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राजेन्द्र यादव से बातचीत

संवाद

ब्राह्मणों को ज्ञान-पिशाच कहना चाहिए

सुप्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव से गीताश्री की बातचीत

 

पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने रविवार के साथ बातचीत में भारतीय क्रिकेट में जातीय कौशल के योगदान को रेखांकित करने के क्रम में सिलीकॉन वैली का संदर्भ उठाते हुए वायवीयता, बाह्मण, ब्राह्मणवाद, अमूर्तता और कौशल को लेकर अपने विचार रखे थे. इसे महज संयोग कहा जाए कि उस साक्षात्कार के कुछ ही दिन बाद सुप्रसिद्ध कथाकार और 'हंस' के संपादक राजेन्द्र यादव ने भी अपने एक वक्तव्य में जाने-अनजाने इसी स्थापना पर मुहर लगाई कि ब्राह्मणों में अध्यात्म और तत्वज्ञान के बारीक विश्लेषण का हुनर होता है और ये कविता करने में काम आता है. ये हुनर उनमें जातिवादी व्यवस्था के जरिए विरासत में मिली बौद्धिक संपदा की बदौलत आता है.

इन्हीं मुद्दों को केंद्र में रख कर राजेंद्र यादव जी से यह बातचीत की गयी.

राजेन्द्र यादव

 

आपकी वर्गीय चेतना इन दिनों कुछ थकी मांदी और पस्त होती जान पड़ रही है. अब तक हम जिस राजेन्द्र यादव को जानते थे, उससे एकदम अलग नज़र आ रहे हैं. जिनकी वर्गीय चेतना में जातीय प्रश्नों की ध्वनियां मुखर हो रही है. क्यों ?

उदय प्रकाश पर जाति का आरोप है (आदित्यनाथ के प्रसंग में) उन्होंने जिस तरह से ओबीसी वगैरह के मुद्दे को उठा कर मुझे उससे जोड़ने की कोशिश की, मैं उसका जवाब देना चाहता था. वो शायद पैदा भी नहीं हुए थे तब तक मैं अपने तीन उपन्यास लिख चुका था. वो मेरे लिए, जाति का अतिक्रमण करने की व्यक्तिगत कोशिश थी. उनका बयान मेरे व्यक्तिगत उपक्रम को आहत कर रहा था. उसके जवाब में मैंने कहा कि वर्ग दो हैं, एक जिन्होंने ज्ञान को मोनोप्लाइज़ (monopolize) किया है और दूसरा वो कि जिनके पास भौतिक अनुभव हैं. ब्राह्मण और नॉन ब्राह्मण. अगर मैं नॉन ब्राह्मण में भी वर्गीकृत करता तो वो जातिवाद था.

 

ब्राह्मणों के पास कई हज़ारों साल से ज्ञान कैद है जिसे उन्होंने किसी दूसरे के पास जाने नहीं दिया, उनके पास ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या था. वो अमूर्तन में विचरते रहे, इसीलिए उनके पास कविता है, क्योंकि कविता अमूर्तन का खेल है.

 प्रभाष जोशी ने अपने साक्षात्कार में जिस तरह सिलीकॉन वैली का संदर्भ उठाते हुए वायवीयता, बाह्मण, ब्राह्मणवाद, अमूर्तता और कौशल को लेकर अपने विचार रखे थे. आपके वक्तव्य में भी कहीं ना कहीं तात्विक रूप में वही जातीय श्रेष्ठता की ही बात सामने आती है. जब आप कहते हैं कि कविता कर्म, मूर्त, अमूर्त पर आधारित है और ब्राह्मण अदृश्य को देखने और कल्पना करने में माहिर होते हैं, इसीलिए वे इस क्षेत्र में दूसरी जातियों से आगे है या यहां एक तरह से उन्हीं का वर्चस्व है. अध्यात्म और तत्वज्ञान के बारीक विश्लेषण का हुनर उनमें होता है और ये कविता करने में काम आता है. ये हुनर उनमें जातिवादी व्यवस्था के जरिए विरासत में मिली बौद्धिक संपदा की बदौलत आता है. क्या इसे प्रभाष जोशी के विचारो का विस्तार नहीं माना जाना चाहिए ?


प्रभाष जोशी self glorification (आत्ममहिमा गान) में हैं, अपने को और ब्राह्मण होने को glorify कर रहे हैं. मैं glorify नहीं कर रहा, मैं उस प्रक्रिया की ओर इशारा कर रहा हूं जहां दूसरी जातियों को अमानवीय और क्रूर तरीकों से दूसरी जातियों को ज्ञान से वंचित रखा गया. यहां मुझे अमरीका की “टाइम” पत्रिका की, वहां के वैज्ञानिकों के बीच हुई बहस याद आ रही है, कि क्या हमें उन वैज्ञानिक सिद्धांतों और निष्कर्षों को बिना किसी नैतिक दंश के स्वीकार कर लेना चाहिए, जो जर्मनी के नाज़ी वैज्ञानिकों और डाक्टरों ने मार दिए जाने वाले यहूदियों के साथ अमानवीय परीक्षणों के दौरान प्राप्त किए थे. उन परीक्षणों में कितनों को नृशंस यातनाएं दी गईं, कितने मारे गए, क्या उन सबको लेकर कोई अपराधबोध हमें नहीं होना चाहिए?


