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प्रकाश सिंह से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

संवाद

माओवादियों से बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार

प्रकाश सिंह से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

उत्तर प्रदेश और बीएसएफ के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह का कहना है कि भारत का लोकतांत्रिक ढ़ांचा इतना कमजोर हो गया है कि वह किसी भी आपात स्थिति में ढ़ह जायेगा. भारत के माओवादी आंदोलन को करीब से जानने-समझने वाले प्रकाश सिंह मानते हैं कि केवल पुलिस के सहारे माओवादी आंदोलन से मुकाबला संभव नहीं है. वे फिलहाल माओवादियों से किसी भी तरह की बातचीत के खिलाफ हैं. उनका कहना है कि सरकार पहले अपनी स्थिति मजबूत करे, फिर बातचीत का कोई सार्थक परिणाम निकलेगा. यहां पेश है उनसे हाल ही में की गई बातचीत के अंश.

प्रकाश सिंह


कई सालों के बाद एक बार फिर सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत की पहल हो रही है. क्या आपको ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष इस बातचीत के लिये सच में तैयार हैं ? क्या ऐसा कोई संवाद संभव है?

बातचीत का दरवाजा तो हमेशा खुला रखना चाहिये. संवाद तो होना चाहिये. लेकिन जब तक बातचीत के लिये दोनों पक्षों की तरफ से गंभीरता नहीं हो, ईमानदारी नहीं हो कि वास्तव में वो बातचीत के द्वारा समस्या का हल निकालना चाहते हैं तब तक यही माना जायेगा कि यह बातचीत केवल एक प्रोपगेंडा वैल्यू के लिये की जा रही है. और दूसरों को दिखाने के लिये की जा रही है कि हम तो शांति चाहते हैं. अगर इस तरह से दूसरों को दिखाने के लिये केवल ये ड्रामा हो रहा है तब तो उस बातचीत का कोई मतलब नहीं निकलता.

बातचीत का मतलब एक ईमानदार इच्छा से है कि हां, हम शांतिपूर्ण ढ़ंग से इस समस्या का समाधान चाहते हैं और हम ये मानते है कि हिंसा से इसका कोई हल नहीं निकलना है.

मुझे ये लगता है कि अभी तक जो कुछ पहल हुई है, वो केवल लोगों को भरमाने के लिये, दिखाने के लिये, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये हुई है कि देखिये, हम तो शांति चाहते हैं परंतु दूसरा पक्ष नहीं मान रहा है.

मैं नहीं मानता कि किसी की तरफ से भी बातचीत के लिये बहुत गंभीरता रही है. मैं ये भी मानता हूं कि वर्तमान समय और माहौल शांति वार्ता के लिये सही नहीं है

जब एक तरफ तो हिंसा का तांडव हो रहा है, एक के बाद एक घटनायें हो रही हैं, ऐसे में बातचीत कैसे हो सकती है ?

सिल्जा में ईस्ट्रन फ्रांटियर राइफल पर हमला हुआ. फिर छत्तीसगढ़ में चिंतलनार में 75 सीआरपीएफ के जवान मारे गये. फिर एक दूसरी घटना में बीस के करीब जवान मारे गये. फिर कोरापुट में घटना हुई, राजधानी एक्सप्रेस में घटना हुई, ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में घटना हुई. इस तरह से जब हिंसा की घटनाओं का क्रम बना हुआ है तो इस पृष्ठभूमि में शांति-वार्ता का कोई मतलब नहीं निकलता है.


ऐसे माहौल में अगर माओवादी ये कहते है कि हां, हम शांति चाहते हैं तो हमें उस पर विश्वास नहीं होगा.

तो रास्ता क्या है ?

जो राजसत्ता को चुनौती दे रहा है, उसके ऊपर तो अंकुश लगाना ही पड़ेगा. हिंसा को लगाम लगा कर रखना ही पड़ेगा. इसका कोई विकल्प है नहीं और इसके लिए सशस्त्र कार्रवाई ही करनी पड़ेगी. भारत सरकार को सशस्त्र कार्रवाई करते हुये इन पर हावी होना पड़ेगा. यह दिखाना पड़ेगा कि भारत की, भारतीय सत्ता की ताकत ज्यादा बड़ी है और इससे सामना करने का, इसको चुनौती देने का, इससे मुकाबला लेने का दुस्साहस मत करो वरना तुम्हारा नुकसान होगा.

जिस दिन ये संदेश चला जायेगा कि भारत सरकार के पास माओवादियों से कहीं ज्यादा ताकत है और वह माओवादियों पर हावी हो सकती है, जिस दिन उनको भौतिक रूप से जमीन पर ये बात समझ में जा जायेगी, उस दिन माओवादी भारत सरकार की पहल पर गंभीरता के साथ शांतिवार्ता के लिए सामने आयेंगे. उस समय जो वार्ता होगी, वह सार्थक होगी और उस समय जो बातचीत होगी, जो संवाद होगा, उसके सार्थक परिणाम की आप आशा कर सकते है.

