|
|
|
अभिजीत मजूमदार से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
संवाद
हथियार माओवादियों को चला रहा है
अभिजीत मजूमदार
से
आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
नक्सल आंदोलन के संस्थापक चारू मजूमदार के बेटे और सीपीआईएमएल लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी के सदस्य अभिजीत मजूमदार का मानना है कि भारत में चल रहा माओवादी आंदोलन बहुत छोटी लड़ाई तक सिमट कर रह गया है. उनकी राय में हथियार के पीछे एक राजनीति होनी चाहिए और वे महसूस करते हैं कि अब हथियार माओवादियों को चला रहा है.
चुनाव के रास्ते संसदीय राजनीति में आने वाली सीपीआईएमएल लिबरेशन के नेता अभिजीत मजूमदार मानते हैं कि माओवादियों को भी दूसरे जन आंदोलन में आना चाहिये. पिछले दिनों उनके सिलीगुड़ी स्थित पार्टी कार्यालय में लंबी बातचीत हुई. यहां पेश है उस बातचीत के अंश.
•
आप अपने बचपन को
किस तरह याद करते हैं ?
मेरी उम्र लगभग 50 साल हो गई है. छठवें दशक में जब नक्सलबाड़ी बना तो मैं
छोटा था. पूरी दुनिया के इतिहास को देखें तो आप पाएंगे कि 1960 का दशक आंदोलनों का
दौर था. आप यूरोप को देखें, अमरीका को देखें, खास तौर पर स्टूडेंट मूवमेंट और
व्यवस्था विरोधी जितनी भी बातें हैं, वो 1960 में चरम पर थीं.
मुझे याद है कि जब किसानों का आंदोलन हो रहा था और सीपीआईएमएल बनने से पहले ही 1965
से 1969 तक सिलीगुड़ी का हमारा घर, जहां हम पुरखों से रहते आए हैं, वहां सौ-डेढ़ सौ
की संख्या में पार्टी कामरेड आया करते थे. उन दिनों इतनी तो समझदारी नहीं थी
क्योंकि मैं छोटा था लेकिन एक नया कुछ बन रहा है, एक नया ऐलान हो रहा है और मेरे
पिताजी सबसे अलग हैं और उनके लिए हमें गर्व करना चाहिए, इस तरह की छोटी-छोटी बातें
समझ में आती थीं. इसका अहसास भी हमें था. नक्सलबाड़ी बनने के बाद जब सीपीआईएमएल बना
तो उनके जो नारे थे ... उस समय मैंने एक शिशु संघ बनाया और हमारा एक छोटा-सा लकड़ी
का घर था, जिसमें कोई रहता नहीं था. हम दिन भर जो नारे सुनते थे, उन्हें चॉक से घर
की दीवारों पर लिखते रहते थे. जाहिर सी बात है, इसमें एक एडवेंचरिज्म था. उस समय
बहुत समझदारी जैसी बात नहीं थी लेकिन अपने बचपन में मैंने बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ
सीखा.
•
अपने पिता को किस तरह याद करते हैं
?
नहीं, अलग से कुछ नहीं. मैं बचपन से जानता था कि हमारे पिता में अलग से जो
बात है, वो एक कलेक्टीव इंटिटी के रूप में ही है. वे सिर्फ हमारे पिताजी ही नहीं
हैं बल्कि उनको मानने वाले बहुत आदमी हैं.
पिताजी को बार-बार जेल में जाना पड़ता था. अब उन दिनों में हम लोगों के पास इतना तो
इंतजाम भी नहीं था कि हम लोग कुछ कर पाएं. हमारी माताजी लाइफ इंश्योरेंस की एजेंट
थी. मैं और मेरी दो बहनों के लिए मेरी माताजी को बहुत मेहनत करनी पड़ती थी. हमारे
पास पुरखों की जमीन जरूर थी लेकिन उसे देखना अलग काम था.
हमारे माता-पिता दोनों पार्टी एक्टीविस्ट थे. वामपंथी आंदोलन में मेरी माताजी भी कई
बार जेल गईं तो इसी कारण से एक गरीबी थी, जिसका सामना करना पड़ता था. लेकिन कभी भी
इस बात को लेकर कोई हीनता महसूस नहीं हुई क्योंकि हमारी जो माताजी थीं, हम लोगों के
लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती थी. दूसरी ओर पिताजी के लगातार आंदोलनों में रहने के कारण घर में अलग
माहौल था. पिताजी को लेकर बहुत सारी छोटी-बड़ी यादें हैं. आंदोलनों के दौरान जेल आना-जाना लगा रहता था. मुझे याद है, बीच-बीच में उनसे मिलने के लिये हम जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग या कलकत्ता जेल जाते थे. जेल में उनसे मिलने में कई बार बहुत परेशानी होती थी.
जब वो घर में रहते थे तो छोटी-सी छोटी बात में बहुत दिलचस्पी लेते थे. साहित्य और
संगीत में उनकी गहरी दिलचस्पी थी. संगीत में तो उनका लगाव देखते ही बनता था. हर
दोपहर ऑल इंडिया रेडियो में संगीत का कार्यक्रम आता था. उस समय तो रेडियो ही माध्यम
था और हर घर में तो रेडियो की सुविधा भी नहीं थी. हमारे घर भी रेडियो पार्टी के
माध्यम से ही आया था. मुझे याद है, वो एक प्लास्टिक कैबिनेट वाला रेडियो था. उसमें
दोपहर डेढ़ बजे ऑल इंडिया रेडियो पर क्लासिकल म्यूजिक का एक कार्यक्रम आता था,
जिसमें पिताजी बहुत दिलचस्पी लेते थे.
मुझे याद है, पिताजी हम लोगों को इस बारे में विस्तार से बताते थे कि यह कौन-सा राग
है, यह फलां संगीत किस तरह का है. इसी तरह किताबों की उनकी अपनी दुनिया थी, जिसमें
तरह-तरह की महत्वपूर्ण किताबें शामिल थी. अब जब मैं सोचता हूं तो इन बातों पर चकित
रह जाता हूं.
उन दिनों सिलीगुड़ी एक उनींदा सा शहर था. आज जो रौनक आप देख रहे हैं, वह कहीं नहीं
थी. एक छोटा-सा उंघता हुआ शहर और उसमें कम्युनिस्ट पार्टी के कारण ही शायद इस छोटे
से शहर से पूरी दुनिया की खबर रखना, अपडेट रहना, अंग्रेजी साहित्य कहें या लोक
भाषा, इन सब में दखल एक बड़ी चीज थी. एक विस्तृत सोच और बौद्धिक क्षमता उन्हें
दूसरों से अलग करती थी. मेरे पिताजी ही नहीं, उस समय कम्युनिस्ट आंदोलन में जो
दूसरे लोग भी थे, उनके अंदर की जो लगन और प्रतिभा थी, उसे मैं बहुत महत्वपूर्ण
मानता हूं.
आज जिस तरह की दुनिया है और संवाद के जिस तरह के माध्यम है, इंटरनेट है, टीवी है
उसकी तुलना में उस समय तो कुछ भी नहीं था. ऐसे दौर में दुनिया भर की सूचना और ज्ञान
को एकत्र करना और उसे ठीक ढंग से, मार्क्सवादी विचारधारा के साथ लोगों तक पहुंचाना
एक बड़ी बात थी.
•
आपको ऐसा लगता है कि आप अपने पिता की विरासत को ठीक-ठीक निभा पा रहे हैं ?
