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प्रकाश सिंह से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
संवाद
माओवादियों से बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार
प्रकाश सिंह
से
आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
उत्तर प्रदेश और बीएसएफ के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह का कहना है कि भारत का लोकतांत्रिक ढ़ांचा इतना कमजोर हो गया है कि वह किसी भी आपात स्थिति में ढ़ह जायेगा. भारत के माओवादी आंदोलन को करीब से जानने-समझने वाले प्रकाश सिंह मानते हैं कि केवल पुलिस के सहारे माओवादी आंदोलन से मुकाबला संभव नहीं है. वे फिलहाल माओवादियों से किसी भी तरह की बातचीत के खिलाफ हैं. उनका कहना है कि सरकार पहले अपनी स्थिति मजबूत करे, फिर बातचीत का कोई सार्थक परिणाम निकलेगा. यहां पेश है उनसे हाल ही में की गई बातचीत के अंश.
•
कई सालों के बाद एक बार फिर सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत की पहल हो रही है. क्या आपको ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष इस बातचीत के लिये सच में तैयार हैं ? क्या ऐसा कोई संवाद संभव है?
बातचीत का दरवाजा तो हमेशा खुला रखना चाहिये. संवाद तो होना चाहिये. लेकिन जब तक
बातचीत के लिये दोनों पक्षों की तरफ से गंभीरता नहीं हो, ईमानदारी नहीं हो कि
वास्तव में वो बातचीत के द्वारा समस्या का हल निकालना चाहते हैं तब तक यही माना
जायेगा कि यह बातचीत केवल एक प्रोपगेंडा वैल्यू के लिये की जा रही है. और दूसरों को
दिखाने के लिये की जा रही है कि हम तो शांति चाहते हैं. अगर इस तरह से दूसरों को
दिखाने के लिये केवल ये ड्रामा हो रहा है तब तो उस बातचीत का कोई मतलब नहीं निकलता.
बातचीत का मतलब एक ईमानदार इच्छा से है कि हां, हम शांतिपूर्ण ढ़ंग से इस समस्या का
समाधान चाहते हैं और हम ये मानते है कि हिंसा से इसका कोई हल नहीं निकलना है.
मुझे ये लगता है कि अभी तक जो कुछ पहल हुई है, वो केवल लोगों को भरमाने के लिये,
दिखाने के लिये, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये हुई है कि देखिये, हम तो शांति
चाहते हैं परंतु दूसरा पक्ष नहीं मान रहा है.
मैं नहीं मानता कि किसी की तरफ से भी बातचीत के लिये बहुत गंभीरता रही है. मैं ये
भी मानता हूं कि वर्तमान समय और माहौल शांति वार्ता के लिये सही नहीं है
जब एक तरफ तो हिंसा का तांडव हो रहा है, एक के बाद एक घटनायें हो रही हैं, ऐसे में
बातचीत कैसे हो सकती है ?
सिल्जा में ईस्ट्रन फ्रांटियर राइफल पर हमला हुआ. फिर छत्तीसगढ़ में चिंतलनार में
75 सीआरपीएफ के जवान मारे गये. फिर एक दूसरी घटना में बीस के करीब जवान मारे गये.
फिर कोरापुट में घटना हुई, राजधानी एक्सप्रेस में घटना हुई, ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस
में घटना हुई. इस तरह से जब हिंसा की घटनाओं का क्रम बना हुआ है तो इस पृष्ठभूमि
में शांति-वार्ता का कोई मतलब नहीं निकलता है.
ऐसे माहौल में अगर माओवादी ये कहते है कि हां, हम शांति चाहते हैं तो हमें उस पर
विश्वास नहीं होगा.
•
तो रास्ता क्या है ?
जो राजसत्ता को चुनौती दे रहा है, उसके ऊपर तो अंकुश लगाना ही पड़ेगा. हिंसा को लगाम
लगा कर रखना ही पड़ेगा. इसका कोई विकल्प है नहीं और इसके लिए सशस्त्र कार्रवाई ही
करनी पड़ेगी. भारत सरकार को सशस्त्र कार्रवाई करते हुये इन पर हावी होना पड़ेगा. यह
दिखाना पड़ेगा कि भारत की, भारतीय सत्ता की ताकत ज्यादा बड़ी है और इससे सामना करने
का, इसको चुनौती देने का, इससे मुकाबला लेने का दुस्साहस मत करो वरना तुम्हारा
नुकसान होगा.
जिस दिन ये संदेश चला जायेगा कि भारत सरकार के पास माओवादियों से कहीं ज्यादा ताकत
है और वह माओवादियों पर हावी हो सकती है, जिस दिन उनको भौतिक रूप से जमीन पर ये बात
समझ में जा जायेगी, उस दिन माओवादी भारत सरकार की पहल पर गंभीरता के साथ
शांतिवार्ता के लिए सामने आयेंगे. उस समय जो वार्ता होगी, वह सार्थक होगी और उस समय
जो बातचीत होगी, जो संवाद होगा, उसके सार्थक परिणाम की आप आशा कर सकते है.
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नक्सल आंदोलन का सरकार जिस तरीके से मुकाबला कर रही है, उसमें कारपोरेट
घरानों की बड़ी भूमिका देखी जा रही है. आपको लगता है कि इस तरह कारपोरेट के
हित-अहित को ध्यान में रखकर नक्सलियों के साथ की जा रही लड़ाई का कोई खास मतलब निकल
पायेगा ?
कारपोरेट की भूमिका मेरे समझ में नहीं आयी. हां, कारपोरेट जगत ये जरूर चाहता है कि
नक्सलवाद को कुचल दिया जाये. क्योंकि उनकी रुचि इस बात में है कि वो उद्योग लगायें.
वो चाहते हैं कि उनके जो एमओयू साईन हो चुके हैं, उस पर कार्रवाई हो. उनकी योजनाओं
की नींव पड़े. कारपोरेट जगत का जो आर्थिक हित है, उसमें तो वे चाहते हैं कि
माओवादियों को हटाया जाये. पर मै ये कहता हूं कि पहली बात तो कि आंदोलन को जो ये
लोग कुचलने की बात कहते हैं, मैं उस भाषा से सहमत नहीं हूं. आंदोलन पर हमें लगाम
लगानी होगी.
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किशनजी जिस
तरह से बड़बोले की तरह हांकते हैं, बड़ी-बड़ी बात करते हैं कि हम राइटर्स
बिल्डिंग उड़ा देंगे, हम शहरी युद्ध छेड़ेंगे करेंगे तो इस तरह की
बहकी-बहकी बातें वो शांतिवार्ता में भी करेंगे. |
मैंने कहा न कि सरकार को अपना वर्चस्व स्थापित करना पड़ेगा और ऐसे तरीके से कि
माओवादियों को ये समझ में आ जाये कि सरकार की ताकत हमसे बड़ी है और अगर हम फिर भी
लड़ते रहेंगे तो शायद हमारा खात्मा हो जायेगा. खात्मा भारत सरकार को नहीं करना
चाहिये, भारत सरकार इतना ही दबाव डाले कि वह अपने आप को एक सीमित दायरे में समेट
लें. उनको समझ में आये और अपनी औकात सही ढंग से उनको समझ में आ जाये. उस स्थिति में
आने के बाद भारत सरकार को पहल करनी होगी और उनको ओवर ग्राउंड लाने के लिये
प्रोत्साहित करना होगा. मैं समझता हूं, उस समय वार्ता का सही माहौल बनेगा.
