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माओवादी कवि वरवर राव से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

संवाद

हिंसा नहीं, विकास मुद्दा है

माओवादी कवि वरवर राव से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

वरवर राव को भारतीय माओवादियों के संघर्ष का प्रवक्ता कहा जाता है, सरकारी दावा है कि वे सशस्त्र माओवादियों के नीतिकार हैं. लेकिन वरवर राव इन सब विशेषणों से अलग अपने को क्रांतिकारी कवि कहलाना पसंद करते हैं. 1940 में आंध्र-प्रदेश के वारंगल में जन्मे वरवर राव ने कोई 40 सालों तक कॉलेजों में तेलुगू साहित्य पढ़ाया है और लगभग इतने ही सालों से वे भारत के सशस्त्र माओवादी आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं. सत्ता के खिलाफ लिखने-पढ़ने, संगठन बनाने और पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित करने वाले वरवर राव टाडा समेत देशद्रोह के आरोप में लगभग 8 साल तक जेल में रहे हैं. 2001-02 में तेलुगू देशम और 2004 में कांग्रेस पार्टी ने जब माओवादियों से शांति वार्ता की पेशकश की तो वरवर राव को मध्यस्थ बनाया गया था. इस लंबी बातचीत में वरवर राव ने बस्तर और विनायक सेन से लेकर आंध्र के माओवादी विद्रोह तक के अपने रिश्तों पर विस्तार से चर्चा की है, जिसे यहां हम अविकल रुप से प्रस्तुत कर रहे हैं.

वरवर राव



छत्तीसगढ़ का बस्तर आज युद्द क्षेत्र में बदल गया है. लाखों आदिवासी बंदूक के निशाने पर हैं. बस्तर और छत्तीसगढ़ से आपका कैसा रिश्ता रहा है ?

बहुत सारी यादें हैं. एक बार की यात्रा मुझे अभी याद आ रही है. हम लोग बस्तर और रायपुर की यात्रा पर थे एक बस में सांस्कृतिक दल के साथ. हमारे साथ बहुत सारे साथी थे. हमें किसी ने बुलाया नहीं था, हम खुद आये थे. कार्यक्रम करते-करते हम कांकेर पहुंचे और वहां प्रोग्राम करने के बाद रात को एक स्कूल में सो गये. तो रात शायद दो बजे पुलिस आके उठा के मुझे और गदर को फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में ले गई. तो फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में एसपी और कलेक्टर दोनों ही बैठे थे. तो पूछते हैं कि आप यहां क्यों आए हैं ? कहा- कल्चरल टीम है, ऐसे ही प्रोग्राम देते हुए आए हैं. आदिवासी इलाका है, आदिवासी के बारे में तो हमको दिलचस्पी है. उनके बारे में ही हम लिखते हैं, भाषण देते हैं. तो हम, क्योंकि हमारी समझ है कि जल, जंगल, ज़मीन उनको ही होना चाहिए.

तो एक बहुत लंबा discussion, तीन घंटे लंबा discussion किया है. बार-बार उनका कहना एक ही है कि आपका जो लीडर है कोंडापल्ली सीतारमैय्या है. वो आंध्रा के कृष्णा जिले का है. वहां वो बहुत ज़मीन है उसके पास. वो तो बहुत हिफाज़त किया है और यहां आके आपके आंध्रा लोग, यहां आकर आदिवासी लोगों की ज़मीन छीनना चाहते हैं. वो आदिवासी का बहाना लेकर लोगों की ज़मीन छीनना चाहते हैं. और ये मध्य प्रदेश को आप बांटना चाहते हैं. मध्य प्रदेश और दंडकारण्य में बांटना चाहते हैं.

ये जो है, हम यह नहीं कह रहे है. हम ये कह रहे हैं कि जो आदिवासी, वैसे तो संविधान ही sixth schedule में रखा है उनको. आदिवासी की independent councils बना सकते हैं. और चाहें तो अलग राज्य दे सकते हैं. बाद में जो हुआ है छत्तीसगढ़ में, देखा जाए तो. ये कहा हमने, ये कह कर फिर... खैर वो तो जेएनयू बैकग्राउंड वाले थे लोग. इसीलिए बहुत सी बातें करके भेज दिए.

वहां से निकले और आए हैं भिलाई में ठहरे. भिलाई में, भिलाई स्टील प्लांट में हो या कहीं बाहर भी हो, आंध्रा से आए हुए लोग बहुत होते हैं. खासकर ये नार्थ कांगरा से सीतापुरम में लोग आकर काम करने वाले मज़दूरी करने वाले होते हैं. तो उनके क्वाटर्स में रहे हैं और प्रोग्राम दे रहे थे. तो भिलाई के स्टील प्लांट के सामने प्रोग्राम देने के लिए ऐसे ही एक समय में निकले थे कुछ लोग. मैं press conference करने के लिए दुर्ग गया था. जब press conference कर रहे थे तो मुझे फौरन दुर्ग में information आई कि हमारे टीम के सदस्यों को arrest किए हैं. मैं वहीं press conference करके मैं वापस आया हूं, तब तक एक बस तैयार किए हैं पुलिस वाले, अपना एक वैन. दो बसें, हम जो बस लेकर आए वो बस बीच में रखे. पीछे एक पुलिस वैन, सामने एक पुलिस वैन रखे. हमको extermination orders दे कर कोंटा के रास्ते से लाकर वहीं भद्राचलम में छोड़ दिए. ये 1990 का experience है आपके रायपुर का.

