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संवाद | राजेंद्र यादव-अशोक वाजपेयी

संवाद

 

आयोजनः गीताश्री

 

 

यह कविता से साहित्य के मुक्त होने का समय हैः राजेंद्र यादव

आपके पास क्षीण और दयनीय जानकारी हैः अशोक वाजपेयी

 

 

गीताश्रीः हर काल और समय में हिंदी साहित्य की अपनी गति रही है. समय के साथ-साथ इसका स्वरूप भी निश्चय ही बदला है. हिंदी साहित्य और समाज के दृष्टिकोण से देश की आजादी के बाद के 60 साल महत्वपूर्ण रहे हैं. आप लोग आजादी के बाद के समय को गद्य का मानते हैं या पद्य का? आज की कविता गद्यमुखी होने के बावजूद किस तरह अलग है या फिर नहीं है?

अशोक वाजपेयी और राजेंद्र यादव

साक्षात्कारः अशोक वाजपेयी मेरी सारी कविताएं प्रार्थना हैं
साक्षात्कारः राजेंद्र यादव चीनी कम जिंदगी ज़्यादा

 

राजेंद्र यादव: यह जो 60 साल का समय है यह पूरा समय कविता से साहित्य का क्रमशः मुक्त होने का समय है. गद्य का विकास कविता के चंगुल से मुक्त होने के साथ होता रहा तो वहीं जीवित रहने के लिए कविता को या तो गद्यात्मक होना पड़ा है या फिर वो पश्चिम का सीधा-साधा अनुवाद हो गई.

 

अशोक वाजपेयी: देखिए, इसमें कोई संदेह नहीं कि 20वीं शताब्दी के साहित्य की सबसे बड़ी घटना गद्य का उदय और विकास है. हालांकि इसके पहले ही शताब्दियां भी गद्यविहीन नहीं कही जाएंगी पर हां, गद्य इतना सशक्त और व्यापक नहीं था. अब अगर आप यह कहें कि साहित्य कविता के 'चंगुल' से आजाद होने की कोशिश कर रहा है तो यह मुझे बहुत ही अबौद्धिक लगता है. 20वीं शताब्दी सिर्फ भारत में ही नहीं, संसार में गद्य की महान शताब्दी है पर साथ ही साथ, वह कविता की भी महान शताब्दी है. अगर ऐसा न होता तो दूसरा-तीसरा नोबल पुरस्कार कविता को न मिलता.

 

राजेंद्र यादव: तो क्या नोबेल पुरस्कार कोई साहित्यिक मापदंड है?

 

अशोक वाजपेयी: नहीं, नहीं है पर एक मापदंड विश्वव्यापी जरूर है. ऐसे बहुत से साहित्यकार हैं जिन्हें नोबेल नहीं मिला पर फिर भी यह एक विश्वव्यापी मापदंड तो है. दूसरी बात यह है कि इतने व्यापक गद्य के पड़ोस में हिंदी कविता का स्वरूप और स्वभाव भी निश्चित रूप से बदला है. समय पर किसी भी विधा का न तो कब्जा होता है और न ही हक. ‘समय’न तो सिर्फ गद्य का हो सकता है और न ही सिर्फ कविता का.

 

राजेंद्र यादव: पर, मेरा मानना है कि समय के साथ-साथ कुछ चीजें मुर्झा जाती हैं, एक ओर सरकती चली जाती हैं और कुछ हैं जो मुख्यधारा में आ जाती हैं. आज से 50 साल पहले या फिर 20-25 साल पहले किसी भी साहित्यिक बहस में या खंडन-मंडन में या प्रतिवादन में अक्सर कविता का जिक्र हुआ करता था उसे 'कोट' किया जाता था, जबकि अब सारे विश्व में कविता इन सब से अलग हो चुकी है.

 

अशोक वाजपेयी: मुझे यह कहने की इजाजत दीजिए कि आपके पास जो दुनिया की खबर है वह क्षीण और दयनीय है. आप नहीं जानते कि दुनिया में कविता को लेकर बहस आज भी चल रही है. दुनिया की बात न कीजिए, अपनी राय बताइए.

