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संवाद | राजेंद्र यादव-अशोक वाजपेयी

संवाद

 

आयोजनः गीताश्री

 

 

यह कविता से साहित्य के मुक्त होने का समय हैः राजेंद्र यादव

आपके पास क्षीण और दयनीय जानकारी हैः अशोक वाजपेयी

 

 

गीताश्रीः हर काल और समय में हिंदी साहित्य की अपनी गति रही है. समय के साथ-साथ इसका स्वरूप भी निश्चय ही बदला है. हिंदी साहित्य और समाज के दृष्टिकोण से देश की आजादी के बाद के 60 साल महत्वपूर्ण रहे हैं. आप लोग आजादी के बाद के समय को गद्य का मानते हैं या पद्य का? आज की कविता गद्यमुखी होने के बावजूद किस तरह अलग है या फिर नहीं है?

 

राजेंद्र यादव: यह जो 60 साल का समय है यह पूरा समय कविता से साहित्य का क्रमशः मुक्त होने का समय है. गद्य का विकास कविता के चंगुल से मुक्त होने के साथ होता रहा तो वहीं जीवित रहने के लिए कविता को या तो गद्यात्मक होना पड़ा है या फिर वो पश्चिम का सीधा-साधा अनुवाद हो गई.

 

अशोक वाजपेयी: देखिए, इसमें कोई संदेह नहीं कि 20वीं शताब्दी के साहित्य की सबसे बड़ी घटना गद्य का उदय और विकास है. हालांकि इसके पहले ही शताब्दियां भी गद्यविहीन नहीं कही जाएंगी पर हां, गद्य इतना सशक्त और व्यापक नहीं था. अब अगर आप यह कहें कि साहित्य कविता के 'चंगुल' से आजाद होने की कोशिश कर रहा है तो यह मुझे बहुत ही अबौद्धिक लगता है. 20वीं शताब्दी सिर्फ भारत में ही नहीं, संसार में गद्य की महान शताब्दी है पर साथ ही साथ, वह कविता की भी महान शताब्दी है. अगर ऐसा न होता तो दूसरा-तीसरा नोबल पुरस्कार कविता को न मिलता.

 

राजेंद्र यादव: तो क्या नोबेल पुरस्कार कोई साहित्यिक मापदंड है?

 

अशोक वाजपेयी: नहीं, नहीं है पर एक मापदंड विश्वव्यापी जरूर है. ऐसे बहुत से साहित्यकार हैं जिन्हें नोबेल नहीं मिला पर फिर भी यह एक विश्वव्यापी मापदंड तो है. दूसरी बात यह है कि इतने व्यापक गद्य के पड़ोस में हिंदी कविता का स्वरूप और स्वभाव भी निश्चित रूप से बदला है. समय पर किसी भी विधा का न तो कब्जा होता है और न ही हक. ‘समय’न तो सिर्फ गद्य का हो सकता है और न ही सिर्फ कविता का.

 

राजेंद्र यादव: पर, मेरा मानना है कि समय के साथ-साथ कुछ चीजें मुर्झा जाती हैं, एक ओर सरकती चली जाती हैं और कुछ हैं जो मुख्यधारा में आ जाती हैं. आज से 50 साल पहले या फिर 20-25 साल पहले किसी भी साहित्यिक बहस में या खंडन-मंडन में या प्रतिवादन में अक्सर कविता का जिक्र हुआ करता था उसे 'कोट' किया जाता था, जबकि अब सारे विश्व में कविता इन सब से अलग हो चुकी है.

 

अशोक वाजपेयी: मुझे यह कहने की इजाजत दीजिए कि आपके पास जो दुनिया की खबर है वह क्षीण और दयनीय है. आप नहीं जानते कि दुनिया में कविता को लेकर बहस आज भी चल रही है. दुनिया की बात न कीजिए, अपनी राय बताइए.

 

राजेंद्र यादव: चलिए, हिंदी की ही बात कर लीजिए. हिंदी में आज जितने वैचारिक विमर्श होते हैं उनमें क्या कहीं कविता है?

 

अशोक वाजपेयी: आज जब वैचारिक संघर्ष की बात करते हैं तो जो संघर्ष निराला और पंत का था वैसा ही प्रेमचंद का भी था. ऐसा नहीं था कि तब सारे वैचारिक संघर्ष कविता तक ही सीमित थे. वैसे भी इन संघर्षों को आप किसी विधा-मात्र से बांध कर नहीं रख सकते. आजादी के बाद भी जो बहसें या चर्चाएं हुई हैं, वह सिर्फ कविता या गद्य पर केंद्रित थीं, यह कहना गलत होगा.

 

राजेंद्र यादव: 1980-90 की बात कहो.

 

अशोक वाजपेयी: हम तो 60 साल की बात कर रहे हैं, अगर आप 60 साल को 20-25 साल में समेटना चाहें तो अलग बात है. आप ही अपनी संपादकीयों में कहते रहे हैं कि हिंदी की आलोचना कविता से प्रेरित रही है और गद्य अपने लिए अपनी विविधता के अनुरूप कोई आलोचनाशास्त्र विकसित नहीं कर पाया.

मैं समझता हूं कि हिंदी आलोचना रामचंद्र शुक्ल के बाद जब-जब मकाम पर पहुंची है वह उसकी अपनी जातीय उपलब्धि ही है. रामचंद्र शुक्ल और उनके बाद हुए बड़े आलोचकों को पश्चिम से प्रभावित बौध्दिक चेतना आलोचना का वाहक नहीं माना जा सकता. हम एक पश्चिमी उपनिवेश थे ही, हमारे गद्य और पद्य दोनों पर ही पश्चिम का प्रभाव पड़ा है इसलिए पश्चिमी प्रभाव से इंकार करना गलत होगा. पर हमने जो कुछ स्वीकार किया है उसे अपनी और घरेलू जरूरतों के अनुकूल बनाया है.

