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छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन से बातचीत
संवाद
हिंसा
बुनियादी तौर पर ग़लत है
छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन
से
आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
देश में सर्वाधिक चर्चित पुलिस अधिकारियों
में शुमार किये जाने वाले छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन
मानते हैं कि बस्तर या देश के दूसरे हिस्सों में माओवादी बनाम राज्य का संघर्ष तभी
खत्म हो सकता है, जब हिंसा को एकमात्र रास्ता मानने वाले लोगों की बुनियादी समझ में
बदलाव आय़े. उनका मानना है कि माओवादियों से सैद्धांतिक रुप से लड़ना होगा और उनकी
हिंसा से भी. लेकिन विश्वरंजन यह भी स्वीकारते हैं कि जब तक आर्थिक विषमता को दूर
नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे चरमपंथी आंदोलन समाज में अपनी जगह बनाते रहेंगे. यहां
पेश है, उनसे की गयी बातचीत.
•
एक
कविता है- हिचकॉक और ज़िंदगी. एक समय था/ जब मुझे हिचकॉक द्वारा बनाया गया सिनेमा
देखना/ अच्छा लगता था/ सिनेमा क्या ख़ून ही ख़ून/ चीख ही चीख/ एक बंदूक यहां / एक
चाकू वहां / सिर पर लाठी का एक प्रहार/ और आसमान का लाल ही होते जाना सहसा/ कितना
वीभत्स और/ कितना मज़ेदार/ आज नहीं देखता हूं मैं हिचकॉक की फ़िल्म/ आज हम सब ख़ुद
हिचकॉक के पात्र बनते जा रहे हैं/ वीभत्स और मज़ेदार.
अपनी इस कविता को आप किस तरह analyze करेंगे.
देखिए, कविता को तो हम कभी analyze नहीं करते हैं, लेकिन आप इसको इस तरह
से देखिए कि जो संवेदनशीलता है हिंसा के प्रति हमारी इतनी भोथरी होती जा रही है
समाज की, कि बहुत सारी चीज़ें हमें उद्वेलित ही नहीं करती है. हम खुद हिंसा में
कहीं ना कहीं डूबते नज़र आ रहे हैं. और जो हमारी संवेदना है जीवन के प्रति या
ज़िंदगी के प्रति, वो भोथरी हो रही है. हम जब एक कटा हुआ सिर देखते हैं, बस्तर के
जंगलों में, कीड़े लगते हुए. वो मेर सिपाही का भी हो सकता है, किसी और का भी हो सकता
है लेकिन पुलिस को जाना ही पड़ता है body लाने के लिए. हो सकता है 48 घंटे के बाद
हम पहुँच रहे हैं और उस समय हम उसको अपने अंदर उतार भी नहीं पाते हैं. हम सब कहीं न
कहीं हिंसा से इतने जुड़े हैं कि खुद हिचकॉक की फ़िल्म के पात्र बनते जा रहे हैं.
जबकि हिचकॉक के पात्र आपको उद्वेलित करने के लिए, उस तरह के पात्र बनाए गये थे.
हिचकॉक की फ़िल्म आपको कितनी भी मज़ेदार लगे, आपको एक स्तर पर इतनी उद्वेलित करती
थी कि आप हिंसा के खिलाफ खड़े होते थे. आज हिंसा इस कदर फैल रही है समाज में, कि जो
shock , जो झटका हमें मिलना चाहिए था, आज समाज में वो नहीं मिल रहा है. आज समाज में
वो चीज़ नहीं आ रही है, समाज उसको एक सामान्य-सी हक़ीकत मानके बढ़ा चला जा रहा है.
ये सोच था, ये महसूसता था, जब ये कविता लिखी गई थी.
अब उसको analyze हम नहीं करते हैं. कविता को क्या analyze करना है. कविता अगर
संप्रेषित होगी तो संप्रेषित होगी, नहीं होगी तो कचरे में डालने के लायक है.
कचरापट्टी में. जैसे हम कभी मानते ही नहीं है कि किसी आदमी को यह हक है कि जब वह
लिख रहा हैं कि वो सोचे कि वो महान कवि है, या हम महान कवि हैं. वो समय निर्णय लेता
है. 300 साल बाद आपकी कविता पढ़ी जा रही है तो आप बड़े कवि, नहीं तो आप दो कौड़ी के
नहीं. किसी के बोलने से कोई बड़े कवि, छोटे कवि नहीं होता है. 300 साल के बाद वो
समय निर्णय कर देगा, कि आप बड़े कवि हैं या कवि हैं, कि कचरा पट्टी में जाने योग्य
हैं. आज के कोई आलोचक को ये मैं अधिकार नहीं देता हूं कि वो ये निर्णय ले.
•
राज्य की हिंसा का जो माहौल है, उसके बरक्स इस कविता को कैसें देखेंगे ?
राज्य में जो हिंसा का माहौल है. देखिए ऐसा है कि हिंसा, जब हिंसा जो
है, बुनियादी तौर पर एक आदमी की, एक मनुष्य का, किसी भी स्तर पर मुश्तक होने की
कहानी है. और ये कहानी राज्य में ही क्यों, ये करीब-करीब विश्व स्तर पर फैलती जा
रही है. बहुत दिनों से, बहुत दिनों से ऐसा होता आ रहा है. इधर करीब मैं समझता हूं
कि सबसे बड़ा झटका जो समाज को आधुनिक युग में मिला, वो विश्वयुद्घों में जो हिंसा
हुई. जिसने बहुत हद तक आदमी को अंदर से तोड़ा और उसकी संवेदनशीलता, हिंसा के प्रति
जो होनी चाहिए थी वो, उसके बाद लड़ाइयां भी हो रही हैं दुनिया में और लोग मारे जा
रहे हैं.
ये दो व्यक्ति के बीच में लड़ाई हो जाए और किसी ने चाकू चला दिया, वो नहीं
है. एक सामूहिक स्तर पर अगर हिंसा हो रही है और हम उसको react नहीं कर रहे हैं या
रोकने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, तो हिंसा फैलेगी. और आदमी और भोथरा होगा, उसकी
संवेदनशीलता और भोथरी होगी. और इस संवेदनशीलता को, मेरा मानना है कि fractional,
fractional मतलब छोट-छोटे बंटवारे, ग्रुप में बैठ कर के, यहां चिल्ला के, वहां पर
हल्ला मचा के, इसको रोका नहीं जा सकता है. इसके लिए एक बहुत ही व्यापक, बहुत ही
व्यापक जिससे पूरे समाज का संबंध सम्मिलित हो, वहां पर, जिसको कहा जाता है सामाजिक
पुनर्जागरण, इसके खिलाफ, इस तरह की मुहिम बनानी पड़ेगी. नहीं तो जहां हिंसा होगी,
वहां प्रतिहिंसा भी होगी, इसको कोई रोक नहीं सकता है.
आपको बहुत सारे बुनियादी सवालों को उठाना पड़ेगा. हम कैसा समाज चाहते हैं? हम हिंसा
को कितनी मान्यता दे सकते हैं? या कितनी मान्यता नहीं दे सकते हैं? ये हमारे एक
आदमी या दो आदमी के सोचने की बात नहीं है. ये धीरे-धीरे समाज की हर इकाई को महसूस
करना पड़ेगा. नहीं तो समाज धीरे-धीरे विकृत होता चला जाएगा. कोई उसको रोक नहीं सकता
है. हिंसा पर, जैसे गांधीजी ने बोला था कि हिंसा किसी कीमत पर नहीं. हिसा किसी कीमत
पर नहीं, ये निश्चय एक आदमी नहीं ले सकता है. ये समाज को लेना पड़ेगा.
आज तक किसी स्तर पर आप अगर ये मानते हैं कि हिंसा लाज़मी है तो प्रतिहिंसा को आप
रोक नहीं सकते हैं. और जब तक हिंसा-प्रतिहिंसा की लड़ाई चलती रहेगी, तब तक आदमी और
आदमी की संवेदशीलता और भोथरी होगी, वो और हिचकॉक का पात्र बनता जाएगा.
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•
आपने जो हिंसा की बात कही, हिंसा और प्रतिहिंसा की बात कही. तो आपको ऐसा
लगता है कि जो democracy है, जो लोकतंत्र है वो ज्यादा हिंसक है?
देखिए वो तो, वो मैं समझ गया कि आपका प्रश्न क्या है. प्रश्न ये है कि
गणतांत्रिक institutions हैं, वो ज्यादा हिंसात्मक हैं या वो समूह जो हिंसा को एक
ज़रूरी सच के रूप में मानता है. तो ज़ाहिर है कि जो ग्रुप या जो समूह या जो
ideology , हिंसा को एक ज़रूरी सच के रूप में मानता हैं वो बुनियादी तौर पर हिंसा
का पक्षधर है.
Democracy जहां भी हो वहां पर भी हिंसाएं हो सकती हैं लेकिन democracy की जो या जो
गणतांत्रिक व्यवस्था है, उसकी सबसे बड़ी मज़बूती है, वो साथ-साथ एक बड़ा space दे
देता हैं, बातचीत का, discussion का, debate का. और उस discussion और debate में
बहुत सारे लोग खड़े हो सकते हैं उस हिंसा के खिलाफ. एक ग्रुप, एक समूह, एक ideology
जो इसकी छूट नहीं देता है कि कोई उसका विरोध कर पाए, उसके खिलाफ बोल पाए.
