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सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
संवाद
सती प्रथा
हमारी परंपरा
सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी
से
आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
देश के वरिष्ठ पत्रकार और 'जनसत्ता'
के संपादक प्रभाष जोशी क्रिकेट के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने के लिए उस पर
लिखते हैं. उनकी राय में भारतीय क्रिकेटर स्वाभाविक रूप से वह कौशल अर्जित करते
हैं, जिसकी जरूरत क्रिकेट में होती है, कुछ वैसे ही जैसे ब्राह्मणों ने ब्रह्म से,
वायवीय दुनिया से अपने संपर्क के पारंपरिक कौशल के कारण
सिलिकॉन वैली में अपना झंडा गाड़ा. प्रभाष जी का मानना है कि भारत में सती प्रथा
समेत तमाम मुद्दों को अपनी परंपरा में देखने की जरूरत है. यहां पेश है, उनसे हाल ही
में की गई बातचीत.
•
आज
देश में हिंदी पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष माने जाने वाले प्रभाष जोशी एक विदेशी खेल
पर इतने लहालोट रहते हैं, कई लोगों को माजरा समझ में नहीं आता. धोती-कुर्ता और
‘अपन’ वाले प्रभाष जोशी के इस क्रिकेट प्रेम का राज क्या है ?
इंदौर में मैं पला-पनपा. इंदौर में बहुत प्रसिद्ध टीम हुआ करती थी होलकर टीम और
इंदौर शहर के लिए वो टीम गौरव का प्रतीक थी. क्योकि उसमें सी.के.नायडू जैसे खिलाड़ी
थे, जो कि भारतीय क्रिकेट के प्रथम पुरूष हैं. उसमें मुस्ताक अली जैसे खिलाड़ी थे,
जिनसे अधिक रोमांटिक खिलाड़ी तो आज तक नहीं हुआ. उसमें चंदू सरवटे, भाऊ साहेब
निर्मलकर थे, जिन्होंने किसी भी हिन्दूस्तानी द्वारा सबसे ज्यादा 443 रन बनाने का
रिकार्ड कायम किया था; खंजू रामनेकर और भाऊ निवसरकर, ऐसे लोग उसमें थे. तो एक प्रकार से स्थानीय
गौरव की भावना अपने को रिलेट करती थी. फिर मैं क्रिकेट खेलता भी था और अगर मैंने
विनोबा का रास्ता ना पकड़ा होता तो शायद मैं टेस्ट क्रिकेट खेलता और रिटायर होता.
मुझे लगा कि क्रिकेट खेलने के बाद दूसरा सबसे करीबी प्रेम दिखाने का तरीका उसके बारे
में लिखना होता है. लेकिन लिखना भी मैंने कोई अपने आप शुरू किया ऐसा नहीं है. ‘नई
दुनिया’ ने पहली बार खेल का कवरेज चालू किया तो मैं वो पेज निकाला करता था. उस पेज
में यह था कि नायडू साहब का कुछ छपे, जगदाले साहब का कुछ छपे तो इनकी तरफ से मैं
घोस्ट राइटिंग किया करता था. उस घोस्ट राइटिंग के कारण मुझको लगा कि यह मामला लिखकर
आगे बढ़ाया जा सकता है.
अब मैं पाता हूं कि मुझे देखने में जो आनंद आता है, उसे लिखकर मैं बहुत अच्छी तरह
से अभिव्यक्त कर सकता हूं. क्योंकि मैं जहां भी जाता हूं, कई महिलाएं मुझे मिलती
हैं, वे कहतीं हैं कि हम तो क्रिकेट समझते नहीं लेकिन आप जो लिखते हैं, उसे पढ़ने के
लिए हम क्रिकेट पर ध्यान देते हैं. और तो और हिंदी के प्रसिद्ध कवि अपने कुंवर
नारायण ने मुझसे कहा कि मैं क्रिकेट देखता नहीं हूं, समझता नहीं हूं. मैं क्रिकेट
को आपके गद्य के कारण पढ़ता हूं. अब अगर आपको चारों तरफ से इस तरह का रिस्पांस मिलता
है और अगर वो आपका पहला शौक है तो फिर आपकी इच्छा होती है कि आप उसे लगातार करते रहें.
कई बार मेरे मन में यह आता है कि अब तो देख लिया, अब क्या लिखना. मुझे याद आता है
कि मैं एक बार विदेश यात्रा पर था तो एक महिला ने मुझे चिट्ठी लिखी कि कल फलां-फलां
मैच हुआ, उसमें ऐसी-ऐसी स्थिति हुई. आज सबेरे मैंने इस इरादे से अखबार खोला कि देखते
हैं उसमें आप क्या कहते हैं. और आपका लेख न देखकर मुझे बहुत निराशा हुई. तो कम से
कम जिस पर सब लोग रुचि रखते हैं, उन पर तो आप जरूर लिखा कीजिए. अब उस महिला को मैं
जानता नहीं हूं. यूं भी अपने यहां महिलाओं का क्रिकेट में शौक उतना नहीं है, जितना
दूसरे देशों में हो सकता है. लेकिन अगर आपको इतनी व्यापक पाठकीय रुचि और प्रतिक्रिया
मिलती है तो यार, लिखने वाला इसके अलावा किसके लिए लिख रहा है ? इसलिए मैं वो करता
रहता हूं.
खेल राजाओं का
•
एक सवाल उठता है बार बार कि क्रिकेट सामंती खेल है. देश का एक बहुत बड़ा
वर्ग ऐसा मानता है कि क्रिकेट को अनावश्यक रूप से बाज़ार के दबाव के कारण बढ़ावा
मिला है, उसके बनिस्बत फुटबाल या हॉकी या जो दूसरे बेहतर खेल हो सकते थे, उनको
दरकिनार किया गया.
अपने देश में जिस तरह से यह खेल शुरू हुआ है, उस कारण से उसकी यह छवि
बनी हुई है. अपने देश में क्रिकेट लाए अंग्रेज, वो अंग्रेज जो आप पर राज करते थे.
सबसे पहले उनके साथ किसने खेलना मंजूर किया ? पारसियों ने, जो कि आपकी एक बहुत ही
छोटी अल्पसंख्यक कम्युनिटी थी. अंग्रेजों ने उनको इसलिए क्रिकेट में लगाया कि इन
लोगों को वो भारतीयों से फोड़ कर, अलग कर के फिर इनका इस्तेमाल कर सकें. उसके बाद यह
महाराजाओं की टीमों का खेल बना. उसके बाद पटियाला महाराजा, बड़ौदा के महाराजा, होलकर
महाराजा इस तरह से महाराजा लोग इसमें आए. बनारस में रहने वाले महाराज कुमार ऑफ
विजयानगरम् ने इसमें रुचि ली क्योंकि वो क्रिकेट के जरिए अंग्रेजों से अपने संबंध
ठीक करना चाहते थे. और तो और, क्रिकेट के दूसरे नंबर के दुनिया के सबसे बड़े
प्रामाणिक खिलाड़ी रणजीत सिंह जी महाराज कुमार ऑफ जामनगर, वो भी क्रिकेट इसलिए खेलते
थे क्योंकि वो अंग्रेजों का खेल था और इसके जरिए वे अपनी रियासत की रक्षा कर सकते
थे. इसलिए एक सज्जन ने उन पर पुस्तक भी लिखी है ‘बैटिंग फॉर द एम्पायर’ यानी
साम्राज्य के लिए वो खेलते थे.
यह गौरतलब है कि रणजीत सिंह जी इंग्लैंड की टीम से खेले और उनके भतीजे दिलीप सिंह
जी, जिनके नाम पर अपने यहां एक प्रतियोगिता भी चलती है; वो जब क्रिकेट खेलने को आए
तो इस हालत में थे कि वो भारत के लिए खेल सकते थे और उनको भारत का कप्तान बनाया जाता.
लेकिन रणजीत सिंह ने उनको कहा कि तुम इंग्लैंड के लिए खेलो और वो सबसे पहले
इंग्लैंड के लिए खेले.
इंग्लैंड के लिए खेलते हुए रणजी ने पहले ही मैच में सेंचुरी बनाई थी. ऐसे में दिलीप
सिंह के ऊपर ये दबाव था कि वो भी सेंचुरी बनाएं. तो उन्होंने भी बनाई थी. इसका सबसे
मजेदार नतीजा ये निकला कि मंसूर अली खान पटौदी के पिता इफ्तिखार अली पटौदी इंग्लैंड
में खेलते थे. वो पहले इंग्लैंड के लिए ही खेले. वो 1932 की बॉडी लाइन सीरीज में थे
और जॉर्डिन के साथ नहीं थे. जॉर्डिन वो कैप्टन था, जिसने
बॉडी लाईन बॉलिंग इन्वेंट की थी. ये उससे सहमत नहीं थे. तो इसलिए जॉर्डिन ने इनको
साइड लाइन कर दिया था.
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रणजी ने और दिलीप सिंह ने इंग्लैंड के लिए खेलते हुए पहले टेस्ट में सेंचुरी बनाई,
इसलिए इफ्तिखार अली पटौदी भी इंग्लैंड के लिए खेले और पहले टेस्ट में सेंचुरी बनाई.
वो दिन भर खेलते रहे और शाम को 105 रन पर थे. जब वो 105 रन पर थे तो आखिर ओवर शुरू
हुआ. उसी समय वो बल्ला लेकर पिच को जगह-जगह से ठपकाने लगे.
तो डॉन ब्रैडमैन उनके पास से निकले. डॉन ब्रैडमैन ने कहा “what are you patting at
Pat ?” पटौदी को जैसे Pat कहते थे,
इनको भी कहते थे. तो डॉन ब्रैडमैन ने कहा- क्या कर रहे हो. तो उसने कहा कि
“I am trying to judge the pace of the wicket.” (मैं पिच की स्पीड को समझने की
कोशिश कर रहा हूं.) तो डॉन ब्रैडमैन ने कहा कि “It has changed five times you
came.” क्योंकि दिन भर वो यही करते रहे क्योंकि सेंचुरी बनाना जरूरी था.
खैर, जब उनका इंग्लैंड का कैरियर खत्म हुआ तो 1946 में पहली बार वो भारत के कप्तान
बने इंग्लैंड के टूर पर. वे इंग्लैंड के खिलाड़ियों को भारत के खिलाड़ियों से बेहतर
जानते थे. भारत के खिलाड़ियों के तो नाम भी नहीं जानते थे.
आम आदमी का प्रवेश
पहले पोरबंदर को कप्तान बनाया, फिर नवाब इफ्तिखार खान पटौदी को बनाया.
दोनों तरफ राजाओं को कप्तान बनाया गया और मैदान पर सीके नायडू ने सबसे पहले टेस्ट
में कप्तानी की थी. राजा के पास मर्सीडीज ज्यादा थी और रोल्स रायस ज्यादा थी, रन नहीं
थे. इसलिए सीके नायडू को खिलाया गया. सीके नायडू तो बेचारे साधारण परिवार के आदमी
थे और बहुत अच्छे एथलीट थे.
