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माओवादी कवि वरवर राव से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
संवाद
हिंसा नहीं, विकास मुद्दा है
माओवादी कवि वरवर राव
से
आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
वरवर राव को भारतीय माओवादियों के संघर्ष का
प्रवक्ता कहा जाता है, सरकारी दावा है कि वे सशस्त्र माओवादियों के नीतिकार हैं.
लेकिन वरवर राव इन सब विशेषणों से अलग अपने को क्रांतिकारी कवि कहलाना पसंद करते
हैं. 1940 में आंध्र-प्रदेश के वारंगल में जन्मे वरवर राव ने कोई 40 सालों तक
कॉलेजों में तेलुगू साहित्य पढ़ाया है और लगभग इतने ही सालों से वे भारत के सशस्त्र
माओवादी आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं. सत्ता के खिलाफ लिखने-पढ़ने, संगठन बनाने और
पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित करने वाले वरवर राव टाडा समेत देशद्रोह के आरोप में लगभग
8 साल तक जेल में रहे हैं. 2001-02 में तेलुगू देशम और 2004 में कांग्रेस पार्टी ने
जब माओवादियों से शांति वार्ता की पेशकश की तो वरवर राव को मध्यस्थ बनाया गया था.
इस लंबी बातचीत में वरवर राव ने बस्तर और विनायक सेन से लेकर आंध्र के माओवादी
विद्रोह तक के अपने रिश्तों पर विस्तार से चर्चा की है, जिसे यहां हम अविकल रुप से
प्रस्तुत कर रहे हैं.
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छत्तीसगढ़ का बस्तर
आज युद्द क्षेत्र में बदल गया है. लाखों आदिवासी बंदूक के निशाने पर हैं. बस्तर और
छत्तीसगढ़ से आपका कैसा रिश्ता रहा है ?
बहुत सारी यादें हैं. एक बार की यात्रा मुझे अभी याद आ रही है. हम लोग
बस्तर और रायपुर की यात्रा पर थे एक बस में सांस्कृतिक दल के साथ. हमारे साथ बहुत
सारे साथी थे. हमें किसी ने बुलाया नहीं था, हम खुद आये थे. कार्यक्रम करते-करते हम
कांकेर पहुंचे और वहां प्रोग्राम करने के बाद रात को एक स्कूल में सो गये. तो रात
शायद दो बजे पुलिस आके उठा के मुझे और गदर को फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में ले गई. तो
फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में एसपी और कलेक्टर दोनों ही बैठे थे. तो पूछते हैं कि आप यहां
क्यों आए हैं ? कहा- कल्चरल टीम है, ऐसे ही प्रोग्राम देते हुए आए हैं. आदिवासी
इलाका है, आदिवासी के बारे में तो हमको दिलचस्पी है. उनके बारे में ही हम लिखते
हैं, भाषण देते हैं. तो हम, क्योंकि हमारी समझ है कि जल, जंगल, ज़मीन उनको ही होना
चाहिए.
तो एक बहुत लंबा discussion, तीन घंटे लंबा discussion किया है. बार-बार उनका कहना
एक ही है कि आपका जो लीडर है कोंडापल्ली सीतारमैय्या है. वो आंध्रा के कृष्णा जिले
का है. वहां वो बहुत ज़मीन है उसके पास. वो तो बहुत हिफाज़त किया है और यहां आके
आपके आंध्रा लोग, यहां आकर आदिवासी लोगों की ज़मीन छीनना चाहते हैं. वो आदिवासी का
बहाना लेकर लोगों की ज़मीन छीनना चाहते हैं. और ये मध्य प्रदेश को आप बांटना चाहते
हैं. मध्य प्रदेश और दंडकारण्य में बांटना चाहते हैं.
ये जो है, हम यह नहीं कह रहे है. हम ये कह रहे हैं कि जो आदिवासी, वैसे तो संविधान
ही sixth schedule में रखा है उनको. आदिवासी की independent councils बना सकते हैं.
और चाहें तो अलग राज्य दे सकते हैं. बाद में जो हुआ है छत्तीसगढ़ में, देखा जाए तो.
ये कहा हमने, ये कह कर फिर... खैर वो तो जेएनयू बैकग्राउंड वाले थे लोग. इसीलिए
बहुत सी बातें करके भेज दिए.
वहां से निकले और आए हैं भिलाई में ठहरे. भिलाई में, भिलाई स्टील प्लांट में हो या
कहीं बाहर भी हो, आंध्रा से आए हुए लोग बहुत होते हैं. खासकर ये नार्थ कांगरा से
सीतापुरम में लोग आकर काम करने वाले मज़दूरी करने वाले होते हैं. तो उनके क्वाटर्स
में रहे हैं और प्रोग्राम दे रहे थे. तो भिलाई के स्टील प्लांट के सामने प्रोग्राम
देने के लिए ऐसे ही एक समय में निकले थे कुछ लोग. मैं press conference करने के लिए
दुर्ग गया था. जब press conference कर रहे थे तो मुझे फौरन दुर्ग में information
आई कि हमारे टीम के सदस्यों को arrest किए हैं. मैं वहीं press conference करके मैं
वापस आया हूं, तब तक एक बस तैयार किए हैं पुलिस वाले, अपना एक वैन. दो बसें, हम जो
बस लेकर आए वो बस बीच में रखे. पीछे एक पुलिस वैन, सामने एक पुलिस वैन रखे. हमको
extermination orders दे कर कोंटा के रास्ते से लाकर वहीं भद्राचलम में छोड़ दिए.
ये 1990 का experience है आपके रायपुर का.
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ये यात्रा किस तरह की रही ?
बहुत अच्छा रास्ता जंगल का. और लौटते समय में हम घने जंगल में. तब तो घने
जंगल थे (1990 की बात बोल रहा हूं. 19 साल पहले.) तो वहां एक Red Flag रख कर हमने
लिखा कि हम इस जंगल से गुज़रे हैं और इस जंगल से आ रहे हैं, कोई यहां फिरने वाले
लोग ये देखें तो हमारी ये इच्छा है कि लाल झंडा जंगल में नहीं लाल किले पर भी
लहराएगा एक दिन.
ये लिखकर वहां, पत्थर पर लिख के वो झंडा रखकर चले गए. वो पहली, पहली नहीं वो एक
बहुत खास याद है जो रायपुर आने की. वैसे तो रायपुर में intellectual level पर और
लेखक होने के कारण से और भी लोग हमारे पास भी आए थे. Seminars में आए थे विनायक सेन
हो या इलीना सेन हो. इलीना सेन Feminist Movement में रह कर हैदराबाद आती थीं,
वारंगल में आती थीं. और जो किशोर भारती ग्रुप था पहले आपका, अनिल सदगोपाल, ये सब
लोगों से हमारा बहुत संबंध था.
हम “सृजना” बोल कर एक literary magazine निकालते थे 1966 से लेकर 1992 तक. 26 साल
हमने ये मैगज़ीन निकाली. उसमें सीवी सुब्बाराव नाम के हमारे मैगज़ीन में काम करने
वाले दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक लेक्चरर थे और पीयूडीआर में काम कर रहे थे. उन्होंने
हमको दिल्ली में हो, रायपुर में हो, कलकत्ता में हो, बहुत से literary interests
रखने वाले बुद्धिजीवियों के नंबर दिए थे. तो ये किशोर भारती ग्रुप के वजह से भी
हमारे कई संबंध आए थे. तो उससे परिचय था. और वैसे ही सुरेंद्र परिहार, Anthropology
के professor जो retire हुआ शायद. वो बहुत ही debate करता था, उनसे भी मिले. और झा,
जो अभी arrest हो गए प्रफुल्ल झा, उनसे भी परिचय था. तो वो लोग मिलते थे. वो लोग
Press Conference करते थे. तो वो एक हुआ. दूसरी बार हुआ कि हमारा All India League
for Revolutionary Culture (AILRC) बोलकर एक Association है. जैसा कि आंध्रा में
Viplava Rachayitala Sangham (VIRASAM – Revolutionary Writers’ Association) है,
उसको हम 1983 में बनाया, 1981 से कोशिश कर रहे थे, 1983 में बना है.
तो यहां का जो सांस्कृतिक मंच था, हमारा उसमें एक constant unit था. तो उसमें एक
समय क्या नाम क्या है लक्ष्मण देशमुख था, कोई आदिवासी गायक और सुशांत कुमार साहा
था. नहीं रहा शायद वो. भिलाई का रहने वाले था. वैसी एक टीम थी यहां हमारी. वैसे ही
वो सुशांत कुमार साहा को arrest किया था और एक पुलिस स्टेशन के उपर हमला होकर
हथियार ले गए थे. मानपुर पुलिस स्टेशन के हमले में उसको रखा था, accused किया था.
तो वो तो इतना भी नहीं था. तो मैंने आकर उसको लिए bail डलवाई. तो राजेंद्र सायल से
भी परिचय था तो उनके पास, विनायक सेन के पास, सुरेंद्र परिहार के पास रहकर, 15 दिन
रहा मैं रायपुर में. रायपुर, दुर्ग, भिलाई. वो कोर्ट जो दुर्ग कोर्ट था, वो तो
रोज़ाना रायपुर में रहना, रोज़ाना दुर्ग जाना. मुझे ये बहुत याद है.
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कोई ये ले जाने वाले होते हैं ना vehicle, जो नेशनल हाईवे में मिलते थे. तो रोज़ाना
मैं हिंदी गाना उसमें सुनता था. अब आ गया है, साउथ में भी आ गया है फैशन. तब नहीं
था. तब तो दो बातें खास थीं. एक तो private vehicles बहुत कम होते थे आंध्रा में,
खासकर हमारे हैदराबाद के तेलंगाना इलाके में. बहुत कम private vehicles होते थे. हम
आरटीसी बसों में चलते थे, सरकारी बसों में. प्राइवेट बसों में भी कैसेट बजाने का
कल्चर तब तक नहीं आया था वहां. तो यहां बहुत, अब बैठते ही गाना सुनना होता था. तो
हिंदी के अच्छे गाने आते थे बहुत. तो कुछ गाने तो मुझे याद हो गए हैं. एक वो सिपाही
की चिठ्ठी लिखने का गीत है- संदेसे आते हैं, संदेसे जाते हैं. ये सब गाने जो पंद्रह
दिन सुने तो मैं भी उसे गुनगुनाना शुरु कर दिया.
उस समय मैं बहुत लोगों से मिल रहा था, मीडिया के लोगों से मिल रहा था. तो पंद्रह
दिन रहना है तो क्या करना है. दैनिक भास्कर के ऑफिस रोज़ जाता था. कोर्ट में जाना,
bail के लिए वकील से बात करना. बस पंद्रह दिन रहा था. ये दो मेरे memorable दौरे थे
रायपुर के. ये 1997 के बाद ज्यादा आना नहीं हुआ. ये arrest होने से पहले. उस समय जब
आए थे हम, तो वीसी शुक्ला से मिले थे, रविशंकर शुक्ल के बेटे.
हम भी छत्तीसगढ़ को समर्थन करने वाले थे. और वो भी सांस्कृतिक आजादी को समर्थन करने
वाले थे. वैसे ही हम एक रावल से इंदौर में मिला, वो जनता पार्टी के मंत्री थे. उनको
मिले थे, बहुत से लोग मिले थे. क्योंकि हमारी एक भारत यात्रा थी, वो भारत यात्रा
में जो हम मिले वो 1985 की बात थी. 1985 में आए थे पहली बार. वो भारत यात्रा में
आते हुए मिलते हुए उधर आए थे. रायपुर आए, इंदौर आए, भोपाल से निकले. नागपुर से
भोपाल आए और भोपाल से इधर निकले.
