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सलीम खान से बातचीत
समानांतर सिनेमा बकवास है
पटकथा लेखक सलीम ख़ान मानते हैं कि समानांतर
सिनेमा को केवल आलोचको ने जिंदा रखा. हालांकि वे इस तरह की विशेषण पर भी आपत्ति
दर्ज करते हैं. उनकी राय है कि फिल्म या तो अच्छी होती है या बुरी.
यहां पेश है सलीम ख़ान
से रविवार
की बातचीत के अंश.
• आज़ादी के बाद से अब तक के
हिंदी फिल्मों के सफर को किस तरह देखते हैं और अपने सफर के साथ इसके रिश्ते को आप
किस तरह देखते-परखते हैं ?
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सलीम खान |
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इन दिनों सिर्फ जितना मन करता
है लिखता हूं, पढ़ता हूं, घूमता फिरता हूं. ये ही मेरे लिए
काफी है. |
आज़ादी के समय की बहुत-सी यादें मेरे दिमाग में हैं. गिरीश साहब की शहीद है, अशोक
कुमार की समाधि है. सब बेहतरीन फिल्में हैं, बहुत ही कमाल की फिल्में थीं उस जमाने
में. हमने दो दो तीन तीन बार ये फिल्में देखी थीं. उस फिल्म का ये गाना भी बहुत
कमाल का है – गोरे गोरे ओ बांके छोरे, समाधि का ये गाना बहुत मशहूर था.
शहीद का गाना- वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो, वो भी बहुत मशहूर गाना था रफी
साहब का बहुत सूपर डूपर हिट गाना था. और इसी का एक वर्सन खान मस्ताना ने भी गाया
था, तो ये यादें है.
उस वक्त ये ख्याल नहीं था कि मैं फिल्मों से जुडुंगा, या फिल्मों में आऊंगा. हम लोग
इंदौर के हैं तो इंदौर में शनिवार या रविवार को अंग्रेजी पिक्चर आती थी और महू में
क्योंकि वहां काफी मिलिट्री मौजूद थी महू में और ब्रिटिश सेना भी थी, एलाइड
फोर्सेस.
तो हम लोग महू जाकर देखते थे पिक्चर, इंदौर में देखते थे. उस समय फिल्म से यही
ताल्लुक था कि हम फिल्में बहुत देखते थे अंग्रेजी, हिंदी.
शायद कुदरत हमें ट्रेंड कर रही थी कि फिल्में देखो ये काम आएंगी और आज भी वो
फिल्में काम आती हैं, जब हम फिल्म की स्टोरी लिखने बैठते हैं. मैंने हमेशा ये कहा
है अपने आर्टिकल्स में कि मेरे उपर कोई फाउंटेन नहीं है. मैं फिल्में बहुत देखता
था, मेरी मेमोरी बहुत अच्छी है मुझे याद रहती थी फिल्में, सीन याद रहते थे,
कैरेक्टर याद रहते थे, डायलॉग याद रहते थे, और मैं संवेदनशील आदमी हूं. इन सारी
चीजों का मैं इस्तेमाल करता था सही जगह तो मुझे औरों के मुकाबले फायदा ज्यादा था.
हिंदी तो मेरी मातृभाषा है मेरी जुबान है और अंग्रेजी भी पढ़ता लिखता था. तो
अंग्रेजी में भी बहुत किताबें पढ़ी हैं, शायद यह सच हो कि मैं भारतीय फिल्म
इंड़स्ट्री में सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा आदमी होऊंगा. तो ये सब करता था मैं उस वक्त.
ये जो चीजें हैं, जो फिल्म मैंने देखी है, किताबें पढ़ी हैं, उस सब को मैंने लिखने
में इस्तेमाल किया और वे ही काम आईं. ऐसा कभी मैंने दावा नहीं किया कि मैं बहुत ही
कोई टैलेंटेड या कोई पैदायशी लेखक हूं.
• इसके अलावा भी तो आपके लेखन के कुछ स्रोत रहे होंगे ?
जहां तक प्रेरणा का सवाल है मैं लाया गया था यहां एक्टर बनने के लिए. इंदौर के
अमरनाथ थे, जो कि खुद फिल्म निर्देशक थे जिन्होंने बड़ी मशहूर फिल्में बनाई हैं.
