ पर यह हुआ कि उसके
बाद मैं फिर कभी स्कूल से नहीं भागा.
मेरे स्कूल न जाने की कुछ ठोस वजहें थीं. दरअसल वहां के एक अध्यापक बहुत जल्लाद
किस्म के थे. वे बात-बात पर छात्रों को मारते थे. उनकी ऐसी दहशत थी कि शौच की इच्छा
हो तो भी आप इजाजत मांगने से डरते थे कि कहीं पीट न दें. गणित का सवाल सही होने पर
भी एक बार मुझे मार पड ग़ई थी. वहां तीसरी कक्षा तक ही क्लास थी. जब एक बार उन
अध्यापक ने बताया कि स्कूल को चौथी कक्षा तक बढाया जा रहा है तो मैंने भगवान से
प्रार्थना की कि ऐसा न हो. ऐसा नहीं हुआ तो मैंने राहत की सांस ली.
वहां एक खराबी और थी. वहां हमारे अध्यापक बस पास और फेल बताते थे. यह नहीं बताते थे
कि आप किस दर्जे से पास हुए. तीसरी कक्षा के बाद जब मैं दूसरे स्कूल में गया तो वहां
कुछ बेहतर माहौल मिला. वहां छमाही परीक्षा के बाद जब एक अध्यापक ने, जो मेरे दोस्त
के मामा लगते थे, बताया कि मैं फर्स्ट क्लास से पास हुआ हूं तो मुझे विश्वास नहीं
हुआ. मैं तो पढाई में अपने-आपको इतना गया-बीता मानता था कि यकीन नहीं हुआ मैं
फर्स्ट क्लास से पास हो सकता हूं!
अपने शहर शाजापुर को लेकर मेरी कई स्मृतियां हैं जो 1971 में दिल्ली आने पर बहुत
परेशान करती थीं. रात को सपने में शाजापुर के अपने लोगों को देखता था तो दिल्ली की
दहशत से बड़ी राहत मिलती थी. अपने कस्बे की उन्हीं स्मृतियों ने मुझे वह बनाया, जो
आज मैं हूं.
दिल्ली आया तो लंबे समय तक यहां मुझे बेरोजगारी से कठिन संघर्ष करना पड़ा. स्थिति
ऐसी आ गई थी कि महीनों भटकने के बाद सोचा था कि वापस लौट जाऊंगा, अगर अंतिम प्रयास
के रूप में दिल्ली प्रेस की नौकरी मुझे नहीं मिली. लेकिन मिल गई. वास्तव में
शाजापुर से मेरा लगाव तो बहुत था, मगर बार-बार लगता था कि यह बहुत छोटी जगह है.
यहां से निकलना चाहिए. तो बीए के बाद जयपुर में अपने मित्र असद जैदी से मिलते हुए
मैं दिल्ली आ गया.
•
आपने लिखना कब और कैसे शुरू किया? शुरुआत कविताओं से की या गद्य से?
शुरुआत तो कविताओं से ही की. दरअसल हमारे कस्बे शाजापुर में कई साहित्यिक विभूतियां
हुई थीं. बालकृष्ण शर्मा नवीन हमारे कस्बे के थे. सन् 60 के आस-पास जब मैं 11-12
साल का था, उनकी मृत्यु हो गई थी. नवीन जी की एक बड़ी हस्ती के रूप में वहां भी
पहचान थी. उनकी एक मूर्ति बनी, उनके नाम पर हर वर्ष कवि सम्मेलन होता था. नरेश
मेहता का भी वहां से संबंध रहा. एक कवि प्रभाग चंद्र शर्मा भी वहीं के थे जो
'तारसप्तक' में आते-आते रह गए. अज्ञेय जी ने उनसे कविताएं मंगवाई थीं, मगर उन्होंने
इसे गंभीरता से नहीं लिया कि ऐसे संकलनों से क्या होता है.
इन साहित्यिक विभूतियों से प्रेरित होकर हम तीन-चार मित्र कविता लेखन के लिए
प्रेरित हुए थे. हमने पहले बाल उद्गार मंडल बनाया और थोड़े बड़े हुए तो उसे किशोर
उद्गार मंडल नाम दिया.
