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माओवादी कवि वरवरा राव से बातचीत
संवाद
कड़वा है सरकार से बातचीत का
अनुभव
माओवादी कवि वरवर राव
से
आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
क्रांतिकारी कवि वरवर राव अपने अनुभव से मानते हैं कि सरकार और माओवादियों के बीच
बातचीत मुश्किल है. आंध्र प्रदेश की सरकार और माओवादियों से बातचीत में मध्यस्थ रहे
वरवर राव की राय में सरकार देश में अमरीकी साम्राज्यवाद लाना चाहती है, इसलिए वो
माओवादियों को मार रही है. वरवर राव साफ मानते हैं कि माओवादियों की जितनी दुश्मनी
अमरीका से है, उतनी ही चीन से भी. नेपाल के माओवादियों से भी वे केवल सैद्धांतिक
दोस्ती की बात स्वीकारते हैं.
उनसे की गयी बातचीत का दूसरा और अंतिम भाग यहां अविकल रुप से पेश है.
•
क्रांतिकारी कवि वरवर राव जो भतखम्मा की बात करते हैं जिसका
आशय है “जियो और जीने दो” जो कि आप कह रहे थे. तो क्या हम ये मान के चलें कि कहीं न
कहीं तेलंगाना movement से अपने वाद की शुरुआत करने वाले वरवरा राव, गांधी के आसपास
पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं ?
नहीं, नहीं, नहीं. मार्क्सवाद ही है जीना और जियो और जीने दो. क्योंकि जो जीने का
हकदार है, जो उत्पादन में भाग लेने वाले अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी जीवन
देता है. वो जीना है. उनको जीने नहीं दे रहा है ये सामंतवादी, ये शोषणवादी जो समाज
है. जो पूंजीवादी समाज है उनको जीने नहीं दे रहा है.
एक तरफ वो काम करने वाले नहीं है, उत्पादन में भाग लेने वाले नहीं है, वो परजीवी
हैं. इनके सीमा के उपर, इनके स्वेद के उपर वो जी रहा है. जो अपने स्वेद से उत्पादन
में भाग ले रहा है, उनको जीने नहीं दे रहा है. हमारा कहना है कि उनके जीने दो, उनसे
ही तुम्हें अनाज मिल रहा है, खाना मिल रहा है, और तुम भी जी सकते है. मगर तुम शोषण
से उनको जीने नहीं दे रहे हो. ये गांधी की बात नहीं, जीने की बात है.
Marxism तो एक ultimate philosophy है जिसमें classless society होती है. उस
classless society में जेल नहीं होती है, हिंसा नहीं होती है, state नहीं होता है,
पुलिस नहीं होती है. Paris commune रहा है ऐसा. 70 दिन के लिए Paris Commune में ना
पुलिस रहा, न जेल रहा, ना court रहा, ना ही state रहा. यूजेन पोत्येर बोल के एक
कामगर था, उसने एक international कविता लिखा है - सुबह जो नाला साफ करता है, वो 10
बजे आकर ऑफिस में बैठता है, court में जाकर judge बनता है. शाम में आकर कविता लिखता
है.
यानी एक सम्पूर्ण मानव बन गया है 70 दिन के लिए Paris commune में.
• जिस यूजेन
पोतिये की बात आप कर रहे हैं, उनकी ही एक कविता का हिंदी अनुवाद है – उठ जाग ओ भूखे
बंदी, अब खींचो लाल तलवार, कब तक सहोगे भाई, जालिम का अत्याचार. मतलब क्रांति यहां
भी तलवार से ही हो रही है, हिंसा से ही हो रही है. ऐसे में गांधी आपको कहां
प्रभावित करते हैं?
मैं बहुत सी जगह बोल रहा हूं. एक बात में हम कुछ हद तक गांधी को इसीलिए मानते हैं
कि anti-imperialist. और दूसरी बात है कि जो विकास के बारे में जो गांधी और नेहरू
की जो विचारधारा है. बड़े-बड़े प्रोजेक्ट को समर्थन देने वाला नेहरू और छोटे-छोटे
घर की उत्पादन की चीजें यानी handicrafts, गांव में लगाने वाली जो छोटे छोटे
industries, Cottage industries, small scale industries, खादी. ये गांधी जो कहता
था, हम उसको समर्थन करते हैं.
इसीलिए कि ये बड़ी पूंजी लगाने के, बड़े उत्पादन के, बड़ा उत्पादन भी नहीं है वहां;
ये जो भारी विकास जो आ रहा है, खासकर तो आज छत्तीसगढ़ की समस्या को यही समझते हैं.
तो रमन सिंह जब पहली बार Chief Minister बना है, तो तीन MOU’s sign किया है,
Memorandum of Understanding. एस्सार से, टाटा से और पोस्को से. यानी बस्तर में
स्टील प्लांट लाने के लिए. उससे पहले ही जो बैलाडीला में बना है, जापान के लिए जो
iron ore लेने के लिए. हमारे विशाखापटनम से एक जो किरंदुल रेलवे लाइन है, जो
बैलाडिला की रेलवे लाइन है, वो वहीं से तो जाती है. किसके लिए हो रहा है ये ? ये
iron ore जापान को भेजने के लिए.
एमओयू बनाम संघर्ष
छत्तीसगढ़ के जितने भी साधन हैं. यहां के जितने भी minerals हैं... ये
छत्तीसगढ़ बहुत rich है. बस्तर तो बहुत rich है देश में ही. 80% जो minerals जो
अलग-अलग किस्म के होते हैं. 28 kinds of minerals are there in Bastar,
particularly in south Bastar. ये सब को आप बड़े-बड़े industralists को,
multinational corporations को भेजने के लिए आप Memorandum of Understanding में आ
गए हैं.
ये एक बात ऐसी ही नहीं कि जो एक जमाना था जो Public Sector में होते थे. हज़ारों
लोगों को उपाधि (काम) मिलती थी, जैसे भिलाई स्टील प्लांट में या विशाखापनम के स्टील
प्लांट में मिला है. वैसा भी नहीं क्योंकि बहुत आधुनिक तकनीक आ रही है तो कम
employees हों और ज्यादा उत्पादन हो. वैसा देखा जाए तो ये recession में तो स्टील
प्लांट खत्म ही होते जा रहा हैं. इसी समय जो MOU’s जो sign किया है, वहां से संघर्ष
शुरु हुआ है.