आज की तारीख में अगर आप बात करने के लिए उनको बुलाइयेगा, तो किशनजी जिस तरह से
बड़बोले की तरह हांकते हैं, बड़ी-बड़ी बात करते हैं कि हम राइटर्स बिल्डिंग उड़ा देंगे,
हम शहरी युद्ध छेड़ेंगे करेंगे तो इस तरह की बहकी-बहकी बातें वो शांतिवार्ता में भी
करेंगे और वे ये चाहेंगे कि भारत सरकार को हम अपनी शर्तों पर दिशा-निर्देश दें. ऐसे
वातावरण में बात तो नहीं हो पायेगी.
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बात कुछ दिनों बाद ही हो पायेगी, कुछ महीनों बाद हो पायेगी, जब भारत सरकार द्वारा
जो अभियान चलाया जा रहा है, उसके कुछ सार्थक परिणाम आने शुरू हो जायेंगे ओर उस
परिणाम के आने में मुझे कोई संदेह नहीं है. हो सकता है कि पहला राउंड माओवादियों ने
मार लिया हो. सीआरपीएफ को दंतेवाड़ा में उन्होंने नीचे दिखाया हो, और जगह भी कुछ
घटनाएं हुईं . पर ये दूसरे, तीसरे दौर में देखेंगे कि धीरे-धीरे तस्वीर बदलनी शुरु
होगी. ये लंबी लड़ाई है. कोई ऐसा नहीं है कि छह महीने में खत्म हो जायेगी. ये लड़ाई
तो कम से कम तीन साल चलेगी ही चलेगी.
इसके बाद आप देखियेगा कि हो सकता है कि दूसरे दौर में भी कुछ पलड़ा माओवादियों का
भारी रहे पर धीरे-धीरे आप देखेंगे कि शनैः-शनैः सुरक्षा दल दूसरे-तीसरे दौर से अपनी
पकड़ मजबूत बनाने लग जाएगी और पांचवें छठवें दौर से माओवादियों को ये लगेगा कि अब
जरा मुश्किल हो रही है, अब लड़ना मुश्किल हो रहा है. पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी
वगैरह जो है, उनको दो-चार झटके लगेंगे और झटके लगेंगे, उसमें कोई संदेह नहीं है.
समय की बात है. झटके लगेंगे तब उनको समझ में आ जायेगा कि हम जो कर रहे हैं, ये
अभियान सफल नहीं हो सकता है और हमारी और हमारे समर्थक की खैरियत इसी में है कि भारत
सरकार से शांतिवार्ता की जाये, जिसकी वो पेशकश कर रहे हैं.
• तेलंगाना और नक्सलबाड़ी से लेकर आज के बस्तर तक के सारे सशस्त्र आंदोलन
पिछली शताब्दी के एक बहुत बड़े कालखंड में छाये रहे हैं. 43 साल बाद फिर से यह
समस्या जिस तरह से सामने है, आपको लगता है कि जिस तरह की स्थितियां हैं, उसमें तीन
साल बाद अगर माओवादी आंदोलन खत्म भी हो जाये तो भी आने वाले दिनों में ऐसा ही कोई
सशस्त्र आंदोलन फिर से शुरु नहीं होगा ? खास तौर पर आज जो सामाजिक-आर्थिक स्थितियां
हैं, उसमें तो इस तरह के आंदोलन के उभरने की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी ?
देखिये, तीन साल की जो बात मैं भी कह रहा हूं या प्रधानमंत्री भी इस तरह की कल्पना
करते हैं, गृहमंत्री महोदय भी करते हैं. इस समस्या के दो पहलू है. एक तो
अस्त्र-शस्त्र क्रांति वाला पहलू है और दूसरा पहलू ये है कि किन कारणों से सशस्त्र
क्रांति की शुरूआत हुई और सशस्त्र क्रांति का औचित्य बना.
माओवादियों का जो सशस्त्र बल है, उनसे तो हम तीन साल में निपट लेंगे. जो विकास का
मुद्दा है, जो गवर्नेंस की बात है... गवर्नेंस से मेरा मतलब है कि कोई गांव कितना
भी सूदूरवर्ती हो, वहां हमारा प्राथमिक चिकित्सा केंद्र काम करे, हमारा प्राथमिक
स्कूल काम करे, स्वच्छ पानी की व्यवस्था हो, सड़क हो, वहां पेड़ हों, हो सके तो बिजली
भी हो वहां पर. ये सब जो गवर्नेंस से संबंधित जो मुद्दे हैं, इसको ईमानदारी से
सरकार को सुलझाना पड़ेगा और नहीं किया तो आप दो-तीन साल बाद माओवादी आंदोलन को दबा
लेंगे. लेकिन हो सकता है कि दस साल बाद ये समस्या फिर से और ज्यादा उग्र रूप से
हमारे सामने आ जाये.
इस समय जो उग्रता आप देख रहे हैं, ये माओवादियों के फिर से खड़े होने का तीसरा अवसर
है. सत्तर के दशक में हमने समझा कि करीब-करीब इस समस्या को हमने दबा लिया. नब्बे के
दशक में हमने समझा, इसको दबा लिया. लेकिन चूंकि हम इसके मूल कारणों में नहीं जाते,
इसलिए ये समस्या और ये आंदोलन हर बार एक उग्र रूप में हमारे सामने आता है.
90 के दशक में जब कोंडापल्ली सितारम्मैया ने इस आंदोलन में फिर से जान भरी, तो यह
बड़े उग्र रूप में हमारे सामने आया. उसको हमने दबा दिया तो 2007 के बाद से ये बड़े
भयंकर रूप में आया है. 2007 से जो भयंकर रूप में आया, अगर उसको 2012-14 तक दबा
देंगे, फिर हम कुछ नहीं करेंगे और इसी तरह से बेईमानी से हुकूमत करते रहेंगे तो
मालूम होगा कि 2020 में ये और ज्यादा भयंकर रूप में सामने आ गया. तो इस समस्या का
दूरगामी समाधान ढूढना होगा.
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अगर राजनीतिक
नेतृत्व और प्रशासन में निश्चिंतता आ गई कि बेईमानी का जो रास्ता था,
उसी तरह चलने दो. तो ये समस्या तो हमारे पास फिर लौटकर आयेगी. |
सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, छत्तीसगढ़ पुलिस, झारखंड पुलिस इसका केवल सशस्त्र
क्रांति वाला पहलू दबा सकते हैं. पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी की ताकत को कम कर
सकते हैं. उसको बेअसर कर सकते है. पर जिन मूलभूत कारणों से ये आंदोलन बढ़ रहा है,
अगर हमने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, उस समस्या का निदान नहीं किया तो ये समस्या
हमारे साथ बनी रहेगी. सशस्त्र बल आपको अस्थायी समाधान दे देंगे पर उसको फिर स्थायी
समाधान बनाने के लिए हमें प्रशासन, सरकार का जो प्रशासनिक तंत्र है, उसको सक्रिय
होना पड़ेगा और ईमानदारी से गवर्नेस का जो पहलू है, उसको सकारात्मक स्वरूप देना
पड़ेगा.
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आपने दो शब्द इस्तेमाल किये. पहला- बेईमान हुकूमत और दूसरा मूलभूत समस्या.
आपको लगता है कि ये जो बेईमान हुकूमत है, वह मूलभूत समस्या को लेकर गंभीर है ?