उसके बरक्स किसी भी देश की democratic institution या democratic system, ज़ाहिर है
कम हिंसात्मक होगी क्योंकि उसको रोकने वाले बहुत लोग रहेंगे. अगर आप maoist की बात
कीजिए और अगर आपने माओ को पढ़ा हो तो आप ये पाइएगा कि माओ हिंसा को एक ज़रूरी
हथियार मानते थे. और जब आप उसे एक ज़रूरी हथियार मानिएगा और अपने अग्रिम हथियार
मानिएगा तब आप ज्यादा हिंसक होंगे. तब आप कोई भी आपका विरोध करता है तो उसके प्रति
भी आपका रुख हिंसात्मक हो जाएगा.
हिंसा को रोकने के लिए अगर आप बंदूक उठा रहे हैं,
वो एक स्थिति होगी और आप अपने ही ग्रुप में कोई आदमी आपको बताने की कोशिश कर रहा है
कि आप गलत है, और उसको आप हिंसात्मक तरीके से खत्म कर दीजिए वो दूसरी बात हो जाएगी.
तब क्या होगा कि हम एक ऐसे समाज और सभ्यता की ओर बढ़ जाएंगे जो न सिर्फ हिंसा पर
आधारित है बल्कि बिल्कुल totalitarian है.
चीन का इतिहास, क्योंकि अब बहुत सारे archived documents बाहर आने लगे हैं, दोनों
जगह से, रूस से भी और आपको मालूम होगा कि माओ के शुरुआती दिनों में रूस के साथ बहुत
सारे संबंध थे. स्टालिन के साथ बहुत सारे संबंध थे. जब चीन आज़ाद नहीं हुआ था. उनको
अगर देखिएगा, आज अगर पढ़िएगा तो ये देखिएगा कि माओ में हिंसा के प्रति लेश मात्र की
घृणा भी नहीं थी. वो उसको इतना ज़रूरी चीज़ मानते थे.
एक उसके दोस्त की डाय़री, जो की उसके अंतरंग आए हैं, जो की एक क्म्यूनिस्ट ही था,
उसका supporter भी था बहुत दिन तक. उसने लिखा है कि शुरुआती दिनों तक माओ ये कहते
थे कि destruction and war is better than peace. वो बोलते हैं कि दुनिया के इतिहास
में जो सबसे attractive part होता है, वो war की history होती है ना कि peace की
history होती है. तो अगर आपकी किसी भी ideology में इस तरह की हिंसा की प्राथमिकता
हो जाएगी तो वो ज़ाहिर है कि democracy में जिस तरह की हिंसा हो सकती है,
controlled या limited हिंसा हो सकती है, उससे वो ज्यादा खतरनाक है.
मैं बिल्कुल मानता हूं कि सिर्फ यहीं नहीं, विश्व इतिहास इसका गवाह है कि democracy
में democratic हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाने की और उसे रोकने की democratic society
में ज्यादा क्षमता है. न कि एक totalitarian system में.
•
जिस democracy की आप बात कर रहे हैं लगातार, तो क्या democracy में कोई
ऐसा space बचा हुआ है जहां आम आदमी ठीक ठीक सांस ले सके?
आम आदमी ठीक-ठीक सांस ले सके, वो ले ही रहा है. आज तो सरकारें बदल रही
हैं, सरकारों को कौन बदलता है? आम आदमी ही बदलता है.
•
जिसके पास 5 करोड़ रुपये हो वो बदल सकता है.
नहीं बदल सकता, लेकिन अगर आप एक आम आदमी हैं तो आप क्यों उसके साथ बिकने
को तैयार हैं? आप बराबर आरोप दूसरे पर क्यों मढ़ते हैं? आप अपने ज़मीर में झांक कर
क्यों नहीं देखते हैं कि आप क्यों बिकने को तैयार हैं ? क्योंकि ये ही भारत में ये
सिद्ध हुआ है कि एक emergency के बाद पूरे अपने संसाधनों के बावजूद एक बहुत मज़बूत
प्रधानमंत्री हार गया और उसकी पार्टी हार गई. उसी आम आदमी ने उसको खारिज कर दिया.
आप ये क्यों भूलते हैं कि बहुत सारे राज्यों में, जो पावर में पार्टी थी और अपने
बहुत मज़बूत संसाधनों के बाद, बहुत मामूली लोगों से हारी. उनके जो बड़े शीर्ष नेता
थे वो हार गए.
समस्या ये नहीं है कि आम आदमी जवाब नहीं दे सकता है. समस्या ये है कि हम और आप जो
चुनाव के माध्यम है या जो discussions के माध्यम हैं या जो debates के माध्यम हैं,
उसको कितनी मजबूती से और कितनी अच्छी तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं? और ये सीख, ये
education भी एक democracy दे देती है. इसमें समय लग सकता है लेकिन democracy ये
education दे देती है कि आपको आपके अधिकारों का इस्तेमाल सजगता और सही तरीके से
करना है. नहीं तो आप घाटे में रहिएगा. जबकि जहां-जहां भी totalitarian system आए
हैं, वहां पर उनको mid course correction करने की भी गुंजाइश नहीं थी क्योंकि जो
आदमी था और जो समूह था, वो किसी की भी बात सुनने को तैयार नहीं था और जो आदमी उसको
ये बताने की कोशिश करता था कि आप गलत रास्ते पर जा रहे हैं, वो चाहे जेल या मानसिक
प्रताड़ना गृह या पागलखाना या Siberia या Gulag या desert में कैद कर दिया जाता था.
ये फर्क था.
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क्या हम भारत में ऐसी व्यवस्था चाहेंगे, जहां आप यदि उस पार्टी के होने
के बाद भी, उससे किसी बात पर एतराज़ रखने लगे तो आपको किसी पागलखाने में भर्ती कर
दिया जाये? बुनियादी प्रश्न ये है. और ये क्या हिंसा नहीं हुई कि आप जो कि सही
सलामत हैं, उनको सिर्फ इसीलिए बंद कर दिया जाए कि आप मानसिक रूप से असंतुलित हो गये
हैं.
एक देश में, जब वहां पर हाइड्रोजन बम बनाने वाले और जो हाइड्रोजन बम को discoverer
हैं, उन्होंने जब ये एतराज उठाया कि ये बहुत घातक हथियार हैं और इसके इस्तेमाल पर
रोक लगानी चाहिए तो उन्हें सिर्फ इसलिए पागलखाना में भर्ती कर दिया गया क्योंकि
वहां का राज्य सोचता था कि इतने बड़े आदमी को और हम किसी और कारण से अलग नहीं कर
सकते हैं. अब कहिए, आप क्या सोचते हैं कि क्या ये हिंसा नहीं ?
•
लेकिन क्या इन हिंसाओं को नाजायज़ ठहरा के आप कोई space लेना चाहते हैं,
अपनी हिंसा के लिए?
नहीं, space तो तब होगा ना, जब आप पहले ये मानिएगा कि हिंसा बुनियादी
तौर पर गलत है. जब आप ये नहीं मानते कि हिंसा गलत है और आप हिंसात्मक तरीके से एक
लंबी लड़ाई लड़ने पर, एक protracted war लड़ने पर तुले हुए हैं तो वो space कहां से
मिलेगा आपको? जब आपने एक लड़ाई लड़ने के लिए बंदूक उठा ही ली है तो उसको रोकने की
कोशिश की ही जाएगी.
•
इसके लिए बस्तर में एक युद्ध की तैयारी चल रही है.
बस्तर में ही नहीं, हिंदुस्तान में बहुत जगह चल रही है. बस्तर में क्यों
चल रही है, झारखंड में भी चल रही है, महाराष्ट्र में भी चलेगी. जहां पर आप ये
बोलिएगा कि हम सिर्फ युद्ध के जरिए ही और हिंसा के जरिए ही काबिज़ होंगे शासन पर,
वहां पर हर democratic राज्य पूरे विश्व में, कोई भी हो, वो उससे लड़ने को तैयार
होगा.
•
इसका कोई अंत देखते हैं आप ?
अंत है. अंत है कि जो आदमी इसे अपनी बुनियादी समझ मानता है कि हिंसा के
अलावा कोई चारा नहीं है, वो अपनी समझ में बदलाव आए कि दुनिया में हिंसा के अलावा
बहुत रास्ते हैं.
•
आखिर वो कौन से कारण हैं कि 1967 में नक्सलबाड़ी शुरु होता है, 52 दिन
में खत्म हो जाता है, साल दो साल भटकते फिरते रहता है और आखिर फिर इतने बड़े रूप
में, जिसको आप रेड कॉरिडोर कहते हैं. वो कौन सी बात है ?
कोई कारण नहीं है. आपको मैं बता देता हूं क्या है. 1967 में नक्सलवाद
जिस स्वरूप में आया था, उसको बहुत लोग नहीं मानते, लेकिन मैं उसको एक रोमांटिक
माओवाद बोलता हूं. माओ खुद इसको रोमांटिक बोले हुये हैं. और इसीलिए ये तीसरा ग्रुप
चारू मजूमदार की पार्टी के, चीन जा रहे थे बर्मा के Through, उनको रगेद के वापस कर
दिया गया था. उसके बहुत से कारण थे. कुछ personality कारण थे, personality के कारण
थे चारु मजूमदार के. वो उनके ज़माने में ही टूटने लगा और उनके ज़माने में ही बहुत
सारे टुकड़ों में बंट गया था नक्सलबाड़ी movement.
इसीलिए आज विकास भट्टाचार्य बोलते हैं कि हम नक्सली हैं और वो maoist हैं. हम
नक्सली हैं तो उनको क्यों बोलते हैं, नक्सली तो हम हैं original नक्सली. क्योंकि वो
अपने आप को सबसे बड़ा टुकड़ा मानते हैं, जो उसमें से छिटककर अलग हुआ था. Present जो
लोग हिंसा में उसके बाद भी उतरे रहे और मानते रहे जिसमें PWG था, MCC था, MCC कभी
भी नक्सल movement का part नहीं था, उस ज़माने में part नहीं था. और Party Unity
था. इन लोगों का शुरु से ही ये मानना था कि नक्सलबाड़ी movement दिशाहीन था, इसीलिए
टूटा और इनका शुरु से मानना था कि एकमात्र रास्ता जो है, वो है हिंसा का रास्ता. ये
बाद में एक हो गए 2000 में.
इनकी जो सोच है, वो करीब-करीब एक है और tactics में तीनों की कुछ-कुछ बुनियादी फर्क
थी जो कि उन्होंने पाट लिया है. लेकिन CPI (Maoist) ये मानता है कि आज हिंसा के
माध्यम से ही औऱ शासन में काबिज़ होकर ही जैसे माओ काबिज़ हुए थे, आप कोई change
कोई बदलाव ला सकते हैं. जहां रहा आपका दूसरा सवाल कि ये फिर से कैसे पनप गया ? तो
ये भी ज़ाहिर है कि जब भी और जहां भी समाज में, आर्थिक या सामाजिक विषमताएं रहेंगी,
वहां पर कोई भी ideology, जो एक सरल राह दिखाता है. और ना समाज सरल है, समाज बहुत
complicated है. न इतिहास सरल है लेकिन जो सरल रास्ता दिखाता है, वो अपनी जड़ें
फैलाने लगता है.
इसीलिए कोई भी मुहिम लंबे समय तक इस तरह की किसी भी ideology के खिलाफ खड़ी नहीं हो
सकती है. जो साथ-साथ उस इलाके की सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को address नहीं करे.
उसको दूर करने की कोशिश नहीं करेगी. एक development का stage वो आता है कि जब आप
इतने develop हो जाते है कि फिर इस तरह की ideologies roots नहीं जमा पाती हैं. ये
सबसे पहले Herbert Marcuse जो कि खुद Marxist थे, ने अमरीका में देखा कि अमरीका में
जो मार्क्सवादी या माओवादी जो संगठन हैं, अभी वहां भी हैं छोटे छोटे, वो बिल्कुल
पैर नहीं जमा सकते क्योंकि यहां का आर्थिक ढांचा ही बदल गया है. और ऐसा नहीं है कि
वहां पर अमीर और गरीब में फर्क नहीं है. लेकिन जो सबसे गरीब व्यक्ति है, वो भी
इतना, उसकी भी हालत इतनी अच्छी है बहुत-सी जगहों से, कि वो इसके बारे में सोचता ही
नहीं है कि वो सामने वाला इतना क्यों कमाता है. वो अपनी जिंदजी जीता है, आराम से
जीता है. अगर हम उस स्तर में आर्थिक विकास कर देते हैं, बार-बार कभी भी इस तरह की
ideology जन्म नहीं ले पाती है.
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इसलिए Herbert Marcuse ने कहा कि Marxism या communism जो है, उसको वैज्ञानिक नहीं
समझ कर उसे ethical , नैतिक movement समझना चाहिए, जहां पर ये नैतिक मांग होनी
चाहिए कि लोग बराबरी पर हैं. और उसने ये realize किया कि ये नैतिक मांग को इनको
दिलायेगा कौन, इस नैतिक मांग को ? क्योंकि ना वहां का लेबर इसके लिए तैयार होगा, ना
किसान. तो उनको लगा कि हम students के माध्यम से इसको ला सकते हैं.
आपको याद होगा कि 60 के दशक में अमरीका में major movements चला था. बल्कि
कैलिफोर्निया से लेकर सब जगह जहां पर Student आगे आए थे, एक समतावादी समाज के लिए.
लेकिन वो इसीलिए फेल कर गया क्योंकि Student की जिंदगी विद्यार्थी के बतौर बहुत कम
होती है. वो इतनी कम होती है कि वो उसके माध्यम से कई बहुत ज्यादा कोई आंदोलन नहीं
उठा सकता है. फ्रांस में भी Herbert Marcuse बहुत popular हो गए थे.
ज़ाहिर बात ये है कि अगर आप आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को Address करने लगते हैं
तो इस तरह की जो भी extremist movements हैं, वो develop नहीं कर सकते हैं. और कोई
भी नीति जो एक बुनियादी स्तर पर इस समस्या से जूझने की कोशिश करेगा, उसको ये चीज
लेकर चलना पड़ेगा. इसीलिए ये लड़ाई, ये युद्ध, ये दूसरे युद्धों से अलग इसलिए रहेगा
क्योंकि ये युद्ध किसी देश से नहीं लड़ा जा रहा है. ये युद्ध एक ideology से लड़ा
जा रहा है, जो कि बहुत सारी socio-economic reasons के कारण भी उनको सहारा मिलता है
बढ़ने में. तो एक स्तर पर आप एक ideology से लड़िएगा और दूसरी स्तर पर आप उनकी
हिंसा को आप रोकने की कोशिश कीजिएगा. और तीसरे स्तर पर आपको आर्थिक, सामाजिक
विषमताओं को उस इलाके में, जहां पर वो पनप रही है, दूर करने की कोशिश करनी पड़ेगी.
ये तीनों जब तक एक साथ नहीं होगा तब तक आपको हो सकता है, आपको छिटफूट लाभ हो जाए.
हो सकता है आपको छुटपुट जैसे 1967 -72 के बीच में आपने नक्सलबाड़ी movement को खत्म
कर दिया था. वो खत्म हो जाए लेकिन फिर से वो जोर पकड़ेगा, अगर आप socio economic
conditions को ठीक-ठीक नहीं रखेंगे.
•
मैं पिछले सवाल पर लौटूं, जहां आपने ये कहा कि democracy में कम से कम
ये space तो है कि आप अपनी बात कह सकें. सलवा जुड़ूम को लेकर बार-बार ये बात कही जा
रही है कि जो सलवा जुडूम के साथ नहीं हैं वो नक्सलियों के साथ हैं.
हम polemics में नहीं जाना चाहते क्योंकि ये polemical statement है.
Polemical statement माओवादी भी बोल रहे हैं और बहुत लोग बोल रहे हैं.
सलवा जुड़ूम के साथ बहुत लोग नहीं हैं लेकिन न उनको जेल में डाला गया है, न उनको
बोलने से कोई मनाही की गई है. ये उसी तरह का statement है, जब कोई आदमी बोलता है कि
हम जीत के रहेंगे. जीत के रहेंगे बोलने और जीतने में बहुत लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती
है. वैसे ही उड़ाया जाता है कि हम तुरंत इस तारीख तक भारत में अपना लाल झंडा गाड़
देंगे. वो सब polemics होता है. Polemical statement को तथ्यात्मक statement में
तब्दील नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे हम जो सामाजिक, जो समाज कहा जाता है, वो
social science कहा जाता है, उसके साथ खिलवाड़ करते हैं. तब हम एक स्तर पर उतर रहे
हैं, जहां पर हम एक जिंदाबाद-जिंदाबाद वाला चीज होता है ना, उस तरह की चीज़ कर रहे
हैं कुछ. एक चीख, एक चिल्लाहट खाली पैदा कर रहे हैं, सोच पैदा नहीं कर रहे हैं.
सलवा जुड़ूम को बहुत लोग, बहुत तरीके से देखते हैं. मैंने ये सिद्ध किया था बर्कले
(विश्वविद्यालय) में भी, इसका कोई प्रश्न नहीं कर पाए थे क्योंकि वहां पर प्रश्न
दूसरा होने लगा था. सलवा जुड़ूम पर एक प्रश्न किसी ने नहीं किया. वो जितने वहां पर
पोस्टर लगे हुए थे, वो बिनायक सेन को लेकर लगे हुए थे. एक प्रश्न नहीं किया किसी ने
भी. तो प्रश्न ये है कि अगर आप CPI Maoist के पोलित ब्यूरो के documents देखिए तो
सलवा जुड़ूम पर खुद उन्होंने क्या-क्या कहा है, ये आपको मालूम हो जाएगा. और कब
उन्होंने decide किया कि इसके खिलाफ देशव्यापी movement चलाया जाए, ये भी आपको
मालूम हो जाएगा. और आपको ये भी मालूम हो जाएगा कि इस decision के पंद्रह दिन बाद
पहला study team invite होता है. उसके पहले वहां कोई study team क्यों नहीं जा रहा
था? कोई क्यों नहीं उसके बारे में बात कर रहा था? और क्यों ऐसा हुआ है कि बहुत-सी
study team जो अंदर घुसने की कोशिश की, उनको maoist leaders ने नकार दिया है कि हम
आपसे नहीं मिल सकते. क्यों कुछ से मिला जाए और कुछ से नहीं मिला जाए? और कैसे उसको
फैलाएंगे, ये खुद उनके document में हैं. और बहुत जल्दी एक किताब मेरी आनेवाली है,
जिसमें ये टॉपिक बनकर आएगा. ये हमारे पास क्यों रहेगा, ये एक public document है.