प्रभाष जोशी और मेरे कहे में फर्क है. उनके लिए जो गर्व का विषय़ हो सकता है, हो सकता है वही मेरे लिए शर्म या प्रश्नाकुलता का विषय हो.

आपने आधुनिक साहित्य के श्रेष्ठ 10 कवियों और कथाकारों की सूची बनाई है. वह चर्चा में है. इस सूची का आधार क्या है ? क्या ये महज ऐच्छिक पसंद और नापसंद से तैयार की गई सूची है ?

मैं सिर्फ ये जानना चाहता हूं कि जो लोग मेरी बनाई सूची में शामिल हैं, क्या वो महत्वपूर्ण कवि या लेखक नहीं? क्या उनके बिना आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास पूरा हो सकता है ? हां, आप ये कह सकते हैं कि दस की ही क्यों बनाई, बीस की क्यों नहीं, पचास की क्यों नहीं? पर... ये चुनाव मेरा है. मैंने अपनी सुविधा से जिन दस की ही बनाई, क्या वे दस कमज़ोर हैं? महादेवी वर्मा को छोड़कर सभी ब्राह्मण थे कवियों सूची में, लेकिन क्या उनके बिना हिंदी कविता का इतिहास पूरा होता है?


उधर कथाकारों में मैंने नाम लिए थे प्रेमचंद, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, फणीश्वरनाथ रेणु, मोहन राकेश, शैलेष मटियानी. क्या इनके बगैर साहित्य का इतिहास पूरा होता है? कोई जातिगत भेद नहीं सिर्फ ब्राह्मण और नॉन ब्राह्मण हैं, एक में अमूर्तन है तो दूसरे में अनुभव और संवेदना है. ऐसा कहते वक्त जातिगत पूर्वाग्रह मेरे जरा भी नहीं हैं.


  इस संदर्भ में मैं भक्तिकाल के कवियों की लंबी सूची आपको गिनाना चाहती हूं... नानक, रविदास से लेकर अग्रदास तक ढेरों नाम हैं. इस सूची को ध्यान में रखते हुए कविता-कुल को जाति-कुल में देखने को आप किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे?


हम आधुनिक साहित्य और साहित्यकारों की बात कर रहे हैं तो भक्तिकाल बीच में कहां से आ गया?


  आप कविता की परंपरा में जातिगत संभावना की बात कर रहे हैं. इस सदी में जब कविता में ब्राह्मणों के कौशल की बात की जाती है तो लगता है कविता में जाति एक संभावना है.


जिसे भक्तिकाल कहते हैं, उसके दो हिस्से हैं. एक तो आचार्यों का है जिसमें ब्रह्म, जीव, माया जैसी निरर्थक बातों पर माथापच्ची है और दूसरे वर्ग में जुलाहे, रंगरेज, मेहनत करने वाले, औरतें और मुसलमान भी शामिल थे. वहां भी दो वर्ग हैं- संतों और भक्तिवालों का.


जब रविदास खुद को खालिस चमार घोषित करते हैं तब क्या है? या फिर जुलाहे कबीर को क्या कहेंगे? मुझे लगता है कि कुछ बेवकूफी की बातें हममें भर दी गई हैं. जैसे मनुष्य मनुष्य एक है, उनमें भेद करना गलत है.


आप बताइए क्या अमरीका और यहां का मनुष्य एक है? हमारी मानसिक बनावट, हमारे संस्कार, हमारे अभ्यास, हमारी भौगोलिक और भौतिक सुविधाएं वो नहीं हैं, जो अमरीका के लोगों की है. एक जैसे लगने के बावजूद हम दो बिल्कुल अलग नक्षत्रों पर रहने वाले जैसे हैं. जब-जब आप वैज्ञानिक विश्लेषण करेंगे तो चीज़ों को तोड़कर टुकडों में ही समझना पड़ेगा. सर्व समेटू सामान्यीकरण हमें कहीं नहीं ले जाएगा.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

akashdeep (deepakashmishra@gmail.com) gorakhpur

 
 यादव जी की धारणा नयी नहीं है. हमेशा से समाज का एक तबका ब्राह्मण विरोधी रहा है और यह मात्र मानवीय स्वभाव को प्रदर्शित करता है जो ब्राह्मण श्रेष्ठ को दरकिनार करने का असफल प्रयास मात्र है. 
   
