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सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से आलोक प्रकाश पुतुल की बाततीत
संवाद
लिखे को हस्तक्षेप मानना
चाहिए
सुप्रसिद्ध
साहित्यकार
विनोद कुमार शुक्ल
से
आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
सभी फोटोः शाश्वत गोपाल
अपने पहले कविता संग्रह लगभग जयहिंद
और वह आदमी चला गया नया गरम
कोट पहिनकर विचार की तरह के अलावा
नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे
और दीवार में एक खिड़की रहती थी
जैसे उपन्यासों से हिंदी साहित्य में दूसरों के लिखे से एकदम अलग की तरह अपना
मुआवरा गढ़ने वाले सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल मानते हैं कि आज विकास
के साथ-साथ बाज़ार चलता हुआ दिखाई देता है, विकास की दिशा वहीं खत्म होती है, जहां
तक बाजार पहुँच चुका होता है. उसके आगे कोई विकास नहीं है. विनोद कुमार शुक्ल इस
बात पर आश्चर्य जतलाते है कि जंगल के सबसे भोले-भाले लोग, आदिवासी सबसे अधिक हिंसा
के घेरे में हैं. वे मानते हैं कि साहित्यकार के लिखे जाने को ही हस्तक्षेप की तरह
देखा जाना चाहिए. उनका सवाल है कि जिसका लिखा जाना कोई हस्तक्षेप नहीं है, तो लेखक
का सड़क पर उतर आना किस तरह का होगा ?
यहां प्रस्तुत है, उनसे हाल ही में की गई बातचीत के अंश
•
गैब्रिअल गार्सिया मार्क्वेज कहते हैं कि कालेज के
दिनों में उन्हें किसी दोस्त ने काफ्का की कहानियां पढ़ने को दी. मार्क्वेज उसमें
'मेटामोर्फोसिस” पढ़ने लगे. उसका एक वाक्य है- ''जैसे ही ग्रेगर समसा, बेचैन
सपनों वाली रात के बाद सुबह सोकर उठा, उसने अपने को एक बहुत बड़े कीड़े में बदलते
हुए देखा. '' मार्क्वेज कहते हैं कि उस वाक्य ने उन्हें जैसे पलंग से पटक दिया.
उन्हें इससे पहले नहीं पता था कि लेखक को इस तरह भी कुछ लिखने की छूट होती है.
मार्क्वेज के अनुसार अगर उन्हें ऐसा पता होता तो पहले ही लिखना शुरु कर देता.
उन्होंने इसके बाद कहानियां लिखनी शुरु की.
तो लिखना क्या इस तरह सहसा घटने जैसा कुछ है ? आपने लिखना
कैसे शुरु किया था ?
लिखना शुरु करने के पहले लिखने का वैसा कोई कारण नहीं. सबसे पहले दूसरों का लिखा
हुआ पढ़ा गया. शायद ये एक कारण हो सकता हो कि ऐसा लिखा गया. लेकिन तब भी, पहले तो
अपने से बात करने का कोई और तरीका लिखने के अलावा नही है, बाद में लिख कर हम, लोगों
से बात करते हैं. और लिखना लोगों से बात करना है. शायद इस तरह मुखर होने की मैंने
कोशिश की है.
•
लिखने की तरह की पहली रचना कौन सी थी ?
घर में लिखने का वातावरण था. संयुक्त परिवार था. माँ, जमालपुर जो कि अब बांग्लादेश
में है; से नौ वर्ष की उम्र में अपने भाइयों के साथ कानपुर लौट कर आ गई थीं. उस नौ
वर्ष की उम्र में उन्होंने बंगाल का संस्कार, जितना भी हो, एक पोटली में बांध कर ले
आई थीं. और वही पोटली हर बार मेरे सामने खुल जाती थी. मैंने उन्हीं से रवींद्रनाथ
टैगोर, शरतचंद्र और बंकिम के नाम सुने.
पहली रचना तो लिखित में बची हुई कभी होती नहीं. जब लिखित में होने की प्रक्रिया
होती है तो कोई दूसरी रचना, उस पहली रचना को खारिज कर देती है. खुद रचना को खारिज
करना हमेशा दूसरों के द्वारा खारिज होने से अपनी रचना को बचाने का एक तरीका होता
है. और दूसरी रचना, जो किसी तरह से खारिज होने से बच जाती है, रह जाती है.
तो पहली रचना तो कभी होती ही नहीं है. जितनी भी रचनाएं हैं, सब दूसरी रचनाएं हैं.
•
ये `दूसरी’ पहली रचना कब थी ?
