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akhilesh | अखिलेश का मायालोक
संवाद

 

अखिलेश का मायालोक

सुप्रसिद्ध चित्रकार अखिलेश से पीयूष दईया की बातचीत

 

 

अखिलेश के छाया चित्रः सैय्यद हैदर रज़ा

 

akhilesh-painter

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

1.
अखिलेश के चित्रकर्म में देसी व मार्गी का विभेद नहीं बल्कि एकत्व सत्यापित व परीक्षित है. उनके रंगलोक के वृत्तान्त में यह कहना बहुत कठिन है कि वे रंगों की मातृभूमि में कब नहीं थे. वहां रंगों में शास्त्रीय परिष्कार व गर्वीला ऐश्वर्य है तो विदग्ध लालित्य, ऐंद्रीय मांसलता व आंचलिक प्रांजलता भी. उनके वर्णपट की बहुलता का रागसिक्त रंगात्म अनन्य है पर मनुष्य-मात्र को सम्बोधित भी. रंगोंष्म सांसों से दीप्त व निनादित फलक-सतहों का सुघर विन्यास-चपल चमक लिये-रूपंकृत अन्तश्चेतना से आलोकित जान पड़ता है तो अविवक्षित से गर्भित नई अर्थाभाएं व रूपाकार ताल-दीप्त लयों से रचित होते हुए व्यंजक. मानो फलक-व्योम के अभेदाकाश की चित्रास्मिता में ऐसा प्रतीकित सम्बोध जो कहीं से भी परिभाषक एकरेखीयता से कभी भी अपना उपजीव्य संघनित नहीं करता. इस चित्र-बोध में यह स्वयं अस्ति है जो भव में है और यह स्वयं भव है जो अस्ति में है-यहां आध्यात्मिकता पार्थिवता के रेशों से बनी है तो यह पार्थिवता स्वयं में अनिवर्चनीय कामवत्ता से उदात्तीकृत व उन्मोचित है. आद्यन्त चित्र-चेतना में व्याप्त यह कामवत्ता चित्रोच्चारित ऋचाएं है-शृंगारिक खिलाव में विकीरित ऊर्जा जो रंगों में अवतरित होती है और बहुत बार उत्तप्त शिराओं की तरह फैली रेखाएं या कभी ऐसे रूपाकार जैसे विकल शुक्राणु. ऐसा धोखा होता है कि उनके चित्रों में व्याप्त कामवत्ता वह कस्तूरी-सुगन्ध है जिसे पाने की तलाश में चित्र है जिसमें कि विभिन्न रंगाकार मृग है : कभी समंजस-समरस कुलांचे भरते, कभी स्वछन्द. व्क्ताव्यक्त के भीतर यूं धड़कते-स्पन्दित जान पड़ते मानो अखिलेश के स्पर्श तले अपने सन्दर्भ की तलाश में हो जिसे पा लेना दरअसल कस्तूरी पा लेना है. तत्वत: चाक्षुष मूलधर्मिता में कुछ इस तरह से पल्लवित कि अद्वितीय रूप से वह अखिलेशमय है. दृष्टि का ऐसा समास जिसकी कीमियागिरी अपूर्वानुमेय है-पूरी तरह से समरस. कहना न होगा कि इस चित्र-संसार में रचनात्मक जोख़िम उठाने के बीहड़ में आत्माविष्कार की जादुई लिपि भी है. हर बार स्वयं को पुनर्नवा करती. चित्रकला की परम्परा में सम्भवत: पहली बार घट रही एक विरल घटना. पुरूष-ऊर्जा का आद्य सूक्त जहां स्त्रैण-ऊर्जा शायद अनाद्य है.


गोया अपने गर्भगृह में रहस्यदर्शी अदृश्य जड़ों को पोसते-सींचते हुए. नयनानन्दकर.

2.
कभी सुना था कि माया, देवताओं की लीला है जिसमें वे Absolute को व्यक्त करते हैं. क्या माया अवकाश में खिंचे-measured out-इस सांयोगिक संसार को ही व्यंजित नहीं करती ? यह अवकाश हमें घेरे है और हम इसका एक अंश है. ''माया'' शब्द ''मा'' मूल से आया है जिसका अर्थ है पैमाइश करना-to measure. और इसलिए भी माया अनिर्वचनीय है कि यह पैमाइश सम्भव नहीं हो पाती होगी. जैसे कि लीला-लोक में एकमात्र अबोधगम्य बात यह है कि यह बोधगम्य है.