मैंने उनको साठ वर्ष की उम्र में खो-खो मैच में चीयर करते हुए देखा. खो-खो की एक
बहुत अच्छी लड़की है महाराष्ट्रीयन. इंदौर की थी. उसका पैर मुड़ गया खेलते हुए. सीके
नायडू मैदान पर आए और उसको कहा- बैठ. उसको बिठाया और पांव को खींचा और कहा कि- जा
खेल. यानी वो फिजिकल चीजों को इतना अच्छा जानते थे.
सीके नायडू साधारण आदमी, मुश्ताक अली तो पुलिस का बेटा, और भी साधारण थे. विजय हजारे
वो बिल्कुल पुलिस के यानी साधारण परिवार के आदमी. एकमात्र पैसे वाला आदमी था तो वो
विजय मर्चेंट. वो ठाकरसी मिल के मालिक हुआ करते थे.
खिलाड़ी तो सब के सब जमीन से आते थे, छोटे गांव से आते थे और उनके कप्तान या टीम को
चलाने वाले राजा-महाराजा होते थे. इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ने वालों को लगा कि ये खेल
तो राजा-महाराजाओं का खेल है, उन्होंने इसको हटाया.
हॉकी भी अंग्रेज ही लाए थे, कोई अपना खेल तो है नहीं. फुटबाल तो सारे यूरोप के
साधारण, बहुत ही साधारण लोगों का खेल हैं. वहां का सबसे लोकप्रिय खेल यही है.
फुटबाल और हॉकी भी अंग्रेज ही लाए लेकिन इन दोनों खेलों को राज का संरक्षण नहीं था.
इसमें सिर्फ साधारण लोग खेलते थे. इसलिए हमने यह माना कि ये तो जनता का खेल है और
क्रिकेट जो है वो राजा-महाराजाओं का खेल है.
आखिरी राजा-महाराजा जो देश के लिए खेला, वो था अपना नवाब मंसूर अली खान पटौदी. इसको
एक वोट देकर, चेयरमैन का वोट देकर नवाब पटौदी को विजय मर्चेंट ने बाहर किया और अजीत
वाडेकर को कप्तान बनाया गया.
अजीत वाडेकर पहली बार एक टूर पर जाकर बाहर से दो सीरीज जीतकर लाया. तब से क्रिकेट
का जो लोकतांत्रिकीकरण हुआ है, वो गजब का है. उसमें अब ऐसे-ऐसे लोग खेलने के लिए आते
हैं, जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं जा सकता था. अब ये विनोद कांबली... कांबली
गाड़ी साफ करने वाले क्लीनर का बेटा है. वो अपने यहां विकेट कीपर था, वो किसका बेटा
था? ढोली का. अभी भी उसके पिता हरियाणा में कहीं ढोल बजाते हैं. यह सब बहुत ही
साधारण, बहुत ही साधारण परिवारों से आए हुए लोग हैं. अब बाजार क्या इसको पुश कर कर
रहा है ? बाजार हर उस चीज को पुश करता है, जो उसका सामान बेचने में उसकी सहायता कर
सकता है.
मान लीजिए आज फुटबाल इस देश का सबसे लोकप्रिय खेल हो जाए, वो फुटबाल के लिए
एडवरटाईज करेंगे. हॉकी इस देश का सबसे लोकप्रिय खेल हो जाए तो सारा बाजार उसको बढ़ाने
में लग जाए. इंग्लैंड ने तो क्रिकेट के खेल का आविष्कार ही किया लेकिन आज भी
इंग्लैंड में फुटबाल को जितने विज्ञापन मिलते हैं और जितने प्रायोजक मिलते हैं और
फुटबाल खिलाड़ी जितने मालामाल हैं, उतना क्रिकेट खेलने वाले नहीं हैं. क्योंकि
क्रिकेट को वहां तीसरे नंबर का दर्जा है. फुटबाल है, टेनिस है और उसके बाद क्रिकेट
का नंबर आता है.
अपने यहां राष्ट्रीय कारणों से क्रिकेट की लोकप्रियता रही है. यानी इनका खेल के
इतिहास से लेना देना नहीं है, अपनी राष्ट्रीयता का सवाल है. पहली बार सीके नायडू
ने एमसीसी के विरूद्ध मुंबई में 155 रन बनाए, उसके पहले दिन अर्न गाय अरली नाम के
एमसीसी के खिलाड़ी ने आठ छक्के समेत करीब सवा सौ रन बनाए. सीके नायडू ने 11 छक्के
मारे और 14 चौव्वे मारे उस दिन. सारे देश में ये फैल गया कि एक हिन्दूस्तानी एक
अंग्रेज को क्रिकेट के खेल में मार सकता है. उस दिन से देश के मन में ये भावना पैदा
हुई कि अगर इसको राष्ट्रीय समर्थन मिलेगा तो हम अंग्रेजो को पछाड़ सकते है. इसलिए
सीके नायडू को मैं भारतीय क्रिकेट का प्रथम पुरूष मानता हूं क्योकि उनके नाम लेते
ही जैसी सनसनी हो जाती थी. बंबई में, कलकत्ते में, मद्रास में वो 1926 की एक इनिंग
के कारण लोकप्रिय हो गये. 1926 में वो 31 बरस के थे. वो 1895 में जन्मे थे. तो उनके
कारण एक तरह का राष्ट्रीय जज्बा पैदा हो गया.
जब भारत में एमसीसी की टीम आई तो गांधी जी के पास लोग गये. गांधी जी ने अपना नाम
एमसीसी के टीम के नीचे लिख दिया था. ये जो क्रिकेट के खेल में राष्ट्रीयता की भावना
अपने यहां पैदा हुई, वो दूसरे खेलों में नहीं थी. हॉकी में हालांकि हम हर मैडल जीत
कर आते थे लेकिन हॉकी में अंग्रेज तो कही थे ही नहीं तो दूसरों को हराने का कोई
मतलब नहीं था.
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अंग्रेज क्रिकेट के बादशाह थे और उनको अगर हम क्रिकेट में हरा सकते हैं तो हम बेहतर
टीम हो सकते है. ये जो राष्ट्रीय भावना है, इस कारण से अपने यहां क्रिकेट इतना
लोकप्रिय है.
लगान और स्लमडॉग मिलेनियर
•
राजा-महाराजा, बाजार, कॉरपोरेट और राष्ट्रीयता का जो ये पूरा परिदृश्य बनता
है, उसमें ‘लगान’ जैसी फिल्में बनती हैं और बाज़ार उस राष्ट्रीयता को फिर से भुनाता
है.
इस देश ने ‘लगान’ फिल्म बहुत देखी और आपको मालूम है कि ‘लगान’ फिल्म आस्कर के लिए
भेजी गई थी. आस्कर के अवार्ड में इंग्लिश लोगो का बोलबाला नहीं है. वहां अमरीकियों
का बोलबाला है. इसलिए क्रिकेट वाली फिल्म को वहां उतना प्रश्रय नहीं मिला, जितना
‘स्लमडॉग मिलेनियर’ को मिला. ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ की कथा महामंदी से मारे जा रहे
अमरीका के लिए आशा की किरण की तरह थी कि हम फिर से लबालब करोड़पति की तरह हो सकते
हैं, ये उसके पीछे भावना थी. अब ‘लगान’ जैसी फिल्म हमें क्या संदेश देती है ?
राष्ट्रीयता का देती है न. अपन साधारण लोगों का, क्रिकेट के बादशाह और हम पर राज
करने वाले बादशाहों पर विजय का संदेश देती है. यानी उसमें भी क्रिकेटीय superiority
या क्रिकेटीय excellence यानी सर्वश्रेष्ठता का सवाल नही है. इसमें भी राष्ट्रीयता
का सवाल है. आप पाकिस्तान से खेलते हैं और आपने वर्ल्डकप में पाकिस्तान को मार दिया
तो सारे देश में ऐसा जश्न मनता है, जैसे वर्ल्डकप जीत गये हों. बल्कि मुझे कई लोग
मिले कि हमारा वर्ल्डकप तो उसी दिन हो गया, जिस दिन इंडिया ने पाकिस्तान को हराया.
संयोग से हर विश्वकप के मैच में भारत ने पाकिस्तान को हराया है. तो अपनी राष्ट्रीयता
की भावना अब इंग्लैंड से उतनी नही जागती जितनी की पाकिस्तान से.
क्रिकेट, मुसलमान और देशभक्ति
•
क्रिकेट में पाकिस्तान को लेकर जिस तरह से उन्माद फैलता है, जिस तरह की
राष्ट्रीयता का माहौल तैयार किया जाता है, उसमें बाजार के साथ-साथ सांप्रदायिकता की
एक खास भूमिका नजर आती है. बाबरी मस्जिद टूटने के बाद से इस भूमिका को और स्पष्टता
के साथ देखा-समझा जा सकता है. ऐसे में क्रिकेट में इस तरह की राजनीति की भूमिका को
आप किस तरह देखते हैं ?
आपको याद होगा, बाबरी मस्जिद के पहले शिवसेना ने पिच खोद दी थी. तब बाबरी मस्जिद
गिरी नहीं थी. शिवसेना वालों की पाकिस्तान के साथ खेलने के बारे में जो आपत्ति है,
वो इसलिए है क्योंकि वो भारत के मुसलमानों को भारत के हिन्दूओं को हराने के साधन की
तरह देखते हैं. उनको लगता है कि पाकिस्तानी टीम यहां आती है तो सारे के सारे
मुसलमान उसको सपोर्ट करते है. अब इस तर्क का आप क्या करेंगे ?
आपकी टीम इंग्लैंड जाती है तो आप के जितने भी लोग ब्रिटिश नागरीक हो गये है, वो वहां
जाकर ब्रिटेन की टीम के लिए चीयर नहीं करते है, वो आपकी टीम के लिए चीयर करते है.
जिस देश को छोड़ आए है, जिस देश की नागरिकता भी छोड़ दी. उस देश के मूल के आप हैं,
इसलिए अपनी टीम को आप चीयर करते है. अब अगर एक मुसलमान पाकिस्तान की टीम को चीयर
करता है तो आप को आपत्ति क्यों होनी चाहिए ? ब्रिटेन वाले कहेंगे कि ये कैसे
हिन्दूस्तानी हैं, जो यहां हमारी धरती पर आकर रहते हैं, हमारी धरती पर पले-पनपे
हैं, फूले-फले हैं और ये इंडिया की टीम को चीयर करते है. वो ये दलील दे सकते है और
उनकी दलील ठीक होगी कि नहीं ?
तो जो उन्माद है, वो भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता के कारण है. इसका हिन्दूत्व
डॉमिनेंद से ज्यादा लेना-देना नहीं है. वीर सावरकर ने हिन्दूत्व में बहुत पहले ये
कहा कि आप अगर कल किसी से लड़ोगे तो क्रिश्चियन और मुसलमान आपकी सेना के खिलाफ हो
जायेंगे. यूरोप के दो उदाहरण उन्होंने दिए.
आज तक आपने देख लिया कि तीन युद्ध हो गये पाकिस्तान से, ऐसा कभी नहीं हुआ कि
मुसलमानों की बस्ती ने पाकिस्तान की मदद करनी चालू कर दी. एक जगह ऐसा नहीं हुआ तो
फिर आप उनकी निष्ठा पर संदेह क्यों करते हैं ?
