पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

खेती बर्बाद कर रहे अंतरराष्ट्रीय समझौते

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

जीएसटी से लगेगा जोर का झटका

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

गलत कर्ज नीति के कारण कृषि संकट

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > Print | Send to Friend 

अशोक वाजपेयीः मेरी सारी कविताएं प्रार्थना हैं

संवाद

 

मेरी सारी कविताएं प्रार्थना हैं

मेरी फैंटेसी है कि किसी भी सरकारी अधिकारी को जैसे ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाए,

उसे गोली मार दी जाए और लाश को चौराहे पर लटका दिया जाए.

 

अशोक वाजपेयी से गीताश्री की बातचीत

 

 

अशोक वाजपेयी से बात करना बहुत दिलचस्प है. विषयों और मुद्दों की जितनी विविधता अशोक वाजपेयी के पास है, वह सच में चौंकाने वाली है.

आप नौकरशाह अशोक वाजपेयी को जानने की कोशिश करेंगे तो पता चलता है कि वो रज़ा की किसी पेंटिंग में डूब-उतरा रहे हैं. जब तक पेंटिंग के उन रंगों से आपकी नजर हटेगी, तब तक अशोक वाजपेयी आपसे कुमार गंधर्व पर बतियाना शुरु कर देंगे. आप जब कुमार गंधर्व के हिरणा के पीछे भागेंगे तो अशोक वाजपेयी लुकॉच के किसी उद्धरण की तरफ आपको पकड़ कर लाने की कोशिश करेंगे. लीजिए, आप अभी लुकॉच में ही उलझे हैं और अशोक वाजपेयी प्रेम पर अपनी कोई कविता बता रहे होते हैं. खरगोश जैसे शब्दों की आवाजाही में आप मुग्ध हों इससे पहले अशोक जी “ प्रेम का दूसरा नाम दुख है” कह कर आपको बता देंगे कि मृत्यु ने केवल बुद्ध को ही परेशान नहीं किया.

ASHOK VAJPAYEE

मैं समझता हूं देह के बिना प्रेम संभव नहीं. कम-से-कम मेरे लिए ऐसा प्रेम संभव नहीं, जिसमें मन प्रेम करता है, पर देह नहीं.


जाहिर है, ऐसे में व्यक्ति अशोक वाजपेयी से बतियाना भी कम दिलचस्प नहीं था. अशोक वाजपेयी से रविवार के लिए गीताश्री ने लंबी बातचीत की. विषयों की विविधता में कई बार सवालों के क्रम उलझे या कहीं-कहीं उनमें दोहराव-सा भी हुआ. यहां पेश है उस बातचीत के संपादित अंश.

 

 

अशोक जी, अब तक आपसे बहुत लोगों ने कला पर, संस्कृति पर, साहित्य पर, कविता पर, दुनिया जहान की बातें की. लोग संस्कृति प्रेमी, कला समीक्षक और कवि के तौर पर आपको जानते और सराहते हैं. मैं चाहती हूं कि लोगों को ये पता चले कि 'व्यक्ति' अशोक वाजपेयी क्या है? वो क्या सोचता है विभिन्न विषयों पर? जब उनको नींद आती है तो वो क्या सपने देखना चाहते हैं? जब उनको प्रेम की जरूरत होती है, तब वो किसके पास जाना चाहते हैं?

 

आप प्रेम के कवि भी है तो चलिए शुरूआत प्रेम से ही करते हैं. आप सबसे पहले हमें ये बताएं कि आपको पहला प्रेम, कब और कैसे हुआ?

 

देखिए, मैं ये मानता हूं कि हमको ये जो अवसर मिला है जीने का, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इस बात से निर्धारित, नियमित और उल्लासित होता है कि हम उसे कितने प्रेम से भर सकते हैं. मेरे बारे में प्रेम कवि के तौर पर लोगों ने धारणा बना रखी है कि मैं सिर्फ स्त्री-पुरुष प्रेम का कवि हूं. यद्यपि वो प्रेम का बहुत बड़ा हिस्सा है, पर मैंने और भी प्रेम किए हैं. मैंने अपनी मां पर लिखा है, पिता पर भी लिखा है और बाबा पर भी. ये भी एक तरह से प्रेम का हिस्सा है.