गोया अखिलेश के विमोहन.

3.
हिन्दी के विलक्षण कवि-कथाकार शिरीष ढोबले की एक कहानी का समापन यूं होता है: ''...शायद, आनन्द का ही एक पृष्ठ हमने अब तक समझा नहीं है.'' औपनिषदिक उक्ति है : ''आनन्दाद्येव खल्विमानि सर्वाणि भूतानि जायन्ते. :: आनन्द से ही सब जीव जन्म लेते हैं.'' समकालीन कला-परिदृश्य में अखिलेश की अद्वितीय उपस्थिति एक विरल उपस्थिति है.


गोया वे आनन्द प्रस्तावित कर रहे हैं, अपनी चित्रलीला से नि:सृत.

4.
फरवरी, दो हज़ार आठ के शुरू में अखिलेश के साथ उनके कृतित्व-व्यक्तित्व पर एकाग्र बातचीत का सिलसिला बनने लगा. यह बातचीत अभी जारी है. प्रस्तुत पाठ इसी असमाप्त वार्तालाप के मंगलाचरण से बना है.


यह पाठ वत्सल संदीपनिर्मल के लिए.


ऐसा लगता है कि मानवीय कल्पना के अभाव में कला का आविर्भाव नहीं होता. आपके यहां कल्पना का यह स्वभाव उस अनुभूति-उत्स से निर्धारित होता जान पड़ता है जो एक ऐसे लुकाछिपी के खेल में व्यवहृत है जहां उस सन्दर्भ को खोजना-पाना है जो विभिन्न रंगों या रंग-युतियों के दरमियान कहीं छिपा है भी और नहीं भी, सम्भवत:. ''नज़र से छिपे हुए'' के सन्दर्भ में रेने माग्रीत के वाक्य आपको दिलचस्प लगेंगे : What is visible can be hidden—a letter in an envelope, for example, is something visible but hidden, it isn’t something invisible. An unknown person at the bottom of the sea is not something invisible, it’s something visible but hidden.


अब अगर उपर्युक्त वाक्य को ऑस्कर वाइल्ड के इस वाक्य के बरक्स रख कर देखें : ''हम कितनी ही कोशिश क्यों न करें, चीज़ों के रूप के पीछे हम वास्तविकता को नहीं पकड़ सकते. इसका भयानक-सा कारण यह हो सकता है कि चीज़ों के अनुभव से अलग उनकी कोई अलग वास्तविकता नहीं है-सिर्फ़ उथले लोग यह कहते हैं कि चीज़ों को उनके बाहरी रूप से नहीं जाना जा सकता. दुनिया का असली रहस्य दृश्य में निहित है, अदृश्य में नहीं.''


क्या हम यह जान सकते हैं कि यह संदर्भ स्वयं में क्या है, जो कि एक चित्र-सत्ता में उजागर होता है या कि उसमें व्याप्त है ? क्या यह प्रतीकात्मक तरह से सन्दर्भ को उससे सम्बन्धित करना है जिससे कि यह वास्ता रखता है-belong करता है ? क्या यह विभिन्न रंग-युतियों को अनुभूत करने के विकल्पात्मक ढंगों में उतरना है या यह रंग-युतियों और स्वयं को अनुभूत करने के विकल्पात्मक ढंगों का प्रकार है ? 

 

रेने माग्रीत और ऑस्कर वाइल्ड के उदाहरण दिलचस्प हैं. माग्रीत का उध्दरण एक चित्रकार का उदाहरण है जो लेखक के नजरिये से दिया गया है. ऑस्कर वाइल्ड का उध्दरण ऐसा उदाहरण है जो चित्रकार के नजरिये से दिया गया है. जिस visible और hidden की बात रेने माग्रीत कर रहे है वह एक तरह से हमारी पिछली चर्चाओं में आए हरे की ही बात है. माग्रीत हरे शब्द में छिपे हुए अर्थ की बात कर रहे हैं. यह अर्थ कई हो सकते हैं. ऑस्कर वाइल्ड सरफेस पर दिख रहा दृश्य ही सत्य है, कह रहे हैं. चित्रकला के सन्दर्भ में चित्र सत्य है.

 

चित्र का हिडन अर्थ नहीं है. जो आपके सामने है, वही उसका अर्थ है. उसके कोई सन्दर्भ नहीं है. चित्र का सन्दर्भ वह स्वयं है. जबकि रेने माग्रीत के उध्दरण में उनका इशारा इसकी तरफ़ है कि जो दिख रहा है उसमें कुछ छुपा है. जो दिख रहा है वह हरा शब्द है लेकिन इसका अर्थ छिपा हुआ है. यह दो दिलचस्प उदाहरण हैं. रेने माग्रीत के बारे में मैं ज़रूर थोड़ा कह सकता हूं, ऑस्कर वाइल्ड के बारे में जानता नहीं हूं तो नहीं कह सकता हूं.

 

माग्रीत ने अपने चित्रों में यह संकेत, कि जो दिख रहा है उसका अर्थ उसके अलावा है, उनके चित्रों के केन्द्र में रहा है. उनका प्रसिध्द चित्र लें. “The Treachery of Image" रेने माग्रीत पद और पदार्थ के भेद की ओर इशारा कर रहे हैं. रेने माग्रीत उस वस्तु की तरफ़ इशारा कर रहे हैं और उस चित्र में उसके छिपा होने की तरफ़ इशारा कर रहे हैं. वे अपने चित्र में पाइप ''चित्र'' को पाइप ''शब्द'' की तरह ले रहे हैं. उन्होंने चित्र और शीर्षक के सम्बन्धों को बदल दिया. चित्र और उसके शीर्षक का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है. यह जो दिख रहा है और जो शीर्षक है, उसकी अन्तस्सम्बन्धता को वे प्रश्नांकित करते हैं. स्वयं चित्र और उसके शीर्षक का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है. वे दो अनुभूतियों को दृश्य और शब्द के रूप में रखते हैं : यह वर्ण के रूप में मौजूद है. वर्ण रंग और शब्द के अर्थ में. वर्ण बैग का, वर्ण आकाश से कोई सम्बन्ध नज़र नहीं आता. दार्शनिक सन्दर्भ में अर्थ ढूंढने जाय तब शायद वह एक हो जाय. यह दिलचस्प उध्दरण है. जो दिख रहा है वह नहीं है बल्कि वह जो छिपा है, जो नहीं दिख रहा है, वह है. ऑस्कर वाइल्ड दूसरी तरह से सेजां की बात कह रहे हैं. जो दृश्य है, वही सत्य है; शेष का कोई अर्थ नहीं है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sunanda Mishra Kolkata

 
 Piyush daiya and akhilesh, Both are great. 
   
 

anita (anitamisr@gmail.com) kanpur

 
 पीयूष जी, काफी दिनों बाद एक बढ़िया साक्षात्कार पढ़ने का अवसर मिला... इस साक्षात्कार से कई नई बातें भी पता चली... बहुत बहुत शुभकामनाएं और बधाई. 
   
 

piyush daiya (todaiya@gmail.com) bhopal

 
 अरुण जी :: हवा का मसला तो यूं भी है कि उस्ताद हवा में गाँठ लगा देता है. और वैन गॉग अपने चित्रों में ब्रश स्ट्रोक यूं लगा रहे थे कि हवा को भी चित्रांकित किया जा सकता है ! ज़ाहिर है आपने जो दो उदाहरण दिये हैं वो दोनो ही यथार्थ-वादी हैं. और अब तो विज्ञान भी यथार्थ-वादी नहीं रहा, सर.
चलिए, आपने बातचीत पढ़ी, लिखा, भले कच्चे व्यंग्य में. आभार.
 
   
 

Naval Shukla (navalshukla@gmail.com) Bhopal

 
 अखिलेश के साथ आपकी बातचीत के अंश पढ़ा, अच्छा लगा. संभवतः आप भोपाल में हैं. अगर हां, तो संपर्क करें. 
   