देखिये गंभीर तो हैं इस बार. इस समय तो सरकार मजबूरी में है क्योंकि उनको लाले पड़ रहे हैं. इस
समय तो मजबूरी में हैं. माओवादी समस्या पर सशस्त्र बल जब हावी हो जायेंगे तो फिर ऐसा
न हो कि फिर ये पुराने ढर्रे पर चले जायें. ऐसा भी हो सकता है. अब ये तो राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर करेगा. अगर राजनीतिक नेतृत्व सख्त रहेगा,
गवर्नेंस को वास्तव में बेहतर करने की कोशिश करेगा तब तो ठीक है पर अगर राजनीतिक
नेतृत्व और प्रशासन में निश्चिंतता आ गई कि साहब अब तो समस्या टल गई. चलो, फिर थोडे
दिन और लूटपाट कर ली जाये. बेईमानी का जो रास्ता था, उसी तरह चलने दो. तो ये समस्या
तो हमारे पास फिर लौटकर आयेगी.
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• प्रकाश सिंह ने उत्तर प्रदेश में भ्रष्टतम अफसरों के कारनामों की एक सूची
सरकार को दी थी, सबूतों के साथ. उस मामले में क्या कार्रवाई हुई ?
कोई कार्रवाई नहीं हुई. ये लिस्ट मैने केंद्र सरकार को दी, उन्होंने कोई कार्रवाई
नहीं की. सीवीसी को दी कोई कार्रवाई नहीं हुई. प्रदेश सरकार को दिया कोई कार्रवाई
नहीं की गई. भ्रष्टाचार के विरूद्ध जो प्रतिबद्धता होनी चाहिये, वो प्रतिबद्धता आज
भारत सरकार या राज्य सरकार, कहीं नहीं है.
प्रधानमंत्री बात जरूर कर लेते हैं पर उनकी नाक के नीचे भ्रष्टाचार पल रहा है, वो
कुछ नहीं कर पाते. आज सारा तंत्र इस भ्रष्टाचार से दूषित है. अब ये जो मंत्री ए
राजा का जो मामला है, थ्री-जी स्पेक्ट्रम का जो कुछ निकल रहा है, अगर वो सही है तो
ऐसे आदमी को तो उल्टा टांग देना चाहिये. पर डीएमके का दबाव ऐसा है, राजनैतिक विवशता
ऐसी है... आप बतायें, ये राजनैतिक विवशता क्या होती है?
इन मामलों में अगर आपने समझौता किया तो इसके दूरगामी परिणाम बहुत भयंकर निकलेंगे.
सरकार को ये संदेश देना पड़ेगा कि हम भ्रष्ट आदमी को बर्दाश्त नहीं करेंगे, चाहे कोई
भी कीमत हमें देनी पड़े. चाहे उसमें किसी भी पार्टी का प्रतिनिधि क्यों नहीं हो. ये
संदेश हम दे नहीं पा रहे है.
हम हमेशा तराजू तौल कर देखते है कि इस भ्रष्ट आदमी के खिलाफ कार्रवाई करने पर हमारा
तराजू हल्का तो नहीं पड़ जायेगा. हल्का पड़ जायेगा तो भैया, चलो छोड़ दो इसको. तो तराजू
तौलने वाला हिसाब हमे छोड़ना पड़ेगा.
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प्रकाश सिंह जैसे कद्दावर आदमी की आवाज अनसुनी रह जाती है?
नहीं अनसुनी तो... नहीं अनसुनी तो रह ही जाती है, क्या कहें. अब इस समय तो जो
संस्कृति हुकूमत में चल रही है. उस संस्कृति में उसी आदमी की पूछ है, जो आपकी
चमचागिरी करे या आपके पक्ष में बोले. आपकी आलोचना न करे. वो दिन को रात कहे तो रात
कहे, रात को दिन कहे तो दिन कहे तो ठीक है. प्रकाश सिंह जैसे आदमी को एक व्यवस्था
निंदक मेरे ख्याल में माना जाता है... ये लोग कुछ पागल लोग हैं, जो व्यवस्था के साथ
जुडने को तैयार नहीं हैं और व्यवस्था की हमेशा खामी निकालने के लिए तैयार रहते हैं.
मैं समझता हूं कि आज के परिवेश में शायद मुझे व्यवस्था निंदक के रुप में गिना
जायेगा.
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आम आदमी क्या करे ?
आम आदमी को आवाज उठानी पड़ेगी.
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ऐसी आवाज़, जो अनसुनी रह जाये, जैसे प्रकाश सिंह की आवाज़ रह जाती है.
कोई बात नहीं, प्रकाश सिंह कोई हताश नहीं है. देखिये प्रकाश सिंह व्यक्तिगत
तौर पर रोज लड़ते ही रहते है. समाज की जो तस्वीर है, वह तो हम सामने रखेंगे. पर
प्रकाश सिंह ने हथियार नहीं डाले.
प्रकाश सिंह आज भी लड़ रहे हैं और इस बात को देखते रहते हैं कि कभी केंद्र सरकार,
कभी राज्य सरकार या कोई भी सरकार हो, प्रकाश सिंह को अगर गलत लगता है तो वे उनके
खिलाफ बोलते रहते हैं. जब तक मेरी मानसिक और बौद्धिक शक्ति सक्रिय रहेगी, मैं लड़ता
रहूंगा. लड़ना हमारा काम है, बाकी ईश्वर के हाथ में है. लेकिन अगर हम हाथ पर हाथ धर के
बैठ जायेंगे कि कुछ नहीं हो सकता, ऐसा सोचना भी गलत है.
समाज का हर आदमी इसमें अपनी पहल कर सकता है, अपना योगदान कर सकता है. दुर्भाग्य से
ज्यादातर लोगों ने ये मान लिया है कि साहब, हम अकेले, एक नागरिक क्या कर सकता है.
एक नागरिक बहुत कुछ कर सकता है. मैं भी तो एक नागरिक हूं. पर पुलिस सुधार के मामले
में पूरे हिंदुस्तान की सारी सरकारें और सारी इकाइयां हिल गई. मैंने अकेले ही आखिर
करके ही तो दिखाया. मेरे पास कोई और साधन नहीं था और एक अकेले आदमी की ताकत थी.
मेरी बुद्धि थी और मेरी कलम थी. तो हर आदमी कर सकता है पर उसके लिए संघर्ष करना
पड़ेगा और संघर्ष करते रहियेगा तो थोड़ी-बहुत सफलता तो मिलेगी ही मिलेगी.
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उसने हथियार
उठाया है तो कहीं न कहीं उसका औचित्य बनता है. फिर भी संवैधानिक अधिकार
प्राप्त सत्ता एक ही हो सकती है, दो नहीं हो सकती. |
दुर्भाग्य से ज्यादातर लोग ये सोचते हैं कि भई, कौन इस चक्कर में पड़े. अपने राजरंग
में सब लोग ज्यादा मस्त हैं.
मैंने कहा न कि आज का मध्यम वर्ग जिसको कि प्रगति के लिये, समाज के लिए, व्यवस्था
परिवर्तन के लिये अपनी आवाज बुलंदी से उठानी चाहिये, वो मध्यम वर्ग अपने रागरंग में
मस्त है. धनोपार्जन में लगा हुआ है. भोग-विलास में लगा हुआ है. अब समाज की चिंता
उसने छोड़ दी है. देश की बात उसने सोचना छोड़ दिया है. वो समृद्ध हो, उसका परिवार
समृद्ध हो, उसके एक बंगले से दो बंगले हो जायें, एक कार से दो कार हो जाये, एक करोड़
से दस करोड़ हो जाये, दस करोड़ से सौ करोड़ हो जाये. इसी में आम आदमी लगा हुआ है.