मैं इसीलिए बार-बार ये कह रहा हूं. आप लोग इसके सारांश (मुद्दा) को छोड़कर रूप के
बारे में चर्चा कर रहे हैं. रूप के बारे में आप बात कर रहे हैं. सारांश में ये
संघर्ष जो है productive relations में जो हिंसा हो रहा है, ये हिंसा के बारे में
बोल रहा हैं. कितने लोग निर्वासित हो रहा हैं, कितने लोग displaced हो रहा हैं,
इसके rehabilitation की बात हो रही है. वो क्या बन रहे हैं? आप देख रहे हैं रिक्शा
चालक बन रहा हैं, महिला है तो वेश्या बन रहा हैं, Marginalize हो जा रहा है, कितने
लोग मर जा रहा हैं. लाखों लोग unemployed हैं.
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सरकार है विकास विरोधी
कहते हैं कि नक्सलवादी लोग विकास के विरोध में है. विकास के विरोध में
हैं ये बताने के लिए उदाहरण देते हैं कि रोड नहीं बनने दिए हैं.
अगर नक्सली लोग विकास के विरोध में है तो देश में जो पाँच बड़े IDPL कंपनियां थीं
उनको बंद करने का निर्णय तो सरकार ने लिया है. बंद नहीं करने का संघर्ष चलाया है वो
नक्सलवादियों ने. हैदराबाद में IDPL बंद नहीं करने के लिए दो-तीन साल संघर्ष किए
हैं नक्सलवादी लोग. नक्सली लोग और उसका समर्थन करने वाले जो लोग हैं, democrat लोग.
क्योंकि IDPL ने हज़ारों लोगों को employment दिया है, एक तरफ IDPL की जो दवा है,
वो सस्ती भी मिलता था. सिरदर्द की हो या पेट दर्द की हो बहुत सस्ता भी मिलता था. आज
जो Multinational Pharmaceutical Companies की दवाएं जो मिल रही हैं बहुत महंगी
हैं.
रेणुका चौधरी जब Health Minister था, आप देखिएगा (आप ये जो विकास के बारे में ये तो
misinformation दे रहा है) जब IDPL देश भर में पाँच जगह पर आए थे, उस समय की सरकार
का ये मुद्दा था कि IDPL में बहुत सस्ती सी दवा बनना है और जितने भी सरकारी
Hospital हैं, Health Department हैं, Medical Department हैं वहां की medical
supply IDPL से होगी. बाहर से नहीं लेना है. यानी primary health center से लेकर एक
रायपुर के hospital तक अगर कोई बीमारी से गए तो उसकी जो दवा मिलता था वो IDPL की
दवा मिलता था.
रेणुका चौधरी Health Minister बनने के बाद, यानी 1991 के बाद का सरकार आने के बाद,
उसने कहा – नहीं-नहीं हम दवा किसी से भी ले सकता है. यानी in interest of
multinationals you have signed the MOU’s. इसीलिए आप दवा भी देना बंद कर दिया है
और इस बीच में जो IDPL जहां -जहां है वो शहर के बीच में आ गए हैं. उसकी Real Estate
का बहुत मांग है. आज की पूरा जितनी भी ये Industries close करने का और SEZ लाने के
पीछे जो उद्देश्य है, वो है Real Estate करना. सरकार Real Estate कर रहा है आज.
आंध्र में भी कर रहा है, देश भर में भी कर रहा है.
• सरकार और
बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग है जो ये मानता है कि नक्सली उन्हीं इलाकों में
सक्रिय हैं, जहां minerals हैं, mines हैं. और कहीं न कहीं वो बहुराष्ट्रीय
कंपनियों की ही मदद कर रहे हैं.
नहीं, नहीं. वो तो चीज़ गलत है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद कहीं भी नहीं कर रहे
हैं.
• लोगों का ये
कहना है कि एस्सार की पाइपलाइन जाती है, आप उसमें परेशान नहीं करते हैं. लेकिन
एनएमडीसी की जो conveyer belt है, आप उसको हर बार हमला करके जला देते हैं.
ये एक बार हुआ था. मगर review भी कर लिए हैं. ना एस्सार हो, ना पोस्को हो किसी को
भी allow नहीं करना है. और सब sectorial depend होता है. ये एक बार हुआ है, मैं कह
रहा हूं. लेकिन बाद में review भी कर लिया है हमने. एस्सार को भी allow नहीं करना
है. ये बहुत सा सुना है मैंने. जैसा मैंने कल प्रकाश सिंह से सुना है;
misinformation है ये. क्योंकि पुलिस विभाग में डीजीपी रहकर रिटायर हुआ है. जो उनको
information मिलता है वैसा वो कहता है. इसके बारे में कह रहे हैं कि अफीम (नक्सली
अफीम की तस्करी कर रहे हैं) वो सब गलत बात है.
नेपाल के माओवादियों से संबंध नहीं
वैसे ही ISI से संबंध है ये गलत बात है. उनके तो नेपाल की Maoist Party से भी संबंध
नहीं है. Organisation संबंध नहीं है. वो नेपाल की पार्टी भी कह चुका है, यहां की
पार्टी भी कह चुका है. गणपति भी कह चुका है, प्रचंड भी कह चुका है.
संबंध इतना है कि political है. Organisational संबंध कभी भी नहीं रहता है एक देश
की पार्टी का, दूसरे देश की पार्टी का. जब (communist) international होता था तब
था. अब international ही नहीं है तो कोई organizational संबंध नहीं है, Politically
है. उनकी ideology और इनकी ideology एक ही है. Maoism उनका भी है Maoism इनका भी
है.
LTTE का भी एक nationality liberation को समर्थन देते हैं मगर LTTE Marxist
Leninist Organization नहीं है, इसीलिए उससे भी कोई लेने-देने की बात भी नहीं होता
है. ये जो प्रचार होता है, कहां से शुरु किय़ा है? LTTE से शुरु किया है. नेपाल से आ
रहे हैं बोलते हैं.
जैसा अमरीका, वैसा चीन
अब मैंने कल सुना, चाइना के एजेंट है बोल रहे हैं.
कब की बात है चाइना? 1970 था तब कहा था China Chairman is our Chairman. बाद में
review कर लिया है, गलत मान लिया है self criticism किया है. आगे जा कर 1973 से तो
China को Capitalist Roader बताए हैं. हम तो आज China को, जैसे America को देखते
हैं वैसे China को देखते हैं.
