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असगर अली इंजीनियर से बातचीत

संवाद

 

मुसलमानों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं

इस्लामिक विषयों के विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर से रेयाज उल हक की बातचीत

 

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म  के अध्यक्ष और इस्लामिक विषयों के विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर की पहचान मजहबी कट्टरवाद के खिलाफ लगातार लड़ने वाले शख्स के रुप में है. असगर अली इंजीनियर मानते हैं कि जहां-जहां इस्लाम पर जुल्म हुआ है, वहां के लोग लड़ाई के लिए खड़े हुए हैं. वे मानते हैं कि कट्टरपंथ मजहब से नहीं, सोसायटी से पैदा होता है. इनकी राय में भारतीय मुसलमान इसलिए अतीतजीवी है क्योंकि यहां के 90 प्रतिशत मुसलमान पिछड़े हैं और उनका सारा संघर्ष दो जून की रोटी के लिए है. इसलिए उनके भीतर भविष्य को लेकर कोई ललक नहीं है. यहां प्रस्तुत है, डॉ. असगर अली इंजीनियर से की गई बातचीत के अंश.

असगर अली इंजीनियर

 

 अगर धर्म के आधार पर देखा जाये तो दुनिया भर में अमरिकी प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष में इसलामी राष्ट्रों के लोग ही सबसे अगली कतारों में हैं. इसके क्या कारण देखते हैं आप ?

 

विश्व के जिन हिस्सों पर जुल्म हो रहा है, वे सारे वही हिस्से हैं, जहां मुसलमान हैं. आज अमरिकी हमला वियतनाम, कोरिया या चीन पर नहीं हो रहा है. तो वहां के लोग क्यों लडेंगे अमेरिका के खिलाफ ? फलस्तीन में या इराक में जो कुछ हो रहा है, उसे भुगतनेवाले तो मुसलमान ही हैं न ? तो लडनेवाले भी मुसलमान ही होंगे.

 

इसके क्या कारण हो सकते हैं कि मुसलमानों को ही टारगेट बनाया जा रहा है?

 

• • इसलिए कि अमेरिका मध्यपूर्व पर अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहता है. वहां तेल का भंडार है, जिस पर वह अपना कब्जा जमाना चाहता है. वहां जो भी जुल्म होता है, उसमें वह इस्राइल की हिमायत करता है. इसके जरिये वह अरबों को दबा कर रखना चाहता है. इस्राइल अमेरिका की पुलिस चौकी है, जिसके जरिये अमरिकी अरबों पर कंट्रोल रखना चाहते हैं. जब इस पुलिस चौकी द्वारा फलस्तीन के लोगों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं उनके खिलाफ. इसी तरह अमेरिका इराक पर कब्जा करता है क्योंकि वहां बेशुमार तेल है. सऊदी अरब के बाद वहां सबसे ज्यादा तेल है. इसलिए वह वहां अपना कब्जा जमाये रखना चाहता है. तो बदले की कार्रवाई तो होगी ही.

 

भारत और शेष विश्व के मुसलिम समाज में एक फर्क दिखता है. पूरी दुनिया के मुसलिम समाज में ऐसे साम्राज्यवादी जुल्म के खिलाफ हर तरह के संघर्ष चल रहे हैं. लेकिन भारत के मुसलमान इस साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में दूर-दूर तक नहीं दिखते या बहुत कम. वे विरोध जताने के लिए एक साधारण-सा जुलूस तक नहीं निकाल पाते हैं. ऐसा क्यों ?

 

• • इसलिए कि किसी जमाने में जब विरोध किया तो उसका रद्दे अमल सख्त हुआ. जैसे इस्राइल का येरुशेलम पर हमला हुआ था 1968 में, तो मुसलमानों ने बहुत बडा जुलूस निकाला. उसका बहुत ही बुरा रद्दे अमल हुआ. उस समय जनसंघ ने काफी प्रोपेगेंडा किया कि मुसलमानों की वफादारी भारत के साथ नहीं है बल्कि मक्का-मदीना के साथ है, बैतुल मुकस (येरूशेलम) के साथ है. इसका लोगों पर बहुत खराब असर पडा.

इसके अलावा हिंदुस्तान में उस जमाने के मुकाबले में इतनी तबदीलियां आयी हैं कि मुसलमान खुद दुनिया के भविष्य के बारे में सोचने से ज्यादा यह महसूस करता है कि उसके अपने भविष्य का क्या होगा. इसलिए वह कश्मीर के भी आंदोलन का खुल कर समर्थन नहीं करता. आप देखेंगे कि कश्मीर की हिमायत में भी दूसरे राज्यों के मुसलमान कोई जुलूस नहीं निकालते. अब वे यह समझते हैं कि उनके हक उनके इलाके से जुडे हुए हैं और उन्हें अपना भविष्य देखना है. इसलिए उनकी वफादारी भी किसी एक पार्टी से खत्म हो गयी. किसी जमाने में उनकी वफादारी सिर्फ कांग्रेस के साथ थी, लेकिन अब हालत यह है कि यहां बिहार में कांग्रेस चुनाव लडती भी है तो वह राजद को वोट देता है. केरल में कम्युनिस्टों को वोट देता है. आंध्र प्रदेश में तेलुगुदेशम को वोट देता है. जो क्षेत्रीय हित हैं, वे भी इसमें काम करते हैं.

 

ऐसा क्यों है कि इसलाम विरोधी जो कुछ भी लिखा जा रहा है, उसकी बडी तारीफ हो रही है? हर जगह उसे काफी प्रचार मिल रहा है? वीएस नायपाल हों या सलमान रुश्दी...

 

• • मीडिया पर कंट्रोल उनलोगों का है, जो उन इलाकों से फायदा उठाना चाहते हैं, जहां इसलामी हुकूमतें हैं या जहां के लोग इसलाम को मानते हैं. जो बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अमेरिका में हैं, उन्हीं के हक में मीडिया होता है. सब फायदा उठाना चाहते हैं मुसलिम राष्ट्रों के तेल से, क्योंकि वे जानते हैं कि तेल की सप्लाइ बंद हो गयी तो सारा ऑटोमोबाइल खडा हो जायेगा सडकों पर. उनके कारखाने बंद हो जायेंगे. कितने रोजगार खत्म हो जायेंगे. इसलिए इस तेल पर अमेरिका का प्रभुत्व होना ही चाहिए. फिर मीडिया वही करता है जो अमरिकी शासक वर्ग के हक में है. इन्हीं के दुष्प्रचार से लोगों में यह धारणा बनती है कि इसलाम कोई ऐसा मजहब है जो हिंसक है.

 

सोवियत संघ में मुसलिम बहुसंख्यावाले राष्ट्र भी शामिल थे. लेकिन दुनिया के दूसरे मुसलिम देशों में मार्क्सवाद अपनी प्रभावी उपस्थिति तक दर्ज नहीं करा पाया है, इसके क्या कारण हैं?

 

• • वह सब ताकत से हुआ था. यह नहीं था कि मध्य एशिया के मुसलमानों ने कम्युनिज्म को कबूल कर लिया था. काफी संघर्ष हुआ वहां भी. लेकिन जब सोवियत रूस कामयाब हुआ उन सब पर कब्जा करने में तो उनके पास इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं था कि वे सोवियत संघ में शामिल हो जायें. क्योंकि वहां जम्हूरियत तो थी नहीं, तानाशाही थी, जिन्होंने मुखालिफत की उन्हें सख्त सजाएं दी गयीं. जेल में डाल दिया या गोली मार दी गयी.

लेकिन इतना ही नहीं थी. मार्क्सवाद के फायदे भी उन्हें नजर आये. शिक्षा-सार्वभौमिक शिक्षा-मिली, बेरोजगारी दूर हुई, खुशहाली आयी. तो बाद में फायदों को भी महसूस किया, इसलिए उसके हामी हो गये.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Abhijeet Sen (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 It is not the war for realigionn but the war for resources(oil). 
   
 

Shamsad (Shamsad_baig@rediffmail.com) Hoshangabad

 
 What can we do? To prove we are indian only indian not a muslim or Hindu. What do you say about gujrat, and babri kand ? 
   
 

dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad,INDIA

 
 असगर साहब ने जो विचार दिए है -वह मंत्रवत है भारतीय समाज के जिस रूप की वोर उनका इशारा है उसके लिए जो जिम्मेदार है उनकी रक्षा करता है भारतीय वामपंथ धर्मं के प्रति जितना भी सजग हो वामपंथ लेकिन जाती के प्रति कही न कही होशियारी करता है अन्यथा मायावती न पैदा होती ! 
   
 

RAMESH MISHRA CHANCHAL (sabhardarshan@gmail.com) MUMBAI

 
 असगर साहब के विचारों को देश के धर्मनिरपेक्ष लोगों को गाइड लाइन बनाना चाहिए. 
   
 

sharad jaiswal (sharadjaiswal2008@gmail.com) lucknow

 
 thanks for this interview. 
   
 

Sunanda Patna

 
 Very good interview. is it possible for you to translate this one and post to raviwar in English ? 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 एक महत्वपुर्ण साक्षात्कार पढाने के लिये रविवार का शुक्रिया !इस विषय मे ओशो की बात याद आती है कि हिन्दुत्व इस्लाम ये सब संप्रदाय है !धर्म निहायत व्यक्तिगत चीज है. 
   
 

bharat sagar (sagar_shandar@yahoo.co.in) Kaladi ( Distt. Ernakulam ) KERALA

 
 श्री असगर साहब के विचारों को देश के धर्मनिरपेक्ष लोगों को गाइड लाइन बनाना चाहिए. 
   
 

Pravin Patel (tribalwelfare@gmail.com) Bilaspur

 
 Ravivar needs contratulations to bring in the facts that throuws enough light on the current socio, economic and political compulsion of the muslims in India and how they are trapped in the international scenerio. I met Asgar Ali at a meeting in Kolkatta before a year and half and can say, what ever he speaks, he is exposing his heart through his words.

Ravivar editorial team, keep it up.
 
   

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