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छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन से बातचीत

संवाद

हिंसा बुनियादी तौर पर ग़लत है

छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

देश में सर्वाधिक चर्चित पुलिस अधिकारियों में शुमार किये जाने वाले छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन मानते हैं कि बस्तर या देश के दूसरे हिस्सों में माओवादी बनाम राज्य का संघर्ष तभी खत्म हो सकता है, जब हिंसा को एकमात्र रास्ता मानने वाले लोगों की बुनियादी समझ में बदलाव आय़े. उनका मानना है कि माओवादियों से सैद्धांतिक रुप से लड़ना होगा और उनकी हिंसा से भी. लेकिन विश्वरंजन यह भी स्वीकारते हैं कि जब तक आर्थिक विषमता को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे चरमपंथी आंदोलन समाज में अपनी जगह बनाते रहेंगे. यहां पेश है, उनसे की गयी बातचीत.

विश्वरंजन

 

एक कविता है- हिचकॉक और ज़िंदगी. एक समय था/ जब मुझे हिचकॉक द्वारा बनाया गया सिनेमा देखना/ अच्छा लगता था/ सिनेमा क्या ख़ून ही ख़ून/ चीख ही चीख/ एक बंदूक यहां / एक चाकू वहां / सिर पर लाठी का एक प्रहार/ और आसमान का लाल ही होते जाना सहसा/ कितना वीभत्स और/ कितना मज़ेदार/ आज नहीं देखता हूं मैं हिचकॉक की फ़िल्म/ आज हम सब ख़ुद हिचकॉक के पात्र बनते जा रहे हैं/ वीभत्स और मज़ेदार.

अपनी इस कविता को आप किस तरह analyze करेंगे.

देखिए, कविता को तो हम कभी analyze नहीं करते हैं, लेकिन आप इसको इस तरह से देखिए कि जो संवेदनशीलता है हिंसा के प्रति हमारी इतनी भोथरी होती जा रही है समाज की, कि बहुत सारी चीज़ें हमें उद्वेलित ही नहीं करती है. हम खुद हिंसा में कहीं ना कहीं डूबते नज़र आ रहे हैं. और जो हमारी संवेदना है जीवन के प्रति या ज़िंदगी के प्रति, वो भोथरी हो रही है. हम जब एक कटा हुआ सिर देखते हैं, बस्तर के जंगलों में, कीड़े लगते हुए. वो मेर सिपाही का भी हो सकता है, किसी और का भी हो सकता है लेकिन पुलिस को जाना ही पड़ता है body लाने के लिए. हो सकता है 48 घंटे के बाद हम पहुँच रहे हैं और उस समय हम उसको अपने अंदर उतार भी नहीं पाते हैं. हम सब कहीं न कहीं हिंसा से इतने जुड़े हैं कि खुद हिचकॉक की फ़िल्म के पात्र बनते जा रहे हैं. जबकि हिचकॉक के पात्र आपको उद्वेलित करने के लिए, उस तरह के पात्र बनाए गये थे.

हिचकॉक की फ़िल्म आपको कितनी भी मज़ेदार लगे, आपको एक स्तर पर इतनी उद्वेलित करती थी कि आप हिंसा के खिलाफ खड़े होते थे. आज हिंसा इस कदर फैल रही है समाज में, कि जो shock , जो झटका हमें मिलना चाहिए था, आज समाज में वो नहीं मिल रहा है. आज समाज में वो चीज़ नहीं आ रही है, समाज उसको एक सामान्य-सी हक़ीकत मानके बढ़ा चला जा रहा है. ये सोच था, ये महसूसता था, जब ये कविता लिखी गई थी.

अब उसको analyze हम नहीं करते हैं. कविता को क्या analyze करना है. कविता अगर संप्रेषित होगी तो संप्रेषित होगी, नहीं होगी तो कचरे में डालने के लायक है. कचरापट्टी में. जैसे हम कभी मानते ही नहीं है कि किसी आदमी को यह हक है कि जब वह लिख रहा हैं कि वो सोचे कि वो महान कवि है, या हम महान कवि हैं. वो समय निर्णय लेता है. 300 साल बाद आपकी कविता पढ़ी जा रही है तो आप बड़े कवि, नहीं तो आप दो कौड़ी के नहीं. किसी के बोलने से कोई बड़े कवि, छोटे कवि नहीं होता है. 300 साल के बाद वो समय निर्णय कर देगा, कि आप बड़े कवि हैं या कवि हैं, कि कचरा पट्टी में जाने योग्य हैं. आज के कोई आलोचक को ये मैं अधिकार नहीं देता हूं कि वो ये निर्णय ले.