जैसे बड़ा भाई, लैला मजनूं और काफी अच्छी- अच्छी फिल्में बनाई हैं उन्होंने.
उन्होंने मुझे ताराचंद बड़जात्या के बेटे कमल बाबू की शादी में देखा था. उन्होंने
कहा कि तुम बंबई आ जाओ. मुझे ना तो स्टेज का अनुभव था, ना कभी काम किया था फिल्मों
में तो मैंने कहा कि चलो कोशिश करके देखते हैं, तो मैं अपनी एमए की पढ़ाई छोड़ कर
बंबई चला आया.
यहां उन्होंने मुझे एक छोटे भाई के रोल में लिया. 1958 से 1965 तक मैंने कोई 25
फिल्में की हैं, सब छोटे मोटे रोल, तीसरी मंजिल, दीवाना, प्रोफेसर. और भी बी ग्रेड,
सी ग्रेड फिल्में भी कीं. मगर मुझे उसमें कोई संतोष नहीं मिल रहा था.
हर एक आदमी की ख्वाहिश होती है कि वो अपने काम में श्रेष्ठतम हो. मुझे लगता नहीं था
कि इस काम में मुझमें इतनी काबिलियत है कि मैं इस काम मैं श्रेष्ठतम हो सकूं, मैं
सबसे टॉप का अभिनेता बन सकूं. तो उससे मैं निराश हो गया था. तो मैं सोचता था कि मैं
क्या करूं.
मेरे साथ पढ़ाई का बैकग्राउंड था और फिल्में भी देखता था, तो मैंने सोचा कि मुझे
लेखक बन जाना चाहिए. मैं फिल्में देखता था तो मुझे लगता था कि उसमें ऐसा हो सकता
था, वैसा हो सकता था. तो हर में बेहतरी ढूंढता था.
अजीत साहब ने कहा कि कहना बहुत आसान है भई, कुछ लिख के तो बताओ, फिर एक स्क्रिप्ट
लिखा जो उनको बहुत पसंद आई. फिर वो दादामुनि, अशोक कुमार साहब को सुनाई तो उनको भी
बहुत पसंद आई, फिर उन्होने खरीद भी ली. वो उनकी बतौर निर्माता पहली फिल्म थी. फिर
उन्होने विक्टोरिया 203 बनाई.
तो जब मैं लेखन के क्षेत्र में आया तो जैसे एक अभिनेता के तौर पर मैंने आत्म अवलोकन
किया था मैंने कि मैं एक बहुत बड़ा अभिनेता नहीं बन सकता. तो लेखन में आकर मुझे ऐसा
लगा कि अगर में 2 % जानता हूं तो अगले आदमी को 1 % से ज्यादा नहीं आता, ये मुझमें
विश्वास था. और यह विश्वास आज भी कायम है.
हिंदी फिल्मों के संदर्भ में मैंने जो किया, बहुत ही मेहनत और सलीके से किया. लेकिन
जब सफलता मिली, जैसे जंजीर में सफलता मिली तो उसके पहले तो हम दो तीन हिट बहुत बड़ी
लिख चुके थे, मगर किसी ने पूछा नहीं था कि किसने लिखी है.
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जंजीर से पहले अमिताभ चलते नहीं थे लेकिन जंजीर जब सफल हुई तो लोगों ने कहा कि ये
फिल्म तो स्क्रिप्ट के कारण चली है, इसके लेखक कौन है. तो लोगों ने कहा कि
जिन्होंने सीता गीता लिखी, हाथी मेरे साथी लिखी, इसके लेखक तो वो हैं, तो पहले की
सारी फिल्मों की क्रेडिट भी इसी फिल्म के साथ मिली. और फिर तो उसके बाद चीजें इतनी
तेजी से होने लगी कि हमें खुद ही समझ नहीं आया.
फिर यादों की बारात, हाथ की सफाई, मजबूर आई, फिर दीवार, शोले आई तो लाइन से सारी
फिल्में करते चले गए. जो पैसा मांगते थे वो मिल जाता था, फिर स्टार भी हमारी
फिल्मों में काम करने के लिए उत्सुक रहते थे. तो हमारे लिए चीजें बहुत अच्छी हो रही
थी. बहुत ही अच्छा पीरियड देखा. हमें तो इज्जत मिली ही मिली, हमारे साथ-साथ हमारे
लेखन विभाग को भी इज्जत मिली. फिर हमने ये कहा कि भई हमारा नाम आना चाहिए, हमें
पैसे बराबर मिलना चाहिए. अपने पेशे को बहुत आदर दिया और चाहा कि बाकी सब भी आदर
दें.