कौशल वाली कौम
भारतीय क्रिकेट टीम के कई सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी मुसलमान हैं. यानी वर्ल्डकप में भारत
का झंडा लेकर जाता हुआ अजहरूद्दीन और एक मैच में आपको याद हो तो पठान भाईयों ने अपने
को जिताया था. दोनों आमने सामने थे. लार्डस् का मैच जिसे सबसे बड़ा मैच मानते है,
उसको जिताने वाला कौन था ? मोहम्मद कैफ.
मुसलमानों ने भारतीय क्रिकेट का अहित किया हो, ऐसा आपको कहीं नहीं मिलेगा. बल्कि वो
ज्यादा अच्छे खिलाड़ी हुए. इसका कारण है. अपने यहां मुसलमान कौन हुए? मुसलमान वो हुए,
जो हाथ से काम करने वाले लोग थे. जुलाहे, लोहार, कुम्हार जो-जो भी हाथ से काम करने
वाले लोग थे और जिनको आप के समाज में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता था, वो लोग
मुसलमान हुए. वे स्वाभाविक रूप से हाथ को, उंगलियों को हैंडल करने वाले लोग थे. उनकी
स्किल हमसे और आप से बेहतर है क्योंकि वो हाथ से ही काम करने वाले लोग थे. हम दिमाग
से काम करने वाले लोग है.
हाथ में दक्ष होने के कारण अजहरूद्दीन की कलाई बेहतर चलती थी या मुश्ताक अली. स्पिन
करने में आपको कलाई और उंगलियां, इनका ही सबसे अच्छा इस्तेमाल करना आना चाहिए. तो
वो जो हाथ से काम करने वाले लोग है, उनका स्किल, उनका हुनर, उनका कौशल जो है, वो
दिमाग से काम करने वाले से ज्यादा बेहतर होता है, ट्रेनिंग के कारण.
जैसे सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता.
दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये
और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन
इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि
ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि
वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने
शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते
हैं. यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते.
ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों
को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां
इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए.
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अपने समाज में अलग-अलग कौशल के अलग-अलग लोग हैं. अपन ने ये माना कि राजकाज में
राजपूत अच्छा राज चलाते है. क्यों माना हमने ? एक तो वो परंपरा से राज चलाते आ रहे
है, दूसरा चीजों के लिए समझौते करना, सब को खुश रखना, इसकी जो समझदारी है, कौशल जो
होती है, वो आपको राज चलाते-चलाते आती है. आप अगर अपने परिवार के मुखिया है तो आप
जानते हैं कि आपके परिवार के लोगों को किस तरह से हैंडल किया जाये.
ब्राह्मणों का वर्चस्व
मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे है. अगर
सचिन आउट हो जाये तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जायेगा. क्योकि कांबली
का खेल, कांबली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बनाकर रखने और लेकर जाने का
नहीं है. वो कुछ करके दिखा देने का है. जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो
लंगर डालकर खड़ा हो जाये और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला.
अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण
आगे बढ़ते है. अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे
राजनेता कौन है ? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल
बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण. क्यों ?
क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते है.
बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो
मैंने लिखा कि इतनी बार झुके है कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा.
ये मैं जातिवादिता के नाते नहीं कह रहा हूं. एक समाज में स्किल का लेवल होता है,
कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने
क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है.
इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बना कर लड़ा करती थीं. जब वह
प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगो की फौज खड़ी की. ऐसे लोग, जो
उसके खिलाफ बोल नहीं सकते थे. या जो अपनी खुद की कैपासिटी में कुछ कर नहीं सकते है.
वही एक सर्वोच्च नेता रहीं. बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते
है. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते है.
क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनॉलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे
कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं ?
सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण.
ये जो टिके रहने की परंपरा है, वो जाति से नहीं आई. ये आपका लगातार उस काम को करते
रहने के कारण है. इस कौशल का जिस भी क्षेत्र में बेहतर इस्तेमाल हो सके वहां आप सफल
हो सकते हैं. अगर आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 11 खिलाड़ियों में से 5 हिन्दूस्तानी
निकालेंगे तो उसका कारण यह है कि हमारे यहां वो कौशल विकसित है.
भारतीय बेट्समैन श्रेष्ठ
मैं सभी विश्वकप में देखने जाता हूं, भारतीयों से अच्छी बल्लेबाजी कोई नहीं करता.
सचिन तेंदुलकर को आगे-पीछे जाके बल्ला नहीं करना पड़ता है, जब वो गेंद को मारता है
तो उसका पांव अपने आप गेंद के सामने होता है. यह कौशल है, जो अचानक नहीं
आयी है. वो जो 130 मील प्रति घंटा की रफ्तार से आने वाली
सर्विस को जब रिटर्न करते हैं टेनिस कोर्ट पर, तो सोच-समझ कर थोड़ी करते हैं. किसको
बैकहैंड मारूंगा, किसको स्लाईस करूंगा, यह पहले से थोड़ी तय करते हैं. आपकी जो
रिफ्लेक्सेस हैं, वो इतनी ट्यून्ड होते हैं कि जैसी गेंद आ रही है, आप उसे वैसा
खेलते हैं. ये जो ट्रेंड करना है, यह आपके रिफ्लेक्सेस तो आपकी ट्रेनिंग से प्राप्त
होती है. जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार के काम को करने की ट्रेनिंग मिली है,
वे उस काम को अच्छा करते हैं.
क्रिकेट चूंकि अपने यहां अब समाज के मध्य वर्ग का खेल हो गया है तो आप देखेंगे कि
कौशल का स्तर और दूसरी जगहों के स्तर से बहुत उंचा है. आस्ट्रेलियन गेंद को मारता
है तो ऐसा लगता है कि हथौड़ा मार रहा है लेकिन जब हिन्दूस्तानी मारता है तो ऐसा लगता
है एक तरह की कला से उसने उसको मारा है. दुनिया के सबसे अच्छे बैट्समैन आपके पास
हैं, इसलिए क्योंकि वो कला आपकी है.
•
जब आप सिलिकॉन वैली की बात करते हैं तो...
हम समंदर में भी होते तो तूफां होते, वहां साहिल नहीं होते. ये तो आपका स्वभाव है.
•
जब आप सिलिकॉन वैली, क्रिकेट, कौशल और अंततः
ब्राह्मणवाद
की बात करते हैं तो इसका एक पाठ यह बनता है कि आप कहीं न कहीं
ब्राह्मण होने की श्रेष्ठता को स्थापित करने की
कोशिश कर रहे हैं...
नहीं-नहीं, मैं ब्राह्मणवाद की बात ही नहीं कर रहा हूं. मैं
ब्राह्मण के उस कौशल की बात कर रहा हूं. वो सिलिकान वैली में, आईटी में जाकर
सफल हुए, यहां सफल नहीं होते थे. क्योंकि आईटी में आपको जो अमूर्त है, उसको मूर्त
करने की कला आनी चाहिए. क्योंकि ब्राह्मण का काम वही है. वो उससे पैदा हुआ है. मैं
परंपरा से विभिन्न जातियों के काम के दौरान विकसित हुई कुशलता की बात कर रहा हूं.
आप इसे
ब्राह्मण जाति या
ब्राह्मणवाद
से मत जोड़िए.
सती हमारी परंपरा
•
मुझको आपका एक बहुचर्चित लेख याद आता है सती प्रथा वाला...
मैं यह मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया
हुआ है. अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया. सबसे बड़ी
सती कौन है आपके यहां ? सीता. सीता आदमी के लिए मरी नहीं. दूसरी सबसे बड़ी कौन है
आपके यहां ? पार्वती. वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के
लिए. उसके लिए. सावित्री. सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है. सावित्री वो है,
जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया.
सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है. मेरा सत्व,
मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं. अब वो अगर पतित होकर... बंगाल में जवान
लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की
परंपरा हुई. इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में. इसलिए वह घर में रहे.
जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते. अपने यहां कुछ जगहों पर उसको
सती कर देते हैं.
आगे पढ़ें
आप अपने देश की एक प्रथा को, अपने देश की पंरपरा में देखेंगे या अंग्रेजों की नजर
से देखेंगे, मेरा झगड़ा यह है. मेरा मूल झगड़ा ये है.
शैम्पेन के मुकाबले महुआ
कल मैंने अपने एक भाषण में कहा कि अगर भारत के आदिवासियों का राज होता तो महुआ की
शराब शैम्पेन से अच्छी होती. हम उनको हिकारत की नजर से देखते हैं क्योंकि हम
आदिवासियों को ही हिकारत की नजर से देखते हैं. और इसलिए उनके महुआ पीने को हम बहुत
बुरी चीज मानते हैं. दूसरी ओर फ्रेंच लोग अगर शैम्पेन पीते हैं तो मानते हैं कि
सर्वश्रेष्ठ वाईन हम पी रहे हैं. ये क्या बात है भाई ? तुम्हारी अपनी चीज है, इसलिए
वो पवित्र, पूज्य और प्रतिष्ठित है. हमारी है, इसलिए वो निकृष्ट कोटि की, हिकारत की
नजर से देखने की चीज है. अंग्रेजों से या यूरोप से मेरी यही लड़ाई है.
जब अंग्रेज यहां आकर औद्योगिकरण कर रहे थे तो मार्क्स ने कहा कि वो भारत की उन्नति
कर रहे हैं. 1857 का जो विद्रोह हुआ, उससे पहले ही मार्क्स ने 1854 में यह लिखा है.
तो मैं सवाल यह पूछना चाहता हूं कि अगर यूरोप का सामंत औद्योगिकरण करके भारत को
गुलाम बनाता है तो आप उसे प्रगति की निशानी मानते हैं और हमारा सामंत जब अपने लोगों
का राज चलाना चाहता है तब आप कहते हैं कि दकियानूसी, पुराणपंथी, पुराने तरीके का
आदमी है. क्यों भई? क्योंकि आपको, यूरोप को अपने औद्योगिकरण के लिए सस्ते संसाधन,
सस्ता श्रम और खुला बाजार चाहिए. उसके लिए आप इन लोगों को दबा कर रखते हैं.
अंग्रेजों के समय अजमेर से खंडवा तक लाईन बिछाई गई रेल की. वो कोई मालवी लोगों के
आवागमन को ठीक करने के लिए नहीं बिछाई गई थी. अजमेर में बहुत बड़ी छावनी थी, नीमच
में पुलिस का बहुत बड़ा हेडक्वार्टर. महू तो मिलिट्री हेडक्वार्टर था. तो अपनी सेना
और अपनी पुलिस को जल्दी भेजने के लिए उन्होंने रेल की लाईन डाली. अपना माल जो आपको
विदेश ले जाना है, उसको जल्दी ले जाने के लिए आपने रेल की लाईन डाली. इससे हमारे
लिए यातायात की सुविधा हो गई, यह संयोग है. यह उसका उद्देश्य नहीं है, यह उसका
प्रयोजन नहीं हैं. You are incidental to them. उनका मुख्य प्रयोजन भारत की
परिस्थिति से पूंजी बनाना है. अगर इस अंतर को हम नहीं समझेंगे तो यूरोप का जो पूरा
का पूरा भारत पर आक्रमण है, आप उसको समझ नहीं सकेंगे.
आप इन दो बातों को देखें. लेनिन ने भी साम्राज्यवाद का विरोध किया और गांधी ने भी.