उस समय एक बड़ा किसानों का एक आंदोलन चल रहा था कि इंदौर को नवा बंबई बनाने की
कोशिश हो रही है. औऱ बांबे और इंदौर के बीच में बहुत ही सिटीज़, टाउनशिप्स आ रही
हैं. जैसा बांबे और नवा बांबे में है. इसका यहां किसान लोग विरोध कर रहे थे कि
हमारी ज़मीन जाएगी. तो एक शाम में मीटिंग किए थे. एक मीटिंग उसको विरोध करते हुए
किए थे. किसानों की मांग थी कि यहां रह जाइए आप. इस संघर्ष में रह जाइए आप, क्योंकि
इस संघर्ष में आप अच्छे रूप से समर्थन दे रहे हैं.
हमने समझाया- हम कैसे रह सकते हैं, लेकिन सोचते हैं कि इस संघर्ष में किसी को भेज
दें, organizer भेजेंगे आपको. ये अनुभव 1985 का है. 1985 सितंबर में हम 40000 मील
भारत यात्रा किए हैं. महाराष्ट्र, तब का मध्यप्रदेश, बंगाल, बिहार, उड़ीसा. ये मैं
इतनी यात्रा करते-करते आंध्रा में लौटा तो अरेस्ट हो गय़ा. तो साढे तीन साल टाडा के
अंदर में रखे थे. वो पहला था, 1990 का दूसरा था, 1997 तीसरे बार रिहाई के लिए आया
था. लेकिन तब तक छत्तीसगढ़ नहीं बना था. छत्तीसगढ़ बनने के बाद रायपुर आना पहली बार
2009 में हुआ और एक ये अलग संदर्भ में. इससे पहले जब हम आए थे, तो कोई वर्कर के घर
में, झोपड़पट्टी में या हमारे Cultural Activist के घर में रहे थे.
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चलिए, अब थोड़ा मुद्दे की बात करते हैं. सबसे पहले तेलंगाना से शुरु करते
हैं. तेलंगाना आंदोलन की उपलब्धियां क्या हैं ?
आप जो तेलंगाना के movement के बारे में 46 से 51 के बीच में बोलते हैं.
उपलब्धियां तो बहुत हैं. बहुत ज्यादा उपलब्धियां है क्योंकि ये अब आप जैसा
छत्तीसगढ़ है रायपुर है, वो भी एक princely state था. हैदराबाद स्टेट जो है, एक
रियासत था. पूरे भारत में सबसे बड़ा रिय़ासत था. ऐसा देखा जाए तो directly British
India में नहीं था वो. 1948 तक भी British India में नहीं था वो हैदराबाद रियासत.
उसमान अली खान उसका मालिक था.
सितंबर 13 तारीख से लेकर 17 तारीख तक पुलिस एक्शन के नाम से मिलिट्री एक्शन हुआ
सरदार पटेल के नेतृत्व में, तब हैदराबाद रियासत Indian union में दाखिल हुआ. तो ये
हैदराबाद रियासत होने के कारण एक हैदराबाद स्टेट होने के कारण, princely state में
सत्ता होने के कारण बहुत दमन और उत्पीड़न होता था, शोषण होता था. सुंदरैय्या, जो
वहां कम्यूनिस्ट पार्टी के लीडर था, जो armed struggle को लीड किया था, उनका लिखना
था कि middle ages feudal oppression वहां देखा जाता था. Bonded labour होता था.
तेलुगु में तो एक कहावत है कि “नी बान चन दोरा” यानि मैं तुम्हारा दास हूं. ये
culture में आ गया है. मैं खुद आपसे, एक landloard से, एक काम करने वाला bonded
labour कहता है कि मैं आपका दास हूं. ये दी गई एक भावना है. ये culture में बन गया
है. तो वैसी स्थिति 1930 तक था. तो 1930 से जो आंध्रा महासभा बना है. तो ये boded
labour के विरोध में और self respect के बारे में, एक संघर्ष शुरु हुआ है.
धीरे-धीरे उसमें कम्यूनिस्ट काम करते थे. धीरे-धीरे वो 1946 तक आंध्र महासभा का, वो
आंध्र महासभा एक तरह का united front था; उसका नेतृत्व कम्यूनिस्ट पार्टी के
नेतृत्व में आया है. तो तबसे ये bonded labour खत्म होना, self respect होना,
तेलुगु भाषा के लिए एक स्थान मिलना, इन चीज़ों से लेकर, जो ज़मीन पे tenant है, उस
tenant को ही ज़मीन अगर 12 साल उन्हीं की है तो उनको हक मिला है. और भी आगे जा के
1946 तक Land to the Tiller, जमीन को हल करने वाला का जमीन, ये नारा आ गया.
यानि मैं समझता हूं, भारत में पहली बार land to the tiller नारा तेलंगाना संघर्ष के
बाद आया है. और 1948 के बाद जब पुलिस एक्शन के बाद ये armed struggle में बदल गया
है, कम्यूनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में. क्योंकि 4 जुलाई 1946 को एक बड़ा जुलूस,
रइतगुरी संघम का एक जुलूस निकल रहा था तो उसके ऊपर एक जमींदार ने उसके उपर गोली
चलाई जिससे दो लोग मर गए. एक डोड्डी कोमरैय्या नाम का और एक मलैय्या नाम का.
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डोड्डी कोमरैय्या की शहादत को लेकर, अमरत्व को लेकर ये दिया गया कि अब self respect
के लिए अब हथियार उठाना है. तो 1948 में हथियार उठाकर, 48 से लेकर 51 तक सिर्फ
हैदराबाद के निज़ाम के विरोध में ही नहीं, दिल्ली के राजा के विरोध में भी एक
संघर्ष चला है armed struggle का.
यानी पूरे भारत में पहली बार एक सशस्त्र संघर्ष कम्यूनिस्टों के नेतृत्व में हुए
हैं. उसके नेतृत्व में 3000 गावों में 10 लाख एकड़ Land भूमिहीन लोग जप्त कर लिए.
