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कम्यूनिस्ट कैपिटलिज्म एक भयानक चीज है- अरुंधति राय

संवाद

 

कम्यूनिस्ट कैपिटलिज्म एक भयानक चीज है- अरुंधति राय

सुप्रसिद्ध लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति राय से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

 

अरुंधति राय

 

 

 

 

 















जानी-मानी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति राय के मुताबिक सलवा जुड़ूम के चलते बस्तर में गृह युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं. वह कहती हैं कि विकल्प सिर्फ बस्तर में नहीं बल्कि सारी दुनिया में तलाशा जा रहा है. विकास के पूंजीवादी और पूर्व के समाजवादी मॉडल का हश्र क्लाइमेट चेंज के रूप में हमारे सामने है. तो राष्ट्रवाद की परिणति संभावित आण्विक युद्ध के रूप में नजर आ रही है. वह कहती हैं कि विकास और जनसंहार का आपस में गहरा रिश्ता है. यह आप पर है कि आप जेनोसाइड या जनसंहार को किस तरह परिभाषित करते हैं. राय पिछले एक सप्ताह से छत्तीसगढ़ में थीं. वह बस्तर भी गईं. इसी दौरान यह बातचीत हुई.


 देश में जिस तरह से चुनावी गठबंधन हुए हैं, उसमें कोई भी किसी के भी साथ जा कर खड़ा हो गया है. जिस तरह इतिहास का अंत समेत बहुत सारे अंत की घोषणा होती है, क्या ऐसा कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति में विचारधारा का अंत हो गया है ?

 

आप अभी बस्तर में जाएंगे तो बहुत अद्भुत बात पाएंगे कि हमारे देश की जो सबसे बड़ी पार्टियां हैं- कांग्रेस और भाजपा, दोनों साथ मिल कर देश के जो सबसे गरीब लोग हैं, उनसे लड़ रही हैं. साथ-साथ एक मंच में बैठ कर. ऐसे में चुनाव होने पर ये जीतें या वो, इसका कोई खास मतलब नहीं है.

 

 तो क्या किसी वैकल्पिक राजनीति पर बात करने के लिए ये सही समय है ?

 

समय सही है या देर हो गई, मुझे पता नहीं. मैं बोल नहीं सकती. पर अगर अभी ये बात नहीं हुई तो फिर कभी नहीं आएगा वो ‘सही’ समय.

 

 बस्तर में हालात कैसे हैं ?

 

बस्तर में गृहयुद्ध जैसे हालात हैं, जिसमें 60 हजार आदिवासी सलवा जुड़ूम के शिविरों में हैं. उसमें से जो एसपीओ हैं, जिन्हें हथियार दिये गये हैं. बाकी लगभग 3 लाख आदिवासी जंगल में घूम रहे हैं. न उनके पास खाना है, न वे खेत में आ सकते हैं, न बाजार जा सकते हैं, न ही वे अस्पताल जा सकते हैं. स्कूल बंद पड़े हुए हैं. तो ये एक बहुत ही गंभीर स्थिति है. और उससे हम लोग कैसे गुजरेंगे और ये क्यों हो रहा है, ये बहुत बड़े सवाल हैं. ये क्यों हो रहा है ? ये गांव किसने खाली किया ? क्यों खाली किया ? ये लोग जाएंगे कहां ? स्थिति बहुत ही गंभीर है.

 

 अगर दुनिया के परिदृश्य में देखें तो हथियारबंद आंदोलन सब जगह से नकारे जा रहे हैं या फिर कमजोर हो रहे हैं. मुख्यधारा की राजनीति से अलग जहां भी आंदोलन हो रहे हों, उसके अनुभव ऐसे ही हैं. चाहे नेपाल हो, जिसे राजनीति की मुख्यधारा में आना पड़ा हो या एलटीटीई का हथियारबंद आंदोलन, जो मुख्यधारा की राजनीति से अलग रहने के कारण लगातार कमज़ोर हुआ है. आखिर इसका विकल्प क्या है ?

