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akhilesh | अखिलेश का मायालोक | Piyush daiya
संवाद

 

अखिलेश का मायालोक-दो

सुप्रसिद्ध चित्रकार अखिलेश से पीयूष दईया की बातचीत

 

 

अखिलेश के छाया चित्रः सैय्यद हैदर रज़ा

 

अखिलेख की एक कृति

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अखिलेश का मायालोक का पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

 

एक जापानी चित्रकार है शोईची इदा. उनसे कभी मेरी बातचीत हुई थी. मैंने उनके काम देखे थे. उन्होंने काग़ज़ के ऊपर दूसरे रंग के काग़ज़ के ऊपर एक और रंग का काग़ज़ लगा कर ऐसे कुछ काम किये थे. मैंने उनसे इन कामों के बारे में पूछा.

उन्होंने बताया कि सारे काग़ज़ वे ख़ुद बनाते है और उस तरह से वे अपने काम तैयार करते हैं. यह रचना प्रक्रिया से गुज़रते हुए होता है. मुझे यह दिलचस्प लगा कि चित्रकार अपने काम करने दौरान, काग़ज़ बनाने में ही, कलाकृति तैयार कर रहा है. मुझे सूझा कि इस तरह के काम मुझे भी कर सकना चाहिए. ठीक इस तरह के काम नहीं मगर काग़ज़ बनाने के दौरान कुछ काम करना चाहिए. पहले से कोई विचार नहीं था उस को लेकर. कुछ सोचा नहीं था कि किस तरह का काम होना चाहिए. सबसे पहले यही खयाल आया कि काग़ज़ बनाना सीखना चाहिए.

दरअसल, चित्रकला का क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र भी है जिसमें बहुत सारे आर्कषण मौजूद है. यह आकर्षण कई बार चित्रकार को ले डूबते हैं. ऐसे ही उस समय में मुझे लगा कि हाथ-काग़ज़ को बनाते वक्त उस पर काम करना चाहिए. हाथ-काग़ज़ पर काम करना सीखने के लिए मैं अहमदाबाद में गांधी आश्रम-कलमख़ुश-गया और उनसे अनुरोध किया कि मैं काग़ज़ बनाना सीखना चाहता हूं. उन्होंने कहा-''हां, ज़रूर सीखिए. हम सुबह नौ बजे से शाम छ: बजे तक काम करते हैं. इस वक्त आना होगा.'' मैं नियमित जाने लगा. जैसे सारे मजदूर आते थे वैसे मैं भी उनके साथ आता और उनके साथ रहकर काग़ज़ कैसे बनता है, यह बनाना सीखा. लगातार दस दिन सुबह से शाम तक. दसवें दिन के बाद अगले दिन से मुझे यह काम शुरू करना था पर वह हो नहीं पाया. उनके यहां कुछ समस्या आ गई. मैं वापस लौट आया.


उसके बाद काफ़ी दिनों तक मैं सोचता रहा कि कहां, कैसे काम हो सकता है. ओरछा में ताराग्राम एक जगह है जहां पर कुछ युवा Architect/आर्किटेक्ट और Designer's/डिजाइनर्स ने मिलकर काग़ज़ बनाने का काम शुरू किया था. मैं वहां चला गया. मुझे वहां काम करने की अनुमति मिली. क़रीब दो महीने मैं वहां रहा. वन विभाग के अतिथिगृह में ठहरा जहां से लगभग चार क़िलोमीटर दूर उनका कारखाना था. यहां वे काग़ज़ बनाते थे. मैं रोज़ सुबह वहां जाकर अपना काम करता. उन्होंने मुझे पूरी आज़ादी दी हुई थी. बल्कि कुछ सहयोगी भी दिये. उन्होंने सब उपलब्ध कराया. मेरे लिए वहां एक कमरा अलग से दे दिया कि कोई व्यवधान न हो.

सारी सुविधा थी कि मैं अपना काग़ज़ बना सकूं. वह उनका प्रयोग/नमूना बनाने का कमरा था. नमूना बनाने के लिए बड़ा काग़ज़ लेने की आवश्यकता नहीं होती. इसीलिए वे कोलाज एक आकार के काम है. उनमें आखिरी दो काम मैंने बड़ी टेबल पर जाकर किये थे. यह सुविधा मुझे वहां मिली, मैं काम कर सका. उस काम को करने के पीछे कोई क्रान्तिकारी विचार नहीं था. मेरे मन में यह था कि काग़ज़ के बनने के दौरान उसमें काफ़ी कुछ किया जा सकता है और उसका एक अपना आनन्द हो सकता है.