मैंने कविता के बड़प्पन को सीधे मुक्तिबोध में जाना. दो कदम बाद ही पहाड़ हो, नहीं
मुक्तिबोध हों जैसे. सन 1958 में मुक्तिबोध राजनांदगांव में आए. रचना के संसार को
टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं देखा, उसके विराट संपूर्ण को मुक्तिबोध में पाया. और मेरा
कौतुहल, उत्सुकता बचकानी थी.
मुक्तिबोध जी ने मेरी कविताओं को देखा, फिर उन्होंने सबसे पहले कविता लिखने से मना
किया, और लिखने-पढ़ने पर ज़ोर दिया, ताकि कुछ नौकरी कर परिवार की सहायता करूं.
पहली बार उनसे मिलने के बाद एक लंबा समय निकल गया. जब दुबारा नहीं मिला तो उन्होंने
मेरे बड़े भाई, जो कि उनके विद्यार्थी थे, कहा कि मैं उनसे मिलूं. दुबारा मैं कविता
लेकर उनके पास गया. उन कविताओं में से आठ कविताएं उन्होंने श्रीकांत वर्मा, जो
`कृति’ के संपादक थे; को प्रकाशनार्थ भेजीं, और वे छपीं. इन आठों कविताओं को आप
दूसरी कविता कह सकते हैं.
•
घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए
होता है....
और
....घर का हिसाब किताब इतना गड़बड़ है / कि थोड़ी दूर पैदल जाकर घर की तरफ लौटता
हूँ / जैसे पृथ्वी की तरफ....
और
....घर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगा / अपने संन्यास में / मैं और भी घरेलू
रहूंगा / घर में घरेलू / और पड़ोस में भी....
और
....दूर से घर देखना चाहिए....
तो आपकी रचनाओं को पढ़ते हुए लगता है कि घर एक राग की तरह है. घर के साथ ये किस तरह
का रिश्ता है. ?
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अब इसको आप इस तरह कह लें कि मैं घरघुसना रहा.
शायद मेरे लिए शुरुआत में घर में घुसे रहने की आदत बचपने के असुरक्षित होने के कारण
ज्यादा रही होगी. क्योंकि जो लोग जंगलों में रात गुज़ारते हैं, वो अपने बचाव के लिए
पेड़ की उंचाई पर आश्रय लेते हैं. और यह भी कि शिकारी भी मंच, पेड़ पर बनाता है. घर
में संयुक्त परिवार के साथ मैं संसार को समझ रहा था. पिता की मृत्यु बचपने में ही
हो गई थी.
मेरा मंच, मेरा घर रहा है और यह जान बचाने के लिए घर में घुस जाने जैसा रहा होगा.
जीने के लिए घर से निकल जाना जैसा भी.
•
लेकिन घर से बाहर जाना आपकी सबसे पहली इच्छा भी रही है-
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे / मैं उनसे मिलने / उनके पास चला जाऊँगा।…./ मैं फुरसत
से नहीं/ उनसे एक जरूरी काम की तरह/ मिलता रहूँगा।.../
इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह/ सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा...
यह भाव सदिच्छा मात्र की तरह क्यों है ?
देखिए, आपने जिस तरह मेरी रचनाओं में से, मेरे कहे हुए
उत्तरों को सामने लाकर रख दिया है. दरअसल ये सब उन्हीं में से आई हैं और उसके जवाब
की तरह ही हैं.
•
लेकिन लगातार घर में ही रहना और उससे उलट घर से बाहर जाकर
लोगों से मिलने की पहली इच्छा रखना...
मैं कुछ समझा नहीं.
सब कुछ कह दिया जैसा कभी होता नहीं. कहने को कुछ बचा नहीं, यह भी नहीं होता. कविता
में केवल हमारा प्रश्न ही हमारा नहीं होता, दूसरों का प्रश्न भी हमारा होता है.
रचना में दूसरों के प्रश्न ही होते हैं. और उत्तर एक मात्र नहीं होता. कहने के लिए
पूरी जिंदगी बची होती है. और बिना कहे बात जारी है. पर कविता टुकड़ों-टुकड़ों में
होती है. पूरी जिंदगी भर की टुकड़ों-टुकड़ों की कविताएं एक ही जिंदगी की केवल एक ही
कविता होती है. ऐसा कोई नहीं जिसके पास सब उत्तर हैं– भगवान के पास तो कतई नहीं.
भगवान के पास तो एक भी उत्तर नहीं. जो कविता में कहा गया है, उसे कविता में ही
ढूंढना चाहिए. और जो नहीं कहा गया है उसे भी. कविता को स्वीकार करने, खारिज़ करने
का अधिकार प्रत्येक पाठक के पास है.