पर... जिस संदर्भ में आप पूछ रही हैं, वो 1959 में जब मैं 18 बरस का था तब मेरी क्लास में एक मेरी सह-छात्रा थीं, उनके साथ मेरा प्रेम-संबंध था. धीरे-धीरे शुरू हुआ, पर बहुत सघन और प्रगाढ़ हो गया. उसकी विडंबना ये थी कि कुछ महीने बाद ही जब जुलाई 1960 में मेरा बी.ए. का पाठ्यक्रम पूरा हो गया तो मैं दिल्ली चला आया. फिर... छुट्टियों में जाते थे तब हम मिलते-जुलते थे, 2-3 साल तक ये सिलसिला चला, पर जब मैं दयालसिंह कॉलेज में अध्यापक हो गया, तब तक उसने भी एम.ए. कर लिया, फिर पी.एच.डी करने के बाद उसका संबंध कहीं और हो गया.

 

क्या आपको लगता है कि कहीं कोई कोई कमी रह गई थी, या फिर दूरी की वजह से आपके प्रेम पर असर पड़ा? पहले प्रेम में ऐसा क्यों हुआ?

 

औरों का मैं नहीं जानता, पर मेरा प्रेम कोई बहुत आदर्शवादी या प्लैटॉनिक नहीं था. वो बहुत गहरा ऐंन्द्रीय प्रेम था, और ऐंन्द्रीय प्रेम में अनुपस्थित मायने रखती हैं. मैं नहीं समझता कि मुझमें या उसमें कोई कमी थी, पर दूरी एक बड़ा कारण थी.

देह और गेह के कवि कहे जाने वाले अशोक जी, आपकी राय में प्रेम में 'देह' की उपस्थिति कहां तक है?

मैं समझता हूं देह के बिना प्रेम संभव नहीं. कम-से-कम मेरे लिए ऐसा प्रेम संभव नहीं, जिसमें मन प्रेम करता है, पर देह नहीं. देह से हटकर प्रेम होता ही होगा, पर मुझे नहीं लगता.

 

प्रेम आपके लिए कितना जरूरी है?

 

बहुत. आप जब जीवन में आगे बढ़ते हैं तब आपकी बहुत सारी भौतिक जरूरतें क्षीण पड़ जाती हैं, लेकिन एक भरा पूरा ऐंद्रीय प्रेम मुझे अब भी चाहिए.

 

क्या आप प्रेम को किसी बंधन में बांधकर देखना चाहते हैं? आपके लिए 'प्रेम' का अर्थ किसी को मुक्त कर देना है, या बांधना है?

 

ये दोनों चीजें एक साथ हैं. पूरी तरह से मुक्ति संभव नहीं. ये एक महत्वाकांक्षा तो हो सकती है, पर संभव नहीं है. पूरी तरह से बांधना भी संभव नहीं. प्रेम मुक्ति और 'बंधन' दोनों के बीच में कहीं अपने आपको अवस्थित करता है, उसकी आकांक्षा तो अधिक मुक्ति की ओर बढ़ने की होती है. पर... अपने को मुक्त करना और दूसरे को मुक्त करना, दोनों ही कठिन है. बर्दाश्त भी नहीं होता.

 

प्रेम स्वयं एक बंधन हो सकता है, भले ही दोनों एक दूसरे को मुक्ति देना चाहें तो भी दोनों एक दूसरे को साथ दे पाते हें, सुख दे पाते हैं, सानिध्य दे पाते हैं, समझ दे पाते हैं, पर मुक्ति, अक्सर नहीं दे पाते.

 

प्रेम की सभी जटिलताएं बंधन और मुक्ति के बीच का संघर्ष है. तो क्या आपको भी कभी इस तरह के संघर्ष का सामना करना पड़ा?

 

कोई भी जीवित व्यक्ति अगर संघर्ष न करे तो आश्चर्य ही होगा.

 

आपने प्रेम और देह को जो एक साथ देखा है, तो आप प्रेमरहित देह संबंध को क्या मानते हैं?