  ये यात्रा किस तरह की रही ?

बहुत अच्छा रास्ता जंगल का. और लौटते समय में हम घने जंगल में. तब तो घने जंगल थे (1990 की बात बोल रहा हूं. 19 साल पहले.) तो वहां एक Red Flag रख कर हमने लिखा कि हम इस जंगल से गुज़रे हैं और इस जंगल से आ रहे हैं, कोई यहां फिरने वाले लोग ये देखें तो हमारी ये इच्छा है कि लाल झंडा जंगल में नहीं लाल किले पर भी लहराएगा एक दिन.

ये लिखकर वहां, पत्थर पर लिख के वो झंडा रखकर चले गए. वो पहली, पहली नहीं वो एक बहुत खास याद है जो रायपुर आने की. वैसे तो रायपुर में intellectual level पर और लेखक होने के कारण से और भी लोग हमारे पास भी आए थे. Seminars में आए थे विनायक सेन हो या इलीना सेन हो. इलीना सेन Feminist Movement में रह कर हैदराबाद आती थीं, वारंगल में आती थीं. और जो किशोर भारती ग्रुप था पहले आपका, अनिल सदगोपाल, ये सब लोगों से हमारा बहुत संबंध था.

हम “सृजना” बोल कर एक literary magazine निकालते थे 1966 से लेकर 1992 तक. 26 साल हमने ये मैगज़ीन निकाली. उसमें सीवी सुब्बाराव नाम के हमारे मैगज़ीन में काम करने वाले दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक लेक्चरर थे और पीयूडीआर में काम कर रहे थे. उन्होंने हमको दिल्ली में हो, रायपुर में हो, कलकत्ता में हो, बहुत से literary interests रखने वाले बुद्धिजीवियों के नंबर दिए थे. तो ये किशोर भारती ग्रुप के वजह से भी हमारे कई संबंध आए थे. तो उससे परिचय था. और वैसे ही सुरेंद्र परिहार, Anthropology के professor जो retire हुआ शायद. वो बहुत ही debate करता था, उनसे भी मिले. और झा, जो अभी arrest हो गए प्रफुल्ल झा, उनसे भी परिचय था. तो वो लोग मिलते थे. वो लोग Press Conference करते थे. तो वो एक हुआ. दूसरी बार हुआ कि हमारा All India League for Revolutionary Culture (AILRC) बोलकर एक Association है. जैसा कि आंध्रा में Viplava Rachayitala Sangham (VIRASAM – Revolutionary Writers’ Association) है, उसको हम 1983 में बनाया, 1981 से कोशिश कर रहे थे, 1983 में बना है.

तो यहां का जो सांस्कृतिक मंच था, हमारा उसमें एक constant unit था. तो उसमें एक समय क्या नाम क्या है लक्ष्मण देशमुख था, कोई आदिवासी गायक और सुशांत कुमार साहा था. नहीं रहा शायद वो. भिलाई का रहने वाले था. वैसी एक टीम थी यहां हमारी. वैसे ही वो सुशांत कुमार साहा को arrest किया था और एक पुलिस स्टेशन के उपर हमला होकर हथियार ले गए थे. मानपुर पुलिस स्टेशन के हमले में उसको रखा था, accused किया था. तो वो तो इतना भी नहीं था. तो मैंने आकर उसको लिए bail डलवाई. तो राजेंद्र सायल से भी परिचय था तो उनके पास, विनायक सेन के पास, सुरेंद्र परिहार के पास रहकर, 15 दिन रहा मैं रायपुर में. रायपुर, दुर्ग, भिलाई. वो कोर्ट जो दुर्ग कोर्ट था, वो तो रोज़ाना रायपुर में रहना, रोज़ाना दुर्ग जाना. मुझे ये बहुत याद है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

subhash chandra kushwaha (sckushwaha@rediffmail.com) Lucknow

 
 कवि वरवर राव का साक्षात्कार पढ़ा । कई महत्वपूर्ण जानकारियां,खासकर तेलंगाना संघर्ष और उसकी दशा,दिशा तथा तत्कालीन वामपंथी नेतृत्व के भटकाव की जानकारी मिली । व्यवस्था किस तरह आंदोंलनों के पक्ष में मुखौटा लगा कर खड़ी होंने का भ्रम पैदा करती है और नेतृत्व , परिस्थितियों का मूल्यांकन किए बिना भटक जाता है । खैर वरवर राव को सलाम !
सुभाष चन्द्र कुशवाहा
 