 

राजेंद्र यादव: क्या तुलसी, कबीर या फिर किसी और ने भी हिंदी साहित्य को समझने के लिए कोई अवधारणा विकसित की?

 

अशोक वाजपेयी: बिल्कुल, रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह से लेकर हर किसी ने अपनी-अपनी तरह से अवधारणात्मक काम किया है. आप यह कतई नहीं कह सकते कि सब उधार लिया गया है. पश्चिम हमारे लिए एक द्वंद्वात्मक और असहज उपस्थिति है, सो है. इससे क्या इंकार है?

 

राजेंद्र यादव: पर, क्या इससे मुक्त होने की कोशिश है?

 

अशोक वाजपेयी: इससे मुक्त होने की कोशिश न सिर्फ आलोचना में, बल्कि कविता और गद्य दोनों में है. जिन विभिन्न धाराओं का जोरदार तरीके से समयानुकूल समर्थन किया है दलित और स्त्रियों की धारा, यह अपने आप में वह चीजें हैं जो पूरे सौंदर्यशास्त्र को दोबारा पुनर्विष्कार करने को विवश करती हैं.

 

राजेंद्र यादव: विवश जरूर करती हैं पर फिर वहां साहित्य के अपने सिध्दांत और अपने शास्त्र नहीं रहे. हम समाजशास्त्र में आ गए. अब स्त्री और दलितों को लेकर जो साहित्य है वह समाजशास्त्र पर ज्यादा आधारित है और साहित्य शास्त्र पर कम.

 

अशोक वाजपेयी: यह सही है. दरअसल इसमें दो दिक्कते हैं- पहली यह कि इन धाराओं ने समाजशास्त्री वैधता को ही अपना मुख्य अस्त्र बनाया. दूसरा यह कि अगर भक्तिकाल को देखें तो कुछ दलित बोले और मुख्य धारा से जुड़ गए. स्त्री एक ही बोली- 'मीरा'. पर फिर लंबे समय बाद यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन है. इसलिए इसका शास्त्र हड़बड़ी में इतनी आसानी से नहीं बन सकता है और नहीं बना है. हां, इसने जो विक्षोभ और विचलन पैदा किया है उससे भी इंकार नहीं किया जा सकता.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

PremRam Tripathi (prt9999@gmail.com) Bhopal

 
 अशोक जी एवं राजेंद्र जी अपना अपना अलग अंदाज़ साहित्य को देखने का है इससे यह नहीं समझना चाहिए कि राजेंद्र जी बिल्कुल विरोध में हैं या अशोक जी. हां कुछ पाठक राजेंद्रजी को पोर्न विमर्श का पुरोधा मान रहे हैं तो यह बिल्कुल गलत है क्योंकि लख व कहानियां लेखक द्वारा तत्काल समय में देखा गया समाज ही होता है, अतः उन्हें पोर्न विमर्श का पुरोधा या वेस्टर्न संस्कृति का समर्थक मानना गलत है.

पाठकों की इस राय से मैं भी सहमत हूं कि इन विमर्श करने वालों की निज़ी जिंदगी की खबर भी सबको होनी चाहिए इससे यह पता चल सके कि ये कितने आदर्श का पालन करने वाले हैं, जिससे समाज का कुछ तो भला होगा.
 
   
 

mridula pradhan (mridulap12@gmail.com) D-191,Saket,New Delhi-110017

 
 दूब पर शबनम की चादर थी बिछी
छिंटे पड़े पत्तों पर थे
थी पंखुरी के भाल पर मोती जड़ी
कि ओस इतना था गिरा कल रात भर.
 
   
 

pallav (pallavkidak@gmail.com) udaipur

 
 ऐसी बातचीत बार-बार लगातार होनी चाहिए. जब सोबती-वैद संवाद पढ़ें तो इनका महत्व और आनंद का अंदाजा होगा. 
   
 

ajey (ajeyklg@gmail.com) Keylong

 
 ये एक बेकार की बहस है, लाभान्वित नहीं हुआ. दरअसल बहस कविता पर हो रही हो तो राजेंद्र यादव को उसमें शामिल ही नहीं किया जाना/होना चाहिए. आपको कविता का कोई आदमी देखना चाहिए था. ये तो वही मिसाल हुई कि ईश्वर पर बात करने के लिए आपने चार्वाक जी को बोल दिया. रति सक्सेना, सुशील कुमार की बातें पसंद आईं. शेष तो एक बैड शो...! 
   
 

राजकिशोर (truthonlygmail.com) दिल्ली

 
 कविता समाप्त हो रही है, तो यह चिन्ता का विषय है। महास्वप्वप्न अभी भी बचे हुए हैं। उनके वाहक जरूर कम हो गए हैं। सत्य बोलना कम हो जाएगा, इसलिए क्या यह कहा जाएगा कि सत्य की प्रासंगिकता कम हो गई है ? दलित और स्त्री के बाहर भी ढेर सारी रचना हो रही है। लेकिन उसके पास कोई राजेंद्र यादव नहीं है। शोर या मंच कब से साहित्यिक श्रेष्ठता के मानदंड हो गए?  
   
