सुप्रसिद्ध साहित्यकार और गांधीवादी चिंतक नंदकिशोर आचार्य से पायल शर्मा की
बातचीत
संवाद
गांधी का सारा जीवन स्वराज की
उपलब्धि का सत्याग्रह
सुप्रसिद्ध साहित्यकार और गांधीवादी चिंतक नंदकिशोर आचार्य
से
पायल शर्मा की बातचीत
महात्मा गांधी की पुस्तक हिंद स्वराज को प्रकाशित हुए 100
साल हो गए. ये 100 साल दुनिया में महत्वपूर्ण बदलाव के भी हैं. ऐसे में हिंद स्वराज
की प्रासंगिकता को लेकर की गई बातचीत के अंश यहां प्रस्तुत हैं.
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हिंद
स्वराज पुस्तक को लेकर देश-दुनिया में क्या हलचल है ?
हिंद स्वराज पुस्तक अपने प्रकाशन से लेकर आज तक विचार-विमर्श
का विषय रही है, बल्कि प्रकाशन के साथ ही देश-विदेश के विचारशील लोगों ने उस पर
विचारपूर्ण टिप्पणियां भी कीं. पुराने लोगों में गोखले और गांधीजी के सहयोगियों में
नेहरु जैसे लोगों ने, यथापि इसके महत्व को स्वीकार नहीं किया था, लेकिन योरोप के
बहुत से महत्वपूर्ण विचारकों ने, कुछ बातों पर अपनी सहमति रखते हुए भी, मोटे तौर पर
इस पुस्तक में व्यक्त विचारों और खासतौर से मूल दृष्टि से अपनी सहमति जाहिर की थी.
आर्य पथ ने तो तीसरे दशक में ही विशेषांक निकाला था. यह नहीं है कि शताब्दी वर्ष की
वजह से ही इस पर पुनर्विचार की शुरुआत हुई है, क्योंकि महात्मा गांधी सदैव विमर्श
के केंद्र में रहे हैं, भारत से अधिक शायद पाश्चात्य में– और उन पर कोई भी विमर्श
हिंद स्वराज के बिना पूरी हो ही नहीं सकता है.
यह अच्छा है कि शताब्दी वर्ष के बहाने इस विमर्श में और तेजी से व्यापकता आ रही है.
औपचारिकतावश ही सही, प्रचलित व्यवस्था से ग्रस्त संस्थाएं भी–यानी हमारे बौद्धिक
संस्थान, इस पुस्तक के बहाने समाज के मौजूदा संकट और उसके समाधान के विकल्पों की
तलाश में लग रहे हैं. देश-विदेश के बहुत सारे विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और एनजीओ
इस पुस्तक को समझने की कोशिश कर रहे हैं– संगोष्ठियों और व्याख्यान आदि आयोजित किए
जा रहे हैं.
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गांधीजी
ने इस पुस्तक के जरिए मूलभूत रूप से क्या संदेश देने की कोशिश की है, उनके संदेशों
को लेकर सिर्फ बौद्धिक वर्ग में चर्चा है या आम लोग भी इससे जुड़ने की कोशिश कर रहे
हैं ?
इस पुस्तक का केंद्रीय सरोकार स्वतंत्रता है, जिसे गांधीजी `स्वराज’
का नाम देते हैं और उसे वे `मन का स्वराज’ यानी चेतना का स्वराज कहते हैं. इस
स्वराज की प्रक्रिया का आधार आत्मबल है, जिसका व्यवहारिक रूप गांधीजी आहिंसा के
व्यवहार में देखते हैं. अहिंसा केवल व्यैक्तिक व्यवहार में नहीं- बल्कि
सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था की प्रक्रिया और कसौटी के रूप में भी. संक्षेप
में कहें तो हिंद स्वराज एक सत्याग्रही व्यक्ति और सत्याग्रही समाज का संकल्प है.
सत्याग्रह अपने रचनात्मक और प्रतिरोधात्मक दोनों ही अर्थों में.
सच तो यह है कि बौद्धिक लोगों में तो सिर्फ चर्चा ही है, जबकि आम जन की तो आकांक्षा
ही यही है कि उनका समाज सत्याग्रही हो, उनका जीवन सत्याग्रही हो. दुर्भाग्य यह है
कि आम जन अपनी आकांक्षा को उतना मुखरित नहीं कर पाती, जितना अति अल्पसंख्यक
सत्तासीन वर्ग– सत्ता राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सभी अर्थों में – सत्ता के साधनों
पर काबिज होने की वजह से अपने हाशिए पर होने को भी मुख्य धारा की तरह बता देता है.
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गांधीजी
ने हिंद स्वराज लिख दिया, लेकिन उन्होंने इस पुस्तक में उल्लेख सिद्धांतों को अमल
में लाने कि लिए अपने समय में क्या प्रयास किया और उनके समकालीनों ने कैसा रुख
अपनाया ?