 

ये विकल्प की जो बात है, ये बहुत ही विस्तृत और गंभीर बात है. हम सिर्फ बस्तर में ही विकल्प नहीं ढूंढ रहे. पूरी दुनिया में विकल्प ढूंढे जा रहे हैं. क्योंकि ये जो पूरा पूंजीवाद और पूर्वी मॉडल का जो विकास है या जो इससे पहले का समाजवादी मॉडल का विकास था, अर्थव्यवस्था को शीर्ष पर ले जाने वाला, वो हमें क्लाइमेट चेंज की तरफ ले जा रहा है. इसे आप एक सर्वनाशी दृष्टिकोण कह सकते हैं. दुनिया का जो अंत है, उसके बीज इसमें निहित हैं. दूसरी ओर हमारे सामने राष्ट्रवाद का मुद्दा है, परमाणु युद्ध का मुद्दा है और इस तरह के कई मुद्दे हैं.

आदिवासियों को हाशिये पर डाल देने प्रक्रिया को हम भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया.

 

उन्नति और विकास को लेकर जैसा हम सोचते हैं, अगर हम इतिहास में झांकें तो पाएंगे कि उन्नति और जनसंहार के बीच हमेशा से एक रिश्ता रहा है. और ये जो जनसंहार शब्द है, यह बहुत गंभीर शब्द है. लोगों ने इसे अपने-अपने तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की है. और इसका मतलब सिर्फ ये नहीं है कि लोगों को पकडकर मारो. इसका मतलब ये भी है कि एक किस्म के लोगों को अपना खाना, अपना पीना, अपनी संसाधन से अलग कर दो, ताकि वो अपने आप ही मर जाएं. अफ्रीका जैसे देशों में यह बहुत हुआ है. तो क्या हम लोग उस स्थिति में आ गए ?

 

आप कहते हैं कि नक्सलाईट हैं या आतंकवाद है और ये भी कहते हैं कि इस जंगल में जो कैम्पों में नहीं हैं वो माओइस्ट हैं. मैं पूछती हूं कि क्या हम इतने हज़ार लोगों को मारने के लिए तैयार है ? और वो कौन लोग हैं ? जो सबसे गरीब है और जिसके हथियार तीर-धनुष हैं.

हमें अपने से भी यह पूछना चाहिए कि क्या हम इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं ?

 

 मैं फिर दुहराउंगा कि आखिर विकल्प क्या है ? बस्तर, झारखंड, आंध्र प्रदेश या देश के कई हिस्सों में जिस तरह से हथियारबंद लड़ाईयां चल रही हैं, क्या आप उसे वैकल्पिक राजनीति के तौर पर आप देख रही हैं ?

 

जब आतंकवाद, सशस्त्र संघर्ष या इस तरह का कोई भी शब्द कहा जाता है, तब मामले को बहुत उलझा दिया जाता है. आप बुश की मुद्रा अख्तियार कर लेते हैं- आप या तो हमारे साथ हैं या आतंकवादियों के साथ.

आप किसी भी अधिकारी से बात करें और उनसे पूछें कि आखिर इन लोगों के पास विकल्प क्या था ? ये क्या कर सकते थे ?

गरीब वह है, जो हमेशा से संघर्ष करता आ रहा है. जिन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है. संघर्ष के अंत में ऐसी स्थिति बन गई कि किसी को हथियार उठाना पड़ा. लेकिन हमने पूरी स्थिति को नजरअंदाज करते हुए इस स्थिति को उलझा दिया और सीधे आतंकवाद का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया. ये जो पूरी प्रक्रिया है, उन्हें हाशिये पर डाल देने की, उसे भूल गये और सीधा आतंकवाद, ‘वो बनाम हम ’ की प्रक्रिया को सामने खड़ा कर दिया गया.

ये जो पूरी प्रक्रिया है, उसे हमें समझना होगा. इस देश में जो आंदोलन थे, जो अहिंसक आंदोलन थे, उनकी क्या हालत हमने बना कर रखी है ? हमने ऐसे आंदोलन को मजाक बना कर रख दिया है. इसीलिए तो लोगों ने हथियार उठाया है न ?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