आपका सवाल थोड़ा अलग है और मैं इसे समझ पा रहा हूं. विरासत की बात तो मैं
मानता नहीं. हमारे हिंदुस्तान में यह अजीब बात है कि हम परिवार की विरासत को ज्यादा
ही महत्व देते हैं. इसी कारण से हम हिंदुस्तान के राजनीतिक इतिहास को देखें तो
इसमें भी हमें इस तरह की चीजें दिखाई पड़ती हैं. जैसे नेहरू परिवार है, जवाहर लाल
के बाद इंदिरा आएंगी और यह परंपरा उनके नाती राहुल गांधी तक आ गई है. यह जो परिवार
की परंपरा है, यह एक फ्यूडल मोड है. पूंजीवाद में भी यही होता है.
मैं ऐसा नहीं मानता कि मैं बहुत अलग हूं क्योंकि मेरे पिता एक किसान आंदोलन के जनक
थे. क्योंकि एक कम्युनिस्ट पार्टी बना चुके थे और सर्वमान्य रूप से एक सर्वमान्य नेता के
रूप में उभरे थे.
इसका यह मतलब नहीं है कि उनका बेटा होने के कारण वह विरासत मेरे
पास आ जाएगी. मार्क्सवादी दृष्टिकोण से तो यह कहना चाहिए कि सिद्धांतों को हम प्रैक्टिस में कितना ला पाते हैं. मैं इसमें कितना सफल हो पाया, इसका आकलन मैं नहीं कर सकता. इसका आकलन तो
दुनिया करेगी कि जो कुछ मैं कर रहा हूं या करुंगा, उससे अंततः जनता का क्या हित होगा ? अगर
जनता का कुछ हित होगा, किसानों की, मजदूरों की लड़ाई को बढ़ा पाएंगे तो वही होगी
हमारी विरासत. विरासत तो अलग से कुछ भी नहीं होती और अलग से कुछ करने से भी यह
बनती भी नहीं है.
आगे पढ़ें
•
वैचारिक रूप से, एक पिता और पुत्र के रिश्ते से अलग, एक पार्टी कॉमरेड के रूप
में क्या आपको ऐसा लगता है कि आप कॉमरेड चारू मजूमदार की लाइन पर हैं ?
बेशक. बेशक हूं. जब हम उनकी लाइन के बारे में सोचते हैं तो मीडिया की सोच से,
राष्ट्र की सोच से, लाइन को सिर्फ दिखाने के लिए कुछ टैक्टिकल एब्रेशंस हैं, उनको
भी दिखा कर कहते हैं कि यह भी चारू मजूमदार की लाइन है. चारू मजूमदार की लाइन कोई
अलग लाइन नहीं थी. चारू मजूमदार की लाइन पूरी दुनिया की, खासतौर पर तीसरी दुनिया की
क्रांति की लाइन है, क्रांति की दिशा है जिसकी दिशा मूलत:
मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओ त्से तुंग की विचारधारा में है. इस विचारधारा को हमारे
देश में सबसे अनोखे तरीके से इस्तेमाल करने का जो चारू मजूमदार का योगदान था, वह
बड़ी बात है.
ऐसी बात नहीं थी कि यह सिद्धांत कहीं से टपक गया हो या कहीं आसमान से आ गया हो और
चारू मजूमदार उसे दिशा दे रहे हों. दिशा तो वही मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओ त्से तुंग की विचारधारा ही थी लेकिन उस दिशा को समझना, समझदारी
से विस्तार देना, बहुत ही सरल तरीके से किसानों को समझा पाना, मजदूरों को समझा पाना
कि भाई, आपका शोषक कौन है और कौन-सा रास्ता पकड़ कर आपको जाना है, यह जो बड़ी बात
थी, उसमें दूसरे नेताओं के साथ-साथ चारू मजूमदार की बड़ी भूमिका थी. वैचारिक रूप से
इसकी पूरी प्रस्तावना, जो हमारी पार्टी की आठवीं दलील में है, उसको सिर्फ एक सांगठनिक रूप देने के
लिए जो काम उन्होंने किया था, वह बड़ी बात थी. यह हिंदुस्तान में पहले कभी नहीं
हुआ.
ऐसे ही नए तरीके से, नई उमंग के साथ और उसके साथ-साथ सिर्फ जमीन को छीनना ही नहीं,
पूरे राष्ट्र को चलाना और उसमें किसान और मजदूर की भागीदारी सुनिश्चित करने की जो
लड़ाई है, उसमें तो वही मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ त्से तुंगवाद है. मुझे नहीं लगता
कि चारू मजूमदार की कोई अलग लाइन खड़ी हो गई थी और मैं जो हूं, उनकी विरासत को लेकर
चल रहा हूं, या हम लोग जो काम कर रहे हैं वह पूरी तरह से चारू मजूमदार के खिलाफ है,
ऐसा भी नहीं है.
इस तरह के जो पूरे संदर्भ हैं, उन पर एक के बाद एक होने वाली हमारी पार्टी कांग्रेस में विस्तार से चर्चा हुई है. सीपीआईएमएल लिबरेशन 1974 में सिर्फ तीन नेताओं को लेकर
एक सेंट्रल कमेटी से शुरु हुई थी और आज हम वहां से चलते-चलते राष्ट्रीय स्तर पर
काम कर रहे हैं. पार्टी बनने से लेकर अब तक यानी कोलकाता में संपन्न हुई हमारी आठवीं कांग्रेस तक, उसकी जो रणनीति और कर्मनीति है, उसमें 1974 से अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ है. हमारी दिशा
मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ त्से तुंगवाद पर आधारित दिशा ही है.
हां, टेक्टिकल लाइन में जरूर बदलाव हुआ है क्योंकि समय के साथ-साथ कम्युनिस्ट
पार्टी की यही नीति होती है. विकास के नाम पर जो बदलाव लाने की कोशिश राष्ट्र करता
है, उसी को सबवर्ब करने का जो तर्क है, उसी तार्किकता को लाने की जरूरत है. यह
अभ्यास का मामला है, यह कोई अकेले वैचारिक मामला नहीं है. अभ्यास में लाकर उसे
दिखाना होता है.
हो सकता है, हम बिहार को सोचें, झारखंड को सोचें तो पता चलता है कि
हमारी अगुवाई हुई है और हम अपने को स्थापित करने में सफल रहे हैं. बंगाल में हम
थोड़ा दबे रहे हैं तो यह तो चलता रहता है. अविभाजीत सीपीआईएमएल, जिसके सचिव थे चारू मजूमदार और आज आप जिस पार्टी को देख रहे हैं उसमें कोई उथल-पुथल नहीं हुआ है. वह
पार्टी रणनीतिक तौर पर वैसी ही है.
•
आंध्र में, छत्तीसगढ़ में, बिहार में, झारखंड में और देश के कई हिस्सों में
चारू मजूमदार का नाम लेकर जो कुछ चल रहा है, उसे लेकर आप कितना सहमत-असहमत हैं ?
देखिए, अगर चारू मजूमदार को अपना आदर्श मानकर देश के कोने-कोने में जिस तरह
से आंदोलन चल रहे हैं, उनमें सिर्फ माओवादी आंदोलन ही नहीं है. सीपीआईएमएल लिबरेशन
के अलावा कई ऐसे संगठन है, जो चारू मजूमदार को अपना नेता मानते हैं. इन सबके सामने चारू मजूमदार को अपना नेता मानने के अलग-अलग कारण हैं, अलग-अलग तरीके हैं. इसमें तो हम
कुछ कर नहीं सकते, किसी को रोक नहीं सकते. अगर वो चारू मजूमदार को अपना नेता मानते
हैं तो उनकी अपनी कोई न कोई सोच होगी ही और हम उसको नकारात्मक रूप से नहीं देखते
हैं.