Public के पास रहना चाहिए.
•
public को तो देखने की छूट नहीं है. राज्य के जितने कानून हैं,
जनसुरक्षा कानून............
क्यों नहीं छूट है? हम तो किताब में डाल रहे हैं.
•
नहीं. आप तो डाल सकते हैं लेकिन......
नहीं वो छूट तो करने दीजिए न. हम तो public कर रहे हैं ना. क्योंकि वो
एक public document ऐसे है कि ये एक seized document है. इसे पुलिस ने अपना केस
आधार बनाया है, इसीलिए वो seized document है. ऐसे भी वो जो accused है, उसके पास
पहुँच जाएगा. इसीलिए वो कोई secret document नहीं है. उनके लिए वो कोई secret
document हो सकता था क्योंकि वो कभी सोचे नहीं थे कि ये दूसरों के पास पहुँच जाएगा.
क्योंकि अब जब वो हासिल हो गई है तो वो documents हम लाएंगे.
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बहुत से जो माओवाद के
documents है. जिसके लिए गुड्सा उसेंडी ने हमें पहले भी challenge किया था कि हमने
इसे secret इसीलिए रखा था कि आपके जैसे लोग नहीं पढ़ें. लेकिन आपके पास ये पहुँच ही
गया है तो आप उसे छाप दीजिए. तो हम छाप देंगे. लोग देखें कि उनकी असल सोच और मीडिया
में जो प्रचारित करते हैं, उसमें कितना फर्क है.
•
सलवा जुड़ूम और SPO इसको लेकर लगातार विवाद होते रहे हैं...
SPO’s पर विवाद होंगे हीं क्योंकि वो जानते हैं, नक्सली जानते हैं कि
SPOs जो हैं, उनसे ज्यादा घातक उनके लिए कोई नहीं है.
•
उनके खिलाफ तो आपने खुद कार्रवाई की है, बहुत सारे FIR lodge करवाए हैं.
Doesn’t matter. वो FIR तो हमको इसीलिए lodge करना पड़ रहा है कि आप
complaint करते हैं. और ऐसी जगह से आप पाँच बयान निकाल देते हैं. लेकिन मैं देखना
चाहूंगा कि कोर्ट में कितने लोगों को सज़ा मिलती है.
ये तो बहुत आसान है, क्योंकि मुझे मालूम है कि दबाव में वहां का आदिवासी झूठ बोल
सकता है लेकिन दो साल के बाद जब कोर्ट में उसको वही पूछा जाएगा तो वो झूठ नहीं
बोलेगा. ये चीज़ national human right commission ने तुरंत देख लिया था क्योंकि
हमने उनको बताया था कि आप जरूर उनको प्रश्न कीजिएगा. उनको प्रश्न कीजिएगा. तो SPOs
में दो चीज़ है. SPOs में बहुत सारे surrendered naxalites हैं और बहुत सारे relief
camp के लोग है. Both of them know their hideouts. उनको, दोनों को मालूम है कि
उनके hideouts कहां है. उनको ये भी मालूम है, जो naxalities surrendered naxalites
हैं उनकी training भी उनके पास है. जो पहले बहुत सारे लोग उसमें नक्सली कमांडर थे,
उनको मालूम है, उनकी training भी उनको मालूम है, उनके नाम भी उनको मालूम है. उन लोग
कोशिश कर रहे हैं कि बार बार उनको involve किया जाए.
हर तीन चार महीने में, खासकर के जब सुप्रीम कोर्ट के पास जब सुनवाई होती है, उसके
एक महीने पहले से खूब सारे आपके पास आएंगे. तो कोशिश की जाती है कि inquiry की जाए.
लेकिन inquiry में अगर दो एक के बाद तीन चार लोग से आप एक तरह का बयान दिलवा दें तो
उसके बाद कोई चारा नहीं है कि आप मुकदमा कायम करें. और उसके बाद कोर्ट पर छोड़
दीजिए, कोर्ट में क्या होता है.
लेकिन ये हमने देखा कि जब human rights commission के लोगों को, हमने सिर्फ ये बोला
कि आप अपने interpreters रखिए एक. दो- आप प्रश्न कीजिए उनसे, उनका बयान रहेगा, तो
उसके बाद आप बहुत चीज़ पूछिए उनसे. तो उन्होंने पाया कि बहुत ज्यादा केसों में, वही
आधे घंटे के अंदर, वही आदमी बदल गया. जो उसने लिखा था उस complaint में और जो बाद
में उसने कहानी सुनाई, उसमें 180 degree का फर्क आ गया. ये कैसे हो सकता है कि कुछ
लोग बोलें कि नहीं जो हम बोल रहे हैं, उसी को आप मानिए? आप उससे आप नहीं पूछ सकते
हैं. Investigation का मतलब होता है कि truth find करने की कोशिश. आप चाह रहे हैं
कि मेरे बयान पर ही आप बंद कर दीजिए, हमने बयान दे दिया और उससे ज्यादा कुछ करने का
काम नहीं. हमने written complaint दिया था, वो ही पूरा है, उस पर आप उठा कर बंद
कीजिए उसको. ऐसा कोई investigation नहीं होता.
ऐसा क्यों है कि वहां एक एनजीओ है, जो लोग को लेकर घूमते रहता है चारों तरफ. लेकिन
वो पुलिस के पास उसको लेकर नहीं आता है. खुद क्यों लेकर नहीं आता हैं, अपने सामने
बैठे, करे. आपको थाने में विश्वास नहीं है तो आप एसपी के पास जाइए, एसपी पर विश्वास
नहीं है तो आईजी के पास जाइए, आईजी पर विश्वास नहीं है तो डीजी के पास जाइए. क्यों
नहीं आप जाना चाहते हैं?
•
डीजी के पास विश्वास नहीं है तो कोर्ट में जाइए. कोर्ट में वो जा रहे
हैं...
कोर्ट में जाइए. कोर्ट में जाने से आप सीखिएगा. कोर्ट में जाने से तो
कुछ हो नहीं जाएगा ना.
•
पामेड़, सिंगावरम, संतोषपुर सारे मामले कोर्ट में हैं फर्जी encounter
के...
फर्जी encounter. नहीं-नहीं, नहीं-नहीं, नहीं. वो, उससे कुछ नहीं होता
है. कोर्ट में मामले डाल देने से ये नहीं सिद्ध हो जाता है कि पुलिस उसमें ग़लत है.
पुलिस दोषी तब होगा, जब कोर्ट निर्णय लेगा. ये जो फैलाया जा रहा है कि कोर्ट ने
संज्ञान ले लिया, कोर्ट के पास और कोई चारा नहीं रहता है, न्याय लेने का. जैसे मेरे
पास बुलाते हैं तो हम मुकदमा तभी कायम करते हैं क्योंकि हमारे पास तब चारा नहीं
रहता है कि हम मुकदमा कायम नहीं करें. अगर उसका बयान जो मेरे सामने देगा न कि उसका
ये (अंगूठा) लगा हुआ मेरे पास पोस्ट से आयेगा. जब वो लेकर आएंगे और वो वही चीज़ बता
देगा तो मेरे पास भी कोई चारा नहीं रहेगा, उसको कायम करने का. कोर्ट के पास भी कोई
चारा नहीं रहेगा. लेकिन इसका मतलब ये कदापि नहीं है कि वो जो कह रहे हैं कि वो सही
है.
•
फर्जी मुठभेड़ के आरोप कितने सच हैं?
हम तो नहीं मानते. क्योंकि अगर हम document दिखा दें तो उनके document
में एक और चीज़ है. नक्सली document में ये साफ ज़ाहिर है कि वो भी पहले वहां से
weapon निकालने की कोशिश करते हैं. weapon निकालने का दो कारण है क्योंकि weapon
इनको मुश्किल से हासिल होता है. तो weapon छोड़ना नहीं चाहते पहला.
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दूसरा कारण है
कि weapon अगर निकाल दें तो वो ये सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि वो फर्जी
मुठभेड़ है. और 1967 से आज तक नक्सली किसी ऐसी मुठभेड़ को माना नहीं है कि ये असली
मुठबेड़ है, जिसमें उनके लोग सिर्फ हताहत हुए हैं. लेकिन उसमें वो अपनी पीठ जरूर
थपथपाए हैं, जिसमें सिर्फ पुलिस वाले हताहत हुए हैं. अब ऐसा तो कभी हुआ नहीं, हो
नहीं सकता है कि सब मुठभेड़ सीधे फर्जी हो जाए. और अगर मुठभेड़ फर्जी है, फर्जी
मुठभेड़ करने की हमारी मानसिकता है तो
ऐसा क्यों है कि इतने सारे लोग जेल में है?
उनके साथ हम क्यों नहीं फर्जी मुठभेड़ करते? हमारे संघम के आज इतने सारे लोग जेल
में क्यों है? उनके साथ हम फर्जी मुठभेड़ क्यों नहीं करते? जहां actual encounter
हो रहा है, जहां हमारे लोगों को भी चोट लगी है, वहीं पर फर्जी मुठभेड़ हो रहा है?
•
इस पूरी प्रक्रिया में केवल आदिवासी मारे जा रहे हैं.