मनोज शर्मा (smjmanoj.sharma) जम्मू

 
 यह बहुत ज़रूरी काम है और सारे साक्षात्कार शीघ्र ही पुस्तकाकार रूप में आने चाहिएं.धन्यवाद आलोक जी! 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 अरुन्धती जी, आपको धन्यवाद देने की ज़रुरत नहीं है.
आपका यह एक वाक्य अगर राजनेताओं और उनके रहम पर जीने वालों की समझ में आ जाए तो दुनिया बदल जाएगी : "विकास और जन-संहार का आपस में गहरा संबध है."
मैं इसे इस तरह कहूँगा : "अगर प्रकृति और मानव-चेतना का विकास नहीं है तो हर बाहरी विकास जनसंहार है." फिर हर विकास कुछ लुटेरों का नीच कारोबार है और बाकी लोगों का संहार. हर कहीं यही हो रहा है.
मानव-चेतना कभी प्रकृति को नष्ट नहीं करती, बल्कि उसके सहयोग से मनुष्य और वन्य-जीवन को अधिक सुन्दर बनाती है. अगर वन्य-जीवन को बाहरी विकास के नाम पर नष्ट किया जाएगा तो मूल-भूत जीवन पूरा तबाह हो जाएगा. इस बात को न समझने से जो अराजकता पैदा हो रही है, उसे सारी दुनिया झेल रही है. प्रकृति से मनुष्य का रिश्ता तो टूटा ही, मनुष्य से मनुष्य का रिश्ता भी प्रदूषित और पाखंडी हो गया.
मैं हिमालय का रहने वाला हूँ, मगर जहां मैंने घूमना, तैरना, लिखना और जीना सीखा, हिमालय के उन खुले भूखंडों पर राजनेताओं और उनके चहेते धन-पिशाचों का कब्ज़ा हो चूका है. कुल्लू-मनाली के जिन नदी किनारों पर मेरा बचपन बीता, वहाँ आज धन-कुबेरों के होटल हैं. एक बड़े राजनेता का 'सपन रेसोर्ट' बहुत लम्बे इलाके को घेर चूका है.इन विलासिता-पूर्ण होटलों और रेसोर्ट्स के पास टहलना भी आज एक प्रकृति-प्रेमी घुमंतू के लिए अपराध है. डर लगता है. मनाली क्षेत्र का कितना ही भूभाग राजनेताओं ने घूस खा-खा कर एक बहुराष्ट्रीय आदमखोर कंपनी सकी विलेज के हवाले कर दिया है.
किन्नौर जहां मैं बरसों रहा, आज विकास करने वालों के हाथ चढ़ कर सत्यानाश की तस्वीर हो गया है.
यह तो साफ़ दिख रहा है कि अगर राजनेताओं और उनके चहेतों को तत्काल वन्य-जीवन और उसमे जीते आदिवासियों को परेशान करने से नहीं रोका तो सबसे पहले राजनेता और उनके बिरादर नष्ट होंगे. ऐसा वक्त आ पंहुचा है. माओवाद, नक्सलवाद या साम्यवाद नहीं, आज जो हालात बना दिए गए हैं, उस में से जिंदा रहने को निकला हुआ जिंदाबाद !
अब आतंकवादी बता कर कोई किसी को अगर उसकी जगह से भगाएगा तो मारा जाएगा. अब सिपाही और 'आतंकवादी जान गए हैं कि उन्हें लड़वा कर मरवाया जा रहा है.
अगर ये दोनों किस्म के नौजवान समय पर एक नहीं हुए और इन्हें अरुन्धती राय और अग्निवेश जैसे साथी नहीं मिले तो हर कहीं वास्तविक दरिन्दे कहर बरपा देंगे. तब शायद उन दरिंदों से हाथ मिलाने के लिए राजनेता उनके आगे गिड़गिड़ाते नज़र आयेंगे.
पण्डे, पुरोहित और राजनेताओं के भरोसे जीने के ज़माने लड़ गए. अब जीना है तो जागिये !
बहुत थोड़े में मस्त, जिंदा और आबाद रहने वाला एक घुमंतू टोला 'जिंदाबाद हिमालय' कुछ चुने हुए मित्रों को मूल-भूत जीवन, पानी और रवानी देने वाले हिमालय में बुलाता है, एक खुले आँगन में खुली बात के लिए; जहां दुनिया भर से दोस्त आते हैं... ताकि एक नयी नदी बहे ऊपर से नीचे तक !
 
   
 

ashokchoudhary (gkp.ashok@gmail.com) gorakhpur

 
 इस बात में अब बहस नहीं बची है कि भारत के शासक वर्ग का चरित्र क्‍या है। अरूंधती ने जो देखा सुना अनुभव किया वो बताया। उन्‍होंने अपना पक्ष तय किया है कि वे इस देश की बहुसंख्‍य जनता के साथ हैं। अब इस देश में जनतंत्र की दुहाई देते हुये रोज रोज इसका सियापा करने वालों को तय करना है कि उनका क्‍या पक्ष है। सब तो नंगे हो चुके हैं। कुछ छिपा नहीं है। एक युद्ध चल रहा है। हम आप भोले बने रहे माने न माने। चिदंबरम साहब घोषित कर चुके हैं। जो उनके साथ नहीं होगा वो नक्‍सलियों का साथी माना जायेगा। मान ले ससुर। हम तो उनके साथ नहीं हैं। 
   
 

pakash ranchi

 
 Reading or listening to Arundhaiti ji is ो memorable moment…  
   
 

Abhijeet Sen (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 Where this problem is not exist,where this type of situation are not exist ,is that place where basic needs are fulfilled, Government authorities are sensitive, social, political , financial, educational and employment generating productive institution are working properly, investment in infrastructure is in large scale,total involvement of local people in these activities and also active participation of local people in policy matter, implementation of such projects and above all resource management.  
   
 

Shreekant Rathi (desipathshala@gmail.com) Ghumarwin, Bilaspur, H.P.

 
 हमारे बिलासपुर के पहाड़ी रास्तों में एक दृश्य लगातार नजर आता है कि जब कोई कार वहां से गुजरती है तो कुछ आवारा कुत्तों का झुंड उनके पीछे-पीछे लग जाता है औऱ दूर तक भौंकते हुए उनका पीछा करता है. उन्हें न तो कार से लेना देना होता है और ना ही उन्हें कार में बैठना है.
क्या विचारों के मामले में हमारे साथ भी ऐसा नहीं है ? हमें जिन विषयों पर कुछ नहीं करना है, जिनके बारे में हम जानते तक नहीं, उसके बारे में केवल बकते रहना क्या उन आवारा कुत्तों की ही तरह का मामला नहीं है.

अरुंधति ने जो विषय उठाया है, उसे थोड़ा गंभीरता से कभी जानने समझने की भी कोशिश करनी चाहिए. मैं शिक्षा में लगे होने के कारण बस्तर, झारखंड और हिमाचल की आदिवासी समस्याओं को जानता हूं. इसलिए आप सबसे माफी मांगते हुए कह रहा हूं कि पहले मुद्दों को जाने, फिर उनपर इतनी आक्रमक टिप्पणी लिखने का साहस करें.
 
   
 

Mahesh Sinha (sinhamahesh@gmail.com) Raipur

 
 हिमांशु जी, बौखलाए तो आप लगते हैं क्योंकि न जाने क्यों आपका बयान संपादक ने नहीं छापा .
क्या सिर्फ लेखक, पत्रकार, समाजसेवी ने सब चीजों का ठेका ले रखा है. जब आदिवासी मर रहे थे आतंकवादियो (माओवादी) के द्वारा तब सब चुप थे. एकाएक क्या हो गया.
बातें बहुत सारी हैं मेरा ईमेल एड्रेस पहले भी दिया था अब भी दिया है.
 
   
 

Himanshu (patrakar.himanshu@gmail.com)

 
 लोग अरुंधति जी के इस इंटरव्यू से बहत बौखलाए हुए हैं औऱ इनमें से अधिकांश ऐसे अनाम लोग हैं, जो न लेखक हैं, न पत्रकार, न समाजसेवी. उन्हें बस किसी के खिलाफ कुछ लिखना है, इसलिए लिखे जा रहे हैं. माना कि आप पाठक होने के नाते लिख रहे हैं तो इन सारे सवालों को लेकर कोई बहस क्यों नहीं करते. आप पाठक होने के नाते कुछ करते क्यों नहीं. अगर आप चाहें तो अपना नाम-पता और फोन नंबर मुझे मेल करें और अपने विचार भी. मैं ऐसे सभी पत्रों को एक साथ करके पूरे नाम-पते के साथ उन्हें सरकार औऱ नक्सलियों दोनों के नाम सार्वजनिक पर्चा बना कर छापू कर दिल्ली, रायपुर और बस्तर में बंटवाउंगा.
अरुंधति राय बस्तर गई थीं सलवा जुड़ूम औऱ नक्सलवाद के हालत जानने और उसके बाद वापसी में विनायक सेन समर्थकों ने उनसे अपने कार्यक्रम में शामिल होने का अनुरोध किया. वे बस्तर चेंच भाजी खाने नहीं गईं थी. वे सलवा जुड़ूम औऱ आदिवासियों का हाल जानने ही गई थीं.औऱ अनाम किस्म के पाठक, आप में से कितने लोग बस्तर में गये हैं ? रायपुर में बैठ कर बहस करना बहुत सरल है. जा कर देख कर तो आइए बस्तर के हालात.
दूसरा एक पाठक ने पूछा है कि समस्या का हल क्या है. उन्होंने अपने इंटरव्यू में समस्या का हल बता दिया है- आदिवासियों को अपने तरीके से जीने दें. और सवाल ये भी है कि आपको अगर समस्या सुलझाने में इतनी ही दिलचस्पी है तो जिस सरकार को आप टैक्स पटाते हैं, उसे भी एकाध पत्र लिखें.
संपादक जी, आप मेरे पत्रों को प्रकाशित नहीं कर रहे हैं. ये मेरा चौंथा पत्र है. क्या आपने इस मंच को भी छत्तीसगढ़ सरकार का मंच बना दिया है, जहां लोग सरकारी भाषा में बात करें, उन्हें ही छपने दिया जाए ? मैं रविवार का प्रशंसक हूं केवल इसलिए क्योंकि आपके यहां लोकतंत्र है लेकिन लगता है कि आपने भी विचारों का सलवा जुड़ूम चला रखा है.
 
   
 

Mahesh Sinha (sinhamahesh@gmail.com) Raipur

 
 वाह अरुंधती जी अपने ये तो बताया नहीं कि आप छत्तीसगढ़ क्यों गयी थी ? आप कह सकती हैं इस इंटरव्यू में ये पूछा ही नयी गया. आप छत्तीसगढ़ गयी थी एक विचारधीन कैदी के समर्थन में समर्थन जुड़ाने क्योकि उन्हें यहाँ बहुत कम समर्थन मिल रहा है. आपका ये कार्यक्रम किसने प्रायोजित किया था ? आपको धुर विरोधी दलों कांग्रेस और बीजेपी का सलवा जुडूम मसले में एक होना षड्यंत्र लगता है !
आपने अपने एक बयान में ये लिखा है कि छत्तीसगढ़ में गृहयुद्ध के हालत हैं , इस साक्षात्कार में आपने ये बस्तर के बारे में कहा है , पहले ये फैसला कर लीजिये कि कहाँ क्या हो रहा है . कृपा कर के अपने स्तर का दुरूपयोग न करें इस देश की जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए . कह्हन थी आप जब जब आतंकवादी आदिवासियों का शोषण कर रहे थे . आप किसके साथ हैं आदिवासी या (नक्सल, माओ) आंतकवादी के साथ जिनके पास अत्याधुनिक हथियार हैं , तीर कमान नहीं , और ये दूसरे प्रदेशों से आये हैं.
अगर आपका सही समर्थन आदिवासियों के साथ है तो क्यों आप नक्सली समर्थक का समर्थन कर रही हैं ?
 
   
 

अभिषेक श्रीवास्‍तव (guru.abhishek@gmail.com) नई दिल्‍ली

 
 आलोक जी को साधुवाद और अरुंधति को उससे भी ज्‍यादा, क्‍योंकि आम तौर पर वह हिंदी पत्रकारों को इंटरव्यू नहीं देतीं। कम से कम हिंदी वालों के लिए यह एक दुर्लभ इंटरव्यू है, क्‍योंकि अब तक हिंदी में अंग्रेजी से अरुंधति का अनुवाद ही आता रहा है। ज़रा और लंबा होता, तो अच्‍छा होता।  
   
 

Dr. Ramesh Dwivedi (dr_rdwivedi@rediffmail.com) Nagpur

 
 Very good interveiw

ramesh 9226575904
 
   
 

pran sharma (pransharma@talktalk.net) coventry,uk

 
 कुछ करके दिखाइए तभी आपकी कथनी-करनी की सार्थकता होगी. 
   
