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अभिजीत मजूमदार से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

संवाद

हथियार माओवादियों को चला रहा है

अभिजीत मजूमदार से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

नक्सल आंदोलन के संस्थापक चारू मजूमदार के बेटे और सीपीआईएमएल लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी के सदस्य अभिजीत मजूमदार का मानना है कि भारत में चल रहा माओवादी आंदोलन बहुत छोटी लड़ाई तक सिमट कर रह गया है. उनकी राय में हथियार के पीछे एक राजनीति होनी चाहिए और वे महसूस करते हैं कि अब हथियार माओवादियों को चला रहा है. चुनाव के रास्ते संसदीय राजनीति में आने वाली सीपीआईएमएल लिबरेशन के नेता अभिजीत मजूमदार मानते हैं कि माओवादियों को भी दूसरे जन आंदोलन में आना चाहिये. पिछले दिनों उनके सिलीगुड़ी स्थित पार्टी कार्यालय में लंबी बातचीत हुई. यहां पेश है उस बातचीत के अंश.

अभिजीत मजूमदार


आप अपने बचपन को किस तरह याद करते हैं ?

मेरी उम्र लगभग 50 साल हो गई है. छठवें दशक में जब नक्सलबाड़ी बना तो मैं छोटा था. पूरी दुनिया के इतिहास को देखें तो आप पाएंगे कि 1960 का दशक आंदोलनों का दौर था. आप यूरोप को देखें, अमरीका को देखें, खास तौर पर स्टूडेंट मूवमेंट और व्यवस्था विरोधी जितनी भी बातें हैं, वो 1960 में चरम पर थीं.

मुझे याद है कि जब किसानों का आंदोलन हो रहा था और सीपीआईएमएल बनने से पहले ही 1965 से 1969 तक सिलीगुड़ी का हमारा घर, जहां हम पुरखों से रहते आए हैं, वहां सौ-डेढ़ सौ की संख्या में पार्टी कामरेड आया करते थे. उन दिनों इतनी तो समझदारी नहीं थी क्योंकि मैं छोटा था लेकिन एक नया कुछ बन रहा है, एक नया ऐलान हो रहा है और मेरे पिताजी सबसे अलग हैं और उनके लिए हमें गर्व करना चाहिए, इस तरह की छोटी-छोटी बातें समझ में आती थीं. इसका अहसास भी हमें था. नक्सलबाड़ी बनने के बाद जब सीपीआईएमएल बना तो उनके जो नारे थे ... उस समय मैंने एक शिशु संघ बनाया और हमारा एक छोटा-सा लकड़ी का घर था, जिसमें कोई रहता नहीं था. हम दिन भर जो नारे सुनते थे, उन्हें चॉक से घर की दीवारों पर लिखते रहते थे. जाहिर सी बात है, इसमें एक एडवेंचरिज्म था. उस समय बहुत समझदारी जैसी बात नहीं थी लेकिन अपने बचपन में मैंने बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ सीखा.

अपने पिता को किस तरह याद करते हैं ?

नहीं, अलग से कुछ नहीं. मैं बचपन से जानता था कि हमारे पिता में अलग से जो बात है, वो एक कलेक्टीव इंटिटी के रूप में ही है. वे सिर्फ हमारे पिताजी ही नहीं हैं बल्कि उनको मानने वाले बहुत आदमी हैं.

पिताजी को बार-बार जेल में जाना पड़ता था. अब उन दिनों में हम लोगों के पास इतना तो इंतजाम भी नहीं था कि हम लोग कुछ कर पाएं. हमारी माताजी लाइफ इंश्योरेंस की एजेंट थी. मैं और मेरी दो बहनों के लिए मेरी माताजी को बहुत मेहनत करनी पड़ती थी. हमारे पास पुरखों की जमीन जरूर थी लेकिन उसे देखना अलग काम था.