 

shyam skha rohtak

 
 पहले विश्वदृष्टि सिर्फ अपनों तक सीमित थी, न्याय और समता दो राजाओं के बीच था.
राजेन्द्र यादव का यह कथन ही इनदोनों की बहस का जवाब है ,ये दोनों अंग्रेजो के संरक्षण में देशी रजवाडों जैसे किरदार हैं यादव दलित-स्त्री [अश्लीलता ] के नवाब हैं तो अशोक वाजपेयी सत्ता सुख भोगते साहित्यकार कहला रहें हैं ,अब लेक्चर देकर नाम दाम कमा रहें हैं ,दोनों को साहित्य सृज़न किए बरसों बीत गए ,नामवर भी इसी दौड़ में शामिल हैं. ठीक है बीसवीं सदी में गद्य लेखन ने जगह बनायी है .पर कविता वह भी छान्दसिक कविता हर काल में ,देश में प्रासंगिक रही है छंद ने न केवल भाषा ,संस्कृति अपितु देश व् कौमों के इतिहास को संरक्षित रखा है. आज भी दुष्यंत ,शैलेन्द्र,साहिर लोगों की जुबान पर आ गए हैं जैसे कबीर मीरां ,खुसरो या तुलसी ,कितने आमजन मुक्तिबोध या आगे को जानते हैं ? -श्याम सखा श्याम
 
   
 

सुशील कुमार (sk.dumka@gmail.com) दुमका,झारखंड

 
 कुछ पाठक-कवि-लेखक इस बहस को दूसरी दिशा में ले जाना चाहते हैं। यह सही नहीं है। किसी पाठक के विचार का विरोध तार्किक ढंग से कोई करता है तो ठीक है पर मुख्य मुद्दे से भटकाकर यदि कोई किसी पाठक के ही निजी जिंदगी की बखिया उधेरना चाहता है जिससे वह बोले नहीं, तो यह निंद्दनीय है। इसलिये मैं निवेदन करूंगा कि राजेन्द्र यादव जी और अशोक वाजपेयी जी के विमर्श पर ही प्रतिक्रियाओं को केंद्रित रखा जाय।
बहस को आगे बढ़ाते हुए मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि राजेन्द्र यादव जी किस तरह “हंस” जैसे मंच का दुरुपयोग करते रहे हैं ।‘हंस’,अगस्त 2007 अंक के लिये कवि अशोक सिंह(दुमका,झारखंड) की कविता ‘‘एक सामुहिक शोकगीत:अपने शहर की चर्चित कवयित्री के पलायन पर” को स्वीकृति दी गयी थी। पर उसकी ज़गह शहंशाह आलम( वैसे यह भी मेरे मित्र ही हैं) की एक कविता ‘मृतात्माओं की इस नगर की इस सांध्य बेला में’ यह कहकर छाप दी गयी कि अशोक सिंह की कविता पहले ही कहीं प्रकाशित हो चुकी थी। इसलिये ‘हंस’ छपी रचना को पुन: नहीं छापता। इस आशय की सूचना इस लिहाज़ से आलम की कविता के नीचे बतौर टिप्पणी में भी दी गयी। पर मैं यहाँ यह खुलासा करना चाहता हूँ कि शहंशाह आलम की भी वह कविता ‘दोआबा’ अंक-दो माह जून में यानि दो माह पहले ही छप चुकी थी। दरअसल भीतर की बात यह थी कि वह कविता एक उस कवयित्री के पलायन का भेद खोल रही थी जिससे राजेन्द्र यादव जी के अंतरंग संबंध हैं/थे। मुगालते में उसकी स्वीकृति तो मिल गयी थी पर जब पता चला कि यह अमूक कवयित्री के बारे में है तो यादव जी ने कन्नी काट लिया। उसी प्रकार जब अशोक सिंह ने एक कविता ‘धर्म के ठीकेदारों की ठीकेदारी’ 2005 में भेजा तो ‘हंस’ ने उसे लौटा दिया। पर तीन महीने बाद जब उसी कविता को उसी कवयित्री के नाम से भेजी गयी तो झट ही उसे राजेन्द्र यादव जी ने ‘हंस ’ में लगा दिया। यह सन 2005 की घटना है।
मै सच कहता हूँ कि अगर राजेन्द्र यादव जी के पास ‘हंस’ सरीखा मंच नहीं होता तो वे औसत से नीचे दर्जे के रचनाकार होते। भला कौन सुनता एक अलेखक की बात? यहाँ मैं जितेन्द्र कुमार जी(दुमका) की इस बात से सहमत हूँ कि क्रिकेट की तर्ज़ पर साहित्य की विधा से इन्हें सन्यास ले लेना चाहिए। इसी में इज्जत बची रहेगी वर्ना थुक्कम-फज़ीहत होती ही रहेगी।
-सुशील कुमार( दुमका,झारखंड से)
(ईमेल- sk.dumka@gmail.com)
 
   
 

जितेन्द्र कुमार, दुमका, झारखण्ड(jk.hansniwas@gmail.com) (jk.hansniwas@gmail.com) Dumka

 
 श्री यादव एवं श्री वाजपेयी के सम्वाद एवं इस पर महानुभावों की इन सभी प्रतिक्रियाओं को देख समझ कर एक सामान्य पाठक के रुप में यही कहना चाहूंगा कि क्रिकेट की भांति साहित्य से भी कुछ लोगों के सन्यास का समय आ गया है. समझदारी इसी में है कि सम्मानपूर्वक विदायी ले लें अन्यथा.... 
   
 

आलोक तोमर (aloktomar#hotmail.com) दिल्ली

 
 सुरेन्द्र सिंह परिहार जी का गुस्सा समझ में आता है.जनसता से मुझे क्यों निकाला गया था, ये कहानी तो प्रभाष जी ही बताएँगे मगर मैं पत्रकारिता के निगमबोध घाट की सीढियों पर नहीं बैठा रहा. इतनी तरह के और इतने विविध काम किए हैं कि आप तक को मेरा नाम आज तक याद तो है.