Special economic zones जो China ने लाया है वो China के लिए भी अच्छा नहीं है और
उसका Model लेकर भारत सरकार special economic zones लाया है. मुरासोली मारन पहली
बार लाया है special economic zone, कौन Special Economic Zone का विरोध कर रहा है
जो China में लागू है? Marxist Party भी मानती है, हम नहीं मानते हैं.
सबको China agent बोलकर कल बात कर रहे हैं. वो RSS ideologue है वो बात करने वाला.
मेरा कहना है कि मेरा जो भावना है, आपकी उससे सहमति नहीं हो सकती है. मेरा जो
विचारधारा है वो मानने की ज़रूरत नहीं है, पूरा आप विरोध कर सकते हैं लेकिन Facts
को distort मत करो.
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पृथक कश्मीर को समर्थन
हां हम कश्मीर को अलग होने का समर्थन देते हैं, North East को अलग होने
का समर्थन देते हैं इसीलिए देते हैं क्योंकि वो अलग ही रहा है. 15 अगस्त 1947 तक वो
अलग ही रहा है. कश्मीर रियासत कभी भी ब्रिटिश India में नहीं थी. ये तो सरकार ने
मान लिया है, नहीं मान लिया है तो क्यों उसके प्रधान कहते थे शेख अबदुल्ला को?
क्यों कश्मीर के मुद्दे को जवाहर लाल नेहरू ही security council में ले गये हैं?
क्यों आज भी संविधान में कश्मीर के लिए एक अलग मुद्दा रखे हैं? जो भी rule आता है
तो This is applied to Jammu & Kashmir also क्यों लिखते हैं? This is applied to
Chhattisgarh also तो नहीं लिखते हैं. यानी कुछ है अलग.
वैसे ही North East के बारे में, तो एक इतिहास है. और दूसरी बात है (कश्मीर का पृथक
करना) हम नहीं चाह रहे हैं, वो लोग चाह रहे हैं. वो लोग जो चाहते हैं, हम उसको
समर्थन देते हैं. कश्मीरी लोग कश्मीर का self determination चाह रहे हैं, उसका हम
समर्थन कर रहे हैं. हम जाकर उसके उपर नहीं रख रहे हैं, वो चाहते हैं.
माओवादी बनाम सांसद
• आपने कहा कि
facts को destroy मत करें. बहुत सारी माओवादी सशस्त्र पार्टियां एक-एक करके बनती
चली गईं. आप हर एक को संशोधनवादी कह देते हैं और फिर वो अपनी एक पार्टी बना लेता
है. इस तरह से झारखंड में या बिहार में कम से कम एक दर्जन छोटी बड़ी पार्टियां है.
और उसमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो कल तक rapist थे, गुंडागर्दी करते थे,
डकैत थे. तो ये पूरे movement की जो दशा है और दिशा है उसको किस तरह देखते हैं आप?
जो revolutionary parties है जो ML पार्टियां हैं. जो CPIML चारू मजूमदार के
नेतृत्व में थे. वो पार्टी का 1972 से लेकर split होना शुरु हुआ. खासकर ideological
तौर पर split ये चीज़ों पर होना शुरु हुआ कि एक तो चुनाव को एक form of struggle
मानना या नहीं मानना. Election boycott या election में participateकरना है, ये
पहला मुद्दा है.
Election boycott का stand चारु मजूमदार लिया था. वो भी election boycott एक
strategy बोलकर निकला था, नक्सलबाड़ी के बाद. बाद में review कर के strategy नहीं
होता है form ही होता है. एक Tactical form ही होता है मगर नक्सलबाड़ी के बाद वो ही
tactical form को अटल होकर ही रहना, ये आज की Maoist party का stand है, या कल की
people’s war का stand है. ये बात लेकर election boycott का stand लेकर.
वैसे ही आज की दशा जो है armed struggle का प्रचार करने का जैसा है, armed struggle
करने की दशा नहीं है ये एक विचारधारा है. सशस्त्र संघर्ष करते हुए, उसका प्रचार
करना है ये maoist party का स्टैंड है. ये ideological स्तर पर मोटे-मोटे दो ML
शिविर आया हैं. जैसा liberation, new democracy, CPML जनशक्ति वैसी पार्टी. कानू
सान्याल के नेतृत्व में पार्टी. MCC, party unity, people’s war ये ऐसी पार्टी. तो
1972 की तो बहुत splits होने की स्थिति था.
1990 से लेकर unity की स्थिति आया. कानू सान्याल के नेतृत्व में भी कुछ ML पार्टी
का unity हुआ था. New democracy वाले भी कुछ लोगों से मिले थे. वैसे ही election
boycott stand लेने वाले और सशस्त्र संघर्ष नहीं चुनने के बाद. वो भी छोड़ना नहीं
कहते हैं. वो continuously जो लागू रखे हैं खासकर आंध्रप्रदेश में श्रीकाकुलम
setback के बाद भी. जो people’s war group जो 1980 में बना है.
जो continuously सशस्त्र संघर्ष में है, वो लोग बिहार के MCC औऱ पार्टी unity के
साथ merge हुए हैं. तो पहले 1997 में party unity के साथ हुआ था. हाल ही में 21st
September 2004 को MCC में भी हुआ है. जब MCC हुआ है CPI Maoist कहा गया है. वो
2004 में सितंबर 21 को हुआ है, उसका ऐलान किया गया था हमारे वार्ता के समय में 14th
October को.
नक्सल अगर नक्सल नहीं तो Ex-Naxal. तो नक्सल के नाम से जितना भी चलता है क्योंकि वो
नाम वो तो है, प्रभाव है. तो अच्छे काम करने वाले के लिए भी होता है, बुरा काम करने
के लिए भी वो प्रभाव होता है.
आप देखिए ना, आज आप लोग ही एक को introduce किया कि बहुत दिन अंदर आ कर रहा है.
नक्सल पार्टी में बहुत दिन भूमिगत रहकर आया है. वो बात लिखेंगे पहले, ये नहीं बताया
कि वो बाहर आया है state में शामिल हुआ है, सलवा जुडूम में काम कर रहा है, नक्सल का
विरोध कर रहा है. ये नहीं कहते हैं आप लोग और उसको ये बताना चाहते हैं कि उसको बहुत
experience है underground में. हो सकता है, मगर आज क्या है वो. उसको आप कैसे
प्रतिनिधि मानते हैं. तो अपने आप को ऐसा कहने वाले तो बहुत हैं. और कोई copyright
की बात नहीं है ये तो.
