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सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

संवाद

सती प्रथा हमारी परंपरा

सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

देश के वरिष्ठ पत्रकार और 'जनसत्ता' के संपादक प्रभाष जोशी क्रिकेट के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने के लिए उस पर लिखते हैं. उनकी राय में भारतीय क्रिकेटर स्वाभाविक रूप से वह कौशल अर्जित करते हैं, जिसकी जरूरत क्रिकेट में होती है, कुछ वैसे ही जैसे ब्राह्मणों ने ब्रह्म से, वायवीय दुनिया से अपने संपर्क के पारंपरिक कौशल के कारण सिलिकॉन वैली में अपना झंडा गाड़ा. प्रभाष जी का मानना है कि भारत में सती प्रथा समेत तमाम मुद्दों को अपनी परंपरा में देखने की जरूरत है. यहां पेश है, उनसे हाल ही में की गई बातचीत.

प्रभाष जोशी

 

आज देश में हिंदी पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष माने जाने वाले प्रभाष जोशी एक विदेशी खेल पर इतने लहालोट रहते हैं, कई लोगों को माजरा समझ में नहीं आता. धोती-कुर्ता और ‘अपन’ वाले प्रभाष जोशी के इस क्रिकेट प्रेम का राज क्या है ?

इंदौर में मैं पला-पनपा. इंदौर में बहुत प्रसिद्ध टीम हुआ करती थी होलकर टीम और इंदौर शहर के लिए वो टीम गौरव का प्रतीक थी. क्योकि उसमें सी.के.नायडू जैसे खिलाड़ी थे, जो कि भारतीय क्रिकेट के प्रथम पुरूष हैं. उसमें मुस्ताक अली जैसे खिलाड़ी थे, जिनसे अधिक रोमांटिक खिलाड़ी तो आज तक नहीं हुआ. उसमें चंदू सरवटे, भाऊ साहेब निर्मलकर थे, जिन्होंने किसी भी हिन्दूस्तानी द्वारा सबसे ज्यादा 443 रन बनाने का रिकार्ड कायम किया था; खंजू रामनेकर और भाऊ निवसरकर, ऐसे लोग उसमें थे. तो एक प्रकार से स्थानीय गौरव की भावना अपने को रिलेट करती थी. फिर मैं क्रिकेट खेलता भी था और अगर मैंने विनोबा का रास्ता ना पकड़ा होता तो शायद मैं टेस्ट क्रिकेट खेलता और रिटायर होता.

मुझे लगा कि क्रिकेट खेलने के बाद दूसरा सबसे करीबी प्रेम दिखाने का तरीका उसके बारे में लिखना होता है. लेकिन लिखना भी मैंने कोई अपने आप शुरू किया ऐसा नहीं है. ‘नई दुनिया’ ने पहली बार खेल का कवरेज चालू किया तो मैं वो पेज निकाला करता था. उस पेज में यह था कि नायडू साहब का कुछ छपे, जगदाले साहब का कुछ छपे तो इनकी तरफ से मैं घोस्ट राइटिंग किया करता था. उस घोस्ट राइटिंग के कारण मुझको लगा कि यह मामला लिखकर आगे बढ़ाया जा सकता है.

अब मैं पाता हूं कि मुझे देखने में जो आनंद आता है, उसे लिखकर मैं बहुत अच्छी तरह से अभिव्यक्त कर सकता हूं. क्योंकि मैं जहां भी जाता हूं, कई महिलाएं मुझे मिलती हैं, वे कहतीं हैं कि हम तो क्रिकेट समझते नहीं लेकिन आप जो लिखते हैं, उसे पढ़ने के लिए हम क्रिकेट पर ध्यान देते हैं. और तो और हिंदी के प्रसिद्ध कवि अपने कुंवर नारायण ने मुझसे कहा कि मैं क्रिकेट देखता नहीं हूं, समझता नहीं हूं. मैं क्रिकेट को आपके गद्य के कारण पढ़ता हूं. अब अगर आपको चारों तरफ से इस तरह का रिस्पांस मिलता है और अगर वो आपका पहला शौक है तो फिर आपकी इच्छा होती है कि आप उसे लगातार करते रहें.