राज्य की हिंसा का जो माहौल है, उसके बरक्स इस कविता को कैसें देखेंगे ?

राज्य में जो हिंसा का माहौल है. देखिए ऐसा है कि हिंसा, जब हिंसा जो है, बुनियादी तौर पर एक आदमी की, एक मनुष्य का, किसी भी स्तर पर मुश्तक होने की कहानी है. और ये कहानी राज्य में ही क्यों, ये करीब-करीब विश्व स्तर पर फैलती जा रही है. बहुत दिनों से, बहुत दिनों से ऐसा होता आ रहा है. इधर करीब मैं समझता हूं कि सबसे बड़ा झटका जो समाज को आधुनिक युग में मिला, वो विश्वयुद्घों में जो हिंसा हुई. जिसने बहुत हद तक आदमी को अंदर से तोड़ा और उसकी संवेदनशीलता, हिंसा के प्रति जो होनी चाहिए थी वो, उसके बाद लड़ाइयां भी हो रही हैं दुनिया में और लोग मारे जा रहे हैं.

ये दो व्यक्ति के बीच में लड़ाई हो जाए और किसी ने चाकू चला दिया, वो नहीं है. एक सामूहिक स्तर पर अगर हिंसा हो रही है और हम उसको react नहीं कर रहे हैं या रोकने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, तो हिंसा फैलेगी. और आदमी और भोथरा होगा, उसकी संवेदनशीलता और भोथरी होगी. और इस संवेदनशीलता को, मेरा मानना है कि fractional, fractional मतलब छोट-छोटे बंटवारे, ग्रुप में बैठ कर के, यहां चिल्ला के, वहां पर हल्ला मचा के, इसको रोका नहीं जा सकता है. इसके लिए एक बहुत ही व्यापक, बहुत ही व्यापक जिससे पूरे समाज का संबंध सम्मिलित हो, वहां पर, जिसको कहा जाता है सामाजिक पुनर्जागरण, इसके खिलाफ, इस तरह की मुहिम बनानी पड़ेगी. नहीं तो जहां हिंसा होगी, वहां प्रतिहिंसा भी होगी, इसको कोई रोक नहीं सकता है.

आपको बहुत सारे बुनियादी सवालों को उठाना पड़ेगा. हम कैसा समाज चाहते हैं? हम हिंसा को कितनी मान्यता दे सकते हैं? या कितनी मान्यता नहीं दे सकते हैं? ये हमारे एक आदमी या दो आदमी के सोचने की बात नहीं है. ये धीरे-धीरे समाज की हर इकाई को महसूस करना पड़ेगा. नहीं तो समाज धीरे-धीरे विकृत होता चला जाएगा. कोई उसको रोक नहीं सकता है. हिंसा पर, जैसे गांधीजी ने बोला था कि हिंसा किसी कीमत पर नहीं. हिसा किसी कीमत पर नहीं, ये निश्चय एक आदमी नहीं ले सकता है. ये समाज को लेना पड़ेगा.

आज तक किसी स्तर पर आप अगर ये मानते हैं कि हिंसा लाज़मी है तो प्रतिहिंसा को आप रोक नहीं सकते हैं. और जब तक हिंसा-प्रतिहिंसा की लड़ाई चलती रहेगी, तब तक आदमी और आदमी की संवेदशीलता और भोथरी होगी, वो और हिचकॉक का पात्र बनता जाएगा.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shakeel (shakeellohani@yahoo.com) mahasamund

 
  2005 में जो सलवा जुड़ूम शुरु हुआ था, उसके कारण आदिवासी मारे जा रहे हैं, इससे किसी को इंकार नहीं होना चाहिए. दूसरा ये कि आप जब कहते हैं कि एसपीओ के कारण नक्सली घबराये हुए हैं, तो इसका दूसरा सच ये भी है कि नक्सली जिस तरह संघम सदस्यों को आगे रखते हैं, उसी तरह आप भी एसपीओ के नाम उन्हीं आदिवासियों को आगे कर रहे हैं और नक्सली मुठभेड़ में वही मारे जा रहे हैं. मतलब ये कि आपके निशाने पर भी भोलेभाले आदिवासी हैं और नक्सलियों के निशाने पर भी. आप केवल 'जन मारा जा रहा है मेरा आग्रह है कि आप अपराधियों से लड़ने का हौसला पैदा करें. आपके अधिकारी भ्रष्टाचार के कारण इस्तीफे दे रहे हैं, उनमें लड़ाई का जज्बा पैदा करें. आप कविता-कहानी भी करें लेकिन राज्य में पुलिसिंग भी हो, यह भी सुनिश्चित करना आपका काम है. 
   