लेनिन ने कहा कि साम्राज्यवाद की जड़ में कैप्टलिज्म है. पूंजीवादी वृत्ति के कारण
दुनिया भर में साम्राज्य बनाए जा रहें हैं. गांधी ने कहा कि ये मात्र पूंजीवाद का
मामला नहीं है, यह सभ्यता का सवाल है. आप अपनी औद्योगिक सभ्यता को सारी दुनिया पर
थोप कर उनको गुलाम बनाते हैं. उनके संसाधनों का इस्तेमाल करके, उनके संसाधनों से आप
समृद्ध होते हैं और उनको गरीब रखते हैं.
जब अंग्रेज आए थे तब दुनिया की जीडीपी में भारत का योगदान 21 प्रतिशत होता था. यानी
इतना अपना व्यापार, इतनी अपनी धन-दौलत हुआ करती थी. अंग्रेज जब गए तो एक फीसदी
जीडीपी थी.
भाई, ये कौन-सी आर्थिक नीति है ?
मनमोहन सिंह ने राज संभाला तब देश के उद्योग घरानों के पास देश की जीडीपी का 2
प्रतिशत था. 2008 में गिनती हुई तो 22 प्रतिशत जीडीपी इन घरानों के पास चली गई थी.
जब मनमोहन सिंह ने राज संभाला तब खेती का अपनी अर्थव्यवस्था में योगदान करीब 31
प्रतिशत या उसके आसपास हुआ करता था. आज खेती का योगदान 17.6 प्रतिशत है. जबकि
उद्योग पर एक प्रतिशत लोग भी नहीं जीते हैं और खेती पर देश के 70 प्रतिशत लोग जीते
हैं. जहां ज्यादा लोग हैं, जहां ज्यादा उत्पादन हैं वहां तो जीडीपी गिरकर 17.6
प्रतिशत आ गई है और जहां थोड़े से लोग हैं और पैसा बना रहे हैं, वहां आपकी जीडीपी 22
प्रतिशत चली गई. तो भाई, यह कौन सी आपकी आर्थिक नीति है ? यह कौन सी आपकी इनक्लूसिव
ग्रोथ है, जो अंबानी को तो करोड़पति, अरबपति बनाती है और कलावती को दिन में काम नहीं
मिलता है ? यह तो अपनी व्यवस्था का मामला है. यह व्यवस्था ही अंग्रजों की व्यवस्था
है.
आपने 1947 में सोचा नहीं कि इस व्यवस्था को बदलकर हम दूसरी व्यवस्था लागू करें.
क्योंकि वो अपने साम्राज्य को बरकरार करने के लिए आपके यहां राज कर रहे थे. आप अपने
लोगों के लिए राज चलाना चाहते हैं तो आपको अलग पद्धति चलानी चाहिए थी. लेकिन कुछ तो
पाकिस्तान भारत का विभाजन होने के कारण सारे लोग डरे हुए थे कि हम कुछ भी नया करेंगे,
कुछ भी बिगाड़ेंगे चलती हुई चीजों को तो पता नहीं देश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा.
आप याद कीजिए, शुरू के सारे वर्षों में एकता और अखंडता सबसे बड़ा नारा हुआ करता था.
आज कोई एकता -अखंडता की बात नहीं करता. तब सिर्फ उसी की बात होती थी. क्योंकि हमको
डर था कि हमारा देश टूट जाएगा. इसलिए हमने कोई प्रयोग नहीं किया. जैसा चलता आ रहा
था, उसको वैसा ही चलने दिया. वैसा ही चलने देने के कारण यह परिस्थिति हुई है कि अब
अपने ही देश का एक वर्ग आपका शासक वर्ग हो गया है और ज्यादातर लोग उसकी प्रजा, उसका
उपनिवेश हो गए हैं. यह कोई मैं कहता हूं ऐसी बात नहीं है.
मारिया मिश्रा नाम की एक ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की महिला हैं, उन्होंने एक अच्छी
किताब लिखी है India since the Rebellion: Vishnu's Crowded Temple. उसमें उन्होने
कहा है कि जवाहर लाल नेहरू तो आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल थे. क्योंकि उन्होंने
उन्हीं चीजों को कंटिन्यू किया जो कि गवर्नर जनरल करते थे.
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देश का एक बहुत बड़ा वर्ग तो यह मानता है कि 1947 की जो आजादी थी, वो आजादी
थी ही नहीं. और तो और नेहरू के समय में ही आज़ादी से. मोहभंग की बात होने लगी थी तो
इसके बरक्स देखा जाए तो क्या हम ठीक-ठीक आज़ाद हुए ?
देखिए, दो लोग थे जिन्होंने कहा कि हम आजाद नहीं हुए. एक तो कम्युनिस्टों ने कहा कि
हम आजाद नहीं हुए दूसरा हिंदुत्ववादियों ने कहा था. हिंदुत्ववादी ने भी इस आंदोलन
में भाग नहीं लिया और कम्युनिस्टो ने भी.
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कम्युनिस्टों ने भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ अंग्रेजों की मुखबिरी की थी. क्योंकि उस
वक्त उनको लगता था कि रूस दुनिया में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा है तो उसकी मदद करो.
तो जिधर रूस है, वो उधर चले गए. हिंदुत्ववादियों को लगता था कि अगर पाकिस्तान को यह
देश सौंप कर जाएंगे, टुकड़ा करके तो बाकि टुकड़ा हम हिंदुओं को मिलना चाहिए.
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सांस्कृतिक नहीं, सांप्रदायिक राष्ट्रवाद
आप जानते हैं कि आरएसएस ने, गोलवलकर ने बकायदा सर्कुलर निकाला था. जिसमें कहा था कि
हमको इसमें भाग नहीं लेना है. मौजूद है वो सर्कुलर. तो ये कौन लोग हैं जिन्होंने इस
आजादी के आंदोलन में भाग नहीं लिया. इसलिए मेरा खून खौलता है, जब 1992 के मस्जिद
गिराने वाले कहते हैं कि वे बहुत राष्ट्रवादी हैं. भाई, तुम कैसे राष्ट्रवादी हो
यार ! तुम मानते हो कि हिन्दू ही राष्ट्र है भारत का. और अगर हिन्दू राष्ट्र है तो
इस देश की परंपरा और इस देश के लोगों का क्या करोगे आप ? वो कहां जाएंगे ? और अब वो
कहते हैं कि हमने तो हिन्दू कोई धर्म के कारण नहीं कहा. हमने तो इसलिए कहा क्योंकि
सिंधु नदी के इधर जो भी लोग हैं, सारी दुनिया उन्हें हिंदु कहती थी. इसलिए हम सबको
हिंदु कहते हैं.
लेकिन हिंदुत्व की अंतिम कसौटी उन्होंने क्या लगाई ? आप रक्त से हिंदु हैं तो आप
हिंदु नहीं हैं. आप माता-पिता के नाते हिंदु हैं तो आप हिंदु नहीं हैं. आपकी अंतिम
जो कसौटी है वो ये कि आपकी पुण्यभू यहां है कि नहीं. पुण्यभू तो आपका धार्मिक स्थान
है ना ! पुण्यभू तो धार्मिक स्थान को कहते हैं न ! और पुण्य और पाप कभी भी संस्कृति
के शब्द नहीं रहे. वो सारी दुनिया में धर्म के शब्द हैं. संस्कृत में भी, हमारी बोली
में भी और दुनिया की किसी भाषा में भी. पाप और पुण्य धार्मिक व्याख्या हैं,
सांस्कृतिक नहीं.
इसलिए आप जिसको सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहते हैं, वो दरअसल सांप्रदायिक राष्ट्रवाद
है. मेरा झगड़ा यही है, सावरकर और इन लोगों से. अपने यहां ये कभी नहीं कहा गया कि आप
हिंदु हुए तो आपने बड़ा पुण्य कमाया. अपने यहां कहा गया कि दुर्लभम भारते जन्मः भारत
में जन्म लेना दुर्लभ है. यह नहीं कहा गया कि हिंदु धर्म में जन्म लेना दुर्लभ है.
अपनी पूरी परंपरा में भारत को लोगों के हिसाब से बांटकर नहीं देखा गया. हमने कभी भी
बाहर से आने वाले लोगों को मारकर नहीं भगाया. क्योंकि हमारे यहां ‘वो’ नहीं है,
भिन्न है. There is no ‘they’, different लोग हैं. आप मुझसे भिन्न हैं क्योंकि आपकी
नाक अलग है, मेरी नाक अलग है, मैं आपकी नाक तो नहीं काटूंगा क्योंकि आपकी नाक मेरी
जैसी नहीं है. हम भिन्नता को स्वीकार करते हैं.
ये जो आप शक संवत चलाते हैं, यह किसका चलाया हुआ है ? उन शक राजाओं का चलाया हुआ
है, जिनको विक्रमादित्य ने पराजित किया था. विक्रमादित्य ने पराजित करके जिन शकों
को दक्षिण की तरफ धकेला, उन लोगों ने विक्रमादित्य से कोई 50-60 साल बाद 100 साल
बाद शक संवत चलाया. लेकिन शक लोग एस्ट्रानामी के ज्यादा बड़े पंडित थे. मिहिर जो था,
वो तो शक था. मिहिर नाम ही शक जाति का नाम है. मिहिर भट्ट खगोलशास्त्र के बारे में
आपसे बेहतर जानता था. इसलिए उसका चलाया हुआ संवत हमने स्वीकार किया. अपने विक्रम
का, विजेता राजा का चलाया हुआ स्वीकार नहीं किया.
छठ से छठी तक बाहरी
हमारे यहां छठ की पूजा होती है. सूर्य की पूजा हमारी पंरपरा में नहीं है. वो शक लोग
लेकर आए. वो ईरान वाले लोग थे जो कि सूर्य पूजक थे. उनके कारण सारे देश में छठ मनती
है. आप जब कहते हैं कि छठी का दूध याद आ जाएगा क्योंकि पहली बार समारोहपूर्वक मां
छठ के दिन दूध पिलाती है.
कितनी चीजें हमारे यहां बाहर से आकर शामिल हो गईं हैं. जलेबी इतने प्रेम से खाते
हैं, जलेबी तुर्किस्तान से आई है. हलवा इतने प्रेम से खाते हैं, सत्यनारायण भगवान
को भोग लगाते हैं, हलवा पश्चिम एशिया से आया है. पराठे बड़े चाव से खाते हैं, बाहर
से आया है. आपकी रोटी है और आपकी पुड़ी है. आपका चावल है, आपका जौ है, उसके अलावा
आपका कोई अन्न नहीं है. ये बाहर से आए हुए अन्न हैं. 15 वीं शताब्दी तक हम आलू नहीं
जानते थे. आलू पहली बार अपने यहां पुर्तगाली लोगों ने लाया. लाल मिर्च अपने देश में
नहीं खाई जाती थी. काली मिर्च खाई जाती थी, जो केरल में पैदा होती है. पुर्तगाली
लोग जब गोवा पहुंचे तो वो मैक्सिको से लाल मिर्च पहली बार लेकर आए. आज कोई सोच सकता
है कि हम लाल मिर्च के बगैर अपना काम चला लेंगे.बल्कि काली मिर्च लोग नहीं खाते
हैं, लाल मिर्च खाते हैं. काली मिर्च तो सिर्फ संपन्न लोग खा सकते हैं.