अगर क्रांति लाने वाली पार्टी corrupt है. ये आप कहते हैं rapist…. छोटी सी moral
turpitude के लिए central committee members को निकालने वाली पार्टी है. जो
लंकापापिल का central committee member था जो छत्तीसगढ़ में काम किया है. वैसे ही
इल्ज़ाम पर उसको निकाल दिया है, वो surrender होकर बाहर वारंगल में है, हमारे पास
ही है. तो ये कैसे हो सकता है. अगर कोई है तो उसको निकाल देते हैं वो बात जब बाहर
आती है. अगर ऐसा है तो समझिए इतने दिन लोगों में नहीं रह सकते हैं. 42 years
naxalite movement रहा है तो नहीं हो सकता है ये.
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अपराधी संसद में
शायद बुर्जुआ पार्टी में ये सब करने वाले वो ही उनके लिए एक सर्टिफिकेट बन गया है
MLA, MPs बनने के लिए. जैसा साईनाथ ने लिखा है हिंदू में, आम आदमी को represent
करने वाले करोड़पति हैं आज. आम आदमी का वोट मिलता है वो करोड़पति है, 300 से ज्यादा
Parliament में हैं. और आज आंध्र प्रदेश में कौन MLA बनता है? जो Real estate करता
है, जो crime करता है. जो corrupt आदमी है, जो landlord है, जो पूंजीवादी है, ये
MLA बनता है.
आंध्र प्रदेश की स्थिति अगर है ऐसी तो बाहर की स्थिति तो बोल ही नहीं सकते हैं.
लुटेरे, criminals सारे assembly और parliament में बैठे हैं.
देखिए आप, जीवनशैली देखिए एक मंत्री की आज. अपने आप को तो आदिवासी मंत्री बोलकर
परिचय कराते हैं. वो जब आदिवासी था तो राजनीति में आया था तब उनकी जीवनशैली क्या थी
और आज क्या जीवनशैली है ?
एक Maoist party leader को बताइए. एक तो वो कह रहा था अभी आपका Minister, education
and culture minister (छत्तीसगढ़) कह रहा था अभी कि आप जो पूंजीवाद के विरोध में कह
रहे हैं, तो इसमें भी बड़े पूंजीवादी हैं. एक को बताओ. अगर वो पूंजीवादी है तो जंगल
में रहकर क्यों encounter में मारा जा रहा है. और पैसे collect करने के लिए लेवी के
बारे में बोलते हैं. लेवी किसके लिए ले रहे हैं? अपने परिवार के लिए ले रहे हैं?
अपने घऱ के लिए ले रहे हैं? हथियार खरीदने के लिए इन लोग लेवी ले रहे हैं.
माओवादियों की जीवनशैली
कोई दुनिया में एक ऐसा संघर्ष चला था, कोई किसी के पास से पैसे नहीं
लिया? लोहिया जी तो बहुत अच्छा socialist थे, मारवाड़ी के घर में रहता थे. उनके पास
मिठाई खाता था. मगर अपने लिए लोहिया कुछ किया क्या? अपने लिए गांधी कुछ किया क्या?
मैं उनके बारे में भी बहुत.... वैसी ही integrity आपके parliament और assembly में
बैठने वाले एक भी Minister को बताईए आप, एक MLA को बताइए आप.
और Maoist party में हमारे पास एक people’s war का state secretary था पुलिएंजैय्या
बोलके. उनको और उनकी बीवी को encounter में मार दिया. वो secretary थे पार्टी का.
वो ऑफिस से पकड़े गए हैं. तो बहुत सा सोना था, लाखों रुपए थे. तो पुलिस कह रही है
कि देखिए कितना सोना है, कितने पैसे हैं. अगर उनके लिए वो सब वो काम किया है तो भाग
जाता वो. वो पार्टी ऑफिस है, वो पार्टी का फंड है. वहां रखा है वो, उसकी हिफाज़त कर
रहा है. अगर personal acquisition का है वो, personal accumulation अगर होता है तो
पार्टी में क्यों रहता वो.
आज जो पार्टी में हैं जाकर उनका परिवार घर में देखिए आप. जो भी है वो क्योंकि आपके
पूरे central committee के सदस्यों तो इधर होते हैं. ये central committee के
leadership जो तेलंगाना से, जो आंध्र से हैं उनके घर को जाकर देखिए उनकी क्या
स्थिति है. न घर है, गोपाल रक्षण राव के घर को तो तोड़ दिए हैं. उनका गांव में उनका
घर नहीं. वो तो हालांकि एक upper class family से आया है. एक middle class upper
class family से आया है. कोई नहीं है, कुछ नहीं है. रामकृष्णा है एक टीचर का बेटा
है. टीचर मर गया है, भाई लोग छोटे-छोटे काम कर लेते हैं. अगर मीडिया को कोई
interest है तो एक survey कीजिए. Maoist party central committee members के परिवार
वालों की जीवनशैली क्या है ?
तथ्यों को विकृत मत कीजिए
मैं एक कॉलेज टीचर रिटायर हुआ हूं, इसीलिए मेरे पास एक फ्लैट है. घर है. मेरी
जीवनशैली भी मैं जिस कॉलेज के लेक्चररों के साथ काम किया था, उससे जीवनशैली से
तुलना कीजिए, कम ही होता है, ज्यादा तो नहीं होता है. लेक्चरर तो अच्छा जी सकता है.
ये इसीलिए बोल रहा हूं ना facts distort मत कीजिए.
हां पैसे ले रहे हैं लेवी है, वो तो कहते हैं लेवी. किसके लिए ले रहा है. जो
कैबिनेट में रहने वाले मंत्री अगर पैसे लिए तो किसके लिए ले रहा है? माओवादी पार्टी
के नेता लोग अगर पैसे लिए तो किसलिए ले रहे हैं? ये ज्यादातर जो खर्चा होता है,
हथियार के लिए होता है क्योंकि ये illegal है तो दुगना भी देना पड़ता है.
एक कहावत है, चीनी लोगों का एक लोकगीत है – आपको खाना कौन देता है? जहां रहते हैं
वहां की जनता देती है. आपको हथियार कौन देते हैं ? शत्रु देते हैं. पुलिस स्टेशन पर
हमला करते हैं लेते हैं, बना लेते हैं. तीसरा है - किसी से खरीद लेते हैं. खरीदने
के लिए पैसे होने चाहिए.
दुनिया भर के संघर्षों में से एक ऐसा बताइए, जहां हथियार का इस्तेमाल नहीं हुआ है.
और हथियार के लिए पैसे की ज़रूरत है. और वो पैसे कहां से आते हैं, पैसे वालों से ही
आते हैं. मगर खाने के उपर वो किसके उपर आश्रित है ? रहने के लिए किसके उपर वो
आश्रित है ? जंगल में आदिवासी के साथ रह रहे हैं. उसके साथ खा रहे हैं, उसके साथ पी
रहे हैं. वो क्या खा रहे हैं, वो क्या पी रहे हैं ये तो देखिए आप मीडिया वाले अंदर
जाकर.
•
कहीं आपको ऐसा नहीं लगता कि नक्सल आंदोलन का एक बड़ा हिस्सा,
जो पूंजीवादी ताकते हैं जिनसे वो लेवी वसूलता है, उनके tools के बतौर इस्तेमाल होता
है ?
जब उसका tool बन जाता है, टूट जाता है. हरगिज़ नहीं बनता है ऐसे सामंतवाद और
पूंजीवाद का. हम बाहर रहने वाले किसी के लालच में आ गए तो उसका काम करने का हम
हिचकिचाते हैं. मगर हथियार रखकर जो जंगल में हैं, आपके पैसे लिए भी, अगर आपके विरोध
में एक किसान मज़दूर का संघर्ष चल रहा है तो उसके तरफ रहते हैं आपके तरफ नहीं रहते
हैं.
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अगर कोई रहा, एक उदाहरण बताएं तो वो टिकता नहीं. उसमें बदलाव आया है इस समय से.
पैसे ले सकते हैं क्यों पैसे हैं, किसके पैसे हैं. काम करने वाले के हैं, श्रम करने
वाले के पैसे हैं. भीष्म और द्रोण किसके तरफ थे ? कौरवों के तरफ थे लेकिन किसका मन
में समर्थन कर रहे थे-पांडवों का. अगर इस तरह कहा जाए तो कौरवों का खाना खा रहे हैं
और किसकी हिफाज़त कर रहे हैं बोले तो धर्म जिसके तरफ है पांडवों की.
अमरीकी साम्राज्यवाद के विरोधी
पैसे सामंत से ही लिए हैं, पैसे पूंजीवादी से लिए हैं, किसी से भी लिए
हैं. लेकिन पक्ष में किसके खड़े हुए हैं. आदिवासी के पक्ष में खड़े हुए हैं, मज़दूर
के पक्ष में खड़े हुए हैं, किसान के पक्ष में खड़े हुए हैं. न ही पूंजीवादी और
सामंतवादी के पक्ष में खड़े हुए हैं. एक बात बताइए कहां पूंजीवादी को supportकर रहे
हैं. एक बताइए कि जिंदल कंपनी को support कर रहे हैं. ये बताइए कि वो एस्सार को
support कर रहे हैं. एक बताइए कि वो पोस्को को support कर रहे हैं. एक बताइए की वो
अमरीकी साम्राज्यवाद के समर्थन में है. एक तो उदाहरण बताइए.
एक तो आप बताए थे कि वो एस्सार के पाइपलाइन की बात होती है. उसे स्वीकार कर लिया
बोलके मैं. ...हो भी सकता है आंध्र में तो हुआ है ये चीज़....हम रोक नहीं लगा पा
रहे हैं, वो भी है. हमारे limitations भी हैं. ऐसा नहीं है कि हम जा के ये कर सकते
हैं.
एक समय आंध्र में कोकाकोला कंपनी पर हमला किए हैं. हैरिटेज कंपनी पर हमला किए हैं.
आज का स्थिति ज्यादा अलग बन गए हैं. कुछ नहीं कर पा रहे हैं. छ्त्तीसगढ़ में तो
बैलाडीला के पास आप रोक सके हैं पीपुल्स वार को. वहां हम रोक नहीं सके हैं, वो तो
हमारी limitation की बात है. अगर हमारे लक्ष्य की बात कहा जाता है. पूंजीवाद,
सामंतवाद, साम्राज्यवाद के समर्थन में Maoist party as party as organization कहीं
समर्थन दिया बोले तो ये सच नहीं हो सकता है. अगर सच है तो खत्म है वो.
•
ये एक खऱाब सवाल हो सकता है क्योंकि मैं व्यक्तिगत रूप से
किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ हूं लेकिन आपके stand को लेकर अगर बात करें तो आपकी
लड़ाई में जिसे आप वर्ग शत्रु कह रहे हैं, वह तो कभी नहीं मारा जाता. आपकी बंदूक का
निशाना हमेशा गरीब आदिवासी, गरीब सिपाही ही होता है. तो वर्ग शत्रु की परिभाषा अलग
और उनसे संघर्ष का मामला अलग , ये कैसा माओवाद है?
आजादी की लड़ाई के समय दोनों तरफ ही गरीब आदमी थे. सिपाही भी वो ही थे और जो सिपाही
पर हमला किया है, वो भी गरीब सिपाही थे.
देश में आज की जो स्थिति है. जो देश में सिपाही के रूप में भर्ती होते हैं वो सबसे
गरीब किसान लोगों के बेटे होते हैं. आज की स्थिति ये है कि कोई भी रोजगार नहीं
मिला, कोई भी नौकरी नहीं मिली, तब पुलिस में जाते हैं. पुलिस में जाकर आप शत्रु के
पक्ष में हैं. आप शत्रु होने का कारण नहीं है. आप शत्रु के पक्ष में होने के कारण
मर जा रहा है.
आप एक ऐसा युद्ध बताइए, जिसमें सिपाही नहीं मरा है. कौरवों के पक्ष में भी वो ही
मरते थे और पांडवों के पक्ष में भी. वो तो गरीब तो ही थे. और दुर्योधन हो या अर्जुन
हो वो बहुत हिफाज़त से लड़ रहे थे. आज की स्थिति भी वैसी ही है.
अपनी उंगली, अपनी आंख
मैं यही कहा कि कोंडापल्ली सीतारमैय्या जब जेल से भाग गया है तो उसको
बंधक बनाए रखने के लिए जो सिपाही को रखा है उसको मार के गया है. क्योंकि वो एक
क्रांतिकारी है इसीलिए वो भाग जाना चाहता है. इसीलिए वो मार डाला. तो यही criticism
आया कि ये तो गरीब पुलिस को मारकर गया है. तब जो DIG intelligence विजय रामाराव था
जो बाद में तेलुगु देशम पार्टी में था. तो मैंने बाद में कहा कि वहां विजय रामाराव
गार्ड नहीं था. विजय रामाराव ने एक सिपाही को गार्ड रखा है, तो सिपाही को ही मारना
पड़ता है. तो गरीब ही मर जाता है. और जब आप गरीब आदिवासी को पुलिस में ही नहीं सलवा
जुड़ूम में भी recruit किए हैं. ये अपने उंगली को अपनी ही आँख में घुसाने जैसा है.