 

anil maharashtra

 
 बहुत बढ़िया इंटरव्यू लिया आपने आलोक जी. धन्यवाद. और अंतम सवाल का तो बहुत सटीक जवाब भी दिया है अरुंधति जी ने. 
   
 

jagdish rawtani (anandam66@gmail.com) new delhi

 
 Arundhati has apprised us of reality that she has witnessed in person.Though she has not suggested any solution but she appears to be anxious and curious to find the one. Let us not blame her for not suggesting any remidy. Had it been so easy this problem might not have taken roots. However in my firm opinion I feel we have to analyse and go deeper to understand the whole issue in the attempt to find out some solutiion, if politicians willing to cooperate ( may appears difficult). One immediate step can be taken and that is to write to BIG NETAS of the country for explanation/clarification in the matter. Once the dialogue begins, we may be able to find solution also. In the mean time we can keep discussing the apathy of the affected people through all availbale channels as to highlight the sad issue. 
   
 

harisuman bisht (harisuman_bisht@yahoo.com) noida

 
 अरुंधति जी, आप बहुत अच्छा लिखती हैं पर आप का लिखा मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि जिस तबके की बात उठाती हैं उसके हित तथा हितों के संबंध में क्या दृष्टि रखती हैं ये स्पष्ट नहीं होता. केवल परेशान करने से समाधान नहीं होता, या हो नहीं सकता. यह आप भी जानती हैं. जो लोग कैद में हैं, या जो मारे जा रहे हैं, वे तो हमेशा से दबे कुचले, हमेशा ही मारे जाते रहे हैं. इस संबंध में आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है. आप पाती हैं उनमें हमेशा से मूल मुद्दे किनारे होते रहे हैं. ऐसा करने में भारतीय़ राजनीति सफल रही है. जो लोग मर रहे हैं, या मारे जा रहे हैं वे राजनीति की भेंट चढ़ रहे हैं. आज तक भूखमरी, गरीबी गंभीर विषय नहीं रहे. यदि ऐसा होता तो लोगों को अपने जीवित रहने के लिए लड़ना नहीं पड़ता. ये दुर्भाग्य ही है. आप के पास समाधान है तो उसे बताएं, खाली बातें कहने से पेट नहीं भरता. बातों से आदमी जिंदा नहीं रहता, जीवित रहने के लिए उपचार चाहिए.  
   
 

indramani (indramani2006@indiatimes.com) indramani

 
 अरुंधति राय के विचार मैंने पढ़े. उनका कहना बिल्कुल वाजिब है. आशा है, ऐसी ही महान हस्तियों की बातचीत पढ़ने को मिलती रहेगी. आपके सराहनीय प्रयास को मेरी बधाई. 
   
 

vinod kapoor (vk_ddindia@rediffmail.com)

 
 Arundhati is a pain with weird opinions. Just one award does not make intellectual, opinion maker or a political shaker. She is a fake. Sorry. 
   
 

vinod tiwari (vinod_tiwari101@yahoo.com) bhopal

 
 अरुंधति रॉय सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा. आपकी बातों से तो लगता है कि आप आदिवासियों के हाल जानने नहीं नक्सलवादियों से मिलने गईं थी.
 
   
 

Abhishek (am_dhr@rediffmail.com) UP

 
 आम लोग जो चीन और माओ को नहीं जानते, मगर उनके पीछे क्या बाहरी हाथ बिलकुल नहीं हैं! तो उन बाहरी हस्तक्षेपों को रोकते हुए अपने लोगों से बात करने की सार्थक पहल क्यों नहीं होती? 
   