और एक तरह के Red Rule तीन साल के लिए वहां चला है.
तो पुलिस एक्शन हुआ, तो कम्यूनिस्ट पार्टी लीडर भी वहां surrender हो गए जवाहर लाल
नेहरु के. जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि हम ही land reforms लाएंगे, हम ही tenancy act
लाएंगे, हम land to the tiller देंगे. ये सब promises नेहरू ने किए थे. डांगे,
राजनारायण रेड्डी जैसे लोगों ने उसे मान लिये हैं. तो 1951 में withdraw किए हैं.
Withdraw करने में हथियार भी वापस किये हैं और ज़मीन भी वापस किये हैं. तो एक तरह
का उनके साथ treachery हुआ है. उनके साथ नेतृत्व का treachery हुआ है. नहीं तो जो
पाया है, आप जो पूछा है तो तीन हज़ार गावों में 10 लाख एकड़ land भूमिहीन लोग का हक
आ गया है. एक तरह का land rule आ गया है. तो खैर ज़मीन गया है बाद में, फिर भी, मैं
आपका दास हूं ये भावना गया है. अब आप तेलंगाना में कहीं नहीं सुनते हैं कि हम आपके
दास हैं. एक ये हुआ.
दूसरा इसके कारण ही tenancy act आया है. अब tenancy act ही लागू हुआ है. और
जमींदारी, जागीरदारी, देशमुख, देशपांडे जो भी titles हैं, ये titles सब गया है. और
पहली बार 1952 में तेलंगाना में, As such हैदराबाद स्टेट में land reforms act है,
जिसमें जमींदारी, जागीरदारी system रद्द हो गया है. और देशमुख , देशपांडे जैसा
titles गए हैं. और tenant act गया है. और आप economic terms में आप पूछ रहे हैं तो
ये आया है. ये पेपर में कितना रहा अमल कितना हुआ, ये दूसरी बात है.
अमल नहीं रहा, इससे फिर से 1969 में, जब 1967 में जब नक्सलबाड़ी हुआ तो श्रीकाकुलम
भी हुआ, तेलंगाना भी संघर्ष शुरु हुआ है. वारंगल, खम्म्म, करीमनगर जिलों में भी
सशस्त्र आंदोलन फिर से 1969 में शुरु हुआ, उससे inspire होकर ही हमने क्रांतिकारी
लेखक संघ बनाया. क्रांतिकारी मैं तो, मेरे लेखन में क्रांति की बात कहनी मैंने 1969
में शुरु की. तब मैं कॉलेज लेक्चरर भी था. तब तक पॉलिटिक्स में नहीं था मैं.
जब तेलंगाना सशस्त्र आंदोलन चल रहा था तब तो मैं आठ साल का बच्चा था. तब पॉलिटिक्स
नहीं था. दूसरी तरफ देखा जाए तो मैं कांग्रेस family से आया हूं. मेरा भाई वारंगल
तालुका कांग्रेस का प्रेसिडेंट था. मेरा परिवार पूरा कांग्रेस से, मेरे दो भाई
कांग्रेस पार्टी में काम किए थे. निज़ाम के विरोध में भूमिगत थे. निज़ाम के विरोध
में संघर्ष भी किए थे. मेरा बड़ा भाई 1950 में मर गया.
वैसे तो कांग्रेस परिवार है. मेरी माँ जब तक जिंदा रही, कांग्रेस पार्टी को ही वोट
करती रहीं. तो यानी मेरे गांव में ही मेरा एक बड़ा भाई, यानी मेरा चचेरा भाई
कम्यूनिस्ट पार्टी का लीडर था. वो अंडरग्रांउंड हो गया था. वो सशस्त्र संघर्ष लड़ा
था. पहले election में एमपी बना था 1952 में. वारंगल पार्लियामेंट जीत लिया, दो
असेंबली सीट जीत लिया तो देश भर में ये उनका रिकार्ड था कि दो असेंबली सीट जीत लिया
और दो पार्लियामेंट सीट जीत लिया. पार्लियामेंट रख लिया, असेंबली से resign दे
दिया. वो मेरा चचेरा भाई ही है, फिर भी मेरा परिवार कांग्रेसी होने के बाद, अगर है
तो, कहा गया है तो मैं कांग्रेसी था. क्योंकि पहले चुनाव में मैंने कांग्रेस का
प्रचार भी किय़ा है. तब दस साल का बच्चा था मैं.
मगर जब धीरे-धीरे मैंने पढ़ना शुरु किया हूं, Teaching शुरु किया, खासकर नक्सलबारी
में जो हुआ है और श्रीकाकुलम में जो सशस्त्र संघर्ष शुरु हुआ है. खासकर आदिवासी
लोगों में जो संघर्ष शुरु हुआ है. वो श्रीकाकुलम सेल में ही सुब्बाराव पाणिग्राही
नाम का एक कवि, सत्यम एक टीचर, कैलाशम एक टीचर, पंचाई कृष्णामूर्ति जो एक
बुद्धिजीवी है, जिन्होंने आंध्रा यूनिवर्सिटी से एम.ए किया है. ये लोग जब
श्रीकाकुलम में शामिल हुए थे. तो मुझे लगा कि ये क्या है, क्योंकि मैं एक teacher,
एक कवि हूं. सत्यम और कैलाशम जैसे teacher, श्रीकाकुलम आंदोलन को lead कर रहे हैं.
मैं एक teacher हूं, बुद्धिजीवी हूं, पंचाई कृष्णामूर्ति जैसे बुद्धिजीवी जो आंध्रा
युनिवर्सिटी से एम ए किए हुए हैं, मैं वैसे ही उस्मानिया यूनिवर्सिटी से एम ए किया
हूं. वो आके श्रीकाकुलम पार्टी का लीडर बन गया है. पाणिग्राही मेरे जैसा एक कवि, और
एक गायक भी है, performing artist है. वो सशस्त्र संघर्ष में गया है. Encounter हुआ
है, गाने लिखे हैं. ये कैसे हो सकता है ?