ये जो स्वीकृति है, बाहर की चीजों की, बाहर की चीजों को स्वीकार करके उनको घोट के
अपनी बना लेने की, ये जो समन्वय की संस्कृति है, ये भारत का मूल तत्व है.
यूरोप के लोगों ने बाहर से आए लोगों को मार दिया या उनके अधीन हो गए. हमने उनको मारा
नहीं. हमने उनको अपने अंदर स्वीकार किया. कहा कि तुम भिन्न हो, हम भिन्न हैं लेकिन
भिन्नता के कारण हमारी संस्कृति में भिन्नता बहुलता, विविधता सब चीजें आईं.
आप कहते हैं कि जो विक्रम ने जो चलाया था, वो ही संवत है या फिर वो ही हिंदु संवत
है तो इससे बड़ा कोई झूठ नहीं हो सकता. क्योंकि कुछ जगहों पर नया साल विक्रम के संवत
से शुरू होता है. लेकिन बंगाल में पहला बैशाख तो उसके एक महीने बाद आता है. और असम
में जो बीहू का त्यौहार मनाया जाता है, वो तो और भी बाद में आता है. उसके बाद ओणम,
उसके बाद दक्षिण के राज्यों में जो अलग-अलग नए साल शुरू होते हैं. उन सब में आप देखें
तो पाएंगे कि अपने यहां तो कई प्रकार के संवत्सरों में हम जी रहे हैं. आप कैसे कहते
हैं कि विक्रम संवत ही हिंदु संवत है. वो नहीं है, ये मान लेना चाहिए. क्योंकि इसमें
अपना कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि आप सिर्फ अपने ही लोगों की विविधता को मंजूर कर रहे
हो.
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मेरा ये कहना है कि कि यूरोप की पूरी संस्कृति में एक जाति को दूसरी जाति मारकर
बाहर निकालती है या दूसरी जाति में अपने को ढाल लेती है. हमने न किसी को मारकर बाहर
निकाला, ना हम उनके अधीन हुए. हम उनको पचाने की ताकत जानते थे. सिर्फ अंग्रेजों को
हम नहीं पचा सके क्योंकि तकनीक के कारण वो अपने देश से जुड़े रह सकते थे. इसके पहले
का कोई भी शासक अपने देश से जुड़ा हुआ नहीं रह सकता था. इसलिए अकबर, इसलिए जितने भी
बड़े लोग हुए मुसलमान राजा, वो सब आपके धर्म का, आपकी जाति प्रथा का, आपकी पंरपरा का
सम्मान करते थे. बल्कि उनसे ज्यादा सम्मान देने वाले और लोग नहीं थे. क्यों, क्योंकि
आपने उनको पचा लिया था, उनको अपना बना लिया था. ये जो अपनी संस्कृति में सब चीजों
को स्वीकार करके, उनका समन्वय बनाना है, ये अपनी सबसे बड़ी ताकत है. इसको छोड़ना नहीं
चाहिए.
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मेरा कहना है कि यूरोप अपनी नज़र से हमको देखता है. एक आदिवासी ने पुस्तक लिखी है.
उसने अपनी पुस्तक की भूमिका में कहा कि अब तक आपने शिकार की कथा शिकारी के मुंह से
सुनी है. ये कथा शिकार कह रहा है. यानी जिसका आपने शिकार किया है वो ये बता रहा है.
हमारा कहना है कि एक हिंदुस्तानी तरीका भी दुनिया को देखना है. वो कोई यूरोप के
तरीके से कमतर नहीं है.
संवाद जारी रहे
•
शिकार की यह परंपरा लगातार ज़ारी है. बस्तर में, झारखंड में या बाकी जगहों
में और जिसके कारण नक्सलवाद, माओवाद या इस तरह की हिंसा पर आधारित आंदोलन के लिए एक
स्पेस अपने आप बन जाता है. आपने तो विनोबा जी के साथ काम किया है. तो इस शिकार और
हिंसा की पूरी जो राजनीति है, उसको किस तरह देखते-परखते हैं ?
हिंसा में मनुष्यता का विश्वास अटूट है. मनुष्य पहले दिन से ही हिंसा कर रहा है. और
आज भी सोचता है कि हिंसा का तरीका सबसे अच्छा है. इसलिए चंबल में जब जयप्रकाश
नारायण के वक्त डाकूओं का समर्पण करा रहे थे तो सरकार ने कहा कि आपने उन लोगों को
गले लगाया और उनको भाई कहा और आपकी पत्नी ने उनको तिलक लगाया. ऐसा करके आपने डाकूओं
को लायनाइज किया है, उनको शेर बनाया है, उनको हीरो बनाया है और इससे कानून और
व्यवस्था की हानि हुई है.
जेपी ने इस पर कहा कि अगर मैं आपका जीवन परिवर्तन करने के लिए आपसे बात कर रहा हूं
तो क्या मैं आपको गाली देकर बात करूंगा. अगर मैं गाली देकर बात करूंगा तो मैं आपका
कोई परिवर्तन नहीं कर सकता हूं. मैं आपको भाई कहुंगा तभी आप मुझमें विश्वास रखेंगे.
और तब आप मुझसे आकर बात कर सकते हैं. सरकार अगर यह चाहती है कि मैं उन लोगों को
आत्मसमर्पण करने के लिए भी बुलाउं और कहूं कि तुम डाकू हो, तुम बदमाश हो, तुमने इतने
खून किए, तुमने इतना वो किया, तुम भाग जाओ यहां से, तो फिर वह आत्मसमर्पण करने के
लिए क्यों आएगा ? आत्मसमर्पण किस लिए करवा रहे हैं क्योंकि आप उनको समाज में वापस
इज्जत की जिंदगी और इज्जत की जगह देना चाहते हैं. जाहिर है, इज्जत की जगह देने के
लिए तो आपको किसी से बात करनी पड़ेगी. उसको मार पीट कर दास नहीं बना सकते क्योंकि
दास बनकर तो वह आपके हित में रहेगा ही नहीं कभी भी. अगर आपका इरादा संवाद के जरिए,
लोकतांत्रिक तरीके से, शांति के तरीके से, लोगों को अपनी व्यवस्था में शामिल करना
है तो सिवाय बात करने के कोई साधन नहीं है. और जिन कारणों से यह उत्पन्न होता है उस
अन्याय को आपको मिटाना पड़ेगा.
मेरा कहना यह है कि आप नक्सल आंदोलन से और नक्सल विचार से तभी निपट सकते हैं जब एक-
आप अपना अन्याय दूर करें और दूसरा-आप उनसे बात करके उनको वापस लाएं. जब नक्सलियों
पर प्रतिबंध लगा तो कुछ पार्टियों ने कहा कि प्रतिबंध लगाना गलत है, क्योंकि हम उनसे
राजनीतिक रूप से निपट सकते हैं, ये कहा गया. मैंने तब लिखा कि भाई आप नक्सलाईट से
तो राजनीतिक रूप से निपट सकते हैं और इसलिए आप कहते हैं कि उन पर पाबंदी मत लगाओ.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर इस देश में तीन बार पाबंदी लगी, सन 1948 में, सन 1975
में और 1992 में बाबरी मस्जिद के बाद. तब तो किसी लोकतांत्रिक उदारवादी ने उठकर नहीं
कहा कि भाई आरएसएस पर पांबदी क्यों लगाते हो. हिंदुत्व से हम विचार से निपटेंगे. हम
राजनीतिक रूप से निपटेंगे हिंदुत्व वालों से.
नक्सलाईट के बारे में आप कहते हैं क्योंकि नक्सलाईट से आपको सहानुभूति है. अगर इस
देश को अपने हिंदुत्ववादियों से सहानुभूति नहीं होगी तो उनको वो वापस मोड़ कर नहीं
ला सकते. इसलिए संवाद सबसे जारी रखना चाहिए. वह चाहे नक्सलवादी हो या फिर
हिंदुत्ववादी हो क्योंकि इसके अलावा लोकतंत्र में कोई तरीका ही नहीं है.
गांधीजी अपने एक मुकदमे की बहस कर रहे थे अंग्रेज के सामने, पुणे या किसी और अदालत
में. तो वहां उन्होंने कहा कि आप जो कह रहे हो, यह तो आपके हिसाब से सत्य हो सकता
है, मेरे हिसाब से यह सत्य है. दूसरा उन्होंने उसका पक्ष रखा. गांधीजी ने कहा कि
बिलकुल ठीक है. इसलिए मैं कहता हूं कि अहिंसा जरूरी है, आप अपने सत्य को मुझ पर
हिंसा से रोपेंगे तो मैं उसको नहीं मानूंगा. मैं अपने सत्य को हिंसा से आप पर
डालूंगा तो वह स्वीकार नहीं होगा. हम सिर्फ बातचीत करके ही एक दूसरे के सत्य को
समझकर स्वीकार कर सकते हैं. ये गांधी ने कहा था, ये 1921-22 के आसपास बहस किया था.
बात नहीं करोगे तो आप समझोगे कैसे.
संघ वालों से बातचीत करने के लिए हम उनके घर गये थे. मैं, निखिल चक्रवर्ती, जॉर्ज
वर्गीस और वो गांधी जी के पोते रामचंद्र गांधी, हम चार लोग थे. बातचीत के दौरान ये
लोग हमको इनके ही घर में खाने की टेबल पर छोड़कर चले गए. यानी इतने नाराज हो गए. हम
फिर भी बैठे रहे और वो जब लौट कर आए तो उनके साथ हमने खाना खाया. और उनसे अपनी
बातचीत आगे चलाई. बिना बातचीत के आप लोकतंत्र में काम नहीं कर सकते हैं. और मुझे
खुशी है कि बड़ी संख्या में लोग मिडल ग्राउंड के पक्ष में हैं. अपना जो मीडिया है
उसका एक रोल यह भी है, वो मिडल ग्राउंड तैयार करता है. जिससे संघर्ष की समाप्ति की
शुरूआत होती है.
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•
लेकिन सरकार का जो रवैया है, जिस तरह से आदिवासियों को हाशिये पर ढ़केला जा
रहा है लगातार-लगातार और गृहमंत्री चिदंबरम ये कहते हैं कि पहले हमें जमीन पर कब्जा
करना होगा और हम गोली का जवाब गोली से देंगे. ऐसे में बातचीत और मिडल ग्राउंड की
क्या गुंजाइश बचती है ?
वो कोई समझदारी का वक्तव्य नहीं है. जब पंजाब में इतना चल रहा था तो क्या कहते थे
आप ? कि अपने ही बेटे हैं. इनको समझाकर वापस लाना है. इसलिए जिस परिवार के खिलाफ
सिक्खों के मन में सबसे ज्यादा गुस्सा था. यानी इंदिरा गांधी और उनके बेटे. उनकी बहू
ने एक सिक्ख को प्रधानमंत्री बनाकर सारे सिक्ख समुदाय को वापस आपकी धारा में
लोकतांत्रिक धारा में ले कर आ गए. ये तो आपको मानना पड़ेगा ना.
आदिवासियों को हिकारत से देखना बंद करो
जब अकाल तख्त टूटा था तो मैं वहां गया था. मैं तब चंडीगढ़ में था इंडियन एक्सप्रेस
में. मैं वहां गया तो मुख्य ग्रंथी जो था, उसने कहा कि जब तक राजीव गांधी यहां आकर
मत्था टेक के अपनी गलती स्वीकार नहीं करेगा तब तक हम इन लोगों को नहीं माफ करेंगे.
तो मैंने कहा कि मान लो वो यहां आकर मत्था टेक के स्वीकार करता है कि हमारी गलती
हुई, क्या आपका आदमी, तब अकाल तख्त का प्रतिनिधि तब संसद में जाकर मत्था टेक कर ये
कहेगा कि हमने आपके प्रधानमंत्री को मारा तो गलत किया. उसके लिए हमें माफ किया जाए.
अगर हरमंदिर साहब सबसे बड़ी जगह है तो लोकतंत्र का मंदिर भी सबसे बड़ी जगह होना चाहिए.
अब जहां इतना अधिक वैमनस्य और रोष था, वहां अब पंजाब में कहीं अलगाववाद की बात नहीं
है. क्योंकि आप मानते हैं कि सिक्ख अपने लोग हैं. हमारी आर्मी में, हमारे व्यापार
में और सब जगह.
आदिवासियों को आप हिकारत की नजर से देखते हैं. समझते हैं कि उनके
संसाधनों को लूटे बिना हमारा विकास नहीं हो सकता. पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश
सिंह कह रहे थे कि 6 करोड़ लोगों को देश में विस्थापित किया गया है, उसमें से 40
प्रतिशत लोग आदिवासी हैं. आदिवासियों के संसाधनों को लूटकर आप क्या करेंगे.
दुनिया भर के वैज्ञानिक कह चुके हैं कि बिना वनों के आदमी के रहने लायक धरती नहीं
बचेगी. आप बाघ की रक्षा क्यों करना चाहते हैं. इसलिए नहीं कि वो सुंदर जानवर है,
इसलिए कि बाघ नहीं रहा तो आदमी नहीं रहेगा. क्योंकि जो परिस्थिति और पर्यावरण बाघ
को बचाये रखती है वही आदमी को भी बचाती है. आप जब अपनी रक्षा के लिए बाघ बचाना चाहते
हैं, तो दुनिया की रक्षा के लिए वन क्यों नहीं बचाना चाहते हैं ? और अगर दुनिया की
रक्षा के लिए वन बचाना चाहते हैं तो वन को बचाने वाले, सबसे कुशल लोग अगर हैं तो
आदिवासी हैं, क्योंकि वन ही उनका जीवन है. उनको अच्छी तरह रखेंगे तो वे वनों को
अच्छा रखेंगे. इस बात को कोई नहीं समझना चाहता.
वेदों में आदिवासी शब्द
अंग्रेजों को लगता था कि हमको यहां रहना थोड़ी है, हमको तो लूटपाट के अपने देश को
समृद्ध करना है. उन्होंने हमारे संसाधनों के प्रति वही रव्वैया अपनाया, जो एक लुटेरे
का होता हैं. एक घर का मालिक भी अपने संसाधनों का उपयोग करता है, लेकिन वो घर को
चलाने के लिए करता है. लुटेरा उसको बरबाद करने के लिए करता है. तो उस लुटेरे की
प्रवृत्ति में और आपकी प्रवृत्ति में फर्क होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए ? आप इन
आदिवासियों को इज्जत की जगह दीजिए.
ऋग्वेद में 63 शब्द मुंडारी भाषा के हैं. कहां से आ गए वो. वो ऋषि लोग क्या चोर थे,
जो उनकी भाषा को उठाकर ले आए. उन ऋषियों के साथ इन मुंडाओं का कितना व्यवहार रहा
होगा, वो आप सोचिए. उनके सबसे अच्छे श्लोकों में, उनकी सबसे अच्छी ऋचाओं में मुंडारी
शब्द आए. मुंडा और आपमें कोई फर्क थोड़ी है. जब तक आप इस बात को लागू नहीं करेंगे तब
तक आप इस देश की समस्या कैसे हल करेंगे.
आज आदिवासी हैं, तो फिर कल दलित हैं, फिर मुसलमान हैं, फिर क्रिश्चियन हैं फिर आपका
क्या बचेगा ? सिर्फ ब्राह्मण और राजपूत ? सिर्फ ब्राह्मण और राजपूत क्या ये देश को
चला लेंगे ? ब्राह्मण से दिमाग के काम करवा लो लेकिन वो मेहनत के कौन से काम कर सकता
है. खेती करके खड़ी कर देगा वो या फिर मजदूरी करके खड़ा कर देगा वो ? उससे नहीं बनेंगे
ये काम. राजा से भी नहीं बनेंगे.
आप देखेंगे अपने यहां जितनी भी अपराधी जनजातियां हैं, वो कौन थे ? अमृतसर में जो
एयरपोर्ट है, उसका नाम राजा सांसी एयरपोर्ट है. सांसी, जिसे आप इतना अपराधी, इतना
गया-गुजरा मानते हैं, वो वहां के राजा होते थे. जैसे आपके यहां गोंड़ राजा होते थे,
जैसे हमारे यहां भील राजा होते थे.
आपने उनका राज छीनकर उनको निकाल कर बाहर किया. उनको सिर्फ तलवार चलाना, खून करना,
चाकू चलाना ही आता था क्योंकि वो राज चलाने वाले लोग थे. तो वो बेचारे अपराधी हो
गए. उनको अंग्रेजों ने अपराधी बना दिया. कंजरों को आपने कंजर बना दिया. ये सब
सम्मानित जनजातियां थीं. आपने अपना राज बनाने के लिए उनको राज से बाहर करके बरबाद
कर दिया और अब आप कहते हैं कि ये अपराध करते हैं. अपराध नहीं करेंगे तो क्या करेंगे
? हमें पहले अपनी गलतियों को सुधारने की जरूरत है, नहीं तो हम कभी भी इस समस्या का
हल नहीं निकाल सकेंगे.
18.08.2009,
00.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | आद्या आरूही सेन दिल्ली | | | | मुबारक हो प्रभाष जी, आपके साक्षात्कार ने मीडिया में कुंडली मारे बैठे जातिवादियों को फिर से फन फैलाने का अवसर दे दिया है. आश्चर्य नहीं की सारे मिश्रा, त्रिपाठी, जोशी, पांडेय आपके पीछे खड़े नज़र आ रहे हैं...
मेरी मानें तो अब आपकी बुद्धि भी आपकी तरह ही सठिया गई है, अब ईक्कसवीं सदी में जाति के आधार पर समाज से खिलवाड़ बंद कीजिए और अपने पसंदीदा ब्राह्मण प्रधानमंत्री वाजपेयी को रिटायरमेंट में कंपनी देना शुरू कीजिए... चाहें तो खाली वक्त में भारत निर्माण में ब्राह्मणों की भूमिका पर महाग्रंथ भी लिख सकते हैं... | | | | | |
| | Amrish (amrish2jan@gmail.com) Kolkata | | | | मैं बहुत सामान्य पढ़ा लिखा हूँ, प्रभाष जी की बात पूरी तरह समझ नहीं पाया...क्रिकेट में अजहर और पठान अच्छे खिलाडी हैं, तो सचिन और गावस्कर भी...इसमें उनका मुस्लिम या ब्राह्मण होना सहायक है, ये बात हजम नहीं हो रही...या शायद सही भी हो, आनुवंशिकता के कारण जैसे शारीरिक गुण पीढी-दर-पीढी चलते हैं, वैसे ही मानसिक गुण भी कमोबेश वंशानुगत होते हों...("मैं परंपरा से विभिन्न जातियों के काम के दौरान विकसित हुई कुशलता की बात कर रहा हूं. आप इसे ब्राह्मण जाति या ब्राह्मणवाद से मत जोड़िए.") मेरे विचार से व्यक्ति का रहन-सहन, निजी रुझान, और परिस्थितियां उसकी दशा और दिशा तय करती हैं... | | | | | |
| | Rakesh Singh () Kansas City | | | | मैं हिमांशु (नोएडा) की प्रतिक्रिया से सहमत हूँ. | | | | | |
| | आत्महंता () धनबाद | | | | अहसानमंद हैं, गाली नहीं दें ------------------- नहीं मालूम यह कौन सी हवा चली कि लोग अपने दौरों में कीर्तिमान स्थापित करनेवालों को गाली देकर अपनी कालर ऊंची कर रहे हैं। क्रिकेट या टेनिस से मेरी दिलचस्पी मैदान में भारत या भारतीय की मौजदूगी रहने तक सीमित है। लेकिन प्रभाष जी ने खेल पत्रकारिता को जो कलेवर, मिजाज और तेवर दिए वह किसी खेल पत्रकार के बूते की बात नहीं। विषय कोई भी हो, वो अपनी कंटेंट को जिस तरह खोलते हैं, जैसा रिदम पैदा करते हैं विषय की जटिलता या प्रसंग से वाकफियत की कोई जरूरत नहीं होती। आखिर हिंदी का कौन पत्रकार इसे मानने को तौयार नहीं। उन्होंने एक अखबार से/में जो कुछ किया वह हिंदी पत्रकारिता का मानक हुआ। परिदृश्य में उनकी मौजूदगी प्रसंग को अर्थवान बना देती थी।
दुर्भाग्य ही है कि हिंदी पट्टी की नई बिरादरी जो अभी-अभी मीडिया में प्रवेश ही कर रही है, उसे इन चीजों को देखना-सुनना, परखना-गुनना, सीखना-समझना चाहिए। आखिर जिस साक्षात्कार को लेकर लोग वितंडा खडा कर रहे हैं, क्या उसे समग्रता से, विषय को समूचेपन में उन्होंने देखा है। उन्होंने ब्राह्मण की, ब्राह्मणत्व की चर्चा जरूर की, पर कहीं भी उसे स्थापित करने के लिए तर्क नहीं गढ़े। आखिर सदियों का अभ्यास शारीरिक संरचना, व्यवहार, कौशल व उसके बाद संस्कार को कैसे अप्रभावित रहने देंगे।
यह ठीक है कि उन्होंने किसी के चुनाव प्रचार में सभा को संबोधित कर दिया। आखिर कोई तो बता दे कि इस दुनिया की किसी भी सभ्यता का नायक सभी मायने में आदर्श रहा। मेरा तो मानना है कि सभी नायक लात की पैदाइश थे। यदि उनकी सीमाएं लोगों को स्वीकार्य हैं तो प्रभाष जी तो वह मूर्ति नहीं बने। आखिर उनके दाय को देखते हुए, इन चीजों पर स्वस्थ चर्चा संभव नहीं थी। हमें जिनका कर्जदार होना चाहिए, हम उन्हें गरियाकर कालर ऊंची करके खुश हो लेते हैं।
यह सब मैं इसलिए नहीं लिख रहा कि मुझे उनकी कृपा प्राप्त है, या कृपा की अपेक्षा है। मैंने 14 सालों तक कस्बे में पत्रकारिता की है। और बड़े अखबारों में प्रभावी पदों पर रहने का मौका मिला। चीजों को विकृत होते हुए, विकृति के कारणों को खुली आंखों देखा। अखबार नहीं आंदोलन का नारा बुलंद करनेवाले अखबार में समन्वयक व फीचर प्रभारी का पद इसलिए छोड़ दिया कि प्रबंधन अपनी दिलचस्पी के अनुसार चीजों को चलाने की छूट पा गया था। आज खूब खूशी-खुशी मीडिया से विदा होकर सामाजिक कार्य के क्षेत्र में हूं। | | | | | |
| | mihirgoswami (mgmihirgoswami@gmail.com) bilaspur c.g | | | | ये आठ पन्ने, ये बता किसे याद रखूं, किसे भूल जाउं. | | | | | |
| | PremRam Tripathi (prt9999@gmail.com) Satna, Bhopal M.P. | | | | प्रभाष जी के लेख में ऐसी कोई भी बात नहीं दिखाई देती, जो वर्ग विभेद को बढ़ावा दे रही हो या एकपक्षीय हो...ये तो वैसी वाली बात हो गई है कि- "जाकी रही, भावना जैसी, प्रभू मूरत देखी तिन तैसी." | | | | | |
| | ASHOK TIWARI (ashokktiwari@yahoo.com) M.P. | | | | Joshi says- सूर्य की पूजा हमारी पंरपरा में नहीं है. वो शक लोग लेकर आए. वो ईरान वाले लोग थे जो कि सूर्य पूजक थे. This is absolutely wrong. Thousands of rhymes in Vedas dedicated to SUN God. ancient sun temples are found in India. Many Upanishads are based on SUN God as highest Brahm. Will Joshi say Surya Puran was written by Iranians? | | | | | |
| | बलराम अग्रवाल (2611ableram@gmail.com) दिल्ली(भारत) | | | | मुझे लगता है कि प्रभाष जी की कुछ बातों को उनके निहित अर्थों से भिन्न समझा और उछाला गया है। हाँ, धारणा सिर्फ ब्राह्मणों में ही होने वाली उनकी बात पर मैं यह अवश्य कहना चाहूँगा कि इस बाम्हनगर्दी ने परशुराम तक को अंधा बना दिया था। उन्हें 'रावण' में कोई आततायीपन नजर नहीं आया था और वे चुन-चुनकर अपने काल के क्षत्रियों को ही काटते रहे थे। | | | | | |
| | RAGHUVEER RICHHARIYA (raghuveerr@starnews.co.in) NOIDA | | | | साथियों, रविवार.कॉम में सती प्रथा, सिलकॉन वैली में ब्राह्मण श्रेष्ठता और तेंदुलकर चालीसा का बखान करने वाले प्रभाष जोशी जी के इंटरव्यू को पढ़कर हैरानी हो रही है। उससे ज्यादा परेशानी प्रभाष जी के शिष्यों की अतिवादी प्रतिक्रिया को लेकर। आलोक तोमर जिस तरह से प्रभाष जोशी का बचाव कर रहे हैं (या कहें बचाव के जाल में उन्हें फंसा रहे हैं), उससे हिंदी के इन स्वनामधन्य पत्रकारों के बुद्धि, विवेक पर तरस आता है।
सवाल नं.- 1 जब हम गीता, भागवत, रामचरित मानस, कुरान, बाइबिल में लिखे/छपे तथ्यों, उनके लेखकों पर बहस कर सकते हैं- तो प्रभाष जोशी के सती प्रथा और ब्राह्मणवाद को महिमामंडित करने वाले पोंगापंथी तथ्यों पर क्यों नहीं। ये तो उसी तरह है जैसे जिन्ना पर किताब लिखने वाले जसवंत को बिना पढ़े, सोचे समझे उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। क्या प्रभाष जोशी के लिखे, कहे पर बहस से बचने वाले ऐसा ही नहीं कर रहे हैं।
2- वरिष्ठ पत्रकार और प्रभाष जी के प्रबुद्ध शिष्य आलोक तोमर कह रहे हैं कि प्रभाष जी की मुखालिफत करने लोग वे हैं--जिन्हें जनसत्ता में नौकरी नहीं मिली या जिनके लेख जनसत्ता में नहीं लिखे। तो मेरे भाई आलोक जी, ये तो पता कर लीजिए रविवार.कॉम में जोशी जी का इंटरव्यू करने वाले आलोक प्रकाश पुतुल या जनतंत्र.कॉम चलाने वाले समरेंद्र सिंह ने कब प्रभाष जी से नौकरी मांगी। मेरी जानकारी में कभी नहीं..क्योंकि मैं इन दोनों लोगों को जानता हूं..आलोक ने छत्तीसगढ़ में रहकर देशबंधु औऱ बीबीसी के जरिए जो काम किया है-वो देश के किसी चर्चित पत्रकार के काम से कम नहीं है।
3- तीसरी बात-प्रभाष जी, अपने शिष्यों के बीच हिंदी पत्रकारिता के युगपुरुष कहे जाते हैं-उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ बिगुल बजाने वाले संपादक का खिताब हासिल है( जो शायद उन्हें नहीं बल्कि स्वर्गीय श्री रामनाथ गोयनका जी को मिलना चाहिए)-लेकिन सत्ता से करीबी गांठने में इन महानुभाव के चर्चे बहुत कम हुए हैं। बात चल ही पड़ी है तो मैं प्रभाष जी के साथ घटित अपना एक निजी अनुभव (जो शायद उन्हें याद न हो) बांटना चाहता हूं.। 1996 में हम भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से बीजेएमसी कर रहे थे-विवि के महानिदेशक श्री अऱविंद चतुर्वेदी के खिलाफ छात्रों का आंदोलन हुआ-मुद्दे कई थे (पत्रकारिता विवि की मनमाने ढंग से फ्रेंचाइजी बांटी जा रही थी, जिनमें पत्रकारिता कोर्स नहीं कंप्यूटर की डिग्री/डिप्लोमा बंटते थे, ऑडियो-वीडियो लैब के लिए आई भारी भरकम रकम कहां गई थी--ये चतुर्वेदी जी को छोड़कर किसी को मालूम नहीं था। वगैरह..वगैरह...). अरविंद चतुर्वेदी भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. श्री शंकरदयाल शर्मा के सगे साढ़ू थे-उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता था। प्रभाष जोशी जी और श्री अजीत भट्टाचार्जी विवि के सलाहकार मंडल में थे-छात्रों से समझौता कराने आए-और उन्होंने हमें ऐसा प्रस्ताव दिया कि हम आंदोलन बंद कर दें। बीजेएमसी के छात्रों ने हाथ जोड़ लिए। एक संपादक जो इमर्जेंसी के दौरान सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ दम भरता रहा हो...वो इमर्जेंसी के 21 साल बाद ही सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति ऐसे लोटने लगेगा-ऐसा हम लोगों ने सोचा भी नहीं था। - उम्र और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करना हमें बचपन से सिखाया गया है। वो हम लोग करत रहेंगे-लेकिन प्रभाष जी के विचारों पर शुरू हुई बहस ऐसे कैसे थम सकती है। सादर रघुवीर रिछारिया | | | | | |
| | abhinaw upadhyay (abhinaw01@gmail.com) delhi | | | | अच्छा लेख है. प्रभाष जी की शैली के अनुकूल. | | | | | |
| | jawed hasan ksa alahsa | | | | Well Prabash ji very good. आपके विचार बहुत अच्छे हैं. | | | | | |
| | Mukesh MIshra (mmishrajaipur@yahoo.com) Jaipur | | | | प्रभाष जी की बातों का विरोध करने वाले उनके द्वारा कही गई सच्ची बातों को नहीं पचा पा रहे हैं और खासकर ऐसे दौर में जबकि ब्राह्मणों का विरोध करने एक फैशन बन गया है. मेरा जोशीजी से निवेदन है कि सच्चाई पर मज़बूत रहें और विरोध की परवाह ना करें. We are all with you sir | | | | | |
| | rohit pandey (aboutrohit@gmail. com) gorakhpur | | | | बोलने के लिए पूरा पढ़ लेते तो भ्रमित न होते. | | | | | |
| | Rajni (iilloovveeuu1975@yahoo.com) NPM, Near Doljo Beach, Panglao Island, Bohol, Philippines | | | | प्रभाष जी के कहे को जिस तरह से पढ़ा जा रहा है, उसे देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा है. हिंदी का प्रबुद्ध समाज इस तरह लाठी लेकर उन्हें दौड़ाने पर तुला हुआ है...समाजशास्त्र में इसे ही भीड़ का तंत्र कहते होंगे, जहां जिसे मौका मिला, अपना हाथ साफ करने लग गया. प्रभाष जोशी जी के मामले में भी अधिकांश जगहों में यही हो रहा है. लोग बिना पूरा साक्षात्कार पढ़े गाली-गलौज पर उतर आये हैं.
प्रभाष जी को एक तरफ गुऱु कह रहे हैं, दूसरी ओर उनकी कुटाई की बात हो रही है. आपको किसने कहा था गुरु बनाने के लिए ? प्रभाष जी ने आपको आवेदन दिया था? नहीं न. तो फिर इतना हंगामा क्यों ? मत मानिए, उनको अपना गुरु और बंद करें यह रोना-धोना.
प्रभाष जी के कहे पर आप बहस कर रहे हैं, वह तो ठीक है, जो उन्होंने नहीं कही है, उस पर क्यों बहस कर रहे हैं ? उनके मुंह में शब्द डाल कर क्यों कहलवाना चाह रहे हैं ? इतना भदेसपन मत फैलाइए.
मैंने अपनी टिप्पणी दो और साइटों को भेजी थी, जहां प्रभाष जी बर लगातार बहस हो रही है. लेकिन दोनों ही साइटों ने उसे प्रकाशित नहीं किया. इससे समझ में आता है कि उनके यहां अपनी सुविधानुसार प्रतिक्रियाओं को छापने की चतुराई चल रही है. मैं उम्मीद करती हूं कि आप कम से कम मेरा पत्र जरुर प्रकाशित करेंगे. | | | | | |
| | anurag meerut | | | | सती प्रथा के बारे में प्रभाष जी का लेख पहले पढ़ चुका हूं. मतभेद हो सकते हैं लेकिन बहुत simplify करके ना देखा जाए. | | | | | |
| | Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) Noida | | | | सुनंदा जी, लगता है, प्रभाष जी का खरापन लोग पचा नहीं पा रहे हैं और अपनी छद्दम नामों से अपने-अपने ब्लॉग में लेख लिख कर अपनी दुश्मनी निकाल रहे हैं. खुद ही लिख रहे हैं, खुद ही उस पर प्रतिक्रिया भी जमा रहे हैं.
पहली बात तो ये कि प्रभाष जोशी ने कहीं भी सती प्रथा का समर्थन नहीं किया है. अपनी आंखें साफ करके थोड़ा पढ़ लें कि प्रभाष जी ने साफ कहा है कि पति के साथ जल जाना हमारी सती प्रथा नहीं है. हमारी परम्परा में सत्य और निजत्व की बात उन्होंने की है. लेकिन कुछ कुतर्की लोग सती प्रथा वाले वाक्य को हवा में उड़ाए जा रहे हैं. अरे भैया, अपनी औकात बनाओ, फिर प्रभाष जी पर थूको.
दूसरा प्रभाष जोशी ने अपने क्रिकेटरों के बारे में जो कहा कि अजहर या पठान की कला उनकी परंपरा का हिस्सा है. उसको लेकर बात क्यों नहीं करते ? मोतियाबिंद के मरीज की तरह केवल ब्राह्मण वाला हिस्सा लेकर क्यों उड़ रहे हैं जनाब?