 

अमिताभ त्रिपाठी (amitabh.ald@gmail.com) इलाहाबाद

 
 गीता श्री के प्रश्न राजेन्द्र जी के उत्तर से अच्छे हैं। यदि यादव जी के उत्तरों में विरोधाभास है तो यह नई बात नहीं है। जातिवाद भारतीय समाज का सच है लेकिन उससे अधिक महत्त्वपूर्ण है वह प्रक्रिया है, जिससे इसे समाप्त करने में मदद मिल सके और मुझ लगता है कि यह बहस इस बिन्दु से कोसों दूर है। 
   
 

shobhit (skbajpai_bsp@yahoo.co.in) bilaspur

 
 राजेंद्र जी,

आप ब्रह्म के स्थान पर ब्राह्मणवाद कहते तो उचित रहता. ब्राह्मणवाद एक विचारधारा है जिसने देश और समाज का पतन किय. लेकिन ब्राह्मण के खिलाफ फतवा जारी करने जैसी स्थिति को यहूदियों के खिलाफ हिटलर की घणा से क्यों ना जोड़ें ? दूसरी बात आधुनिक युग की बात करते समय भक्तियुग की चेतना की अंतर्धारायों को क्यों छोड़ दें ? तीसरी बात यह कि जो आप मनुष्यों की स्वाभाविक असामानता की बात कर रहे हैं, तो आप मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतों से इतर डार्विनवाद के समर्थक के रूप में नज़र आ रहे हैं.

राजेंद्रजी, आप चाहे जो कहें बुनियादी बात यही है कि समाज में आर्थिक स्थिथि ही मनुष्य की श्रेष्ठता को तय करती है एक मनुष्य कितना बिकाऊ है, आज की दुनिया में वही श्रेष्ठ है, और उसकी बाते अकाट्य हैं, यही ब्राह्मणवाद है. और आप इस दर्पयुक्त, दंभयुक्त नव-ब्राह्मणवाद के एक बड़े और शीर्षस्थ नेतृत्व स्थान पर हैं. आप जो ना कहें वो कम है.

हम सभी प्रतीक्षारत हैं आपकी अगली दंभोक्ति के,

सादर
 
   
 

बलराम अग्रवाल (2611ableram@gmail.com) दिल्ली(भारत)

 
 एक सवाल के जवाब में यादवजी शंबूक और गार्गी का जिक्र करने लगते हैं जबकि एक सवाल के जवाब में प्रतिप्रश्न करते हैं कि इस बातचीत में भक्तिकाल कहाँ से आ गया? अगर मुद्दा आज की ही कविता का है तो यादवजी की लिस्टवाले किसी कवि की कविता(या उसका मात्र नाम ही) किसी आम आदमी से जानकर देखिए। कविता की पांडुलिपि बड़े से बड़े किसी प्रकाशक को भेजकर देखिए। कहेगा--यह बिकती नहीं है। क्यों?

ब्राह्मण के तो एक न्यौते पर ही बिक जाने की कहावत लोक में प्रचलित है, तब उसकी लिखी कविता क्यों नहीं बिक पा रही है? जाहिर है कि आम आदमी तक कविता का फैलाव आज नहीं है। लेकिन यह दोष यादवजी ब्राह्मणों पर नहीं डालेंगे। यह दोष आम आदमी का है। बकौल आशुतोष बिहार--ब्राह्मणों ने अन्य जातियों को आगे बढ़ने का मौका दिया! वाह, अपने वक्तव्य से यादवजी ने बहुत-से ब्राह्मणों के जातीय दर्प को जगा दिया है जो 'जातिविहीन समाज' की अवधारणा अथवा प्रयत्नों बहुत पीछे धकेल देगा।
 
   
 

gulzar hussain (gulzarhssn@gmail.com) mumbai

 
 राजेंद्र यादव ने शुरु से ही हिंदू कट्टरपंथियों के साथ साथ मुस्लिम कट्टरंथियों का भी जमकर विरोध किया है. यही बात उनमें खास है. भगत सिंह ने भी सभी धर्म के दुर्गुणों को “मैं नास्तिक क्यों हूं” लिखकर उज़ाकर किया था. दलित और स्त्री विमर्श को हिंदी साहित्य में राजेंद्र यादव ने ही सम्मानजनक स्थान दिलाया. अब राजेंद्र यादव को कोसने का सिलसिला बंद होना चाहिए. 
   
 

krishna kant (krishnakant.pandey45@gmail.com) delhi

 
 श्रेष्ठता का मामला पूरी तरह से आर्थिक है. आर्थिक रुप से श्रेष्ठ लोग ही श्रेष्ठता का प्रदर्शन करते हैं, ऐसा कहना गलत नहीं होगा. 
   