तो अब मालूम करना शुरु किया. उससे प्रभाव में आ गया मैं. और तब तक ही सृजना start
की थी 1966 में मैंने. तो मैंने महसूस किया कि अब कहीं मुझे एक रास्ता मिल गया है.
मेरे लेखन में हो या भावना में हो या teacHing में हो, जो भी हो मुझे एक रास्ता मिल
गया है. यह एक दर्शन है, ये दर्शन लेकर लिखना है, ये दर्शन लेकर जो काम करना है, वो
शुरु किया मैंने.
इससे सृजना magazine में भी “trigger पर उंगली रखकर आओ” बोलके एक कविता, रक्तचरण
संगीत शीर्षक कविता जो कि पूरी संस्कृत में थी, हमने 67-68 में छापना शुरु किया था.
और “थिंगा बालू कवलू” यानी rebel poets नाम के वारंगल के दस कवि, मैं वारंगल का
हूं... तो rebel poets नाम के दस कवि मिल कर जनवरी 1970 में एक संकलन लाए हैं.
बाद में 1972 फरवरी में श्रीश्री की षष्ठीपूर्ति हुई है. श्रीश्री षष्ठीपूर्ति में
वहां के छात्र लोग एक सवाल पूछा कि आप यहां जो श्रीश्री की षष्ठीपूर्ति कर रहे हैं,
श्रीश्री षष्ठीपूर्ति एक बहुत बड़े पैमाने पर की गई थी. श्री श्री तो बहुत बड़े कवि
थे, महाकवि थे वो. उसका षष्ठीपूर्ति में पच्चीस हज़ार लोग आए, यानी कि साहित्य का
सम्मेलन नहीं था वो. वहां आंध्रा में जितने भी साहित्यिक लोग हैं modern literature
से संबंध रखने वाले, वो सब लोग थे. आंध्र में जितने भी.... तब तक तो... जितने भी
अलग-अलग कम्यूनिस्ट पार्टी में काम करने वाले लोग थे, वो लोग भी आए थे.
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केवल कविता
को appreciate करने वाले भी आए थे, पच्चीस हज़ार लोग आए थे. तो उस समय एक पर्चा
आंध्रा यूनिवर्सिटी के छात्र ने निकाला कि आप किस तरफ हैं. आप यहां श्री श्री की
षष्ठीपूर्ति कर रहे हैं. श्री श्री एक progressive poet कह रहे हैं, एक marxist
poet कह रहे हैं. क्योंकि communist manifesto में marx ने जो कहा है The history
of all hitherto existing society is the history of class struggles." तो श्री
श्री ने कविता में लिखा की परस्परम संघर्ष चिना सेक्चलरो चिना चरित्रपूर्तम यानी दो
वर्ग हो के जो आपस में संघर्ष करते हैं, उन शक्ति से समाज आगे जाता है, इतिहास पैदा
होता है. जो productive forces का जो संघर्ष होता है, उस संघर्ष से इतिहास बनता है.
इसीलिए मार्क्स ने कहा है कि इतिहास को तो जनता बनाती है. जो जनता संघर्ष करती है,
अलग दूसरे वर्ग से जो संघर्ष करती है उसी से इतिहास बनता है. वो कविता बनाई है श्री
श्री ने. उसी से श्री श्री ने. ऐसे कवि की आप षष्ठीपूर्ति कर रहे हैं, जिन्हें
महाकवि कह रहे हैं, युगप्रवक्ता कह रहे हैं. जो आपके बाजू में है श्रीकाकुकलम में
उसमे आदिवासी लोग संघर्ष कर रहे हैं. उस संघर्ष में बुद्धिजीवी शामिल हैं, शिक्षक
शामिल हैं, कवि शामिल है, महिलाएं शामिल है पंचाय्यी, इंद्रबाला जैसे लोग. उसके
बारे में आप क्या सोचते हैं? आप क्या सोचते हैं? साफ साफ कह दें.
तो तब तक ही दिगंबर कवलू आए थे. हमारे rebel poets थे. Erstwhile progressive
writers में काम करने वाले लोग थे श्रीश्री, के वी रमन्ना रेड्डी, कुटुंबा राव,
रावी शास्त्री जैसे लोग यानी तीन किस्म के लोग थे. जो progressive writers
movement, जो united communist party, जो प्रेमचंद के नेतृत्व में progressive
writers movement इप्टा थे, उससे संबंध रखने वाले श्रीश्री, कुटुंब राव, रावी
शास्त्री, केवीआर, बुजुर्ग लोग थे. वो discontinue हो गए हैं कम्यूनिस्ट पार्टी से,
इप्टा से, progressive writers movement से, उसका काम खत्म हुआ 1955 से क्योंकि
1956 में पूरा parliamentary लाइन में आ गई है. और नहीं रहा, progressive writers
movement नहीं रहा. यहां भी वैसी ही स्थिति है शायद. तो ये स्थिति आ गई है. और
दूसरी तरफ दिगंबर कवलू जो protest poets हैं, जो कह रहे हैं कि ये क्या है स्थिति
समाज कुछ बदला नहीं, व्यवस्था कुछ बदली नहीं. ये जो भी है एक stand still दिख रहा
है. जैसे पानी ठहर जाता है ना, प्रवाह नहीं होता है, ये बहुत बुरा है. आदमी बहुत
naked नहीं दिख रहा है. हरेक के उपर कोई मुखौटा है. इसको निकाल दो, ये दिगंबर कवलू
था. हम rebel poets साफ साफ सशस्त्र संघर्ष चला रहे थे.
ये तीनों लोग वहां ऐलान किए कि हम श्रीकाकुलम के पक्ष में हैं. हम सशस्त्र संघर्ष
के पक्ष में हैं. हम जहां भी देश में आदिवासी संघर्ष हो रहा है उसके पक्ष में हैं.
