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अशोक वाजपेयीः मेरी सारी कविताएं प्रार्थना हैं

संवाद

 

मेरी सारी कविताएं प्रार्थना हैं

मेरी फैंटेसी है कि किसी भी सरकारी अधिकारी को जैसे ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाए,

उसे गोली मार दी जाए और लाश को चौराहे पर लटका दिया जाए.

 

अशोक वाजपेयी से गीताश्री की बातचीत

 

 

अशोक वाजपेयी से बात करना बहुत दिलचस्प है. विषयों और मुद्दों की जितनी विविधता अशोक वाजपेयी के पास है, वह सच में चौंकाने वाली है.

आप नौकरशाह अशोक वाजपेयी को जानने की कोशिश करेंगे तो पता चलता है कि वो रज़ा की किसी पेंटिंग में डूब-उतरा रहे हैं. जब तक पेंटिंग के उन रंगों से आपकी नजर हटेगी, तब तक अशोक वाजपेयी आपसे कुमार गंधर्व पर बतियाना शुरु कर देंगे. आप जब कुमार गंधर्व के हिरणा के पीछे भागेंगे तो अशोक वाजपेयी लुकॉच के किसी उद्धरण की तरफ आपको पकड़ कर लाने की कोशिश करेंगे. लीजिए, आप अभी लुकॉच में ही उलझे हैं और अशोक वाजपेयी प्रेम पर अपनी कोई कविता बता रहे होते हैं. खरगोश जैसे शब्दों की आवाजाही में आप मुग्ध हों इससे पहले अशोक जी “ प्रेम का दूसरा नाम दुख है” कह कर आपको बता देंगे कि मृत्यु ने केवल बुद्ध को ही परेशान नहीं किया.

ASHOK VAJPAYEE

मैं समझता हूं देह के बिना प्रेम संभव नहीं. कम-से-कम मेरे लिए ऐसा प्रेम संभव नहीं, जिसमें मन प्रेम करता है, पर देह नहीं.


जाहिर है, ऐसे में व्यक्ति अशोक वाजपेयी से बतियाना भी कम दिलचस्प नहीं था. अशोक वाजपेयी से रविवार के लिए गीताश्री ने लंबी बातचीत की. विषयों की विविधता में कई बार सवालों के क्रम उलझे या कहीं-कहीं उनमें दोहराव-सा भी हुआ. यहां पेश है उस बातचीत के संपादित अंश.

 

 

अशोक जी, अब तक आपसे बहुत लोगों ने कला पर, संस्कृति पर, साहित्य पर, कविता पर, दुनिया जहान की बातें की. लोग संस्कृति प्रेमी, कला समीक्षक और कवि के तौर पर आपको जानते और सराहते हैं. मैं चाहती हूं कि लोगों को ये पता चले कि 'व्यक्ति' अशोक वाजपेयी क्या है? वो क्या सोचता है विभिन्न विषयों पर? जब उनको नींद आती है तो वो क्या सपने देखना चाहते हैं? जब उनको प्रेम की जरूरत होती है, तब वो किसके पास जाना चाहते हैं?

 

आप प्रेम के कवि भी है तो चलिए शुरूआत प्रेम से ही करते हैं. आप सबसे पहले हमें ये बताएं कि आपको पहला प्रेम, कब और कैसे हुआ?

 

देखिए, मैं ये मानता हूं कि हमको ये जो अवसर मिला है जीने का, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इस बात से निर्धारित, नियमित और उल्लासित होता है कि हम उसे कितने प्रेम से भर सकते हैं. मेरे बारे में प्रेम कवि के तौर पर लोगों ने धारणा बना रखी है कि मैं सिर्फ स्त्री-पुरुष प्रेम का कवि हूं. यद्यपि वो प्रेम का बहुत बड़ा हिस्सा है, पर मैंने और भी प्रेम किए हैं. मैंने अपनी मां पर लिखा है, पिता पर भी लिखा है और बाबा पर भी. ये भी एक तरह से प्रेम का हिस्सा है.

पर... जिस संदर्भ में आप पूछ रही हैं, वो 1959 में जब मैं 18 बरस का था तब मेरी क्लास में एक मेरी सह-छात्रा थीं, उनके साथ मेरा प्रेम-संबंध था. धीरे-धीरे शुरू हुआ, पर बहुत सघन और प्रगाढ़ हो गया. उसकी विडंबना ये थी कि कुछ महीने बाद ही जब जुलाई 1960 में मेरा बी.ए. का पाठ्यक्रम पूरा हो गया तो मैं दिल्ली चला आया. फिर... छुट्टियों में जाते थे तब हम मिलते-जुलते थे, 2-3 साल तक ये सिलसिला चला, पर जब मैं दयालसिंह कॉलेज में अध्यापक हो गया, तब तक उसने भी एम.ए. कर लिया, फिर पी.एच.डी करने के बाद उसका संबंध कहीं और हो गया.

 

क्या आपको लगता है कि कहीं कोई कोई कमी रह गई थी, या फिर दूरी की वजह से आपके प्रेम पर असर पड़ा? पहले प्रेम में ऐसा क्यों हुआ?

 

औरों का मैं नहीं जानता, पर मेरा प्रेम कोई बहुत आदर्शवादी या प्लैटॉनिक नहीं था. वो बहुत गहरा ऐंन्द्रीय प्रेम था, और ऐंन्द्रीय प्रेम में अनुपस्थित मायने रखती हैं. मैं नहीं समझता कि मुझमें या उसमें कोई कमी थी, पर दूरी एक बड़ा कारण थी.

देह और गेह के कवि कहे जाने वाले अशोक जी, आपकी राय में प्रेम में 'देह' की उपस्थिति कहां तक है?

मैं समझता हूं देह के बिना प्रेम संभव नहीं. कम-से-कम मेरे लिए ऐसा प्रेम संभव नहीं, जिसमें मन प्रेम करता है, पर देह नहीं. देह से हटकर प्रेम होता ही होगा, पर मुझे नहीं लगता.

 

प्रेम आपके लिए कितना जरूरी है?

 

बहुत. आप जब जीवन में आगे बढ़ते हैं तब आपकी बहुत सारी भौतिक जरूरतें क्षीण पड़ जाती हैं, लेकिन एक भरा पूरा ऐंद्रीय प्रेम मुझे अब भी चाहिए.

 

क्या आप प्रेम को किसी बंधन में बांधकर देखना चाहते हैं? आपके लिए 'प्रेम' का अर्थ किसी को मुक्त कर देना है, या बांधना है?

 

ये दोनों चीजें एक साथ हैं. पूरी तरह से मुक्ति संभव नहीं. ये एक महत्वाकांक्षा तो हो सकती है, पर संभव नहीं है. पूरी तरह से बांधना भी संभव नहीं. प्रेम मुक्ति और 'बंधन' दोनों के बीच में कहीं अपने आपको अवस्थित करता है, उसकी आकांक्षा तो अधिक मुक्ति की ओर बढ़ने की होती है. पर... अपने को मुक्त करना और दूसरे को मुक्त करना, दोनों ही कठिन है. बर्दाश्त भी नहीं होता.

 

प्रेम स्वयं एक बंधन हो सकता है, भले ही दोनों एक दूसरे को मुक्ति देना चाहें तो भी दोनों एक दूसरे को साथ दे पाते हें, सुख दे पाते हैं, सानिध्य दे पाते हैं, समझ दे पाते हैं, पर मुक्ति, अक्सर नहीं दे पाते.

 

प्रेम की सभी जटिलताएं बंधन और मुक्ति के बीच का संघर्ष है. तो क्या आपको भी कभी इस तरह के संघर्ष का सामना करना पड़ा?

 

कोई भी जीवित व्यक्ति अगर संघर्ष न करे तो आश्चर्य ही होगा.

 

आपने प्रेम और देह को जो एक साथ देखा है, तो आप प्रेमरहित देह संबंध को क्या मानते हैं?

 

देखिए... ये जैविक जरूरत पूरी करने का बहाना है. जरूरी नहीं है कि उसने पड़ने वाले लोगों को वो गहरे तक प्रभावित करे. मेरे लिए इसके कोई मायने नहीं.

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