 

संजय ग्रोवर (samvadoffbeat@yahoo.co.in) Delhi

 
 यह बात किसी भी बहस पर कही जा सकती थी/है। ख्याल जरा देर से आया। उम्मीद है आगे से जल्दी आ जाया करेगा।  
   
 

aanupama (aanupamasbhardwaj@gmail.com) noida

 
 इस बहस को पढ़ कर हंसू या रोऊं कुछ समझ में नहीं आता है. जिस देश में अलगाववाद, सांप्रदायिकता, वैमनस्य भरा हो. जहां गरीबी और भूख के हाथों लाई मौत किसी जाति नहीं पूछती है, जहां पर रोड एक्सीडेंट में हज़ारों लोग हर साल मर जाते हैं, वहां हम ऐसी बहस पर एक सेकंड भी कैसे बर्बाद कर सकते हैं.

बढ़ती आबादी का भस्मासुर सामने खड़ा है. सभी बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी जान लगा देना चाहिए. ना कि बीते कल को आज अपन किसी भी स्वार्थसिद्धि के लिए लकड़ी बना कर नहीं जलाना चाहिए ऐसा करने से हमारा देश ही भस्म हो जाएगा.
 
   
 

संजय ग्रोवर (samvadoffbeat@yahoo.co.in) Delhi

 
 वेद ब्राहमणों के ज्ञान के कौशल के स्पष्ट प्रमाण कैसे हैं ? ज़रा बताएं ताकि हम भी समझ सकें। 
   
 

Ashutosh Bihar

 
 ज्ञान का कौशल अधिकतर ब्राह्मणों में ही अधिक होता है, बल्कि इसका स्पष्ट प्रमाण हमारे वेद हैं. ब्राह्मणों ने अन्य जातियों को आगे बढ़ने का मौका दिया है. आपको ज्ञान नहीं है तो चुप रहिए. समाज को और कलंकित मत कीजिए 
   
 

Bsnshi Lal (vermabanshi@yahoo.in) ghaziabad

 
 जोशी एवं यादव जी को ब्राह्मणवाद से उपर उठना चाहिए. आधुनिक भारत में बड़े चोर भी ब्राह्मण हुए हैं जैसे नरसिंह राव, नेवल कमांडर झा जिन्होंने वार रूम लीक कांड किया था. क्या धोनी, युवराज, पठान, आर पी सिंह श्रेष्ठ नहीं है. साहित्य में ब्राह्मणों ने किसी को स्थापित नहीं होने दिया. अर्जुन, कृष्ण, राम श्रेष्ठ नहीं है क्या.

ये ब्राह्मण समाज के विभाजन के लिए दोषी हैं. पाठन-पठन-चिंतन कहां से आएगा, जब प्राचीन भारत में पढ़ने का वैध अधिकार केवल ब्राह्मण को था. वेदों में लिखा था कि ब्राह्मण जन्म से नहीं कर्म से होता है. आपको ज्ञान नहीं है तो चुप रहिए. समाज को और कलंकित मत कीजिए, भविष्य में इस क्षेत्र में भी रूढ़िवादी ब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त होने जा रहा है.
 
   
 

roop chaudhary ghaziabad

 
 गीताजी के सवाल शानदार हैं. राजेंद्र यादव जी ने कई सवालों के ज़वाब गोल-मोल दिए हैं, उन्हें और खुलकर बोलना चाहिए. कबीर, रविदास आदि के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाना है. अंतर्मन का ज्ञान किताबी ज्ञान से गहरा होता है.  
   
 

अजेय (ajeyklg@gmail.com) केलंग , लाहौल, हिमाचल्

 
 बातें हैं, बातों का क्या. कहतें हैं logic is a whore. वह चाहे किसी के साथ मन हो, सो जाए. बातें भी. सीधे सीधे कहिए आप के पास टॉपिक खत्म है. आध्यात्म पर पूर्वाग्रहवश नही कह सकते. सेक्स पर कोई सुनना नही चाहता. असली मुद्दों से बचना हो तो इस महान भारत में जाति विमर्श चलाइए, जब तक चलता हो.

आप लोगों ने इसी तरह हंस की मार्केटिंग की है. उदय प्रकाश को कोसना छोड़िए. पहाड़ में कहते हैं, "मेरी मुंडी मुंडी, हौरां री कादू". अर्थात वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति. आप का logic भी ब्राह्मणवादी है. जोशी जी की तरह. ब्राह्मण का जातिवाद, जातिवाद थोड़े ही होता है. (उदयप्रकाश का ही होता है).
 