जन, भारत का नागरिक मारा जा रहा है. आदिवासी भी भारत का नागरिक है,
हमारा पुलिसवाला भी भारत का नागरिक है और नक्सली जो मारे जा रहे हैं, वो भी भारत का
नागरिक है.
•
एक जो बात बार-बार कही जा रही है कि सरकार 2005 से लगातार encounter कर
रही है और सलवा जुड़ूम का movement चल रहा है. आज तक हथियार के नाम पर केवल भरमार
बंदूकें या उसी तरह की outdated technology की चीजें ही क्यों मिलती हैं. ?
नहीं, ऐसा नहीं है. हमारे एके-47 भी हमने पकड़े हैं. न सिर्फ पकड़े हैं
बल्कि हमको ये भी मालूम हो गया है कि कहां से लूटे हुए थे. ऐसा नहीं है. ज्यादा
इसीलिए होता है कि सामने में वो लोग ज्यादातर संघम मेम्बरों को रखते हैं. उनकी
मिलिट्री कंपनियां, जिनके पास आधुनिक हथियार हैं, वो आपको आखिरी में घेरने की कोशिश
करती है, जब भी पुलिस अपनी गोली को exhaust करने लगती है.
देखिए, बहुत सारी ऐसी लड़ाईयां हुई हैं, जिसमें एके-47 मिला है. हमने बहुत सारे
एके-47 को trace भी किया है कि कौन से थाने से लूटा हुआ है. या किस encounter में
लूटा हुआ है, जैसे हमारे लोग भी मर जाते हैं तो उनको भी लूट लेते हैं. या किस जगह
से लूटा हुआ है.
अभी हाल ही में एक encounter में हमारे पास एक एके-47 आया जो कि trace भी कर दिए
हैं कि महाराष्ट्र के एक encounter से लूटा गया है, भारत पुलिस का था. उसमें तो
नंबर रहता है, उसमें आप कुछ कर नहीं सकते हैं. ज्यादा इसीलिए रहता हैं क्योंकि....
इनकी एक किताब है “Ambush & immediate ambush countertrade” उसको पढ़िएगा. तो ये जो
layers ambush के लगाते हैं और उनको फोटो दिए गए हैं. कुछ स्केच दिए गए हैं उनके.
उसमें शुरु में उनके जनमिलिशिया के लोग रहते हैं. और strategic location पर उनके
लोग रहते हैं.
उसके दो कारण है. उसमें ही दिखाया गया है कि कारण क्या है. कारण ये है कि वो
चाहेंगे कि पुलिस अपनी ammunition को exhaust करे. ये आप मान के चलिए कि माओवादी या
नक्सली के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण चीज है, वो उसकी बंदूक से भी ज्यादा, उसकी
ammunition है. क्योंकि बंदूक तो वो लूट सकता है लेकिन ammunition तो खर्च होने की
चीज हैं. तो अगर वो उसका गलत इस्तेमाल और उसका मारक इस्तेमाल नहीं कर सकता तो उसका
इस्तेमाल करना नहीं चाहता. तो जब आप की गोलियां बहुत-सी निकल जाती हैं और आपके पास
कम गोली बचती है तब वो उसका इस्तेमाल करता है. और तब वो सामने आता है और जब वो फंस
जाता है तब उस मुठभेड़ में आप पाइएगा कि बराबर एके-47 और रॉकेट लॉंचर का इस्तेमाल
किया गया है.
जहां पर माओवादी खुद ambush लगाता है, वहां की पहली मुठभेड़ में अगर वो पीछे हट गया
है मुठभेड़ करके, तो उसमें जो शुरुआती दौर पर उनकी जो जनमिलिशिया है, वो आगे रहते
हैं उनको गोली लगती है. एक दो उनके भी लग सकती हैं, जिनको वो खींच कर निकाल लेते
है. और ये pattern सिर्फ यहां का नहीं है ये पूरे विश्व का है. जहां जहां पर भी
माओवादी लोग हैं, वहां का है. ये pattern explain भी उन्होंने ही किया है अपने war
documents में. उसमें बहुत कोई ये चीज़ नहीं है. उसको हम सिद्ध कर देंगे, उनके ही
documents से कोर्ट में कि कैसे करते हैं.
Public में ये प्रचारित करते हैं क्योंकि उनके पास भी कई लोग हैं जो प्रचारित करते
हैं, जो उनके मित्र हैं. और कुछ लोग उसको मान भी लेते हैं. और उसको फैलाते रहते
हैं. लेकिन हकीकत ये है कि छत्तीसगढ़ पुलिस अगर फर्जी encounter में विश्वास करती
तो हमारे जेल नक्सलियों से नहीं भरे होते. उनमें से बहुत से उनके Important leaders
हैं, various level के हैं. उनको encounter में मार दिया गया होता. उनको पकड़ कर
लाकर हम क्या कर रहे हैं? हम कोर्ट में लड़ेंगे, case establish करेंगे.
मानसिकता ही छत्तीसगढ़ पुलिस की fake encounter की नहीं रही है. दूसरी बात है कि इस
तरह के आरोप आप लगा सकते हो. और वो आरोप ज्यादातर आपकी जो पुलिस है, उसके मनोबल को
गिराने के लिए एक psy-war (मनोवैज्ञानिक युद्ध) के तहत लगाया जाता है.
•
क्या ये psy-war के कारण ही है कि आप जब अफसरों की और पुलिसकर्मियों की
पदस्थापना बस्तर में करते हैं तो वो जाने से इंकार कर देते है ? भले ही निलंबित कर
दिया जाए?
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देखिए ऐसा है कि ज्यादातर लोग चले गए हैं. ये यहां पर एक था जो भी कारण
था, लोग नहीं जाते थे. लेकिन धीरे-धीरे लोग जाने लगे हैं. बहुत से लोग निलंबित भी
किए गए, जब निलंबित रह गए तो वो उसके लिए तैयार हो गए क्योंकि हमने तो Additional
SP रैंक तक के लोगों को निलंबित करवाया है. आज वो वहां जाने को तैयार हो रहे हैं.
बोल रहे हैं कि हमें निलंबन से बाहर रखिए. ये दबाव डालना था. ये दबाव इसीलिए भी हो
रहा था कि यहां की ज्यादातर पुलिस के लोग उस इलाके में नहीं रहते और उनमें ये डर
था. जो भी डर हो, जिस कारण से भी डर हो. क्योंकि अब हम उन्हें train भी कर चुके थे
तो इसीलिए कोई ज़रूरत उनको अलग रहने की भी नहीं थी. उसके बहुत से कारण हो सकते हैं,
लेकिन हम ये उनको बाध्य कर देंगे. चाहे वो कोई भी कोशिश वो करे, वो कोर्ट से भी हार
गए, कोर्ट ने बिल्कुल निर्णय ले लिया है कि ये कारण से कोई भी आदमी वहां जाने से
नहीं कतरा सकता है कि वो पहले वहां जा चुका है. उसको जाना पड़ेगा और अब मेरे पास
क्योंकि कोर्ट से भी, हाईकोर्ट से भी ये judgment आ गया है. और हम उनको तब तक, जब
तक शारीरिक रूप से अक्षमता नहीं पाई जाए.
जैसे बहुत सारी चीज हमारे रिकार्ड में नहीं रहती हैं. अगर दो महीने, चार महीने, छह
महीने पहले ही उन्होंने बायपास कराया है. जो हो सकता है, हमें मालूम नहीं है, लेकिन
अगर वो उसका सर्टिफिकेट लेकर आता है. और बायपास कराया है तो वो उसको छुपा नहीं सकता
है, वो तो तुरंत मालूम पड़ जाएगा. या किसी को paralytic stroke है one side और वो
ठीक हुआ है. और एक पैर को drag करता है, चल ही नहीं सकता है. तो ऐसी समस्याओं को
छोड़कर उसको जाना ही पड़ेगा.
अब ये धीरे धीरे realize करने लगे है, इसीलिए पिछले इसमे, finally आखिर में बहुत
लोग चले गए हैं. सभी जगह, कुछ लोग suspend हो गए हैं, लेकिन reinstate होकर वही कह
रहे थे कि हमें reinstate कर दीजिए, हम जाएंगे. कोई बहुत दिन तक suspend बन कर रहना
नहीं चाहता. लेकिन वो हम कर देंगे और हमने ये देखा कि जो लोग शुरु में नहीं जा रहे
थे और बाद में चले गए, वो वहां अच्छी लड़ाई लड़ने लगे. शुरु की जो हिचक होती है, वो
हिचक से वो परेशान थे.
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माओवादियों के चीन, नेपाल और एलटीटीई से संबंध है. इसको लेकर लगातार
बाते होती हैं कि माओवादी आ रहे हैं train कर रहे हैं. नेपाल के माओवादी आ रहे हैं.
आज ही किसी अखबार में खबर छपी है.