हम देश में जो वर्गयुद्ध हो रहा है उसके पक्ष में हैं. ये ऐलान किए हैं. अब तब से
लेकर 1970 जुलाई तक, 17 फरवरी में हुआ, छह महीने तक कोशिश कर के 1970 में
revolutionary writers association बना लिए. तो बाद में तो rest is history. बाद
में तो क्रांतिकारी लेखक संघ का एक बड़ा रोल था क्योंकि 1970 जुलाई में हम बने हैं.
जुलाई 4th में बने हैं, तो जुलाई 4 को बने हैं तो “MARCH” बोलके एक कविता संकलन लाए
हैं. उसका title ही था March. प्रजानुसाइनस चेस्तुना रेवाल्यूशनरी कवि. आज जो जनता
को अपनी भावना से सशस्त्र बना रहा है, वही कवि है. कवि की कविता जनता को यानी जो
उत्पादन में भाग ले रहा है, वो जनता को सशस्त्र बनाना है. सशस्त्र बनाने का मतलब ये
नहीं कि उसको बंदूक देना है, उसकी भावना में ये बंदूक की भावना लाना है. यानी उसको
ज़ोर देना है, ये कहते हुए march निकाला है. उसको बाद में सरकार ने बैन कर दिया.
उसी दिन जुलाई 4 को लाए हैं. जुलाई 4 का तो अभी मैंने बताया है. जुलाई 4 को बहुत
कुछ है, जुलाई 4 अल्लूर सीता रामराज का जन्मदिन है, Telangana armed struggle की
शुरुआत है, जुलाई 4 अमरीकी सिविल वार का स्वतंत्रता दिवस है. ऐसा हो गया है जुलाई 4
तो उसी दिन क्रांतिकारी लेखक संघ भी बना है. तो अक्टूबर में कॉंफरेंस किए हैं.
सुब्बाराव पाणिग्राही ने खम्म्म में अक्टूबर में कांफरेंस की है. उस दिन हम जंझा
बोलके कविता संकलन लाया है जो श्रीश्री के नेतृत्व में, केवी रमन्ना रेड्डी के
नेतृत्व में लाए हैं. इन दोनों किताबों को प्रतिबंधित किए हैं.
अब तब से प्रतिबंधित करना, गिरफ्तार करना, केस लगाना शुरु हुआ है. 1971 में दिगंबर
गौर को गिरफ्तार किए हैं. 1973 में मुझे, चंरबंथा राजू और एम.टी. खान को गिरफ्तार
किए हैं पहली बार . 1974 में Secundarabad conspiracy case लगाए हैं पहली बार
लेखकों के उपर. अब 1973 से लेकर अब तक, अब देखिए कितना 36 साल cases लगाना, जेल में
भेजना, बैन करना ये तो आदत बन गई है.
Secundarabad Conspiracy Case, Ramnagri Conspiracy case कुल मिलाकर आठ साल मैं जेल
में रहा. और खासकर 1986 से लेकर 1989 तक साढ़े तीन साल टाडा के अंतर्गत isolation
में रखे हैं मुझे. मैं लिखता रहा, वो ही है जेल लेटर्स. जब 1986 से 89 में मैं रहा
टाडा के अंतर्गत, तो उस समय इंडियन एक्सप्रेस का संपादक हैदराबाद आया. 1986 में
उससे मुलाकात हुई थी, तो उसने पूछा कि आप जेल में दो साल से है. आप जेल में रहकर
हमारे लिए कुछ लिख सकते हैं. तो मैंने कहा कि बहुत restrictions होते हैं जेल में.
जो भी हो इन्हीं restriction में क्या लिख सकते हैं. जेल एक छोटी सी दुनिया है, और
इस छोटी सी दुनिया की कोई छोटी सी बात होती है तो वो लिखें. आप य़हीं फिरते हैं इस
पर लिखिए कुछ. तो मैंने उस छोटी सी दुनिया में छोटी सी क्या बात होती है. यानी कि
चिड़िया से क्या बात होती है या पत्ते से क्या बात होती है, इस आकाश से क्या बात
होती है, नक्षत्र से क्या बात होती है. जो हफ्ते में एक बार मिलने के लिए आने वाले
मेरे परिवार से क्या बात होती है. बाहर के मेरे दोस्तों से क्या बात होती. ये ले के
मैंने 13 पत्र लिखे.
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जब मैंने एक फ्रेम बनाया है तो ये 13 के बारे में मैंने सोचा
कि Jesus Christ के 13 दोस्त थे. उन्हीं 13 दोस्तों के कारण बाद में Jesus को पकड़ा
गया है और सूली पर चढ़ा दिया गया. तो यानी दोस्त ना रहे. उसके विपरीत में मेरे ये
13 दोस्त हैं, जो दोस्त रहे. Jesus के जो 13 दोस्त थे, वो 13 दोस्त न रहे. लेकिन
मेरे जो 13 दोस्त हैं वो मेरे साथ साढ़े तीन साल रहे हैं.
वैसे दोस्तों में मैंने पक्षी को लिया है और वृक्ष औऱ खत आते हैं जेल में उनको लिया
है, जो मुलाकातें होती हैं उनको लिया है. और कुछ लोग मेरे खास जो दोस्त हैं, मेरे
परिवार के, मेरी बीवी, मेरी तीन बेटियां. जिन्होंने मेरे लिये बहुत suffer किया है.
क्योंकि मेरी पत्नी को मैं जब, मैं खाली लेक्चरर था. तो मैं पढ़ा रहा था इसीलिए
publisher नहीं रह सकता मैं. पहली बार जब गिरफ्तार हुआ तब तक तो publisher था मैं.
1966 से लेकर 1972 तक Publisher रहा. 1973 में जब Arrest हुआ तो मैंने publication
transfer कर दी अपनी पत्नी को. यानी 26 साल में 23 साल मेरी magazine की
publisherवो थी. इस कारण से सृजना के उपर जितने cases हुए थे, छह cases हुए थे. वो
सारे cases उनके उपर गए. वो जेल गईं हैं. उनको दो साल सज़ा भी हुई है. घर के उपर
हमला हुआ है पुलिस वालों का. फोड़ डाले हैं. ये सब मेरी पत्नी ने मेरी तीन बेटियों
के साथ सहा है. तीन बेटियां है मुझे. तब तो बच्ची थीं. कोई भी उनका सहारा नहीं था.
