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मेधा पाटकर से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

संवाद

हमारी बात नहीं मानेंगे तो पछताना पड़ेगा

मेधा पाटकर से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री और सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का मानना है कि विकास की अवधारणा को ठीक से समझा नहीं जा रहा है, जिससे सामाजिक संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है. मेधा पाटकर की राय में सशस्त्र माओवादी आंदोलन के मुद्दे तो सही हैं लेकिन उनका रास्ता सही नहीं है. हालांकि मेधा पाटकर यह मानती हैं कि देश में अहिंसक संघर्ष और संगठन भी अपना काम कर रहे हैं, लेकिन सरकार उनके मुद्दों को नजरअंदाज कर रही है, जिससे इस तरह के आंदोलनों की जगह लगातार कम हो रही है. यहां पेश है, उनसे की गई एक बातचीत.

 

देश भर में जब कभी भी विकास की कोई प्रक्रिया शुरू होती है तो चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने उसका विरोध शुरू हो जाता है. गरीब भले गरीब रह जाए, आदिवासी भले आदि वास करने को मजबूर रहे लेकिन एक खास तरह के दबाव में विकास का विरोध क्या बहुत रोमांटिक ख्याल नहीं है?

विकास की परिभाषा किसी भी भाषा, किसी भी माध्यम में आप ढूढें तो यही होती है कि संसाधनों का उपयोग करके जो जीने के, जो जीविका के बुनियादी अधिकार हैं, या जरूरते हैं, उसकी पूर्ती करना. तो विकास की संकल्पनाएं तो अलग-अलग हो सकती हैं. कोई भी विकास का विरोधी नहीं है, न हम है, न सरकार भी हो सकती है. लेकिन सरकार एक प्रकार का विकास का नजरिया, ये कहते हुए जब सामने लाती है कि उन संसाधनों के आधार पर वो लाभ ही लाभ पाएंगे, वो आर्थिक या भौतिक लाभ. लेकिन उसमें जिन लोगों के हाथ में पीढ़ियों से संसाधन हैं, उनका न कोई योगदान होगा नियोजन में, न ही उनको लाभों में भागीदारी या हिस्सा मिलेगा. तब जा कर हमको अपने विकास की संकल्पना भी रखने का अधिकार है.

हम लोगों को लगता है कि आज इस देश में बहुत सारी जमीन, पानी, जंगल, खनिज संपदा, भूजल होते हुए भी 80 प्रतिशत लोग अपनी बुनियादी जरूरत पूरी नहीं कर पा रहे हैं, ये क्यों? और क्यों चंद लोग लक्षाधीश, कब्जाधीश बन रहे हैं. इतने और ऐसे कि जिनकी पूंजी विदेशी कंपनियों को खरीदने तक काम आ रही है. यह सब प्राकृतिक संसाधन और मनुष्य के श्रमों के आधार पर ही अपना लाभ, अपनी तिजोरी भरना संभव कर पा रहे हैं. जबकि सरकार की तिजोरी भी खाली हो रही है और लोगों के हाथ में जो पुराने पीढ़ियों से धरोहर जैसे प्राकृतिक संसाधन हैं, उनको भी हस्तांतरित किया जा रहा है.

इसीलिए हम लोग जल नियोजन चाहते हैं तो विकेंद्रीत जल नियोजन, ताकि हरेक को अपने नज़दीक से नज़दीक जल स्त्रोत से अपनी प्यास बुझाने का मौका मिले. हम औद्योगिकरण चाहते हैं तो खेती खत्म करके उद्योग नहीं. जो खाली ज़मीन पड़ी है, उसमें उद्योग लग जाए और उद्योग से पर्यावरणीय प्रदूषण या प्राकृतिक संसाधनों का विनाश और बड़े पैमाने पर विस्थापन न हो.

तो विस्थापनवादी विकास का नज़रिया छोड़कर अगर हम लोग गांव-गांव तक, शहर की बस्ती-बस्ती तक नियोजन का अधिकार ले जाएंगे और जो नियोजन होगा और उसमें पहला अधिकार अगर उन्हीं का होगा तो बात ही खत्म हो गई. वो रोज़गार निर्माण करने वाला विकास होगा, न कि रोज़गार खत्म करने वाला. वो खेती और उद्योग की बीच की, आज की दूरी मिटाने वाला होगा. जहां महिलाएं, बच्चे ही नहीं, दलित-आदिवासी, मज़दूर-किसान सभी, जो आज अबला या दुर्बल घटक माने जाते हैं; उनको पहली प्राथमिकता होगी और इसी आधार पर इस देश में समता, न्याय, समाजवाद जो संवैधानिक मूल्य हैं, उनकी स्थापना हो पाएगी.