रही मेरी साहित्य की समझ की बात तो ये आप ख़ुद राजेंद्र यादव से फोन कर के पूछ लें जो आज तक मेरे कविता लिखना छोड़ने पर नाराज़ हैं. हिन्दी साहित्य में एमए किया है, सत्तर प्रतिशत अंकों के साथ और इसके पहले की आप कहें कि एमए करने से क्या होता है, लाखों पडे हैं, मैं आपको बता दूँ कि मुझे अपने ज्ञानी होने का कोई दंभ नहीं रहा, और थोड़ा बहुत पढ़ा मैंने भी है मगर हवा में नाम उछालने की आदत नहीं है मेरे भाई.

और अब हंस महिमा भी सुन लीजिये. ये हंसराज कालेज, दिल्ली की पत्रिका थी जिसे अपनी एक मारवाड़ी मित्र से चंदा दिला कर ''खरीदा'' गया था और प्रेमचंद का थापा लगा दिया था. मैंने सारा आकाश नहीं लिखा, ये गलती मुझ से हुई मगर मैं स्त्री विमर्श के नाम पर गंदे मज़ाक किसी को नहीं सुनाता. राजेंद्र जी का हिन्दी साहित्य को अपार योगदान है और उसमें एक यह भी है उन्होंने आप जैसे शुभचिंतक तैयार किए हैं, आप से मेरा कतई कोई कैसा भी बैर नहीं मगर अभिव्यक्ति के लोकतंत्र में मेरे एक असहमत वोट पर इतना गुस्सा?

रही चंद्रास्वामी के लाखों की बात तो उनके दिए डेड़ लाख से जो संस्था मैंने शुरू की वो तब से अब तक २-३ करोड़ का शब्दों का कारोबार कर चुकी है.स्वामी जी के पैसे भी उनके पास पहुँच गए हैं, वैसे जब मैंने डेड़ लाख लिए थे, तब उनकी हैसियत अरबों की थी. आशा है सानंद होंगे. चाहें तो सीधे लिखिए: aloktomar@hotmail.com. phone: +91-9811222998
 
   
 

जगत मोहन शरण (jagatmohansharan@gmai.com) नयी दिल्ली

 
 यह कैसे मान लिया जाये कि सुरेन्द्र सिहं परिहार राजेन्द्र यादव के बचाव जो कह रहे हैं,वह प्रायोजित नहीं है.मैं हिन्दी साहित्य का एक मामूली पाठक हूं तो क्या मुझे राजेन्द्र यादव सरीखे लोगों पर जो कि मुझे निहायत बोगस लगते हैं,सवाल उठाने का हक नहीं ?अपनी गाढी मेहनत की कमाई से २५ रुपये निकाल कर मैं जो 'हंस' खरीदता रहा, बौद्धिक सामग्री के नाम पर क्या हर माह यादव जी की लीद उठाने और कहानियों के नाम पर कुछ अधेड़ महिलाओं द्वारा लिखित पोर्नोग्राफी पढने के लिये ? क्या मुझे यादव जी से यह पूंछने का हक नहीं कि नारी-विमर्श का अर्थ केवल योनी-विमर्श होता है?यादव जी बुढापे में इसके अलावा कर क्या रहे हैं ?
सम्भव है कि स्त्री और सेक्स को लेकर यादव जी की अपनी कुछ निजी व्याधियां रहीं हों (बहुत से उम्र - दराज़ लोगों की होती हैं) तभी तो वे आज इस उम्र में भी खुद को गोपियों से घिरे किशन -कन्हैया साबित करने और अपनी 'मेचो-इंस्टिंक्ट' का एक भोंडा, विदूषकीय और गैर-ज़रूरी प्रदर्शन करने पर तुले रहते हैं.(मन्नू भंडारी उनके इन एडवेंचरों खूब लिख ही चुकी हैं) लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि एक सार्वजनिक प्लेटफ़ार्म पर यादव जी माहराज जो कुछ भी उवाच करें उसे जस का तस स्वीकार कर लिया जाये? तमाम श्रद्धेय मूर्तियों को उठा कर पटक देने की वकालत राजेन्द्र यादव ही तो करते रहे हैं. तो मेरे जैसे एक मामूली पाठक के द्वारा उनकी इस महान मूर्ति को उठा कर पटक देने पर एतराज़ क्यों ?.
परिहार जी मुझे शालीनता का पाठ पढाने चलें हैं,वे यह क्यों नहीं देख पाते कि राजेन्द्र यादव ने 'हंस' पत्रिका में किस तरह औरत को केवल एक सेक्स-वर्कर बना देने की एक भयानक मुहिम छेड़ रखी है. अपने से असहमत सारे पत्रों और लेखों को वे दबा देते हैं. और इतना ही नहीं, इस दोयम दर्ज़े के बौद्धिक के बचाव में हमेशा ही कुछ चापलूसों का एक दल खड़ा हो जाता है. ? यादवजी का 'होना-सोना' सम्पाद्कीय, या अभी 'हंस' के जून अंक का सम्पादकीय या 'हासिल' कहानी में व्यक्त राजेन्द्र यादव के निजी पराक्रमों को यदि परिहार जी ने पढा होता तो वे मुझे शालीनता का पाठ पढाने न चलते.
हमें इस बात का जवाब भी कभी नहीं मिलता कि इस महान सम्पादक के सारे तथाकथित दलित- विमर्श और हिन्दी में लिखे जा रहे दलित साहित्य को अहर्निश अपने सम्पाद्कीयों का टेका देते रहने के बावजूद हिन्दी प्रदेश से आज तक कोई महत्वपूर्ण और बड़ा दलित लेखक उभर कर क्यों नहीं आया है?
अंत में इतना ही कहना चाहता हूं कि यह साहित्य के कविता से मुक्त होने का समय हो या न हो पर राजेन्द्र यादव सरीखे लोगों से मुक्त होने का समय तो अवश्य ही है.
 