लेकिन जहां तक हम माओवादियों के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि 70 के दशक में
हमारी जो भावनाएं थीं, हमारा जो अभ्यास था, उसमें कुछ बातें थीं जिसको लेकर बाद
में, पहले कांग्रेस से लेकर आज 40 साल बाद आठवें कांग्रेस तक हमने उनकी समीक्षा की.
खास तौर पर चौथे पार्टी कांग्रेस में हमने दलील के रूप में इसकी समीक्षा की थी.
समीक्षा के दौरान यह बात साफ हुई कि हमारे आंदोलन के दौरान कुछ-कुछ चीजें ऐसी थीं, जो गलत थीं. उसमें एक
बात तो यह थी कि एक बुर्जुआ स्टेट में ट्रेड यूनियन मूवमेंट को छोड़कर पूरे के पूरे
ट्रेड यूनियन का किसानों को संगठित करने के लिए गांवों में जाना सही नहीं था. इस
तरह से जो टेक्टिकल अवरेशन जो हुआ था, उसको लेकर हम लगातार विचार करते हैं.
हम देखते हैं कि जब आप हिंदुस्तान में या कहीं भी हथियार उठाते हैं, तो उसकी अपनी
एक विरासत भी होती है. चारू मजूमदार जब 70 के दशक में सशस्त्र संग्राम की बात कर
रहे थे, तो उनके पास एक पूरी विरासत थी. 1950 से हम देखे तो पाएंगे कि भारतीय
किसान, संघर्ष की केवल एक ही भाषा समझते थे, वह थी हथियार की भाषा. जिन्होंने
जमींदारों के खिलाफ, ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हथियार उठाया था. यहां तक कि 1919 में
चौराचौरी में 22 पुलिस वालों को जलाया गया था, उसमें भी सबसे बड़ी भागीदारी हमारे
किसानों की थी. उसके बाद ही तो गांधीजी ने असहयोग और अहिंसक आंदोलन की घोषणा की थी.
लेकिन किसानों ने तो अपने तरीके से अपने आंदोलन की भाषा समझी थी और उसका इस्तेमाल
भी किया था.
तो यह जो पूरे किसान आंदोलन की विरासत है, आंदोलन की भाषा को समझना और
इसी को कहीं एक क्रांतिकारी दिशा में ले जाना, या ऐलान करना, यह चारू मजूमदार की एक
सबसे बड़ी अनोखी बात है, ऐसा हम अभी भी मानते हैं लेकिन उन्होंने यह कहा था कि
आंदोलन के दौरान घरेलू हथियारों का इस्तेमाल हो, जिससे बड़ा से बड़ा जनसमूह जुड़
सके. किसान अपने आप हथियार उठाए.
अभी हम देख रहे हैं कि जो सिंगूर में हुआ, जो नंदीग्राम पश्चिम बंगाल में, जो ओडिसा
के कलिंगनगर में हुआ. लोगों ने हथियार तो उठाए हैं लेकिन यह हथियार सिर्फ इंसास
रायफल के तौर पर है, जो हम मंगाते हैं, जिसपर करोड़ों रुपये खर्च होता है. यह बात तो
चारू मजूमदार ने कहीं भी नहीं कही है. वो कहते हैं कि अगर छीनना है तो पुलिस के पास
से छीन लो. और 70 के दशक में ऐसा ही हुआ.
इसमें सबसे बड़ी बात है, जिसे हमें समझना
चाहिए कि हथियार के पीछे एक राजनीति होनी चाहिए. Politics must be in command, not
arms. कहीं-कहीं हमें ये महसूस हो रहा है कि अब हथियार आपको चला रहा है. हिंदुस्तान
के माओवादी आंदोलन में आज हथियार आदमी को चला रहा है, ये नहीं होना चाहिए. राजनीति
को हथियार चलाना चाहिए. और केवल हथियार ही नहीं, उसके अलावा जनवादी आंदोलन के जो
अलग-अलग रास्ते हैं, तौर-तरीके हैं उसे भी शुरु करना चाहिए.
आगे पढ़ें
उदाहरण के लिए अरुंधति रॉय के हाल ही के लेख को लें. जैसा कि वो लिखती हैं कि बस्तर
में आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा है. एक गाँव के बाद दूसरे गाँव जला दिए गए हैं. तो
वहां एक असहयोग आंदोलन, एक अनशन, एक गांधीवादी रूप लें तो उसमें आपकी सफलता संदिग्ध
होगी. एक ऐसी जगह में जहां इस तरह के आंदोलन का कोई दर्शक नहीं हो तो ऐसे आंदोलन का
मतलब क्या है. लेकिन माओवादियों को सोचना पड़ेगा कि जहां दर्शक हैं, जहां जनता है,
जहां शहरी क्षेत्र हैं, उसमें उनकी रणनीति क्या होगी ? अपनी राजनीति को विस्तार देने
के लिए उनकी कोशिश क्या होगी ? यह स्पष्ट नहीं होने पर हम इस बात पर अटक जाते हैं कि
पूरा मध्यम वर्ग हमारे खिलाफ है, जैसा कि अरुंधति ने व्यक्त किया है.
मुझे लगता है कि यह मार्क्सवादी रूप नहीं है. माओवादियों को सोचना चाहिए कि
हिंदुस्तान के जो लोग हैं, जो अलग-अलग तरह का वर्ग है उनके पास हम कैसे जाएंगे?
बेशक यह वर्ग संघर्ष की ही राजनीति होगी. किसानों की, मज़दूरों की राजनीति को
छोड़कर राजनीति की बात मैं नहीं कह रहा हूं.
मैं मानता हूं कि आदिवासियों को हिम्मत
दिलाने की ज़रूरत है, उनके लिए लड़ने की ज़रूरत है और इस दिशा में माओवादी काम कर
रहे हैं. लेकिन आज के हिंदुस्तान में भुखमरी है, बेकारी है. अगर आप इसको address
नहीं करेंगे, आप एक बड़ी आबादी के केवल एक हिस्से को ध्यान में रखेंगे, केवल आदिवासी
की बात करेंगे तो आपका आंदोलन ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा.
सरकार बहुत ताकतवर है. अगर वो अपनी पूरी शक्ति के साथ आपके इलाके में आ जाए, तो
आपकी जो limitations हैं, उसको ही आधार बनाकर वह आपके खिलाफ एक बहुत बड़ा जनमत तैयार
कर रहा है, जो कि एक बौद्धिक, राजनीतिक, सामाजिक जनमत है. ऐसे में इससे निपटने के
लिए आपको दूसरा कोई तरीका अपनाना चाहिए.
लेकिन यह सब होने पर भी यह ऐलान करना कि माओवादी पूरी तरह से भूल कर रहे हैं या चारू मजूमदार के सिद्धांत
को पूरी तरह ध्वस्त कर रहे हैं, सही नहीं है और ऐसा कहने का मेरा कोई अधिकार भी
नहीं है. उनकी अपनी सोच-विचार है. उनके पास आदमी हैं, उनकी पकड़ है, भले ही वह जंगल
महल में ही हो. वो बौद्धिक तबकों के बीच में भी हैं, दिल्ली में भी हैं, देश के
दूसरे हिस्सों में भी हैं. मेरी बात को एक सकारात्मक आलोचना के तौर पर
माओवादियों को लेना चाहिए.
