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माओवादी कवि वरवरा राव से बातचीत

संवाद

कड़वा है सरकार से बातचीत का अनुभव

माओवादी कवि वरवर राव से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

क्रांतिकारी कवि वरवर राव अपने अनुभव से मानते हैं कि सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत मुश्किल है. आंध्र प्रदेश की सरकार और माओवादियों से बातचीत में मध्यस्थ रहे वरवर राव की राय में सरकार देश में अमरीकी साम्राज्यवाद लाना चाहती है, इसलिए वो माओवादियों को मार रही है. वरवर राव साफ मानते हैं कि माओवादियों की जितनी दुश्मनी अमरीका से है, उतनी ही चीन से भी. नेपाल के माओवादियों से भी वे केवल सैद्धांतिक दोस्ती की बात स्वीकारते हैं.

वरवर राव

उनसे की गयी बातचीत का दूसरा और अंतिम भाग यहां अविकल रुप से पेश है.

क्रांतिकारी कवि वरवर राव जो भतखम्मा की बात करते हैं जिसका आशय है “जियो और जीने दो” जो कि आप कह रहे थे. तो क्या हम ये मान के चलें कि कहीं न कहीं तेलंगाना movement से अपने वाद की शुरुआत करने वाले वरवरा राव, गांधी के आसपास पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं ?

नहीं, नहीं, नहीं. मार्क्सवाद ही है जीना और जियो और जीने दो. क्योंकि जो जीने का हकदार है, जो उत्पादन में भाग लेने वाले अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी जीवन देता है. वो जीना है. उनको जीने नहीं दे रहा है ये सामंतवादी, ये शोषणवादी जो समाज है. जो पूंजीवादी समाज है उनको जीने नहीं दे रहा है.

एक तरफ वो काम करने वाले नहीं है, उत्पादन में भाग लेने वाले नहीं है, वो परजीवी हैं. इनके सीमा के उपर, इनके स्वेद के उपर वो जी रहा है. जो अपने स्वेद से उत्पादन में भाग ले रहा है, उनको जीने नहीं दे रहा है. हमारा कहना है कि उनके जीने दो, उनसे ही तुम्हें अनाज मिल रहा है, खाना मिल रहा है, और तुम भी जी सकते है. मगर तुम शोषण से उनको जीने नहीं दे रहे हो. ये गांधी की बात नहीं, जीने की बात है.

Marxism तो एक ultimate philosophy है जिसमें classless society होती है. उस classless society में जेल नहीं होती है, हिंसा नहीं होती है, state नहीं होता है, पुलिस नहीं होती है. Paris commune रहा है ऐसा. 70 दिन के लिए Paris Commune में ना पुलिस रहा, न जेल रहा, ना court रहा, ना ही state रहा. यूजेन पोत्येर बोल के एक कामगर था, उसने एक international कविता लिखा है - सुबह जो नाला साफ करता है, वो 10 बजे आकर ऑफिस में बैठता है, court में जाकर judge बनता है. शाम में आकर कविता लिखता है.

यानी एक सम्पूर्ण मानव बन गया है 70 दिन के लिए Paris commune में.

जिस यूजेन पोतिये की बात आप कर रहे हैं, उनकी ही एक कविता का हिंदी अनुवाद है – उठ जाग ओ भूखे बंदी, अब खींचो लाल तलवार, कब तक सहोगे भाई, जालिम का अत्याचार. मतलब क्रांति यहां भी तलवार से ही हो रही है, हिंसा से ही हो रही है. ऐसे में गांधी आपको कहां प्रभावित करते हैं?

मैं बहुत सी जगह बोल रहा हूं. एक बात में हम कुछ हद तक गांधी को इसीलिए मानते हैं कि anti-imperialist. और दूसरी बात है कि जो विकास के बारे में जो गांधी और नेहरू की जो विचारधारा है. बड़े-बड़े प्रोजेक्ट को समर्थन देने वाला नेहरू और छोटे-छोटे घर की उत्पादन की चीजें यानी handicrafts, गांव में लगाने वाली जो छोटे छोटे industries, Cottage industries, small scale industries, खादी. ये गांधी जो कहता था, हम उसको समर्थन करते हैं.

इसीलिए कि ये बड़ी पूंजी लगाने के, बड़े उत्पादन के, बड़ा उत्पादन भी नहीं है वहां; ये जो भारी विकास जो आ रहा है, खासकर तो आज छत्तीसगढ़ की समस्या को यही समझते हैं. तो रमन सिंह जब पहली बार Chief Minister बना है, तो तीन MOU’s sign किया है, Memorandum of Understanding. एस्सार से, टाटा से और पोस्को से. यानी बस्तर में स्टील प्लांट लाने के लिए. उससे पहले ही जो बैलाडीला में बना है, जापान के लिए जो iron ore लेने के लिए. हमारे विशाखापटनम से एक जो किरंदुल रेलवे लाइन है, जो बैलाडिला की रेलवे लाइन है, वो वहीं से तो जाती है. किसके लिए हो रहा है ये ? ये iron ore जापान को भेजने के लिए.