तीसरी बात कि प्रभाष जोशी ने पठान या कांबली को लेकर जो कहा है, वो उस सवाल के जवाब में कहा है, जिसमें आलोक जी ने पूछा था कि क्रिकेट सामंतों का खेल है. उन्होंने यह साबित करने के लिए इन लोगों के नाम लिए कि नहीं, ये खेल आम आदमी का खेल है.
इस इंटरव्यू को अपने-अपने तरीके से उठा कर उसको पढ़ने के बजाय समग्रता में पढ़ें. अगर आप में से किसी को प्रभाष जी ने जनसत्ता बाहर किया है ( जैसा कि उन्होंने एक ब्राह्मण राजीव शुक्ला और एक ठाकुर आलोक तोमर के साथ किया था) या फिर आप में से कइयों को नौकरी नहीं दी होगी, तो उसका स्कोर सैटल करने के लिए अपनी गंदगी मत फैलाइए. | | | | | |
| | Sunanda Singh रांची, झाऱखंड | | | | मैंने कल प्रतिक्रिया लिखते हुए कहा था कि कुछ छुद्र लोग बात का बतंगड़ बना रहे हैं. आज मैंने देखा कि एकाध ब्लॉगों में मेरी प्रतिक्रिया पोस्ट की गई है और रविवार में दी गई कुछ दूसरे लोगों की प्रतिक्रिया भी इस तरह पोस्ट की गई है, जैसे ये उनके ब्लॉग में भेजी गई हो. हमारी प्रतिक्रियाओं को आधार बना कर उस ब्लॉग में लेख भी लिखा गया है.
मतलब ये कि विवाद में रस लेने के लिए जहां-जहां से जो-जो कुछ मिल रहा हो, उसे उठाओ और रसास्वादन करो. | | | | | |
| | Anindya delhi | | | | इक्कीसवीं सदी में किसी आदमी का जाति व्यवस्था के समर्थन में इस तरह खड़ा होना वाकई हैरतनाक है। अगर किसी को इंदिरा गांधी और सचिन तेंदुलकर की सफलता का कारण उनका ब्राह्मण होना नजर आता है तो उसकी सोच पर तरस ही खाया जा सकता है।
यदि इस इंटरव्यू में व्यक्त विचारों को सही मान लें तो अब भी राजकाज का ठेका राजपूतों और ब्राह्मणों को ही उठना चाहिए क्योंकि कौशल और प्रतिभा का सम्मान करना तो किसी भी समाज का दायित्व है। बाकी तो सिर्फ ठठेरागीरी में माहिर हैं इसलिए उन्हें वही करते रहने देना चाहिए। ब्राह्मणवाद का इस खूबसूरती से बचाव करने के लिए आपको साधुवाद। | | | | | |
| | ajay patel () varanasi | | | | ये प्रभाष जी की संस्कृति हो सकती है, जहां पति के मरने के बाद पत्नी को सती करवाया जाता होगा और पत्नी के मरने पर अनेक लोगों के साथ शादी करने की छूट थी. कितने पति आज तक सती हुए. | | | | | |
| | चार्वाक सत्य (charwaksatya11@hotmail.com) कोलकाता | | | | आईटी में ब्राह्मण वर्चस्व के बारे में प्रभाष जोशी गलत बयानी कर रहे हैं । वो या तो तथ्यों से अनभिज्ञ है या बेईमानी कर रहे हैं। फॉर्च्यून- 1000 में शामिल सिलिकॉन वैली की आईटी कंपनियों में गूगल, एचपी, एडोबी, एएमडी, एपल, इ-बे, ओरैकल, इंटेल, याहू, सन माइक्रोसिस्टम्स, सिस्को, नेटएप, सैमेंटेक प्रमुख हैं। इन कंपनियों में किसी एक भी कंपनी में प्रेसिडेंट, चेयरमैन या वाइस चेयरमैन ब्राह्मण नहीं है। इन में से हर कंपनी की साइट पर जाकर चेक करने के बाद ये बात लिखी जा रही है। “सिलिकॉन वैली की हर आईटी कंपनी में प्रेसिडेंट, चेयरमैन या वाइस चेयरमैन ब्राह्मण है”, जैसी बात जोशी जी ने किस आधार पर कह दी, ये आश्चर्यजनक है। ये असावधानी है या अपनी बात को साबित करने की जल्दबाजी। और प्रभाष जी, आईटी कंपनी में सेक्रेटरी कौन सा पद होता। भारत की दस सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में सिर्फ इंफोसिस के मालिक ब्राह्मण हैं। बाकी टीसीएस, विप्रो, टेक महिंद्रा, एचसीएल, पुराने सत्यम, पटनी सभी के मालिक कोई नाडार, कोई टाटा, कोई प्रेमजी, कोई राजू टाइप अब्राह्मण हैं। प्रतिभा किसी जात विशेष की बपौती नहीं है। | | | | | |
| | ravi (ravivikram53@rediffmail.com) patna | | | | आखिर सच सामने आ ही गया. प्रभाष जी भी अंततः ब्राह्णणवादी ही निकले.वैसे भी जनसत्ता के उनके दिनों में उनके संपादकीय स्टाफ में 80 फीसदी ब्राह्मण ही थे. आज सचिन या कांबली की बात नहीं है, प्रभाष जी भी पत्रकारिता में ब्राह्मणवादी मेधा को ही सबसे काबिल मानते होंगे. मंडल पर प्रभाष जी की राय ब्राह्णणवादी ही होगी. | | | | | |
| | Arvind Mishra (drarvind3@gmail.com) Varanasi | | | | सभ्य व्यक्ति अब इस व्यवस्था का पोषण नहीं करेगा ! और अगर सिलिकान वैली में ब्राह्मण इंजीनियरों की संख्या एक तथ्य है तो इसमें नाक भौ सिकोड़ने की क्या बात है! प्रभाष जोशी या किसी को अपनी बात कहने का हक है -क्या उन्होंने भारत का कोई कानून तोडा है ? | | | | | |
| | Ashutosh Noida, UP | | | | सुनंदा जी, आपकी राय बिल्कुल सही है. दिल्ली में कथित प्रगतिशीलों का एक गिरोह है, जिसमें बलात्कारी, छेड़खानी करने वाले और चोरी करने वाले लोग भी शामिल हैं. ये लोग इसी तरह कौव्वा कान ले गया की तर्ज पर आधी-अधूरी चीजों को पेश करके हंगामा खड़ा करते रहते हैं और फिर दारू पी कर उसका जश्न मनाते हैं. उदय प्रकाश पर, चरणदास चोर पर, फिर आलोक मेहता पर अब प्रभाष जोशी पर ये गिरोह पड़ा हुआ है. इनमें हिम्मत है तो प्रभाश जोशी की बातों का सिलसिलेवार जवाब क्यों नहीं देते ? | | | | | |
| | Sunanda Singh रांची, झारखंड | | | | आज सुबह से कई ब्लागों पर प्रभाष जी का यह इंटरव्यू टुकड़े-टुकड़े में पढने को मिला और मैं सोचती रह गई कि क्या सच में प्रभाष जोशी ने ऐसा कुछ कहा है.
अभी जब रविवार पर पूरा इंटरव्यू पढ़ गई हूं तो सोच रही हूं कि कुछ लोग अपने छुद्र स्वार्थ के लिए और अपने ब्लाग की हिट्स बढ़ाने के लिए संदर्भों से काट कर बकवास कर रहे हैं. यह बेशर्मी है, पत्रकारिता के नाम पर नीचता है. जो कुछ प्रभाष जोशी ने कहा है, उस पर तो बात करो. केवल उन्हें गरियाने के लिए.....शर्म आनी चाहिए. | | | | | |
| | satyanarayan patel () indore | | | | अपने मालवा में ऐसी कोई प्रथा नहीं है जिसमें औरत को पति के मरने के बाद जला दी जाए या वह खुद चिता में कूद पड़े. राजस्थान तरफ जरूर ऐसा होता रहा है.
मैं उसी गाँव से हूं जिसके बगल वाले गाँव में प्रभाष जी मास्टरी किया करते थे. हमारे इधर इस प्रथा से लोग वाकिफ हैं पर कोई सती नहीं होती, न किसी को विवश किया जाता है. सत शब्द का उपयोग जरूर किया जाता है लेकिन उसकी पत्नी का चिता में जल कर सती होने से कोई लेना देना नहीं है. | | | | | |
| | Manish Verma Noida | | | | * Sati Pratha is not an Indian tradition. There is no mention or example of Sati in any old Indian scriptures.
* Women in India often committed suicide to protect their honour from invaders. This custom was called Johar. They built big cauldron like pots, lit then with fire and jumped into them, to die voluntarily in order to save their honour and chastity. There was no forced immolation in that process.
* Sati is an ancient Sanskrit term, meaning a chaste woman who thinks of no other man than her own husband. The famous examples are Sati Anusuiya, Savitri, Ahilya etc. None of them committed suicide, let alone being forcible burned. So how is that that they are called Sati? The word ‘Sati’ means a chaste woman, and it has no co-relations with either suicide or murder.
* The phrase, ‘Sati Pratha’ was a Christian Missionary invention. Sati was taken form the above quoted source and ‘Pratha’ was taken from the practice of Johar’, (by distorting its meaning from ‘suicide’ to ‘murder’) and the myth of ‘Sati Pratha’ was born to malign Indian culture.
* When Raja Dashrath dies in Ramayana, none of his queens perform Sati act.
* In Mahabharata, many warriors died in the war, but there is no mention of Sati anywhere. | | | | | |
| | Suresh C Mathur कोंकर, रांची, झाऱखंड | | | | यह इतिहास की अपनी तरह से की गई व्याख्या लगती है. सती का मतलब सत्य से जरुर रहा होगा, लेकिन जो प्रथा थी, उसमें विधवा को जबरन जला देना ही था.
आप याद करें राजाराम मोहनराय को. उन्होंने अपनी भाभी को इसी तरह सती किए जाने के बाद ही सती प्रथा का विरोध शुरु किया था और लगातार विरोध के कारण 1829 में अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगाया था. इस प्रथा को देखने का तरीका विदेशी या यूरोप का नहीं था. इस परंपरा को शुद्ध रुप से देसी तरीके से ही देखा गया था और राजाराम मोहनराय कोई विदेशी नहीं थे. | | | | | |
| | Vicky G Bhopal | | | | "...जिस देश की नागरिकता भी छोड़ दी. उस देश के मूल के आप हैं, इसलिए अपनी टीम को आप चियर करते है. अब अगर एक मुसलमान पाकिस्तान की टीम को चियर करता है तो आप को आपत्ति क्यों होनी चाहिए ?...."
यह कैसा तर्क है जोशी जी? ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के लोग भारतीय टीम का सपोर्ट करते है क्योंकि उनका मूल यानी जड़ भारत से जुडा है. इसलिये उनकी भावनाएं भारत से जुडी हैं. आप बताइए कि किस भारतीय मुसलमान की मूल भूमि पाकिस्तान है? भारतीय मुसलमान तो हमेशा से भारत मे रहे, यही पैदा हुए, यही रहना है. फ़िर पाकिस्तान के सपोर्ट की बात आपको सही क्यों लगती है? | | | | | |
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