•
आपको ऐसा लगता है कि पिछले 40 साल में इस आंदोलन की जो उपलब्धियां हैं,
नक्सलबाड़ी से लेकर तेलंगाना और आज के दंतेवाड़ा तक, वहां उपलब्धियों के नाम पर
केवल हिंसा है ?
नहीं. मैं ये मानने के लिए तैयार नहीं हूं. हिंसा को जब हम उपर से देखते हैं
तो हिंसा का दूसरा रूप वह है, जो सबसे बड़ा है. वह है सरकार की हिंसा. सरकार की
हिंसा प्रतिरोध के रूप में एक हिंसा को जन्म देती है. और यह जो प्रतिरोध की हिंसा
है, वो सामने ना आ पाए, उसके लिए सरकार एक सांस्कृतिक दबाव भी बनाती है. हिंसा तो
सरकार करती है.
अगर आप दंतेवाड़ा का उदाहरण लें तो आदिवासियों ने तो वहां हिंसा की बात नहीं की थी.
और लालगढ़ में तो उन्होंने कहा था कि पुलिस की हिंसा का जवाब हम जनवादी आंदोलन से
देंगे. तो उसमें छत्रधर महतो को क्यों पकड़ा गया?
छत्रधर के साथ पूरे पश्चिम बंगाल
की पुलिस और प्रशासन बैठकर बातचीत कर रही थी और यकायक माओवादियों को दिखाकर, राइफल
को दिखाकर और किशनजी को दिखाकर एक संयुक्त ऑपरेशन शुरु कर दिया गया. यह जो इतनी बड़ी
हिंसा है, उसे हम देखते नहीं है. पुलिस और सेना को लेकर जंगल को उजाड़ने की जो
हिंसा है, उस पर हमारी नज़र नहीं जाती है.
सलवा जुड़ूम शुरु होता है और उसकी फंडिंग, हथियार जुटाने का काम टाटा और एस्सार और
रमन सिंह करते हैं. तो उनकी जो साझीदारी है, उसे आप दबा गए हैं, उसे मीडिया सामने
नहीं ला पाया है. दूसरी ओर आप दिखा रहे हैं कि माओवादी यह हिंसा कर रहे हैं.
माओवादी जहां नहीं हैं, वहां की हिंसा भी आपको देखनी पड़ेगी. कलिंगनगर में माओवादी
नहीं है, वहां किसने हिंसा की? 14 मार्च 2007 को नंदीग्राम में जब 14 लोगों को कुचल
दिया गया, उसमें तो सीपीएम का जो शासक दल है, उसके गुंडे शामिल थे और पुलिस को लाकर
वह हिंसा की गई. इस हिंसा को आप नहीं देखते हैं.
आपने देखा होगा कि चैनलों पर यह
ऐलान कर दिया गया कि अगर आप ऑपरेशन ग्रीनहंट का विरोध करते हैं तो आप माओवादी हैं.
लोकतांत्रिक स्पेस को इस तरीके से कुचला जाना, हिंसा तो ये है. हमारे जैसे लोग जो जनवादी रास्ते पर जाने की बात करते हैं, यह उनके प्रति हिंसा है. हमारे लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा
जा रहा है.
मैं समझता हूं कि 1947 के बाद जो हिंदुस्तान बना है, उसमें अब तक की
सबसे खतरनाक हिंसा ऑपरेशन ग्रीनहंट के नाम पर चल रही है. इसके खिलाफ सिर्फ अरुंधति
रॉय नहीं हैं, हर जगह एक लोकतांत्रिक स्वर जो बाहर आ रहे हैं, उसे दबा देने की
कोशिश हो रही है. चिदंबरम यह कर रहे हैं. यह तो हिंसा है. जनता के उपर जनता के खिलाफ
एक युद्ध खड़ा कर दीजिए. हर पैमाने पर, हर जगह एक युद्ध खड़ा कर दो और आप लड़ाओ.
•
आप ये चाहते हैं कि राज्य की जो हिंसा है, उसकी आड़ लेकर आपको भी हिंसा
की छूट मिले, उसके बरक्स.....
हिंसा नहीं. हम हिंसा के पक्षधर नहीं हैं. हमारी जो tactical line है और
जिसे हमने review किया है, वह जनवादी आंदोलन है. और इसे पूरे देश में फैला देना
चाहिए. और सरकारी हिंसा नहीं, हिंसा के पीछे की जो राजनीति है, हिंसा के पीछे जो
अर्थनीति है, जिस अर्थनीति और राजनीति को इस्तेमाल करने के लिए सरकार द्वारा हिंसा
का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसी को पहचानना और इस पहचान को हर आदमी तक पहुँचाना,
आम जनता तक फैलाना यही हमारी राजनीति है.
हमारे लिये सबसे बड़ा हथियार जनवादी आंदोलन ही है.
लेकिन सरकार अगर आपके खिलाफ हथियार उठाए और हिंसा का इस्तेमाल करे और आप उसके
प्रतिरोध के लिए हथियार उठाएं तो यह नक्सलबाड़ी की ही बात है. यह 70 के दशक की
विरासत है. मैं ये मानता हूं कि राष्ट्र अगर हमारे खिलाफ हथियारबंद आंदोलन लाद दे
तो उसका प्रतिरोध करना हमारा अधिकार है, यह अधिकार जनता के पास होना ही चाहिए.
आगे पढ़ें
•
देश का एक बहुत बड़ा वर्ग मानता है कि अगर जनता आपके साथ है तो आपको
चुनाव की राजनीति में आना चाहिए. जैसे आपकी पार्टी सीपीआईएमएल आई. आपको लगता है कि
माओवादियों को भी चुनाव के रास्ते में आना चाहिए ?
मैं तो माओवादियों का सलाहकार नहीं हूं. मेरे लिए कोई ऐसा उपदेश देना ठीक
नहीं है. लेकिन माओवादियों के बहुत सारे ऐसे नेता हैं, जिन्होंने चुनाव का रास्ता
अपनाया. आपने झारखंड में काम किया है, ये तो आप भी बेहतर जानते हैं. विधानसभा चुनाव
में भी बहुत सारे माओवादी चुनाव में भाग लिए हैं. पलामू जिले में भी एक बड़े
माओवादी नेता थे.....
•
कामेश्वर बैठा.
हां, कामेश्वर बैठा थे, रंजन यादव थे, ये लोग तो माओवादी आंदोलन से अलग
हटकर ही चुनाव की राजनीति में आए हैं. मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि सारे माओवादी इस
रास्ते पर ही आ रहे हैं लेकिन जो सकारात्मक आलोचना है, उसके बारे में ज़रूर सोचना
चाहिए. इस रास्ते का भी इस्तेमाल किय़ा जाना चाहिए. दोनों साथ-साथ चलाया जाना चाहिए.
हां, प्रतिरोध की आवाज़ को बुलंद करना चाहिए. अगर जरुरी हो तो हथियार उठाओ लेकिन जो
समाज का व्यापक वर्ग है, उस तक आपको अपनी राजनीति पहुँचानी होगी. जो शासक दल हैं,
उसके पीछे की जो अर्थनीति है, राजनीति है उसे बेनकाब करना होगा. इसके लिए जितने
रास्ते हो सकते हैं, थोड़े Subversion के साथ ही, एक बुर्जुआ tactical lines को भी
इस्तेमाल करना चाहिए.