   
 

नीलिमा गुजरकर (neelimagujarkar@gmail.com) जबलपुर

 
 जहाँ तक मेरी बुद्धि चलती है और मेरी सामाजिक सोच है, मुझे विश्वास है की यह जो वाद विवाद चल रहा है, ब्राह्मणों और दूसरी जाति के लोगो के कविता करने की योग्यता को लेकर, आधारहीन है. हम क्यों भूल नहीं जाते कि ब्राह्मण अभी तक सिर्फ अपने दीर्घकालीन संस्कृत और हिंदी भाषा के सानिध्य की वजह से ही कविता करने में महारत हासिल किये हुए थे.

अब जब हिंदी भाषा और इससे जुड़े हुए दूसरे ज्ञान के दरवाजे हर जाति और वर्ग के लिए खुले हुए है तो कविता में अब ब्राह्मणों का वर्चस्व कायम नहीं रह सकता. आज कविता सिर्फ ब्राह्मणों की बपौती नहीं रही. इसलिए ये जो भी विवाद है, निराधार है और इसका कोई महत्व नहीं. यह सिर्फ उभरते हुए कवियों को हतोत्साहित करेगा और जातिगत मैत्री भाव में विष घोलेगा. इसलिए बड़े और समझदार लोगो को ऐसे विवादों को आग नहीं देना चाहिए.
 
   
 

Deepak (deepakrajim@gmail.com) kuwait

 
 प्रभाष जी ही कम थे कि इन्होने भी ब्राह्मणवाद का बाजा बजाना शुरु कर दिया ...ब्राह्मणों मे ज्ञानकौशल होता है यह कहना सही परिभाषा नही होगी बल्कि सही परिभाषा यह होगी कि जिसे ज्ञानकौशल हो वह ब्राह्मण हो गया. अक्सर लोग कुछ इक्कले-दुक्कले उदाहरण से यह धारणा बना लेते है कि ब्राहमणों मे ही जानकौशल होता है. यह बिल्कुल irrelevant तरीका है क्योंकि अनेको ऐसे उदाहरण भी भरे पडे है जो यह बता दे कि अनेको तथाकथित ब्राह्मण परले दर्जे के भोंदु है. फ़िर वेद रटना ज्ञानी होने का लक्षण नही है. याद रखिये, ज्ञान अनुभूति है. जबकि आपके सारे वेद सिर्फ़ सूचना हैं. वह किन्हीं औरो की अनुभूतियां है मगर आपके लिये सिर्फ़ सूचनाएं हैं.

मैने एक कहानी सुनी थी कि दो नासमझ लोग पहली बार ट्रेन मे जा रहे थे. अचानक वहां एक सोडा बेचने वाला आया. उन्होंने पहली बार सोडा की बोतल खोली वह भी बडी मुश्किल से. फ़िर उसमें से एक ने कहा, हमें कुछ पता नहीं यह क्या है, इसलिये मैं इसे पहले पीकर देखता हूँ. अगर सब कुछ ठीक रहा तब आधा तुम्हारे लिये छोड़ दूंगा, तुम इसे पी लेना. जैसे ही उसने सोडा की बोतल गटकी, उसी समय इत्तेफ़ाकन ट्रेन एक अंधेरी गुफ़ा के अंदर से गुजरी. कुछ एक मील लंबी गुफ़ा और घुप्प अंधेरा. सोडा पीते हुए मित्र ने दूसरे से कहा.. हाय! इसे पीते ही मुझे कुछ दिखाई नही दे रहा है, सब अंधेरा हो गया. अब मै अंधा हो गया तो हो गया तुम भूलकर इसे मत पीना.

इसी तरह आप अपने ब्राह्मणवादी निष्कर्ष निकाल रहे है. पारस पत्थर से सोना जांचा जा सकता है, फ़ूल नही. इसलिये अपने ये दकियानुसी मानदंड बदलिए. ज्ञानी ब्राह्मण नही हो रहे हैं, बल्कि वह सब हो रहे है, जिन्हे शिक्षा और संपन्नता के अवसर मिल रहे हैं, जो शिक्षा के लिये ज्यादा सचेत हैं. पूरे देश को इस शिक्षा के लिये सचेत होना चाहिये, फ़िर देखिए, यह ब्राह्मणवादी बकवास बंद हो जायेगी !

रविवार से मैं निवेदन करूंगा कि आप इन बेसिर-पैर के मुद्दों पर जान ना डालें. बल्कि मुद्दे पर आएं और मुद्दा है शिक्षा. क्योंकि शिक्षा खुद एक क्रांति है.
 