हम कविताएं लिखते थे, हस्तलिखित पत्रिकाएं निकालते थे और काव्य गोष्ठियां करते थे.
मुझे तुक और छंद की बिलकुल समझ नहीं थी, इसलिए मुझे लगता था कि कविता लिखना तो मेरे
लिए असंभव है. लेकिन इसमें एक दोस्त ने मेरी मदद की, जिसकी बहुत कम उम्र में मृत्यु
हो गई थी.
उसने बताया कि 'धर्मयुग' में जो कविताएं छपती हैं उनमें तो एक लाइन छोटी होती है,
दूसरी लाइन बड़ी. तो आजकल कविता लिखने के लिए छंद-वंद जरूरी नहीं रह गई है. तो इस
तरह हम भी इस प्रेरणा को पाकर कविताएं लिखने लगे, अपने अध्यापकों को सुनाने लगे. इस
तरह से एक साहित्यिक माहौल हम सब मित्रों ने बनाया.
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•
पहली कविता किस पत्रिका में छपी?
मेरी कविताएं छापने को कोई तैयार नहीं था. यहां तक कि अखबार भी मेरी कविताएं नहीं
छापते थे. फिर भी दिल्ली आकर कविताएं लिखना मैंने जारी रखा. जब शाजापुर जाता था तो
अपने अध्यापक डा दुर्गा प्रसाद झाला जी को, जो अभी भी जीवित हैं, अपनी कविताएं
सुनाता था.
एक बार दिल्ली से लौट कर मैंने उन्हें अपनी कविताएं सुनाई तो उन्होंने कहा-'अशोक
वाजपेयी की 'पहचान सीरीज' में तुम अपनी कविताएं क्यों नहीं भेजते?' मैंने संकोच
जाहिर किया तो वे बोले-'देखो, यही होगा न कि नहीं छापेंगे. तुम्हारा गला तो नहीं
काट देंगे. और जगह नहीं छपती, वहां भी नहीं छपेगी. इसमें इतना संकोच करने की क्या
जरूरत है?'
सो उनकी बात मान कर मैंने अपनी 20-30 कविताएं 'पहचान सीरीज' के लिए भेज दीं. मगर
अशोक जी का कोई जवाब नहीं आया. एक बार मुझे पता चला कि अशोक वाजपेयी दिल्ली आए हुए
हैं और नेमिचंद जैन के घर ठहरे हुए हैं. मैंने उन्हें फोन किया तो वे बोले-'क्या आप
आज शाम को मिल सकते हैं?'
मैं तो उन दिनों फ्रीलांसर होता था. अक्सर खाली ही रहता था. शाम को हम क्वालिटी
रेस्तरां में मिले तो उन्होंने बताया-'हम आपकी कविताएं छाप रहे हैं. मगर इस बीच आप
जो भी लिखें हमें भेजते रहें.' यह सब सुन कर मैं उत्साहित हुआ. उत्साहित होकर मैंने
काफी कविताएं लिखी और उन्हें भेजता रहा. इस तरह पहली बार मेरी कविताएं 'पहचान
सीरीज' में आईं और लोगों का ध्यान मेरी तरफ गया. फिर तो पत्र-पत्रिकाओं से कविताओं
की मांग होने लगी.
•
व्यंग्य हो, कहानियां-कविताएं हों या उपन्यास हो, अपनी रचनाओं में व्यंग्य की
तुर्शी और एक खास तरह के खिलंदड़े लहजे के साथ संप्रेणीयता को लेकर आप हमेशा बहुत
सजग दिखते हैं. क्या आप ऐसा अपनी रचनाओं की पठनीयता बरकरार रखने के लिए करते हैं?