 

देखिए... ये जैविक जरूरत पूरी करने का बहाना है. जरूरी नहीं है कि उसने पड़ने वाले लोगों को वो गहरे तक प्रभावित करे. मेरे लिए इसके कोई मायने नहीं.

आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bimlasehdev (bimlasehdev@hotmail.com) delhi

 
 सब की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं, मन को भाईं. सब की सोच अपनी है. 
   
 

Anamika ()

 
 After reading the article and the reactions of readers this is clear that the intention of the interviewer is already exposed in the eyes of the readers, so nothing is left to be written.
Jayanti ,who has taken interview of Rajendra yadav about his personal sex life and sexual preferences and Geetashree who has asked similar questions to Vajpeyee have proved that such women can stoop to any extend to sell their books. Readers have seen through them . They are completely exposed.
 
   
 

Vigyan Bose () Kolkata

 
 Chaukane ke uddeshya se sex ke bare men sawal poochh kar Geetashree ne kise impress kiya hai yeh to wohi jane par is prakar ke sawal se na to sahitya ka bhala hua na striyon ka.
Doosri baat, unke kuchh fans bhi hain jo unka samarthan na karne walon ko gaali de kar patra likh rahe hain. Yeh sab dayaneeya aur shochneeya hai.
 
   
 

अनंत विजय (anantvijay@yahoo.com) गाजियाबाद

 
 अशोक जी ने पहले प्रेम के बारे में तो बता दिया लेकिन भरे पूरे ऐंद्रिय प्रेम के बारे में कुछ नहीं बताया. संभव है अशोक जी कहें कि गीता ने पूछा ही नहीं. तो गीता जी जब आप अगली बार अशोक जी से बात करें तो बुढापे के प्रेम पर भी बात कर लें. 
   
 

ajey (ajeyklg@gmail.com) Keylong, La-haul, H.P.

 
 अंतिम पेज में कुछ महत्वपूर्ण नहीं है.... मैं अपनी कल वाली राय पर कायम हूं. जिस धूलधक्कड़ में से अपने सपनों की दुनिया बनाने का ख्वाब अशोक वाजपेयी देख रहे हैं, या “देखना चाहते हैं” उस दुनिया को उनहोने कितने करीब से देखा होगा ? हांलांकि उनकी अभिजात्य रूचियों को गलत नहीं मानता. कलावादी शौक से अपनी रूमानी दुनिया में जियें, लेकिन धूलधक्कड़ से जुड़ाव दिखाने का ये पाखंड क्यों ?
टिप्पणियां भी पढ़ी. दुख हुआ कि लोग इंटरव्यू से बाहर की चीज़ों पर बेव़जह उलझ रहे हैं. पर्सनल हो रहे हैं....
 
   
 

ajey (ajeyklg@gmail.com) Keylong , Lahaul, H.P.

 
 अंतिम पेज रह गया. अच्छा इंटरव्यू है. मज़ा आया. एक काफी खराब कवि का सुंदर व्यक्तित्व देख पाया. 
   
 

अंशुमाली (anshurstg@gmail.com) बरेली

 
 यह बूढ़े कवि का आत्म-प्रलाप है। जिसके पास न समाज है, न ही सामाजिक चिंताएं। हर वक्त अंग्रेजी कवियों की जी-हजूरी करने वाले व्यक्ति को आप वरिष्ठ कवि मानते हैं! 
   
 

हिमांशु सिन्हा (patrakar.himanshu@gmail.com)

 
 संजय जी, आप घबरा गए हैं और हकबकाए हुए भी हैं. अब आपको कुछ नहीं सुझा तो पूरी साइट पर ही सवाल खड़े करने लग गए. जब झुठ गढ़े जाते हैं तो शब्द थरथराने लगते हैं. आपकी हालत वैसी ही हो गई है.
मैं आपकी तरह यह नहीं कहूंगा कि ये मेरा आखरी पत्र है क्योंकि मेरी आस्था संवाद में हैं. जार्ज बुश संवाद नहीं करते. आपकी प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद अपने लिखे पर मेरी आस्था और बढ़ गई है.
 