तो अखबार में छपी है तो अखबार की खबरों को अखबार वालों से ही पूछिए कि
कहां से वो लाते हैं. देखिए, ऐसा है कि शुरुआती दिनों में MCC के द्वारा नेपाली
maoist train हुए थे खासकर जुबरा और पार्श्वनाथ हिल में. कुछ PU (Party Unity) से
भी हुए थे कैमूर हिल्स में. औऱ कुछ लोग यहां भी गए थे शुरुआती दौर में. उसके बाद
उन्होंने अपनेको रिचर्ज किया. Nepalese maoist और CPI Maoist में मतभेद भी हो गया
बाद में. लेकिन आज के दिन में वो वहां पर शासन में नहीं है. एक पुराना connection
उनके कागज़ का रहा है. तो ये संभव है कि उनमें से कुछ लोग यहां पर आकर के उनके साथ
लड़ रहे हों या support कर रहे हों. लोकिन जब तक हकीकत तौर पर कोई आदमी पकड़ा नहीं
जाता, तब तक ये बोलना कि वो उसकी मदद कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं, ये बहुत सही
नहीं होगा. क्योंकि आज तक कोई पकड़ा नहीं गया है. कोई पकड़ा जाता तो ये बोलने में
कोई मुश्किल नहीं होती.
जहां तक लिट्टे से संबंध हैं, शुरुआती दौर में PW (peoples war) ने लिट्टे के लोगों
से explosives devises बनाने की सीख ली थी. बाद के दिनों में कुछ weapons लिट्टे के
उन कैडरों से खरीदा था, जो लिट्टे छोड़कर भाग गए थे, वो बंदूक को ले के. लिट्टे से
directly उनका कोई contact है कि नहीं है, इस बारे में कुछ intelligence report
नहीं मिली है. लेकिन आज के दिन में कोई लिट्टे वाला उनके साथ पकड़ा नहीं गया है.
North east से जब हमने urban base तोड़ा था तब उसमें जिक्र था उनके रिकार्ड में,
उनके Maoist के रिकार्ड में, कुछ हथियार north east से खरीदे हैं. जो आदमी उनके साथ
weapon लाता था, वो पकड़ा गया. उसको उठाता था जमशेदपुर से, उसकी जानकारी के अनुसार
वो northeast से आता था. लेकिन वो ज्यादा मात्रा में नहीं था.
ज्यादातर weapon उनका अभी भी लूटे हुए हथियार हैं क्योंकि ओड़ीशा में उन्होने बहुत
लूटा. उनका जो कागज है उसके अनुसार, उनको अभी भी दो-तीन हजार हथियारों की ज़रूरत है
जिसको चाहे वो smuggling channel से ले लें.
चीन का जहां तक सवाल है, present चीन, आज का जो चीन है, वो माओवादियों को उस तरह से
support नहीं करता है. माओ के ज़माने का चीन भी नहीं कर रहा था. लेकिन चीन के
हथियार बहुत मात्रा में, दूसरे देशों में भी हैं. चीनी हथियार उनके पास मिले हैं,
चीनी hand grenade भी मिले हैं. तो ये कहना तुरंत संभव नहीं है कि चीन as a
राष्ट्र, government उनको मदद कर रही है. चीनी हथियार इनके पास है, ये लोग जानते
हैं. लेकिन ये स्मगलर चैनल से आ रहे हैं, ये चीनी हथिय़ार northeast से आ रहे हैं,
ये कभी उन्हीं को पकड़ेंगे तो हम उनसे पूछेंगे कि वो कहां से लाते हैं.
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Maoism जो पूरी theory है और तेलंगाना Movement, नक्सलबाड़ी, एमसीसी,
पार्टी यूनिटी, पीडब्लूजी से सीपीआई माओवादी तक, ये जो पूरी प्रक्रिया है, इसे
वैचारिक रूप से आप किस तरह देखते हैं.
ये इतना बड़ा प्रश्न है, जिसके लिए आपको मेरे 10-12 interview करने
पड़ेंगे. इसीलिए हम इसमें नहीं जाएंगे. इसके लिए हम काम कर रहे हैं, जो जल्द ही
आपके सामने आएगा. तो आप उसमें पढ़ लीजिएगा.
•
नक्सलियों के सूत्रवाक्य..
नहीं हो सकता है. इसके लिए आपको बहुत कुछ करना पड़ेगा. मुझे मालूम है
कि ज्यादातर लोग माओ को नहीं पढ़े हैं. second hand पढ़े हैं, second hand का मतलब
party leadership से पढ़े हैं. या ऐसे लोगों के माध्यम से पढ़े हैं, जो उनके अपने
दोस्त थे.
माओ की जो अपनी किताबें आई थी Chinese China में, जब वो पावर में आ गया था तो भी
highly sanitized थी in a sense कि जो वो चाहता था, वही किया. जो 32– 35 volume की
हम बात कर रहे हैं. वो official publication है. उसमें बहुत सारी चीज नहीं थी लेकिन
जो थीं, उसको भी अगर ठीक से पढ़िये तो आपको माओ की मानसिक स्थिति, मानसिक रूप से वो
किस तरह से सोचता था, वो समझ में आ जाएगा. और आखिर में आपको यही सवाल उठाना पड़ेगा,
बुनियादी सवाल कि आप हिंसा के पक्षधर है कि नहीं, बहुत simple है ये. ये सवाल तो
आपको उठाना ही पड़ेगा. हिंसा के बिना कोई तरीका नहीं है, ये सवाल उठाना पड़ेगा और
उसके साथ हिंसा के स्वरूपों को भी समझना पड़ेगा. उसके लिए आपको चीन के इतिहास में
जाना पड़ेगा, खासकर Maoist चीन के इतिहास में.
आज ये संभव हो गया है. आज दो कारण से संभव हो पाया है. एक तो जो नया चीन है,
उन्होंने release कर दिया है documents, जो archived में थे, official archived
में. माओ की डायरियां बाहर आ गई हैं, माओ के पत्र बाहर आ गए हैं, जो लोगों को उसने
लिखा था, अपने colleagues को लिखा था, अपने friends को लिखा था. 1916 के बाद के माओ
की चीज़ें बाहर आ गई हैं, वो student था उस जमाने की. और वो available हैं किताबों
के form में. आपको वो मिल नहीं रही होंगी पर वो available हैं किताबों के form में.
और किताबें आ गई हैं. माओ important आदमी थे, उनकी सब चीजें बाहर आ गई हैं. चीनी और
रूसी जो documents थे, archived KGB के भी बाहर आ गए हैं. वो उस पीरियड का जिक्र
करेगा, जब माओ communist बन रहे थे और यूनान में काम कर रहे थे और क्या-क्या
guidance ले रहे थे, ये सब बाहर आ जाएगा, आ गया है.
आप उसको बिना किसी interpreter के अपनी आँखों से देखिए. और फिर आप निर्णय लीजिएगा
कि ये एक सही रास्ता था कि नहीं. हम उस पर अभी भी काम कर रहे हैं. कुछ चीज़ मैं सोच
रहा हूं कि जल्दी आएंगी. क्योंकि interview कुछ लोग ले रहे हैं इसके लिए, वो पूरी
किताब ही interview के form में रहेगी. कुछ और जो गहरे सवाल हैं, जो बहुत बुनियादी
सवाल है. वो हो सकता है हमें, आपको दो-तीन साल और रुकना पड़े, चार साल. जब हम उसको
लाएंगे मोटी किताब के तौर पर, जिसमें politics से लेकर के बहुत सारे बुनियादी सवाल
उठाते हैं.
•
माओ की जो बात कर रहे हैं तो गांधी के, गुड़सा उसेंडी से और बाकी बहुत
सारे लोगों के साथ भी आपकी कई मुद्दों पर बहस हुई है. गांधी, गांधीवाद, बस्तर के
एनजीओ...
देखिए, गांधीवाद तो हम कोई चीज को मानते नहीं हैं.क्योंकि गांधी के
जैसा गांधी ही हो सकता है. लेकिन ये सवाल उठता है कि गांधी ने जिस अहिंसा की बात की
Political उसमें, Achieve करने के लिए किसी चीज को. वो अहिंसा को कितना हम उतार
पाते हैं. अपने में वो बड़ी बात है.
गांधीवादी तो वो हो जाता है, जो गांधीवादी संस्थानों से जुड़ा हुआ है. और उनमें से
बहुत सारे, जब अपने ज़मीर में उतरेंगे तो मैंने किसी और इसमें बोला था कि वो अपने
साथ बैठ नहीं पाएंगे. बहुत से गांधीवादी ऐसे होंगे कि जब अपने ज़मीर में उतरेंगे तो
खुद के साथ वो बैठ नहीं पाएंगे. तो हम उनकी बात नहीं करते. लेकिन गांधीवाद या गांधी
की जो अहिंसा है, वो अहिंसा है, वो एक जिद्द तक की अहिंसा है कि अगर एक movement को
रोक दिया जाए, एक अहिंसक के रुप में तो ये हिम्मत सिर्फ गांधी ही कर सकते थे.
नोआखोली में सबने कह दिया कि हम आपको security नहीं दे सकते हैं, आप नहीं जाइये
वहां तो उन्होंने कह दिया कि हम बिना security के जाएंगे. और वो तभी हो सकता है कि
जब आप अंदर से एकदम सच्चे इंसान हों. कि आप नोआखोली में दोनों तरफ मारकाट चला हुआ
है, वहां गाधी अकेला चल रहा है. और वो जहां जा रहे हैं, वहां हिंसा रुकती चली जा
रही है, एक आवाज़ में.
गांधीवादी, इस तरह के जो तथाकथित जो गांधीवादी हैं, वो जब रायपुर के चौराहे में
बोलना बंद करके, वहां चलने लगे कि हिंसा रोको तब हम मानेंगे कि वो गांधी की छाय़ा के
भी मज़दीक पहुँचे हैं. गांधीवादी बोल कर के और उसके बाद executive class में travel
करने से कोई गांधीवादी नहीं होता.