•
सरकार का ये कहना है कि देश लगातार विकास कर रहा है, खुशहाली की ओर जा
रहा है और आप जैसी जो पार्टियां हैं, वह कहीं ना कहीं इस विकास के रास्ते में रोड़े
अटका रही हैं.
विकास का मॉडल क्या होगा? विकास का जो मॉडल है, उसमें आपने माओवादियों के
कॉरिडोर के नाम पर एमओयू का कॉरिडोर बना दिया है. झारखंड में आप देखें तो इन एमओयू
और एनओसी के नाम पर ही वहां के गरीब आदिवासी परिवार के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा
ने 4500 करोड़ इकठ्ठे कर लिए. अगर ये ही आपका विकास का रुख है तो इस पर हम सबको सोचना
पड़ेगा.
हमारा शहर सिलिगुड़ी बहुत बड़ा हो गया है और राज्य के शहरी विकास मंत्री भी इसी शहर
से हैं. और पश्चिम बंगाल में कोलकाता के बाद यही दूसरा सबसे बड़ा शहर बन रहा है.
यहां पास में ही चांदमनी चाय बगान था, जिसकी लड़ाई हम लोगों ने लड़ी थी, उसको बचाने
के लिए लड़ाई. अब वहां एक सैटेलाइट टाउनशिप बन गई है.
सवाल यही है कि आपका मॉडल
क्या है? जिस अमरीकी मॉडल को लेकर पूरे यूरोप को, अमरीका को, पूरी दुनिया को मंदी
की मार सहनी पड़ी है, अब उसी मॉडल को आप ला रहे हैं.
बीस प्रतिशत लोगों की सहूलियत के लिए आप बाकी 80 प्रतिशत लोगों का बलिदान दे रहे
हैं. ये अगर आपका रुख है तो आप चलिए उसमें, लेकिन ऐसा करने पर 80 प्रतिशत लोग तो उसके प्रतिरोध में
खड़े होंगे ही, खड़े हो रहे हैं. तो आपको ये सहना पड़ेगा, यह हकीकत है, वास्तविकता है. और इस
वास्तविकता में हमारे जैसे लोग किस के साथ रहेंगे? हम 80 प्रतिशत के साथ ही रहेंगे, यही हमारी
राजनीति है. और उसमें वर्ग का जो संदर्भ है, हम उसमें से ही मज़दूर को, किसान को
इकठ्ठा करने का प्रयास करेंगे. इसमें हमारे पास कोई और विकल्प भी नहीं है.
हम
चिदंबरम की तरफदारी नहीं कर पाएंगे. अगर हम कम्यूनिस्ट हैं, और अगर हम कम्यूनिस्ट
नहीं भी होते, केवल एक लोकतांत्रिक व्यक्ति भी होते तो भी बाकी 80 प्रतिशत लोगों के
साथ ही जाते. सबकी आँख खोलते. राष्ट्र, राज्य और सत्ता प्रतिष्ठान जिस तरह से काम
कर रहे हैं, उसमें वे खुद को ही बेनकाब कर रहे हैं. वो खुद संकट में है और इस संकट
से उबरने के लिए वे जनता के विरोध में हथियार का इस्तेमाल कर रहे हैं.
दूसरी ओर माओवादियों की लड़ाई को भी हमें देखना होगा. दंतेवाड़ा में जो घटना हुई है, उसको लेकर माओवादी कह सकते हैं कि उन्हें बड़ी सफलता
मिली है लेकिन हम देख रहे हैं कि उसका प्रतिफल क्या है. हम देख रहे हैं कि सत्ता दल
इस तरह की घटनाओं का इस्तेमाल कर रहा है.
सीआरपीएफ के जो 76 जवान मारे गए, वो गरीब
लोग थे. जब कॉफिन में उनके शव देश के अलग अलग हिस्सों में पहुँचे तो आम जनता में
माओवादियों के खिलाफ आक्रोश का वातावरण बना कि उन्होंने हमारे घर के लड़के को मार
डाला है. और ये जो आवेश है, सिर्फ इसी को दिखाकर सरकार उससे माओवादियों के खिलाफ एक
जनमत बना रही है.
दंतेवाड़ा में जहां ये घटना घटी है, वहां आसपास के सारे गाँव वाले अपना घर द्वार
छोड़कर भाग गए हैं. Hit and run की यह जो policy है, उसमें आपको राज्य का प्रतिरोध
सहना पड़ेगा. और सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह की घटनाओं से आप राज्य की हिंसा को सही साबित करते हैं. इस पर
माओवादियों को सोचना पड़ेगा.
इस घटना के बाद ऑपरेशन ग्रीनहंट के खिलाफ एक भी लफ्ज़ बोलने के खिलाफ एक माहौल
तैयार कर दिया गया है. यह एक तरह से अलिखित आपातकाल है.
•
पूरे देश भर में हिंसा का जो माहौल है, जो लोग हिंसा कर रहे हैं उससे
सरकार कैसे निपटे. ऐसे में आप एक opinion maker के बतौर सरकार को क्या सलाह देंगे?
हमारी पार्टी ने पहले ही सरकार से सलाह नहीं, ये मांग रखी हुई है कि ऑपरेशन
ग्रीनहंट बंद किया जाए. और हमने यह भी कहा है कि अगर माओवादियों के नाम पर ही
ऑपरेशन ग्रीनहंट चलाया जा रहा है तो उनसे बातचीत की जाए. सरकार को माओवादियों से
निःशर्त बातचीत करनी चाहिए. पहले हुये आंध्र प्रदेश की वार्ता के जो भी परिणाम रहे
हों, उसके अलग कारण हो सकते हैं. लेकिन नए सिरे से बातचीत की जानी चाहिए.
इस बातचीत में बौद्धिक तबके को भी शामिल किया जाना चाहिए. मध्यस्थ के रूप में
उन्हें रखा जा सकता है. इसमें नियम और शर्तें क्या होगी, वो हम नहीं तय कर सकते.
जिनके साथ आप बैठेंगे, सरकार और माओवादी, वे यह सब तय कर सकते हैं.
हमने लालगढ़ में भी बातचीत की बात की थी. हमने गृह सचिव को चिठ्ठी लिखी थी कि हमारी
पार्टी का प्रतिनिधि मंडल, जिसमें मैं भी शामिल होता, लालगढ़ जाना चाहता है.
पी.चिदंबरम जब लालगढ़ गए तो उन्होंने कहा था कि अब यहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरु
की जानी चाहिए, राजनीतिक पार्टियों को सामने आना चाहिए और इस तरह की बहुत सारी
बातें. लेकिन हमारी चिठ्ठी का अब तक कोई जवाब नहीं आया है और इस बात को महीना गुजर
चुका है. उन्होंने अब तक नहीं कहा है कि वे हमें जाने देंगे या नहीं जाने देंगे. ये
अगर सरकार का रुख है तो इसका क्या किया जाए.
आगे पढ़ें
सरकार Unlawful Activities Prevention Act जैसे काले कानून को विस्तारित कर रही है.
UAP Act 1967 में लागू हुआ था, जब नक्सलबाड़ी का आंदोलन हुआ था. उस समय उसका इतना
विरोध हुआ था कि डर के मारे सरकार उसे अमल में नहीं ला सकी थी. अब 1967 का UAP
Act उन्होंने अलग रूप में लागू कर दिया है. हमने सरकार से मांग की है कि संयुक्त
ऑपरेशन बंद किया जाए, ग्रीनहंट बंद किया जाए. अभी तो सरकार यह भी खुल कर नहीं कह
रही है कि ऑपरेशन ग्रीनहंट चल रहा है या नहीं चल रहा है.