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जंजीर से अमिताभ भी चल निकले |
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उस वक्त तक लेखन ऐसा समझा जाता था कि चलो ठीक है. ना लेखक का नाम आता था, ना उन्हें
अच्छा व्यवहार मिलता था, ना अच्छे पैसे मिलते थे. कुछ भी नहीं, बस कहा जाता था कि
बैठो लिखो. ज्यादा से ज्यादा चाय या सिगरेट के पैकेट का बंदोबस्त हो जाता था. पर
उनके साथ बराबरी के स्तर पर व्यवहार नहीं किया जाता था. पर हमारे आने और सफलता से
अच्छी फिल्में देने के बाद इस विभाग को पहचान मिली और आदर दिया गया.
• आपकी फिल्म से अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन का खिताब
मिला. क्या स्क्रिप्ट लिखते समय भी आपके दिमाग में ऐसा कुछ था कि आपके लिखे से कोई
इस तरह का चरित्र निकल कर आ सकता है ?
यह तो तयशुदा था कि एक इस तरह का किरदार बनाना है. और उससे तकलीफ हुई, क्योंकि उस
वक्त का जो हीरो था वो गाने गाता था, वो लड़की से रोमांस करता था, उस वक्त की
फिल्मों में कॉमेडी ट्रैक होता था. साथ-साथ महमूद, शोभा खोटे, जानी वॉकर ये सब होते
थे फिल्म के अंदर. उसको मनोरंजन समझा जाता था. मनोरंजन तो फिल्म से अलग तो है नहीं
कोई चीज. अच्छी फिल्म, दिलचस्प फिल्म ही मनोरंजन है.
ये सब बातें उस फिल्म में नहीं थी, तो उसका बेचना भी बहुत मुश्किल था. कितने लोगों
ने उस फिल्म को ठुकराया. निर्माताओं, अभिनेताओं जिन्होंने ज़ंजीर को ठुकराया, इसकी
कोई गिनती ही नहीं है. धर्मेंद्र ने ठुकराया, जिनके लिए कहानी लिखी गई थी. इसके बाद
दिलीप साहब ने, राजकुमार साहब ने, देवानंद साहब ने ठुकराया इस फिल्म को.
फिर हम लोग किसी नये चेहरे के बारे में सोचने लगे. ऐसा नया अभिनेता जो कि इस रोल के
हिसाब से गुणवान हो. और हमारी खोज के समय ही अमिताभ बच्चन नये-नये आए थे बांबे टू
गोवा से. और उसमें एक दो सीन बहुत अच्छे थे तो ऐसा लगा कि इस काम के लिए ये व्यक्ति
सबसे सही व्यक्ति है. अगर हमें कोई स्टार नहीं मिल रहा है तो ये अभिनेता ही सही है
इस रोल के लिए. और वो फिल्म बनी और वो ही इस फिल्म के सबसे संतोषजनक भाग थे.
बाकि जो भी हमारी कल्पना थी उससे सारी चीजें कमतर ही रही. पर उनका अभिनय तो हमारी
कल्पना के अनुरूप ही था. क्योंकि कल्पना हमेशा सच्चाई से बेहतर ही रहती है. हम जो
कल्पना करते हैं, जो सोचते हैं, 35 एमएम बाई 75 एमएम के स्क्रीन पर जो चीज़ छोटी
लगती है वो हम पेपर पर कल्पना करते हैं. कुछ ही चीजें ऐसी होती हैं कि भई जो सोचा
था वो हो गया.
