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सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से आलोक प्रकाश पुतुल की बाततीत

संवाद

लिखे को हस्तक्षेप मानना चाहिए

सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

विनोद कुमार शुक्ल


















सभी फोटोः शाश्वत गोपाल

अपने पहले कविता संग्रह
लगभग जयहिंद और वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह के अलावा नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे और दीवार में एक खिड़की रहती थी जैसे उपन्यासों से हिंदी साहित्य में दूसरों के लिखे से एकदम अलग की तरह अपना मुआवरा गढ़ने वाले सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल मानते हैं कि आज विकास के साथ-साथ बाज़ार चलता हुआ दिखाई देता है, विकास की दिशा वहीं खत्म होती है, जहां तक बाजार पहुँच चुका होता है. उसके आगे कोई विकास नहीं है. विनोद कुमार शुक्ल इस बात पर आश्चर्य जतलाते है कि जंगल के सबसे भोले-भाले लोग, आदिवासी सबसे अधिक हिंसा के घेरे में हैं. वे मानते हैं कि साहित्यकार के लिखे जाने को ही हस्तक्षेप की तरह देखा जाना चाहिए. उनका सवाल है कि जिसका लिखा जाना कोई हस्तक्षेप नहीं है, तो लेखक का सड़क पर उतर आना किस तरह का होगा ?

यहां प्रस्तुत है, उनसे हाल ही में की गई बातचीत के अंश

गैब्रिअल गार्सिया मार्क्वेज कहते हैं कि कालेज के दिनों में उन्हें किसी दोस्त ने काफ्का की कहानियां पढ़ने को दी. मार्क्वेज उसमें 'मेटामोर्फोसिस” पढ़ने लगे. उसका एक वाक्य है- ''जैसे ही ग्रेगर समसा, बेचैन सपनों वाली रात के बाद सुबह सोकर उठा, उसने अपने को एक बहुत बड़े कीड़े में बदलते हुए देखा. '' मार्क्वेज कहते हैं कि उस वाक्य ने उन्हें जैसे पलंग से पटक दिया. उन्हें इससे पहले नहीं पता था कि लेखक को इस तरह भी कुछ लिखने की छूट होती है. मार्क्वेज के अनुसार अगर उन्हें ऐसा पता होता तो पहले ही लिखना शुरु कर देता. उन्होंने इसके बाद कहानियां लिखनी शुरु की.

तो लिखना क्या इस तरह सहसा घटने जैसा कुछ है ? आपने लिखना कैसे शुरु किया था ?

लिखना शुरु करने के पहले लिखने का वैसा कोई कारण नहीं. सबसे पहले दूसरों का लिखा हुआ पढ़ा गया. शायद ये एक कारण हो सकता हो कि ऐसा लिखा गया. लेकिन तब भी, पहले तो अपने से बात करने का कोई और तरीका लिखने के अलावा नही है, बाद में लिख कर हम, लोगों से बात करते हैं. और लिखना लोगों से बात करना है. शायद इस तरह मुखर होने की मैंने कोशिश की है.

लिखने की तरह की पहली रचना कौन सी थी ?

घर में लिखने का वातावरण था. संयुक्त परिवार था. माँ, जमालपुर जो कि अब बांग्लादेश में है; से नौ वर्ष की उम्र में अपने भाइयों के साथ कानपुर लौट कर आ गई थीं. उस नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने बंगाल का संस्कार, जितना भी हो, एक पोटली में बांध कर ले आई थीं. और वही पोटली हर बार मेरे सामने खुल जाती थी. मैंने उन्हीं से रवींद्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र और बंकिम के नाम सुने.

पहली रचना तो लिखित में बची हुई कभी होती नहीं. जब लिखित में होने की प्रक्रिया होती है तो कोई दूसरी रचना, उस पहली रचना को खारिज कर देती है. खुद रचना को खारिज करना हमेशा दूसरों के द्वारा खारिज होने से अपनी रचना को बचाने का एक तरीका होता है. और दूसरी रचना, जो किसी तरह से खारिज होने से बच जाती है, रह जाती है.

तो पहली रचना तो कभी होती ही नहीं है. जितनी भी रचनाएं हैं, सब दूसरी रचनाएं हैं.

ये `दूसरी’ पहली रचना कब थी ?

मैंने कविता के बड़प्पन को सीधे मुक्तिबोध में जाना. दो कदम बाद ही पहाड़ हो, नहीं मुक्तिबोध हों जैसे. सन 1958 में मुक्तिबोध राजनांदगांव में आए. रचना के संसार को टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं देखा, उसके विराट संपूर्ण को मुक्तिबोध में पाया. और मेरा कौतुहल, उत्सुकता बचकानी थी.