कई बार मेरे मन में यह आता है कि अब तो देख लिया, अब क्या लिखना. मुझे याद आता है कि मैं एक बार विदेश यात्रा पर था तो एक महिला ने मुझे चिट्ठी लिखी कि कल फलां-फलां मैच हुआ, उसमें ऐसी-ऐसी स्थिति हुई. आज सबेरे मैंने इस इरादे से अखबार खोला कि देखते हैं उसमें आप क्या कहते हैं. और आपका लेख न देखकर मुझे बहुत निराशा हुई. तो कम से कम जिस पर सब लोग रुचि रखते हैं, उन पर तो आप जरूर लिखा कीजिए. अब उस महिला को मैं जानता नहीं हूं. यूं भी अपने यहां महिलाओं का क्रिकेट में शौक उतना नहीं है, जितना दूसरे देशों में हो सकता है. लेकिन अगर आपको इतनी व्यापक पाठकीय रुचि और प्रतिक्रिया मिलती है तो यार, लिखने वाला इसके अलावा किसके लिए लिख रहा है ? इसलिए मैं वो करता रहता हूं.

खेल राजाओं का

एक सवाल उठता है बार बार कि क्रिकेट सामंती खेल है. देश का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा मानता है कि क्रिकेट को अनावश्यक रूप से बाज़ार के दबाव के कारण बढ़ावा मिला है, उसके बनिस्बत फुटबाल या हॉकी या जो दूसरे बेहतर खेल हो सकते थे, उनको दरकिनार किया गया.

अपने देश में जिस तरह से यह खेल शुरू हुआ है, उस कारण से उसकी यह छवि बनी हुई है. अपने देश में क्रिकेट लाए अंग्रेज, वो अंग्रेज जो आप पर राज करते थे. सबसे पहले उनके साथ किसने खेलना मंजूर किया ? पारसियों ने, जो कि आपकी एक बहुत ही छोटी अल्पसंख्यक कम्युनिटी थी. अंग्रेजों ने उनको इसलिए क्रिकेट में लगाया कि इन लोगों को वो भारतीयों से फोड़ कर, अलग कर के फिर इनका इस्तेमाल कर सकें. उसके बाद यह महाराजाओं की टीमों का खेल बना. उसके बाद पटियाला महाराजा, बड़ौदा के महाराजा, होलकर महाराजा इस तरह से महाराजा लोग इसमें आए. बनारस में रहने वाले महाराज कुमार ऑफ विजयानगरम् ने इसमें रुचि ली क्योंकि वो क्रिकेट के जरिए अंग्रेजों से अपने संबंध ठीक करना चाहते थे. और तो और, क्रिकेट के दूसरे नंबर के दुनिया के सबसे बड़े प्रामाणिक खिलाड़ी रणजीत सिंह जी महाराज कुमार ऑफ जामनगर, वो भी क्रिकेट इसलिए खेलते थे क्योंकि वो अंग्रेजों का खेल था और इसके जरिए वे अपनी रियासत की रक्षा कर सकते थे. इसलिए एक सज्जन ने उन पर पुस्तक भी लिखी है ‘बैटिंग फॉर द एम्पायर’ यानी साम्राज्य के लिए वो खेलते थे.

यह गौरतलब है कि रणजीत सिंह जी इंग्लैंड की टीम से खेले और उनके भतीजे दिलीप सिंह जी, जिनके नाम पर अपने यहां एक प्रतियोगिता भी चलती है; वो जब क्रिकेट खेलने को आए तो इस हालत में थे कि वो भारत के लिए खेल सकते थे और उनको भारत का कप्तान बनाया जाता. लेकिन रणजीत सिंह ने उनको कहा कि तुम इंग्लैंड के लिए खेलो और वो सबसे पहले इंग्लैंड के लिए खेले.

इंग्लैंड के लिए खेलते हुए रणजी ने पहले ही मैच में सेंचुरी बनाई थी. ऐसे में दिलीप सिंह के ऊपर ये दबाव था कि वो भी सेंचुरी बनाएं. तो उन्होंने भी बनाई थी. इसका सबसे मजेदार नतीजा ये निकला कि मंसूर अली खान पटौदी के पिता इफ्तिखार अली पटौदी इंग्लैंड में खेलते थे. वो पहले इंग्लैंड के लिए ही खेले. वो 1932 की बॉडी लाइन सीरीज में थे और जॉर्डिन के साथ नहीं थे. जॉर्डिन वो कैप्टन थ, जिसने बॉडी लाईन बॉलिंग इन्वेंट की थी. ये उससे सहमत नहीं थे. तो इसलिए जॉर्डिन ने इनको साइड लाइन कर दिया था.
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