जैसे शोले थी. जो भी हमने सोचा, जो भी दृश्य जेहन में थे, स्क्रीन पर हुआ. वो जो एक
जादू था वो हुआ. और उसका कारण ये था कि हर कोई अपने श्रेष्ठतम मुकाम पर काम कर रहा
था और हर किसी ने बहुत बढ़िया टीमवर्क किया. निर्माता कितना भी पैसा खर्च करने को
तैयार थे, कि फिल्म अच्छी बननी चाहिए. स्टारकास्ट ऐसी जो आज इकठ्ठा भी नहीं हो सकती
किसी फिल्म के अंदर. वो फिल्म बनी होगी 2.5 करोड़ में और अब तो उस किस्म की फिल्म
बनाने के लिए मेरे ख्याल से आसानी से 100 करोड़ रुपये लगेंगे या उससे भी ज्यादा.
तो जंजीर की जो बात है, वो ही उस फिल्म के लिए बहुत बड़ा नेगेटिव पाइंट था. क्योंकि
हीरो कभी रोमांस नहीं करता है, उसने कभी लड़की का हाथ नहीं पकड़ा. पूरी फिल्म में
हीरो ने गाना नहीं गाया, रोमांटिक सीन नहीं थे, कॉमेडी ट्रैक नहीं था. और ये फिल्म
पूरी एक किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है. और वो किरदार ही हिट हुआ.
• एक पटकथा लेखक की कितनी भूमिका है फिल्म में ?
बहुत पहले दिलीप साहब में ये बात थी कि जब भी वो किसी एक्टर के साथ काम करते थे तो
वो उसको अपना श्रेष्ठ काम करने का एलाउ करते थे. वो किसी के भी साथ काम करें या तो
वो कोई एक्टर हो, चरित्र अभिनेता हों तो उन्होंने ही पहले जाना कि दूसरे को मदद
करने में ही उसका फायदा है. क्योंकि सामान्यत: ये सोच होती है कि मैं उसको खा गया,
उसकी छुट्टी कर दी. तो अगर ऐसी भावना को निकाल दें तो आप सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं.
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हम देखते थे कि प्राण साहब ने कई फिल्में की हैं उनके साथ. प्रेमनाथजी ने कई
फिल्में की हैं, तो देखिए प्रेमनाथ जी का काम आन में, जबरदस्त....! उन्होंने जाना
कि जब मैं साथी कलाकारों की मदद करूंगा तो मुझे अच्छी फिल्में मिलेंगी. मेरी
कैमेस्ट्री अच्छी रहेगी तो फिल्म में अच्छा लगेगा. आज के ऐक्टरों में ऐसा नहीं है.
वो कहेंगे मैं खा गया, रीटेक करा देंगे दूसरे का अच्छा सीन है तो. या जानबूझ के
कहेंगे मैं अटक गया या एक और ले लो. तो ये सब कभी काम नहीं करेगा.
ये जो सिंथेटक आंसू होते हैं आजकल के, ये भी काम नहीं करेंगे. अगर आपने वो शॉट को
अंदर से फील नहीं किया है तो स्क्रीन पर वो इमोशन दिखेगा ही नहीं. आपको वो
विजुवलाइज करना पड़ेगा और उस इमोशन को फील करके दिखाना पड़ेगा तभी देखने वालों को
मज़ा आएगा. अब हम सीन लिख रहे हैं और कहते हैं कि ऑडियंस को हंसी आएगी. अरे हमें
लिखते वक्त हंसी नहीं आई तो ऑडियंस को कैसे आएगी. तो हमें हंसी आनी चाहिए लिखते
वक्त तभी तो निर्देशक और अभिनेता को सीन करते वक्त लगेगा कि हां इसमें ह्यूमर है.
अगर मैं लिख रहा हूं और मुझे जो आंसू नहीं आ रहे हैं तो मैं फाड़ देता हूं उस सीन
को. अगर मुझे नहीं छू रहा तो लोगों को कैसे छुएगा.
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शोले में सबने मेहनत की |
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यहां एक्टर की भूमिका महत्वपूर्ण है. अगर हम कितना भी कुछ कर लें तो भी डिलवरी उसके
हाथ में हैं. हमारा पोस्टमैन वो है. हम कितना भी अच्छा खत लिख दें, पहुँचाने वाला
वो ही है. चाहे वो किसी भी रूप में हो पिक्चर हॉल में हो, डीवीडी कोई भी हो. वो ही
पहुँचाएगा, तो सबसे ज्यादा वाह वाही भी उसी को मिलती है. पीछे जो लोग हैं कैमरामैन,
निर्देशक, लेखक वो कभी बड़े स्टार नहीं बन पाते हैं, चाहे वो कितना भी बड़ा काम
करें. उनके पीछे कोई भागता नहीं, मीडिया हो, अखबार कोई भागता नहीं है, हिस्टीरिया
नहीं होता.