मुक्तिबोध जी ने मेरी कविताओं को देखा, फिर उन्होंने सबसे पहले कविता लिखने से मना किया, और लिखने-पढ़ने पर ज़ोर दिया, ताकि कुछ नौकरी कर परिवार की सहायता करूं.

पहली बार उनसे मिलने के बाद एक लंबा समय निकल गया. जब दुबारा नहीं मिला तो उन्होंने मेरे बड़े भाई, जो कि उनके विद्यार्थी थे, कहा कि मैं उनसे मिलूं. दुबारा मैं कविता लेकर उनके पास गया. उन कविताओं में से आठ कविताएं उन्होंने श्रीकांत वर्मा, जो `कृति’ के संपादक थे; को प्रकाशनार्थ भेजीं, और वे छपीं. इन आठों कविताओं को आप दूसरी कविता कह सकते हैं.

घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है....
और
....घर का हिसाब किताब इतना गड़बड़ है / कि थोड़ी दूर पैदल जाकर घर की तरफ लौटता हूँ / जैसे पृथ्वी की तरफ....
और
....घर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगा / अपने संन्यास में / मैं और भी घरेलू रहूंगा / घर में घरेलू / और पड़ोस में भी....
और
....दूर से घर देखना चाहिए....

तो आपकी रचनाओं को पढ़ते हुए लगता है कि घर एक राग की तरह है. घर के साथ ये किस तरह का रिश्ता है. ?

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

manoj kumar jaa (jhamanoj01@yahoomail.com) darbhanga

 
 साफ, सफल और सारगर्भित. बातों में भी बहुत बारीक काम, जैसा कि शुक्लजी कविताओं में हैं. सच ही, जहां लेखक के लिखे हुए से कुछ खास ना हो, वहां उसके सड़क पर उतरने से क्या उम्मीद हो. 
   
 

कृष्ण बलदेव वैद (kvaid@nda.vsnl.net.in) , New Delhi

 
 विनोद जी से बातचीत पढ़ कर एक बार फिर उनकी सादगी और गहराई से प्रभावित हुआ. 
   
 

Vishnu Khare (vishnukhare@yahoo.com) , New Delhi

 
 हमेशा की तरह विनोद जी के विचार बहुत मार्मिक, अंतर्दृष्टिपूर्ण और मौलिक हैं. उन्हें पढ़ कर हमेशा मुझ पर एक नशा-सा तारी होने लगता है. इस बातचीत में उनका एक अलग, बेबाक और जागरुक, प्रतिबद्ध रुप सामने आता है. संसार की कोई भी भाषा उन पर गर्व करेगी, एक इस कमीनी हिंदी को छोड़ कर. पुतुल का संपादन कुछ बेहतर हो सकता था.

वैसे वे मानते हैं कि उनका कोई मित्र नहीं है लेकिन एकतरफा इश्क करने वाले अपने माशूक की ये कातिल अदा भी खूब जानते हैं.
 
   
 

रवीन्द्र व्यास () इंदौर

 
 कविता हो, कहानी हो, उपन्यास हो या कोई साक्षात्कार विनोद जी अपने कहे के खास ढंग के बरकरार रखते हैं। उनके कहने का यह खास ढंग ही उन्हें विरल रचनाकार बनाता है। यह साक्षात्कार उसकी एक मिसाल कही जा सकती है।  
   
 

शेखर मल्लिक (shekharmallick@yahoo.com)

 
 विनोद कुमार जी का ये साक्षात्कार बहुत सारगर्भित है. बहरहाल कुछ सवाल उनकी रचनाओं के ऊपर विशेष कर और संदर्भ सहित होते तो अच्छा रहता. प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.
 
   
 

Akhter ali (akhterspritwala@yahoo.co.in) Raipur

 
 विनोद जी को सुनना और पढ़ना, लिखने की तमीज़ को समझना है. मैं विनोद जी के शहर का वासी हूं, ये भी किस्मत की बात है. 
   
 

Ram Kumar Mishra (rkmishra.mahanagar) Mumbai

 
 This interview shows that journalist wants know more about Mr. Shukla but Mr. seems economic to give what he want to get by him. Though it describes that the writer is coutious about his responsibility to the society and current moto of hindi literature. 
   
 

उदय प्रकाश

 
 विनोद जी के कहे में एक खास तरह की सदिच्छा झलकती है, जिसका इशारा आलोक जी ने अपने सवालों में भी किया है. यह बहुत जरुरी है कि रचनाकार अपने समय से भी टकराये. 
   