   
 

Sanjay Dwivedi ()

 
 My comment was on the quality of the whole site, not on this particular interview, as I read several articles on the site.
The language used by Mr Himanshu and earlier by Ms Sana Reheman against many other readers is abusive and shows them in very poor light.
No respectable reader would like to be called names like Kameena, Sharm karo etc which Ms Sana has used againt other female readers.
I am sure this is my last letter to the site.I still maintain that talking about personal sex life should not be the main theme of an interview of any public figure.
 
   
 

हिमांशु सिन्हा (patrakar.himanshu@gmail.com)

 
 Sanjay Dwivedi का मेल पढ़ कर समझ में आ गया कि कुछ लोग प्रायोजित तरीके से विरोझ कर रहे हैं. अशोक जी की बातचीत में मैंने किसी संदीप पांडेय की प्रतिक्रिया अब तक नहीं देखी. मतलब ये कि संजय जैसे लोगों ने राजेंद्र यादव और अशोक वाजपेयी दोनों के ही साक्षात्कारकर्ताओं को जानबुझ कर बदनीयती से निशाना बनाने के लिए विरोध करना शुरु किया है. आंखों में पट्टी बांधकर तलवार भांजने वाले इन लोगों को पता ही नहीं चल पा रहा है कि ये कहां से तलवार भांजते-भांजते कहां पहुंच जा रहे हैं. राजेंद्र यादव के साक्षात्कार की प्रतिक्रिया पर बात करते-करते अशोक जी की प्रतिक्रिया पर हमला बोलने लग रहे हैं.

और संजय जी महाराज, Try to improve before you perish. ये धमकी किसे दे रहे हैं ?

इसलिए ही मैंने कहा था कि आप में से कई लोगों में श्री तोगड़िया और ठाकरे और ऋतंभरा औऱ उमा भारती और बुश बनने के लक्षण हैं. ऐसी धमकी तो यही देते हैं. छुप कर वार करने वाले संजय द्विवेदी (अपना ई मेल आईडी तक छुपा कर बतियाने वाले) आप अपनी उत्तेजना शांत करें और धमकाना बंद करें.
 
   
 

Sanjay Dwivedi () Unnao

 
 I dont think that Sandeep Pande and people like him can be called Togariya, Ritambhara or Bush just because they have pointed out that Yadav and the interviewers have not paid any attention to the real issues and have concentrated on their personal sex lives.The way reactions are published in the blog show that very frevelous people have started this with an agenda of self promotion. Even the language of reactions is un finished and ashaleen.Try to improve before you perish.  
   
 

anandkrishan, (anandkrishan@yahoo.com) JABALPUR

 
 अशोक जी पिछले आधी सदी के मत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं. उनकी रचना धर्मिता वस्तुतः युगीन रचनाधर्मिता को व्याख्यायित करती है. वे खरी-खरी कहने वाले और ऐसे विरल कवि हैं, जिसने अपनी कविता में घर, परिवार, पास-पड़ोस, घर के सामने लगे बकुले और काठचंदन के पेड़ों को जीवित रखा और उन्हें नया अर्थ दिया है.
किसी रचनाकार को समझने के लिए उसके व्यक्तिक आयामों का सिंहावलोकन करना जरुरी है. अशोक दी जैसे अनौपचारिक, बेबाक और सच्चे व्यक्ति के साथ ऐसी ही बातचीत हो सकती थी. वे किसी खोल में ढके हुए नहीं हैं.
जिन लोगों को ये साक्षात्कार नागवार गुजरा, उन्हें मेरी ये सलाह है कि वे पूरे समकालीन साहित्य को ही पढ़ना छोड़ दे तो उनका कष्ट कम हो जाएगा. सुकरात से ओशो तक हर युग में सत्य की और प्रेम की बात करने वाले को बर्दाश्त नहीं किया गया. पर इससे सत्य, प्रेम जैसे मूल्य अवमूलित नहीं होते.
 