 

राजेंद्र यादव: चलिए, हिंदी की ही बात कर लीजिए. हिंदी में आज जितने वैचारिक विमर्श होते हैं उनमें क्या कहीं कविता है?

 

अशोक वाजपेयी: आज जब वैचारिक संघर्ष की बात करते हैं तो जो संघर्ष निराला और पंत का था वैसा ही प्रेमचंद का भी था. ऐसा नहीं था कि तब सारे वैचारिक संघर्ष कविता तक ही सीमित थे. वैसे भी इन संघर्षों को आप किसी विधा-मात्र से बांध कर नहीं रख सकते. आजादी के बाद भी जो बहसें या चर्चाएं हुई हैं, वह सिर्फ कविता या गद्य पर केंद्रित थीं, यह कहना गलत होगा.

 

राजेंद्र यादव: 1980-90 की बात कहो.

 

अशोक वाजपेयी: हम तो 60 साल की बात कर रहे हैं, अगर आप 60 साल को 20-25 साल में समेटना चाहें तो अलग बात है. आप ही अपनी संपादकीयों में कहते रहे हैं कि हिंदी की आलोचना कविता से प्रेरित रही है और गद्य अपने लिए अपनी विविधता के अनुरूप कोई आलोचनाशास्त्र विकसित नहीं कर पाया.

मैं समझता हूं कि हिंदी आलोचना रामचंद्र शुक्ल के बाद जब-जब मकाम पर पहुंची है वह उसकी अपनी जातीय उपलब्धि ही है. रामचंद्र शुक्ल और उनके बाद हुए बड़े आलोचकों को पश्चिम से प्रभावित बौध्दिक चेतना आलोचना का वाहक नहीं माना जा सकता. हम एक पश्चिमी उपनिवेश थे ही, हमारे गद्य और पद्य दोनों पर ही पश्चिम का प्रभाव पड़ा है इसलिए पश्चिमी प्रभाव से इंकार करना गलत होगा. पर हमने जो कुछ स्वीकार किया है उसे अपनी और घरेलू जरूरतों के अनुकूल बनाया है.

 

राजेंद्र यादव: क्या तुलसी, कबीर या फिर किसी और ने भी हिंदी साहित्य को समझने के लिए कोई अवधारणा विकसित की?

 

अशोक वाजपेयी: बिल्कुल, रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह से लेकर हर किसी ने अपनी-अपनी तरह से अवधारणात्मक काम किया है. आप यह कतई नहीं कह सकते कि सब उधार लिया गया है. पश्चिम हमारे लिए एक द्वंद्वात्मक और असहज उपस्थिति है, सो है. इससे क्या इंकार है?

 

राजेंद्र यादव: पर, क्या इससे मुक्त होने की कोशिश है?

 

अशोक वाजपेयी: इससे मुक्त होने की कोशिश न सिर्फ आलोचना में, बल्कि कविता और गद्य दोनों में है. जिन विभिन्न धाराओं का जोरदार तरीके से समयानुकूल समर्थन किया है दलित और स्त्रियों की धारा, यह अपने आप में वह चीजें हैं जो पूरे सौंदर्यशास्त्र को दोबारा पुनर्विष्कार करने को विवश करती हैं.

 

राजेंद्र यादव: विवश जरूर करती हैं पर फिर वहां साहित्य के अपने सिध्दांत और अपने शास्त्र नहीं रहे. हम समाजशास्त्र में आ गए. अब स्त्री और दलितों को लेकर जो साहित्य है वह समाजशास्त्र पर ज्यादा आधारित है और साहित्य शास्त्र पर कम.

 

अशोक वाजपेयी: यह सही है. दरअसल इसमें दो दिक्कते हैं- पहली यह कि इन धाराओं ने समाजशास्त्री वैधता को ही अपना मुख्य अस्त्र बनाया. दूसरा यह कि अगर भक्तिकाल को देखें तो कुछ दलित बोले और मुख्य धारा से जुड़ गए. स्त्री एक ही बोली- 'मीरा'. पर फिर लंबे समय बाद यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन है. इसलिए इसका शास्त्र हड़बड़ी में इतनी आसानी से नहीं बन सकता है और नहीं बना है. हां, इसने जो विक्षोभ और विचलन पैदा किया है उससे भी इंकार नहीं किया जा सकता.

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