•
पी.चिदंबरम कहते हैं कि ऐसा कोई ऑपरेशन ग्रीनहंट नहीं चल रहा है.
उन्होंने छत्तीसगढ़ में ही ये बात कही है.
हमारी पार्टी लिबरेशन के पास दस्तावेज हैं कि कहां-कहां ऑपरेशन ग्रीनहंट चल
रहा है. छत्तीसगढ़ में, झारखंड में किस-किस इलाके में यह हो रहा है. ये तो सामने आ
ही जाएगा. आज की जो तकनीक है, आज का जो मीडिया है, उसमें तो यह आ ही जाएगा कि कहां
क्या चल रहा है. अब बहुत दिनों तक आप उसे छुपा नहीं सकते. जो कुछ चल रहा है, वह
ऑपरेशन ग्रीनहंट नहीं है तो क्या है?
ऑपरेशन ग्रीनहंट यानी हरियाली का शिकार करो और
उसके नीचे जो खनिज हैं, जो संसाधन हैं, उसकी लूट करो. लूट और खसोट की जो राजनीति है,
उसके सबसे बड़े प्रवक्ता तो चिदंबरम साहब बन गए हैं. और यह सब कुछ हिंदुस्तान की
जनता के सामने खुल चुका है. इसे कहां तक ले जाएंगे, कहीं ना कहीं तो इसे रोकना
पड़ेगा.
•
अभी आपने कहा कि माओवादियों से सरकार को निःशर्त बातचीत करनी चाहिए. इस
बातचीत का तरीका क्या हो ? ऐसे में कैसे बातचीत हो सकती है, जब माओवादी कहते हों कि
हम आपके संविधान को नहीं मानते ?
उन लोगों ने तो कहा था कि हमें 72 दिनों का समय दें ताकि हम इसे समझ लें.
•
ताकि माओवादी और मजबूत हो सकें?
नहीं, यह देखना तो सरकार का काम है. हम ना तो माओवादी हैं ना चिदंबरम के
पक्ष में हैं. हमें तो नहीं पता कि माओवादी लड़ रहे हैं या कोई और लड़ रहा है. हो
सकता है आदिवासी अपने आप लड़ रहे हो. ये जानकारी तो हमारे पास नहीं है, हमारा
माओवादियों के साथ संबंध भी नहीं है.
लेकिन अगर सरकार कहती है कि ऑपरेशन ग्रीनहंट या संयुक्त ऑपरेशन माओवादियों के खिलाफ
चलाया जा रहा है तो इसका मतलब है कि सरकार को पता है कि लड़ने वाले कौन लोग हैं. तो
सरकार उनसे बातचीत क्यों नहीं करती है. उनके पास सरकार को किस तरह पहुँचना है, वो
तौर-तरीका सरकार बनाए. उसमें हम नहीं कहेंगे कि इस रास्ते से आप जाइए. हम तो कह
सकते हैं कि एक राष्ट्र अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध करे, यह कहीं से भी
लोकतांत्रिक नहीं है.
दिग्विजय सिंह ने अपने एक लेख में बहुत-सी अच्छी बातें कही हैं कि यह विकास के अभाव
से उभरी समस्या है. इसमें कानून व्यवस्था कहां से आती है. हालांकि यह भी कांग्रेस
की एक नीति है कि एक तरफ तो इस आंदोलन को पूरी तरह से कुचलने की बात होती है, वहीं
दूसरी ओर दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को खड़ा कर दिया जाता है जिसमें वो लोकतांत्रिक
प्रक्रिया की बाते करें क्योंकि यहां बहुत बड़ा वर्ग है. यह एक भ्रम की स्थिति पैदा
करने की कोशिश है. ऐसे में माओवादी भी यही कर रहे हैं.
•
आप जैसे लोग इसमें मध्यस्थ क्यों नहीं बनते?
नहीं, ऐसी बात नहीं है. मध्यस्थ बनने के लिए तो हिंदुस्तान में बहुत सारे
लोग हैं, जैसे अरुंधति हैं.
•
अरुंधति ने तो मना कर दिया है.
मना कर दिया है लेकिन उनके साथ बहुत सारे बुद्धिजीवी हैं, गौतम नवलखा हैं.
हम जैसे लोग क्यों? हम ऐसी बात में नहीं जाना चाहते हैं. लेकिन पार्टी के तौर पर
हमें लगता है कि अगर आप माओवादियों को दिखा रहे हैं तो आप उनसे सीधे बात करें.
•
बहुत सारे गांधीवादी इस मामले में पहल कर रहे हैं. क्या आपको लगता है कि
गांधीवादियों की यह कोशिश कामयाब होगी ?
गांधीवादी कहने का ये मतलब नहीं है कि सब गांधीवादी एक जैसे हैं. जो
गांधीवादी दंतेवाड़ा में 17 साल से काम कर रहे थे, वे आज राष्ट्रीय स्तर पर सबसे
अधिक, व्यापक पैमाने पर चर्चा में हैं. वो जो कह रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि वे
माओवादियों के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं. क्यों हुआ ये? अगर राजनीतिक तौर पर सोचें तो
वह तो अहिंसा की बातें करते थे. सबसे बड़ा अहिंसक आदमी दंतेवाड़ा के जंगल में 17
साल से काम कर रहा था और उसी के उपर सलवा जुड़ूम और दूसरे हमले कर के उसके आश्रम को
कुचल दिया गया. सरकार एक गांधीवादी को माओवादी बनाना चाहती है. इसकी जिम्मेदारी कौन
लेगा ? चिदंबरम जी को लेना पड़ेगा. इसे आम आदमी पर थोप देने से नहीं होगा.
हिमांशु कुमार ने आदिवासियों की तकलीफों को देखा है, समझा है. वे ज़रूर एक गांधीवादी हैं.
उन्होंने जो सहा है, देखा है, अंदर की बात सोच सकते हैं. तो उनको अगर आप मध्यस्थ के
रूप में लाएं तो ज़रूर कोई समाधान हो सकता है.
•
आपको लगता है कि गांधी की ज़रूरत है इस देश को?
देखिए ऐसी बात नहीं है. गांधी की आलोचना हम पूरी तरह एक राजनीतिक संदर्भ के
साथ करते हैं. गांधी का जो हिंदुत्व का वेश, जो उनकी राजनीति में था, वो एक अलग समय
था. गांधी का जो ग्राम स्वराज का सिद्धांत था, वो असफल था. वो कहीं भी सही साबित
नहीं हुआ.
जब-जब गांधी ने अहिंसा के सिद्घांत को फैलाने की कोशिश की, जहां कहीं भी
दंगे हुए, उनका एक बड़ा श्रोतावर्ग था, जो गांधी को मानने के लिए तैयार था. शायद
हिंदुस्तान में उतने बड़े कद का नेता नहीं हुआ आज तक, जिसके पीछे लाखों की तादाद
में लोग भागते थे. लेकिन उस समय ब्रिटिश सरकार के खिलाफ गांधी का जो
anti-imperialist संघर्ष था, उसमें पूरे देश की भागीदारी की बात थी. अभी तो हमारे
सामने दिखाने के लिए पी.चिदंबरम जैसे लोग रह गए हैं, जो कहते हैं कि हम स्वाधीन
भारत के स्वाधीन राष्ट्र व्यवस्था के प्रतीक हैं. वो एक ऐसी सरकार चला रहे हैं, जो अंदर
से खोखली हो गई हैं. ये एक fake democracy के नाम पर चला रहे हैं लोग.