हमारे माता-पिता दोनों पार्टी एक्टीविस्ट थे. वामपंथी आंदोलन में मेरी माताजी भी कई बार जेल गईं तो इसी कारण से एक गरीबी थी, जिसका सामना करना पड़ता था. लेकिन कभी भी इस बात को लेकर कोई हीनता महसूस नहीं हुई क्योंकि हमारी जो माताजी थीं, हम लोगों के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती थी. दूसरी ओर पिताजी के लगातार आंदोलनों में रहने के कारण घर में अलग माहौल था. पिताजी को लेकर बहुत सारी छोटी-बड़ी यादें हैं. आंदोलनों के दौरान जेल आना-जाना लगा रहता था. मुझे याद है, बीच-बीच में उनसे मिलने के लिये हम जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग या कलकत्ता जेल जाते थे. जेल में उनसे मिलने में कई बार बहुत परेशानी होती थी.

जब वो घर में रहते थे तो छोटी-सी छोटी बात में बहुत दिलचस्पी लेते थे. साहित्य और संगीत में उनकी गहरी दिलचस्पी थी. संगीत में तो उनका लगाव देखते ही बनता था. हर दोपहर ऑल इंडिया रेडियो में संगीत का कार्यक्रम आता था. उस समय तो रेडियो ही माध्यम था और हर घर में तो रेडियो की सुविधा भी नहीं थी. हमारे घर भी रेडियो पार्टी के माध्यम से ही आया था. मुझे याद है, वो एक प्लास्टिक कैबिनेट वाला रेडियो था. उसमें दोपहर डेढ़ बजे ऑल इंडिया रेडियो पर क्लासिकल म्यूजिक का एक कार्यक्रम आता था, जिसमें पिताजी बहुत दिलचस्पी लेते थे.

मुझे याद है, पिताजी हम लोगों को इस बारे में विस्तार से बताते थे कि यह कौन-सा राग है, यह फलां संगीत किस तरह का है. इसी तरह किताबों की उनकी अपनी दुनिया थी, जिसमें तरह-तरह की महत्वपूर्ण किताबें शामिल थी. अब जब मैं सोचता हूं तो इन बातों पर चकित रह जाता हूं.

उन दिनों सिलीगुड़ी एक उनींदा सा शहर था. आज जो रौनक आप देख रहे हैं, वह कहीं नहीं थी. एक छोटा-सा उंघता हुआ शहर और उसमें कम्युनिस्ट पार्टी के कारण ही शायद इस छोटे से शहर से पूरी दुनिया की खबर रखना, अपडेट रहना, अंग्रेजी साहित्य कहें या लोक भाषा, इन सब में दखल एक बड़ी चीज थी. एक विस्तृत सोच और बौद्धिक क्षमता उन्हें दूसरों से अलग करती थी. मेरे पिताजी ही नहीं, उस समय कम्युनिस्ट आंदोलन में जो दूसरे लोग भी थे, उनके अंदर की जो लगन और प्रतिभा थी, उसे मैं बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं.

आज जिस तरह की दुनिया है और संवाद के जिस तरह के माध्यम है, इंटरनेट है, टीवी है उसकी तुलना में उस समय तो कुछ भी नहीं था. ऐसे दौर में दुनिया भर की सूचना और ज्ञान को एकत्र करना और उसे ठीक ढंग से, मार्क्सवादी विचारधारा के साथ लोगों तक पहुंचाना एक बड़ी बात थी.

आपको ऐसा लगता है कि आप अपने पिता की विरासत को ठीक-ठीक निभा पा रहे हैं ?

आपका सवाल थोड़ा अलग है और मैं इसे समझ पा रहा हूं. विरासत की बात तो मैं मानता नहीं. हमारे हिंदुस्तान में यह अजीब बात है कि हम परिवार की विरासत को ज्यादा ही महत्व देते हैं. इसी कारण से हम हिंदुस्तान के राजनीतिक इतिहास को देखें तो इसमें भी हमें इस तरह की चीजें दिखाई पड़ती हैं. जैसे नेहरू परिवार है, जवाहर लाल के बाद इंदिरा आएंगी और यह परंपरा उनके नाती राहुल गांधी तक आ गई है. यह जो परिवार की परंपरा है, यह एक फ्यूडल मोड है. पूंजीवाद में भी यही होता है.