 

kamlesh pandey (kamlesh.pandey8@gmail.com) BHOPAL

 
 बस्तर में गृहयुद्ध जैसे हालात हैं, जिसमें 60 हजार आदिवासी सलवा जुड़ूम के शिविरों में हैं. उसमें से जो एसपीओ हैं, जिन्हें हथियार दिये गये हैं. बाकी लगभग 3 लाख आदिवासी जंगल में घूम रहे हैं. न उनके पास खाना है, न वे खेत में आ सकते हैं, न बाजार जा सकते हैं, न ही वे अस्पताल जा सकते हैं. स्कूल बंद पड़े हुए हैं. तो ये एक बहुत ही गंभीर स्थिति है. और उससे हम लोग कैसे गुजरेंगे और ये क्यों हो रहा है, ये बहुत बड़े सवाल हैं. ये क्यों हो रहा है ? ये गांव किसने खाली किया ? क्यों खाली किया ? ये लोग जाएंगे कहां ? स्थिति बहुत ही गंभीर है. apne Rajnetik mudde ko jaise bata diya hai'
'Please'
विश्लेषण नहीं समस्या का विस्तार से हल भी बतलाएं.
 
   
 

Kakoli (smitashu@gmail.com)

 
 very very good. 
   
 

Vinod Bastar, Chhattisgarh

 
 अरुंधति जी, आपके बस्तर प्रवास में आपके साथ तो दिल्ली के पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी जी भी थे.आपको शुभ्रांशु जी से भी पूछना था कि सलवा जुड़ूम शुरु होने से पहले कभी उन्हें बस्तर की चिंता क्यों नहीं हुई ? इसलिए क्योंकि तब तक बस्तर में नक्सली आराम से थे और सबकुछ उनकी मर्जी से चल रहा था. जब नक्सलियों के खिलाफ आदिवासी उठे तो देश भर के लोग सक्रिय हो गए.
बस्तर के आदिवासी ये भी चाहते हैं कि नक्सली और सलवा जुड़ूम से उन्हें मुक्ति मिले औऱ उनसे भी जो अधूरा सच लिखकर बस्तर की गलत तस्वीर पेश करते हैं. पहले नौकरशाहों ने बस्तर को बरबाद किया, फिर नक्सलियों ने, अब सलवा जुड़ूम ने. लेकिन इन सबों में पैरासाइट मीडिया की भी बड़ी भूमिका है, जो स्थानीय मीडिया को गाली बकते हुए दिल्ली में बैठे-बैठे अपनी तरह से कहानियां लिखता है.
अऱुंधति जी, आप जब बस्तर की कहानियां लिखेंगी तो सब कुछ सच-सच लिखिएगा. आप 5 दिन के प्रवास में पहले 2 दिन, फिर 1 दिन दादा लोगों के इलाके में थीं, इसकी खबर सबको है. लेकिन हमें उम्मीद है कि आप उनसे प्रभावित हुए बिना सब लिखिएगा.आपने कैंपों में आदिवासियों की पीड़ा देखी है, उन्हें भी लिखिएगा कि आखिर क्यों आदिवासी इन कैंपों में रहने को मजबूर है औऱ वह क्यों नक्सलियों से घृणा करता है.
 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 कई कई फ़ांके बिताकर जो मर गया उसके बारे में
लोग कहते है वहां पर ऐसा नही ऐसा हुआ होगा !!

उन बेचारे आदिवासीयो को कुछ नही मिला मगर क्या अब उन्हे जीने का भी अधिकार नही है ? सिर्फ़ बातें होती है मगर बातो से पेट नही भरता और इन खाली पेट और अपराध का बडा गहरा नाता है !
 
   
 

Prashant Kumar Dubey पटना

 
 यह पहली बार पढ़ रहा हूं कि किसी वैचारिक वामपंथी ने चीन को गलत ठहराया है. वरना तो हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा तो अब तक बुलंद था.

आपने सही कहा कि जो मूल मुद्दे थे, उन्हें किनारे कर दिया गया और नक्सलवाद और आतंकवाद को बड़ा मुद्दा बना कर पेश कर दिया गया. जबकि् भूख, गरीबी असली मुद्दे थे.
 
   
 

jasbir chawla (chawla.jasbir@gmail.com) indore

 
 अरुंधति जी, विश्लेषण नहीं समस्या का विस्तार से हल भी बतलाएं. 
   
 

shiam tripathi (shiamtripathi@yahoo.ca)

 
 अरुंधति जी के इंटरव्यू को देखकर मुझे French Revolution और Russian Revolution की याद आ जाती है. मैं उनके विचारों का अभिनंदन करता हूं. किसानों पर अत्याचार होना एक राष्ट्रीय दुर्भाग्य है. 
   

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