मैं बहुत सजग ढंग से ऐसी कोशिश नहीं करता. रचना का प्राथमिक गुण मैं यह नहीं मानता
कि वह पठनीय है या नहीं है बल्कि यह है कि वह दरअसल रचना है या नहीं है. हो सकता है
कि मुक्तिबोध या शमशेर की रचनाएं जैसी हैं, वे बहुत संप्रेणीय न हों, लेकिन वे
सच्चे अर्थों में रचनाएं हैं. जहां तक मेरी रचनाओं की बात है, मैंने कविता लिखने के
आरंभिक बरसों में भवानी प्रसाद मिश्र को पढा था-'जी हां हुजूर, मैं गीत बेचता हूं!'
यह गीत मैंने उनके मुंह से सुना था. तब मुझे लगा कि कविता इस सहजता से भी लिखी जा
सकती है, लिखी जानी चाहिए, जो बिलकुल बातचीत के अंदाज में है. उसमें छंद है या
अलंकार है, इसका पता उसकी सहजता के कारण नहीं चलता. छंद है उसमें मगर उसकी जो सहजता
है, उसका जो प्रवाह है वह इस कदर बांध लेनेवाला है कि आपको याद ही नहीं रहता कि
उसमें छंद है या नहीं. तो इस तरह वे मेरे लिए एक प्रेरणा के स्रोत बने.
मैंने नागार्जुन की बहुत सारी कविताएं पढीं. फ़िर जब मैंने शुरू किया, वह वामपंथ का
जमाना था. लगातार यह बहस चलती रहती थी कि हमें ऐसा लिखना चाहिए जो जनता की समझ में
आए. वह धारणा कितनी सही थी या नहीं थी,यह अलग मुद्दा है. उस पर कभी मैंने भी सवाल
उठाया था. मगर एक मजबूत दबाव था लेखकों पर कि उनकी रचनाएं जनता तक पहुंचनी चाहिए.
एक और बात जो मुझे खासकर अपने गद्य लेखन को लेकर समझ आती है कि मैंने शुरू से दैनिक
अखबारों में काम किया. और दैनिक अखबारी लेखन में यह बहुत जरूरी है कि आप जो भी बात
कहें, जो खबर लिखें वह तुरंत पढ़ने वाले की समझ में आनी चाहिए, क्योंकि आपकी खबर को
कोई दुबारा नहीं पढ़ने वाला. तो इस माध्यम ने मुझे सिखाया कि आपको इस ढंग से वाक्य
की संरचना करनी चाहिए, इस ढंग से लिखना चाहिए कि आपकी बात तुरंत समझ में आ जाए. तो
इन सबसे मिल कर मेरे लेखन का एक मुहावरा बना. मगर मैं बिलकुल यह नहीं मानता कि
कहानी और कविता को सहज, संप्रेणीय ही होना चाहिए या ये ही इसके बुनियादी तत्व हैं.
कई बार कविता में, गद्य में आप खुद बहुत स्पष्ट नहीं होते कि ठीक-ठीक आप कहना क्या
चाह रहे हैं. हां, रचना के बाद एक गहरी संतुष्टि जरूर मिलती है. हालांकि वह
संतुष्टि, वह चैन इस बात का निश्चित संकेत नहीं कि जो रचना आपने की है, वह श्रेष्ठ
है. वह खराब रचना भी हो सकती है.
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आपकी कविताओं की बात करें तो वे संप्रेषणीयता के स्तर पर बड़ी दिलचस्पी जगाती हैं.
मसलन 'उन्होंने एक दिन में 10 करोड़ कमा लिए, अब वे महात्मा गांधी से भी ज्यादा
महात्मा गांधी बनने में जुट गए' या 'हर हालत में खुश रहने कि तुम्हारी ऐसी आदत है
विष्णु नागर कि कालोनी के लोग तुम्हें कुत्ता कहते हैं और इस पर भी तुम कहते हो-नो
कमेंट्स.' मगर यह मुहावरा समकालीन हिंदी कविता में आम तौर पर देखने को नहीं मिलता.
हिंदी आलोचना तो वाक्य-संरचना में जटिल दूसरे तरह के मुहावरे वाली कविताओं के साथ
खड़ी है.