जब हम लोग ये सवाल उठाते हैं तो पूरा नज़रिया सामने रखते हैं, हरेक क्षेत्र के बारे में हमने एक-एक मसौदा तैयार किया है. जैसे विकास परियोजनाओं का नियोजन कैसे हो, इसके बारे में हमारा मसौदा सोनिया गांधी और उनके राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने भी मंजूर किया और फिर बाजू में रखा गया. और फिर नया भू-अर्जन कानून का मसौदा केंद्र सरकार ने सामने लाया, जिसमें तो फिर निजी हित को सार्वजनिक हित में डालने की कोशिश की गई, जो ब्रिटिशों ने भी कभी बात नहीं की थी. तो हमारे मतभेद ज़रूर हैं पर हमको विकास विरोधी और राष्ट्र विरोधी कहना एक प्रकार की साज़िश है.

एक सवाल ये उठता है कि आप बार-बार हारने वाली लड़ाईयां कब तक लड़ती रहेंगी.

हम नहीं हार रहे हैं, हम जीत रहे हैं. देरी ज़रूर लग रही है, लेकिन अंधेरी नहीं महसूस हो रही है. क्योंकि अगर इस प्रकार का संघर्ष, जो कि अन्याय के खिलाफ है, व्यवस्था को चुनौती देने वाला है लेकिन निशस्त्र है, शांतिपूर्ण है, सत्याग्रही है, जो नर्मदा में चला. तो ऐसा होता भी नहीं कि देश में, दुनिया में केवल एकमेव वो बांध है सरदार सरोवर, जिसमें 11000 परिवारों को ज़मीन के बदले में ज़मीन देनी पड़ी.

आज भी दो लाख परिवार डूब क्षेत्र में हैं. एक ही बांध के, जिसकी डूब 214 किलोमीटर तक यानी रायपुर से नागपुर तक शायद फैली हुई है. तो ऐसा भी नहीं होता कि इतनी बड़ी परियोजनाओं को चुनौती दे सकते हैं. ये भी नहीं होता कि लाभों का जो खोखलापन है और लाभों का बंटवारा गुजरात के अंदर जो विकृत है, जो वहां के भी सूखा पीड़ित लोगों के साथ जो अन्यायपूर्ण साबित हो रहा है, उसकी पोल-खोल नहीं होती, जो आज हो रही है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश भी अपना हक मानने के लिए तैयार हो गए हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 मेधा जी को हिमालय से सादर प्रणाम. 
   
 

akash munirka

 
 देश की ऐसी बदहाल स्थिति होने के बाद भी हमारे नेता 9 फीसदी विकास पाने का लक्ष्य रख रहे हैं वो भी तब जब गांव में रोजगार के अभाव में लोग शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं. 
   
 

Shailendra thakur Jagdalpur Bastar CG

 
 Medha patkar is a well known environmist. We appreciate her thoughts, but she doesn't know real things about Bastar of Chhattisgarh. She only reacts as shown by a self declared NGO who already misused funds of government himself. NGO had run many watershed projects in Bastar region. But this is bitter fact that these areas are neither well developed and nor aware about conservation of ground water. whole work is done in papers. Nowadays he is using national media persons who doesn't know about ground reality of Bastar. Infact, Bastar is worst affected by naxalism & innocent people are killed. But who is responsible for this? This NGo uses National level Social Workers for attracting national media, because local media is aware about reality. This is necessary for Hon'ble Medha Patkar to examine the facts..  
   
 

uma chaturvedi (Umasahyog@gmail.com) Sahyog - Support in Development, sheyopur M.P.

 
 मेधा ताई ने मध्य-प्रदेश ही नहीं, सारे देश में नाम कमाया है. भारत देश में मेधा ताई जैसे नेतृत्वकर्ता अगर न हों तो दूसरे नेताओं का हाल तो घर को लगा दी आग, घर के चरागों ने जैसी है. मेधा ताई जैसे लोगों ने देश की लाज को बचाये रखा है. 
   
 

kumar krishnan (kkrishnanang@gmail.com) ranchi, jharkhand

 
 विकास के नेहरु मॉडल नहीं, विकास के गांधी मॉडल की जरुरत है. 
   