 

mihir (mgmihirgoswami@gmail.com) bilaspur c. g

 
 दिलीप जी यदि है तो क्या हुआ, क्या होगा, क्या होना चाहिए ? 
   
 

dilip

 
 अनिरुद्द, तुम ठेकेदार हो क्या बस्तर के ? 
   
 

अनिरुद्ध (ashrivastava175@gmail.com) जगदलपुर

 
 जयपुर की अनुराधा जी, गुलाबी नगर से निकल कर दण्डकारण्य भी आईये तब आपको पता चलेगा कि आखिर में सच क्या है और कौन किसको फंडिंग कर रहा है। दिल्ली के अखबारों में छपे रिपोर्ट में हमारे बस्तर का आंकलन करने का यत्न न करें। सलवा जुडुम और नक्सलवाद "गुज्जर और मीणा" की तरह की लडाई नहीं है।

चीन, पाकिस्तान यहां तक कि अलकायदा और लिट्टे नक्सलियों को इन सभी से फंड मिलने की खबरें सार्वजनिक होती रही हैं। सलवा जुडुम में सर्वाधिक सक्रिय अगर कोई आदिवासी नेता हैं तो वह है महेन्द्र कर्मा जिनका संबंध कांग्रेस से है जब कि प्रदेश में भाजपा की सरकार है। सलवाजुडुम सही मायनों में क्रांति है और आंदोलन है आदिवासियों का नक्सलियों के खिलाफ।

एस्सार और टाटा के द्वारा नक्सलवादियों को फंडिंग करने की खबरे तो पढीं थी लेकिन उलटी गंगा..? और एक बात कि नक्सलवाद हौव्वा नहीं है, आज बडा सच है। उसे आरामकुर्सी पर बैठ कर न रायपुर से बहसियाया जा सकता है न दिल्ली और जयपुर से। जमीनी स्तर पर क्षेत्रीय नेता (आदिवासी) और प्रशासन ही इसका समाधान कर सकते हैं।
 
   
 

Sunil Tiwari Raipur, Chhattisgarh

 
 पुलिस महानिदेशक महोदय को लगता है कि छत्तीसगढ़ में वो अकेले महान काम कर रहे हैं. आपके थानों में जाने कितने नेताओं के खिलाफ वारंट लंबित पड़े होंगे. केवल नक्सलवाद का हौव्वा खड़ा करके आप दूसरे अपराधों पर परदा डालने का काम कर रहे हैं. भ्रष्टाचार के मामलों की रिपोर्ट नहीं हो रही है, रिपोर्ट हो रही है तो कार्रवाई नहीं हो रही है, कार्रवाई हो रही है तो वह इतनी दिखावटी हो रही है कि अधिकांश मामलों में लोग जमानत पा कर घूम रहे हैं या अदालतें उन्हें बजाप्ता बाईज्जत बरी कर रही हैं. रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, दुर्ग-भिलाई अपराध के गढ़ बन गये हैं और आपकी पुलिस इस पर रोक लगाने में नाकाम रही है.

आपको अगर लगता है कि इस तरह नक्सलियों का हौव्वा खड़ा करके और इस तरह के साक्षात्कार देकर, अपने पास शिक्षा विभाग के बार-बार निलंबित होने वाले बाबुओं का जमावड़ा लगा कर, उनसे अपने पक्ष में लिखवा कर आप प्रदेश का भला कर रहे हैं, तो यह आपकी गलतफहमी है.

मेरा आग्रह है कि आप अपराधियों से लड़ने का हौसला पैदा करें. आपके अधिकारी भ्रष्टाचार के कारण इस्तीफे दे रहे हैं, उनमें लड़ाई का जज्बा पैदा करें. आप कविता-कहानी भी करें लेकिन राज्य में पुलिसिंग भी हो, यह भी सुनिश्चित करना आपका काम है.
 
   
 

anuradha s जयपुर,राजस्थान

 
 आलोक जी ने अच्छा साक्षात्कार लिया है लेकिन इस साक्षात्कार में इस बात का उल्लेख कहीं नहीं है कि सलवा जुड़ूम को एस्सार और टाटा ने फंडिंग की है, इसके पीछे कौन से कारक हैं ? क्या यह सच नहीं है कि सलवा जुड़ूम पुलिस के संरक्षण में शुरु किया गया आंदोलन है और इसे केवल औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए शुरु किया गया था ? 
   