 

arun aditya noida

 
 एक कलाकार के अंतस को अनावृत करता साक्षात्कार। पीयूष के सवाल अच्छे हैं और अखिलेश के जवाब भी लाजवाब हैं। दृश्य और अदृश्य के संदर्भ में रेने माग्रीत और ऑसकर वाइल्ड से अलग हर कलाकार का अपना नजरिया हो सकता है। मसलन हवा एक पदार्थ है। एक चित्रकार एक चित्र बनाता है, जिसका शीर्षहवा है हवा। अब वह हवा का चित्र कैसे बनाए, हवा तो invisible है। तो कलाकार एक पेड़ की कुछ टहनियां बनाता है जो हवा से एक तरफ लचक गई हैं। इस तरह इन लचकी हुई टहनियों को देखकर दर्शक अनुभूति-चक्षु से हवा को देखता है। एक दूसरा कलाकार यह भी कर सकता है कि वह हवा को प्रदर्शित करने के लिए एक खाली फ्रेम ही हैंग कर दे। दोनों के तरक अपनी जगह सही हैं। दोनों में से किसी भी चित्र में हवा visible नहीं है, पर दोनों में हवा को महसूस किया जा सकता है।
बहरहाल अच्छे साक्षात्कार के लिए आप दोनों को बधाई।
 
   
 

Sudha Om Dhingra (sudhaom9@gmail.com) USA

 
 पेंटिंग में ही स्ट्रोक नहीं होते, लेखन में भी होते हैं. पीयूष जी की लेखनी भी तरह-तरह के स्ट्रोक देती है. शैली, अभिव्यक्ति अनूठी....कमाल कर दिया पीयूष जी, अद्भुत बातचीत....
सुधा ओम ढींगरा
 
   
 

देवमणि पाण्डेय मुम्बई

 
 'इस चित्र-संसार में रचनात्मक जोख़िम उठाने के बीहड़ में आत्माविष्कार की जादुई लिपि भी है. हर बार स्वयं को पुनर्नवा करती. चित्रकला की परम्परा में सम्भवत: पहली बार घट रही एक विरल घटना. पुरूष-ऊर्जा का आद्य सूक्त जहां स्त्रैण-ऊर्जा शायद अनाद्य है.'ऐसा ख़ूबसूरत विश्लेषण सिर्फ़ पीयूष जी के ही वश की बात है|
 
   
 

rachana (rach_anvi@yahoo.com) u s a

 
 बहुत सुंदर बातचीत की है पीयूष जी आपने. पेंटिंग और कला के बारे में इस इंटरव्यू के कारण बहुत कुछ जानने को मिला. आपको धन्यवाद. अखिलेश जी की पेंटिंग की तो बात ही क्या. 
   
 

नरेंद्र सिह कुशवाहा नई दिल्ली

 
 इतने गंभीर सवाल....! यह दुर्लभतम बातचीत है. जवाबों के दृष्टिकोण से हो या न हो, कम से कम सवालों से गुजरते हुए तो ऐसा ही लगता है. पीयूष जी को कभी अशोक वाजपेयी ने हिंदी का श्रेष्ठतम युवा संपादक कहा था. इस बातचीत को पढ़ते हुए अशोक जी के कहे के प्रति मेरी आस्था और दृढ़ होती है. 
   
 

Shubhangi Kolkata

 
 पीयूष जी ने बहुत सुंदर बातचीत की है. आम तौर पर तो सवाल बहुत इकहरे रहते हैं लेकिन पीयूष जी के सारे सवाल एक सार्थक विमर्श की तरह नजर आते हैं. जिनमें उनकी विशाल रचनाशीलता का भी अहसास होता है. 
   
 

Ramesh Nanwani (nanwani_ramesh@rediffmail.com) Bhopal

 
 I know "Bidas" Akhilesh & his "Bidas" Art as diffrently as you perceive his paintings. He himself is not as "ABSTRACT" as his paintings are. He does his art as per his "Nature". 
   
 

Suhashish chandra Toranto

 
 thanks Piyush ji for a good interview. Raza emphasized western modernism and his paintings always depicted abstraction. Raza also integrated rudiments of Tantrism which retains Indian scriptural texts. Raza is mainly a nature based painter who has come a long way from painting ex-pressionistic landscapes to abstract ones. Mesmerized with the rustic countryside of rural France, Raza captures the architectural beauty of this region in his paintings. Raza uses wavy brushstrokes and other stylistic devices of paint which entices the art lovers. His earlier works were dazzling with vivacious colors oozing the eye of the on-looker but off late his work has become more subtle and restrained. Raza believes that his work is his own inner experience and involvement with the ambiguity of nature and form which is articulated in color, line, space and light. Raza’s colorful paintings are associated with the symbolic and emotive value of all the vibrant colors of India. 
   
 

Rajni singh (iilloovveeuu1975@gmail.com) New Delhi

 
 अखिलेश जिस तरह से अपनी पेंटिंग में स्ट्रोक देते हैं, वह अपने आप में अनूठा है. 
   

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