पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > Print | Send to Friend | Share This 

अपने घर से ही हम सब ले कर आते हैं

संवाद

 

अपने घर से ही हम सब ले कर आते हैं

चित्रकार और इंस्टॉलेशन कलाकार सुबोध गुप्ता से गीताश्री की बातचीत

 

युवा चित्रकार और संस्थापन यानी इंस्टॉलेशन की कला में विश्वव्यापी ख्याति अर्जित कर चुके सुबोध अपने मित्रों से वह सिर्फ मातृभाषा भोजपुरी में बात करना पसंद करते हैं. वे कहते हैं, “जब कोई भोजपुरी में बोले ला न मन परसन्न हो जा ला.” यह एक गंवई मन है जो दुनिया भर में अपनी कला की धूम मचा चुकने के बाद भी अपना देसीपन नहीं छोड़ पाया है.

सुबोध गुप्ता


पटना से दिल्ली और फिर दुनिया के दरवाजे से कला बाजार में धमाकेदार प्रवेश करने वाले सुबोध को खुद ही यकीन नहीं आता कि उनकी जिंदगी कब और कैसे एक परीकथा में बदल गई. यह सब कैसे संभव हुआ? अपने गुड़गांव स्थित कोठीनुमा स्टूडियो में लैपटॉप और अपनी कलाकृतियों के बीच बैठे सुबोध भी अपनी अप्रत्याशित सफलता को अचंभे की तरह देखते हैं. कहते हैं, “दो तीन महीने पहले ही गांव गया था. वहां जाकर लगा, क्या मैं यहीं से हूं? आश्चर्य तो होता है, क्योंकि वहां से यहां तक का सफर कठिन तो है.”


पिछले 25 सालों से कला कर्म में जुटे सुबोध 1996 से लगातार इंस्टॉलेशन कला पर काम कर रहे हैं. जीवन के अनुभवों में पक और सींझ कर यहां तक पहुंचने के बाद पीछे मुड़कर देखते हैं तो अपने पुराने परिवेश, अपने गांव, शहर, राज्य बिहार को ही अपनी प्रेरणा का अथाह समुद्र मानते हैं. वह कहते हैं, “ जिस घर को मैं छोड़ आया, वह प्रेरणा का अथाह समुद्र है. एक जन्म कम है वहां से प्रेरणा लेने के लिए.”


सुबोध के काम को देखें तो इस पर पक्का यकीन हो जाता है कि पहले वह अपने घर, फिर समाज, सारा देश और फिर दुनिया से चीजें उठाते हैं. और उसे अपनी कला के जरिए सार्वभौमिक बना देते हैं. चाहे वह गांव की पाठशाला हो या बुलेट मोटर साइकिल, सुबोध ने अपनी संस्थान कला के जरिए इन्हें दुनिया की निगाहों में प्रतिष्ठित कर दिया. यहां प्रस्तुत है उनसे की गई बातचीत के अंश.

सुबोध की एक कृति

 

 अपनी कला यात्रा को कैसे देखते हैं? पटना से दिल्ली और फिर अंतर्राष्ट्रीय कला बाजार तक बड़ी लंबी और कठिन यात्रा रही होगी?


सच्चाई को क्या याद करना. ये भी एक सच है, वो भी एक सच था. तब भी एक जिंदगी थी उसका अपना मिजाज था, यह यच है कि आज रूतबा है. एक यथार्थ से निकलकर दूसरे यथार्थ तक पहुंचने की यात्रा है मेरी. मैं मेहनत तब भी करता था, अब भी करता हूं. ये जरूर है कि मेहनत अब रंग लाई. मुझे उस पुरानी मेहनत का फल अब मिला है. आगे ऐसी ही जारी रहे यात्रा तो सुकुन वाली बात होगी.

आपकी पत्नी भारती खेर भी चित्रकार हैं. लेकिन आप उनसे ज्यादा कामयाब हैं. एक साथ, एक तरह के काम करने वाले लोग सफर में कैसे आगे-पीछे रह जाते हैं?

मैं भारती से पहले से काम कर रहा हूं. दस साल लगे मुझे कामयाब होने में. ये सच है कि भारती को लोकप्रियता कम मिली. मगर वह भी कामयाब चित्रकार है. अगर आप लोकप्रिय नहीं हैं, इसका ये मतलब नहीं कि आपका काम कमजोर है. ऐसे कई लोग हैं, जो आज अच्छा काम कर रहे है और उनकी कला की एक भी प्रदर्शनी नहीं लगी. भारती बेहतरीन कलाकार है. भारती या अन्य किसी कलाकार की एक दूसरे से तुलना नहीं होनी चाहिए. सबकी अलग पहचान होती है.

आपको समकालीनों की तुलना में अपना लक्ष्य पहले कैसे मिल गया?


मेरा फोकस बहुत साफ था. समय बदलते रहे, मगर मेरा फोकस बरकरार रहा. अभी भी है. किसी भी काम के लिए लक्ष्य पहले तय करना जरूरी है. आपका निशाना सही होना चाहिए. अगर आपके अंदर कुछ करने की क्षमता है तो कोशिश करने पर लक्ष्य जरूर हासिल होता है- मैंने हासिल किया.

जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो एक छोटे शहर का क्या योगदान नजर आता है? वहां का माहौल, वहां का समाज, सुख-दुख उन सबने आपको कुछ दिया होगा. उनसे आपने क्या और कितना हासिल किया?


मैंने अपने परिवेश में सुख-दुख दोनों देखा है. दुख ज्यादा देख, सुख कम. लेकिन परिवार ठीक था. इसलिए प्यार बहुत मिला. एक हिंदू परिवार में पैदा होने के कारण जो सामान्य हिंदू परिवार की संस्कृति होती है, रोजमर्रा की जिंदगी में उनका जो सांस्कृतिक कर्म होता है, वो सब मुझे विरासत में मिले. उस संस्कृति के बीच पला, बड़ा हुआ, वो मेरे लिए बहुत मायने रखता है. इसका महत्व मुझे तब पता चला जब मैं दिल्ली आया. पीछे मुड़कर देखा तो क्या पाया? मैंने पाया कि संस्कार या जो चीजें मुझे विरासत में मिली है उसे पाने और समझने के लिए लोगों को बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है. लेकिन मैंने जीवन के अनुभवों में पक-सीझ कर हासिल कर लिया. जब मैं उस दौर के जीवन को जी रहा था, तब पता नहीं था कि इसका क्या होगा? मुझे उन्हीं दिनों से आज की रोशनी मिली है दुनिया क्या और कैसी है, ये मुझे उन्हीं दिनों ने बताया. एक कलाकार होने के नाते पता चला कि हमारी भूमिका क्या है? जिस घर को मैं छोड़ आया हूं वह प्रेरणा और अनुभव का अथाह समुद्र है. हम अपने ही घर से विचार, उनका बुना हुआ समाज, प्रेम, घृणा, अलग मिजाज सब लेकर आते हैं. हम जैसे कलाकार पहले घर, फिर समाज और फिर देश-दुनिया से चीजें उठाते हैं.

आज आपकी कला की पश्चिमी कला बाजार में खूब मांग है. भारतीय कला बाजार में कैसा रिस्पांस है?

एक वर्ग है, समाज में जो कला पहचानते है. वे खास तरह के लोग हैं. मेरे चाहने वाले यहां भी हैं, वहां भी हैं. आमलोग कला से थोड़ा दूर ही रहते हैं. हालांकि उन्हें भी यह हक बनता है कि वे कला को देखें, खरीदे या ना खरीदें.

आपने कला के लिए जिस माहौल की बात की. आपने उस माहौल को अपनी कला में कैसे रूपांतरित किया है?

यहां पर मैं एक लेखक का उदाहरण दूंगा. प्रेमचंद की कहानियां देखें- हामिद का चिमटा, जैसी सशक्त कहानी, बिना अपने माहौल को एक्सप्लाएट किए संभव नहीं थी. लेखक ने अपने पास की चीजों को जिस तरीके से दिखाया, छोटी-छोटी कहानियों में उसी तरह एक कलाकार अपने आस-पास के जीवन को एक सच्चाई के साथ बुनता है. हालांकि लेखन और कला दोनों का अलग संवाद होता है अपने माहौल से. कला में जो माहौल रूपांतरित होकर आता है उसे समझना थोड़ा मुश्किल लेखन की तुलना में होता है. अगर आप सही तरीके से चीजों को ढाले तो आप सफल कलाकार हैं.
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Surendra kishor Nawada, Bihar, India

 
 Commercial galleries are a prominent part of the art world, but there are many other ways to show your work: non-profits, collaboratives, artist-run spaces, online galleries, artist-run fairs, cafes, restaurants, retail spaces, books, zines, podcasts, project-specific websites, libraries, botanical gardens, hospitals, science centers--really, anywhere you can think of.
Only you can know where your work fits best, which depends of course on its content, the context you want it to be shown in, and the kind of audience you seek. Let your art dictate where it should be shown, rather than conforming it to a preconceived venue.
 
   
 

Manisha Chauhan Delhi

 
 When Dada artists such as Marcel Duchamp challenged the status quo by presenting the piece Fountain 1917 (a urinal which he christened a ready made sculpture) for an exhibition he was challenging not only notions of skill and the nature of art but also how we use art as viewers and consumers. When artists began to use the “ready made” they were using the gallery space as part of the work. Duchamps Urinal would not be shocking in a builder’s yard – it is only when it is put in the context of an art gallery and displayed on a plinth that it gains its power to shock and bemuse.

The idea of using found objects in a space was developed by Kurt Schwitters with his Merzbau project. In the aftermath of WW1 he turned rooms of his house into walk in artworks by covering every surface with Found collage elements from the everyday world. In creating a kind of modern metropolitan Grotto, he created an environment which would have a powerful effect on anyone entering into it- they would in effect become part of the work by entering the room.

Art such as this was a total rejection of the Art Market. The only way Schwitters could sel l Merzbau as a piece of art would be to sell the whole house that contained it. In this sense the use of the found object and these early experiments with installation represent a decisive break from the established workings of the market and the museum
 
   
 

सुमित शर्मा (sumit.yaas@gmail.com) बिलासपूर

 
 रविवार के ज़रिये मुझे इस इंस्टॉलेशन आर्ट के बारे मे जानकारी हासिल हुई.
आपका आभार.
 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in