 

Sudha verma New Delhi

 
 गांधी को आप एक बार फिर पढ़ें विश्वरंजन जी। मुझे लगता है कि आपने भी गांधी को सेकेंड हैंड पढ़ा है।

गांधी ने महीषादल में 1943 के अपने बयान में कहा था कि अगर किसी महिला का शील भंग हो रहा हो तो वहां हत्या भी अहिंसा है और चुप रहना हिंसा है। बस्तर में औरतो की रक्षा करने के बजाय आपके एसपीओ क्या कर रहे हैं, यह आपको पता है। ऐसे में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए थी, यह सोचने की जरुरत है। गांधी के इस वचन को एक बार पढ़े और सोचें-

आदमी शरीर से कितना ही कमजोर हो, पर यदि पलायन लज्जा की बात है तो उसे मुकाबले पर डटे रहना चाहिए और कर्तव्यपालन करते हुए मृत्यु का वरण करना चाहिए। यही अहिंसा तथा वीरता है। वह कितना ही कमजोर हो, पर अपने शत्रु पर शक्ति भर वार करे और ऐसा करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो जाए यह वीरता है, यद्यपि यह अहिंसा नहीं है। यदि आदमी संकट का सामना करने के बजाए भाग खडा होता है, तो यह कायरता है। पहले मामले में, आदमी के हृदय में प्रेम अथवा दयालुता का भाव होगा। दूसरे और तीसरे मामले में, उसके हृदय में घृणा अथवा अविश्वास और भय के भाव होंगे। -(पृ. 211, हरिजन, 17-8-1935)
 
   
 

अनिरुद्ध (ashrivastava175@gmail.com) जगदलपुर

 
 भारत माता की संतान तो कश्मीर के आतंकवादी भी हैं? जैसे कश्मीर के आतंकवादी वैसे असम के आतंकवादी और वैसे ही नक्सलवादी सब अपराधी हैं और उन्हे स्ट्रीम में डालने की जरूरत है वो मेन स्ट्रीम में आने वाले नहीं। आदिवासी कैंपो में रहने के लिये आदिवासी सरकार के कारण बाध्य नहीं है नक्सली हिंसा के कारण मजबूर है क्योंकि ये तालिबानी उन्हे वापस जंगल जाने पर जिन्दा नहीं छोडेंगे। हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा तब तक नहीं होती जब तक डाकू आपका घर नहीं लूट रहा हो।  
   
 

Deep kumar thakur Raipur

 
 विश्वरंजन का इंटरव्यू पूरा पढ़ गया. बहुत बढ़िया है. जानकार आदमी हैं. सवाल भी काफी अच्छे थे. अपने पालिटिकल बास को तो ये मुट्ठी में रखते होंगे. रमन सिंह वगैरह को पता नही कितनी समझ होगी. लेकिन एक तरह का एरोगेंस तो झलकता ही है विश्वरंजन में.. मुझे लगता है कि इतने सीधे तरीके से रायपुर का कोई और पत्रकार उनसे बात भी न कर पाए. जहां तक सलवा जुड़ूम का सवाल है तो उसका जवाब उनके पास नहीं है. आप किसी भी रूप में आदिवासियों को शिविर में रखने को जस्टिफाइ नहीं कर सकते. हिंसा का जवाब प्रति हिंसा नहीं हो सकती. विश्वरंजन ने साफगोई से राज्य की हिंसा की बात को घुमा दिया. आपने सवाल राज्य ‘की’ हिंसा को लेकर किया था, उनका जवाब राज्य ‘में’ हिंसा पर केंद्रित हो गया. 
   
 

anwwr suhail (anwarsuhail_09@yahoo.co.in) bijuri anuppur mp 484440

 
 विश्वरंजन जी ने वहीं बातें की हैं जो नक्सलियों के खिलाफ हैं, वो नक्सलियों को alien की तरह treat कर रहे हैं, जबकि मेरा मानना है कि नक्सली हमारी तरह के लोग हैं और इसी भारतमाता की संतान है, ज़रूरत है उन्हें mainstream में लाने की. 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बस्तर

 
 विश्वरंजन जी का साक्षात्कार पढ कर प्रसन्नता हुई। पुलिस महकमें को एक साहित्यकार और कवि जैसा संवेदनशील व्यक्तित्व प्राप्त हुआ है इससे यह प्रसन्नता होती है। नक्सलवाद पर प्रशासन का और अपना निजी दृष्टिकोण आपने स्पष्टता और बेबाकी से रखा है।


