पहला पन्ना > Print | Send to Friend | Share This 

राजेन्द्र यादव से बातचीत

संवाद

ब्राह्मणों को ज्ञान-पिशाच कहना चाहिए

सुप्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव से गीताश्री की बातचीत

 

पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने रविवार के साथ बातचीत में भारतीय क्रिकेट में जातीय कौशल के योगदान को रेखांकित करने के क्रम में सिलीकॉन वैली का संदर्भ उठाते हुए वायवीयता, बाह्मण, ब्राह्मणवाद, अमूर्तता और कौशल को लेकर अपने विचार रखे थे. इसे महज संयोग कहा जाए कि उस साक्षात्कार के कुछ ही दिन बाद सुप्रसिद्ध कथाकार और 'हंस' के संपादक राजेन्द्र यादव ने भी अपने एक वक्तव्य में जाने-अनजाने इसी स्थापना पर मुहर लगाई कि ब्राह्मणों में अध्यात्म और तत्वज्ञान के बारीक विश्लेषण का हुनर होता है और ये कविता करने में काम आता है. ये हुनर उनमें जातिवादी व्यवस्था के जरिए विरासत में मिली बौद्धिक संपदा की बदौलत आता है.

इन्हीं मुद्दों को केंद्र में रख कर राजेंद्र यादव जी से यह बातचीत की गयी.

राजेन्द्र यादव

 

आपकी वर्गीय चेतना इन दिनों कुछ थकी मांदी और पस्त होती जान पड़ रही है. अब तक हम जिस राजेन्द्र यादव को जानते थे, उससे एकदम अलग नज़र आ रहे हैं. जिनकी वर्गीय चेतना में जातीय प्रश्नों की ध्वनियां मुखर हो रही है. क्यों ?

उदय प्रकाश पर जाति का आरोप है (आदित्यनाथ के प्रसंग में) उन्होंने जिस तरह से ओबीसी वगैरह के मुद्दे को उठा कर मुझे उससे जोड़ने की कोशिश की, मैं उसका जवाब देना चाहता था. वो शायद पैदा भी नहीं हुए थे तब तक मैं अपने तीन उपन्यास लिख चुका था. वो मेरे लिए, जाति का अतिक्रमण करने की व्यक्तिगत कोशिश थी. उनका बयान मेरे व्यक्तिगत उपक्रम को आहत कर रहा था. उसके जवाब में मैंने कहा कि वर्ग दो हैं, एक जिन्होंने ज्ञान को मोनोप्लाइज़ (monopolize) किया है और दूसरा वो कि जिनके पास भौतिक अनुभव हैं. ब्राह्मण और नॉन ब्राह्मण. अगर मैं नॉन ब्राह्मण में भी वर्गीकृत करता तो वो जातिवाद था.

 

ब्राह्मणों के पास कई हज़ारों साल से ज्ञान कैद है जिसे उन्होंने किसी दूसरे के पास जाने नहीं दिया, उनके पास ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या था. वो अमूर्तन में विचरते रहे, इसीलिए उनके पास कविता है, क्योंकि कविता अमूर्तन का खेल है.

 प्रभाष जोशी ने अपने साक्षात्कार में जिस तरह सिलीकॉन वैली का संदर्भ उठाते हुए वायवीयता, बाह्मण, ब्राह्मणवाद, अमूर्तता और कौशल को लेकर अपने विचार रखे थे. आपके वक्तव्य में भी कहीं ना कहीं तात्विक रूप में वही जातीय श्रेष्ठता की ही बात सामने आती है. जब आप कहते हैं कि कविता कर्म, मूर्त, अमूर्त पर आधारित है और ब्राह्मण अदृश्य को देखने और कल्पना करने में माहिर होते हैं, इसीलिए वे इस क्षेत्र में दूसरी जातियों से आगे है या यहां एक तरह से उन्हीं का वर्चस्व है. अध्यात्म और तत्वज्ञान के बारीक विश्लेषण का हुनर उनमें होता है और ये कविता करने में काम आता है. ये हुनर उनमें जातिवादी व्यवस्था के जरिए विरासत में मिली बौद्धिक संपदा की बदौलत आता है. क्या इसे प्रभाष जोशी के विचारो का विस्तार नहीं माना जाना चाहिए ?


प्रभाष जोशी self glorification (आत्ममहिमा गान) में हैं, अपने को और ब्राह्मण होने को glorify कर रहे हैं. मैं glorify नहीं कर रहा, मैं उस प्रक्रिया की ओर इशारा कर रहा हूं जहां दूसरी जातियों को अमानवीय और क्रूर तरीकों से दूसरी जातियों को ज्ञान से वंचित रखा गया. यहां मुझे अमरीका की “टाइम” पत्रिका की, वहां के वैज्ञानिकों के बीच हुई बहस याद आ रही है, कि क्या हमें उन वैज्ञानिक सिद्धांतों और निष्कर्षों को बिना किसी नैतिक दंश के स्वीकार कर लेना चाहिए, जो जर्मनी के नाज़ी वैज्ञानिकों और डाक्टरों ने मार दिए जाने वाले यहूदियों के साथ अमानवीय परीक्षणों के दौरान प्राप्त किए थे. उन परीक्षणों में कितनों को नृशंस यातनाएं दी गईं, कितने मारे गए, क्या उन सबको लेकर कोई अपराधबोध हमें नहीं होना चाहिए?

