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अपने घर से ही हम सब ले कर आते हैं

संवाद

 

अपने घर से ही हम सब ले कर आते हैं

चित्रकार और इंस्टॉलेशन कलाकार सुबोध गुप्ता से गीताश्री की बातचीत

 

युवा चित्रकार और संस्थापन यानी इंस्टॉलेशन की कला में विश्वव्यापी ख्याति अर्जित कर चुके सुबोध अपने मित्रों से वह सिर्फ मातृभाषा भोजपुरी में बात करना पसंद करते हैं. वे कहते हैं, “जब कोई भोजपुरी में बोले ला न मन परसन्न हो जा ला.” यह एक गंवई मन है जो दुनिया भर में अपनी कला की धूम मचा चुकने के बाद भी अपना देसीपन नहीं छोड़ पाया है.

सुबोध गुप्ता


पटना से दिल्ली और फिर दुनिया के दरवाजे से कला बाजार में धमाकेदार प्रवेश करने वाले सुबोध को खुद ही यकीन नहीं आता कि उनकी जिंदगी कब और कैसे एक परीकथा में बदल गई. यह सब कैसे संभव हुआ? अपने गुड़गांव स्थित कोठीनुमा स्टूडियो में लैपटॉप और अपनी कलाकृतियों के बीच बैठे सुबोध भी अपनी अप्रत्याशित सफलता को अचंभे की तरह देखते हैं. कहते हैं, “दो तीन महीने पहले ही गांव गया था. वहां जाकर लगा, क्या मैं यहीं से हूं? आश्चर्य तो होता है, क्योंकि वहां से यहां तक का सफर कठिन तो है.”


पिछले 25 सालों से कला कर्म में जुटे सुबोध 1996 से लगातार इंस्टॉलेशन कला पर काम कर रहे हैं. जीवन के अनुभवों में पक और सींझ कर यहां तक पहुंचने के बाद पीछे मुड़कर देखते हैं तो अपने पुराने परिवेश, अपने गांव, शहर, राज्य बिहार को ही अपनी प्रेरणा का अथाह समुद्र मानते हैं. वह कहते हैं, “ जिस घर को मैं छोड़ आया, वह प्रेरणा का अथाह समुद्र है. एक जन्म कम है वहां से प्रेरणा लेने के लिए.”


सुबोध के काम को देखें तो इस पर पक्का यकीन हो जाता है कि पहले वह अपने घर, फिर समाज, सारा देश और फिर दुनिया से चीजें उठाते हैं. और उसे अपनी कला के जरिए सार्वभौमिक बना देते हैं. चाहे वह गांव की पाठशाला हो या बुलेट मोटर साइकिल, सुबोध ने अपनी संस्थान कला के जरिए इन्हें दुनिया की निगाहों में प्रतिष्ठित कर दिया. यहां प्रस्तुत है उनसे की गई बातचीत के अंश.

सुबोध की एक कृति

 

 अपनी कला यात्रा को कैसे देखते हैं? पटना से दिल्ली और फिर अंतर्राष्ट्रीय कला बाजार तक बड़ी लंबी और कठिन यात्रा रही होगी?


सच्चाई को क्या याद करना. ये भी एक सच है, वो भी एक सच था. तब भी एक जिंदगी थी उसका अपना मिजाज था, यह यच है कि आज रूतबा है. एक यथार्थ से निकलकर दूसरे यथार्थ तक पहुंचने की यात्रा है मेरी. मैं मेहनत तब भी करता था, अब भी करता हूं. ये जरूर है कि मेहनत अब रंग लाई. मुझे उस पुरानी मेहनत का फल अब मिला है. आगे ऐसी ही जारी रहे यात्रा तो सुकुन वाली बात होगी.

आपकी पत्नी भारती खेर भी चित्रकार हैं. लेकिन आप उनसे ज्यादा कामयाब हैं. एक साथ, एक तरह के काम करने वाले लोग सफर में कैसे आगे-पीछे रह जाते हैं?

मैं भारती से पहले से काम कर रहा हूं. दस साल लगे मुझे कामयाब होने में. ये सच है कि भारती को लोकप्रियता कम मिली. मगर वह भी कामयाब चित्रकार है. अगर आप लोकप्रिय नहीं हैं, इसका ये मतलब नहीं कि आपका काम कमजोर है. ऐसे कई लोग हैं, जो आज अच्छा काम कर रहे है और उनकी कला की एक भी प्रदर्शनी नहीं लगी. भारती बेहतरीन कलाकार है. भारती या अन्य किसी कलाकार की एक दूसरे से तुलना नहीं होनी चाहिए. सबकी अलग पहचान होती है.

आपको समकालीनों की तुलना में अपना लक्ष्य पहले कैसे मिल गया?


मेरा फोकस बहुत साफ था. समय बदलते रहे, मगर मेरा फोकस बरकरार रहा. अभी भी है. किसी भी काम के लिए लक्ष्य पहले तय करना जरूरी है. आपका निशाना सही होना चाहिए. अगर आपके अंदर कुछ करने की क्षमता है तो कोशिश करने पर लक्ष्य जरूर हासिल होता है- मैंने हासिल किया.

जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो एक छोटे शहर का क्या योगदान नजर आता है? वहां का माहौल, वहां का समाज, सुख-दुख उन सबने आपको कुछ दिया होगा. उनसे आपने क्या और कितना हासिल किया?

कुछ संवाद और...


मैंने अपने परिवेश में सुख-दुख दोनों देखा है. दुख ज्यादा देख, सुख कम. लेकिन परिवार ठीक था. इसलिए प्यार बहुत मिला. एक हिंदू परिवार में पैदा होने के कारण जो सामान्य हिंदू परिवार की संस्कृति होती है, रोजमर्रा की जिंदगी में उनका जो सांस्कृतिक कर्म होता है, वो सब मुझे विरासत में मिले. उस संस्कृति के बीच पला, बड़ा हुआ, वो मेरे लिए बहुत मायने रखता है. इसका महत्व मुझे तब पता चला जब मैं दिल्ली आया. पीछे मुड़कर देखा तो क्या पाया? मैंने पाया कि संस्कार या जो चीजें मुझे विरासत में मिली है उसे पाने और समझने के लिए लोगों को बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है. लेकिन मैंने जीवन के अनुभवों में पक-सीझ कर हासिल कर लिया. जब मैं उस दौर के जीवन को जी रहा था, तब पता नहीं था कि इसका क्या होगा? मुझे उन्हीं दिनों से आज की रोशनी मिली है दुनिया क्या और कैसी है, ये मुझे उन्हीं दिनों ने बताया. एक कलाकार होने के नाते पता चला कि हमारी भूमिका क्या है? जिस घर को मैं छोड़ आया हूं वह प्रेरणा और अनुभव का अथाह समुद्र है. हम अपने ही घर से विचार, उनका बुना हुआ समाज, प्रेम, घृणा, अलग मिजाज सब लेकर आते हैं. हम जैसे कलाकार पहले घर, फिर समाज और फिर देश-दुनिया से चीजें उठाते हैं.

आज आपकी कला की पश्चिमी कला बाजार में खूब मांग है. भारतीय कला बाजार में कैसा रिस्पांस है?

एक वर्ग है, समाज में जो कला पहचानते है. वे खास तरह के लोग हैं. मेरे चाहने वाले यहां भी हैं, वहां भी हैं. आमलोग कला से थोड़ा दूर ही रहते हैं. हालांकि उन्हें भी यह हक बनता है कि वे कला को देखें, खरीदे या ना खरीदें.

आपने कला के लिए जिस माहौल की बात की. आपने उस माहौल को अपनी कला में कैसे रूपांतरित किया है?

यहां पर मैं एक लेखक का उदाहरण दूंगा. प्रेमचंद की कहानियां देखें- हामिद का चिमटा, जैसी सशक्त कहानी, बिना अपने माहौल को एक्सप्लाएट किए संभव नहीं थी. लेखक ने अपने पास की चीजों को जिस तरीके से दिखाया, छोटी-छोटी कहानियों में उसी तरह एक कलाकार अपने आस-पास के जीवन को एक सच्चाई के साथ बुनता है. हालांकि लेखन और कला दोनों का अलग संवाद होता है अपने माहौल से. कला में जो माहौल रूपांतरित होकर आता है उसे समझना थोड़ा मुश्किल लेखन की तुलना में होता है. अगर आप सही तरीके से चीजों को ढाले तो आप सफल कलाकार हैं.
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