नक्सल आंदोलन का सरकार जिस तरीके से मुकाबला कर रही है, उसमें कारपोरेट घरानों की बड़ी भूमिका देखी जा रही है. आपको लगता है कि इस तरह कारपोरेट के हित-अहित को ध्यान में रखकर नक्सलियों के साथ की जा रही लड़ाई का कोई खास मतलब निकल पायेगा ?

कारपोरेट की भूमिका मेरे समझ में नहीं आयी. हां, कारपोरेट जगत ये जरूर चाहता है कि नक्सलवाद को कुचल दिया जाये. क्योंकि उनकी रुचि इस बात में है कि वो उद्योग लगायें. वो चाहते हैं कि उनके जो एमओयू साईन हो चुके हैं, उस पर कार्रवाई हो. उनकी योजनाओं की नींव पड़े. कारपोरेट जगत का जो आर्थिक हित है, उसमें तो वे चाहते हैं कि माओवादियों को हटाया जाये. पर मै ये कहता हूं कि पहली बात तो कि आंदोलन को जो ये लोग कुचलने की बात कहते हैं, मैं उस भाषा से सहमत नहीं हूं. आंदोलन पर हमें लगाम लगानी होगी.

किशनजी जिस तरह से बड़बोले की तरह हांकते हैं, बड़ी-बड़ी बात करते हैं कि हम राइटर्स बिल्डिंग उड़ा देंगे, हम शहरी युद्ध छेड़ेंगे करेंगे तो इस तरह की बहकी-बहकी बातें वो शांतिवार्ता में भी करेंगे.


मैंने कहा न कि सरकार को अपना वर्चस्व स्थापित करना पड़ेगा और ऐसे तरीके से कि माओवादियों को ये समझ में आ जाये कि सरकार की ताकत हमसे बड़ी है और अगर हम फिर भी लड़ते रहेंगे तो शायद हमारा खात्मा हो जायेगा. खात्मा भारत सरकार को नहीं करना चाहिये, भारत सरकार इतना ही दबाव डाले कि वह अपने आप को एक सीमित दायरे में समेट लें. उनको समझ में आये और अपनी औकात सही ढंग से उनको समझ में आ जाये. उस स्थिति में आने के बाद भारत सरकार को पहल करनी होगी और उनको ओवर ग्राउंड लाने के लिये प्रोत्साहित करना होगा. मैं समझता हूं, उस समय वार्ता का सही माहौल बनेगा.

आज की तारीख में अगर आप बात करने के लिए उनको बुलाइयेगा, तो किशनजी जिस तरह से बड़बोले की तरह हांकते हैं, बड़ी-बड़ी बात करते हैं कि हम राइटर्स बिल्डिंग उड़ा देंगे, हम शहरी युद्ध छेड़ेंगे करेंगे तो इस तरह की बहकी-बहकी बातें वो शांतिवार्ता में भी करेंगे और वे ये चाहेंगे कि भारत सरकार को हम अपनी शर्तों पर दिशा-निर्देश दें. ऐसे वातावरण में बात तो नहीं हो पायेगी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rajiv (rajivreal@gmail.com) mumbai

 
 सरकार अपना वर्चस्व स्थापित कर के, ताक़त दिखा के समस्या का हल नहीं निकाल सकती. हाँ सरकार अगर फिर से जनकल्याण के रास्ते पर लौटे तो शायद कोई रास्ता निकलेगा. 
   
 

Santosh Kumar Mishra (santoshkumar.mishra@ymail.com) Lucknow,UP

 
 ये सही में ही बहुत ज़रूरी है कि सारी समस्या की जड़ ही काटनी होगी और इससे अच्छा रास्ता और नहीं है. 
   
 

shailendra chauhan (shailendrachau@gmail.com) jammu

 
 ईश्वरीय शक्तियां क्या काम कर रही हैं ? प्रकाश सिंह आखिर कहना क्या चाहते हैं ? सरकारी बदमाशी नहीं चलेगी पर ये देश नेताओं के हाथ में है, प्रकाश सिंह का न कोई संगठन है न कोई पार्टी वह क्या कर सकेंगे, यह अपनी समझ से परे है. 
   
 

bhagat singh (bhagatsingh788@gmail.com) raiouir

 
 तलवार तो उठानी ही पड़ेगी और क़ुरबानी तो देनी ही पड़ेगी, क्या बात हैं कि इसके लिए भगवान का रास्ता देखना पड़ेगा. यही प्रॉब्लम है सेना या पुलिस के रिटायर्ड लोगों के साथ. मेरे पिता सेना से रिटायर्ड थे और हमेशा यही कहते थे कि भ्रष्टाचारियों को गोली मार देना चाहिए, और उनकी सारी बहस आखिरी में भगवान पर ही ख़त्म होती थी.