 

Sanjay Singh Baghel (sanjaysinghdu@gmail.com) Oman

 
 बहुत दिनों बाद मैंने आज कोई इंटरव्यू पूरी पढ़ा और उसका कारण विनोद कुमार शुक्ल जी के विचारों को जानने की इच्छा का होना था. मैंने शुक्ल जी की रचनायें पढ़ी थीं, नौकर की कमीज और दीवार में खिड़की रहती थी. इन दोनों रचनाओं को पढ़ने के साथ ही मुझे लगा था कि शुक्ल जी सहज और शालीनता के सागर है. साथ ही साथ भारतीय मध्य वर्ग की आवाज भी. लेकिन आज इस इंटरव्यू को पढ़ते हुये ऐसा लग रहा था, जैसे मैं किसी दार्शनिक वैतरणी को पार कर रहा हूं. 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) GHAZIABAD

 
 आलोक जी, विनोद जी से विनोद कुमार शुक्ल के बारे मे सुना करता था, पर आपसे उनका यह साक्षात्कार पढ़ कर उसे सुने को जितना सहारा और विश्वास मिला उससे कहीं ज्यादा सोच के स्तर पर फैलाव का आधार भी. जिन मूल्यों की वकालत लोग करते है उनसे बिल्कुल अलग.... शुक्ल जी मूल्यों को गढ़ते नज़र आये, कुछ भी बासी नहीं. आज कितने लोग है जो समझते है उन मूल्यों को? काश शुक्ल जी का सच और उस रहस्य का मकसद इस देश मे पूरा हो पाता.
इतने सुन्दर साक्षात्कार से मिले सुख के लिए साधुवाद .
 
   
 

सुधा ओम ढींगरा USA

 
 शुक्ल जी मेरे मनपसन्द कवि हैं .. आलोक जी की बातचीत से उनके बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, उनके विचारों से परिचित हुई..प्रश्न जितने स्पष्ट हैं, कुछेक उत्तर उतने ही अस्पष्ट मिले..शायद मेरी अपेक्षाएँ अधिक थीं..प्रश्नों से जहाँ संतुष्टि मिली..उत्तरों से थोड़ी सी अतृप्ति रह गई..इस नाचीज़ ने सिर्फ अपने भाव रखें हैं...क्षमा- प्रार्थना के साथ.
 
   
 

Ajay Kumar , Allahabad

 
 विनोद कुमार शुक्ल जिस तरीके से विषयों को विन्यस्त करते हैं, वह इससे पहले हिंदी में कभी नहीं हुआ है. सुदीप जी ने सही कहा है कि वे अपने समय के सबसे सहज और महत्वपूर्ण कवि हैं. एक ऐसा कवि, जिसके कुछ भी लिखे और कहे में कविता सुनाई पड़ती है. साहित्य के भोपाल और दिल्ली मठ से दूर रहकर विनोद जी ने अच्छा ही किया, वरना वो भी उस्तादी की तरह लिखने लग जाते. 
   
 

sudeep thakur (sudeep.thakur@gmail) delhi

 
 विनोद जी, हमारे समय के सबसे सहज और सबसे महत्वपूर्ण कवि हैं. जो लोग विनोद जी और उनकी कविताओं से परिचित हैं उन्हें पता है कि वे पुरस्कारों को लेकर उतने ही असहज हैं जितना राजधानी की चकाचौंध को लेकर. महत्वपूर्ण यह भी है कि वे सिर्फ कवि ही नहीं व्यक्ति के तौर पर भी सहज हैं. यदि आलोक के साथ बातचीत में वे साहित्यकार के सामाजिक हस्तक्षेप की बात कर रहे हैं तो ऐसा उन्होंने किया भी है. छत्तीसगढ़ के पलायन पर लिखी उनकी कविता रायपुर-बिलासपुर संभाग जिन्होंने पढ़ी है वे बता सकते हैं कि यह कविता सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं है. बस्तर पर लिखी उनकी कविताएं भी आदिवासी समाज में हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ हस्तक्षेप की तरह हैं.  
   
 

सुरेश कुमार भटनागर , नई दिल्ली

 
 इस साक्षात्कार से विनोद जी के की पहलू सामने आते हैं, जो अब तक पढ़ने में नहीं आये थे. आलोक जी अगर विनोद जी से कुछ और बातचीत कर सकें तो हम पाठकों के लिये वो बहुत काम का होगा. 
   
 

sangeeta p rajkot

 
 Its a good interview but his reaction over mannerism cannot be justified. Article is not like human face, if examples are given in this manner then it can be asked that where are eyes and lips of your article? 
   
 

ramesh kumar (rk140676@gmail.com) azamgarh

 
 विनोद कुमार शुक्ल को जितना मैंने पढ़ा है उस आधार पर मैं कह सकता हूं कि विनोद शुक्ल के साथ आलोचकों ने ईमानदारी नहीं बरती. सुपर्णा ने ठीक लिखा है कि वे हिंदी के काफ्का हैं.  
   