   
 

संजय ग्रोवर (samvadoffbeat@yahoo.co.in) Delhi

 
 सुनंदाजी, एटमबम होता है और साक्षात होता है। अच्छे या बुरे किसी भी मकसद से वह फटे उसकी आवाज़ हिला देती है। दूसरे दिन अखबारों में और नेट पर भी उसके फोटो देखे जा सकते हैं। वह दुर्गंधित वायु छोड़कर सफाई या खुशबू का ‘क्रेडिट’ नहीं हथियाता। और नेट कोई अमूर्त चीज़ नहीं है, साक्षात है। इसकी अमूर्त से तुलना करना ऐसा ही है जैसे किसी इंसान की अललटप्पू से तुलना करना। नेट पर आप अपने हाथ से कीबोर्ड पर टाइप करते हैं और सामने स्क्रीन पर छपता और जवाब आता देखते हैं। जबकि ब्रहम से संवाद अपने आप में कोई सिद्व प्रक्रिया या वस्तु नहीं है। हम इसे सुनते-रटते पैदा होते हैं और इसीलिए इसपर विश्वास करने लगते हैं। ये अंधविश्वासियों द्वारा हवा से पेंसिल हिलता देखकर उसमें अपने स्वर्गीय दादा की आत्मा को सिर हिलाते देख लेने जैसा विश्वास है। जबकि विज्ञान एक अनूठे और नए विचार में साहस और व्यवहारिकता को जोड़ने से पैदा होता है।

योग्यता-वोग्यता की चालाकियां अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाली। अब लोग समझने लगे हैं कि जिसे हम योग्यता समझते रहे थे उसमें से ज्यादातर पाखण्ड, तिकड़म, साजिशें, अफवाहें थीं। अगर नाली के नीचे रात बिताकर तीस-चालीस रुपए महीने में पूरे मोहल्ले की टट्टियां साफ करने पर भी गालियां खानी पड़े ंतो योग्यता पनाह मांगने लगती है। जिन हालात में दलित हज़ारों सालों से रहते आए हैं, उनमें 6 महीने भी तथाकथित योग्यों को छोड़ दिया जाए तो सर्वाइवल से लेकर स्मरण शक्ति और मानसिक संतुलन तक बचाए रखने के लाले पड़ जाएंगे।

आप रांची में अपने नेट पर मेरी टिप्पणी दोबारा पढें, मैंने पहले ही वाक्य में राजेंद्र यादव के बदल जाने या डरे होने की बात भी की हैं.

हमारे जैसे हालात वाले देश में कविता कलाकंद बिलकुल नहीं होनी चाहिए थी। मगर जो लोग लाशों पर बैठकर कचैड़ियों में नमक कम होने की शिकायत करने की कला में दक्ष या ‘योग्य’ हों वे कविता को जलेबी से लेकर आइसक्रीम तक, अपनी सुविधानुसार, कुछ भी बना सकते हैं।
 
   
 

अविनाश नई दिल्ली

 
 प्रभाष जोशी को पानी पी-पी कर कोसने वालों की चुप्पी से हैरान हूं. यही बातें तो प्रभाष जी ने भी कही थी तब तो लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया था. अब क्या इसलिए चुप्पी है कि ब्राह्मणवाद और उसकी अमूर्तता को एक गैर ब्राह्मण दलित राजेंद्र यादव ने उठा है ? 
   
 

डॉ.लाल रत्नाकर -www.ratnakarsart.com (ratnakarlal@gmail.com) गाजियाबाद

 
 गीताश्री की बौद्धिकता के आगे राजेंद्र जी की बातें कई लोंगो को स्तरीय नहीं लगी है, उन्होंने अपने द्विज होने के साथ साथ उनके वयोवृद्ध (यद्यपि मै गलती कर रहा हूँ यादव जी की उम्र के हिसाब से लिख रहा हूँ - वैसे तो वह अभी जवान है) फिर भी जिस पर सारा साक्षात्कार है उसमे जिस विद्वता से ब्राहमणों की कुटिलता पूर्ण चालाकी का जिक्र हुआ है, वही तो निहितार्थ है ब्राह्मणवाद का. जिसे सींचा है भारत के अनन्य जातियों के बुद्धिजीवियों ने क्योंकि वे उतने क्या बिलकुल कुटिल नहीं थे ? राजेंद्र जी ने दबे मन से यह स्वीकार तो किया है की कविता आदि इनके कर्मो का उत्पाद है पर औरो के उत्पाद को तो कभी भी इन्होने सूचीबद्ध ही नहीं किया. लगभग हर युग में इन्हें ज्ञान के स्तर पर परास्त किया गया है लेकिन विजय का यश तो इन्हें अपने नाम लिखना आता है , काम निकल जाने पर बेशर्मी की इनकी ट्रेनिंग लगभग ठीक है या हो सकती है पर ये चतुर है विद्वान् नहीं यह बात क्यों नहीं कही जाती?

इन्हें -मन्नी-कन्नी सम्मान से क्यों खिलाया पिलाया जाता है उन भूखे नंगो को तब भी स्वजातीय लोंगो की ही फटकार मिलती है, पर इन्हें तब भी सम्मान ?