क्योंकि ये आप state लाया है. Helpless informer भी हो, क्योंकि मैं भी सुनता हूं
रोजाना ये ही ...... criticism होता है. जो informer हो, या सलवा जुडूम हो या पुलिस
हो. ये तीनों भी आदिवासी लोग हैं. एक तरफ तो गरीब के बारे में आदिवासी के बारे में
बात करते रहते हैं तो दूसरी तरफ आदिवासी को मार रहे हैं. सच भी है, सच भी है. मगर
किसके पक्ष में है वो. उसको चेतावनी दे रहे हैं हम कि आप उसके पक्ष में मत रहिए.
हमारे यहां कविता लिखी गई है - कि हमारे में से ही है तुम. हमारा आदमी है तू, उस
पक्ष में मत रहो. मेरे उपर तुमने हथियार उठाय़ा है. इस तरफ नहीं उठाने का, उस तरफ
उठाओ. लेकिन ये बहुत चेतना की बात है. 1857 जैसा संघर्ष आए तो वो समझ लेते हैं.
आगे पढ़ें
•
माओवादी पार्टियां कहती हैं कि वे माओवाद के रास्ते पर चल
रही हैं और इन नौजवानों के आदर्श भगत सिंह हैं. भगत सिंह ने जब सांडर्स की हत्या की
थी तो कहा था कि मानव जाति का जो खून है, उसके प्रति हमारे मन में भरपूर करुणा है.
लेकिन कई बार शरीर का कोई खराब हिस्सा बहुत दुख, बहुत पीड़ा के साथ काट कर अलग करना
पड़ता है. लेकिन यह बहुत आश्चर्यजनक है कि जब माओवादी पार्टियां किसी की हत्या करती
हैं तो वे उस पर उत्सव मनाती हैं. इन हत्याओं को लेकर कोई दुख और पीड़ा क्यों नहीं
है ?
नहीं-नहीं उत्सव नहीं मनाती हैं. वैसा अगर वर्गशत्रु है तो शायद उत्सव मनाती हैं.
अगर गरीब लोग हैं तो बहुत सा समय था वो उसका दुख भी व्यक्त किया है. आप जो भगतसिंह
के बारे में बात quote किए हैं वो ही अच्छा है, वो ही बात है, हम को दुख है.
जैसा आपने उदाहरण भी दिया है कि किसी को मारना चाहता था पर कोई मर गया है वैसा ही
हुआ है. गवर्नर आ रहा है, इस कारण रेल को हटाया लेकिन गवर्नर नहीं आया ये भी है
भगतसिंह. यानी वो भी हो सकता है. क्रांति में वो भी हो सकता है.
गरीबों के मारे जाने का दुख
गरीब लोग जब मर जाते हैं तो दुख ही होता है. बात इतना है कि रामकृष्णा
इस बारे में एक statement भी दिया है - क्रांतिकारी लोग कभी भी जनता का और क्रांति
का न विरोध करने वाले को मारते नहीं है. विरोध करने वाले भी एक मनुष्य का या एक
क्रांतिकारी का जीवन खत्म होने का जिम्मेदारी है तो उनका जीवन हम खत्म कर देते हैं.
समझे ना आप ?
तो आप मेरे लिए जो खतरा किया है, अगर वो fatal है तो ही मैं बदला लूंगा. मेरे लिए
कुछ छोटा सा आपसे दोष हुआ तो फिर भी नहीं करूंगा. क्योंकि मनुष्य का जीवन और
क्रांतिकारी का जीवन बहुत हिफाजत से रहने के लिए बना है. वो जीवन को भंग करने वाले
जो होते हैं, उसको हम क्षमा नहीं करेंगे. आम आदमी का और क्रांतिकारी का जीवन
महत्वपूर्ण है.
•
वरवर राव बड़े माओवादी नेता माने जाते हैं. ..
नहीं, नहीं मैं क्रांतिकारी लेखक हूं. माओवाद खासकर जो CPI Maoist Party है उसका
constitution ये है कि आप professional revolutionary होना है. यानी कि आपके लिए
कोई address नहीं रहना है. ना घर, ना नाम, न private संपत्ति. सब छोड़कर पार्टी में
join होना है. आपकी पार्टी ही खाने, रहने का इंतजाम करेगी. तो मैं कॉलेज लेक्चरर
हूं रिटायर हुआ हूं, हैदराबाद में एक फ्लैट में रहता हूं. मैं कैसा.... अगर मैं
मानूं तो वो लोग नहीं मानते हैं. Maoist ideology को support करना...
•
माओवादी आपकी बात सुनते हैं ?
वो बात क्यों सुने? ना वो सुनाना चाहते हैं, ना मैं सुनता हूं. दो समय मैं वो
पार्टी का प्रतिनिधि रहा हूं. पहले समय में modelities decide करने के लिए. कैसा
क्या होना है क्या मुद्दा है ये तय करने के लिए. दूसरे समय में बातचीत किया हूं.
वार्ता में बातचीत किया हूं तो उनका प्रतिनिधि बन कर. जैसा मार्क्वेज़ है लेखक. वो
लैटिन देशों में बहुत बार ऐसे समय में represent किया है. लोगों ने मांगा था,
श्रीश्री ने किया है. कालूजी ने किया है हमारे तेलंगाना में. कालूजी तो कम्यूनिस्ट
भी नहीं था.
जीवन में बम नहीं देखा
•
लेकिन आपके बारे में कहा जाता है कि आपने बहुत सारे
हथियारबंद आंदोलनों में भाग लिया है.
(हंसते हुए) इसके बारे में मैं आपको एक interesting story बताऊंगा कि मैंने एक भी
हथियारबंद आंदोलन में भाग नहीं लिया है. और सच कहा है तो मैंने आज तक भी बम को नहीं
देखा है. बम खासकर.
हथियार तो वार्ता के समय में जंगल में वो लोगों को लाने के लिए गया तो हथियार देखा
मगर. बम को नहीं देखा है. पर interestingly 1985 में मेरे उपर एक बम केस रखा था
सरकार ने. क्योंकि missing cases बहुत हुए थे 1985 में. पहला missing case हुआ था
1984 december में. सुदर्शन नाम का हमारे वारंगल का था. पहले ले जा के उसे missing
कर दिया है, फिर मार दिया है. उसके विरोध में 18 जनवरी 1985 में मैं revolutionary
writers association का secretary था. Radicals बंद call किया है. वो बंद के दिन 18
जनवरी को एक CI (circle inspector) के घर पर बम डाले थे. Radicals डाले थे. हमको तो
मालूम ही नहीं था.
वहां बम डाला तो पुलिस ने आकर मुझे अरेस्ट किया. बहुत मारा पीटा torture किया, वैन
में डालकर, अपने पांव के नीचे रखकर लेकर गया. मेरे वारंगल में, मेरे घर में, मैं
जहां लेक्चरर हूं. बहुत माना हुआ एक व्यक्ति हूं. Humiliate करना चाहते थे. वैन से
उतारकर, पैर की चप्पल उतारकर, पैदल चप्पल निकाल कर, मैं लुंगी में ही था. जितना
insult करना है, मारना है उतना किया.
लेकिन बाद में जेल भेजने के बाद केस किया कि इनके घर से बम भी हमने जप्त किया है ये
बोला उन्होंने. बम जप्त किये हैं घर से, ये कल शाम में जाकर वो इलाके में बम बांटा
है, और ये घर में बम बनाता है.
हमसे जब सरकारी वकील ने पूछा तो हमने उसका जवाब में बोला कि अगर prosecution वालों
को या अगर पुलिस को interest है तो शायद archives में, या जेएनयू के archives में
हो या कहीं के archives में बाल गंगाधर तिलक की लोकसत्ता मैगज़ीन में एक article
छपा था, उसे पढ़ लें.
आगे पढ़ें
जब अरविंद घोष ने बम बनाया था. तो अरविंद घोष का बम केस चितरंजन दास नाम का एक वकील
था, उसने लड़ा था. बाद में वो चीफ जस्टिस बने है. वो पूरा अरविंद घोष का बम बनाने
का और चितरंजन दास का argument वो लोकसत्ता में publish है.
उसमें पूरा दिया है कि बम कहां बनता है, क्या डालते हैं, कैसे करते हैं. अब अरविंद
दास का चितरंजन दास वकीस से कहना या बाल गंगाधर तिलक का प्रकाशन करने से आप सीख ले
सकते है, मुझे कुछ नहीं मालूम. ये मैंने जवाब दे दिया.
उस समय एक कविता भी लिखी थी reflection बोल के- ना मैं बम करा हूं, ना बम डाला हूं,
तुम ही डर रहा है. तो जनता का तुम्हारे उपर जो विरोध हुआ है, बढ़ रहा है उससे तुम
ही डर रहे हो.
आज तक मैं सच कह रहा हूं मैंने बम को नहीं देखा है The real bomb. असली बम, सिनेमा
में देखा शायद, फोटो में देखा शायद लेकिन The Real Bomb असलियत में नहीं देखा है.
खासकर माओवादी के पास तो नहीं देखा है.
•
आंध्र में दो-दो बार बातचीत के प्रयास हुए और असफल हो गए.
बार-बार ये सवाल उठता है कि माओवादियों और सरकार के बीच बातचीत हो. क्या बातचीत की
कोई गुंजाइश बची हुई है?
अब तो कुछ बचा नहीं, वो हमारा अनुभव से कह रहे हैं. पहली बार जो तेलुगु देशम पार्टी
से आए थे तब पार्टी के उपर प्रतिबंध भी था और उनके heads के उपर prize भी था 10
लाख, 5 लाख या ऐसे कुछ रुपए. संघर्ष विराम का भी ऐलान नहीं किया है तेलुगुदेशम
पार्टी की सरकार ने. पीपुल्स वार ने ही एकतरफा संघर्ष विराम का ऐलान किया है और
बातचीत के लिए आया. बाकी आने के लिए बोला है, हम प्रतिनिधि बातचीत किए Modeliities
को लेकर. जितने दिन बातचीत हो रहा था 5 जून, 9 जून और 28 जून. तीन बार बैठे हैं दो
मंत्रियों के साथ हम लोग. ये विजय रामाराव जो सीबीआई चीफ था उनके साथ हम लोग.
जब हम निकलते हैं उनसे मिलने के लिए secretariat को तभी एक encounter होता है. कोना
बोलकर पुलिस encounter करती है यानी कि बातचीत को विफल करने के लिए. फिर भी वो लोग
बोले के 28 जुलाई को हम आएंगे. हम खुद आएंगे आपसे बातचीत के लिए. 28 जून से लेकर 19
जुलाई तक इतने encounter किए हैं. 2 जुलाई को स्टेट कमेटी मेंबर पद्मा जो जंगल से
निकल कर बातचीत के लिए ही आ रहा था, उनको encounter में मार डाले हैं. तो तब 19
जुलाई को ऐलान किए की हम ceasefire withdraw कर रहे हैं. अब हम बातचीत नहीं करेंगे.
ये पहला experience है हमारा.
दूसरी बार कांग्रेस सरकार थोड़ा आगे गई है कि जो combing operations बंद किय़ा है,
अपने जो paramilitary forces को भेजा था, उनको वापस बैरेक्स में लिए हैं 14 मई को.
और जून 13 को पार्टी ने ceasefire ऐलान किया है सुबह तो शाम को सरकार ने भी
ceasefire ऐलान किया. जुलाई 13 को पार्टी के उपर प्रतिबंध निकाल लिया है.
बात के लिए बुलाया उन्होंने अक्टूबर में. मई 2004 से लेकर जनवरी 2005 तक दोनों तरफ
से कोई प्राणहानि नहीं हुई. यानी मैं ये इसीलिए कह रहा हूं कि अगर सरकार चाहे तो
encounter नहीं होने की स्थिति होती है. अगर encounter नहीं हुए तो उनके तरफ से भी
कोई नहीं मारता है. दो बार आंध्र में हुई ये स्थिति. 19 जनवरी से लेकर 19 सितंबर तक
9 महीने के लिए चेन्ना रेड्डी की सरकार में ना एक encounter था ना कोई बदला था. कोई
प्राणहानि ही नहीं.