 

Subrat Goswami (ahambhumika@yahoo.co.in) Bhopal

 
 The work which Medha ji is doing is undoubtedly outstanding.The fight must go on.Medha ji has been my role model and i always dream to meet her .Though she had been to Bhopal many times unfortunately I could not meet her.I wsih if we could have few more people like Medha than for government bureaucrats it would be impossible to make people fool.
I appreciate your endeavor as a journalist to have such a nice and inspiring interview with people like medha ji .

I hope in future too we could be able to have the interview of the like her from you.
Regards
Subrat Goswami, Programme Co-ordinator, Aham Bhumika, Bhopal
 
   
 

शिरीष कुमार मौर्य नैनीताल

 
 मेधा जी की राय हमेशा से हमारे लिए अहम् रही है, वे विस्थापन की समस्या को एक आमफहम सरलीकरण से पार उसके जटिलतम विन्यासों से पहचानती हैं.
 
   
 

Neha Indore

 
 When common people don't understand the problem of common people then it became impossible to spread awareness about any thing or any problem. I don't understand why these tribes are always treated like other poor world people.

Why these tribes are always kept devoid of facilities while other common people keep enjoying these facilities simultaneously? Why these people always tolerate such a partial behavior of our great system which always suppress Himanshu like person who really wants to improve condition of these people?

I think there will be no wonder if these people will become rebellious for their rights and their peaceful life and no wonder in future these people will called as naxalite by our system.
 
   
 

neha indore

 
 i have no words to thank medhaji, whole discussion is more than enough to realize what is real development. 
   
 

shailendra patwa (journalist23_patwa@yahoo.com) raipur, chattisgarh

 
 गुड. मेधा जी के कहे पर कोई सवाल उठाना मूर्खों का काम है. आप लगे रहें, हमें आपका काम भाता है. 
   
 

आनंद कुमार पांडेय मुजफ्फरपुर, बिहार

 
 Politics of Alternative Development takes a people-centred approach to the politics of empowering social forces engaged in collective action in defence of livelihood, rights and social justice. 
   
 

Sanjeeva Noida

 
 I am just quoting M. A. Oomen from one of his Paper. According to Dr Oomen Quite often it is held that globalization is a natural and inevitable outcome of the evolution of human history. Francis Fukuyama saw ‘the end of history as such: that is the end point of mankind’s ideological evolution and the universalization of Western liberal democracy as the final form of human government.” It is not only the affirmation of Western liberal governments, it is also the affirmation of global capitalism. Can we accept unchallenged the neoclassical worldview of development and governance? To quote the telling words of Partha Chatterjee (1994), “If there is one great moment that turns the provincial thought of Europe to universal history, it is the moment of capital - capital that is global in its territorial reach and universal in its conceptual domain. It is the narrative of capital that can turn the violence of mercantilist trade, war, genocide, conquest and colonialism into a story of universal progress, development, modernization and freedom”. We probably have to start from here in our quest for alternative paradigms”.
Globalization is not an outcome of natural evolution. It is shaped and continuously being shaped from the days of colonization. Even science, technology and the whole knowledge systems got shaped in the process. Unfortunately, science and technology have never been designed to serve the larger interests of humanity. Several social science disciplines, notably economics, have also failed to go beyond the phenomenal form of commodity flow. No wonder it has provided the rationalization for the most iniquitous distribution of income and wealth.
The dominant technological choices have come to be decided by the needs of the military and the resource endowment of the West which have controlled science and technology from the days of the Industrial Revolution. They suit the population growth rate of the West, which is declining but not the 86 per cent of the youth of the world who inhabit the developing countries.
 
   
 

gulzar hussain (gulzar.mahanagar@yahoo.co.in) mumbai

 
 मेधाजी सही कह रही हैं. आज विकास के नाम पर गरीबों, मजदूरों, आदिवासियों के घरों को तोड़ा जा रहा है और उनके खेतों को छीना जा रहा है. सबसे बड़ा सवाल ये है कि पूंजीपतियों को अपना प्रोजेक्ट शुरु करने के लिए गरीबों के मोहल्ले ही क्यों मिलते हैं ? ये पूंजीपति अपनी कंपनियां किसी पॉश इलाके के घरों को तोड़कर शुरु करें तो जाने. यहां तो विकास के बहाने गरीबों को मरने का षडयंत्र रचा जा रहा है. 
   

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