   
 

अनिल जनविजय (aniljanvijay@gmail.com) मास्को, रूस

 
 बेहद महत्त्वपूर्ण इन्टरव्यू है यह। इस इन्टरव्यू में सबसे ज़रूरी जो बात कही गई है, वह यह कि-- "आज जो जनता को अपनी भावना से सशस्त्र बना रहा है, वही कवि है. कवि की कविता का काम जनता को यानी जो उत्पादन में भाग ले रहा है, उस जनता को सशस्त्र बनाना है। सशस्त्र बनाने का मतलब ये नहीं है कि उसको बंदूक देनी है,बल्कि उसकी भावना में बंदूक की भावना लाना है।" 
   
 

Nandani Singh न्यू पाटलीपुत्रा कॉलोनी, बोरिंग कैनाल रोड, पटना

 
 इस इंटरव्यू से तेलंगाना आंदोलन के साथ-साथ नक्सल आंदोलन का भी एक व्यापक परिदृश्य बनता है. महत्वपूर्ण साक्षात्कार. 
   
 

Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) Noida

 
 आपने साक्षात्कार को जस का तस छापने की जो परंपरा चलाई है, वह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है. सबसे अच्छी बात तो यही है कि पूरे संवाद में लगातार ये भान होता रहता है कि सामने वाले से आमने-सामने बात हो रही है. किसी साक्षात्कार को इससे पहले इतना जीवंत कभी नहीं पाया. आपके प्रयोग को बधाई. वरवर राव से बातचीत के दूसरे अंश को पढ़ने की भी उत्सुकता बनी हुई है. 
   
 

Nirmal Singh gill Jalandhar, India

 
 वरवर राव जी, आपकी एक कविता है- लक़ीर खींच कर जब खड़े हों/मिट्टी से बचना सम्भव नहीं।/ नक्सलबाड़ी का तीर खींच कर जब खड़े हों/ मर्यादा में रहकर बोलना सम्भव नहीं/ आक्रोश भरे गीतों की धुन/वेदना के स्वर में सम्भव नहीं। /ख़ून से रंगे हाथों की बातें/ ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर छाती पीटकर/ कही जाती हैं।/ अजीब कविताओं के साथ में छपी/ अपनी तस्वीर के अलावा/ कविता का अर्थ कुछ नहीं होता।/ जैसे आसमान में चील/ जंगल में भालू/ या रखवाला कुत्ता/ आसानी से पहचाने जाते हैं/ जिसे पहचानना है/ वैसे ही छिपाए कह दो वह बात/ जिससे धड़के सब का दिल/ सुगंधों से भी जब ख़ून टपक रहा हो/ छिपाया नहीं जा सकता उसे शब्दों की ओट में।/ जख़्मों को धोने वाले हाथों पर/ भीग-भीग कर छाले पड़ गए/ और तीर से निशाना साधने वाले हाथ/ कमान तानने वाले हाथ/ जुलूस के लहराते हुए झंडे बन गए।/ जीवन का बुत बनाना/ काम नहीं है शिल्पकार का/ उसका काम है पत्थर को जीवन देना/ मत हिचको, ओ, शब्दों के जादूगर !/ जो जैसा है, वैसा कह दो/ ताकि वह दिल को छू ले।

अब जरा इस कविता को पढ़ें और वास्तविक जीवन में जो कुछ घट रहा है, उस पर विचारें. वरवर राव जी, जहां माओवादी आंदोलन नृशंसतापूर्वक जीवन ले रहा हो, वहां शिल्पकार से जीवन देने की अपेक्षा कहां तक जायज है ? या तो आप कविता में सच कह रहे हैं या संवाद में. लेकिन इतना तय है कि कहीं न कहीं आप झुठ कह रहे हैं.
 
   
 

Sanajy Kumar singh Jagdalpur, Bastar, Chhattisgarh

 
 वरवर राव जी, आपकी बातें अच्छी हैं लेकिन लगता है कि हैदराबाद में रहते हुए आपको बस्तर की खबर नहीं मिलती. बस्तर के जंगलों में जो लाल झंडा गाड़ कर आप गये थे, उसे आपके साथियों ने भोले-भाले आदिवासियों के खून से सींचना शुरु कर दिया है.

अब आपके साथियों का काम केवल लेवी वसूलना और गरीब आदिवासियों को मारना रह गया है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ हाथ मिला कर आपके माओवादी आदिवासियों को मार रहे हैं. बस्तर में टाटा और एस्सार के साथ दोस्ती और बंगाल में विरोध ? यह कैसा माओवाद है वरवर राव जी ?
 
   
 

GOPAL PRASAD (gopal.eshakti@gmail.com) DELHI

 
 अंदर की सच्चाई बयान करता हुआ आलेख. सरकार को इनके उठाए मुद्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. 
   

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