•
आपने हथियार नहीं डाले लेकिन इसी अव्यवस्था के खिलाफ तो आंध्र में, बस्तर
में, झारखंड में लोगों ने हथियार उठा लिये क्योंकि उनकी आवाज़ अनसुनी रह गई. फर्क
कहां है ?
मैंने कहा कि उनके हथियार उठाने में और उस आतंकवादी के हथियार उठाने में
हमें फर्क करना पड़ेगा, जो देश को तोड रहा है. जिसने हथियार उठाया है, उसको पहले
समझाकर या उसको हथियार के द्वारा उसे पहले तो निहत्था करना पड़ेगा. कानूनी कार्रवाई
करनी पड़ेगी. कानूनी कार्रवाई, वह तो मजबूरी है. निहत्था करने के बाद हमें उसको सही
रास्ते पर लाना पड़ेगा और फिर उसे समझाना पड़ेगा और फिर जिन कारणों से उसने हथियार
उठाये हैं, उसका निदान करना पड़ेगा. उसको अपनी गंभीरता बतानी पड़ेगी.
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उसने हथियार उठाया है तो कहीं न कहीं उसका औचित्य बनता है. फिर भी एक राज्य के अंदर
जब हुकूमत चलती है तो वैधानिक तरीके से गठित सरकार के द्वारा ही. संवैधानिक अधिकार
प्राप्त सत्ता एक ही हो सकती है, दो नहीं हो सकती. जैसा कि मैं बार-बार कहता हूं कि
देयर केन नाट बी स्टेट विदिन ए स्टेट. सत्ता तो एक ही रहेगी और इस समय सही या गलत,
अच्छी या बुरी, एक वैधानिक तरीके से गठित सरकार है और उसको जो चुनौती देता है, वह
बागी माना जायेगा.
हां, उसके पास कुछ कारण हो सकते हैं. बागी भी कई तरह के होते है, एक बागी जिसके ऊपर
अत्याचार हुआ है, उसको किसी चीज से बेदखल किया गया है, इसलिए वो बागी हो गया है.
उसकी भावनाओं को समझकर, ठीक से उसे हथियारबंद आंदोलन से जरूर बाहर करिये, पर उसको
उसकी जमीन वापस दे दीजिये. दूसरा बागी जो हिंदुस्तान को तोड़ने आ रहा है कि यहां
सांप्रदायिक दंगे हो जायें या हम लोकतंत्र को ध्वस्त कर दें, इनकी अर्थव्यवस्था को
तोड़ दे, उस बागी को तो हम गोली मार देंगे.
• तो आप नक्सलवाद और आतंकवाद दोनों में फर्क कर रहे हैं ?
बिल्कुल, फर्क तो करना पड़ेगा. फर्क करना पड़ेगा और हमें दोनों को अलग तराजू
में रखकर, अलग ढंग से उसका समाधान करना पड़ेगा. मैं तो बल्कि ये कहूंगा कि समस्या को
सही ढंग से, सही तरीके से उसकी नब्ज पकड़ने की जरूरत है, फिर उसी हिसाब से उसका ईलाज करना होगा.
ये नहीं कि हर आदमी, जो हथियार उठाये उसको एक ही नुस्खा दें- गोली मार दो. ये तो
समाधान नहीं है.
जब हम सीमा पार पर थे तो हमारा हुक्म था कि जो रात को सीमा पार कर रहा है तो ये मत
देखो कि कौन है. रात को सीमा पार कर रहा है तो गोली मार दो. फिर उसके बाद हम
देखेंगे कि कौन है. रात को तुम सीमा पार क्यो कर रहे हो भई, चाहे तुम हिंदुस्तान से
पाकिस्तान जा रहे हो या पाकिस्तान से हिंदुस्तान आ रहे हो. या तो तस्करी कर रहे हो,
हथियार ला रहे हो, आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त हो. तो उसको तो पहले गोली
मारेंगे, उसके बाद उसकी जांच करेंगे.
पर जिस आदमी ने बस्तर में हथियार उठाया है तो हमें सोचना पड़ेगा कि उसने हथियार
क्यों उठाया है? अगर वो दंतेवाड़ा जैसी घटना करने के लिए कृतसंकल्प है तो हमें उसके
खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई भी करनी पड़ेगी. हमें उसके खिलाफ अर्धसैनिक बल भेजना पड़ेगा.
वो हमारी मजबूरी है, संवैधानिक मजबूरी है. मैंने कहा- देयर केन नाट बी स्टेट विदिन
ए स्टेट एंड देयर केन नाट बी ए पैरेरल आर्मी अगेन्स्ट रेगूलर आर्मी. अगर किसी ने
समानांतर सेना खड़ी कर ली, जैसे कि वो कहते है कि पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी...
तो हमें उसे हथियाररहित करना पड़ेगा, काबू करना पड़ेगा.
हम ये नहीं कह रहे हैं कि उनको मार-काट के खतम कर देंगे. पर हमें निहत्था करना ही
पड़ेगा और काबू में लाना ही पड़ेगा और ऐसा करने के लिए जितने बल प्रयोग की आवश्यकता
होगी, हम करेंगे. बल प्रयोग करने के बाद जो आत्मसमर्पण करेंगे, गिरफ्तार होंगे उनका
हम पुनर्वास करेंगे. फिर से उनकी शिक्षा की व्यवस्था करेंगे, फिर से उनको समझाएंगे.
उनके साथ जो अन्याय हुआ है, कोशिश करेंगे कि उस अन्याय से उनको निजात मिले. हो सके
तो उन्हें पुलिस में भर्ती कर लेंगे. जैसा नागाओं में था. जब वहां नागा विद्रोही
लीड कर रहे थे, जो बागी नागा आर्मी थी, उससे बीएसएफ की दो बटालियन खड़ी कर ली. वो
बीएसएफ की बटालियन आज भी है. तो उनका पुनर्वास करना पड़ेगा.
• लेकिन जो लोकतांत्रिक ढांचा हमारे सामने है, उसमें इस तरह की स्थिति संभव
है?
देखिये लोकतांत्रिक ढांचा तो मूलत: बहुत अच्छा ढांचा है. ये दुर्भाग्य की
बात है कि उस ढांचे में आज हिंदुस्तान में बहुत विकृतियां आ गई हैं, ये दूसरी बात
है. और उन विकृतियों के आने से इस तरह के काम करने में दिक्कतें आने लगी हैं. पर
जितना भी संभव है, इस विकृत और भ्रष्ट राज्य में प्रयास तो हमें करना ही पड़ेगा.
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सफलतायें तो
अलग छोड़िये, जो कुछ नुकसान हुए हैं, जहां सीआरपीएफ के लोग इतनी संख्या
में मारे गये, उसका मुख्य कारण तालमेल की कमी है. |
• इससे पहले भी आंध्र में बातचीत की कोशिश हुई है. आपने उसे पास से देखा है.
अब पी चिदंबरम फिर से बातचीत की कोशिश कर रहे हैं. पिछली असफलताओं को देखते हुए
आपको लगता है कि बातचीत की ईमानदार कोशिश नहीं हुई या इसमें कहीं कोई बेईमानी है ?
बेईमानी क्या है, मैं कहूंगा अभी समय नहीं आया. मैंने कहा कि शांति वार्ता
तभी हो सकती है, जब उसके लिए एक माहौल बने. उसके लिए गंभीरता हो. वो गंभीरता तभी हो
सकेगी, जब पहले तो भारत सरकार को अपना वर्चस्व, अपना प्रभुत्व स्थापित करना पड़ेगा.
आज की तारीख में वार्ता का कोई मतलब नहीं है. किशनजी आयेंगे और ऐसी बात करेंगे जैसे
बराक ओबामा आ गये हैं. बेवकूफों जैसी बातें करेंगे, अनर्गल प्रलाप करेंगे, बड़ी-बड़ी
मांगे रखेंगे. जिन मांगों का कोई मतलब नहीं है, उसे कोई सरकार स्वीकार नहीं करेगी.
पहले एक बार अपना वर्चस्व स्थापित करिये, फिर वार्ता का प्रस्ताव दीजिये. माओवादी
वार्ता के लिए स्वयं आयेंगे. उसके बाद वार्ता के कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते
हैं.
• छत्तीसगढ़ में राज्य पुलिस और सीआरपीएफ में खूब तनातनी चली है. ऐसे में
आपको लगता है कि नक्सलियों से निपटने में कोई अड़चन आ सकती है ?
अड़चन क्या, बहुत भयंकर अड़चन आ रही है. मैं समझता हूं कि इस अभियान में जो कुछ भी
खामियां है और जो कुछ असफलतायें हुई है, सफलतायें तो अलग छोड़िये, जो कुछ नुकसान हुए
हैं, जहां सीआरपीएफ के लोग इतनी संख्या में मारे गये, उसका मुख्य कारण तालमेल की
कमी है. और सीआरपीएफ ने जो गलतियां की वह अपनी जगह हैं लेकिन तालमेल की कमी बहुत
बड़ा कारण है. अगर अच्छा तालमेल होता, सामंजस्य होता, समन्वय होता तो शायद इस तरह की
दुखद घटनायें नहीं होती जिस तरह कि दंतेवाड़ा में हुई.
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• छत्तीसगढ़ से सीआरपीएफ के डीजीपी विजय रमन की जिस तरह से विदाई हुई, उनका
मुख्यालय बदला गया, उससे तो लगता नहीं कि सरकारें तालमेल बनाने की कोशिश कर रही
हैं.
नहीं, मेरे ख्याल में उसी तालमेल की ही दिशा में जाकर दो व्यक्तियों के
व्यक्तित्व में इतने टकराव हो रहे हैं तो भई एक व्यक्ति को तो हटाना ही पड़ेगा. या
तो दोनों को हटाइये या एक को हटाइये. तो शायद उन्होंने यही सोचा कि सीआरपीएफ के
स्पेशल डीजी को यहां से कोलकाता भेजा जाये. उसमें कोई विशेष दिक्कत नहीं है, आईजी
सीआरपीएफ है ही यहां पर.
मेरे ख्याल में भारत सरकार ने स्थिति का कुछ आंकलन किया होगा और उनकी समझ में ये
आया होगा. ये मेरी व्यक्तिगत जानकारी में नहीं है कि रमन और विश्वरंजन में अहं की
लड़ाई कहिये, या व्यक्तित्व की लड़ाई कहिये इतना जबरदस्त था कि इस टकराव को हटाने
के लिए एक को हटाना जरूरी ही था. उन्होंने समझा होगा कि स्पेशल डीजी सीआरपीएफ को
कोलकाता में करने से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा और ऐसा उन्होंने किया. हम ये उम्मीद
करते हैं कि शायद जो कुछ दिक्कतें आयी थी, ये कोई गारंटी नहीं है, सिर्फ उम्मीद कर
रहे हैं कि जो कुछ दिक्कतें आयी थी, भविष्य में धीरे-धीरे कम होंगी और ये मतभेद
धीरे-धीरे दूर हो जायेंगे.
• एक बड़ा सवाल सीआरपीएफ के प्रशिक्षण का भी उठा है. राज्य के गृहमंत्री ने
भी कहा कि सीआरपीएफ के जवान इसलिये मारे गये क्योंकि वो प्रशिक्षित नहीं थे.
मेरी सीआरपीएफ के आईजी से बात हो रही थी. उन्होंने मुझे बताया कि कांकेर में
बराबर उनके आदमी जा रहे हैं. 100 या 200 सीट उनको दी जा रही है. उसमें लोग
प्रशिक्षण पा रहे हैं. ये सही है कि उनकी जो कोबरा बटालियन्स है, वह तो ट्रेन्ड है.
बाकी जो यूनिट्स हैं उतनी प्रशिक्षित नहीं हैं. उनका प्रशिक्षण बढ़ाने के लिए जो
आवश्यक कार्रवाई की जानी है, वह शुरू की जा चुकी है.
• छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ सेना के इस्तेमाल का प्रस्ताव
केंद्र सरकार को दिया था. केंद्र सरकार भी सेना के सवाल पर हां और ना, हां और ना कर
रही है. क्या लगता है ?
नहीं, सेना के इस्तेमाल की बात दिमाग से निकाल देनी चाहिये. सेना का इस्तेमाल करना
बहुत ही बड़ी गलती होगी. मतलब कई कारणों से.
पहली बात तो ये है कि अर्धसैनिक बल पर इतनी जल्दी आप अपना विश्वास कैसे खो बैठे?
किसी बल को पर्याप्त मौका दीजिये. मैने कहा न कि पहला दौर अगर उन्होंने जीत लिया तो
इसका मायने यह नहीं है. मैंने कहा कि सात-आठ दौर होंगे. मैं कहता हूं कि देखियेगा
हर दौर के साथ पैरामिलिट्री फोर्सेस की क्षमता धीरे-धीरे अच्छी होती जायेगी. पैरा
मिलिट्री फोर्सेस ने क्या नार्थ-ईस्ट हो, क्या कश्मीर हो, क्या पंजाब हो हर जगह
अपना अच्छा परिचय दिया है. आतंकवाद से निपटने में, अलगाववादियों से निपटने में बड़ी
अच्छी भूमिका निभायी है. इतनी जल्दी आप पैरा मिलिट्री फोर्स पर अपना विश्वास मत
हटाइये.
ट्रम्प कार्ड का इस्तेमाल बहुत कम करना चाहिये. ट्रम्प कार्ड का इस्तेमाल आप
रोज-रोज करने लगे, हर काम के लिये करने लगे तो ट्रम्प कार्ड भी एक साधारण कार्ड हो
जायेगा. ये तो एक तात्कालिक सोच हो जाती है.
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पुलिस सुधार
अभी निचले स्तर की तो बात छोड़ दीजिये, अभी उपरी स्तर पर ही, सरकारों के
स्तर पर ही, भारत सरकार के स्तर पर, राज्य सरकार ही लोगों के गले में
हड्डी अटकी हुई है. |
मैं समझता हूं कि अगर आप दूरगामी सोच को रखें तो चीन की सीमा पर और वेस्ट-नार्थ
पाकिस्तान की सीमा पर कभी भी गंभीर समस्या हो सकती है. आर्मी का ध्यान भटकाइये मत.
