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संजय काक से रेयाज-उल-हक की बातचीत

कश्मीर में ईमान भी बहादुरी से कम नहीं

 

1958 में पुणे में जन्मे संजय काक मूलत कश्मीरी पंडित हैं. अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के छात्र रहे संजय ने 2003 में नर्मदा घाटी परियोजना के विरुद्ध एक बहुप्रशंसित फिल्म 'वर्ड्‌स ऑन वाटर' बनायी. उन्होंने इसके अलावा 'इन द फॉरेस्ट हैंग्स अ ब्रिज', भारतीय लोकतंत्र पर 'वन वेपन' तथा 'हार्वेस्ट ऑफ रेन' जैसी फिल्में बनायी हैं.

हाल ही में उन्होंने कश्मीर समस्या पर 'जश्ने आजादी' नामक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनायी है, जिसका प्रदर्शन देश और दुनिया भर में हो रहा है. इसके लिए संजय को जितनी प्रशंसाएं मिली हैं, उसी पैमाने पर आलोचना भी. ऐसा उनकी फिल्म के नजरिये को लेकर है, जिसमें वे सरकारी दृष्टि के बजाय कश्मीर समस्या को लेकर एक अलग सोच के साथ पेश आते हैं, जो कश्मीर के लोगों के ज्यादा करीब है. फिल्म में दिखाये गये दृश्य अविस्मरणीय हैं-आजादी के नारे, दूर तक फैला सन्नाटा भरा कब्रिस्तान, हत्याएं और फौजी गतिविधियां. कुल मिला कर 'जश्ने आजादी' हमारे सामने कश्मीर की त्रासदी का एक महाआख्यान प्रस्तुत करती है, ऐसा आख्यान जो इससे पहले इस तरह कभी नहीं लिखा-कहा गया.

यहां पेश है संजय काक से रेयाज-उल-हक की बातचीत.


 आप खुद कश्मीरी हैं, मगर आपने कश्मीर पर एक फिल्म बनाने के बारे में इतनी देर से कैसे सोचा और इसके लिए यह वक्त क्यों चुना? कोई खास वजह?


पहले इतने कामों में व्यस्त था कि इस पर सोचने का वक्त ही नहीं मिला. लेकिन हिंदुस्तान में क्या हो रहा है, इस पर सोचने का मौका मिला. 'वर्डस ऑन वाटर' जो पहली फिल्म है, उसे बनाने के दौरान बारीकी से देखने का मौका मिला कि जो हमारे इंस्टीट्युशंस हैं, जिनके बल पर यह डेमोक्रेसी चलती है, उनमें क्या हो रहा है. और जो भी देखने को मिला, उससे बहुत हताशा हुई. भारतीय लोकतंत्र खोखला-सा दिखने लगा. संसद पर 2001 में जो हमला हुआ था, उसमें जो प्रो एसएआर गिलानी का मामला चल रहा था. उनके बचाव पक्ष के वकीलों ने मुझसे संपर्क किया कि उनका जो टेलीफोन टेप हुआ था,वह कश्मीरी में है, उसका अनुवाद करना है. वह चाहते थे कि यह अनुवाद कोई कश्मीरी पंडित करे.

 

मैं नहीं समझा कि डिफेंस क्यों चाहता था कि यह काम कोई कश्मीरी पंडित करे. मैंने कहा कि दिल्ली में बहुत सारे कश्मीरी पंडित हैं, किसी से भी करा लीजिए. वे हंसने लगे. उन्होंने कहा कि कोई तैयार नहीं. मुझे इससे गहरा धक्का लगा. इस पूरे मामले में देखने को मिला कि उग्र राष्ट्रवाद किस तरह पूरे देश को जकड़ लेता है. हर जगह यह था- पुलिस हो या मीडिया. तब मैंने समझा कि कितना कुछ हो रहा है कश्मीर में. फिर हम कश्मीर गये. यह सोच कर नहीं कि फिल्म बनानी है,बल्कि यह सोच कर कि बाहर बहुत दिनों तक रहे, अब कुछ दिन वहां रह कर देखेंगे कि वहां क्या हो रहा है.

 

वहां जो कुछ देखने को मिला, उससे बहुत धक्का लगा. हालांकि आजकल उतना तनाव नहीं है, जितना 2003 में था. एयरपोर्ट से हमारे घर जाने में आधा-पौन घंटा लगता है. जितनी फौज, जितने सैनिक, जितनी बंदूकें, जितने बंकर देखे-वह सब देख कर हतप्रभ रह गया. ये भी जाहिर हुआ कि कश्मीर में बहुत कम लोग बोलने को तैयार हैं. वे कहते हैं कि क्यों बात की जाये, खास कर हिंदुस्तान के लोग आते हैं तो. क्या फायदा है कहने का. धीरे-धीरे लगने लगा कि यहां फिल्म बनाना मुश्किल तो है, लेकिन जरूरी भी.


  एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाना और वह भी ऐसे क्षेत्र को लेकर, सरकार के और सेना के नजरिये के लगभग विरुद्ध जाकर, आपने जिसे दुनिया का सबसे सैन्यीकृत जोन कहा है, आसान तो कतई नहीं था. तो दिक्कतें नहीं आयीं, किस तरह की परेशानियां रहीं?


कोई भी क्रिएटिव काम दिक्कत के बगैर नहीं होता है. खास कर ऐसी फिल्में बनाने में दिक्कतें तो आती ही हैं. ये आपकी समझ पर है कि आप कितनी दिक्कतें पार कर लेते हैं. डॉक्यूमेंटरी फिल्मों का रॉ मेटेरियल आम तौर पर यह होता है कि आप लोगों से बात करेंगे और वे आपको बतायेंगे. चाहे आप उसे फिल्म में इस्तेमाल करें या न करें. लेकिन जहां कि स्थिति इतनी टेंस हो, कोई यह नहीं जानता कि किससे क्या बात करे. अमूमन यह भी होता है कि लोग वही बोलते हैं जो आप सुनना चाहते हैं. क्यों पंगा ले कोई, चाहे गांव का बंदा हो या पत्रकार. लोग सिर्फ उतना ही कहेंगे जितना न्यूनतम जरूरी है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Jeet Bhargava

 
 Kak jis media ko gaali de reahe hain usi ki vajah se unkaa vazood khadaa hai. Dar-asal vah naa toh sachche Pundit hai naa hi Kashmiri. Vo toh ek aise bachche ki tarah hai jinhe Bharat-virodhi taakate istemaal karti hain. Apni film me ve jihaadiyon ko toh mahimaa-mandit karte hain, lekin beghar hue masoom Kashimiri panditon ke baare me kuchh nahi bataate. Vah naa toh jihaadi maansaaktaa se pardaa uthaa paaye aur naa hi pakistaani mansoobo ko. Aajkal aise bahut se charitra mil jaate hain jo aise desh-virodhi abhiyaano me jude hue hain. Raastaa aasaan hai..creativity ke naam pe naam bhi mil jaata hai aur daam bhi..  
   
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