इंदौर में मारोठिया बाज़ार है, बड़ा पुराना बाज़ार. यहां पर बहुत तरह की सामग्री, पूजा से लेकर अन्य कई तरह की सामग्रियां मिलती है. अपनी कोलाज-कृतियों के लिए मैंने सारी सामग्री मारोठिया बाज़ार से ख़रीदी थी. इसमें कोई पूर्वविचार नहीं था कि मैं क्या करने वाला हूं. किसी तरह की पूर्वनियोजित परिकल्पना मेरे पास नहीं थी. सिर्फ़ एक खयाल था कि दूसरी तरह का काम करने जा रहा हूं. हो सकता है कि वह सारा प्रयत्न निष्फल रहे.

काम करने के दौरान ही मैं काग़ज़ को इतना मोटा बनाता था कि उनमें इन वस्तुओं को arrange किया जा सके. कुछ अपने साथ ले गया था, कुछ मुझे वहां मिली. मैंने उन्हें भी शामिल कर लिया. मैंने पाया कि वह एक बहुत दिलचस्प वाकया बन रहा था जिसमें बहुत सम्भावनाएं है. किन्तु दोबारा मैंने कोशिश नहीं की. ऐसा लगा नहीं कि मैं फिर वहां जाकर कुछ करूं. हो सकता है कभी बाद में करूं. यह एक सम्भावना है.

कौड़ी को चुनने के पीछे ऐसा विचार नहीं था कि इससे एक आंख बनने वाली है या चश्मों को चुनते वक्त. क़ुछ चीज़ें मैंने जानबूझ कर चुनी थी, जैसे चाकू. बोर्खेज़ की एक कहानी पढ़ी थी जिसमें चाकुओं का ज़िक्र था, कुछ प्रसिध्द चाकूबाजों का ज़िक्र था. इन कोलाज-शृंखला के बहुत सारे काम उस दौरान की मेरी reading से प्रभावित है. उससे परिसंचालित है. इन कृतियों को मैंने वहीं ताराग्राम में बनाया और बनाने के दौरान ही उसमें हर सम्भव प्रयोग, प्रयास किये.

कृ. ब. वैद के उपन्यास ''मायालोक'' पर एक कोलाज इसलिए बना कि उन दिनों मैं ''मायालोक'' पढ़ रहा था और यह उपन्यास आधा ही छोड़ कर मैं ताराग्राम चला गया था. उपन्यास पढ़ते वक्त मुझे बहुत आनन्द आया था. सारे समय मैं बचे हुए ''मायालोक'' के बारे में सोचता रहा था. और सम्भवत: इससे निकलने के लिए मैंने यह काम करना शुरू किया. बोर्खेज की कहानी व अन्य किताबें मैं पहले से पढ़ चुका था. वे किताबें मुझे अच्छी लगी थी इसलिए मैंने उन पर काम किये.

बोर्खेज की कहानी में दोस्त के घर एक पार्टी में ये चाकू रखे हैं. इन चाकुओं के बारे में बतलाते हुए मेजबान कहता है कि बहुत साल पहले कुछ प्रसिध्द चाकूबाज थे और ये चाकू उनके हैं. पार्टी ख़त्म इसी तरह होती है कि चाकुओं से वे सभी दोस्त अपने को मार चुके हैं. इसमें एक तरह की हिंसा थी. चाकुओं के सम्मोहन ने किशोरों को लहूलुहान कर दिया. मुझे यह कहानी अच्छी लगी. इस तरह की readings है. इन्हीं से obsessed होकर मैंने इन कोलाज-चित्रों को बनाया.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Rati Saxena (saxena_pr@asianetindia.com) Trivandrum

 
 बेहद रोमंचित कर देने वाले अनुभव हैं, अखिलेश जी के..क्या आपके अनुभव कृत्या के लिए भी लिए जा सकते हैं. मैं चाहती हूँ कि कृत्या इस कला यात्रा का आनन्द ले सकें। कृपया kritya.com भी देखें.

 
   
 

Ajay Kulshreshtha (ajay@kulsh.com) So. California, USA

 
 पियूषजी, नहीं समझा आपने मेरी राय क्यों जाननी चाही.

और मेरा मत जानकर आप हर्षित न होंगें. प्रथम तो यह कि मुझे आम तौर पर अमूर्त चित्रकारिता में रुचि नहीं है क्यों कि ऐसी कला की कसौटी निर्धारित करना असंभव सा है. दूसरे यह कि आपने जिस अंत्यन्त क्लिष्ट, प्रवाह रहित, भाषा में अपने विचार व्यक्त किए हैं, उसे मैं छूँछा पांडित्य-प्रदर्शन मानता हूँ. -अजय कु.
 
   

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