भगवान न करे, पर यहां टू-फ्रंट वार और थ्री-फ्रंट वार की बात होती है. टू फ्रंट से
मेरा मतलब पाकिस्तान और चीन से एक साथ और थ्री फ्रंट मतलब पाकिस्तान भी चीन भी और
इधर माओवादी भी. तो एक फ्रंट तो पैरा मिलिट्री फोर्सेस को संभालने दीजिये बाकी दो
फ्रंट आर्मी संभाल रही है. अगर आपने आर्मी को इधर कर लिया तो आर्मी कहां-कहां
लड़ेगी.
• सरकार सेना को लेकर हड़बड़ी में है ?
नहीं हड़बड़ी में नहीं है. लोग विवाद खड़ा करते हैं. मतलब इस देश में कोई भी
इश्यू मिल जाता है तो चर्चा इतनी ज्यादा होती है और टीवी पर उसका इतना मंथन होने
लगता है.... नहीं सरकार ने तो ये कभी नहीं कहा कि वह सेना के इस्तेमाल के पक्ष में
है. जब भी इस बात को उठाया गया तो सरकार ने ये कहा कि सेना की मदद हम ट्रेनिंग के
लिये लेंगे. असैन्य मदद के लिए एयर फोर्स के हेलीकाप्टर दे देंगे. माओवादी हमले में
हताहत होता है तो उस हालत में भी मदद कर देंगे. लेकिन सेना का सीधा इस्तेमाल, जमीन
पर नहीं होना चाहिये.
• आपने पुलिस सुधार को लेकर जो कुछ किया, वो इससे पहले कभी संभव नहीं था.
लेकिन आपकी पुलिस सुधार को लेकर जो रिपोर्ट और अनुशंसा है, वो निचले स्तर पर अब तक
उतर नहीं पा ही है.
अभी निचले स्तर की तो बात छोड़ दीजिये, अभी उपरी स्तर पर ही, सरकारों के स्तर
पर ही, भारत सरकार के स्तर पर, राज्य सरकार ही लोगों के गले में हड्डी अटकी हुई है.
तो न निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं. उगल इसलिए नहीं सकते क्योंकि सुप्रीम
कोर्ट उसमें दबाव डालेगा. पर सुप्रीम कोर्ट का भी जो दबाव होना चाहिये था वह पिछले
तीन वर्षों में थोड़ा कम हुआ था, कुछ विशेष कारणों से. पर अब जो नये चीफ जस्टिस आये
हैं, मैं समझता हूं, वे ज्यादा दिलचस्पी लेंगे. मै समझता हूं कि इस सुधार प्रक्रिया
को जो गति मिलनी चाहिये, वो नये चीफ जस्टिस के कार्यकाल में मिलेगी.
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• पुलिस का चेहरा क्यों नहीं बदल पा रहा है?
देखिये, 145 साल का पाप इतना जल्दी नहीं धुलेगा. 145 साल का पाप है, 1861 से
आज तक का. शायद ज्यादा ही हो गये. इसको धोने में धीरे-धीरे समय लगेगा. पर आवश्यकता
इस बात की है कि पुलिस सुधार की प्रक्रिया का हम सहयोग तो करें. उसको आगे तो
बढ़ायें. उसको उस पुलिस सुधार की प्रक्रिया को सहयोग करने के लिए आगे बढ़ाने के लिए न
तो सरकारें प्रतिबद्ध हैं, नौकरशाही उसमें प्रतिबद्ध नहीं है, राजनीतिक नेतृत्व
नहीं चाहता, जनता भी उदासीन सी है.
मीडिया ने थोड़े दिन तो उसको टेक-अप किया, फिर मीडिया ने भी उसे छोड़ दिया. किसी से
मैंने पूछा तो उनका कहना था कि- पुलिस इज नाट अ सेक्सी सब्जेक्ट. तो आजकल सेक्स,
सेक्स... तो हर चीज में सेक्स होना चाहिये और पुलिस कोई सेक्सी विषय नहीं हो सकता है.
ये बहुत सूखा विषय है. अब उसको नहीं लेते हैं क्योंकि ही डज नाट मेक गुड न्यूज. तो
मीडिया भी आजकल छोड़े हुए है इस विषय को.
• मीडिया से तो आपकी अच्छी दोस्ती है, अच्छा याराना है.
याराना-वराना कुछ नहीं है. मीडिया मेरे पीछे पड़े रहता है. मुझे छोड़ता नहीं
है. पता नहीं मेरी हरकतें कुछ ऐसी हैं कि मीडिया मेरे पीछे पड़ा रहता है. मेरी इमेज
ही ऐसी है. मीडिया के किसी भी व्यक्ति से मेरा याराना नहीं है. मीडिया मुझे घेरे
रहता है, मैं कही भी जाऊं.
• आप खतरनाक तरीके की बात करते हैं- उल्टा लटका दिया जाये, गोली मार दी...
मैं समझता हूं कि कोई उपाय नहीं है, मै समझता हूं कि उल्टा लटकाने का टाइम आ
गया है और ये सरकार नहीं लटकायेगी तो मैं नक्सलियों से कहूंगा कि तुम लटका सकते हो
तो तुम लटकाओ. इस देश के भ्रष्ट आदमियों को तुम अगर गोली मारो तो मैं उनके लिए ताली
बजाने के लिये तैयार हूं.
सरकारें भी भ्रष्ट आदमियों को नहीं लेती, ये मगरमच्छ को मारो. ये सिपाही को मार के
और गांव के तथाकथित मुखबिर को मार के क्या करने वाले हो. मूर्ख हो तुम. मान लीजिये,
आपने हजार सिपाहियों को मार लिया, चलो सौ मरे, मैं कहता हूं हजार मार लिया तो क्या
हुआ. उनकी भर्ती के लिए एक लाख लोग खड़े हो जायेंगे.
इन मूर्खों को ये समझ में आनी चाहिये कि सिपाहियों को मारकर के तुम कुछ नहीं हासिल
करने वाले, कुछ नहीं हासिल करोगे. तुमने अब स्टेट की दमनकारी मशीनरी को अपने घर में
बुला लिया है. अभी तक चैन की बंशी बजा रहे थे. तुम्हारे जंगल में कुछ जगह तुमने
लिबरेटेड जोन स्थापित कर लिये थे. अब धीरे-धीरे अर्धसैनिक बल और राज्य पुलिस का
दबाव बढ़ता जा रहा है. इनकी सारी नीतियां गलत है, क्या कहा जाये? इनके दिमाग की सोच
बड़ी सीमित है.
• आप कुछ औऱ सुझाव भी दे रहे थे.
हां मैं तो मानता हूं कि इस देश के सौ आदमी, सौ भ्रष्ट आदमियों को हर साल
लाल किले के सामने खड़े करा के स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले गोली मार देनी
चाहिये. मारिये आप इनको, नहीं तो ये देश को खा जायेंगे. ये देश को खा रहे हैं. रोज
खा रहे हैं. मैं समझता हूं कि चीन से बड़ा खतरा और पाकिस्तान से बड़ा खतरा,
माओवादियों से बड़ा खतरा भ्रष्टाचार से है. भ्रष्टाचार इस देश को खा जायेगा.
• ये भ्रष्ट व्यवस्था चीन से कैसे लड़ेगी, पाकिस्तान से कैसे लड़ेगी,
माओवादियों से कैसे लड़ेगी ?
किसी से नहीं लड़ सकती. यह भ्रष्टाचार सिस्टम को अंदर से कमजोर बना रहा है.