नक्सलियों से चर्चा नहीं करनी चाहिए क्योंकि वो वार्ता में पूरा राज मांग लेंगे, यही बात इन्होंने रायपुर के प्रोग्राम में कही थी. न तो इन चर्चाओं में कोई सत्ता मांग रहा हैं और न कोई उन्हें दे रहा हैं. मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं बल्कि वैश्विक नीतियों का हैं जो किसी भी तरह से दुनिया में गरीबो को ख़तम करके संसाधनो पर कब्ज़ा करना चाहते हैं. जो इनका विरोध करे वे या तो नक्सलवादी हैं या देशद्रोही. अमेरिका में यह कहा गया था कि "गुड रेड इंडियंस, डेड रेड इंडियंस” और यहाँ कहा जायेगा कि "गुड ट्राइबल्स इस डेड ट्राइबल्स" यानि जो समुदाय बिना किसी विरोध के अपने संसाधन मालिकों को सौंप दे वही अच्छे भारतीय हैं.

प्रकाश जी, माफ़ कीजिये आज भारत में नक्सलवाद को ख़तम करने के बाद भी इस लूट के खिलाफ लड़ाई ख़तम नहीं होने वाली. इसका हल लाल किले पर गोली मारने से नहीं होगा क्योंकि गोली मारने वाला हाथ आप कहां से लायेंगे, ऐसा तो तालिबान भी कहते हैं लेकिन उनके भी हाथ खून से ही रंगे हैं.

नक्सलवाद के तरीके की आलोचना तो हम सब करते हैं लेकिन दूसरा रास्ता दिखता भी नहीं हैं. बता रहे हैं वो तो इस सिस्टम को जरूर रास आएगा ही. आजकल टेलीविज़न पर हजारों साधू यही कह रहे हैं.
 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad/Jaunpur

 
 प्रकाश सिंह जी ने बड़ी क्रांति का आमंत्रण दिया है पर जगह बताई है लाल किले के सामने-"हां मैं तो मानता हूं कि इस देश के सौ आदमी, सौ भ्रष्ट आदमियों को हर साल लाल किले के सामने खड़े करा के स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले गोली मार देनी चाहिये. मारिये आप इनको, नहीं तो ये देश को खा जायेंगे. ये देश को खा रहे हैं. रोज खा रहे हैं. मैं समझता हूं कि चीन से बड़ा खतरा और पाकिस्तान से बड़ा खतरा, माओवादियों से बड़ा खतरा भ्रष्टाचार से है. भ्रष्टाचार इस देश को खा जायेगा. "
अब इनको कौन बताये कि देश के हर दफ्तर से यह भ्रष्टाचार रूपी जिन्न अवाम को निगल रहा है. यह जिसे भ्रष्टाचार कह रहे हैं, नए युग में शिष्टाचार में बदल गया है, बिना 'घुस' के इनके महकमे में कोई काम नहीं होता. 'अमर कांड''पुलिस भर्ती कांड'आईये उत्तर प्रदेश में किसी मंत्री से बात करिए, काम तभी होगा जब कीमत इतनी होगी जिसको वह 'नोट गिनने की मशीन' से ही गिन पाएंगे.
जगह बदलिए उठाईये शस्त्र देखिये शुरुआत कहाँ से ठीक रहेगी- करोड़ों में विधायकी, कई करोड़ों में सांसदी, मंत्रियों की नोटों की माला, जिलाधिकारी, पुलिस के आला अफसर, कुलपतियों की नियुक्ति, सभी आयोगों में भर्तियाँ, यहाँ सबकी कीमत लगती है, क्योंकि इस प्रदेश में 'द्विज-दलित नव जागरण का विस्तार चल रहा है.' उच्च न्यायलय मौन है कि कहीं नव विकास वाधित न हो जाय.क्योंकि यह सब दलित मुख्यमंत्री की देख रेख में चल रहा है. पर प्रकाश सिंह जी कोई कह रहा था- उत्तर प्रदेश में आजकल ईमानदारी बढ़ गयी है 'पैसे लेकर काम कर देते है, यदि किसी ने ज्यादा दे दिया तो कम वाले का पूरा पैसा वापस कर देते है'
 
   
 

Akriti kumar bilthare (akriti.bilthare@gmail.com) , Bhopal

 
 ये देश नेताओं के हाथ में है और इन नेताओं को हमने ही अपनी बागडोर सौंप दी है. आलोक जी, आपने सही सवाल किया है कि आखिर कोमा में रह रही जनता कैसे परिवर्तन लाएगी. हम सब कायर लोग हैं, जो अपनी गलतियों के लिये दूसरों को ही जिम्मेवार बता कर भाग लेना चाहते हैं. ऐसा कायर समाज कुछ नहीं कर सकता. माओवादी तो और भी भटकाव वाले रास्ते पर हैं. उनसे अब कोई उम्मीद नहीं बची है. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 प्रकाश जी और आलोक जी, आप दोनों के सवाल-जवाब आज के मुर्दा समाज के बीच एक इंकलाब की तरह हैं. बहुत ज़रुरत आ पड़ी है इस चिंगारी को फैलाने की.