हिंदी की पत्रिकाएं, हिंदी आलोचना या हिंदी के आलोचक किन लेखकों-कवियों या कैसी
रचनाओं के साथ खड़े हैं, इसकी मैंने कभी परवाह नहीं की. उनकी परवाह करूं तो फिर मुझे
कुछ और भी करना पड़ेगा. मसलन मुझे जनसंपर्क में कुशल होना पड़ेगा, एक रणनीति के तहत
खुद को प्रोजेक्ट करना पड़ेगा, जो मेरे बस में नहीं है. तो आलोचक किसे लेखक मानते
हैं, किसे प्रोजेक्ट करते हैं, किसे नहीं करते, वह उनकी चिंता का विषय है. मेरी जिद
है कि मैं लिखूंगा वही जो मैं लिखना चाहता हूं.
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जटिल ढंग से चीजें मेरे रचना-संसार
में आएंगी तो उन्हें जटिल ढंग से लिखूंगा, सहज ढंग से आएंगी तो सहज ढंग से लिखूंगा.
व्यंग्यात्मक ढंग से आएंगी तो व्यंग्यात्मक ढंग से लिखूंगा, अखबार की भाषा में
आएंगी तो उसी भाषा में लिखूंगा. जिस विधा में इच्छा होगी, उसी में लिखूंगा. इमेज की
परवाह नहीं करूंगा कि मुझे कवि के रूप में थोड़ा ज्यादा माना जाता है तो सिर्फ वही
दिखूं. बाकी जिन्हें स्वीकार करना है, नहीं करना है यह उनकी समस्या है. मैं किसी से
डिक्टैट नहीं हो सकता, न किसी को डिक्टैट कर सकता हूं.
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अभी हाल ही में एक इंटरव्यू में आपने कहा है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत ने आपको
गहरे मथा है और यह भी कि संगीत से बड़ी कोई रचना शब्दों में संभव नहीं. तो किन
गायकों-वादकों को आप सुनते रहे हैं और उनसे गुजरते हुए आपको क्या महसूस होता रहा
है? मसलन कुमार गंधर्व को लाइव सुननेवाले कई लोगों की प्रतिक्रिया सुनने को मिलती
है कि वह एक ऐसा जादुई एहसास है जिसे कभी भूला नहीं जा सकता. विष्णु खरे ने कहीं
लिखा था कि आधी रात को लता मंगेशकर का गाया गीत 'सपने में साजन से दो बातें, एक याद
रही एक भूल गई' सुनते हुए पागल हो जाने या दुनिया छोड़ देने की अहैतुक इच्छाएं जन्म
लेती हैं.
लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मन्ना डे ,किशोर कुमार के गाए कई गीत मुझे भी बहुत
उद्वेलित करते हैं. उनके गाए कुछ गीत तो बार-बार सुनने का मन करता है. इसी के साथ
भारतीय शास्त्रीय संगीत ने भी मुझे गहराई से मथा है. खास तौर से जब मैं अमीर खां को
सुनता हूं तो ऐसा लगता है कि कोई गायक नहीं गा रहा, बल्कि कोई दार्शनिक है जो अपनी
बात कहने की कोशिश गा कर कर रहा है. इसी तरह गंगूबाई हंगल को सुनना एक दुर्लभ अनुभव
है. उनकी आवाज मर्दाना है और पहली बार सुनिए तो थोड़ा विचित्र भी लग सकता है. मगर
उनके गायन का जो माधुर्य है, जो तैयारी है इस बात को गौण बना देती है कि उनकी आवाज
कैसी है. बल्कि यही आवाज उनकी विशिष्टता बन जाती है. गंगूबाई की विशिष्टता उनका खास
तरह का गला है. उनके गायन के एक खास टुकड़े ने एक दिन मुझे बहुत रुलाया है. और ऐसा
भी नहीं है कि मुझे दुख या परेशानी का कोई पल तब याद आ गया हो. बस उसे सुनकर आनंद
की एक ऐसी अवस्था में पहुंच गया था कि उस टुकड़े को बार-बार सुनता रहा और रोता रहा.
मुझे किसी कविता ने आनंद से इस कदर कभी नहीं भिगोया. मैं कोई आधे घंटे तक रोता रहा
उस खास टुकड़े को सुन कर. यह आनंद, मेरी अक्षमता ही मानिए कि मुझे किसी कविता ने कभी
नहीं दिया.