   
 

सुरेंद्र सिंह परिहार , जमशेदपुर, झारखंड

 
 बहुत अच्छी बातचीत है. लेकिन प्रतिक्रियाएं प्रायोजित लगती हैं. ऐसा लगता है कि सबने बहुत सोच-समझ कर राजेंद्र यादव पर हमला बोला है.

आलोक तोमर से शुरु करें तो उनके ही अंदाज में पूछा जा सकता है कि पत्रकारिता के निगम बोध घाट की सीढ़ियों पर तो आप उसी समय बैठ गए थे, जब आपको जनसत्ता से निकाला गया था.और आपको साहित्य की इतनी समझ कब से हो गई कि आप राजेंद्र यादव और अशोक वाजपेयी को समझ सकें ? आप तो चंद्रास्वामियों की गोद में ही अच्छे लगते हैं, जिनसे गाहे-बगाहे लाखों रुपए लेना आपने खुद स्वीकारा है.

जितेंद्र जी, पंकज जी, आपने भी अशोक वाजपेयी पर आलोक वाले अंदाज में ही लेकिन शालिनता से हमला बोला है. यूरोप का जूठन तो राजेंद्र यादव उठाते रहे हैं. ये स्त्री विमर्श जब वहां से हकाल दिया गया तो राजेंद्र यादव ने उसे लपका. रही बात अशोक जी के मदन, उदयन और ध्रुव जी को आगे बढ़ाने की तो ये तीनों लेखक अपनी रचनात्मकता में उतने ही बड़े हैं, जितना ये नजर आते हैं. इनके होने में अशोक वाजपेयी का उतना ही योगदान है, जितना किसी दूसरे लेखक के लिए अशोक जी करते हैं.

संदीर औऱ जगत जी, आप पाठक हैं यह बात तो समझ में आती है लेकिन एक पाठक इतना अशालिन कैसे हो सकता है कि वह लेखक को गरियाना शुरु कर दे. सूरज पर थूकने की कोशिश में आपके चेहरे पर बहुत कुछ लुथड़ा-पुथड़ा गया होगा. अच्छा तो यह होगा कि आप दोनों जिस तरीके से राजेंद्र यादव की लानत-मलामत में जुटे हैं, उतनी ऊर्जा कुछ लिखने में लगाते. संभव है, सारा आकाश आप न लिख पाएं तो भी धूल-मिट्टी कुछ तो लिख ही जाएंगे.
 
   
 

राजेश उत्‍साही () भोपाल

 
 पहली बार अशोक वाजपेयी जी और राजेन्‍द्र यादव का सीधा संवाद पढ़ा । समझ में आया कि क्‍यों दोनों को दो विपरीत ध्रुव की तरह देखा जाता रहा है।  
   
 

राजेश उत्‍साही () भोपाल

 
 पहली बार अशोक वाजपेयी जी और राजेन्‍द्र यादव का सीधा संवाद पढ़ा । समझ में आया कि क्‍यों दोनों को दो विपरीत ध्रुव की तरह देखा जाता रहा है।  
   
 

rati saxena trivandrum

 
 मुझे तो इस बातचीत में कुछ भी नया या संवाद करने वाली कोई बात नहीं लगी, ये तो अपनी ढपली अपना राग है, साहित्य और समाज को बुद्धीजीवी नहीं बल्कि लेखन और पाठन तराशता है, लेखक और मुक्ति अपने अहम से लेनी चाहिए ना कि साहित्य से... मैंने बड़े चाव से लिंक खोला था कि कुछ नया पढ़ने को मिलेगा...परन्तु...चलिए इससे पता तो पड़ता है कि हमारे बौद्धिक जन क्या सोच रहे हैं।

 
   
 

सुमन कुमार घई, सम्पादक- sahityakunj.net; मुख्य-सम्पादक - कनेडियन पत्रिका (sahityakunj@gmail.com) टोरोंटो, कनाडा

 
 राजेन्द्र यादव को मैं साहित्यकार न मान कर एक वर्ग विशेष का कहानीकार ही मानता हूँ। प्रायः होता है कि रचनाकार केवल समय के एक छोटे से पक्ष में जब सफलता प्राप्त करता है तो उसी में उलझ कर रह जाता है। आमतौर में कहानीकारों से ऐसी बातें सुनने में आती हैं जैसा की राजेन्द्र यादव ने कहा - कोई भी नया विचार या नई बात नहीं है; हाँ जैसा कि एक पहले टिप्पणीकार ने कहा है; वाक्‌पटुता है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि आज की कविता अमूर्त होने के कारण आम पाठक से दूर हो जाती है। पर ऐसा समय समय पर हर विधा के साथ होता है। प्रयोगवाद सदा ही सफल हो; ऐसा किसी भी भाषा - देशी या विदेशी, के साहित्य में नहीं होता। राजेन्द्र यादव की साख केवल उनके कहानी सफलता के दौर के कारण है और भारतीय संस्कृति कर्म-प्रधान न होकर व्यक्ति-प्रधान है; और पुराने लेखक प्रायः उसे पूरी उम्र भुनवाते रहते हैं। ऐसे लोगों से अक्सर सुनने में आता है, "छाया तो पुराने वृक्ष की होती है"। मेरा सदैव उत्तर रहता है, "ऐसे वृक्षों की छाया में कुछ उगता नहीं है, और जो अंकुर प्रस्फुटित होता भी है वह मर जाता है"।
पुराने मठाधीश न तो किसी नई विचारधारा या जो विचार उनके अपने मस्तिष्क की उपज न हो, को स्वीकार कर पाते हैं और न ही उसे मान्यता देते हैं। अपनी वाह-वाह को केवल अपने इर्द-गिर्द सीमित रखने के लिए साहित्य कि पूर्ण विस्तार को केवल संकीर्ण दृष्टि से देखकर उसीमें बाँध देना चाहते हैं ताकि उस संक्षिप्त वृत्त में वही सबसे बड़े लगें। इस कूप-मंडूक मानसिकता का हर माध्यम में खंडन होना आवश्यक हो जाता है।
अंतरजाल के समय से पहले ऐसे मठाधीशों का मुद्रित माध्यम पर पूरा नियंत्रण था और जो उनकी विचारधार से मेल नहीं खाता था वह सुबह का सूरज नहीं देख पाता था। आज की संभावनाओं और सच्चाई को यह लोग न तो समझ पा रहे हैं और न ही उसे अपना पा रहे हैं।
कविता युगों-युगों से समाज के दैनिक जीवन में रची-बसी है। चाहे वह लोकगीतों में हो या रीति-रिवाज़ों के गीतों में। कविता का सम्बन्ध सीधा अवचेतन से होता है; लेखक का भी और पाठक का भी। यही काव्य-शक्ति है। किसी भी समाज में भाषा की समृद्धि उस समाज के संपूर्ण विकास का द्योतक होती है और भाषा का अलंकार साहित्य है, जो उसीसे उपजता है उसे ही सजाता है। साहित्य की विधाओं की विविधताओं को, और उनके अमूल्य योगदान को न समझ पाने वाला अपने आपको इतना ऊँचा समझ ले जैसा की राजेन्द्र यादव ने स्वयं को समझा है; दयनीय है।
 