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•
लेकिन बस्तर के इलाके में जो लोग हिंसा रोकने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे
गांधीवादी, उनको तो सरकार मार-मार कर भगा रही है, पुलिस आरोप लगा रही है.
नहीं नहीं, आरोप लगा रही है. आप कैसे जानते हैं कि आरोप लगा रही है?
लगा क्या रही है ? गांधी को तो हमने कभी नहीं देखा कि जबरदस्ती कोई इलाके पर कब्जा
कर ले, जो forest इलाका है.
•
सरकार उसके लिए धन उपलब्ध कराती है.
धन उपलब्ध कराती है कि वो registered party है, वो लोग आकर थोड़ी बोलता
है कि हम फर्जी तरीके से ये रखे हुए हैं. इसीलिए उस पर तो आप बात नहीं कीजिए. वो
क्या करते हैं, कि झूठ फैलाते हैं कि हम 33 गांव बसाये हैं, वो 33 आप आ कर गिना
दीजिए. वो चारों तरफ बोल रहे हैं. इसलिए वो बात नहीं है.
बात ये है कि आप गांधीवाद, gandhiism को, गांधी को आप एक commerce के बतौर use करना
चाहते हैं, पैसा कमाने के लिए... तुर्रा ये कि उसका आप चारों तरफ हल्ला भी मचाते
हैं कि हम गांधीवादी हैं. आप झूठ का सहारा लेते हैं, जो गांधी ने कभी अपनी ज़िंदगी
में नहीं लिया. और अपने को गांधीवादी बोलते हैं ? आप खुद वो..., उनको खुद पूछना
चाहिए...हमसे क्यों पूछ रहे हैं, खुद से पूछें कि वो क्या कर रहे हैं और क्या नहीं
कर रहे हैं.
•
आख़िरी सवाल, माओवादियों से बातचीत की कोई गुंजाइश बनती है?
माओवादी नहीं मान रहे हैं.क्योंकि माओवादी में अलग-अलग लोग अलग-अलग चीज बोल रहे
हैं. किशन जी कुछ बोल रहे हैं, कोई आदमी और कुछ बोल रहा है, उनके so called जो उनके
facilitator हैं, वो कुछ बोल रहे हैं. सवाल बहुत सीधा है.कोई बातचीत तब तक सफल नहीं
होगी, जब तक माओवाद या माओवादी दो चीज ये मानेंगे नहीं कि ये भारत की संवैधानिक
ढ़ांचे के तहत वो बात करें. सफल ही नहीं हो सकता, आप क्या बात कीजिएगा ? वो बोलेंगे
कि पहले आप अपने ढ़ांचे को तोड़ दीजिए, तब बात कैसे कीजिएगा. जो आदमी उस संविधान के
तहत, उससे शपथ लेकर आया हुआ है, वो कैसे बात करेगा कि आप तोड़ दीजिए ? दूसरी बात-
अगर आप बोलते हैं कि उसके जो बुनियादी जो उसूल हैं, उसको आप नहीं मानते, तो आप बात
कैसे कीजिएगा. तीसरी बात- आप कहते हैं कि हम बंदूक नहीं रखेंगे. तो आप ऐसे बंदूक
हमको दिखाते हुए हमसे बात तो करीएगा नहीं. तो फिर किस बात पर बात हमसे कीजिएगा.
चौंथी बात- वो कौन बात करने के लिए बोल रहे हैं ? उनके general secretary तो चुप
बैठे हुए हैं. तो किसकी बात मानें ? और पांचवीं बात- जब आंध्र में बात कर रहे थे तो
उनकी एक letter है कि ये सब चीज Non negotiable है, तो मेरा तो मानना था कि 6 महीने
बात क्यों हुई. पहले दिन टूट जाना चाहिए था.
Democracy, जो हमारे constitution का है, वो नहीं मानेंगे, Violence वो छोड़ेंगे
नहीं, हथियार वो रखेंगे नहीं, मारेंगे, जन अदालत भी वो करेंगे तो फिर आप बात किस
बात पर करीएगा? तो समझा दें वो. तो बातचीत का क्या मतलब होता है? बातचीत तो बराबर
एक जरिया होता है Democracy में, बशर्ते आप Democratic तरीके से बातचीत कीजिए. आप
बोल दीजिए कि हम कुछ नहीं मानेंगे, आप मानिए. ऐसा तो कुछ होता नहीं.
06.12.2009,
13.24 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | shakeel (shakeellohani@yahoo.com) mahasamund | | | | 2005 में जो सलवा जुड़ूम शुरु हुआ था, उसके कारण आदिवासी मारे जा रहे हैं, इससे किसी को इंकार नहीं होना चाहिए. दूसरा ये कि आप जब कहते हैं कि एसपीओ के कारण नक्सली घबराये हुए हैं, तो इसका दूसरा सच ये भी है कि नक्सली जिस तरह संघम सदस्यों को आगे रखते हैं, उसी तरह आप भी एसपीओ के नाम उन्हीं आदिवासियों को आगे कर रहे हैं और नक्सली मुठभेड़ में वही मारे जा रहे हैं. मतलब ये कि आपके निशाने पर भी भोलेभाले आदिवासी हैं और नक्सलियों के निशाने पर भी. आप केवल 'जन मारा जा रहा है मेरा आग्रह है कि आप अपराधियों से लड़ने का हौसला पैदा करें. आपके अधिकारी भ्रष्टाचार के कारण इस्तीफे दे रहे हैं, उनमें लड़ाई का जज्बा पैदा करें. आप कविता-कहानी भी करें लेकिन राज्य में पुलिसिंग भी हो, यह भी सुनिश्चित करना आपका काम है. | | | | | |
| | mihir (mgmihirgoswami@gmail.com) bilaspur c. g | | | | दिलीप जी यदि है तो क्या हुआ, क्या होगा, क्या होना चाहिए ? | | | | | |
| | dilip | | | | अनिरुद्द, तुम ठेकेदार हो क्या बस्तर के ? | | | | | |
| | अनिरुद्ध (ashrivastava175@gmail.com) जगदलपुर | | | | जयपुर की अनुराधा जी, गुलाबी नगर से निकल कर दण्डकारण्य भी आईये तब आपको पता चलेगा कि आखिर में सच क्या है और कौन किसको फंडिंग कर रहा है। दिल्ली के अखबारों में छपे रिपोर्ट में हमारे बस्तर का आंकलन करने का यत्न न करें। सलवा जुडुम और नक्सलवाद "गुज्जर और मीणा" की तरह की लडाई नहीं है।
चीन, पाकिस्तान यहां तक कि अलकायदा और लिट्टे नक्सलियों को इन सभी से फंड मिलने की खबरें सार्वजनिक होती रही हैं। सलवा जुडुम में सर्वाधिक सक्रिय अगर कोई आदिवासी नेता हैं तो वह है महेन्द्र कर्मा जिनका संबंध कांग्रेस से है जब कि प्रदेश में भाजपा की सरकार है। सलवाजुडुम सही मायनों में क्रांति है और आंदोलन है आदिवासियों का नक्सलियों के खिलाफ।
एस्सार और टाटा के द्वारा नक्सलवादियों को फंडिंग करने की खबरे तो पढीं थी लेकिन उलटी गंगा..? और एक बात कि नक्सलवाद हौव्वा नहीं है, आज बडा सच है। उसे आरामकुर्सी पर बैठ कर न रायपुर से बहसियाया जा सकता है न दिल्ली और जयपुर से। जमीनी स्तर पर क्षेत्रीय नेता (आदिवासी) और प्रशासन ही इसका समाधान कर सकते हैं। | | | | | |
| | Sunil Tiwari Raipur, Chhattisgarh | | | | पुलिस महानिदेशक महोदय को लगता है कि छत्तीसगढ़ में वो अकेले महान काम कर रहे हैं. आपके थानों में जाने कितने नेताओं के खिलाफ वारंट लंबित पड़े होंगे. केवल नक्सलवाद का हौव्वा खड़ा करके आप दूसरे अपराधों पर परदा डालने का काम कर रहे हैं. भ्रष्टाचार के मामलों की रिपोर्ट नहीं हो रही है, रिपोर्ट हो रही है तो कार्रवाई नहीं हो रही है, कार्रवाई हो रही है तो वह इतनी दिखावटी हो रही है कि अधिकांश मामलों में लोग जमानत पा कर घूम रहे हैं या अदालतें उन्हें बजाप्ता बाईज्जत बरी कर रही हैं. रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, दुर्ग-भिलाई अपराध के गढ़ बन गये हैं और आपकी पुलिस इस पर रोक लगाने में नाकाम रही है.
आपको अगर लगता है कि इस तरह नक्सलियों का हौव्वा खड़ा करके और इस तरह के साक्षात्कार देकर, अपने पास शिक्षा विभाग के बार-बार निलंबित होने वाले बाबुओं का जमावड़ा लगा कर, उनसे अपने पक्ष में लिखवा कर आप प्रदेश का भला कर रहे हैं, तो यह आपकी गलतफहमी है.