ब्रिटिश सरकार के समय गांधी की जो पकड़ थी, लोग मानते थे कि अहिंसा को लेकर भी हम
एक हद तक सफल हो सकते हैं, आज इसका माहौल ही नहीं है. नहीं रखा हैं इन लोगों ने.
मनमोहन जी हों या इंदिरा गांधी हो, इनके पास एक ही तौर-तरीका है और ये वही तरीका है, जो
ब्रिटिश शासक अपनाते थे. उन्हीं तौर-तरीकों को स्वाधीनता के नाम पर इन्होंने चलाया
है. सरकार ने पूरा एक सिलसिला बना रखा है. ऐसे माहौल में तो लगता है कि गांधी जिस पार्टी के नेता थे,
उसी ने गांधी को मार डाला.
आगे पढ़ें
•
अपने देश में एक तरफ गांधीवाद है और दूसरी ओर माओवाद है और माओवाद का
सबसे बड़ा नमूना हमारा पड़ोसी देश चीन है. कैसे देखते हैं इसको ?
नहीं-नहीं. सबसे पहली बात तो ये है कि माओवाद को हम नहीं मानते हैं. हम 70
के दशक में यही मानते थे कि माओ ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद को ही तीसरी दुनिया के
देशों में अपने तरीके से फैलाने की कोशिश की. इन तीसरी दुनिया के देशों में किसानों
और मजदूरों के बीच उपर से तो सब कुछ शांत लगता था, ऐसा लगता था कि इनके अंदर में
कोई आग नहीं है. मार्क्सवाद-लेनिनवाद को लेकर तीसरी दुनिया में अपने लेख के रुप में
जो माओ के विचार थे और राजनीतिक कार्रवाई के रुप में उन्होंने जो कुछ किया, हम उसे
ही मानते हैं. लेकिन यह मार्क्सवाद-लेनिनवाद से अलग कुछ नहीं था. हम नहीं मानते कि
माओवाद जैसी कोई चीज थी.
• मार्क्सवाद-लेनिनवाद और आपके कहे अनुसार उसको लेकर माओ का जो चिंतन था,
उसका सबसे बड़ा केंद्र चीन है.
70 के दशक में जो चीन था, वो पूरी दुनिया में कम्यूनिस्ट केंद्र के रूप में
जाना जाता था. जनता की लड़ाई को हिम्मत देने वाले दुनिया के केंद्र के रूप में उसे
जाना जाता था. लेकिन उसके बाद माओ के जाते ही उसने अपने तौर-तरीके बदल लिए.
हो सकता है कि कम्यूनिस्ट पार्टी अभी चीन को चला रही हो, कम्यूनिस्ट पार्टी का ही राज है.
लेकिन हम उनकी आलोचना करते हैं. जिस तरह से वहां बेकारी बढ़ रही है, जिस तरह से
वहां के पोलित ब्यूरो में बुर्जुआ वर्ग की भागीदारी बढ़ रही है. विकास के नाम पर
गरीबों के झोपड़े हटाना, स्लम हटाना यानी पूंजीवादी राष्ट्र व्यवस्था के जो
quote-unquote तौर-तरीके हैं उसको लागू करना. हम इसकी आलोचना करते हैं.
चीन की एक खासियत थी कि उन्होंने जो अर्थव्यवस्था बनाई थी, उसमें स्थानीय उत्पादन
और स्थानीय खपत था. लेकिन WTO के साथ जाने के बाद जो एक अलाइनमेंट बना है, उसमें वे
एक वैश्विक पूंजी के ही हिस्से बन गए हैं. तो अभी तो चीन कहीं भी ऐसा नहीं माना
जाता कि वह राजनीतिक केंद्र है और वह किसी को दिशा देगा, एक नेतृत्व के रूप में
आएगा. कहां है माओवाद? हमने छठवीं से लेकर आठवीं कांग्रेस तक इस बारे में विचार भी
किया है.
• ठीक यही भटकाव तो नक्सलबाड़ी से दंतेवाड़ा तक पहुंचते-पहुंचते नक्सल
आंदोलन में भी नजर आता है...
नहीं, भटकाव की बात नहीं है. अगर हम भटके तो उसमें हो सकता है कि हमारी
मैच्योरिटी की बात है. लेकिन जब हम वामपंथ के बारे में सोचते हैं तो ये कोई ऊपर से
थोपी बात नहीं है. वामपंथ वर्ग संघर्ष के ऊपर ही स्थापित है. और जब तक हिंदुस्तान
में असमानता रहेगी, तब तक ये वर्ग संघर्ष बना रहेगा.
ये जो पूंजीवादी प्रणाली बन रही है, उसमें असमानता के खिलाफ आदमी की जो लड़ाई है,
वह वर्ग की लड़ाई है. वह लड़ाई तो चलती रहेगी और वो लड़ाई बढ़ रही है और उसमें
वामपंथ ही है, उसमें भटकाव जैसी बात नहीं है. हो सकता है कि कोई पार्टी, किसी नाम
से इस लड़ाई को नेतृत्व दे, उसके बाद नहीं भी दे सकते हैं. आज माओवादी हैं, कल
माओवादी नहीं भी रह सकते हैं. लेकिन हिंदुस्तान की लड़ाई, इसे एक नये संदर्भ में
देखना, इसे एक समतांत्रिक तरीके से देखना, ये तो जारी रहेगा.
अगर भटकाव की बात है तो यह पार्टी नेतृत्व के स्तर पर हो सकता है. लेकिन वो देर तक
चलता नहीं है. और ये जो हमारे अनुभवों का जो Archive बन रहा है, जमीनी स्तर पर, इसे
भी सोचना चाहिये. हिंदुस्तान में बौद्धिक क्षमता की कोई कमी नहीं है. अभी सबसे
शानदार, सबसे हिम्मतदार, सबसे प्रखर नेतृत्व उभर कर सामने आ रहा है.
• आपको लगता है कि जो Intellectual arrogance है, वह कहीं इस भटकाव का
कारण है ?
Intellectual arrogance है, मैं ऐसा नहीं कह पाउंगा. बौद्धिक लोग संघर्ष में
भागीदारी कर रहे हैं और वही दिशा दे रहे हैं, ऐसा भी नहीं है. 70 के दशक में कलकत्ता
में जो प्रेसिडेंसी थी, उसमें सबसे बड़ी भागीदारी तो छात्रों की रही. लेकिन कब ? जब
नीचे का वर्ग-संघर्ष जोरदार बना. जब एक सपना जमीनी स्तर से उभर कर सामने आया कि एक
नया समाज बनाना है. उसमें हिस्सेदारी करने के लिये बाद में बौद्धिक तबका और छात्र
सामने आये.
नंदीग्राम में बौद्धिक लोगों ने लड़ाई नहीं शुरु की, दिशा नहीं दी. सिंगूर में
बौद्धिक लोगों ने दिशा नहीं दी. लालगढ़ में जो लड़ाई चल रही है, उसे बौद्धिक लोग
दिशा नहीं दे रहे हैं. बौद्धिक लोग तब जा रहे हैं, जब जमीनी स्तर पर कोई संघर्ष हो
रहा है. ऐसा नहीं हो रहा कि अरुंधति जैसे बौद्धिक नया कुछ लिख कर माओवादियों को
दिशा दे रही हैं. आदिवासी अपने स्तर पर हथियार उठा कर जल, जंगल, जमीन की रक्षा करने
की बात कर रहे हैं.