क्योंकि टाडा तो बहुत भयंकर था.
हमारे आंध्रप्रदेश में टाडा के अंतर्गत 13000 लोगों को गिरफ्तार किए था.
बुद्धिजीवी, छात्र, किसान सबको गिरफ्तार किया था. एनटीआर के समय में 1985 से 89 में
ये कहा जाता था कि आटा-माटा-पाटा बंद यानी कोई cultural performance नहीं हो सकता
है. आटा कहते हैं खेल, cultural खेल नहीं हो सकता है. पाटा, गाना नहीं हो सकता है.
माटा, भाषण नहीं हो सकता है. ये टाडा इसके लिए इस्तेमाल किय है. न कोई cultural
performance होगा, न कोई गाना होगा, न कोई भाषण होगा. ये स्थिति 1985 से लेकर आज तक
भी तेलंगाना में है. अब समझिए तेलंगाना की क्या स्थिति है.
झूठे मुठभेड़ में हज़ारों लोगों को मार डाला है. हज़ारों लोगों को 1970 से लेकर अब
तक. अब तो एक नई स्थिति आ गई है कि जो आत्मसमर्पण किए हुए नक्सली हैं, उनकी एक सेना
बना कर, जैसा कि यहां सलवा जुड़ूम बनाया है, एक सेना बनाकर उससे मरवाया. Civil
liberties activists को छह लोगों को मारे हैं. डॉ. रामानाथम मेरा अच्छा दोस्त था,
उसको मार डाले क्योंकि मैं नहीं मिला.
मेरा जिंदगी के लिए भी threat 1981 से शुरु हुआ है. और एक समय में एक-एक. एक समय था
मुझे मारने के लिए ये संघ परिवार वाले कोशिश किए थे, आरएसएस जैसे लोग क्योंकि उनके
विरोध में बात करते थे. एक समय था सीपीएम वाले कर रहे थे. क्योंकि सीपीएम जैसा
बंगाल में कर रहे हैं, सीपीएम का विरोध कर रहे थे नक्सलवादी लोग, तो उनकी कोशिश थी.
एक समय था इसमें से गए कुछ लोग. बाद में 1985 से लेकर राज्य का चल रहा है. पुलिस,
डॉ. रामानाथन को तो मफ्टी में आकर पुलिस वाले मारे हैं. Civil liberties वालों को
छह लोगों को मारे हैं. उनकी कोशिश 1985 से लेकर 2003 तक मुझे मारने की थी.
इसीलिए तो मैं वारंगल से हैदराबाद शिफ्ट हुआ ना फिर. वैसे तो कोर्ट भी condition
रखता थी, कि release होने के बाद में वारंगल नहीं जाना. हैदराबाद में ही
conditioned bail पर रहना. दो बार वैसा ही किया है, 1974 में ऐसा किया है, 1975 में
ऐसा किया है. बीच में Emergency आई है, ये पूरी emergeny मैं जेल में रहा. फिर जब
1989 में मैं जेल से छूटा तो हैदराबाद में रहा. तब मैंने तय किया कि हैदराबाद में
रहूंगा. तो ये स्थिति थी. तो मैं दस कविता संकलन लाया हूं तेलुगु में, पीएचडी थीसिस
लाया हूं.
ये थीसिस का सब्जेक्ट है 'तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष और उपन्यास'. छह उपन्यासों को
लेकर. इन छह उपन्यासों में तेलंगाना की Life, Culture 1930 से लेकर 1962 तक कैसे
develop हुई है. ये इपन्यास में ही उसका ऐसा चित्रण है. इतिहास में नहीं जाते हैं,
ये उपन्यास से ही rebel निकाला हूं मैं. यानी छह उपन्यासों को लेकर, वो जो 1962 के
पहले लिखे गए हैं.. 1962 के पहले इसीलिए कि 1964 के पहले. क्योंकि 1964 में
कम्यूनिस्ट पार्टी split हो गई थी. Split होने के बाद जो उपन्यास आया जो इतिहास आया
वो biased होता है. क्योंकि आप अब जिस पार्टी में रहते हैं उस bias से लिखते हैं.
समझेय सुंदरय्या सीपीआई में चला गया है तो वो सीपीआई लाइन से लिखता है. और कोई
सीपीआई में रहा तो सीपीआई लाइन से लिखता है. वी वी राव, जेसी एमएल में गया एमएल के
इससे लिखता है. वैसे ही लेखक भी. 1964 तक तो कम्यूनिस्ट पार्टी united थी. तो bias
रहने की बात नहीं थी. तो वो उपन्यास लेकर मैं तेलंगाना के इतिहास को rebuild करने
का सोचा. हाल ही में ही मैंने एक लंबा folk song लिखा है, people’s song.
हमारे पास एक folk form है भतखम्मा नाम का. दशहरा होता है ना, दशहरा के पहले 18 दिन
केवल तेलंगाना में एक त्यौहार होता है. फूलों से खेलने का एक त्यौहार. उसमें नौ दिन
घर में खेलते हैं. और नौ दिन जहां पानी होता है वहां जाकर खेलते हैं. उसको कहते हैं
भतखम्मा. भतखम्मा यानी जियो और जीने दो. Live and let live. तुम जियो और दूसरों को
जीने दो इसका मतलब होता है. और गौरी का एक रूपांतर करते हैं. पूरा फूलों से सज़ाने
का. बहुत famous है.