एमओयू बनाम संघर्ष
छत्तीसगढ़ के जितने भी साधन हैं. यहां के जितने भी minerals हैं... ये छत्तीसगढ़ बहुत rich है. बस्तर तो बहुत rich है देश में ही. 80% जो minerals जो अलग-अलग किस्म के होते हैं. 28 kinds of minerals are there in Bastar, particularly in south Bastar. ये सब को आप बड़े-बड़े industralists को, multinational corporations को भेजने के लिए आप Memorandum of Understanding में आ गए हैं.


ये एक बात ऐसी ही नहीं कि जो एक जमाना था जो Public Sector में होते थे. हज़ारों लोगों को उपाधि (काम) मिलती थी, जैसे भिलाई स्टील प्लांट में या विशाखापनम के स्टील प्लांट में मिला है. वैसा भी नहीं क्योंकि बहुत आधुनिक तकनीक आ रही है तो कम employees हों और ज्यादा उत्पादन हो. वैसा देखा जाए तो ये recession में तो स्टील प्लांट खत्म ही होते जा रहा हैं. इसी समय जो MOU’s जो sign किया है, वहां से संघर्ष शुरु हुआ है.

मैं इसीलिए बार-बार ये कह रहा हूं. आप लोग इसके सारांश (मुद्दा) को छोड़कर रूप के बारे में चर्चा कर रहे हैं. रूप के बारे में आप बात कर रहे हैं. सारांश में ये संघर्ष जो है productive relations में जो हिंसा हो रहा है, ये हिंसा के बारे में बोल रहा हैं. कितने लोग निर्वासित हो रहा हैं, कितने लोग displaced हो रहा हैं, इसके rehabilitation की बात हो रही है. वो क्या बन रहे हैं? आप देख रहे हैं रिक्शा चालक बन रहा हैं, महिला है तो वेश्या बन रहा हैं, Marginalize हो जा रहा है, कितने लोग मर जा रहा हैं. लाखों लोग unemployed हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

neha indore

 
 I can't understand the dual mentality of those people who are instantly argued against the Marxism and Maoist. These people are generally unaware from the basics of Marxism, they only see the surface affairs which are actually the result of their anger which is due to wrong policies against them.

People clap on the dialogues recited by the hero against the zamindar(high living people)in Hindi movie but these people cant see that what is happening in movie is same with those people, then why will not victims move on to the way same as Hindi movie hero does. why we consider their way of taking revenge as terrorism?

First of all we have to develop a heart to understand the feeling of others.and i m sure that government by Marxism will never follow blindly to others. At least they know what are the fundamental needs of common people, they know that only food can fulfill the need of hunger not the nuclear reactor .
 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद बस्तर

 
 नक्सलवाद दो धडों पर अपने जमीन तैयार कर रहा है- पहला जहाँ हथियार बंद लोग गोलबंद हो रहे हैं और दूसरा जहाँ बुद्धिजीविता रेहन है। इन लोगों के पास तर्क की तो कोई कमी है ही नहीं. कम पड़ जाये तो कलकता से कभी कोई देवी जी उधार में देती हैं तो कभी अंग्रेजी की लेखिका "इश्यु" को ग्लैमराईज कर जाती हैं।

सरकारें क्या चाहती हैं क्या उससे पहले ये नहीं कि ये माओवादी कैसी सरकार देंगे? क्या प्रचंड जैसी सरकार? या चीन जैसी सरकार? या रूस जैसी जिसके अब टुकडे गिनने मुश्किल हैं? आज ये अभिव्यक्तियों का ढ़िंढोरा पीट रहे हैं, कल तो ये चीन हो जायेंगे और अभिव्यक्ति का यही लाल सलाम कर देंगे। तिब्बत का दर्द देखिये, गहराईयों में इनके मनसूबे समझने में सहायता मिलती हैं।

आतंकवाद वह भी विचारधारा के नाम पर...क्षम्य नहीं है।
 
   
 

purushottam kumar singh (purushottamlkr@gmail.com) patna

 
 इस आलेख के पहले मैंने कानू सान्यान का साक्षात्कार पढ़ा था. मैं दावे के साथ कह सकता हूं की नक्सलवाद के बारे में जानने का जिज्ञासा रखने वालों के लिए इस से अच्छी information नहीं मिल सकती.

पुतुल जी को मेरी तरफ से शुभकामनाएं. आगे भी इस तरह के साक्षात्कार का इंतजार रहेगा. धन्यवाद.
 
   

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