माओवाद से सैद्धांतिक रूप से ही लडना होगा और इसका खोखलापन सामने लाना होगा, उस सभी प्रचारकों और तथाकथित बुद्धिजीवियों के मुखौटे बेनकाब करने होंगे जिनके दुष्प्रचार का नतीजा है कि यह आतंकवाद कटने के बाद भी जड नहीं छोड पाता। सामाजिक आर्थिक विषमता दूर किये बिना नक्सलवाद समाप्त नहीं हो सकता इस सच के साथ अगर देखता हूँ तो पाता हूँ कि आदिमों के पचास हजार से अधिक स्कूलों को ध्वस्त कर देने का श्रेय रखने वाले नक्सली, ग्रामीण सडकों को तबाह कर देने वाले नक्सली, बिजली की जगह ब्लैकआउट पसंद करने वाले नक्सली...क्या आर्थिक विषमता दूर करने वाले पैरोकार हैं? उन्हे तो एन. एम. डी. सी की कंवेयर जलाना है और उसी कंवेयर के जलने भर से उनका समाजवाद प्रकाशित होता रहता है? "इन महान क्रांतिकारियों :)" को जब बस्तर के विकास से परहेज ही है तो काहे का ढिंढोरा?


हमेशा सोचता हूँ कि जब "तथाकथितों" की नजर में नक्सली हिंसा आवश्यक है तो फिर सलवा जुडुम को भी "आदिम क्रांति" ही कहा जाना चाहिये...एक और भूमकाल? आन्ध्र और बंगाल के उन अपराधी तत्वों के खिलाफ आन्दोलन जो माओवाद के नाम पर आदिमों का जीवन हराम किये हुए हैं। आखिर आदिम भी अपनी संस्कृति और स्वाभिमान पर हमले को कब तक सहें?...? मजेदार बात तब होती है जब नक्सली और उसके समर्थक पकडे या मारे जायें तो मानवाधिकार हनन और नक्सलियों का विरोध करता आदिम मारा जाये तो स्वाभाविक प्रतिक्रिया? एक तरफ महाश्वेता देवी, अरंधुति राय जैसे उन लेखकों का आतंक जिनकी कलम जो लिखे वही "पत्थर की लकीर" और दूसरी तरफ "बेचारा सच" जिसे आवाज देने की कोशिश जो भी करे वह "सरकार प्रायोजित" या "दक्षिण पंथी"? हद है।


विश्वरंजन जी मैं "हाथी चले बाजार" वाली कहावत का हिमायती हूँ। आपका कार्य प्रसंशनीय है। बीच में कुछ "साहित्यिक ठेकेदारों" ने आप पर जो आरोप लगाये थे वह भी पढे थे। सच यह है कि न तो साहित्य किसी "वाद या विचारधारा" का ठेका है और न ही "क्रांति"।
 
   
 

आनंद कुमार सिंह , पटना

 
 2005 में जो सलवा जुड़ूम शुरु हुआ था, उसके कारण आदिवासी मारे जा रहे हैं, इससे किसी को इंकार नहीं होना चाहिए. दूसरा ये कि आप जब कहते हैं कि एसपीओ के कारण नक्सली घबराये हुए हैं, तो इसका दूसरा सच ये भी है कि नक्सली जिस तरह संघम सदस्यों को आगे रखते हैं, उसी तरह आप भी एसपीओ के नाम उन्हीं आदिवासियों को आगे कर रहे हैं और नक्सली मुठभेड़ में वही मारे जा रहे हैं. मतलब ये कि आपके निशाने पर भी भोलेभाले आदिवासी हैं और नक्सलियों के निशाने पर भी. आप केवल 'जन मारा जा रहा है, भारत का नागरिक मारा जा रहा है' जैसे जुमले कह कर अपना अपराध कम नहीं कर सकते. 
   
 

Santosh Kumar Arya New Delhi

 
 विश्वरंजन जी, आपने जितनी साफगोई से बात रखी है, वह तारीफ के काबिल है. लेकिन आपने आर्थिक विषमता के मुद्दे पर जो कुछ कहा है, क्या आपकी सरकार में बैठे लोग यह नहीं जानते ? वे तो लगातार चीखते रहते हैं कि नक्सलवाद कानून और व्यवस्था का मामला है. इतना बड़ा झूठ बोलने वाले लोगों को भी समझाइए. 
   

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