फिर 2004 में राजशेखर रेड्डी के जमाने में मई से लेकर जनवरी 2005 तक भी दोनों तरफ
से कोई प्राणहानि नहीं हुई. इक्का दुक्का दसरी बात है, in general. Talks हुआ है,
land reform के बारे में, democratic rights के बारे में, rule of law के बारे में.
Detailed debates हुई हैं, records है आज. Land reforms के बारे में तो पूरे दो दिन
बात किए हैं. हम इस तरफ आठ लोग और उस तरफ आठ, चार ministers और चार cabinet rank
कांग्रेस पार्टी के नेता. बड़े लोग थे वो. चेन्ना रेड्डी human resource center पर.
ये state level काम था जो पूरा देश देखा है उसको.
फिर 8 जनवरी से encounter शुरु किया है. दोबारा आने वाले थे talks के लिए तो जनवरी
में encounter शुरु किए हैं. अब तक तो हज़ारों लोगों को मार डाला है. तो जनवरी 17
को कहा कि हम cease fire withdraw कर रहे हैं.
सरकार जिम्मा ले, मैं जिम्मा लूंगा
दोनों ही समय में सरकार का असहयोग था. कारण भी है क्योंकि वो ना land
reforms कर सकते हैं, ना democratic rights restore कर सकते हैं. सबसे ज्यादा वो
development program जो लेना चाहते हैं वो world bank development program है.
इसीलिए कहता हूं कि विकास की बात.
अगर आप world bank development program लागू करना चाहता है तो अगर ये सिक्के का
दूसरा पहलू है तो परेशानी है. यानी अमरीका में भी वो ही हुआ है और यहां भी वही
होगा. होगा ये ही. देखिए आप, ये मानसून के बाद इतना repression होगा कि blood shed
होगा. ये बात नहीं कि हम चाहते हैं, सरकार चाहती है. सरकार भी हम ये नहीं कह रहे
हैं कि blood shed चाहती है. सरकार चाहती है कि अमरीकी साम्राज्यवाद आए. विश्व बैंक
जो कहा वो करना चाहता है, अमरीका जो कहा वो करना चाहता है. हम उसको नहीं मानते हैं
इसीलिए वो हमको मारते हैं. बात ये है.
आप वहां नहीं जा रहे है आप मारने के बात ही कर रहे हैं, आप मारना मरने के बात कर
रहे हैं आप.क्यों हो रहा है ये. इसीलिए मैंने लालगढ़ के बारे में पूछा, कि आप जो
जिंदल को 5000 एकड़ जमीन लालगढ़ में दिए हैं, जंगलमहल में दिए हैं, वो वापस लेते
हैं क्या? मैं जिम्मेदारी लूंगा हिंसा के बारे में. छत्तीसगढ़ में जितने भी MOU’s
आप साइन किए हैं, वो वापस लेंगे? आदिवासी को जल, जंगल, जमीन देंगे आप? मैं
जिम्मेदारी लूंगा.
इसीलिए मेरा मुद्दा जो है सारांश का मुद्दा है. मुद्दा जो है वो विकास का मुद्दा
है. मुद्दा हिंसा-अहिंसा का नहीं है. It’s a non issue. हल करने वाले हाथों में अगर
जमीन है तो संघर्ष का बात कहां है? जनता के हाथ में अगर सरकार आए तो संघर्ष की बात
कहां है? आज तक इतिहास में कौन दिया है राज्य अगर हथियार नहीं उठाए तो?
Class society में एक समय वोटिंग के दिन आप वोट से जीतते हैं, लेकिन पाँच साल तो
हथियार से जीतते हैं आप. और सरकार के पास जितने हथियार है उतने माओवादियों के पास
कहां हैं. जितने भी हों. Compare कीजिए. पूरे साधन आपके हाथ में हैं. तो इसीलिए तो
violence is a non issue. Issue is development. Issue is खाना, कपड़ा, मकान और
रोटी. ये सब लोगों को मिलना चाहिए. क्या ये सरकार चाहती है?
09.11.2009,
01.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | neha indore | | | | I can't understand the dual mentality of those people who are instantly argued against the Marxism and Maoist. These people are generally unaware from the basics of Marxism, they only see the surface affairs which are actually the result of their anger which is due to wrong policies against them.
People clap on the dialogues recited by the hero against the zamindar(high living people)in Hindi movie but these people cant see that what is happening in movie is same with those people, then why will not victims move on to the way same as Hindi movie hero does. why we consider their way of taking revenge as terrorism?
First of all we have to develop a heart to understand the feeling of others.and i m sure that government by Marxism will never follow blindly to others. At least they know what are the fundamental needs of common people, they know that only food can fulfill the need of hunger not the nuclear reactor . | | | | | |
| | राजीव रंजन प्रसाद बस्तर | | | | नक्सलवाद दो धडों पर अपने जमीन तैयार कर रहा है- पहला जहाँ हथियार बंद लोग गोलबंद हो रहे हैं और दूसरा जहाँ बुद्धिजीविता रेहन है। इन लोगों के पास तर्क की तो कोई कमी है ही नहीं. कम पड़ जाये तो कलकता से कभी कोई देवी जी उधार में देती हैं तो कभी अंग्रेजी की लेखिका "इश्यु" को ग्लैमराईज कर जाती हैं।
सरकारें क्या चाहती हैं क्या उससे पहले ये नहीं कि ये माओवादी कैसी सरकार देंगे? क्या प्रचंड जैसी सरकार? या चीन जैसी सरकार? या रूस जैसी जिसके अब टुकडे गिनने मुश्किल हैं? आज ये अभिव्यक्तियों का ढ़िंढोरा पीट रहे हैं, कल तो ये चीन हो जायेंगे और अभिव्यक्ति का यही लाल सलाम कर देंगे। तिब्बत का दर्द देखिये, गहराईयों में इनके मनसूबे समझने में सहायता मिलती हैं।
आतंकवाद वह भी विचारधारा के नाम पर...क्षम्य नहीं है। | | | | | |
| | purushottam kumar singh (purushottamlkr@gmail.com) patna | | | | इस आलेख के पहले मैंने कानू सान्यान का साक्षात्कार पढ़ा था. मैं दावे के साथ कह सकता हूं की नक्सलवाद के बारे में जानने का जिज्ञासा रखने वालों के लिए इस से अच्छी information नहीं मिल सकती.
पुतुल जी को मेरी तरफ से शुभकामनाएं. आगे भी इस तरह के साक्षात्कार का इंतजार रहेगा. धन्यवाद. | | | | | |
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