करीब पंद्रह साल पहले की बात रही होगी. मैंने अली अकबर खां को फिक्की में गाते सुना
था. मुझे नहीं याद कि वह कौन-सा राग था. शास्त्रीय संगीत की शास्त्रीयता से मेरा
कोई ताल्लुक नहीं. मुझे समझ में नहीं आता, न मैंने कभी इसे समझने की कोशिश की. मगर
जिस ऊंचाई से अली अकबर खां ने उस दिन गाया, मुझे लगा कि जितने गायकों को मैंने आज
तक सुना है, वह ऊंचाई तो किसी के पास नहीं है. उस दिन जहां वे पहुंच गए थे, वह कोई
और ही दुनिया थी. बड़े-से-बड़े गायक को मैंने उस दुनिया में जाते कभी नहीं देखा. बाद
में मैं उनके कैसेट लाया तो उसमें मुझे वह आनंद नहीं आया. मगर उस दिन वे जहां
पहुंचे थे, मैं अवाक था कि कोई मनुष्य कैसे वहां पहुंच सकता है.
एक बार मैं कुमार गंधर्व जी से देवास में किसी पत्रिका के इंटरव्यू के सिलसिले में
मिला तो उन्होंने कहा, जैसा कि वे सोचते थे-'जब तक आप अपने काम में कुछ नया नहीं
करते, उसमें कोई क्रिएटिविटी नहीं आती.' मैंने उनसे मल्लिकार्जुन मंसूर की चर्चा
करते हुए कहा-'उनके गायन में आपको एपरेंटली कुछ नया नहीं मिलता. राग का जो ढांचा है
वे उसमें रह कर ही गाते हैं, लेकिन उसके बावजूद वे जहां ले जाते हैं, वह अद्भुत
है.' कुमारजी मुझ अज्ञानी की बात से न जाने कैसे सहमत हो गए. खुद कुमार गंधर्व अपने
'त्रिवेणी' में या 'माला उज ले ले बाल गंधर्व' में जहां ले जाते हैं, भीमसेन जोशी
आपको जहां ले जाते हैं, मुझे ऐसी कविता नहीं मिली, जो मुझे इतनी गहरी शांति और इतनी
गहरी विकलता भी दे.
•
आपकी कहानियों का एक संग्रह है-ईश्वर की कहानियां. इस संग्रह की कई छोटी-बड़ी
कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई हैं, जिसमें ईश्वर केंद्रीय चरित्र है
और इन कहानियों में ईश्वर की इमेज एक जीते-जागते व्यक्ति की है. ईश्वर का
निर्विकार, निराकार या सर्वशक्तिमान का जो भाव-बोध है, वह यहां सिरे से नदारद है.
तो ईश्वर की क्या इमेजरी है आपके दिलोदिमाग में?
जैसा कि आपने कहा, ईश्वर की महानता, उसकी सर्वव्यापकता, उसका प्रभामंडल इन कहानियों
में उससे छीन लिया गया है. मगर बुनियादी रूप से जैसा कि आपने भी महसूस किया होगा,
ये कहानियां ईश्वर के बारे में नहीं हैं. दरअसल ये मनुष्यों की कहानियां हैं जो इस
बहाने से कही गई हैं. इसलिए इन कहानियों को मैंने तमाम अखबारों में छपवाया. एक
जमाने में पुरुषोत्तम अग्रवाल की साम्प्रदायिकता विरोधी संस्था ने नुक्कड़ और
चौराहों पर इन कहानियों का पाठ कराया था. मैंने सार्वजनिक मंचों पर कई ऐसी जगह इन
कहानियों को सुनाने की कोशिश की, जहां जरूरी नहीं कि साहित्यिक अभिरुचि के ही पाठक
हों. और मैंने पाया कि हर जगह और हर तरह के पाठकों ने इस प्वाइंट को समझा कि इन
कहानियों में ईश्वर का कोई अपमान नहीं.