   
 

जगत मोहन शरण (jagatmohansharan@gmai.com)

 
 राजेन्द्र यादव का एक ही फार्मूला है कि बेमतलब के विवाद खड़े करो और चर्चा में बने रहो. कविता और कवियों को लेकर वे जो अक्सर अपनी बात करते रहते हैं ,यह उनके उसी फार्मूले का एक अंग है.आदरणीय यादव जी यदि सिर्फ़ दयनीय रूप से अपढ़ ,अबौद्धिक और विचारविहीन व्यक्ति ही होते तब भी कोई हर्ज़ नहीं था पर वे तो वे परले दर्ज़े के घाघ भी हैं. लेकिन उनकी समस्त सतही बौद्धिकता के बावज़ूद हम यह नहीं मानते कि उन्हें इतनी मोटी जानकारी भी नहीं कि कि बीसवीं सदी के तमाम मुक्ति-संग्रामों और संघर्षों में अलग अलग देशों और समाजों मे कविता की कितनी अहम भूमिका रही है.लेनिन,माओ और हो ची मिन्ह अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच भी कवितायें लिखते रहे. पहले और दूसरे महा युद्ध में मोर्चे पर जीवन और म्रुत्यु के बीच बंकरों मे कवितायें लिखी जाती रहीं .अफ़्रीकी और लातिनी अमरीकी देशों में सारी उथल- पुथल के बीच लिखी गयी कविता का महत्व इन देशों के कथा साहित्य से उन्नीस नहीं है.अभी अभी फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश का निधन हुआ है .यादव जी से यह उम्मीद तो बेमानी होगी कि अपनी बयासी बरस की पकी उम्र में अब वे अपनी इस बौद्धिक गधापचीसी से बाहर निकलेंगे और इस बात को स्वीकार करने का एक सामान्य अदब दिखायेंगे कि फिलिस्तीनी जनता के दुख-दर्द से महमूद दरवेश की कविता का कितना गहरा रिश्ता था. हमारे अपने देश में काज़ी नज़रूल,निराला,मुक्तिबोध,शंख घोष,वरवर राव ,धूमिल,पाश ,नारायण सुर्वे या नामदेव ढसाल कविता से क्या काम लेते रहे यह भी श्रीयुत राजेन्द्र यादव की चिन्ता का विषय नहीं है.अब ऐसे तथाकथित 'कथा-नायक 'को उठा कर किस हिन्द महासागर में फेंक दिया जाये? हे नरों में श्रेष्ठ नर यादव महाराज जी,सवाल इस बात का नहीं है कि कविता कितनी अप्रासंगिक हो चुकी है या कहानी कितनी महान भूमिका निभा रही है, सवाल यह है कि इन तमाम बहसों को उठाने के पीछे आपकी मंशा और नीयत क्या है? अशोक बाजपेयी के साथ इस छोटी सी बातचीत में ही यह साफ़ हो जाता है कि आपका बौद्धिक स्तर क्या है? बेहतर तो यही होता हे यादव जी कि २० वीं सदी में कविता और कहानी जैसी विधाओं के आपसी लेन-देन रिश्तों को समझने के इस जटिल विमर्श और कुछ सू्क्ष्म किस्म के बौद्धिक झमेले से आप अपने को दूर रखते और इस उम्र में अपनी काक-दृष्टि और अपनी सारी ऊर्जा नारी-विमर्श बनाम औरत की देह पर टिकाये रहते. 
   
 

संदीप शंकर पटना

 
 राजेन्द्र यादव पिछले अनेक वर्षों से कविता बनाम कथा की यह निहायत तर्कहीन बहस चलाना चाह रहे हैं.गनीमत यही हैं लोग उनकी इस बाल सुलभ समझ को गम्भीरता से नहीं लेते .वे इतनी सी बात जीवन की इस संध्या में भी नहीं समझ पाये हैं कि साहित्य में विधाओं की ज़मींदारी नहीं चला करती. हर विधा एक दूसरे के बुनियादी तत्वों से स्वयं को पोषित करती है और कई बार तो पुनराविष्कृत भी करती है.वे यह बात अक्सर दोहराते रहते हैं कि बीसवीं सदी में साहित्य ने स्वयं को कविता से मुक्त किया है.जरा वे बतायें कि आधुनिक समय के सबसे बड़े गद्यकारों जैसे कि प्रूस्त,काफ़्का,वर्जीनिया वुल्फ़,बोर्खेज़,मार्क्वेज़,मिलान कुन्देरा, नज़ीब महफ़ूज़ क्या अपने लेखन के सबसे मर्मान्तक क्षणों मे कविता की सघनता,अतीन्द्रीयता और जादुईपन तक नहीं पहुंचे हैं ?