आश्चर्य होता है इनके यशोगान के लिए लूट पाट के लिए दलितों ने खून पसीना बहाकर धरमस्थल बनाये, राजमहल बनाये, सड़कें बनाई जिस पर उन्होंने कितने कागजों के चिथडों को जिन्हें यह भर सकते थे तब वह वही नहीं करने पाए, नहीं तो सडकों की जगह उनका अपना इतिहास होता-द्विज और शूद्र का भेद ही भारत है और भारत तभी तक भारत है जब तक ब्रह्मण चैन से है? अन्यथा इसे गुलाम होते कितनी देर ! क्या क्या करम इन्होने नहीं किये है यादव जी, दुर्भाग्य से या सौभाग्य है की आप ब्रह्मण नहीं हुए नहीं तो ये आपकी क्या गति करते पता नहीं ..........................?

जहाँ भी ये है .........................ज्ञान से नहीं है जिससे है वह आप भी जानते है और गीताश्री भी। बस ।
 
   
 

सुनंदा रांची

 
 राजेंद्र जी की बातों का जिस तरह से संजय ग्रोवर ने समर्थन किया है, वह चकित करता है. राजेंद्र जी और संजय जी, आप लोग क्या एटम बम बनाने का काम जानते हैं ? नहीं न ? तो भईया, आपलोग घोषित कर दो कि यह बम-वम कुछ नहीं होता, लोग केवल बेवकूफ बना रहे हैं. ठीक उसी तरह, जैसे कंप्यूटर न जानने वाला यह कह दे कि संजय ग्रोवर और राजेंद्र यादव से मैं रांची में बैठे-बैठे नेट के माध्यम से संवाद कर ही नहीं सकती.

कविता की लानत-मलामत करने वालों से अनुरोध है कि पहले कविता को जानने-समझने की योग्यता तो हासिल करें. ठीक उसी तरह, जैसे इस पत्र को पढ़ने के लिए आपको अक्षर ज्ञान और कंप्यूटर ज्ञान की योग्यता की जरुरत होती है. कविता कलाकंद नहीं है.
 
   
 

संजय ग्रोवर (samvadoffbeat@yahoo.co.in) Delhi

 
 ऐसा लगता है जैसे राजेंद्र यादव के भेस में प्रभाष जोशी बोल रहे हों। पिछले कुछ अरसे से वे बदले-बदल, डरे-डरे से लगते रहे हैं। हंस भी।

हिंदी-कविता भी वायवीयता से आगे जाकर अब वायु-वीरता या वायु-वीर्यता बनने की फिराक में लगती है। दो चार मुक्तिबोधों, रधुवीर सहायों को छोड़ दे तो यह अमूर्त कविता कोई भी मूर्त या जीवित व्यक्ति न तो कोई पढ़ता है, न समझ पाता है। अब इसे दुर्भाग्य कहिए चाहे सौभाग्य कि आज भी आम आदमी अशोक चक्रधर या सुरेंद्र शर्मा को साहित्यकार मानता है। वैसे भी, कोई मूर्ख ही कह सकता है कि ‘अंधेरे में’ जैसी कविताएं आम आदमी की समझ में आने वाली ज़ुबान में लिखी गयी कविताएं हैं।

कई बार लगता है कि वायवीय, अमूर्त के नाम पर लिखी गयी कविताओं का उद्देश्य भी वही है जो शादी, मृत्यु या अन्य अवसरों पर पढ़े जाने वाले मंत्रों और कर्मकांडों का है। यानि कि जो कोई काम ही नहीं था निकम्मों ने उसी को काम बना लिया और विद्वान कहलाते हुए धंधा करने लगे। वायवीय और अमूर्त का अर्थ और प्राप्ति यही होती है शायद !
 
   
 

govindm mathur (govindmathur.1950@gmail.com) jaipur

 
 राजेंद्र यादव जी ने दस कवि एवं दस कहानिकारों की सूचि अपनी सुविधानुसार केवल अपनी बात सिद्ध कराने के लिए बनाई लगती है. कविता अब इतनी अमूर्त भी नहीं रही है. केदारनाथ अग्रवाल, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे तखा इन सबसे पहले शमशेर बहादुर सिंह के बिना भी समकालीन कविता की सूची पूरी नहीं होती है. यूं ऐसी कोई सूची बनाना ही गलत है. 
   