उस पर बहुत से गाने हैं, भतखम्मा के. वो गानों की धुन लेकर मैं तेलंगाना का तीन
हज़ार साल का इतिहास लिखा हूं. वो कैसेट भी आए हैं, सीडी निकली हैं. तेलंगाना के
उपर सात गाने अलग से जैसे folk जैसे रेला रेला रेला. रेला रेला रेला तेलंगाना
कांवाला. ऐसा. और जितने भी folk tunes हैं. सात तेलंगाना के बारे में. Separate
तेलंगाना का समर्थन करते हुए गाना लिखा है. और तेलंगाना इतिहास को लेकर एक लंबा 55
मिनट का folk song लिखा है. दोनों ही की सीडी आई है.
क्रमशः
26.10.2009,
01.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | subhash chandra kushwaha (sckushwaha@rediffmail.com) Lucknow | | | | कवि वरवर राव का साक्षात्कार पढ़ा । कई महत्वपूर्ण जानकारियां,खासकर तेलंगाना संघर्ष और उसकी दशा,दिशा तथा तत्कालीन वामपंथी नेतृत्व के भटकाव की जानकारी मिली । व्यवस्था किस तरह आंदोंलनों के पक्ष में मुखौटा लगा कर खड़ी होंने का भ्रम पैदा करती है और नेतृत्व , परिस्थितियों का मूल्यांकन किए बिना भटक जाता है । खैर वरवर राव को सलाम ! सुभाष चन्द्र कुशवाहा
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| | अनिल जनविजय (aniljanvijay@gmail.com) मास्को, रूस | | | | बेहद महत्त्वपूर्ण इन्टरव्यू है यह। इस इन्टरव्यू में सबसे ज़रूरी जो बात कही गई है, वह यह कि-- "आज जो जनता को अपनी भावना से सशस्त्र बना रहा है, वही कवि है. कवि की कविता का काम जनता को यानी जो उत्पादन में भाग ले रहा है, उस जनता को सशस्त्र बनाना है। सशस्त्र बनाने का मतलब ये नहीं है कि उसको बंदूक देनी है,बल्कि उसकी भावना में बंदूक की भावना लाना है।" | | | | | |
| | Nandani Singh न्यू पाटलीपुत्रा कॉलोनी, बोरिंग कैनाल रोड, पटना | | | | इस इंटरव्यू से तेलंगाना आंदोलन के साथ-साथ नक्सल आंदोलन का भी एक व्यापक परिदृश्य बनता है. महत्वपूर्ण साक्षात्कार. | | | | | |
| | Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) Noida | | | | आपने साक्षात्कार को जस का तस छापने की जो परंपरा चलाई है, वह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है. सबसे अच्छी बात तो यही है कि पूरे संवाद में लगातार ये भान होता रहता है कि सामने वाले से आमने-सामने बात हो रही है. किसी साक्षात्कार को इससे पहले इतना जीवंत कभी नहीं पाया. आपके प्रयोग को बधाई. वरवर राव से बातचीत के दूसरे अंश को पढ़ने की भी उत्सुकता बनी हुई है. | | | | | |
| | Nirmal Singh gill Jalandhar, India | | | | वरवर राव जी, आपकी एक कविता है- लक़ीर खींच कर जब खड़े हों/मिट्टी से बचना सम्भव नहीं।/ नक्सलबाड़ी का तीर खींच कर जब खड़े हों/ मर्यादा में रहकर बोलना सम्भव नहीं/ आक्रोश भरे गीतों की धुन/वेदना के स्वर में सम्भव नहीं। /ख़ून से रंगे हाथों की बातें/ ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़ कर छाती पीटकर/ कही जाती हैं।/ अजीब कविताओं के साथ में छपी/ अपनी तस्वीर के अलावा/ कविता का अर्थ कुछ नहीं होता।/ जैसे आसमान में चील/ जंगल में भालू/ या रखवाला कुत्ता/ आसानी से पहचाने जाते हैं/ जिसे पहचानना है/ वैसे ही छिपाए कह दो वह बात/ जिससे धड़के सब का दिल/ सुगंधों से भी जब ख़ून टपक रहा हो/ छिपाया नहीं जा सकता उसे शब्दों की ओट में।/ जख़्मों को धोने वाले हाथों पर/ भीग-भीग कर छाले पड़ गए/ और तीर से निशाना साधने वाले हाथ/ कमान तानने वाले हाथ/ जुलूस के लहराते हुए झंडे बन गए।/ जीवन का बुत बनाना/ काम नहीं है शिल्पकार का/ उसका काम है पत्थर को जीवन देना/ मत हिचको, ओ, शब्दों के जादूगर !/ जो जैसा है, वैसा कह दो/ ताकि वह दिल को छू ले।
अब जरा इस कविता को पढ़ें और वास्तविक जीवन में जो कुछ घट रहा है, उस पर विचारें. वरवर राव जी, जहां माओवादी आंदोलन नृशंसतापूर्वक जीवन ले रहा हो, वहां शिल्पकार से जीवन देने की अपेक्षा कहां तक जायज है ? या तो आप कविता में सच कह रहे हैं या संवाद में. लेकिन इतना तय है कि कहीं न कहीं आप झुठ कह रहे हैं. | | | | | |
| | Sanajy Kumar singh Jagdalpur, Bastar, Chhattisgarh | | | | वरवर राव जी, आपकी बातें अच्छी हैं लेकिन लगता है कि हैदराबाद में रहते हुए आपको बस्तर की खबर नहीं मिलती. बस्तर के जंगलों में जो लाल झंडा गाड़ कर आप गये थे, उसे आपके साथियों ने भोले-भाले आदिवासियों के खून से सींचना शुरु कर दिया है.
अब आपके साथियों का काम केवल लेवी वसूलना और गरीब आदिवासियों को मारना रह गया है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ हाथ मिला कर आपके माओवादी आदिवासियों को मार रहे हैं. बस्तर में टाटा और एस्सार के साथ दोस्ती और बंगाल में विरोध ? यह कैसा माओवाद है वरवर राव जी ? | | | | | |
| | GOPAL PRASAD (gopal.eshakti@gmail.com) DELHI | | | | अंदर की सच्चाई बयान करता हुआ आलेख. सरकार को इनके उठाए मुद्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. | | | | | |
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