मेरा आग्रह है कि आप अपराधियों से लड़ने का हौसला पैदा करें. आपके अधिकारी भ्रष्टाचार के कारण इस्तीफे दे रहे हैं, उनमें लड़ाई का जज्बा पैदा करें. आप कविता-कहानी भी करें लेकिन राज्य में पुलिसिंग भी हो, यह भी सुनिश्चित करना आपका काम है. | | | | | |
| | anuradha s जयपुर,राजस्थान | | | | आलोक जी ने अच्छा साक्षात्कार लिया है लेकिन इस साक्षात्कार में इस बात का उल्लेख कहीं नहीं है कि सलवा जुड़ूम को एस्सार और टाटा ने फंडिंग की है, इसके पीछे कौन से कारक हैं ? क्या यह सच नहीं है कि सलवा जुड़ूम पुलिस के संरक्षण में शुरु किया गया आंदोलन है और इसे केवल औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए शुरु किया गया था ? | | | | | |
| | Sudha verma New Delhi | | | | गांधी को आप एक बार फिर पढ़ें विश्वरंजन जी। मुझे लगता है कि आपने भी गांधी को सेकेंड हैंड पढ़ा है।
गांधी ने महीषादल में 1943 के अपने बयान में कहा था कि अगर किसी महिला का शील भंग हो रहा हो तो वहां हत्या भी अहिंसा है और चुप रहना हिंसा है। बस्तर में औरतो की रक्षा करने के बजाय आपके एसपीओ क्या कर रहे हैं, यह आपको पता है। ऐसे में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए थी, यह सोचने की जरुरत है। गांधी के इस वचन को एक बार पढ़े और सोचें-
आदमी शरीर से कितना ही कमजोर हो, पर यदि पलायन लज्जा की बात है तो उसे मुकाबले पर डटे रहना चाहिए और कर्तव्यपालन करते हुए मृत्यु का वरण करना चाहिए। यही अहिंसा तथा वीरता है। वह कितना ही कमजोर हो, पर अपने शत्रु पर शक्ति भर वार करे और ऐसा करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो जाए यह वीरता है, यद्यपि यह अहिंसा नहीं है। यदि आदमी संकट का सामना करने के बजाए भाग खडा होता है, तो यह कायरता है। पहले मामले में, आदमी के हृदय में प्रेम अथवा दयालुता का भाव होगा। दूसरे और तीसरे मामले में, उसके हृदय में घृणा अथवा अविश्वास और भय के भाव होंगे। -(पृ. 211, हरिजन, 17-8-1935) | | | | | |
| | अनिरुद्ध (ashrivastava175@gmail.com) जगदलपुर | | | | भारत माता की संतान तो कश्मीर के आतंकवादी भी हैं? जैसे कश्मीर के आतंकवादी वैसे असम के आतंकवादी और वैसे ही नक्सलवादी सब अपराधी हैं और उन्हे स्ट्रीम में डालने की जरूरत है वो मेन स्ट्रीम में आने वाले नहीं। आदिवासी कैंपो में रहने के लिये आदिवासी सरकार के कारण बाध्य नहीं है नक्सली हिंसा के कारण मजबूर है क्योंकि ये तालिबानी उन्हे वापस जंगल जाने पर जिन्दा नहीं छोडेंगे। हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा तब तक नहीं होती जब तक डाकू आपका घर नहीं लूट रहा हो। | | | | | |
| | Deep kumar thakur Raipur | | | | विश्वरंजन का इंटरव्यू पूरा पढ़ गया. बहुत बढ़िया है. जानकार आदमी हैं. सवाल भी काफी अच्छे थे. अपने पालिटिकल बास को तो ये मुट्ठी में रखते होंगे. रमन सिंह वगैरह को पता नही कितनी समझ होगी. लेकिन एक तरह का एरोगेंस तो झलकता ही है विश्वरंजन में.. मुझे लगता है कि इतने सीधे तरीके से रायपुर का कोई और पत्रकार उनसे बात भी न कर पाए. जहां तक सलवा जुड़ूम का सवाल है तो उसका जवाब उनके पास नहीं है. आप किसी भी रूप में आदिवासियों को शिविर में रखने को जस्टिफाइ नहीं कर सकते. हिंसा का जवाब प्रति हिंसा नहीं हो सकती. विश्वरंजन ने साफगोई से राज्य की हिंसा की बात को घुमा दिया. आपने सवाल राज्य ‘की’ हिंसा को लेकर किया था, उनका जवाब राज्य ‘में’ हिंसा पर केंद्रित हो गया. | | | | | |
| | anwwr suhail (anwarsuhail_09@yahoo.co.in) bijuri anuppur mp 484440 | | | | विश्वरंजन जी ने वहीं बातें की हैं जो नक्सलियों के खिलाफ हैं, वो नक्सलियों को alien की तरह treat कर रहे हैं, जबकि मेरा मानना है कि नक्सली हमारी तरह के लोग हैं और इसी भारतमाता की संतान है, ज़रूरत है उन्हें mainstream में लाने की. | | | | | |
| | राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बस्तर | | | | विश्वरंजन जी का साक्षात्कार पढ कर प्रसन्नता हुई। पुलिस महकमें को एक साहित्यकार और कवि जैसा संवेदनशील व्यक्तित्व प्राप्त हुआ है इससे यह प्रसन्नता होती है। नक्सलवाद पर प्रशासन का और अपना निजी दृष्टिकोण आपने स्पष्टता और बेबाकी से रखा है।
माओवाद से सैद्धांतिक रूप से ही लडना होगा और इसका खोखलापन सामने लाना होगा, उस सभी प्रचारकों और तथाकथित बुद्धिजीवियों के मुखौटे बेनकाब करने होंगे जिनके दुष्प्रचार का नतीजा है कि यह आतंकवाद कटने के बाद भी जड नहीं छोड पाता। सामाजिक आर्थिक विषमता दूर किये बिना नक्सलवाद समाप्त नहीं हो सकता इस सच के साथ अगर देखता हूँ तो पाता हूँ कि आदिमों के पचास हजार से अधिक स्कूलों को ध्वस्त कर देने का श्रेय रखने वाले नक्सली, ग्रामीण सडकों को तबाह कर देने वाले नक्सली, बिजली की जगह ब्लैकआउट पसंद करने वाले नक्सली...क्या आर्थिक विषमता दूर करने वाले पैरोकार हैं? उन्हे तो एन. एम. डी. सी की कंवेयर जलाना है और उसी कंवेयर के जलने भर से उनका समाजवाद प्रकाशित होता रहता है? "इन महान क्रांतिकारियों :)" को जब बस्तर के विकास से परहेज ही है तो काहे का ढिंढोरा?
हमेशा सोचता हूँ कि जब "तथाकथितों" की नजर में नक्सली हिंसा आवश्यक है तो फिर सलवा जुडुम को भी "आदिम क्रांति" ही कहा जाना चाहिये...एक और भूमकाल? आन्ध्र और बंगाल के उन अपराधी तत्वों के खिलाफ आन्दोलन जो माओवाद के नाम पर आदिमों का जीवन हराम किये हुए हैं। आखिर आदिम भी अपनी संस्कृति और स्वाभिमान पर हमले को कब तक सहें?...? मजेदार बात तब होती है जब नक्सली और उसके समर्थक पकडे या मारे जायें तो मानवाधिकार हनन और नक्सलियों का विरोध करता आदिम मारा जाये तो स्वाभाविक प्रतिक्रिया? एक तरफ महाश्वेता देवी, अरंधुति राय जैसे उन लेखकों का आतंक जिनकी कलम जो लिखे वही "पत्थर की लकीर" और दूसरी तरफ "बेचारा सच" जिसे आवाज देने की कोशिश जो भी करे वह "सरकार प्रायोजित" या "दक्षिण पंथी"? हद है।
विश्वरंजन जी मैं "हाथी चले बाजार" वाली कहावत का हिमायती हूँ। आपका कार्य प्रसंशनीय है। बीच में कुछ "साहित्यिक ठेकेदारों" ने आप पर जो आरोप लगाये थे वह भी पढे थे। सच यह है कि न तो साहित्य किसी "वाद या विचारधारा" का ठेका है और न ही "क्रांति"। | | | | | |
| | आनंद कुमार सिंह , पटना | | | | 2005 में जो सलवा जुड़ूम शुरु हुआ था, उसके कारण आदिवासी मारे जा रहे हैं, इससे किसी को इंकार नहीं होना चाहिए. दूसरा ये कि आप जब कहते हैं कि एसपीओ के कारण नक्सली घबराये हुए हैं, तो इसका दूसरा सच ये भी है कि नक्सली जिस तरह संघम सदस्यों को आगे रखते हैं, उसी तरह आप भी एसपीओ के नाम उन्हीं आदिवासियों को आगे कर रहे हैं और नक्सली मुठभेड़ में वही मारे जा रहे हैं. मतलब ये कि आपके निशाने पर भी भोलेभाले आदिवासी हैं और नक्सलियों के निशाने पर भी. आप केवल 'जन मारा जा रहा है, भारत का नागरिक मारा जा रहा है' जैसे जुमले कह कर अपना अपराध कम नहीं कर सकते. | | | | | |
| | Santosh Kumar Arya New Delhi | | | | विश्वरंजन जी, आपने जितनी साफगोई से बात रखी है, वह तारीफ के काबिल है. लेकिन आपने आर्थिक विषमता के मुद्दे पर जो कुछ कहा है, क्या आपकी सरकार में बैठे लोग यह नहीं जानते ? वे तो लगातार चीखते रहते हैं कि नक्सलवाद कानून और व्यवस्था का मामला है. इतना बड़ा झूठ बोलने वाले लोगों को भी समझाइए. | | | | | |
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