•
कोई भी लेखक जीवन में एक ही रचना लिखता है. लिखने की इस
प्रक्रिया में जब मामला अभ्यस्ति तक आ जाये तो कोई रचनाकार reinvent कैसे होता है ?
लिखने में, लिखने का अभ्यास कभी नहीं होता. लिखना इस तरह की उस्तादी नहीं है कि
मैंने इतना वजन उठा लिया. मुझे लिखते हुए पचास वर्ष हो गए होंगे, तब भी जब मैं कोई
नयी रचना लिखता हूं तो हर बार मुझे लगता है कि मैं शुरुआती दौर पर ही हूं. कविता
कभी भी सांचे से नहीं निकलती. प्रत्येक रचना अपनी रचना प्रक्रिया के साथ आती है. यह
मान कर चलें कि प्रायः कही हुई बात समय के बदलने से बदल जाती है.
भूख पहले भी लगती थी और अभी भी. लेकिन पेट भरने के कारण, अलग-अलग समय पर बदल जाते
हैं.
•
आपकी जो लंबी कविताएं हैं, उनमें एक आवेग नज़र आता है. मसलन
रायपुर-बिलासपुर संभाग. उसके बरक्स आपकी दूसरी छोटी कविताओं में उस तरह का आवेग
नहीं है, तो यह कथ्य के कारण है या लिखे जाने की प्रक्रिया के कारण. दूसरा यह भी कि
कुछ आलोचक आपकी छोटी कविताओं में mannerism की भी बात करते हैं ?
देखिए, अपनी तरह से लिखना mannerism नहीं होता. अगर हर बार मैं अपनी उपस्थिति में
अपनी पहचान अपने नाक-नक्श से बनाता हूं. और ये जो मेरा नाक-नक्श है, इसे मैं कैसे
mannerism कह दूं और बहरूपिया हो जाऊं. मुझे लगता है कि अगर मेरी रचनाओं में मेरा
mannerism है, तो मैं इसे अच्छी बात मानता हूं. और मैं चाहता हूं कि दूसरों की
रचनाओं में भी उनका अपना mannerism होना चाहिए.
•
सलमान रश्दी, मकबूल फिदा हुसैन, तस्लीमा नसरीन... रचनात्मकता
के इस तरह के प्रसंग को आप किस तरह से देखते हैं ?
असल में ये जो तीनों आपने उदाहरण दिए हैं, इनको एक साथ समेटना ठीक नहीं होगा. इनके
यद्यपि अपने अलग-अलग कारण हैं. फिर भी एक कारण तो कट्टरता का है.
कोई भी रचना अपने स्वयं के सेंसरशिप से बाहर निकलती है. इसमें किसी और प्रकार की
बाहरी सेंसरशिप करीब-करीब बेमानी है. अभी-अभी मैंने मकबूल फिदा हुसैन पर विष्णु खरे
का लेख पढ़ा है जनसत्ता में. यह लेख मुझे अच्छा लगा.
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•
हरेक रचनाकार का लिखा जिस तरह का होता है, एक आलोचक उसके
बहुत सारे पहलू को प्रकाश में लाता है. आपको क्या लगता है कि आलोचकों ने आपके किस
पक्ष को अलक्षित ही रहने दिया, जिस पर गौर किया जाना था ?
आपने मेरी रचनाओं के संदर्भ में आलोचक और आलोचना की उनके द्वारा अलक्षित होने की
बात की है. तो मैं एक छोटी सी टिप्पणी करूंगा कि सबसे अच्छा आलोचक मैं उनको मानता
हूं, जिन्होंने मेरी रचनाओं को खराब कहा. और दूसरे क्रम में मैं उन आलोचकों को
मानता हूं, जिन्होंने मेरी रचनाओं को अलक्षित किया है. और तीसरा मेरी दृष्टि में
कोई क्रम नहीं है. मेरी उन पाठकों से मित्रता है, जिन्हें मैं जानता नहीं. और जो कम
से कम एक-दो भी हो सकते हैं.
•
आपको किन विदेशी कवियों ने प्रभावित किया है ?
मैं भुलक्कड़ हूं. नाम उन सबके नहीं ले सकूँगा, जिन सबसे मैं प्रभावित होता रहा
होऊँगा. शुरुवात में सोवियत साहित्य ने प्रभावित किया. अंग्रेजी और स्पेनिश ने भी.
वैसे मैं बहुत कम पढ़ा-लिखा हूँ. मैं किसी भी रचना से प्राकृतिक तरीके से प्रभावित
होता हूँ जैसे किसी पौधे या पत्ती को देखकर.
•
यह आधुनिक भारत की कैसी त्रासदी है कि एक आम आदमी के लिये
जिंदा रहना लगातार मुश्किल हो रहा है. जीडीपी और सेंसेक्स के बेशर्म चमचमाते
आंकड़ों के बीच इतिहास में सबसे अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं, देश भर में
आदिवासियों का शिकार किया जा रहा है, भूख और कुपोषण से हजारों लोग मर रहे हैं.
बाज़ार आदेशित कर रहा है और झूठ, छल-कपट, क्रूरता जीवन के मूल्य की तरह बनाये और
बताये जा रहे हैं. ऐसे में साहित्य और साहित्यकार का समाज में हस्तक्षेप किस तरह
संभव है ?
साहित्य को जिस तरह से हस्तक्षेप करना चाहिए, उस तरह से वह कर रहा है. जिस तरह से
वो लिख रहा है, उसके लिखे को हस्तक्षेप ही मानना चाहिए. और इसके अलावा जो कुछ भी
है, वो लिखने के बाद का है. मैंने शुरुआत में ही आपसे ये कहा कि लोगों से बात करने
का सबसे अच्छा तरीका मुझे कविता लिखना लगता है. और मैं ये ही कर सकता हूँ.
•
लेकिन 1967 में फूटे नक्सल आंदोलन, 1974 के छात्र आंदोलन और
उसके बाद 1975 में लगे आपातकाल के दौरान बौद्धिक तबके की एक भूमिका दिखाई देती है,
लेकिन उसके बाद से क्रमशः यह तबका सामाजिक जवाबदेही से हटता चला गया. क्या उनकी
बहसें ड्राइंग रूम या इंडिया हैबिटेट सेंटर जैसी जगहों तक सीमित नहीं हो गई है ?
क्या बौद्धिक समाज पिछले कुछ सालों में लगातार नकारा होता चला गया है ?
इस तरह की अपेक्षा करना कि लेखकों या बुद्धिजीवियों द्वारा हस्तक्षेप हो, जिसे सड़क
पर उतर आना कहा जाता है, किसी लेखक की तरफ अगर कहीं नज़र उठती है कि वो सड़क पर उतर
आये तो शायद अपने इस सड़क के उतरने के काम में असफल होगा.
जिसका लिखा जाना कोई हस्तक्षेप नहीं है, तो लेखक का सड़क पर उतर आना किस तरह का
होगा ? लेकिन फिर भी अगर ऐसी स्थिति बनती है कि यही एक विकल्प है, जो रचना को
छोड़कर है, तो सड़क पर भी उतर आएंगे. नकारा जैसी स्थिति तो है नहीं.
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लेकिन दुनिया के कई देशों में लेखक सक्रिय राजनीति में आए और
उन्होंने सीधे-सीधे सड़क पर उतर कर राजनीतिक हस्तक्षेप किया.
जिन देशों में ऐसा किया गया, उन देशों में लिखना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है.
पाठक के तौर पर भी, नागरिक के तौर पर भी. कथा, कहानी और कविता पर पूरे देश की नज़र
रहती है.
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लेकिन भारत में भी ऐसे कई उदाहरण हैं. जिनमें रेणु जी भी
शामिल हैं और अरुंधति रॉय भी.
ऐसा कुछ नहीं है. मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगता कि अरुंधति राय भी ऐसा कुछ कर रही हैं
जिसे किसी लेखक का सड़क पर उतरने की तरह का हस्तक्षेप माना जाए. बुकर पुरस्कार
मिलने के बाद उनका एक ताकतवर सामाजिक व्यक्तित्व बना, जिसकी वजह से उनका सड़क पर
उतर आना एक हलचल की तरह हुआ.
रचनाकार की ताकत उसके पाठक की ताकत होती है. और यह पाठक समाज का एक बड़ा हिस्सा
होता है. हमारे यहां ऐसा नहीं है. लेखक अपनी रचना से पहचाना जाता है और यह पहचान
बाहरी तौर पर ताकत ही बनती है. और लेखक का ऐसा कुछ नहीं है.
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विकास की अवधारणा को लेकर पूरी दुनिया में बहस छिड़ी हुई है.
बिजींग से बस्तर तक. एक तरफ कारपोरेट कल्चर है दूसरी ओर गिद्ध जैसी लोलुप राजनीतिक
सत्ता है और तीसरी ओर न होने की तरह की नक्कारखाने की तूती जैसी अनसुनी आवाज़ है.
इन सबों के बीच प्रतिरोध के लिये हिंसा की राजनीति भी है. गांधी के देश में हिंसा
की इस राजनीति को लेकर आप क्या सोचते हैं ?