मैं ऐसा नहीं मानता कि मैं बहुत अलग हूं क्योंकि मेरे पिता एक किसान आंदोलन के जनक थे. क्योंकि एक कम्युनिस्ट पार्टी बना चुके थे और सर्वमान्य रूप से एक सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे थे.

इसका यह मतलब नहीं है कि उनका बेटा होने के कारण वह विरासत मेरे पास आ जाएगी. मार्क्सवादी दृष्टिकोण से तो यह कहना चाहिए कि सिद्धांतों को हम प्रैक्टिस में कितना ला पाते हैं. मैं इसमें कितना सफल हो पाया, इसका आकलन मैं नहीं कर सकता. इसका आकलन तो दुनिया करेगी कि जो कुछ मैं कर रहा हूं या करुंगा, उससे अंततः जनता का क्या हित होगा ? अगर जनता का कुछ हित होगा, किसानों की, मजदूरों की लड़ाई को बढ़ा पाएंगे तो वही होगी हमारी विरासत. विरासत तो अलग से कुछ भी नहीं होती और अलग से कुछ करने से भी यह बनती भी नहीं है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

HARSH PANDAY (harsh_pandey07@rediffmail.com) BILASPUR

 
 जरुरी है कि ये सब ऑनलाईन के बाद ऑन पेपर पर भी आये, बेहद प्रभावशाली इंटरव्यू. 
   
 

मनोज शर्मा (smjmanoj.sharma@gmail.com) जम्मू

 
 बहुत महत्तवपूर्ण बातचीत है. जो लोग नक्सलवाद को पूरी तरह से नहीं जनते,जो लोग इसके विविध दलों की वैचारिक असहमतियों से परिचित नहीं हैं उनका तो मार्ग-दर्शन होगा ही,माले-लिबरेशन की विचारधारा से भी साक्षात्कार होगा.कई बुदिध्जीवियों को शायद तौफीक भी हासिल हो. भाई आप निहायत ज़रूरी काम कर रहे हैं. 
   
 

ali syed Bastar

 
 अच्छी चर्चा ! बातचीत होनी चाहिये. सहमत ! 
   
 

विजय प्रताप (vijai.media@gmail.com) दिल्ली

 
 बहुत ही शानदार इंटरव्यू है. अभिजित मजुमदार ने एक-एक बात को साफ़ किया है. हाल के माओवादी आन्दोलन को लेकर माले का रुख अन्य वामपंथी पार्टियों के मुकाबले कही ज्यादा संतुलित है. माले सीपीएम की तरह इसे पूरी तरह खारिज नहीं कर रही है...किया भी नहीं जा सकता...."हो सकता है कि इन आन्दोलनों के पीछे आदिवासी हों".
यह सही है कि हाल की माओवादी घटनाओं का आँख मूंद कर समर्थन नहीं किया जा सकता लेकिन हमें उन परिस्थितियों को भी नहीं भुलाना चाहिए जिसमें ऐसी घटनाओं के लिए माओवादियों को उकसाया जा रहा है. आलोक जी के सवालों ने अभिजित जी को मौका दिया कि वह बातों को और स्पष्ट करे...यह अंदाज़ अच्छा लगा. आगे भी ऐसे इंटरव्यू की प्रतीक्षा रहेगी.
 
   
 

shailendra chauhan (shailendrachau@gmail.com) jammu

 
 भाई आलोक, बहुत ही अच्छा लग रहा है. इतना महत्वपूर्ण काम आप कर रहे हैं ये देख कर सच में प्रसन्न हुआ ही जा सकता है. अभिजीत का ये साक्षात्कार कई भ्रांतियों को expose करता है. 
   
