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के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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गिरीश तिवाड़ी ’गिरदा‘ से पीयूष पंत की बातचीत

संवाद

आज बंदरिया नचानेवाला ही कोई नहीं

गिरीश तिवाड़ी ’गिरदा‘ से पीयूष पंत की बातचीत

 

पिछले महीने की 22 तारीख को जनकवि ‘गिरदा’ का देहावसान हो गया. गिरदा यानी हिंदी के ’गिरीश तिवाड़ी‘ और कुमांऊनी के ’गिरदा‘. अपनी बीमारी का इलाज कराने ’गिरदा‘ जब नैनीताल से दिल्ली आए थे तब यह बातचीत हुई थी. भूमंडलीकरण के इस दौर में किसी जनकवि से साक्षात्कार हो जाना अगर असंभव नहीं तो अविश्वसनीय ज़रूर लगता है. ऐसा इसलिए क्योंकि आज हमारे सारे क्रिया-कलाप बाज़ार की शर्तों पर ही तय होने लगे हैं. जन सरोकारों के प्रति हमारी संवेदना इतनी शून्य हो चुकी है कि जनता के सुख-दुख, उसकी व्यथा-कथा कहने-सुनने की न तो हमें फ़ुरसत है और न ही कोई रूचि. ऐसे में जन सरोकारों को ही अपनी रचनाओं का विषय बनाने वाला कवि वास्तव में जनता का कवि ही कहलाया जाना चाहिए. उन्नीस सौ साठ व सत्तर के दशक में बाबा नागार्जुन के रूप में हमारे पास एक जनकवि था जिसे पढ़ने और जिसको मिलने में हमें सुकून तो मिलता ही था, हमारी हिम्मत भी बढ़ती थी. कुछ ऐसा ही अहसास होता था ’गिरदा‘ से मिलकर. वही ’बाबा‘ जैसी सादगी, भोलापन और कविता पाठ में बालकों जैसी उत्सुकता. अपनी बीमारी का इलाज कराने ’गिरदा‘ जब नैनीताल से दिल्ली आए थे तब यह बातचीत हुई थी.

girda

 

आज चारों तरफ खुद को भुनाने की होड़ लगी है. ऐसे में जन सरोकारों को ही अपने लेखन के केंद्र में बनाए रखना क्या मुश्किल नहीं लगता ?

देखो भाई, ये होड़ कब नहीं थी. सामाजिक कर्म में ये होड़ हमेशा ही थी. हां, अंतर इतना था कि साहित्य में पहले यह होड़ गलाकाट न होकर लेखक की उत्कृष्टता पर आधारित थी. भई, ये क्यों भूलते हो कि जनवाद को बेचने की होड़ तो तब भी थी. हां, आज फर्क यह आ गया है कि अब साहित्यिक कर्म से जनता का मर्म गायब होता जा रहा है. भइया! ये कह लो कि जनवाद को बेचते-बेचते अब कवि-लेखक खुद को बेचने लगे हैं.

आप तो आज भी जनता से जुड़े मुद्दों, आम आदमी के जीवन संघर्षों, दुख-दर्दों और राजनेताओं के गिरते मूल्यों को अपने रचना कर्म का आधार बनाए हुए हैं? खासकर उत्तराखंड के संदर्भ में.

नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है. देख यार पीयूष! मैं ठैरा पहाड़ का एक आम आदमी, मैं उत्तराखंड में रहता हूं, मैंने अपनी भूमि को धन-धान्यपूर्ण देखा है, मैंने उस कोसी को देखा है जो पहाड़ के लोगों की जीवन रेखा रही है, जो न केवल यहां के लोगों की प्यास बुझाती रही है, खेतों को पानी देती रही है बल्कि पंचभूत में विलीन काया की राख को अपने आगोश में समाती रही है. आज वही कोसी सूख चुकी है, लोग अपने मृतकों की राख तक बहाने के लिए तरस जाते हैं. उन्हें शवदाह के लिए कोसों दूर जाना पड़ता है. उधर विकास के नाम पर नदियों पर बड़े बांध बनाने के चलते लोगों के लिए जल संकट अधिक गहरा गया है. रही-सही कसर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पूरी हो गयी. कहां तो हमने सोचा था कि अलग राज्य का बनना हमारे लिए खुशहाली लेकर आएगा लेकिन हुआ इसका उल्टा. अब तो उत्तराखंड, नेताओं और ठेकेदारों की मिली-जुली लूट का चारागाह बन गया है.


सच कहता हूं यार! ये सब मुझे इतना कचोटता है कि मेरा दर्द मेरी कविताओं के रूप में उभर आता है.

शायद इसीलिए आपको उत्तराखंड का ’जनकवि‘ कहा जाता है.

अरे, नहीं, नहीं. ये तो लोगों का प्रेम है शायद. उन्हें लगता है कि मैं उनकी भाषा में उनके ही सरोकारों को अभिव्यक्ति दे रहा हूं.

क्या यही वजह है कि आपकी ज़्यादातर कविताएं कुमाऊंनी भाषा में है और लोक गीतों पर आधारित हैं.

यार, आखिर मैं भी तो उन्हीं लोगों में से ही हूं, उनकी भाषा ही मेरी भाषा है. और फिर अपनी भाषा में अभिव्यक्त किए गए उद्गार ज़्यादा सशक्त होते हैं.

वैसे तुझे बता दूं कि मैं वाचिक परंपरा का कवि हूं. मेरी कविताएं पढ़ने से ज्यादा सुनने के लिए हैं. हो सकता है कि मेरी कविताओं को पढ़ने से वो प्रभाव पैदा न हो सके, जो मेरे द्वारा उनका पाठ करने से या गा कर सुनाने से.

अच्छा, गिरदा, यह जो उत्तराखंड में नदियों को बचाने का आंदोलन चल रहा है, उसे आप किस तरह से देखते हैं?

यह एक सकारात्मक पहल है. पूरे उत्तराखंड में इसको लेकर 13 यात्राएं निकाली गयीं. आम मानस में चेतना तो विकसित हुई है. कुछ इसे आंदोलन कहते हैं, तो कुछ इसे एक अभियान कहते हैं. कई तरह की धाराएं हैं इसमें- सर्वोदयी धारा, गांधीवादी धारा, एनजीओवाली धारा. फिर रवि चोपड़ा है, राधा भट्ट हैं और सुरेश भाई हैं. तो कहीं न कहीं इन सबके अंतर्विरोध से मुझे डर लगता है. फिर भी मुझे लगता है कि आंदोलन आगे बढ़ता रहेगा.

कुछ समूह हैं जो समझदार हैं और आंदोलन को बचा ले जायेंगे. इन समूहों को समर्थन देना होगा लेकिन जो दलाली का काम कर रहे हैं या सरकार से संवाद की बात कर रहे हैं, उनसे बचना होगा. सबसे ज़रूरी यह है कि आपको इस आंदोलन में जनता को जोड़ना होगा क्योंकि सवाल तो जनता की रोजी-रोटी और जीवनयापन का है. साथ ही आंदोलन की सफलता के लिए यह भी ज़रूरी है कि जनसंघर्षों से जुड़े लोग आंदोलन से बराबर जुड़े रहें. गैर-आंदोलनकारी लोग या फंड के आधार पर प्राथमिकताएं तय करनेवाले लोग अगर एक बार हावी हो गए तो सच, आगे यह आंदोलन बिखर जायेगा. मैं तो कहता हूं कि अगर उत्तराखंड में नदी बचाओ आंदोलन को सफल बनाना है तो इसका नेतृत्व विचारवान महिलाओं के हाथ में होना चाहिए. इन महिलाओं का शिक्षित होना भी ज़रूरी है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

केवलकृष्ण (kewalkrishna70@gmail.com) रायपुर

 
 गिरदा के निधन के बाद ही मैं उनके बारे में ज्यादा जान पाया। जैसे-जैसे उनसे परिचय गहराता जा रहा है, श्रद्धा बढ़ती जा रही है। रविवार ने इस परिचय को थोड़ा और गढ़ा दिया है। आभार। थोड़ा और ज्यादा गढ़ा देते तो और अच्छा होता। गिरदा के बारे में बहुत कुछ जानने की इच्छा है। पोस्ट का इंतजार रहेगा।  
   
 

Shailendra Kumar (kumar.shailendra@gmail.com) फ्रेजर रोड, पटना

 
 पहाड में पानी का आंदोलन में अपना योगदान देने वाले सैकड़ों-हजारों लोगों के लिये गिरदा आज भी जिंदा है. वो हमेशा जिंदा रहेंगे. कौन उनके इस गीत को भूला पायेंगा-

अजी वाह क्या बात तुम्हारी/तुम तो पानी के व्यापारी
खेल तुम्हारा तुम्हीं खिलाड़ी/बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी
सारा पानी चूस रहे हो/नदी समंदर लूट रहे हो
गंगा यमुना की छाती पर/कंकड़ पत्थर कूट रहे हो
उफ तुम्हारी ये खुदगर्जी/चलेगी कब तक ये मनमर्जी
जिस दिन डोलेगी ये धरती/सर से निकलेगी सब मस्ती
महल चौहारे बह जाएंगे/खाली रौखड़ रह जाएंगे
बोल व्यापारी तब क्या होगा/बूंद बूंद को तरसोगे
दिल्ली देहरादून में बैठे योजनकारी/तब क्या होगा
वर्ल्ड बैंक के टोकनधारी/तब क्या होगा
आज बड़े ही मौज उड़ा लो/दुनिया को प्यासा तड़पा लो
लेकिन डोलेगी जब धरती/ बोल व्यापारी तब क्या होगा.
 
   
 

Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) Noida

 
 गिरदा का न होना हम सबों के लिये एक ऐसा शून्य पैदा कर गया है, जिसे भर पाना मुश्किल है. इस तरह की बातें मुहावरों में और औपचारिकतावश भी कही जाती हैं लेकिन यह हक़ीकत है कि आज देश में हिंदी या हिंदी की लोकभाषा का एक भी कवि ऐसा नहीं है, जिसे आप सच्चे अर्थों में कवि कह सकें. यह हमारे समय की त्रासदी भी है. 
   
 

Manik Chittorgarh

 
 ये साक्षात्कार पढ़ कर बहुत अछा लगा. सीधी बात कही है मगर सच्चाई है. पीयूष जी को बधाई.गिरदा को श्रद्धांजली  
   

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