   
 

हिमांशु सिन्हा (patrakar.himanshu@gmail.com)

 
 आप प्रतिक्रिया देने वाले अधिकांश महान लोगों को मैं शत-शत नमन करता हूं. आप लोगों में जो-जो महान लोग हैं, उनकी राय पढ़ कर लगता है कि अब अशोक वाजपेयी या राजेंद्र यादव जब कभी भी बातचीत करें, आप महान लोगों को भी पास में बैठाएं और आपसे पूछते जाएं. और हां, देश में जहां-जहां भी कोई पत्रकार किसी का इंटरव्यू करे, आप जैसे प्रजाति के कुछ लोगों को भी लेकर जाए, और आपसे पूछे- दद्दा/दाद्दी, ये सवाल पूछूं या ना ? जय हो, जय हो...! आप सब विषयों के विशेषज्ञ हैं, नीति निर्धारक हैं, नैतिकता के ठेकेदार हैं, आप सब में श्री तोगड़िया और ठाकरे और ऋतंभरा औऱ उमा भारती बनने के तमाम लक्षण नजर आ रहे हैं. लक्षण तो आपमें में से कइयों के जार्ज बुश जैसे भी हैं. इसी तरह प्रयास करते रहें,महान तो आप लोग हैं ही, महानतम भी बन जाएंगे. स्नेहाधीन. 
   
 

anil (anil.85@live.com) mehrauli

 
 maine aap sabki partikriyain padhi. interview b padha.smaj mein nahi aata ki itni hai-tauba kayon mach rahi hai. main na paksh le raha hoon. na mujhe is interview koi boorai najar aa rahi hai. ek rachnakaar ko vyakti k taur per jaanne mein kya harz hai. mujhe to maza aaya padh kar. behter ho, is per swasth bahas chlain.aapsi chhichhaledaar se bachain.  
   
 

Bhagwan das Dixit () Chandigarh

 
 This interview does not throw any light on the rachna sansar of the poet, nor about his contribution to Bharat Bhawan etc.
Going through the reactions, it appears that they are also prayojit to propmot Geetashree and not Ashokji
The editor should appoint better interviewers who can extract the best out of a poet not the worst out of him, like what Jayanti has done with Rajendra Yadav.
Think about Hindi literature not personal bookselling.
 
   
 

Jagriti (jagire@gmail.com) Delhi

 
 I was really amused to see how a section of readers are reacting to the interviews of Yadavji and Ashok ji.It is high time we Hindi biradari should take a stock of ourselves and accept new ideas and openness. What is wrong in writing about Sex or love? It is the base of relationship between a man and a woman. How can any one shy away with intimacy? The interview of Yadavji was transparent and Ashokji's was from the heart. Let's welcome the new writing, this is need of the hour. 
   
 

Uday Bhatnagar () Patna

 
 Ashok Vajpeyee is an important signature of his time, whose contribution to literature and related institutions is significant.
Creating controversy about interviewer, who has in fact asked irrisponsible questions is unfortunate. Geetashree has to improve a lot. Too much imphasis on appearing to be bold has been very harmful for these ambitious women who work little to get more.
 
   
 

Bharat Singh () Aligarh

 
 Sana Rehman has reacted to two three other reactions in a way as if she is appointed by Geetashree and Jayanti to speak on their behalf.

About the interview, I also believe that if one interviews a poet and a writer she should cocentrate on those aspects of them which affect their writing. How many women a poet is sleeping with is not a pertinent question. Geetashree does not come across as an informed well read interviewer.
 
   
 

नरेंद्र पटना

 
 अशोक जी ने जो बात की है, वह क्या पर्याप्त नहीं है? अपने खोल से बाहर आएं और इस अच्छी बातचीत करें. और सुधा अरोड़ा कौन हैं ? उनके लिखे से अगर सिलसिला शुरु हुआ है तो फिर राजेंद्र यादव क्या इतने दिनों से घास छिल रहे हैं? या सुधा अरोड़ा को महिला राजेंद्र यादव के रुप में स्थापित करने की कोशिश हो रही है ? 
   
 

कुमार बृजेश पटना

 
 मुझे समझ में नहीं आता कि मीनाक्षी और सखियों को किस बात से आपत्ति हो रही है. क्या इससे पहले उन्होंने कभी किसी साहित्यकार का इस तरह का साक्षात्कार नहीं पढ़ा. अगर नहीं पढ़ा तो पढ़ें. हिंदी में ये बड़ा पाखंड है कि जब कोई देह के मुद्दे पर कुछ पूछता या बताता है तो कथित नैतिकवादी हाय नैतिकता, हाय नैतिकता करके विलाप करने लग जाते हैं. कुछ इस तरह जैसे उनके पास कोई देह नहीं हो और देह पर बात करना अपराध हो. 
   