 

राहुल राजेश (rahulrajesh2006@gmail.com)

 
 बहुत खूब. पहले कानू सान्याल, फिर वरवरा राव और अब अभीजीत मजुमदार का साक्षात्कार. सुंदर, समझदार, निष्पक्ष पत्रकारिता.
मेरा निजी तौर पर मानना है कि लोकविरोधी,शक्तिकेंद्रित,पक्षपातपूर्ण और नकारात्मक विकासवाद ही इस देश में सबसे बड़ा नक्सलवाद है. और जाहिर है,इसे माओवादी नहीं, खुद सरकार प्रायोजित कर रही है. सरकार या राष्ट्र राज्य को पहले यह सुनिशिचत करना होगा कि हमारा देश भले ही धीरे धीरे विकास के रास्ते पर चले, पर इसमे सबका विकास हो, सब इस कारवां का हिस्सा बनें, न कि सिर्फ इंदया का लोगों का हित सधे, बल्कि पूरे भारत का हित सधे.
हां, अभीजीत मजुमदार जैसे लोगों को खुलकर हर मंच पर सामने आना होगा.सिर्फ अरुँधति राय के भरोसे यह काम नहीं होगा. अरुँधति राय की अपनी सीमाएँ हैं, और एजेंडा भी. बुद्धिजीवी तबका भी मीडिया पर दवाब बनाए कि वो एकतरफा सच न दिखाए. सच को सच की तरह सामने लाए. किसी की पैरोकारी या चमचई न करे.
 
   
 

pragya (pandepragya30@yahoo.co.in ) lucknow

 
 बातचीत पढ़कर सरकार और मिडिया की भूमिका पर संदेह हों रहा है . मिडिया भी पूरी इमानदारी से हर बात सामने नहीं लाती है .ओपरेशन ग्रीन हंट तो आदिवासियों की तबाही के लिए है उन्हें बचाने वाली सरकार ही जब उनको समाप्त करने की भूमिका में है तो उनका हथियार उठाना लाजिमी है .. बात इतनी बिगड़ चुकी है कि यह खेल अब खूनी हों गया है अब इसके लिए सरकार को अपनी शोषण करने और पूजीपतियों को मजबूती देने की अनर्थकारी नीति छोड़नी पड़ेगी.. लेकिन यह क्या किसी भी कीमत पर होगा ? 
   
 

sunder lohia (lohiasunder2@gmail.com) Mandi ( H.P}.

 
 इस लेख में माओवाद के नाम पर चल रही हिंसा को रोकने के कई कारगर उपाय सुझाए गए हैं. बुद्धिजीवियों को मध्यस्थ बनाने का सुझाव बहुत बढ़िया है. जहां तक हथियार डालने का सवाल है, उसकी पहल तो सरकार को करनी चाहिए क्यों वही इस लड़ाई में ताकतवर पक्ष है. ये बात बिल्कुल सही है कि विकास का मॉडल ऐसा है जिससे गरीबों को नुकसान हो रहा है.

केवल बंदूक के सहारे इस समस्या का हल न तो माओवादी निकाल सकते हैं ना ही सरकार. बंदूक की गोली अपनी आवाज़ से चुनौती ज़रूर देती है पर उस समस्या का हल निकालना इसके बस की बात नहीं है. जहां तक arrogance का सवाल है वो तो बुद्घिजीवियों के बजाय Home Minister में कहीं ज्यादा दिखता है क्यों उनके पास political power है.
 
   
 

bhagat singh raiour

 
 आलोक जी, आपका बहुत आभार कि आप लगातार ऐसे लोगों से बात करते हैं जिससे हमें अपनी समझ बढ़ाने का मौका मिलता है. ऐसे ही प्रयास जब किसी और लेखक ने किये तो उनके खिलाफ ऐसा माहौल बनाया गया कि वे नक्सली हिंसा के साथ हैं. पहले भी रुचिर गर्ग, संजय शेखर और आपने भी नेपाल में जाकर माओवादियों की रिपोर्टिंग की थी. पत्रकारिता के लिए इतना स्थान बना ही रहना चाहिए कि वे उनकी बात जनता तक पहुँचा सकें. अब उनमें से कोई लेखक या पत्रकार किसी से उतना प्रभावित हो जाए कि उनकी लड़ाई का समर्थन भी करने लगे तो कुछ अचरज नहीं होना चाहिए. लेखक या पत्रकार अपने आप में निरपेक्ष नहीं हो सकता. 
   

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