विकास की अवधारणा बाज़ार की अवधारणा के अनुरूप ही बनती है. वैश्विक स्तर पर जो भी
बड़े-बड़े मसले उठाए जाते हैं, उसके बहुत से दूसरे कारण बताए जाते हैं. जैसे संसार
के प्रदूषित होने का. संसार की जो कुछ भी गंदगी है, वह गंदगी गरीबों के द्वारा कभी
नहीं होती. जो कुछ भी कचरा है, वो गरीबों का कभी नहीं होता. गरीब तो कचरा बिनने
वाले होते हैं. सारा कचरा उन अमीर लोगों का है, जो बाजार से केवल डब्बाबंद सामान
खरीदते हैं और उनके कल-कारखाने चलाते हैं. दुनिया में प्रदूषण अमीर देशों से है.
विकास के साथ-साथ बाज़ार चलता हुआ दिखाई देता है, विकास की दिशा वहीं खत्म होती है,
जहां तक बाजार पहुँच चुका होता है. उसके आगे कोई विकास नहीं है. मुझे आश्चर्य है कि
जंगल के सबसे भोले-भाले लोग, आदिवासी सबसे अधिक हिंसा के घेरे में हैं. ये किस तरह
और कैसे हुआ, ये हम जैसे लोगों के लिए अचरज का विषय है.
आदिवासियों के पास जो तीर धनुष जैसा जो हथियार है, ये उनकी अपनी रक्षा के लिए और
शिकार से पेट भरने का उनका अपना साधन है. इसको उतना ही और वैसा ही प्राकृतिक मानना
चाहिए कि जैसे किसी हिरण के सींग होते हैं, जिससे वो अपना बचाव करता है. लेकिन अगर
हिरण एक झुंड़ में खड़ा हुआ है और हिरण के सींग का नुकीलापन आकाश की तरफ मुखातिब
है, ऐसे में उससे अपने बचाव के लिए हवाई हमले की बात करना कैसी सोच है?
जो हिंसा है, वह कभी भी ठीक नहीं है. चाहे नक्सलियों की हो या पुलिस की हो.
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एक ओर राजनीति की मूलधारा से एकदम दूर कुछ-कुछ घृणा की
मुद्रा, वहीं दूसरी ओर साहित्य से कहीं अधिक साहित्य की राजनीति में डूते-उतराते
साहित्यकार. साहित्य की राजनीति क्या साहित्य को समृद्ध करने का काम करती है ?
राजनीति का अर्थ तो कुछ उस तरह का हो गया है कि जो कुछ भी उसके अर्थ निकलते हैं, वो
खराब ही होते हैं. राजनीति जिस तरह की और जैसी है, वो अच्छी कैसे होगी? तो साहित्य
की उन्नति कैसे होगी?
•
देश में जो राजनीतिक दृष्टियां हैं, वे रचना के लिये उपयुक्त
हैं या रचना की अपनी स्वयं की कोई राजनीति या पक्षधरता होती है ?
जो राजनेताओं की राजनीति होती है, उससे रचना का कारण तो जरूर बनता है. और इस तरह से
साहित्य की कोई राजनीति बनती है, उसके बजाय एक कारण बनता है. जो मनुष्य के पक्ष में
होता है. अगर मनुष्य के पक्ष की किसी भी प्रकार की राजनीति साहित्य में दिखाई देती
है तो ये राजनीति अच्छी है. लेकिन जो राजनीति के लोग हैं, उनका मनुष्य का पक्ष
झुठलाने का ज्यादा होता है. लक्ष्य तो सत्ता होती है.
•
पिछले कुछ सालों में हिंदी जगत मानने लग गया है कि अब लिखे
के प्रतिसाद के लिए अंग्रेजी में जाना ही होगा.
नहीं ऐसा दृष्टिकोण तो नहीं है. लेकिन तब भी अगर कहीं भारत का लिखा हुआ अनुवादित
होकर दूसरी भाषा में जाता है तो अच्छी बात है.
•
लेकिन हिंदी में लिखना क्या संताप की तरह नहीं है
? खास तौर पर बड़े पाठक वर्ग को संबोधित करने का मामला
हो और हिंदी का कृपण पाठक संसार हो....
ऐसा तो नहीं है. मुझे ऐसा नहीं लगता है.
अंग्रेजी में लिखना तो मुझे आता नहीं है. अगर मैं अंग्रेजी में लिख सकता तो भी मैं
हिंदी में अपने लिखे हुए का शायद छुट-पुट अनुवाद कर लेता. वैसे मेरे लिखे हुए के
अंग्रेजी में और दूसरी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं. लेकिन ये सब अनायास कारणों से ही
हुए हैं.
•
आपके लिखे पर फिल्में भी बनी हैं. किसी किताब का परदे तक
पहुँचना और फिर उसे एक खास तरह के पाठ के लिए अनिवार्य मजबूरी की तरह स्वीकार किया
जाना, यह सब कुछ कैसा लगता है ?
इसको रचना के साथ न्याय और अन्याय की तरह जोड़कर देखना ठीक नहीं है. फिल्म रचना को
देखने का एक बिल्कुल दूसरा तरीका है. और रचना उसमें आधार की तरह होती है. फिल्म
दृश्य की एक ऐसी रचना है, जिसमें मेरी रचना झलक की ही तरह हो, तो एक कारण की तरह
होती है. जो अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होती है.
14.03.2010,
07.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | manoj kumar jaa (jhamanoj01@yahoomail.com) darbhanga | | | | साफ, सफल और सारगर्भित. बातों में भी बहुत बारीक काम, जैसा कि शुक्लजी कविताओं में हैं. सच ही, जहां लेखक के लिखे हुए से कुछ खास ना हो, वहां उसके सड़क पर उतरने से क्या उम्मीद हो. | | | | | |
| | कृष्ण बलदेव वैद (kvaid@nda.vsnl.net.in) , New Delhi | | | | विनोद जी से बातचीत पढ़ कर एक बार फिर उनकी सादगी और गहराई से प्रभावित हुआ. | | | | | |
| | Vishnu Khare (vishnukhare@yahoo.com) , New Delhi | | | | हमेशा की तरह विनोद जी के विचार बहुत मार्मिक, अंतर्दृष्टिपूर्ण और मौलिक हैं. उन्हें पढ़ कर हमेशा मुझ पर एक नशा-सा तारी होने लगता है. इस बातचीत में उनका एक अलग, बेबाक और जागरुक, प्रतिबद्ध रुप सामने आता है. संसार की कोई भी भाषा उन पर गर्व करेगी, एक इस कमीनी हिंदी को छोड़ कर. पुतुल का संपादन कुछ बेहतर हो सकता था.
वैसे वे मानते हैं कि उनका कोई मित्र नहीं है लेकिन एकतरफा इश्क करने वाले अपने माशूक की ये कातिल अदा भी खूब जानते हैं. | | | | | |
| | रवीन्द्र व्यास () इंदौर | | | | कविता हो, कहानी हो, उपन्यास हो या कोई साक्षात्कार विनोद जी अपने कहे के खास ढंग के बरकरार रखते हैं। उनके कहने का यह खास ढंग ही उन्हें विरल रचनाकार बनाता है। यह साक्षात्कार उसकी एक मिसाल कही जा सकती है। | | | | | |
| | शेखर मल्लिक (shekharmallick@yahoo.com) | | | | विनोद कुमार जी का ये साक्षात्कार बहुत सारगर्भित है. बहरहाल कुछ सवाल उनकी रचनाओं के ऊपर विशेष कर और संदर्भ सहित होते तो अच्छा रहता. प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.
| | | | | |
| | Akhter ali (akhterspritwala@yahoo.co.in) Raipur | | | | विनोद जी को सुनना और पढ़ना, लिखने की तमीज़ को समझना है. मैं विनोद जी के शहर का वासी हूं, ये भी किस्मत की बात है. | | | | | |
| | Ram Kumar Mishra (rkmishra.mahanagar) Mumbai | | | | This interview shows that journalist wants know more about Mr. Shukla but Mr. seems economic to give what he want to get by him. Though it describes that the writer is coutious about his responsibility to the society and current moto of hindi literature. | | | | | |
| | उदय प्रकाश | | | | विनोद जी के कहे में एक खास तरह की सदिच्छा झलकती है, जिसका इशारा आलोक जी ने अपने सवालों में भी किया है. यह बहुत जरुरी है कि रचनाकार अपने समय से भी टकराये. | | | | | |
| | Sanjay Singh Baghel (sanjaysinghdu@gmail.com) Oman | | | | बहुत दिनों बाद मैंने आज कोई इंटरव्यू पूरी पढ़ा और उसका कारण विनोद कुमार शुक्ल जी के विचारों को जानने की इच्छा का होना था. मैंने शुक्ल जी की रचनायें पढ़ी थीं, नौकर की कमीज और दीवार में खिड़की रहती थी. इन दोनों रचनाओं को पढ़ने के साथ ही मुझे लगा था कि शुक्ल जी सहज और शालीनता के सागर है. साथ ही साथ भारतीय मध्य वर्ग की आवाज भी. लेकिन आज इस इंटरव्यू को पढ़ते हुये ऐसा लग रहा था, जैसे मैं किसी दार्शनिक वैतरणी को पार कर रहा हूं. | | | | | |
| | Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) GHAZIABAD | | | | आलोक जी, विनोद जी से विनोद कुमार शुक्ल के बारे मे सुना करता था, पर आपसे उनका यह साक्षात्कार पढ़ कर उसे सुने को जितना सहारा और विश्वास मिला उससे कहीं ज्यादा सोच के स्तर पर फैलाव का आधार भी. जिन मूल्यों की वकालत लोग करते है उनसे बिल्कुल अलग.... शुक्ल जी मूल्यों को गढ़ते नज़र आये, कुछ भी बासी नहीं. आज कितने लोग है जो समझते है उन मूल्यों को? काश शुक्ल जी का सच और उस रहस्य का मकसद इस देश मे पूरा हो पाता. इतने सुन्दर साक्षात्कार से मिले सुख के लिए साधुवाद . | | | | | |
| | सुधा ओम ढींगरा USA | | | | शुक्ल जी मेरे मनपसन्द कवि हैं .. आलोक जी की बातचीत से उनके बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, उनके विचारों से परिचित हुई..प्रश्न जितने स्पष्ट हैं, कुछेक उत्तर उतने ही अस्पष्ट मिले..शायद मेरी अपेक्षाएँ अधिक थीं..प्रश्नों से जहाँ संतुष्टि मिली..उत्तरों से थोड़ी सी अतृप्ति रह गई..इस नाचीज़ ने सिर्फ अपने भाव रखें हैं...क्षमा- प्रार्थना के साथ.
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| | Ajay Kumar , Allahabad | | | | विनोद कुमार शुक्ल जिस तरीके से विषयों को विन्यस्त करते हैं, वह इससे पहले हिंदी में कभी नहीं हुआ है. सुदीप जी ने सही कहा है कि वे अपने समय के सबसे सहज और महत्वपूर्ण कवि हैं. एक ऐसा कवि, जिसके कुछ भी लिखे और कहे में कविता सुनाई पड़ती है. साहित्य के भोपाल और दिल्ली मठ से दूर रहकर विनोद जी ने अच्छा ही किया, वरना वो भी उस्तादी की तरह लिखने लग जाते. | | | | | |
| | sudeep thakur (sudeep.thakur@gmail) delhi | | | | विनोद जी, हमारे समय के सबसे सहज और सबसे महत्वपूर्ण कवि हैं. जो लोग विनोद जी और उनकी कविताओं से परिचित हैं उन्हें पता है कि वे पुरस्कारों को लेकर उतने ही असहज हैं जितना राजधानी की चकाचौंध को लेकर. महत्वपूर्ण यह भी है कि वे सिर्फ कवि ही नहीं व्यक्ति के तौर पर भी सहज हैं. यदि आलोक के साथ बातचीत में वे साहित्यकार के सामाजिक हस्तक्षेप की बात कर रहे हैं तो ऐसा उन्होंने किया भी है. छत्तीसगढ़ के पलायन पर लिखी उनकी कविता रायपुर-बिलासपुर संभाग जिन्होंने पढ़ी है वे बता सकते हैं कि यह कविता सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं है. बस्तर पर लिखी उनकी कविताएं भी आदिवासी समाज में हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ हस्तक्षेप की तरह हैं. | | | | | |
| | सुरेश कुमार भटनागर , नई दिल्ली | | | | इस साक्षात्कार से विनोद जी के की पहलू सामने आते हैं, जो अब तक पढ़ने में नहीं आये थे. आलोक जी अगर विनोद जी से कुछ और बातचीत कर सकें तो हम पाठकों के लिये वो बहुत काम का होगा. | | | | | |
| | sangeeta p rajkot | | | | Its a good interview but his reaction over mannerism cannot be justified. Article is not like human face, if examples are given in this manner then it can be asked that where are eyes and lips of your article? | | | | | |
| | ramesh kumar (rk140676@gmail.com) azamgarh | | | | विनोद कुमार शुक्ल को जितना मैंने पढ़ा है उस आधार पर मैं कह सकता हूं कि विनोद शुक्ल के साथ आलोचकों ने ईमानदारी नहीं बरती. सुपर्णा ने ठीक लिखा है कि वे हिंदी के काफ्का हैं. | | | | | |