सिंगूर, नंदीग्राम, कलिंगनगर में जो संघर्ष हो रहे हैं, इसमें
ही वामपंथ है और इसमें भटकाव जैसी कोई बात नहीं है. ये organic intellectual जो आ
रहे हैं, जिसमें छत्रधर महतो जैसे लोग आ रहे हैं, ये दिशा देने के लिये जरुरी है.
नये हिंदुस्तान की तैयारी है, उसमें ये जरुरी है, इसे समझना होगा.
06.06.2010,
05.51 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | HARSH PANDAY (harsh_pandey07@rediffmail.com) BILASPUR | | | | जरुरी है कि ये सब ऑनलाईन के बाद ऑन पेपर पर भी आये, बेहद प्रभावशाली इंटरव्यू. | | | | | |
| | मनोज शर्मा (smjmanoj.sharma@gmail.com) जम्मू | | | | बहुत महत्तवपूर्ण बातचीत है. जो लोग नक्सलवाद को पूरी तरह से नहीं जनते,जो लोग इसके विविध दलों की वैचारिक असहमतियों से परिचित नहीं हैं उनका तो मार्ग-दर्शन होगा ही,माले-लिबरेशन की विचारधारा से भी साक्षात्कार होगा.कई बुदिध्जीवियों को शायद तौफीक भी हासिल हो. भाई आप निहायत ज़रूरी काम कर रहे हैं. | | | | | |
| | ali syed Bastar | | | | अच्छी चर्चा ! बातचीत होनी चाहिये. सहमत ! | | | | | |
| | विजय प्रताप (vijai.media@gmail.com) दिल्ली | | | | बहुत ही शानदार इंटरव्यू है. अभिजित मजुमदार ने एक-एक बात को साफ़ किया है. हाल के माओवादी आन्दोलन को लेकर माले का रुख अन्य वामपंथी पार्टियों के मुकाबले कही ज्यादा संतुलित है. माले सीपीएम की तरह इसे पूरी तरह खारिज नहीं कर रही है...किया भी नहीं जा सकता...."हो सकता है कि इन आन्दोलनों के पीछे आदिवासी हों". यह सही है कि हाल की माओवादी घटनाओं का आँख मूंद कर समर्थन नहीं किया जा सकता लेकिन हमें उन परिस्थितियों को भी नहीं भुलाना चाहिए जिसमें ऐसी घटनाओं के लिए माओवादियों को उकसाया जा रहा है. आलोक जी के सवालों ने अभिजित जी को मौका दिया कि वह बातों को और स्पष्ट करे...यह अंदाज़ अच्छा लगा. आगे भी ऐसे इंटरव्यू की प्रतीक्षा रहेगी. | | | | | |
| | shailendra chauhan (shailendrachau@gmail.com) jammu | | | | भाई आलोक, बहुत ही अच्छा लग रहा है. इतना महत्वपूर्ण काम आप कर रहे हैं ये देख कर सच में प्रसन्न हुआ ही जा सकता है. अभिजीत का ये साक्षात्कार कई भ्रांतियों को expose करता है. | | | | | |
| | राहुल राजेश (rahulrajesh2006@gmail.com) | | | | बहुत खूब. पहले कानू सान्याल, फिर वरवरा राव और अब अभीजीत मजुमदार का साक्षात्कार. सुंदर, समझदार, निष्पक्ष पत्रकारिता. मेरा निजी तौर पर मानना है कि लोकविरोधी,शक्तिकेंद्रित,पक्षपातपूर्ण और नकारात्मक विकासवाद ही इस देश में सबसे बड़ा नक्सलवाद है. और जाहिर है,इसे माओवादी नहीं, खुद सरकार प्रायोजित कर रही है. सरकार या राष्ट्र राज्य को पहले यह सुनिशिचत करना होगा कि हमारा देश भले ही धीरे धीरे विकास के रास्ते पर चले, पर इसमे सबका विकास हो, सब इस कारवां का हिस्सा बनें, न कि सिर्फ इंदया का लोगों का हित सधे, बल्कि पूरे भारत का हित सधे. हां, अभीजीत मजुमदार जैसे लोगों को खुलकर हर मंच पर सामने आना होगा.सिर्फ अरुँधति राय के भरोसे यह काम नहीं होगा. अरुँधति राय की अपनी सीमाएँ हैं, और एजेंडा भी. बुद्धिजीवी तबका भी मीडिया पर दवाब बनाए कि वो एकतरफा सच न दिखाए. सच को सच की तरह सामने लाए. किसी की पैरोकारी या चमचई न करे. | | | | | |
| | pragya (pandepragya30@yahoo.co.in ) lucknow | | | | बातचीत पढ़कर सरकार और मिडिया की भूमिका पर संदेह हों रहा है . मिडिया भी पूरी इमानदारी से हर बात सामने नहीं लाती है .ओपरेशन ग्रीन हंट तो आदिवासियों की तबाही के लिए है उन्हें बचाने वाली सरकार ही जब उनको समाप्त करने की भूमिका में है तो उनका हथियार उठाना लाजिमी है .. बात इतनी बिगड़ चुकी है कि यह खेल अब खूनी हों गया है अब इसके लिए सरकार को अपनी शोषण करने और पूजीपतियों को मजबूती देने की अनर्थकारी नीति छोड़नी पड़ेगी.. लेकिन यह क्या किसी भी कीमत पर होगा ? | | | | | |
| | sunder lohia (lohiasunder2@gmail.com) Mandi ( H.P}. | | | | इस लेख में माओवाद के नाम पर चल रही हिंसा को रोकने के कई कारगर उपाय सुझाए गए हैं. बुद्धिजीवियों को मध्यस्थ बनाने का सुझाव बहुत बढ़िया है. जहां तक हथियार डालने का सवाल है, उसकी पहल तो सरकार को करनी चाहिए क्यों वही इस लड़ाई में ताकतवर पक्ष है. ये बात बिल्कुल सही है कि विकास का मॉडल ऐसा है जिससे गरीबों को नुकसान हो रहा है. केवल बंदूक के सहारे इस समस्या का हल न तो माओवादी निकाल सकते हैं ना ही सरकार. बंदूक की गोली अपनी आवाज़ से चुनौती ज़रूर देती है पर उस समस्या का हल निकालना इसके बस की बात नहीं है. जहां तक arrogance का सवाल है वो तो बुद्घिजीवियों के बजाय Home Minister में कहीं ज्यादा दिखता है क्यों उनके पास political power है. | | | | | |
| | bhagat singh raiour | | | | आलोक जी, आपका बहुत आभार कि आप लगातार ऐसे लोगों से बात करते हैं जिससे हमें अपनी समझ बढ़ाने का मौका मिलता है. ऐसे ही प्रयास जब किसी और लेखक ने किये तो उनके खिलाफ ऐसा माहौल बनाया गया कि वे नक्सली हिंसा के साथ हैं. पहले भी रुचिर गर्ग, संजय शेखर और आपने भी नेपाल में जाकर माओवादियों की रिपोर्टिंग की थी. पत्रकारिता के लिए इतना स्थान बना ही रहना चाहिए कि वे उनकी बात जनता तक पहुँचा सकें. अब उनमें से कोई लेखक या पत्रकार किसी से उतना प्रभावित हो जाए कि उनकी लड़ाई का समर्थन भी करने लगे तो कुछ अचरज नहीं होना चाहिए. लेखक या पत्रकार अपने आप में निरपेक्ष नहीं हो सकता. | | | | | |
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
|
|