देश के अंदर यह दीमक की तरह देश को खा रहा है. किसी चुनौती के समय, किसी बड़े भारी
संकट की स्थिति आयेगी तो आप देखेंगे कि लोकतंत्र का इतना मजबूत ढांचा था, इतनी
जल्दी गिर कैसे गया?
देखिये, खाली पुलिस की संख्या, सेना की बल संख्या से देश की ताकत को मत देखिये. देश
की ताकत उसकी संस्थाओं से होती है. देशवासियों के चरित्र से होती है. न तो आज
चरित्र रह गया है और संस्थायें एक-एक करके धीरे-धीरे ध्वस्त होती जा रही है या उनको
नष्ट किया जा रहा है. इसकी असली ताकत उसकी संस्थाओं से होती है और देशवासियों के
चरित्र से होती है. आज ये दोनों लगभग खत्म तो नहीं हुआ है पर हां, दोनों की हालत
बड़ी शोचनीय है.
• आप समझते है कि लोकतंत्र खतरे में है?
बिल्कुल, मैं तो नहीं समझता कि लोकतंत्र तीन-चार साल से ज्यादा चलेगा. कुछ न
कुछ इस देश में तूफान आयेगा, उस तूफान में जिसको आप लोकतंत्र कह रहे हैं, इसको खतम
कर दिया जायेगा.
• माओवादी आपकी इस बात से बहुत खुश होंगे. आप उनके राज की ओर इशारा कर रहे
हैं ?
नहीं. माओवादियों का राज तो कभी नहीं होगा, कभी नहीं होगा. माओवादी भूल
जाये, सपने में भी न सोचें कि उनका राज दिल्ली तक पहुंचेगा. वो छत्तीसगढ़ से आगे भी
नहीं जा पायेंगे. छत्तीसगढ़ में ही टाइड विल टर्न.
• तो फिर होगा क्या?
अब वो मैं नहीं बताउंगा. पर हां, एक तूफान आने वाला है.
• ये कोई सरकारी तूफान है.
बस इस देश में एक तूफान आयेगा. बहुत जबरदस्त परिवर्तन होंगे. ये सारे
लोकतांत्रिक ढांचें ध्वस्त हो जायेंगे. जितने लोग, इस तरह के आदमी जो इस देश का खून
चूस रहे हैं, एक-एक खड़े कर-करके मारे जायेंगे.
• ये भ्रष्ट सरकार, खराब लोकतांत्रिक ढ़ांचा, पथभ्रष्ट माओवादी और कोमा में
गई आम जनता, खास तौर पर मध्यम वर्ग. तो ये बदलाव लायेगा कौन?
इसके लिए आप धैर्य रखिये. धैर्य रखिये, बदलाव आयेगा.
• आप ऐसी कोई गुरिल्ला आर्मी तैयार कर रहे हैं ?
नहीं मैं कुछ नहीं, मेरी क्या औकात है. मैं तो अकेला आदमी हूं. कुछ हैं
ईश्वरीय शक्तियां काम कर रही हैं. बस इतना समझ लीजिये अब.
• मतलब इस देश को ईश्वर के भरोसे छोड़ दिया जाये ?
ईश्वर के भरोसे मत छोड़िये आप. हर आदमी अपना कर्तव्य करे तभी तो ईश्वर की मदद भी
सामने आएगी. ईश्वर नपुंसक आदमी की मदद नहीं करता. ईश्वर भी मदद करता है तो
पुरुषार्थी की ही मदद करता है. जो खाली घंटा हिलाता है और माला जपता है, उसकी मदद
नहीं करता है. पूजा करने के बाद हाथ में तलवार भी उठाता है तब ईश्वर उसकी मदद करता
है और घंटा हिला के और माला जप के सोचें कि भगवान इस देश को संभाल लेगा तो वो नहीं
संभालेगा. तलवार तो उठानी पड़ेगी, कुर्बानी तो देनी पड़ेगी.
20.08.2010,
22.38 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | rajiv (rajivreal@gmail.com) mumbai | | | | सरकार अपना वर्चस्व स्थापित कर के, ताक़त दिखा के समस्या का हल नहीं निकाल सकती. हाँ सरकार अगर फिर से जनकल्याण के रास्ते पर लौटे तो शायद कोई रास्ता निकलेगा. | | | | | |
| | Santosh Kumar Mishra (santoshkumar.mishra@ymail.com) Lucknow,UP | | | | ये सही में ही बहुत ज़रूरी है कि सारी समस्या की जड़ ही काटनी होगी और इससे अच्छा रास्ता और नहीं है. | | | | | |
| | shailendra chauhan (shailendrachau@gmail.com) jammu | | | | ईश्वरीय शक्तियां क्या काम कर रही हैं ? प्रकाश सिंह आखिर कहना क्या चाहते हैं ? सरकारी बदमाशी नहीं चलेगी पर ये देश नेताओं के हाथ में है, प्रकाश सिंह का न कोई संगठन है न कोई पार्टी वह क्या कर सकेंगे, यह अपनी समझ से परे है. | | | | | |
| | bhagat singh (bhagatsingh788@gmail.com) raiouir | | | | तलवार तो उठानी ही पड़ेगी और क़ुरबानी तो देनी ही पड़ेगी, क्या बात हैं कि इसके लिए भगवान का रास्ता देखना पड़ेगा. यही प्रॉब्लम है सेना या पुलिस के रिटायर्ड लोगों के साथ. मेरे पिता सेना से रिटायर्ड थे और हमेशा यही कहते थे कि भ्रष्टाचारियों को गोली मार देना चाहिए, और उनकी सारी बहस आखिरी में भगवान पर ही ख़त्म होती थी.
नक्सलियों से चर्चा नहीं करनी चाहिए क्योंकि वो वार्ता में पूरा राज मांग लेंगे, यही बात इन्होंने रायपुर के प्रोग्राम में कही थी. न तो इन चर्चाओं में कोई सत्ता मांग रहा हैं और न कोई उन्हें दे रहा हैं. मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं बल्कि वैश्विक नीतियों का हैं जो किसी भी तरह से दुनिया में गरीबो को ख़तम करके संसाधनो पर कब्ज़ा करना चाहते हैं. जो इनका विरोध करे वे या तो नक्सलवादी हैं या देशद्रोही. अमेरिका में यह कहा गया था कि "गुड रेड इंडियंस, डेड रेड इंडियंस” और यहाँ कहा जायेगा कि "गुड ट्राइबल्स इस डेड ट्राइबल्स" यानि जो समुदाय बिना किसी विरोध के अपने संसाधन मालिकों को सौंप दे वही अच्छे भारतीय हैं.
प्रकाश जी, माफ़ कीजिये आज भारत में नक्सलवाद को ख़तम करने के बाद भी इस लूट के खिलाफ लड़ाई ख़तम नहीं होने वाली. इसका हल लाल किले पर गोली मारने से नहीं होगा क्योंकि गोली मारने वाला हाथ आप कहां से लायेंगे, ऐसा तो तालिबान भी कहते हैं लेकिन उनके भी हाथ खून से ही रंगे हैं.