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हालांकि अपनी कुछ कविताओं और लेखों में
मैंने ईश्वर की जो बनी-बनाई धारणा है, उसमें हस्तक्षेप भी किया है. ईश्वर की जो आम
लोगों की अवधारणा है, उससे मैं लगातार जूझता रहा हूं और आगे भी जूझता रहूंगा. मगर
इन कहानियों में ईश्वर के बारे में आम लोगों की अवधारणा या आस्था को लेकर मैंने
सीधे-सीधे कोई सवाल नहीं खड़ा किया है.
मैंने पाया है कि ईश्वर का भक्त भी ईश्वर के साथ छूट लेता है. मेरी पत्नी ने मुझे
एक पंजाबी और एक गुजराती गीत बताया, जिसमें बड़े मजे लेकर ईश्वर की आलोचना की गई है.
इतना स्पेस, बाकी समाजों में होगा, भारतीय समाज में भी है कि आप ईश्वर के साथ इतनी
छूट ले सकते हैं. तो यह छूट लेते हुए मैंने ईश्वर के बहाने आज के मनुष्यों की कहानी
कही. यहां मेरी चिंता कोई आध्यात्मिक चिंता नहीं है.
हां, इन कहानियों के बारे में एक बात मुझे अच्छी लगी कि इनमें से कई कहानियों को
बहुत छोटी उम्र के बच्चों ने पढी और पसंद की. शायद 'ईश्वर की कहानियां' मेरी
एकमात्र ऐसी रचनाएं हैं जिसे साधारण-से-साधारण पाठकों ने भी, जिनका साहित्य से कोई
वास्ता नहीं, पढी.
एक लेखक के तौर पर आपकी यह कोशिश तो होती ही है कि एक नई दुनिया तक आपकी पहुंच हो.
मसलन पिछले नौ महीने से एक अखबार में मैं व्यंग्य का दैनिक कालम लिख रहा हूं. उस पर
मुझे तमाम गैर-साहित्यिक पाठकों के पत्र मिलते हैं. मैं इसे पत्रकारिता और साहित्य
के जोड़ से बना अपना एक इंटरवेंशन मानता हूं.
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जैसा कि आपने बताया अखबार में आप व्यंग्य का दैनिक कालम लिखते हैं. तो रोज लिखने
का, तात्कालिकता का जो दबाव है, वह लेखक को किस तरह प्रभावित करता है?
तात्कालिकता का दबाव बहुत बुरा भी नहीं होता. अगर आपके भीतर कहने को कुछ है तो कई
बार यह दबाव आपको अपनी बात कहने का अवसर देता है. तात्कालिकता के दबाव का यह मतलब
भी नहीं कि आप कोई तात्कालिक चीज ही लिख रहे हों, जो आज से आगे नहीं जा पाएगा. मुझे
तो दरअसल यह बहाना मिल जाता है अपनी बात कहने का, अपनी सामाजिक-राजनैतिक चिंताओं को
व्यक्त करने का.
तत्कालिकता के दबाव हमेशा बहुत त्याज्य और तुच्छ नहीं होते, जैसा कि आम तौर पर माना
जाता है. बल्कि मैं तो मानता हूं कि जो लेखक अपने समय के जितने दबाव में रहता है,
दबावों को समझता है, उनका विश्लेषण करता है, संभव है कि वह बड़ी रचना भी दे सके.
रघुवीर सहाय से नागार्जुन तक, हम तमाम उदाहरण हिंदी से ही ले सकते हैं. जो तत्काल
के दबाव से हमेशा बाहर रहना चाहते हैं, जो शुरू से ही अनंत के दबाव में रहते हैं,
जो सामाजिक-राजनैतिक चिंताओं को गैरजरूरी-त्याज्य समझते हैं, वे बिना इस दुनिया से
गुजरे, अनंत में ही लटके रह जाते हैं.
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एक इंटरव्यू में आपने भटकते रहने में विश्वास पर चर्चा करते हुए कहा है कि आप इसके
शाब्दिक अर्थ यानी सड़क पर भटकने में भी विश्वास करते हैं. इससे नए रास्ते मिलते
हैं. तो भटकाव की सबसे विलक्षण स्मृतियां कौन-सी हैं, जिसका बाद में आपने रचनात्मक
उपयोग भी किया हो?