हिन्दी कथा की दुनिया में ही लीजिये, निर्मल वर्मा,रेणु , ज्ञानरंजन, विनोद कुमार शुक्ल या उदय प्रकाश के गद्य में क्या कविता के तत्वों की वह अनोखी भूमिका नहीं है जिनकी वज़ह से उनका गद्य ऐसे राजेन्द्र यादवों के गद्य की तुलना में अनेकस्तरीय और अनेक पर्तों वाला लगता है और हिन्दी के पाठकों को अधिक आकर्षित करता रहा है? दरअसल राजेन्द्र यादव की दिक्कत यह है कि बुनियादी रूप में वे एक बेहद बौड़म और मिडियोकर रचनाकार हैं और इसीलिये उस आत्म-विश्वास से हमेशा भरे रहते हैं जो उन जैसों को सहज ही उपलब्ध हो जाता है और बेतुकी बहस और कुतर्क करते रहते हैं.दुख इस बात का है कि ' हंस 'के माध्यम से उन्होंने लद्धड़ और अपठनीय किस्म का गद्य लिखने वालों की एक बडी फ़ौज़ पैदा कर दी है. यही उनका हिन्दी कथा साहित्य को सबसे बडा योगदान है .
 
   
 

Govardhan Gabbi A Punjabi writer 09417173700 (govardhangabbi@rediffmail.com) Chandigarh

 
 राजेंद्र जी ने बहुत कोशिश की है वाजपेयी जी को सवालों के घेरे में समेटने की...मगर वाजपेयी जी डंटे रहे. हर सवाल का उत्तर बहुत गहराई से दिया. स्त्री और दलित लेखन को जो इस बातचीत में जो लाया गया है, वह चिंतनीय और विचारणीय है. कविता और गल्प के बीच के फासले और मायनों को अच्छी तरह से विचारे गए...गीताश्री का हस्तक्षेप भी अच्छा है.कुल मिला कर बातचीत मूल्यवान है. 
   
 

सुशील कुमार (sk.dumka@gmail.com)

 
 महामहिम राजेंद्र यादव जी और अशोक वाजपेयी जी दोनों ही वाकपटु हैं। पहले तो राजेंद्र यादव जी पर आता हूँ। इनकी न तो घर में पटी न बाहर। मन्नु भंडारी जी के साथ इन्होंने जो-जो किया, वह क्या जगज़ाहिर नहीं है? इस बूढ़ापे में भी उनके पास स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श के सिवाय कोई विषय बचा नहीं है। बस मंच मिलने भर की देर है ! और शुरु हो जाते हैं। वैसे यह 'विमर्श' शब्द ही उन आधुनिकतावादियों के शब्द हैं जो पश्चिम की बुर्जुआ-संस्कृति के नुमाईंदे हैं। यह तो 'वन- वे- ट्राफिक' की तरह है। जो सुनाया जा रहा है, बताया जा रहा है, चुपचाप उसे सुनते रहो और अपनी मौन स्वीकृति भी देते रहो। बस बोलो मत। कुछ कहना है तो पक्ष में कहो। प्रख्यात कहानीकार कमलेश्वर जी से भी इनकी नहीं जमीं। खुद तो 'न लिखने का कारण' चार-चार खंडों पाठकों को बताते रहे और यदि किसी ने सृजन का सराहनीय कार्य किया तो उसकी सृजनशीलता इस बात से आँकी गयी कि वह लेखक या कवि उनका पिछलग्गू है या नहीं, कम से कम उनके गुट का तो होना ही चाहिए। खुद तो अमीरज़ादे रईस की तरह दिल्ली में विलासपूर्ण जीवन बिताते हैं,'हंस' की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाते हैं और स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श की बात करते हैं! भाई, मैं भी एक दलित ही लेखक-कवि जो समझो, हूँ। इसलिये यह बात मैं नि:संकोच, निर्भय होकर कह रहा हूँ। मैं विमर्शवादी नहीं हूँ और डंके की चोट से कह सकता हूँ कि इन विमर्शों से हिंदी साहित्य का भला नहीं हो रहा क्योंकि इसकी आड़ में उनके शोषण की जो राजनीति रची जाती है, उनसे जनसामान्य और पाठक अनभिज्ञ ही रह जाते हैं। लेखक के कृतित्व के साथ उसके व्यक्तित्व का भी आकलन होता है। राजेंद्र यादव जी इन विमर्शों में जो कुछ भी कहते हैं उसे जाँचने का एक मात्र निकष यही है कि उनकी निजी, जातीय जिंदगी की ओर भी झाँका जाय और हिंदी साहित्य में उनके लेखकीय अवदान का भी मूल्यांकन किया जाय।

रही बात कविता की, तो राजेंद्र यादव जी कवितालोक के नागरिक कब से हो गये ? उनको पता है कि कविता और उसकी समालोचना के क्षेत्र में संप्रति नया क्या-क्या रचा गया है? कविता के नये प्रतिमानों की जानकारी उन्हें नहीं है। इसके लिये उन्हें हाल में ही आयी विजेंद्र रचित गद्यकृति ''सौंदर्यशास्त्र : भारतीय चित्त और कविता" पढ़नी चाहिये जो न सिर्फ़ कविता को गहराई से समझने का मर्म बतलाती है, बल्कि कविमन में आधुनिक भावबोध की लोकचेतना का संस्कार उत्पन्न करने का उपक्रम भी करती है जो मानसपटल पर देर तक टिककर हमें रचना से जीवन तक सर्वत्र, उत्कृष्टता और उसमें जो कुछ 'सु' है उसकी ओर मोड़ता है जिसमें लोकजीवन के सत्य-शिव-सुन्दर का प्रभूत माधुर्य भासित होता है। यहाँ पाश्चात्य जीवन शैली से उद्भूत बुर्जुआ सौंदर्य-दृष्टि नहीं, वरन एक भारतीय मन की ऑंख से देखा-परखा गया विरासत में मिला वह लोकसौंदर्य है जहाँ भारत की आत्मा शुरु से विराजती रही है पर उसको देखने-गुनने वालों को पिछडा़ और दकियानूस कहकर दुत्कारा गया। दरअसल कविता जो हर समय बाजी मार ले जाती है, इसका उन्हें मलाल है।वैसे विधाओं में आपसी कोई मतभेद नहीं होता।

अशोक वाजपेयी जी की मैने" तिनका-तिनका-खंड एक और दो" दोनो पढ़ ली है, और उनकी आलोचना" पूर्वग्रह" भी। यहाँ संवाद में उनसे सिर्फ़ इतना ही पुछना चाहता हूँ कि जीवन, प्रकृति, समाज और समय की द्वंद्वात्मक स्वभाव से अलग कर और पश्चिम की मध्यमवर्गीय विचारधारा " रुपवाद" और "कलावाद" से प्रेरित होकर लिखी गयी आपकी कविताएँ दृश्य में कितनी देर तक टिक पायेंगी? बात तो आप संवाद-मीमांसा में भारतीय मूल्य और सौंदर्य-चिंता की कर रहे हैं। क्या यही जनवादी साहित्य है?
 
   
 

Drishti Bhuvaneshwar

 
 अशोक जी की बात में वज़न है . कवित आह्वान की जनचेतना की विधा है . जनांदोलन अगर किसी विधा से हुए हैं तो वह कविता और नुक्कड़ नाटक हैं . इसमे दो राय नहीं है . कथाकारों के कविता के प्रति पूर्वाग्रह हमेशा से रहे हैं . वे अपने को बदलने को तैयार नहीं . यह उम्र बदलने की नहीं , दूसरों द्वारा बदलाव की ज़मीन तैयार किए जाने की है , उसमे निष्पक्ष और ईमानदार होने की ज़रूरत है . जो दोनों विद्वजनों में से कोई भी नहीं है , यह साहित्य का दुर्भाग्य है .

 
   
 

योगेंद्र कृष्णा (yogendrakrishna@yahoo.com) पटना

 
 दिग्गजों के बीच ऐसी रचनात्मक टकराहटों की आज सचमुच बड़ी आवश्यकता है। साहित्य के वैचारिक अंधेरे में से कुछ कौंध-सी तो नज़र आती है! 
   
 

जितेंद्र भाटिया

 
 एक संपादक के रुप में अशोक जी भले पूर्वग्रह, समास या बहुवचन की आकर्षक छपाई का श्रेय ले सकें लेकिन अपने भाई उदयन वाजपेयी, मदन सोनी और वागीश शुक्ल को सामने लाने के अलावा उनकी उपलब्धि क्षीण है. वहीं राजेंद्र यादव ने पिछले 20 सालों में हिंदी जगत को इतने लेखक दिए हैं कि उनके उल्लेख में यह जगह छोटी पड़ जाएगी. 
   
 

पंकज चतुर्वेदी

 
 राजेंद्र यादव के साथ यह बड़ा संकट है कि वे गप्प मारते हुए जितने बौद्धिक और खुले लगते हैं, साक्षात्कार देते समय वे उतने ही सामान्य या मीडियाकर. उसके ठीक उलट लगता है जैसे अशोक वाजपेयी को बचपन से ही मंच, माला और माईक की आदत रही है. वे इतने सलिकेदार तरीके से बोलते हैं कि बस वाह-वाह...! हां, इतना सब होने के बाद भी एक बात बहुत साफ है कि अशोक वाजपेयी के पास केवल यूरोप का जूठन ही है, जिसे वे यहां पिछले कई सालों से छौंक-बघार कर पेश कर रहे हैं. देशज औऱ मौलिक विचार के लिए तो आपको राजेंद्र यादव के पास ही जाना पड़ेगा. 
   
 

alok tomar (aloktomar@hotmail.com) delhi

 
 अपने-अपने अहंकार, अपने-अपने महिमा मंडन और इतिहास के बहाने अपनी समकालीनता को सिद्ध करने का करुण प्रयास. तर्क और तथ्य में अशोक वाजपेयी से कौन जीत सका है. गीताश्री ने एक गड़बड़ ये की कि खली अशोक वाजपेयी को स्वयंभू दारा सिंह से भिड़वा दिया.

राजेंद्र जी के पास भाषा है, संघर्ष हैं और टुकड़ों में कटे समग्र के कुछ टूटे हिस्से हैं. स्त्री विमर्श तो उनका योनी के आसपास ही घूमता है औऱ वे अशोक जी के सामने बौद्धिक रुप से विकलांग दिखते हैं, दयनीय भी....बुजुर्ग हैं और साहित्य के निगम बोध घाट की सीढ़ियों पर बैठे ही थे कि गीता ने मुखाग्नि दे दी.
 
   
 

piyush daiya (todaiya@gmail.com)

 
 आनंद आ गया ! अशोक जी के संदर्भ में रज़ा का एक वाक्य याद आता है कि जैसे सूरज के सामने दीया नहीं दीखाना चाहिए, वैसे ही जब अशोक बोल रहे हों, तब सबको चुप हो कर उन्हें सुनना चाहिए. ठीक-ठीक शब्द याद नहीं पर भाव-बोध यही हैं. 
   

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