 

Vasudev Kumar Sinha , Jamalpur

 
 शुक्ल जी बहुत ही महीन बात करते हैं. लेकिन अभ्यस्ति वाला प्रश्न जस का तस खड़ा है. विनोद जी ने बहुत करीने से जवाब दिया है, फिर भी सवाल खड़ा होता है कि आखिर ऐसा कैसे संभव है कि 'आर्डर पर माल तैयार किया जाता है' के अंदाज में लेखक रचनायें लिखे और कहा जाये कि लिखना उस्तादी की तरह का काम नहीं है. विनोद जी भले खुद इश तरह का लेखन नहीं करते हों, लेकिन 80 फीसदी लेखक तो यही कर रहे हैं. 
   
 

शशिभूषण (gshashibhooshan@gmail.com) तमिलनाडु

 
 विनोद कुमार शुक्ल जी का लेखन आत्मबल बढ़ाता है.मैं समझता हूँ वे कथा और कविता के सत्याग्रही हैं.नौकर की कमीज पढ़कर समय-समाज से जैसी मुठभेड़ करने की ताक़त मिलती है, वह बहुत सी क्रांतिकारी किताबों द्वारा भी संभव नहीं.पर वे अपने कहन की गहराई में कवि ही हैं-सघन और आत्मीय.उनकी पंक्तियाँ धीरे धीर घुलती हैं.वे तनाव नहीं रचती कहीं गहरे अर्थों में आनंदित करती हैं.ऐसा आनंद जो विवेक का ही दूसरा नाम है.कई बार तो इस लेखक की एक पंक्ति ही पूरी कविता जैसी होती है.मुझे इससे कोई शिकायत नहीं कि इस अच्छे लेखक को कम पुरस्कार मिलें हैं.पुरस्कारों की जैसी हालत हो रही है उसे देखते हुए यह भी एक सफलता ही मानी जानी चाहिए.वरना वह दिन दूर नहीं जब इसे एक बुराई की तरह दर्ज़ किया जाएगा कि फलाँ लेखक को अमुक-अमुक पुरस्कार मिले हैं.
यह एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार है.इस नज़रिए से भी कि विनोद कुमार शुक्ल जी के बहुत कम साक्षात्कार पढ़ने में आते हैं.जिनका लेखन हस्तक्षेप नहीं, उनका सड़क पर उतरना कितना हस्तक्षेपकारी होगा लेखकों द्वारा इसे गुना जाना चाहिए.
 
   
 

snowa Borno (snowa,borno@gmail.com) Leh

 
 Some lady asked me to see the talks. She said : 'If u have time, see it.' I am too stranger to understand the details of different writers, but I reached the essense as a fresh newcomer. A co-writer of mine helped me to catch more. Thanks to all. Vinod ji, I have a window, which keeps a wall within, but the wall is like a 'bedar-o-deewaar'. U can see it in 'Oshiya A New Woman' blog. Even if u have a lot of time, don't go to this blog. It is injurious to the health of Intellectuals.
 
   
 

शहरोज़ (shahroz_wr@yahoo.com)

 
 राजेन्द्र जी के कथन में सौ फीसदी वज़न है!!! 
   
 

राजेंद्र यादव नई दिल्ली

 
 विनोद कुमार शुक्ल को उनकी मंडली ने ही सबसे अधिक हाशिये पर रखा. जो पुरस्कार उन्हें मिलना चाहिये था, उसकी जूरी में उन्हें रख दिया जाता था. भोपाली चौकड़ियों के कारण विनोद जी ब्रांड की तरह नहीं उभर पाये. 
   
 

रंगनाथ सिंह (rangnathsingh@gmail.com) नई दिल्ली

 
 बहुत बढ़िया साक्षात्कार है। इस बहाने हमें विनोद जी के निजी विचार जानने का मौका मिला।
 
   
 

शहरोज़ दिल्ली

 
 कुशल अदीब से एक पारंगत पत्रकार का संवाद कोशिश तो करता है कि कई विमर्श की खिड़कियाँ खुले लेकिन मुझे नहीं लगता कि कवि कामयाब हुए हैं.एकाध जगह मुखर हैं महज़ शुक्ल जी.हुसैन , तसलीमा वाले या अरुंधती वाले मुद्दे पर उनके जवाब से तुष्टि नहीं हो पायी.
यूँ बड़े लोग हैं.उनका अंदाज़ भी बड़ा बड़ा होता होगा..हम पिद्दियों को भला क्या समझ में आये!!
 
   
 

सुपर्णा (suparna.ghosh@gmail.com) UAE

 
 विनोद कुमार शुक्ल मेरे प्रिय कवि हैं और सच तो ये है कि उनके उपन्यास भी असल में कविता ही हैं. उनका लिखा आज भारतीय साहित्य के केंद्र में होना चाहिए था, लेकिन गिरोहबाजों के कारण ऐसा नहीं हो सका है. वे हिंदी साहित्य के काफ्का हैं. 
   

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