नक्सलवाद के तरीके की आलोचना तो हम सब करते हैं लेकिन दूसरा रास्ता दिखता भी नहीं हैं. बता रहे हैं वो तो इस सिस्टम को जरूर रास आएगा ही. आजकल टेलीविज़न पर हजारों साधू यही कह रहे हैं. | | | | | |
| | Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad/Jaunpur | | | | प्रकाश सिंह जी ने बड़ी क्रांति का आमंत्रण दिया है पर जगह बताई है लाल किले के सामने-"हां मैं तो मानता हूं कि इस देश के सौ आदमी, सौ भ्रष्ट आदमियों को हर साल लाल किले के सामने खड़े करा के स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले गोली मार देनी चाहिये. मारिये आप इनको, नहीं तो ये देश को खा जायेंगे. ये देश को खा रहे हैं. रोज खा रहे हैं. मैं समझता हूं कि चीन से बड़ा खतरा और पाकिस्तान से बड़ा खतरा, माओवादियों से बड़ा खतरा भ्रष्टाचार से है. भ्रष्टाचार इस देश को खा जायेगा. " अब इनको कौन बताये कि देश के हर दफ्तर से यह भ्रष्टाचार रूपी जिन्न अवाम को निगल रहा है. यह जिसे भ्रष्टाचार कह रहे हैं, नए युग में शिष्टाचार में बदल गया है, बिना 'घुस' के इनके महकमे में कोई काम नहीं होता. 'अमर कांड''पुलिस भर्ती कांड'आईये उत्तर प्रदेश में किसी मंत्री से बात करिए, काम तभी होगा जब कीमत इतनी होगी जिसको वह 'नोट गिनने की मशीन' से ही गिन पाएंगे. जगह बदलिए उठाईये शस्त्र देखिये शुरुआत कहाँ से ठीक रहेगी- करोड़ों में विधायकी, कई करोड़ों में सांसदी, मंत्रियों की नोटों की माला, जिलाधिकारी, पुलिस के आला अफसर, कुलपतियों की नियुक्ति, सभी आयोगों में भर्तियाँ, यहाँ सबकी कीमत लगती है, क्योंकि इस प्रदेश में 'द्विज-दलित नव जागरण का विस्तार चल रहा है.' उच्च न्यायलय मौन है कि कहीं नव विकास वाधित न हो जाय.क्योंकि यह सब दलित मुख्यमंत्री की देख रेख में चल रहा है. पर प्रकाश सिंह जी कोई कह रहा था- उत्तर प्रदेश में आजकल ईमानदारी बढ़ गयी है 'पैसे लेकर काम कर देते है, यदि किसी ने ज्यादा दे दिया तो कम वाले का पूरा पैसा वापस कर देते है' | | | | | |
| | Akriti kumar bilthare (akriti.bilthare@gmail.com) , Bhopal | | | | ये देश नेताओं के हाथ में है और इन नेताओं को हमने ही अपनी बागडोर सौंप दी है. आलोक जी, आपने सही सवाल किया है कि आखिर कोमा में रह रही जनता कैसे परिवर्तन लाएगी. हम सब कायर लोग हैं, जो अपनी गलतियों के लिये दूसरों को ही जिम्मेवार बता कर भाग लेना चाहते हैं. ऐसा कायर समाज कुछ नहीं कर सकता. माओवादी तो और भी भटकाव वाले रास्ते पर हैं. उनसे अब कोई उम्मीद नहीं बची है. | | | | | |
| | Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas | | | | प्रकाश जी और आलोक जी, आप दोनों के सवाल-जवाब आज के मुर्दा समाज के बीच एक इंकलाब की तरह हैं. बहुत ज़रुरत आ पड़ी है इस चिंगारी को फैलाने की.
प्रकाश जी के तुज़ुर्बे, बयान और उनके भीतर भरी आग आखिरकार वहाँ पहुंचा देती है, जहां समाज, सरकार, न्यायपालिका, मीडिया, सिपाही और अपने ही घर में पैदा किये गए आतंकी एक साथ समझ सकते हैं कि अगर अपनी सुख-सुविधा छोड़ कर सामने वाले की बात ध्यान से नहीं सुनी गई तो दोनों तरफ के लड़के मारे जायेंगे और जीतेगा कोई नहीं. माओवादी और नक्सलवादी अगर भगत सिंह के रास्ते पर नहीं आते और भ्रष्ट लोगों को गोली से नहीं उड़ाते तो अपने लिए एक भी इंच ज़मीन की उम्मीद न करें. उनके बीच जो चेतनाशील लोग हैं, उन्हें जल्दी से फैसला करना होगा समूचे देश के हित में. दोनों तरफ के लड़ाकों को एक-दुसरे को दोस्ती का पैगाम भेजना होगा. वरना न माया मिलेगी न राम.
अगर राजनेता, माओवादी या नक्सलवादी लोगों को प्रकाश जी की बात दो टूक बता दें और साथ में यह भी कि खुद राजनेता एक साधारण आदमी के स्तर पर आकर पूरी ईमानदारी से यह कह रहा है और इसी के साथ यह भी बता दें कि उसे जनहित में उनकी हिंसा को भी तब तक कुचलना है, जब तक वे इन्साफ की बात नहीं मान लेते तो निश्चित ही अधिकांश लोग हथियार डाल कर बातचीत को राजी हो जायेंगे. उन्हें सबसे पहले यही बताया जाए कि अब पहले की तरह सरकारी बदमाशी नहीं चलेगी, लेकिन उनकी हिंसा के साथ भी कोई रियायत नहीं बरती जायेगी.
कुछ मामले ऐसे हैं, जिन पर हम जैसे लोग नहीं कह सकते. उन पर उस इलाके के अनुभवी और न्यायप्रिय लोगों और ईमानदार पुलिस अधिकारियों से तत्काल राय ली जाय. मीडिया की खुदगर्ज़ सनसनी को कड़ाई से कुचला जाए. यह सब कौन करेगा?
इस मामले पर रोज़ अच्छे-सच्चे लोगों के बयान आ रहे हैं तो जाहिर है, उनका सम्मेलन हो और एक संतुलित नीति बने. प्रकाश सिंह जी के पास ऐसे लोगों की सूची है. पहल वही करेंगे. इशारा उन्होंने कर ही दिया है कि अब वक्त आ गया है. इसे ही ईश्वर की मर्ज़ी कहा जाता है. वह हमारे ज़रिये ही अंगडाई लेती है. प्रकाश जी टाल तो गए, मगर भीतर की खबर है कि उन्हें मीडिया के बहुत अच्छे साथी भी मिल गए हैं. समाज और सरकार में ऊंचे आसनों पर बैठे लोग जान लें कि अगर वे एक संतुलित समाज की रचना में हार्दिक रूप से निचले तबके के नागरिकों से हाथ नहीं मिलायेंगे तो चाहे उन्हें लाल किले के सामने गोली न भी मारी जाए, सिपाही और नक्सलवादी एकजुट होकर उन्हें गोली से उड़ा देंगे.
प्रकाश जी सही कहते हैं कि ज़बरदस्त परिवर्तन का वक्त सामने है. भ्रष्ट लोगों ने इतने पाप कर लिए हैं कि उन्हें गोली से उड़ाने वाला हर नौजवान भगत सिंह कहलायेगा. इन्कलाब ! जिंदाबाद !! | | | | | |
| | sunder lohia (lohiasunder2@gmail.com) mandi himachal pradsesh | | | | पहले तो लगा कि पुलिसिया बयान है. पूरा साक्षात्कार पढ़ने के बाद लगता है, ये तो एक सच्चे देशभक्त की आवाज है. काश, इनका सपना हरेक हिंदुस्तानी का सपना बन सके और अगले कुछ सालों में इसे पूरा होते देख सकें. | | | | | |
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