 

sana rehman (sanarehman701@gmail.com ) new delhi

 
 अनामिका ... जी ... इसलिए नहीं लगा रही कि जिसकी सोच इतनी छोटी है उसके संबोधन में जी लगाकर .. जी शब्द की बेइज्जती नहीं करना चाहती ।
प्रेम और सेक्स पर पूछे गए सवाल साहित्य के लिए गैर जरूरी हैं ये कौन तय करेगा ? पाखंडी नैतिकता वादियों की टोली ? जिसमें आप भी शामिल हैं अनामिका। ये टोली तब क्यों सो जाती है जब गांधी के सेक्स एक्सपेरिमेंट पर देश के जाने - माने चिंतक लेख और किताब लिख डालते हैं ...
सार्वजनिक जीवन में जो आया उसे ऐसे सवालों का सामना करना ही पड़ता है। अनामिका आपको पूरे इंटर्व्यू में प्रेम औक सेक्स ही दिखाई दिया क्यों ? और भी कई सवाल हैं आप उनपर गौर फरमाएं ।
सेक्स पर बात करने में प्रॉब्लम क्या है ?
दुनिया कहां की कहां जा रही है और हम अब भी कूप मंडूक बने रहना चाहते हैं।
दूसरों को frustated कहनें वाली अनामिका मुझे तो आप सबसे बड़ी frustated लगती हैं और वो भी sexually। शर्म करो, सुधरो, कमीनापन छोड़ो। दूसरों को बारबाला का तमगा देने का अधिकार आपको किसने दिया ? कौन जानता है आप अपनी निजी जिन्दगी में क्या करती हैं। मैं फैन हूं जयंतीजी और गीताश्रीजी की इसलिए की ऐसी महिलाएं आपकी तरह पाखंडी नहीं हैं। इन्होंने आपकी तरह मुखौटा नहीं लगाया है। ये आपकी तरह दूसरों को criticise नहीं करतीं बल्कि इनमें इतनी हिम्मत है कि खुले आम अपने विचार व्यक्त करती हैं। अनामिका आप जैसे लोग ही स समाज में गंदगी फैलाने का काम करते हैं। सीखिए गीताश्री जैसी महिलाओं से जो स्त्रियों की आवाज बनती हैं। उनके दुख - दर्द को बांटने का प्रयास करती हैं। कभी किसी दुखियारी के आंसू पोंछ कर देखना भूल जाओगी इस तरह की बातें करना। अपने आपको दूसरों की नजरों में पाक - साफ औरतें ही हैं जो हमारे समाज को गंदा कर रही हैं।
कुछ सवाल पूछें हैं आपसे ... सोचना ... शायद अक्ल आ जाए ।

दृष्टि ,
सिमॉन को अपनी देवी और ideal मानने वाली महिलाओं को प्रेम और सेक्स के सवालों से चिढ़ क्यों है? आखिर ऐसा क्या अश्लील है इन सवालों में?
एक दशक से स्त्री विमर्श के नाम पर महिलाएं प्रेम और सेक्स पर खुल कर लिक रही हैं। फिर बातचीत में पर्देदारी का क्या अर्थ ?
दृष्टि ... मुझे आपकी बात समझ नही आई। एक पढ़ी -लिखी महिला से इस तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जरा घर से बाहर निकलिए दृष्टिजी ... देखिए जमाना कहां से कहां पहुंच गया है। मुझे ये बात समझ ही नहीं ती कि आप जैसी महिलाएं ये ढकोसलेबाजी क्यों करती हैं?
दोगलापन छोड़िये दृष्टिजी .. जो सवाल आपको अच्छे नहीं लगते उन्हीं के उत्तरों के लिए आप अशोक जी को बधाई देती हैं ..वो सवाल आपको गंभीर और ईमानदार नहीं लगते और उन्हीं सवालों के जवाब गंभीर और ईमानदार लगते हैं ... ये दोगलापन क्यों ? और ये भी तो बताइये कि गंभीर और ईमानदार सवाल आपकी नजर में क्या हैं। बस किसी की आलोचना करनी है तो कर दी। दिल दिमाग का प्रयोग कर लिया होता छोड़ा सा। जयंतीजी और गीताश्रीजी से चिढ़ किस बात की है।
आपकी हैसियत क्या है कि आप राजेन्द्र यादवजी के बारे में कुछ बोलें ? क्या समझती हैं आप यादवजी को ? जयंती जी और गीताश्री के काम को आपने देखा है ? कभी पढ़ा है आपने दोनों को ? स्त्री आकांक्षा के मानचित्र पढ़िये ...गीताजी के लेख पढ़िये ...जयंतीजी को पढ़िये ...पहले उस योग्य तो बन जाइये फिर इन लोगों को बारे में कुछ कहिये।
 
   
 

sana rehman (sanarehman701@gmail.com) new delhi

 
 मीनाक्षी ठाकुर जी .... आपकी सोच पर हंसी आती है और फिर उससे ज्यादा आप पर तरस .. पेट में दर्द होने की बात सुनते रहते थे लेकिन कैसे होता है आपकी दो लाइनें पढ़ कर पता चल गया। एक औरत ही एक औरत की दुश्मन होती है मीनाक्षीजी ये आपने सिद्द कर ही दिया। प्लीज किसी पर कीचड़ उछालने से पहले सिर्फ एक बार सोचियेगा क्या वाकई आप दूध की धुली हैं । किसी के सवालों को irresponsible बताने या कहने का आपको अधिकार किसने दिया। गाली तो एक लाख कोई भी किसी को दे सकता है। दिल बड़ा काजिए किसे के अच्छे काम पर खुश होना सीखिए।
मैं भी एक औरत हूं और मुझे इन सवालों में कुछ भी अटपटा नहीं लगा आपको क्या प्रॉब्लम है ? कल को इन्हीं सवालों का जवाब महिला साहित्यकार दें तो आप किसे गाली देंगी ? कुछ लोगों को इस तरह के इंटर्व्यू साहित्य से अलग और निरर्थक लग सकते हैं मुझ जैसे साहित्य प्रेमी को बिलकुल नहीं। हम जानना चाहते हैं कि हमारे जमाने का इतना बड़ा कवि आखिर किस भा। षा में सपने देखता है। मीनाक्षीजी गलत क्या है फैसला आप करेंगी ।
सना रहमान , दिल्ली




 
   
 

Meenakshi Thakur () Kolkata

 
 Hats off to Ashok ji, who has maintained his dignity and given graceful answers to irresponsible questions.Great. 
   
 

Abhishek kumar New delhi

 
 अशोक वाजपेयी से यह सुंदर बातचीत है. अशोक जी प्रेम और मृत्यु के कवि हैं लेकिन कविताओं से अलग व्यक्तिगत जीवन में प्रेम और मृत्यु को वो किस तरह देखते हैं, यह पढ़ कर अच्छा लगा.अशोक जी के अफसरी से संबंधित कोई सवाल नहीं है. उनसे कुलपति होने और भारत भवन के दुःस्वप्न को लेकर भी कुछ पूछा जाना चाहिए था. हालांकि जो कुछ पूछा गया है, वह भी कम रोचक नहीं है. 
   
 

Ramashankar Patna

 
 Kathadesh June 2008 ke ank me Sudha Arora ne apne Aurat ki Duniya stambh me Sartra aur Simon ki baatcheet kya prakashit ki ki Hindi me bhi us tarz par sirf prem , premrahit sex , streedeh par sawal kiye ja rahe hain bagair yeh soche ki na to Rajendra Yadav sartra hain , na Ashok Vajpai . Bharatiya sandarbh me sawaal poochhe jane chahiye . Is desh me hazaron samasyaen hain par in mahilaon ko kuchh aur dikhe tab to us par baat karen .  
   