प्रकाश जी के तुज़ुर्बे, बयान और उनके भीतर भरी आग आखिरकार वहाँ पहुंचा देती है, जहां समाज, सरकार, न्यायपालिका, मीडिया, सिपाही और अपने ही घर में पैदा किये गए आतंकी एक साथ समझ सकते हैं कि अगर अपनी सुख-सुविधा छोड़ कर सामने वाले की बात ध्यान से नहीं सुनी गई तो दोनों तरफ के लड़के मारे जायेंगे और जीतेगा कोई नहीं. माओवादी और नक्सलवादी अगर भगत सिंह के रास्ते पर नहीं आते और भ्रष्ट लोगों को गोली से नहीं उड़ाते तो अपने लिए एक भी इंच ज़मीन की उम्मीद न करें. उनके बीच जो चेतनाशील लोग हैं, उन्हें जल्दी से फैसला करना होगा समूचे देश के हित में. दोनों तरफ के लड़ाकों को एक-दुसरे को दोस्ती का पैगाम भेजना होगा. वरना न माया मिलेगी न राम.

अगर राजनेता, माओवादी या नक्सलवादी लोगों को प्रकाश जी की बात दो टूक बता दें और साथ में यह भी कि खुद राजनेता एक साधारण आदमी के स्तर पर आकर पूरी ईमानदारी से यह कह रहा है और इसी के साथ यह भी बता दें कि उसे जनहित में उनकी हिंसा को भी तब तक कुचलना है, जब तक वे इन्साफ की बात नहीं मान लेते तो निश्चित ही अधिकांश लोग हथियार डाल कर बातचीत को राजी हो जायेंगे. उन्हें सबसे पहले यही बताया जाए कि अब पहले की तरह सरकारी बदमाशी नहीं चलेगी, लेकिन उनकी हिंसा के साथ भी कोई रियायत नहीं बरती जायेगी.

कुछ मामले ऐसे हैं, जिन पर हम जैसे लोग नहीं कह सकते. उन पर उस इलाके के अनुभवी और न्यायप्रिय लोगों और ईमानदार पुलिस अधिकारियों से तत्काल राय ली जाय. मीडिया की खुदगर्ज़ सनसनी को कड़ाई से कुचला जाए. यह सब कौन करेगा?

इस मामले पर रोज़ अच्छे-सच्चे लोगों के बयान आ रहे हैं तो जाहिर है, उनका सम्मेलन हो और एक संतुलित नीति बने. प्रकाश सिंह जी के पास ऐसे लोगों की सूची है. पहल वही करेंगे. इशारा उन्होंने कर ही दिया है कि अब वक्त आ गया है. इसे ही ईश्वर की मर्ज़ी कहा जाता है. वह हमारे ज़रिये ही अंगडाई लेती है. प्रकाश जी टाल तो गए, मगर भीतर की खबर है कि उन्हें मीडिया के बहुत अच्छे साथी भी मिल गए हैं. समाज और सरकार में ऊंचे आसनों पर बैठे लोग जान लें कि अगर वे एक संतुलित समाज की रचना में हार्दिक रूप से निचले तबके के नागरिकों से हाथ नहीं मिलायेंगे तो चाहे उन्हें लाल किले के सामने गोली न भी मारी जाए, सिपाही और नक्सलवादी एकजुट होकर उन्हें गोली से उड़ा देंगे.

प्रकाश जी सही कहते हैं कि ज़बरदस्त परिवर्तन का वक्त सामने है. भ्रष्ट लोगों ने इतने पाप कर लिए हैं कि उन्हें गोली से उड़ाने वाला हर नौजवान भगत सिंह कहलायेगा. इन्कलाब ! जिंदाबाद !!
 
   
 

sunder lohia (lohiasunder2@gmail.com) mandi himachal pradsesh

 
 पहले तो लगा कि पुलिसिया बयान है. पूरा साक्षात्कार पढ़ने के बाद लगता है, ये तो एक सच्चे देशभक्त की आवाज है. काश, इनका सपना हरेक हिंदुस्तानी का सपना बन सके और अगले कुछ सालों में इसे पूरा होते देख सकें. 
   

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