यहां रोल अच्छा हो तो लोग समझते हैं कि एक्टिंग बहुत अच्छी की है, लोकेशन अच्छा हो
तो समझते हैं कि फोटोग्राफी अच्छी है, स्क्रीनप्ले अच्छा हो तो समझते हैं कि
एडिटिंग बहुत अच्छी है. यहां तक कि फिल्म उद्योग के पुराने लोग भी इसके काम की
तारीफ दूसरे को कर देते हैं. उन्हें मालूम नहीं ये काम आया कहां से, उसकी ओरिजिन
कहां से है.
कुछ रोल होते हैं, अभिनेता होते हैं जिनकी बड़ी तारीफ होती है उसमें लिखने वाले का
एक रोल होता है उसमें. अभिनेता तो सिर्फ लाईन डिलीवर करता है और कुछ भी नहीं करता
है कई बार. उसका रोल इतना अच्छा होता है कि कहते हैं कि उसने बड़ी अच्छी एक्टिंग की
है.
• आज की फिल्मों को आप कहां पाते हैं ?
आज सब है- टैलेंट भी है, पैसा भी है, पर एक असुरक्षा का भाव है तो काम करने का
जुनून कहां से आएगा. चार फिल्में कर लो पांच कर लो ये नहीं चलेगी तो वो चलेगी. पहले
के लोगों में ये जुनून की तरह का था.
मुश्ताक अली, गुरुदत्त, दिलीप कुमार, अशोक कुमार ये कुदरत की देन हैं सब के सब.
आजकल तो सबको न्यूज़ में रहने का शौक है. सब एक जैसे हैं, सब के सब. किसी भी तरह
से, कुछ भी करके न्यूज़ में रहना है. Art is cultured in loneliness and displayed
in public. तो एक अच्छे आर्टिस्ट को बहुत अकेला रहना पड़ता है.
फिल्मों से दुनिया नहीं बदलती है दुनिया से फिल्में बदल रही है. उस वक्त जो हालात
थे जो सरकमटांसेस थे, जो संस्कृति थी, जो मूल्य थे उस तरह की फिल्में बनती थी. आज
मूल्य बदल गए हैं तो वैसी फिल्में बन रही है. कोई समाज को फिल्मों से जोड़कर नहीं
देखता. समाज में रेप तो थे ही नहीं, खबरें सुनने को मिलती नहीं थी, नेता भ्रष्ट
नहीं थे नेहरू, शास्त्री जैसे नेता थे, जो 500 रुपये भी नहीं छोड़े अपने बैंक
अकाउंट में तो ऐसी फिल्में नहीं बनती थी.
आज करप्ट हैं तो फिल्में बनती है. काला पत्थर तब बनी जब चसनाला की माइन धंस गई थी.
हम लोग अपने आस पास से भी प्रेरणा लेते हैं. सोसाइटी में गुस्सा है, भ्रष्टाचार है
तो वैसी फिल्में बनती हैं. जैसा समाज में होता है वैसा फिल्मों में दिखता है.
अखबारों से हम प्रेरणा लेते हैं. गांधी देख के जब मैं निकला तो मुझे लगा कि आज मैं
एक बेहतर आदमी हो गया हूं. और सुधरूं तो इस फिल्म को मैं श्रेय दूंगा.
• एक दौर था समानांतर फिल्मों का. लगता था, जैसे इनका विकास
होगा, इनका नया दर्शक वर्ग बनेगा लेकिन अब तो ऐसी फिल्में ही बनना बंद हो गईं ?
बननी बंद हो गई हैं या पहले ही हो गई थी. वो पहले भी बंद हो गई थीं उन्हें जिंदा
किया जा रहा था. उनका अखबार में, पत्रिकाओं में जिक्र होता था. देखता कोई भी नहीं
था. आज भी कोई नहीं देखता है. व्यवसायिक तौर पर उनको चला पाना संभव ही नहीं था. कुछ
लोग कहते हैं कि हम कुछ कहना चाहते थे हमें पैसे से कुछ मतलब नहीं था. लेकिन ऐसा
होता नहीं है.