 

Drishti Bhuvaneshwar

 
 Dhanyavaad itne gambhir aur imandar uttar ke liye . Shuruyat to Gitashree ne bhi Jayanti ki tarah ki thi par Bhala ho Ashok Bajpai ji ka . ki usko apni shaaleenata se line par le aaye .
Yeh mahilayen gitashree aur Jayanti sahi roop me Yadav ji ka naari sanskaran hain !
 
   
 

sayeed ansari (sayeed.ansari@bagnetwork.in ) noida

 
 प्रेम को परिभाषित किया ही नही जा सकता उसे केवल अनुभव किया जा सकता है। ह्दय की गहराइयों से किया गया प्रेम किसी भी सीमा के बंधन से मुक्त है। प्रेम कुछ पाने की आकांक्षा से परे केवल सर्वस्व त्याग का ही दूसरा रूप है। अशोक जी प्रेम के कवि हैं , प्रशासनिक अधिकारी का भी संवेदनाओं से युक्त एक कोमल ह्दय धड़कता है। इसी कोमल ह्दय का स्पंदन उसे गति देता है , उसका संबल बनता है और देता है आगे बढ़ने का दिशा-निर्देश भी।

इस अपूर्व और विलक्षण साक्षात्कार के लिए गीताश्रीजी को मैं साधुवाद देता हूं। प्रतीक्षा रहेगी ऐसे ही अन्य साक्षात्कारों की।

नारी संवतंत्रता की पक्षधर गीताश्री हिन्दी साहित्य जगत की एक सशक्त हस्ताश्रर हैं। बहुमुखी प्रतिभा की धनी गीताश्री की लेखनी स्त्रियों के संवेदनशील विषयों को इतनी सहेजता से कागज पर इसलिए उकेर पाती है क्योंकि उनका कोमल नारी मन अनेकानेक नारियों के मनोभावों का प्रतिबिंब है जो परिस्थितियों से समझौता नहीं करतीं बल्कि उन्हें अपना बनाने की क्षमता रखती हैं।

समलैंगिकता जैसे विषय पर लेखनी चलाना भी गीताजी का एक साहसिक कदम है। ऐसे ही विचारोत्तेजक विषयों पर विचार व्यक्त करके गीताजी विशिष्ट व्यक्तित्व की श्रेणी में आती हैं।

हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
 
   
 

Anamika Chaturvedi ()

 
 Earlier it was Jayanti interviewing Rajendra Yadav and , now there is Geetashree, Yadav's favourite, interviewing Ashok Vajpeyee. Why are these frustrated women obsessed with questions about a writers personal sex life. Ashokji,as a graceful man of repute has tried to give answers as gracefully as he can.
These women should remember that asking about somebody's personal sex life is not literature and by asking such questions thay are not showing any empowerment of their own. This shows them in poor light and proves that women do not know any better. These women should do some reading and should stop acting like Barbalas. Keep that for Hans
 
   
 

Abhishek kumar sinha New delhi

 
 अशोक वाजपेयी से यह सुंदर बातचीत है. अशोक जी प्रेम और मृत्यु के कवि हैं लेकिन कविताओं से अलग व्यक्तिगत जीवन में प्रेम और मृत्यु को वो किस तरह देखते हैं, यह पढ़ कर अच्छा लगा.अशोक जी के अफसरी से संबंधित कोई सवाल नहीं है. उनसे कुलपति होने और भारत भवन के दुःस्वप्न को लेकर भी कुछ पूछा जाना चाहिए था. हालांकि जो कुछ पूछा गया है, वह भी कम रोचक नहीं है. 
   
 

श्रीराम शर्मा फैजाबाद

 
 अशोक वाजपेयी जी से यह बातचीच बहुत महत्वपूर्ण है. अब तक उनके साहित्य पर बहुत पढ़ा लेकिन उनकी पसंद नापसंद और उनके प्रेम को लेकर पढ़ने में नहीं आया था.एक बार उन्होंने बातचीत में कहीं कहा था कि मैं बाहर से हंसमुख, अंदर से उदास और कविता में हमेशा अपने अवसाद को उड़ेलता हुआ व्यक्ति हूँ लेकिन इस बातचीत को पढ़ कर नहीं लगता कि अशोक वाजपेयी ऐसे हैं. 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in