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सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु नागर से अभिषेक कश्यप की बातचीत

संवाद

लिखूंगा वही जो लिखना चाहता हूं

सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु नागर से अभिषेक कश्यप की बातचीत

 

जाने-माने कवि, कथाकार, व्यंग्यकार विष्णु नागर हिंदी साहित्य में अपने खास तरह के मुहावरे के लिए जाने जाते हैं. उनकी रचनाओं में व्यंग्य की तल्खी झकझोरती है तो दिलचस्प अंदाज-ए-बयां मन मोह लेता है. उनके पाठकों का दायरा बहुत बड़ा है. वे हिंदी के उन गिने-चुने लेखकों में हैं, आम तौर पर साहित्य से नाता न रखनेवाले पाठक भी जिनकी रचनाओं के मुरीद हैं. यहां पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश

  बचपन की कौन-सी स्मृतियां हैं, कौन-से ऐसे दृश्य हैं जो आपको बार-बार याद आते हैं?

विष्णु नागर


यूं तो पूरा बचपन ही याद आता है. बचपन में मेरा मन पढने में बिल्कुल नहीं लगता था. हां, भटकने में मेरी दिलचस्पी थी. सो स्कूल से भाग कर अपने छोटे-से कस्बे में मैं यहां-वहां भटकता रहता था. कभी नदी किनारे जाकर बैठ जाता था. एक छोटी-सी पहाड़ी थी, वहां जाकर बैठ जाता था. मंदिर की सीढियों पर जाकर बैठ जाता था. पिता की तो बचपन में ही मृत्यु हो गई थी. मैंने उन्हें देखा भी नहीं. मां के साथ रहता था, जो भटकने की मेरी इस आदत को लेकर चिंतित थीं.

एक दिन मैं यूं ही भटक रहा था कि मुझे शौच आया. मैं अपेक्षया सूने रास्ते से घर लौट रहा था कि मेरे एक पड़ोसी, जो मेरी मां को बहन मानते थे, मुझे खोजते हुए उधर से निकले. उन्होंने मुझे बड़े प्यार से साइकिल पर बिठाया. घर ले आए और मेरी मां से बोले -'हाथ-पैर बांध कर इसे खूब पीटो!' वैसा ही हुआ. मां ने मेरी खूब पिटाई की. रस्सी से मेरे दोनों हाथ बांध दिए गए. स्कूल ले जानेवाली लोहे की पेटी मेरे हाथ में पकड़ाई गई और इसी हाल में सरेबाजार मुझे स्कूल ले जाया गया. इसका मनोवैज्ञानिक असर मुझ पर यह हुआ कि उसके बाद मैं फिर कभी स्कूल से नहीं भागा.

मेरे स्कूल न जाने की कुछ ठोस वजहें थीं. दरअसल वहां के एक अध्यापक बहुत जल्लाद किस्म के थे. वे बात-बात पर छात्रों को मारते थे. उनकी ऐसी दहशत थी कि शौच की इच्छा हो तो भी आप इजाजत मांगने से डरते थे कि कहीं पीट न दें. गणित का सवाल सही होने पर भी एक बार मुझे मार पड ग़ई थी. वहां तीसरी कक्षा तक ही क्लास थी. जब एक बार उन अध्यापक ने बताया कि स्कूल को चौथी कक्षा तक बढाया जा रहा है तो मैंने भगवान से प्रार्थना की कि ऐसा न हो. ऐसा नहीं हुआ तो मैंने राहत की सांस ली.

कुछ संवाद और...


वहां एक खराबी और थी. वहां हमारे अध्यापक बस पास और फेल बताते थे. यह नहीं बताते थे कि आप किस दर्जे से पास हुए. तीसरी कक्षा के बाद जब मैं दूसरे स्कूल में गया तो वहां कुछ बेहतर माहौल मिला. वहां छमाही परीक्षा के बाद जब एक अध्यापक ने, जो मेरे दोस्त के मामा लगते थे, बताया कि मैं फर्स्ट क्लास से पास हुआ हूं तो मुझे विश्वास नहीं हुआ. मैं तो पढाई में अपने-आपको इतना गया-बीता मानता था कि यकीन नहीं हुआ मैं फर्स्ट क्लास से पास हो सकता हूं!

अपने शहर शाजापुर को लेकर मेरी कई स्मृतियां हैं जो 1971 में दिल्ली आने पर बहुत परेशान करती थीं. रात को सपने में शाजापुर के अपने लोगों को देखता था तो दिल्ली की दहशत से बड़ी राहत मिलती थी. अपने कस्बे की उन्हीं स्मृतियों ने मुझे वह बनाया, जो आज मैं हूं.

दिल्ली आया तो लंबे समय तक यहां मुझे बेरोजगारी से कठिन संघर्ष करना पड़ा. स्थिति ऐसी आ गई थी कि महीनों भटकने के बाद सोचा था कि वापस लौट जाऊंगा, अगर अंतिम प्रयास के रूप में दिल्ली प्रेस की नौकरी मुझे नहीं मिली. लेकिन मिल गई. वास्तव में शाजापुर से मेरा लगाव तो बहुत था, मगर बार-बार लगता था कि यह बहुत छोटी जगह है. यहां से निकलना चाहिए. तो बीए के बाद जयपुर में अपने मित्र असद जैदी से मिलते हुए मैं दिल्ली आ गया.

आपने लिखना कब और कैसे शुरू किया? शुरुआत कविताओं से की या गद्य से?

शुरुआत तो कविताओं से ही की. दरअसल हमारे कस्बे शाजापुर में कई साहित्यिक विभूतियां हुई थीं. बालकृष्ण शर्मा नवीन हमारे कस्बे के थे. सन् 60 के आस-पास जब मैं 11-12 साल का था, उनकी मृत्यु हो गई थी. नवीन जी की एक बड़ी हस्ती के रूप में वहां भी पहचान थी. उनकी एक मूर्ति बनी, उनके नाम पर हर वर्ष कवि सम्मेलन होता था. नरेश मेहता का भी वहां से संबंध रहा. एक कवि प्रभाग चंद्र शर्मा भी वहीं के थे जो 'तारसप्तक' में आते-आते रह गए. अज्ञेय जी ने उनसे कविताएं मंगवाई थीं, मगर उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया कि ऐसे संकलनों से क्या होता है.

इन साहित्यिक विभूतियों से प्रेरित होकर हम तीन-चार मित्र कविता लेखन के लिए प्रेरित हुए थे. हमने पहले बाल उद्गार मंडल बनाया और थोड़े बड़े हुए तो उसे किशोर उद्गार मंडल नाम दिया.

हम कविताएं लिखते थे, हस्तलिखित पत्रिकाएं निकालते थे और काव्य गोष्ठियां करते थे. मुझे तुक और छंद की बिलकुल समझ नहीं थी, इसलिए मुझे लगता था कि कविता लिखना तो मेरे लिए असंभव है. लेकिन इसमें एक दोस्त ने मेरी मदद की, जिसकी बहुत कम उम्र में मृत्यु हो गई थी.

उसने बताया कि 'धर्मयुग' में जो कविताएं छपती हैं उनमें तो एक लाइन छोटी होती है, दूसरी लाइन बड़ी. तो आजकल कविता लिखने के लिए छंद-वंद जरूरी नहीं रह गई है. तो इस तरह हम भी इस प्रेरणा को पाकर कविताएं लिखने लगे, अपने अध्यापकों को सुनाने लगे. इस तरह से एक साहित्यिक माहौल हम सब मित्रों ने बनाया.
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