स्व. महेश कौल जो कि खुद एक समझदार व्यक्ति थे, कहते थे कि अगर आप कुछ कहना भी
चाहते हैं तो हॉल को फुल होना चाहिए. नहीं कहना चाहते तो भी हॉल फुल होना चाहिए.
किसी भी सूरत में हॉल फुल होना चाहिए. किसको कहना चाहते थे ? खाली चेयरों को ? हॉल
खाली है किसको कहना चाहते थे आप ? फिल्म या तो अच्छी होती है या बुरी, दिलचस्प होती
है या उबाउ. ये जो नाम मिले हैं पैरेलल सिनेमा, थर्ड सिनेमा, प्रायोगिक सिनेमा ये
सब बकवास है.
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• दर्शकों का एक बड़ा वर्ग तो आज मानता है कि अब उनके लिए
फिल्में नहीं बनतीं. अब मल्टीप्लैक्स के लिए फिल्में बन रही हैं. एक खास वर्ग के
लिए.
इस बात से मैं बिल्कुल भी सहमत नहीं होउंगा क्योंकि मुन्नाभाई और लगे रहो, लगान ये
फिल्में बहुत अच्छी फिल्में थी और वो कोई मल्टीप्लेक्सों को ध्यान में रखकर नहीं
बनाई गई थी. डीडीएलजे भी बहुत अच्छी फिल्म थी जो सामान्य लोगों के ध्यान में रखकर
बनाई गई थी. मैं अपनी या अपने बेटे की कोई फिल्म का नाम नहीं लूंगा पर ये सब
फिल्में सामान्य इंसान को ध्यान में रखकर बनाई गईं और उन्हीं के कारण चलीं.
हर किस्म की फिल्में बनी है और हर दौर में बनी है. पहले तो ए, बी, सी ग्रेड में
फिल्में बनती थी. मैंने तो सी ग्रेड फिल्मों में बहुत काम किया है जिनका बनना
मुश्किल था, बनने पर बिकना मुश्किल था. ऐसी फिल्में जो डिब्बों में बंद हैं. मैंने
सात साल उन्हीं पर गुजारा किया है. मेरा कांट्रैक्ट क्या होता था 2000 या 2500.
हंटरवाली, फ्लाइंग मैन, बागी ए रोम, शहरी लुटेरा जैसी फिल्मों में काम कर के ही
रोजी रोटी चलती थी. आज भी बनती हैं सेक्स, जंगल आदि के उपर.
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अवार्ड से दूर |
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इन दिनों सिर्फ जितना मन करता है लिखता हूं, पढ़ता
हूं, घूमता फिरता हूं. ये ही मेरे लिए काफी है. मुझे तीन चार बार
लाइफटाईम अवार्ड के लिए लोगों ने बुलाया मैंने बस मना कर दिया,
मुझे नहीं चाहिए. मुझे नहीं पसंद कि मैं अवार्ड लेकर खड़े हो जाऊं
और कहूं कि ये मेरा काम है. पहले तो ऐसे लगता भी था लेकिन आज सोचता
हूं तो लगता है कि इसमें बहुत सारे लोगों का भी सहयोग है. कई सारे
लोग होते हैं, संपादक होता है ये होता है वो होता है. उनके सबके
इंडीवीजुअल काम होते हैं. फिल्म मेकिंग एक इंडीवीजुअल काम नहीं है.
इसमें लेखक, संपादक, हीरो हिरोइन, निर्देशक है, कैमरामन है इतने
सारे योगदान देने वाले लोग होते हैं. बनने से थेयेटर में चलने तक
कितने सारे लोग इसमें सहयोग करते हैं, प्रमोशन होता है वो भी मदद
करता है फिल्म में. तो उसके लिए अकेले वहां जाकर अवार्ड लेना अच्छा
नहीं लगता है, ये मुझे गलत लगता है. |
मैं सहमत नहीं होता कि चश्मा सर पर रख के, कुरते, झोले के साथ एक्सपेरिमेंटल
फिल्में बनती है. फिल्में अच्छी या बुरी होती हैं. मुन्नाभाई, लगे रहो, मुगल ए आज़म
भी मेरे लिए आर्ट फिल्म हैं. ये दिखाना कि एक आदमी 7 मिनट में चाय पी रहा है आर्ट
फिल्म नहीं है. और मैं आर्ट फिल्म जैसे शब्द पर विश्वास नहीं करता हूं. कोई उन्हें
देखना नहीं चाहता. आर्ट फिल्में तो पहली ही मर चुकी हैं, उन्हें आलोचकों ने ही
जिंदा रखा था.
ये आलोचक जब फिल्म बनाते हैं तो क्या हालत होती है आपने देखा ही है. जब वो हमारे
खिलाफ लिखते तो हम डर के मारे कुछ कह नहीं सकते थे और उनको मस्का लगाते थे. और वो
भी हर ऑफिस में, हर घर में ऐसे पहुँचते थे कि तुम्हारी किस्मत हम बना देंगे.
उन्होंने दो तीन फिल्में बनाई तो क्या हुआ. नाम लेना नहीं चाहूंगा मगर वो समझ
जाएंगे. उन फिल्मों का ढाई घंटा भी चलना मुश्किल है. मशीन, प्रोजेक्टर के बाद भी
किसी ने नहीं देखा. जिंदगी भर फिल्म के कीड़े रहे, फिल्म फेस्टीवलों में जाते रहे
ऑर्गनाइजेशन के पैसे से. गोवा के, ब्रिटिश फिल्म फेस्टीवल में जाते रहे तो क्या
फायदा हुआ. राज साहब, महबूब साहब तो नहीं गए थे. इनकी धौंस निकल गई है.
ये फिल्में बना के बैठ जाते थे और कहते रीलीज़ नहीं होंगी. लोग प्रीव्यू में देखते
थे और तारीफ करते थे पर लेने को कोई तैय़ार नहीं होता था. तो ये मुख्यधारा सिनेमा को
गाली देते थे. हमेशा हिकारत की नजर से देखते थे कि ये क्या बना दिया वो क्या कर
दिया. क्योंकि वे ऐसा नहीं बना पाते थे. खुद कर सकते हो तो फिर बोलो. सत्यजीत रे ने
कहा मैं शोले बनाना चाहता हूं पर नहीं बना सकता. रमेश सिप्पी पाथेर पंचाली नहीं बना
सकते.
गुस्सा भी जरूरी है. हमने गुस्सा दिखाया क्योंकि वो लोगों में पहले से ही था. अगर
ट्रेन में रेप हो रहा है और आप कुछ ना करके ये कहते हैं कि आपको गुस्सा नहीं आता तो
आप झूठ कहते हैं. क्या ऐसा आपकी बहन, बीवी के साथ होता तो भी आप दर्शक बनके रहते.
गुस्सा अच्छा इमोशन है, लोग टेंपर और एंगर में फर्क नहीं करते हैं. गांधीजी में भी
गुस्सा था इस देश को आजाद कराने का. उसको सही रूप से चैनेलाइज करना जरूरी है.
• आपके हिसाब से कैसी फिल्में बननी चाहिए.
फिल्में तो जैसी बनती हैं वैसी बननी चाहिए. आज स्पेस की फिल्में बनती है क्योंकि
आदमी स्पेस में पहुँच गया है. समुद्र की नीचे पहुँच चुका है, तो वैसा दिखाया जाता
है. हम तो सिर्फ समाज पर बनाते हैं. विवाहेत्तर संबंध बहुत होते हैं तो उसपे फिल्म
आई मेट्रो. तो जो समाज में हो रहा है जो चल रहा है वो ही फिल्म में दिखाया जाता है.
समाज का ही आइना हैं फिल्में. डांस पहले के धीरे धीरे से बदल कर तेज हो गया है.
संगीत बदल गया है. अगर आप उनसे अनुसार नहीं बदलते हैं तो आप पीछे छूट जाएंगे.
01.06.2008, 05.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | abhishek (abhishek.ahhiyyan@gmail.com) patna | | | | अनीश जी ने जो इंटरव्यू लिया है, उसे पढ़कर अच्छा लगा. सारे रंगकर्मी को एक होकर अव्यवस्था से लड़ना होगा. | | | | | |
| | Sehar (naisehar@gmail.com) Delhi | | | | इतने अच्छे इंटरव्यू के लिए अनीश और प्रसन्ना दोनों बधाई के पात्र हैं. पर मुश्किल यह है कि जिन्हें इसे देखना और सीखना चाहिए वो अभी भी किसी प्रोजेक्ट या HRD, Culture Ministry या NSD से पैसा जुगाड़ने में लगे होंगे. NSD पास आउट होते ही उनका एक ही मकसद पैसा कमाना रह जाता है | | | | | |
| | Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad UP | | | | प्रसन्ना जी, कमोबेश यही दशा हर जगह है, क्या थियेटर, क्या साहित्य, क्या कला, क्या....! सब जगह पांव पसारे हैं लोग. उनको खुदा अक्ल दे. | | | | | |
| | lavarnya lucknow | | | | इंटरव्यू में प्रसन्ना ने जिस तरह से एनएसडी के केंद्रियकरण और नाट्यकर्म पर उसके आरोपित एकाधिकार को व्यक्त किया है वो निश्चित तौर पर अचंभित करने वाला है. साथ ही भारतीय ग्रामीण समाज की औरतों के रोटी सेंकने को एक कला के तौर पर देखने वाले प्रसन्ना को हम महिलाओं का सलाम. | | | | | |
| | ajit kumar patna | | | | थियेटर पर जितनी भी सामग्री पढ़ने को मिलती है, उससे बिल्कुल अलग किस्म का लगा ये इंटरव्यू. प्रसन्ना ने जिन सवालों को उठाया है. उस पर हिंदी का नाट्य जगत बात करने से बचता रहा है. हिंदी का पूरा थियेटर अभी माफिया के कब्जे में चला गया है. इन्हीं लोगों ने छियेटर में गंभीर बातचीत को काफी मुश्किल सा बना दिया है. एनएसडी के बारे में प्रसन्ना ने जो कहा, वो बिल्कुल दुरुस्त है. इस संस्था की भूमिका पर नये सिरे से विचार होना चाहिए. थियेटर के तथाकथित मबानुभवों को प्रसन्ना की बातों पर ध्यान देना चाहिए अन्यथा धीरे-धीरे ये लोकप्रिय माध्यम अप्रासंगिक हो जाएगा. काफी अच्छा इंटरव्यू. | | | | | |
| | madhuranjan (me_madhuranjan@yahoo.co.in) patna | | | | इंटरव्यु पुराना होते हुए भी प्रासंगिक है... अनीश बधाई के पात्र हैं. क्या इनसे संपर्क हो सकता है. | | | | | |
| | Sudeep Tiwari Toranto, Canada | | | | One of the eminent personality of theatre Usha Ganguli was shareing that she had designed most of her plays for a hindi audience but 99% of the audience is Bengali whereas hardly 20% of the audience is Hindi speaking. So they have never had a language barrier. There is a little difference between theatre in Mumbai and Bengal. There they do not need to popularize any thing. they are not forced to compete with films or Tv serials. There is nothing such as a Saturday or aSunday . The shows keep happening all the time. | | | | | |
| | Ravishankar Pandey Noida | | | | प्रसन्ना से यह सुंदर बातचीत है. जो मुद्दे अनीश जी ने उठाये हैं, उन पर हिंदी जगत बात ही नहीं करता. अचरज है कि हिंदी के महान कहे जाने वाले नामवर सिंह, राजेंद्र यादव की तो इस ओर नजर ही नहीं आती. नाट्य शास्त्र उनके साहित्य और सोच से ही बेदखल है. वैसे भी गाली-गलौच के अलावा उनके पास है ही क्या. काश कि हिंदी के ये महान (?) लोग प्रसन्ना की बात सुन रहे होते. | | | | | |
| | Himanshu Sinha | | | | सलीम खान असल में खुद ही बकवास में विश्वास रखते हैं. इसलिए वे समानांतर सिनेमा को बकवास कह रहे हैं. उनकी फिल्मों में क्या है? सिवाय बकवास के. वे अपनी फिल्मों से न तो मनोरंजन दे पाए हैं और न ही जीवन का सच सामने आता है. वे अधूरी दुनिया की तस्वीर पेश कर के अपने को महान बताने की कोशिश कर रहे हैं. | | | | | |
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