भटकाव की स्मृतियों पर अपनी एक-दो रचनाएं तो मुझे तत्काल याद आ रही हैं, मगर उससे
भी जरूरी बात यह है कि अगर आप एक मध्यवर्गीय जिंदगी जीते हैं, तो उसके अपने नियम-
कायदे-कानून हैं, अपनी सीमाएं हैं. एक रचनाकार के तौर पर आपको दैनिक जिंदगी के
रूटीन दबावों से बाहर निकलने की कोशिश करनी चाहिए. अपने से, अपने वर्ग से बाहर आना
चाहिए. समाज के अलग-अलग तबकों की जिन्दगी को जितना संभव हो, उतना करीब से देखने की
कोशिश करनी चाहिए. अलग-अलग किस्म के अनुभवों से गुजरने की कोशिश करनी चाहिए. और यह
सब अकारण भटकने से ही हासिल होना संभव है.
इसी तरह रचना में भी यह तय करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि आपको यहां से यहां
पहुंचना है. जब आपको पता न हो कि कहां से शुरू करना है और कहां अंत, उसका रचनात्मक
सुख ही अलग है. तब आप अपने बनाए गए रास्तों, अपने तय निष्कर्षों तक नहीं पहुंचते.
तब निष्कर्ष रचना में से आते हैं. तब रचना अपने तर्क खुद गढ़ती है. इसलिए भटकना और
कहीं पहुंचने के लिए नहीं बल्कि यूं ही भटकना, समझने-देखने के लिए भटकना हमेशा
सार्थक होता है.
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आपकी पसंदीदा पुस्तकें कौन-सी हैं जिन्हें आप बार-बार पढना चाहते हैं?
मुक्तिबोध की डायरियां और हरिशंकर परसाई की कुछ रचनाओं को बार-बार पढने की इच्छा
होती है. फिर से मानसरोवर-प्रेमचंद-की सारी कहानियां पढने की इच्छा होती है. चेखव
और मंटो का लेखन भी मुझे बहुत पसंद है और गाहे-बगाहे मैं उन्हें पढ़ता रहता हूं. दुख
है कि टाल्सटाय का 'वार एंड पीस' अभी तक नहीं पढ पाया, लेकिन भीष्म साहनी द्वारा
अनुदित उनका उपन्यास 'पुनरोत्थान' को बार-बार पढ़ने की इच्छा होती है. 'महाभारत'
मैंने संक्षिप्त रूप में पढा है. उसे संपूर्ण पढने की इच्छा होती है. कालिदास को
बहुत ध्यान से पढने की इच्छा है. ब्रेख्त और रघुवीर सहाय को बार-बार पढने की इच्छा
होती है और पढ़ता हूं.
14.07.2009,
00.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | Abhijeet Sen Raigarh | | | | Like living in neighbor with great simplicity. | | | | | |
| | Dr.sunil kumar suman (sunil_162jnu@yahoo.com) Hindi university, wardha | | | | बिल्कुल स्वाभाविक साक्षात्कार है. विष्णु जी निजी जिंदगी में जैसे सहज, सरल और साफगोई वाले व्यक्ति हैं, वो साक्षात्कार से स्पष्ट है. बधाई. | | | | | |
| | Alok Singh सासाराम, बिहार | | | | बहुत ही आत्म केंद्रीत साक्षात्कार है. इस पूरे साक्षात्कार में कहीं भी समाज, देश की कोई बात नहीं है. हर जगह केवल आत्मप्रशंसा के लायक सुविधाजनक सवाल हैं और वैसे ही उनके जवाब. गोया एक प्रायोजित साक्षात्कार हो, विष्णु नागर को ब्रेक देने के लिए. | | | | | |
| | Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad | | | | विष्णु जी की सहजता और शालीनता वाले व्यक्तित्व के साहित्यकार जो साहित्य की जटिलता, संभवतः जटिल साहित्यकार की सारी अवधारानायों से ऊपर दिखाई देते है .
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