 

subhash chandra (subhashinmedia@gmail.com) new delhi

 
 राजेंद्र यादव हिंदी साहित्य में एक ऐसा नाम है जो सदा चर्चा में बने रहने के लिए प्रयत्नशील है। 'हंस' और उसमें छपने वाली तमाम रचनाएं एक ही सोच की कही जा सकती है। दलित और महिला विमर्श को जैसे उन्होंने पेटैंट करा रखा हो? इससे बाहर की दुनिया शायद वह देखना भी नहीं चाहते। ऐसे महापुरूष द्वारा जिन्होंने कविता नहीं रची हो, उसका मर्म कैसे समझा जा सकता है? संभव है ऐसे ही तर्क देकर चर्चा को जन्म देने का भरसक प्रयास किया जाएगा।

गीता जी के पास पत्रकारिता का लंबा अनुभव है तो राजेंद्र जी के पास साहित्य का। शब्दों की सत्ता के लिए दोनों के अलग-अलग रास्ते। सो, प्रश्न का माकूल उत्तर राजेंद्र जी द्वारा नहीं दिया गया और एक उलझाव पैदा किया गया तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं होनी चाहिए। राजेंद्र जी इन्हीं बातों के लिए तो साहित्य और उससे इत्तर जाने जाते हैं।
 
   
 

PremRam Tripathi (prt9999@gmail.com) Bhopal

 
 यादव जी की बातों से मैं पूरी तरह से सहमत हूं कि ज्ञान का कौशल अधिकतर ब्राह्मणों में ही अधिक होता है. यह बात मैं केवल इसीलिए नहीं कह रहा हूं कि मैं भी एक ब्राह्मण हूं बल्कि इसका स्पष्ट ब्रमाण हमारे वेद हैं, जिनमें यह बतलाया गया है कि दुनिया की बहुत सी खोजें अभी हो रही हैं वो हमारे देश में बहुत पहले हो चुकी हैं और यह सभी कार्य ब्राह्मणों द्वारा ही किए गए हैं.

लेकिन यादव जी का यह कहना भी सत्य है कि ब्राह्मणों ने अन्य जातियों को आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया है, इसके उदाहरण यादव जी ने खुद ही दिए हैं.
 
   
 

Rajni (iilloovveeuu1975@yahoo.co.in)

 
 यादव जी ने खरी बात कही है. प्रभाष जोशी जी ने भी सही कहा था. कुछ लोग हैं, जो उनसे चिढ़ते हैं और छद्म नामों से नेट जगत में हाय-हाय मचाए हुए हैं. एक ही आदमी 20-20 नामों से लिख कर बहुत बड़े समूह के विरोध का भान कराना चाहता है. जबकि ऐसा नहीं है.

विरोध करने वाले वही लोग हैं, जो उदय प्रकाश को अपने भाई की स्मृति में पुरस्कार लेने पर मंदोदरी विलाप करने लग जाते हैं, लेकिन अपने आयोजनों के लिए अनुदान लेने और पत्रिकाओं के लिए विज्ञापन लेने उमा भारती, शिवराज चौहान, रमन सिंह औऱ नरेंद्र मोदी के आगे हाथ फैलाने में इन्हें शर्म नहीं आती. प्रगतिशील बनने का इतना ही शौक है तो बताएं कि पहल और वसुधा जैसी पत्रिकाओं ने किस फासीवादी सरकार के विज्ञापन के लिए कभी मना किया ? उनके यहां भी विज्ञापनों के मद से पत्रिका के पन्ने पर कथित सांप्रदायिक नेता ही चहचहाते हैं.
 
   
 

अजय कुमार सिंह सहरसा, बिहार

 
 अगर कविता अमूर्तता का मामला है तो कहानी किसको संबोधित है ? जिन अर्थों में आप कविता की अमूर्तता की बात करते हैं, उन्हीं अर्थों में आपसे पूछा जाए कि देश की 60 करोड़ जनता को तो दो जून की रोटी भी नहीं मिलती. तो क्या उस जनता के लिए आपकी कहानी भी अमूर्त नहीं है और आपकी पत्रिका अश्लील !!!

आप कविता नहीं लिखते इसका मतलब ये नहीं है कि कविता का रिश्ता वायवीयता से है. यह सब कुछ वेदकालीन बातें हो गईं. कविता में निराला की तोड़ती पत्थर भी है और रघुवीर सहाय की रामदास भी. उनसे भी कभी गुजरें, आपकी जबरन की यह शिकायत भी दूर हो जाएगी.
 
   
 

Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) नोयडा

 
 गीताश्री जी ने जिस गंभीरता से संवाल पूछे हैं, राजेंद्र यादव जी ने लगभग टालने वाले अंदाज में जवाब दिया है. अगर इसे टालना न भी कहा जाये तो यह कहना गलत नहीं होगा कि राजेंद्र यादव जी गंभीरता से तो जवाब नहीं ही दिया है. हर सवाल का जवाब देने के बजाय उसे उलझाने की कोशिश उन्होंने की है.

उनका आखरी जवाब उत्तर जरुर सहानुभूति जुटाउ लगता है, जिससे कम से कम उनका पाठक ऊपर उठ चुका है. यादव जी, आप इस संवेदना के हक़दार नहीं है क्योंकि आपने तो जिंदगी को शतरंज की बिसात की तरह मजे लेने के लिए जिया है, इसमें संवेदना की जगह कहां है ?
 
   

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