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संवाद | गोविंद मिश्र-राजी सेठ

n  संवाद

 

आयोजनः गीताश्री

 

 

विमर्श और साहित्य अलग-अलग चीजे हैं- गोविंद मिश्र

अब यह एग्रेसिव, घरफोड़ू नारी चाहते हैं- राजी सेठ

 

 

सुप्रसिद्ध साहित्यकार गोविंद मिश्र और राजी सेठ ने इस संवाद में अपने समय की चिंता और दुख को तो साझा किया ही है, हाल के दिनों में चले खास तरह के विमर्शों पर भी सवाल खड़े किए हैं.

 

गोविंद मिश्र: राजी, तुम्हारे इस कमरे में हम सन 70 या 75 के आस-पास से बैठ रहे हैं. मुझे याद आता है जब जैनेंद्र जी थे, अज्ञेय थे, भवानी भाई थे, कैसी अच्छी-अच्छी बैठकें होती थीं यहां. उस वक्त जो माहौल था, कैसे एक किताब अच्छी-सी आती थी और 7-8 लोग जमीन पर ही बैठकर बात किया करते थे. तुम्हें याद है वह रमेश जी, जिनका घर तिलक मार्ग में था?

 

राजी सेठ: हां, हां, खूब याद है.

गोविंद मिश्र: उनके घर कैसी गोष्ठियां होती थीं. मेरी किताब पर उन्हीं के घर कैसी गोष्ठी हुई थी. और फिर 'लाल-पीली जमीन' पर अज्ञेय जी ने अपने ही घर गोष्ठी कराई थी. अच्छा, उस वक्त एक बात थी कि कोई यह नहीं कहता था कि तुम यह लिखो. एक किताब आती थी, उसके हर पक्ष पर चर्चा होती थी. खूब आलोचना होती थी. आज यह वक्त आ गया है कि साहब आप नारी पर ही लीखिए, दलित पर ही लिखिए. यह सब समझाने वाले एक लेखक को हैं कौन? यह एक परिवर्तन मुझे महसूस होता है. दूसरे, पुराने वक्त में कोई भी किताब आती तो जैनेंद्र जी चले आते थे अध्यक्षता करने. कहते थे, “ गोविंद, क्या पता इन्हीं में से कौन अच्छा साहित्यकार निकल आए.” आज गढ़ बन गए हैं छोटे-छोटे.

राजी सेठ: हां, यह मलाल तो मुझे भी बहुत कचोटता है.

गोविंद मिश्र: हां, और यह लोग सिर्फ अपने-अपने की तारीफ करते हैं. पत्रिकाओं का यह हाल है कि बाजार जैसी हो गई हैं. उनका जब भूखा पेट है कि उन्हें लगातार कुछ-कुछ चाहिए और हमें यह भी एक खबर मिली है कि संपादकीय पैसे लेकर किसी की प्रशंसा में लिखे जाते हैं.
(इतना कहकर गोविंद जी राजी सेठ की ओर अर्थपूर्ण ढंग से देखते हैं. फिर दोनों ही हंस पड़ते हैं.)

गोविंद मिश्र: यह जो माहौल अब बदला है, तुम दिल्ली में रहती हो, तुम्हें चुभता नहीं है?

राजी सेठ: नहीं, मैं दिल्ली में नहीं रहती क्योंकि मैं दिल्ली से एक खास मानसिक दूरी बनाकर रखती हूं. यह माहौल मुझे माफिक ही नहीं आता. लेकिन, आपने जो गोष्ठियों की बात कही न, वह गलत है.

गोविंद मिश्र: दिल्ली की ही नहीं, दूसरे शहरों में से कई एक में यही हाल है. यही संस्कृति आ गई है.

राजी सेठ: दूसरे शहरों का तो मैं नहीं जानती पर जहां तक गोष्ठियों की बात है तो पहले किसी की किताब आती थी तो हम खुश होते थे, एक-दूसरे का आदर करते थे. सोचते थे कि अब इसे देखेंगे, खूब लिखेंगे, पर...

गोविंद मिश्र: (बीच में काटते हुए) मुझे तो लगता है इससे साहित्य का बड़ा नुकसान हो रहा है. लेखन की इतनी बड़ी दुनिया को अगर आप सीमित कर देंगे कि अब सिर्फ दलित पर ही साहित्य होगा या फिर नारी विमर्श, नारी मुक्ति, नारी केंद्र पर ही साहित्य होगा, गलत है.

राजी सेठ:
सही, लेकिन थोड़ा तो उनकी यह कोशिश है कि हम समय को दाखिल करें. अब समय को दाखिल करने का यह मतलब थोड़े ही है कि लेखक को खारिज कर दो.

गोविंद मिश्र: क्यों, क्या अब के समय में भी बूढ़ा उसी तरह अकेलापन नहीं जीता?

राठी सेठ: हां, नहीं तो क्या! और आपने तो इस पर बहुत लिखा है.

गोविंद मिश्र: देखिए, समय तो आएगा ही आएगा लेखन में लेकिन बुढ़ापे का अकेलापन, बचपन की समस्याएं, प्रेम, जाने कितनी परेशानियां हैं, जो लेखन में भी रहेंगी.

राजी सेठ: लेकिन आप यह बताइए कि क्या प्राचीन काल से लेकर अब तक कोई ऐसा समय रहा है लेखन में जब नारी न रही हो केंद्र में. हर समय जिस रूप में भी रही, वैदिक काल से लेकर अब तक लेकिन अब यह खास तरह की नारी चाहते हैं.

गोविंद मिश्र: किस तरह की?

राजी सेठ: जैसे एग्रेसिव, घरफोड़ू.

गोविंद मिश्र:
अब बताइए! मुझे तो यह सब ऐसे लगता है, जैसे अस्पताल में होते हैं न, अलां कूल्हे के स्पेशलिस्ट तो फलां सीने के स्पेशलिस्ट. अब यह बन रहे हैं एग्रेसिव नारी स्पेशलिस्ट तो वह बन रहे हैं प्रेम वाली नारी के स्पेशलिस्ट! अब क्या यह होगा साहित्य में !

राजी सेठ: कारण अगर देखा जाए तो चीजें डीसेंटर हो गई हैं. सेंटर तोड़ दिए गए हैं, परिधि पर जितनी चीजें आई हैं, उनको लाओ. और यह माना गया कि स्त्री, दलित परिधि पर रहे हैं हमेशा से, तो अब उनको केंद्र में लाओ, अंदर लाओ.

गोविंद मिश्र: लेकिन परिधि पर जो रहे, वह न?

राजी सेठ: हां.

गोविंद मिश्र: तो एक बात बताइए, मैंने देखा कि एक बड़ी समस्या है कि परिवारों से विदेश चले गए बच्चे. आपके यहां भी तो यह समस्या है न ?

राजी सेठ: हां.
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