महात्मा गांधी का सारा जीवन ही स्वराज की उपलब्धि का
सत्याग्रह है. हिंदुस्तान की आजादी का संघर्ष इसी दृष्टि से चला, यथापि वह वास्तविक
स्वराज की उचित पृष्ठभूमि तैयार करने तक सीमित करना था. स्वदेशी, बुनियादी शिक्षा,
मातृभाषा, खादी और ग्रामोद्योग आधारित अर्थव्यवस्था, सर्वोदय आदि सभी के लिए ही तो
वे प्रयास करते रहे. सांप्रदायिक एकता, दलितोद्धार, स्त्रियों का सबलीकरण आदि के
लिए किए गए प्रयत्नों ने काफी कामयाबी भी पाई. ये सब वास्तविक स्वराज के लिए की जाने
वाली तौयारी ही तो थी.
उनके बहुत से सहयोगियों– विनोबा, कुमारप्पा, जयप्रकाश, लोहिया जैसे अनेक लोगों ने
उनके बाद भी उन प्रयत्नों को अपने-अपने तरीकों से जारी रखा. नेहरू और उनके अनुयायी
सरकारी राजनीतिज्ञों ने अगर उस दिशा में रुचि नहीं ली, तो यह नहीं कहना चाहिए कि
उनके सभी समकालीनों का रुख प्रतिकूल ही रहा. भूदान जैसे आंदोलन, जेपी आंदोलन, लोहिया
का अहिंसक प्रतिरोध और अभी के अहिंसात्मक आंदोलन गांधीजी के ही विचारों और प्रयत्नों
की निरंतरता के ही रूप हैं.
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गांधीजी ने अपने
समय में इस पुस्तक में कोई सुधार नहीं किया, पर क्या आज बदले समय में उसमें व्यक्त
सिद्धांतों में कोई फेरबदल या सुधार की जरूरत है ?
हिंद स्वराज एक बीज पुस्तक है. उसमें किसी सुधार की नहीं,
बल्कि उसकी इबारत में अंतर्निहित दृष्टि को समझने की जरूरत है. हिंदी स्वराज का मूल
सिद्धांत समतामूलक स्वतंत्रता है. इसकी प्रक्रिया अहिंसात्मक सत्याग्रह है. इन
सिद्धांतों में किसी परिवर्तन के बजाय इन आयामों और तरीकों को समझने और विकसित करने
की जरूरत है.
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दुनिया की
महत्वपूर्ण किताबों की भीड़ में गांधीजी की इस पुस्तक का क्या स्थान है, आने वाले
संकट से निपटने में यह पुस्तक किस हद तक सहायक हो सकती है.
जिन किताबों ने दुनिया को बनाने में योगदान किया है, वे
प्रारंभ में धर्मिक पुस्तकें रहीं. लेकिन आधुनिक युग परिवर्तनकारी हुई. एडम स्मिथ
की वेल्थ ऑफ नेशंस और मार्क्स की कम्यूनिस्ट मैनिफैस्टो को ऐसा ही माना जा सकता है.
हिंद स्वराज एक ऐसी पुस्तक है जो इन दोनों किताबों और उनके आधार पर विकसित समाज
व्यवस्थाओं के अंतर्विरोधों और तत्वमीमांसीय खामियों को समझती हुई ना केवल उन
व्यवस्थाओं की समीक्षा को प्रस्तुत करती है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का प्रस्ताव करती
है, जो आज की हिंसक और असत्य पर आधारित व्य़वस्था के बरक्स एक सत्याग्रही व्यवस्था
का विकल्प प्रस्तावित करती है. इस दृष्टि से हिंद स्वराज आज शायद सर्वाधिक
महतवपूर्ण पुस्तक है, क्योंकि यह मनुष्य को केवल ऐंद्रिक अस्तित्व नहीं बल्कि मूलतः
नैतिक अस्तित्व मानती है और मनुष्य की नैतिक संभावनाओं के उत्कर्ष के साथ साथ नैतिक
समाज-व्यवस्था की-जिसे सत्याग्राही समाज कहा जा सकता है-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया भी
सुझाती है. शर्त यही है कि हम अपने को नैतिक मानते हैं या नहीं. अगर हम केवल
ऐंद्रिक जरूरतों को भी महत्व दें तो भी वेल्थ ऑफ नेशंस और कम्यूनिस्ट मैनिफैस्टो के
मुकाबले हिंद स्वराज का रास्ता सभी जरूरतों को पूरा करने का ऐसा रास्ता सुझाती है
जिसमें ना तो समानता के लिए राजनीतिक दमन उत्पीड़न की जरूरत होगी और न ही स्वतंत्रता
के लिए आर्थिक शोषण हुए. सत्याग्रही समाज में न तो शोषण का स्थान है, न दमन का.
स्वतंत्रता, समानता और बंधुतत्व के तीनों आदर्श और सत्याग्रही समाज में एक साथ
क्रियावंतित हो सकते हैं.
30.06.2009,
10.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित