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सच्चिदानंद सिंहा से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

संवाद

गांधी के सिवा कोई रास्ता नहीं है

सच्चिदानंद सिंहा से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

 

सच्चिदानंद सिंहा भारत के उन चुनिंदा विचारकों में हैं, जो अपने समय से लगातार मुठभेड़ करते रहते हैं. 81 साल की उम्र में भी लगातार सक्रिय सच्चिदानंद सिंहा मानते हैं कि भारत में आने वाले दिनों में अगर किसी नये समाज का निर्माण करना है तो समाजवादी विचारकों को गांधी की कुछ बातों को स्वीकारना ही होगा. उनसे कुछ सामयिक मुद्दों पर की गई बातचीत यहां हम प्रकाशित कर रहे हैं.

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आपने समाज और सभ्यता के बहुत से सवालों से लगातार मुठभेड़ की है. एक सवाल लगातार उठता रहता है कि आखिर इस समाज का मूल संकट क्या है ?

मुझे तो लगता है कि मूल संकट यही है कि कभी हम लोग ठीक से समझ नहीं पाते हैं कि इसका मूल संकट है क्या? हमेशा आदमी एक खास परिप्रेक्ष्य में दुनिया के बारे में सोचता है. असल में आदमी की अपनी अलग पहचान तभी होगी जब वह प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक के सारे परिप्रेक्ष्य में अगर सोचना शुरू करेगा, तभी तो उसे असल में पता चलेगा कि समस्या क्या है, नहीं तो वह तात्कालिक चीजों में उलझ कर रह जाता है और समाधान खोजने की कोशिश नहीं करता.

आपको क्या लगता है वर्तमान में समाज का सबसे बड़ा संकट क्या है?

मुझे लगता है कि समाज में अभी सबसे बड़ा संकट तो यह है कि आदमी में आकांक्षाएं बहुत बढ़ गई हैं और वह अपने संकट को ही नहीं समझ पा रहा है. उसके पास कोई उपाय नहीं है कि उन आकांक्षाओं पर नियंत्रण कर सके. जैसे सबसे बढक़र उपभोक्तवादी संस्कृति है. हर आदमी उपभोक्तावादी संस्कृति का गुलाम है. और अभी तक तो सारी व्यवस्था इस संस्कृति को बढ़ावा देने वाली है. आदमी उसमें उलझा हुआ है. वह बीमार है लेकिन यह भी नहीं जानता कि वह बीमार है. अगर बीमार आदमी को ये भी पता नहीं हो कि वह बीमार हो तो वह उपचार के बारे में भी नहीं सोचेगा.

आर्थिक व्यवस्थाएं होती हैं, वो भी बहुत कुछ तय करती है कि हमारी संस्कृति क्या हो. बड़े पैसे वाले खुद के लिए तो संकट पैदा करते ही हैं, चूंकि वे हमेशा प्रतिस्पर्धा का जीवन जीना चाहते हैं, हमेशा उनके दिमाग में रहता है कि दूसरों से बढक़र उपर जाएं. उन्हीं की वजह से गरीबों का संकट पैदा होता है. अपनी आगे बढऩे की तमन्ना को गरीबों के बीच में इस तरह से फैला देते हैं कि जो उनकी बुनियादी जरूरतें है, वो पूरी नहीं हो पातीं. बीज रूप में संपन्न लोग और उनकी तमन्ना ही समाज में सबके लिए ज्यादा संकट पैदा कर रहा है.

इस संकट के कारण समाज में सबसे ज्यादा मनुष्यता और मूल्यों का संकट पैदा हुआ है ?

आज के समाज में तो एक ही मूल्य है, और वह है पैसा उपार्जन करने का. कार्ल मार्क्स ने अपनी मशहूर किताब कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो में कहा है कि सारे संबंधों की जगह पर पूंजीवादी समाज में एक मौद्रिक संबंध ही है, जो पूरी तरह से अन्य संबंधों के उपर छाया हुआ है?

मार्क्स की इस व्याख्या से आप सहमत हैं?

सब से तो सहमत नहीं हैं लेकिन उस समय उसने जो समाज का मूल्यांकन किया, वह बहुत कुछ सही है. हालांकि पूरे इतिहास के बारे में उसके जो निष्कर्ष हैं, उसमें जो उसने विचार दिए थे, उसमें आधी-अधूरी सच्चाई ही है, और वो तो इससे भी साबित होता है कि मार्क्स के बाद संसार का जो विकास हुआ, उसने वही दिशा नहीं ली. जैसा कि मार्क्स सोचता था.

वह तो सोचता था कि पूंजीवादी समाज के विकास से एक बिंदू पर सर्वहारा क्रांति हो जाएगी, समाज बदल जाएगा, समाजवादी व्यवस्था कायम होगी. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. एक के बाद एक ह्रास होता रहा. मजदूर आंदोलनों की हार होती रही.

मार्क्स के कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो लिखने के सौ साल बाद एक प्रक्रिया शुरू हुई कि जिसमें कि समाज के बहुत बड़े अंग में, वहां भी जहां पर कभी कम्युनिस्ट आंदोलनों का प्रभुत्व था; पूरे समाजवादी मूल्य खत्म हो गए. सोवियत यूनियन में, चीन में जिन लोगों ने समाजवादी क्रांति करने का दावा किया था, वहां समाजवादी व्यवस्था धराशायी हो गई. चीन अभी सबसे आक्रामक पूंजीवादी व्यवस्था बन गया.

मार्क्स की सोच में कुछ तो त्रुटि थी लेकिन मार्क्स ने जो कुछ भी कहा, उन सभी को खारिज नहीं किया जा सकता. उसमें बहुत मूलभूत सत्य भी था. सत्य में बहुत आयाम होते हैं. ये हर पीढ़ी का काम है कि पुराने सत्य को पुनरपरीक्षित करे और अपने संदर्भ में उसकी जो कुछ सच्चाई है, उसे बचाकर रखने का प्रयास करे. उसकी गलतियों को छोडक़र फिर उस विचार का आगे परिष्कार करे.

दिक्कत यही है कि कम्यूनिस्टों ने मार्क्स के विचारों को आंख मूंदकर धार्मिक अंधविश्वास की तरह मान लिया. बाकी लोगों ने मार्क्स के विचार को खारिज कर दिया. दूसरी तरफ पूंजीवादी व्यवस्था कोशिश कर रही थी कि मार्क्स के विचार को पूरी तरह खारिज कर दिया जाए क्योंकि उसमें उन्हें क्रांति का बीज दिखाई देता था. दोनों तरफ से मार्क्सवादी विचार को खतरा पैदा हुआ. एक तरफ समर्थकों की तरफ से स्खलन की वजह से, दूसरी ओर आक्रमण की वजह से.

मार्क्स के विचार को फिर परीक्षित करने की जरूरत है. उसके सत्य को बचाकर रखने की जरूरत है. बाद की घटनाओं और उनके बाद के जो मनीषी हुए, जिन्होंने नए तरह से दुनिया को देखने को कोशिश की, उस विचार को लेकर सब के साथ एक संगति बनाकर चलने की जरूरत है.

धन के लिए श्रम का विनिमय और विकास की जो मार्क्स की अवधारणा है, खास तौर पर श्रम के रुपांतरण को लेकर...

मार्क्स ने 19 वीं शताब्दी में भौतिक शास्त्र की जो जानकारी थी, उसमें विकास की सीमाएं कभी कहीं भी परीक्षित नहीं थी. लोग समझते थे कि जो विकास हो रहा है विज्ञान का, तकनीक का वह अनवरत और असीम चलता रहेगा. 20 वीं शताब्दी के जो अनुभव हैं ऊर्जा का अतिव्यय, उसकी वजह से पर्यावरण का संकट, यह मार्क्स के दिमाग में कभी नहीं था. उसके दिमाग में था कि विकास की प्रक्रिया लगातार बढ़ती चली जाएगी.

आज हम जानते हैं कि हमारी धरती सीमित नक्षत्र है, जिससे हम इतना संसाधन हासिल करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि जिससे असीमित मात्रा में उपभोग की वस्तुएं पैदा कर सकें. आज की पूंजीवादी व्यवस्था अधिक से अधिक उत्पादन और ज्यादा से ज्यादा वितरण करना चाहती है और जितना ही उत्पादन का फैलाव होगा, उतना ही पूंजीवाद का मुनाफा बढ़ेगा. इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था इस प्रक्रिया को लगातार बढ़ाने की कोशिश कर रही है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Biju Toppo [biju.toppo@gmail.com] Noida - 2011-06-06 14:32:30

 
  बहुत संतुलित साक्षात्कार. इस साक्षात्कार में कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब उभर कर सामने आये हैं. 
   
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