| | Vasudev Kumar Sinha , Jamalpur | | | | शुक्ल जी बहुत ही महीन बात करते हैं. लेकिन अभ्यस्ति वाला प्रश्न जस का तस खड़ा है. विनोद जी ने बहुत करीने से जवाब दिया है, फिर भी सवाल खड़ा होता है कि आखिर ऐसा कैसे संभव है कि 'आर्डर पर माल तैयार किया जाता है' के अंदाज में लेखक रचनायें लिखे और कहा जाये कि लिखना उस्तादी की तरह का काम नहीं है. विनोद जी भले खुद इश तरह का लेखन नहीं करते हों, लेकिन 80 फीसदी लेखक तो यही कर रहे हैं. | | | | | |
| | शशिभूषण (gshashibhooshan@gmail.com) तमिलनाडु | | | | विनोद कुमार शुक्ल जी का लेखन आत्मबल बढ़ाता है.मैं समझता हूँ वे कथा और कविता के सत्याग्रही हैं.नौकर की कमीज पढ़कर समय-समाज से जैसी मुठभेड़ करने की ताक़त मिलती है, वह बहुत सी क्रांतिकारी किताबों द्वारा भी संभव नहीं.पर वे अपने कहन की गहराई में कवि ही हैं-सघन और आत्मीय.उनकी पंक्तियाँ धीरे धीर घुलती हैं.वे तनाव नहीं रचती कहीं गहरे अर्थों में आनंदित करती हैं.ऐसा आनंद जो विवेक का ही दूसरा नाम है.कई बार तो इस लेखक की एक पंक्ति ही पूरी कविता जैसी होती है.मुझे इससे कोई शिकायत नहीं कि इस अच्छे लेखक को कम पुरस्कार मिलें हैं.पुरस्कारों की जैसी हालत हो रही है उसे देखते हुए यह भी एक सफलता ही मानी जानी चाहिए.वरना वह दिन दूर नहीं जब इसे एक बुराई की तरह दर्ज़ किया जाएगा कि फलाँ लेखक को अमुक-अमुक पुरस्कार मिले हैं. यह एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार है.इस नज़रिए से भी कि विनोद कुमार शुक्ल जी के बहुत कम साक्षात्कार पढ़ने में आते हैं.जिनका लेखन हस्तक्षेप नहीं, उनका सड़क पर उतरना कितना हस्तक्षेपकारी होगा लेखकों द्वारा इसे गुना जाना चाहिए. | | | | | |
| | snowa Borno (snowa,borno@gmail.com) Leh | | | | Some lady asked me to see the talks. She said : 'If u have time, see it.' I am too stranger to understand the details of different writers, but I reached the essense as a fresh newcomer. A co-writer of mine helped me to catch more. Thanks to all. Vinod ji, I have a window, which keeps a wall within, but the wall is like a 'bedar-o-deewaar'. U can see it in 'Oshiya A New Woman' blog. Even if u have a lot of time, don't go to this blog. It is injurious to the health of Intellectuals.
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| | शहरोज़ (shahroz_wr@yahoo.com) | | | | राजेन्द्र जी के कथन में सौ फीसदी वज़न है!!! | | | | | |
| | राजेंद्र यादव नई दिल्ली | | | | विनोद कुमार शुक्ल को उनकी मंडली ने ही सबसे अधिक हाशिये पर रखा. जो पुरस्कार उन्हें मिलना चाहिये था, उसकी जूरी में उन्हें रख दिया जाता था. भोपाली चौकड़ियों के कारण विनोद जी ब्रांड की तरह नहीं उभर पाये. | | | | | |
| | रंगनाथ सिंह (rangnathsingh@gmail.com) नई दिल्ली | | | | बहुत बढ़िया साक्षात्कार है। इस बहाने हमें विनोद जी के निजी विचार जानने का मौका मिला।
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| | शहरोज़ दिल्ली | | | | कुशल अदीब से एक पारंगत पत्रकार का संवाद कोशिश तो करता है कि कई विमर्श की खिड़कियाँ खुले लेकिन मुझे नहीं लगता कि कवि कामयाब हुए हैं.एकाध जगह मुखर हैं महज़ शुक्ल जी.हुसैन , तसलीमा वाले या अरुंधती वाले मुद्दे पर उनके जवाब से तुष्टि नहीं हो पायी. यूँ बड़े लोग हैं.उनका अंदाज़ भी बड़ा बड़ा होता होगा..हम पिद्दियों को भला क्या समझ में आये!! | | | | | |
| | सुपर्णा (suparna.ghosh@gmail.com) UAE | | | | विनोद कुमार शुक्ल मेरे प्रिय कवि हैं और सच तो ये है कि उनके उपन्यास भी असल में कविता ही हैं. उनका लिखा आज भारतीय साहित्य के केंद्र में होना चाहिए था, लेकिन गिरोहबाजों के कारण ऐसा नहीं हो सका है. वे हिंदी साहित्य के काफ्का हैं. | | | | | |
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