यह भी पढ़ें...

प्रभाष जोशी सती प्रथा हमारी परंपरा

 राजेंद्र यादवः चीनी कम,जिंदगी ज्यादा

 एक नॉन-पापा की बात

 संवादः अशोक वाजपेयी-राजेन्द्र यादव


प्रभाष जोशी और मेरे कहे में फर्क है. उनके लिए जो गर्व का विषय़ हो सकता है, हो सकता है वही मेरे लिए शर्म या प्रश्नाकुलता का विषय हो.

आपने आधुनिक साहित्य के श्रेष्ठ 10 कवियों और कथाकारों की सूची बनाई है. वह चर्चा में है. इस सूची का आधार क्या है ? क्या ये महज ऐच्छिक पसंद और नापसंद से तैयार की गई सूची है ?

मैं सिर्फ ये जानना चाहता हूं कि जो लोग मेरी बनाई सूची में शामिल हैं, क्या वो महत्वपूर्ण कवि या लेखक नहीं? क्या उनके बिना आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास पूरा हो सकता है ? हां, आप ये कह सकते हैं कि दस की ही क्यों बनाई, बीस की क्यों नहीं, पचास की क्यों नहीं? पर... ये चुनाव मेरा है. मैंने अपनी सुविधा से जिन दस की ही बनाई, क्या वे दस कमज़ोर हैं? महादेवी वर्मा को छोड़कर सभी ब्राह्मण थे कवियों सूची में, लेकिन क्या उनके बिना हिंदी कविता का इतिहास पूरा होता है?


उधर कथाकारों में मैंने नाम लिए थे प्रेमचंद, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, फणीश्वरनाथ रेणु, मोहन राकेश, शैलेष मटियानी. क्या इनके बगैर साहित्य का इतिहास पूरा होता है? कोई जातिगत भेद नहीं सिर्फ ब्राह्मण और नॉन ब्राह्मण हैं, एक में अमूर्तन है तो दूसरे में अनुभव और संवेदना है. ऐसा कहते वक्त जातिगत पूर्वाग्रह मेरे जरा भी नहीं हैं.


  इस संदर्भ में मैं भक्तिकाल के कवियों की लंबी सूची आपको गिनाना चाहती हूं... नानक, रविदास से लेकर अग्रदास तक ढेरों नाम हैं. इस सूची को ध्यान में रखते हुए कविता-कुल को जाति-कुल में देखने को आप किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे?


हम आधुनिक साहित्य और साहित्यकारों की बात कर रहे हैं तो भक्तिकाल बीच में कहां से आ गया?


  आप कविता की परंपरा में जातिगत संभावना की बात कर रहे हैं. इस सदी में जब कविता में ब्राह्मणों के कौशल की बात की जाती है तो लगता है कविता में जाति एक संभावना है.


जिसे भक्तिकाल कहते हैं, उसके दो हिस्से हैं. एक तो आचार्यों का है जिसमें ब्रह्म, जीव, माया जैसी निरर्थक बातों पर माथापच्ची है और दूसरे वर्ग में जुलाहे, रंगरेज, मेहनत करने वाले, औरतें और मुसलमान भी शामिल थे. वहां भी दो वर्ग हैं- संतों और भक्तिवालों का.


जब रविदास खुद को खालिस चमार घोषित करते हैं तब क्या है? या फिर जुलाहे कबीर को क्या कहेंगे? मुझे लगता है कि कुछ बेवकूफी की बातें हममें भर दी गई हैं. जैसे मनुष्य मनुष्य एक है, उनमें भेद करना गलत है.


आप बताइए क्या अमरीका और यहां का मनुष्य एक है? हमारी मानसिक बनावट, हमारे संस्कार, हमारे अभ्यास, हमारी भौगोलिक और भौतिक सुविधाएं वो नहीं हैं, जो अमरीका के लोगों की है. एक जैसे लगने के बावजूद हम दो बिल्कुल अलग नक्षत्रों पर रहने वाले जैसे हैं. जब-जब आप वैज्ञानिक विश्लेषण करेंगे तो चीज़ों को तोड़कर टुकडों में ही समझना पड़ेगा. सर्व समेटू सामान्यीकरण हमें कहीं नहीं ले जाएगा.

आगे पढ़ें

Pages: