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लोदो सिकोका से पुरुषोत्तम ठाकुर की बातचीत

संवाद

यह हमारी सरकार नहीं है

लोदो सिकोका से पुरुषोत्तम ठाकुर की बातचीत

 

कुनी, उसकी सहेली और माँ, गाँव के पास ही पहाड़ी के नीचे वाली ज़मीन में सरसों के खेत में सरसों के फुल और पत्ती तोड़ रहे थे और तोड़ते-तोड़ते अचानक कुनी चिल्ला उठी- “लोदो दादा आ गये, लोदो दादा आ गये…”

लोदो सिकोका


नियमगिरि के इस लाखपदर गाँव में रहकर पिछले चार दिनों से हम इसी खबर का इंतजार कर रहे थे. चार दिन पहले जब हम इस गांव में पहुंचे थे तो पता चला कि लोदो यानी लोदो सिकोका कुछ ही देर पहले भुवनेश्वर के लिये रवाना हो गये थे. वहां किसी बैठक में उन्हें भाग लेना था.

नियमगिरि के डोंगरिया आदिवासी नियमगिरि में बाक्साइट माइनिंग के लिए कोशिश कर रही ब्रिटिश कंपनी वेदांता के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं और लोदो सिकोका, नियमगिरि सुरक्षा परिषद के एक प्रमुख नेता हैं.

लोदो पिछले साल अगस्त में पहली बार तब चर्चा में आये, जब वेदांता कंपनी के इशारे पर लोदो को पुलिस उस समय उठा ले गई, जब वह अपने साथियों के साथ एक बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली जा रहे थे. उन्हें रायगढ़ा पुलिस ने थाना ले जाकर मरते दम तक पिटा, माओवादी होने का ठप्पा दिया और तब जाकर छोड़ा जब मीडिया से लेकर स्थानीय सांसद और कार्यकर्ताओं ने दबाव बनाया.

सरसों के खेत से गाँव पहुँच कर जब हमने लोदो के बारे में पूछा तो एक ने कहा कि वह भूखे और प्यासे थे और अपनी डोंगर (डोंगर में स्थित अपने खेत) की ओर चले गए हैं. हम भी पीछे चल पड़े. वैसे भी पिछले चार दिनों में हम कई लोगों का डोंगर चढ़ चुके थे, जिनमें लोदो का डोंगर भी शामिल था.

असल में फसल कटाई के इस समय गांव के सभी लोग अपने परिवार समेत अपने-अपने डोंगर में छोटी -छोटी कुटिया और मचान लगाकर रहते हैं. डोंगर में ही वे धान, मड़िया, गुर्जी, कांदुल,अंडी जैसे कई तरह की फसलों को काटकर लाते हैं.

नियमगिरि पहाड़ में रहने वाले ये डोंगरिया आदिवासी डोंगर में ही खेती करते हैं. यहां खेती करना काफी मेहनत का काम है, जिसमें पूरे परिवार को जुटना पड़ता है. डोंगर में क्योंकि जुताई नहीं हो पाती, इसलिए वहां हाथ से कोड़ाई करनी पड़ती है. इसलिए इस खेती में घर के छोटे बच्चे से लेकर बुढ़ों तक का योगदान महत्वपूर्ण होता है.

वहां चार दिन तक रहते हुये हमने इसे और बेहतर तरीके से समझा था. जब बड़े लोग फसलों की कटाई कर रहे थे तब पांच से दस साल के छोटे बच्चे नीचे झरनों से छोटे-छोटे पात्रों में पानी लाने जैसा काम कर रहे थे. जीवन के अंतिम दिनों की ओर बढ़ रहे कई बुजुर्ग महिलायें भी कुछ न कुछ काम करते दिखीं.

डोंगरिया लोगों की प्रकृति पर निर्भरता और प्रकृति से इतना जुड़ाव है कि बाहरी चीजों के उपर इनकी निर्भरता नहीं है. यही वजह है कि जब बाकी देश महंगाई को लेकर इतनी हाय-तौबा कर रहा हैं , तो ये लोग उस से कोसो दूर हैं. वह इसलिये भी क्योंकि इनके जीवन में बाज़ार का हस्तक्षेप नहीं है. इनका बाज़ार से ज्यादा लेना देना नहीं है. वह बाहरी दुनिया से जितना लेते हैं, उससे कहीं ज्यादा देते हैं. पहाड़ के नीचे बसे लोग नियमगिरि के फलमूल और फसल के लिए इंतजार करते रहते हैं. इसलिए महंगाई होने पर उन्हें दो पैसा ज्यादा ही मिलता है कम नहीं. हालांकि बिचौलिए सबसे ज्यादा फायदा उठा लेते हैं, जो इनके उत्पादों को कम मूल्य में इनसे लेकर काफी मुनाफा कमाते हैं.

कुछ संवाद और...

लोदो के डोंगर में चढ़ाई के दौरान रास्ते में उनका सलप यानी सल्फी का पेड़ है. सलप के पेड़ से निकलने वाला रस पीया जाता है. वहाँ हमने देखा, लोदो पेड़ पर चढ़े हुए हैं और सलप निकाल रहे हैं और नीचे उनके मित्र खड़े हुए हैं, जो उनके साथ ही भुवनेश्वर से लौटे हैं.

हमारे पहुंचते तक लोदो सलप लेकर नीचे आ गये. दुआ-सलाम के बाद छूटते ही कहा- “पिछले चार दिनों से सलप नहीं पिया था इसलिए बहुत प्यास लग रही थी.”

लोदो अपनी भुवनेश्वर यात्रा के बारे में बताने लगे- "वहां सब चीज़ के लिए लाइन में लगना पड़ता था. नहाने के लिए लगना पड़ता था और गरम पानी दिया जा रहा था. पीने के पानी को बोतल में भरकर बेचा जा रहा था, वह भी दस से पंद्रह रुपये में."

“मैंने उन लोगों को कहा कि आप लोग हमारे नियमगिरि आ जाओ, हम आपको एक ट्रेन भर के पानी देंगे, वह भी बिल्कुल मुफ्त. हमारे यहाँ बहुत सारे झरने हैं, जहाँ शीतल और स्वच्छ पानी है. ...इसलिए मैं तो जब तक भुवनेश्वर में रहा, नहाया भी नहीं.”

हम अगर नियमगिरि में नहीं होते तो शायद लोदो की बातों का मतलब समझ नहीं पाते, लेकिन वहां रहने के बाद हम भी महसूस करते हैं कि नियमगिरि जिसे वह नियमराजा भी कहते हैं, उनके लिए कितना उदार है और उन्हें क्या कुछ नहीं दिया है नियमगिरि ने. जो लोग प्रकृति के इतने करीब हैं, वह हम जैसी सोच-समझ वाले कैसे हो सकते हैं, जिनके लिये सब कुछ नफा-नुकसान और व्यापार का विषय है. जिस नियमगिरि को वह अपना भगवान मानते हैं, उसे हमारी सरकार भी तो रुपये के लिए बेचने पर उतारू हो गई है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Jaleshwar Oraon [] Chennai - 2014-01-02 08:15:59

 
  साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाकर सरकार आदिवासियों को, जो कि जल-जंगल-जमीन का मालिक और धरती पुत्र हैं, उन्हें उजाड़ने का काम में लगी है। नियामगिरी के आदिवासी नेता लोदो को जिस तरह पुलिस प्रताड़ना दी गई, पुलिस द्वारा अपराध हुआ। पुलिस का कहना कि हमारी सरकार को परेशान कर रहो हो इसलिए तुम्हें मार-पिटाई हो रही है। वो पुलिसवाले जो कि सरकारी नौकर मात्र हैं और जिस तरह लोदो की पिटाई की गई, स्पष्ट रूप से पुलिसवालों को भारत देश के कानून का ज्ञान नहीं है, इसलिए एक लाचार और बेवश निःहथा व्यक्ति की चार-पाँच पुलिसवालों ने कैद रख कर पिटाई की, यह पुलिस बर्बरता से कम कुछ नहीं है। पुलिस ऐसी बर्बरता समय-समय पर करती दिखाई देती रही है। 
   
 

sajjan agrawal [sajjankhariar@gmail.com] KHARIAR -

 
  बहुत ही अच्छा साक्षात्कार है. पढ़ कर बहुत कुछ जानकारी मिली. 
   
 

ramesh kumar [rk140676@gmail.com] azamgarh -

 
  वैदिक काल से लेकर आज तक आदिवासियों के साथ क्रुरतापूर्वक व्यवहार किया जाता रहा.हमारे धर्मग्रंथों में उन्हें दानवों के रूप में चित्रित किया जाता रहा और आज नाक्सलियो के रूप में. इनके साथ कब न्याय किया जायेगा? 
   
 

डॉ.लाल रत्नाकर [ratnakarartist@gmail.com] गाजियाबाद -

 
  जो लूटना चाहते हैं उन्ही के साथ पुलिस भी खड़ी है यही सच्चाई है ! 
   
 

मनोज शर्मा [smjmanoj.sharma@gmail.com] जम्मू -

 
  बहुत प्रासंगिक साक्षात्कार है. भावुक करने वाला और तैयार करने वाला. 
   
 

bhagatsingh [] raipur -

 
  पिछले साल शायद मई के महीने में उनसे भुवनेश्वर में मेरी मुलाकात हुई थी. मैं उनकी कही हुई बातों को आज तक नहीं भुला हूं. छत्तीसगढ़ में इपने जीवन की लड़ाई लड़ रहे लोगों के लिये तो लोदो एक आदर्श की तरह ही हैं. पुरुषोत्तम जी को धन्यवाद कि उन्होंने इस विस्तृत साक्षात्कार के सहारे एक बहादुर आदमी से फिर मिलवाया. 
   
 

kirti [kirtisundriyal.ht@gmail.com] wardha, maharashtra -

 
  लोदो मैं तुम्हारे संघर्ष को सलाम करती हूं, जिस साहस का परिचय आपने दिया है वह काबिले तारीफ है. साथ ही इन्टरव्यू लेने के लिए पुरुषोत्तम ठाकुर जी का धन्यवाद. 
   
 

दीपक [deepakrajim@gmail.com] आबूधाबी -

 
  लादो जैसे लोग शिक्षित हो ना हों, समझदार जरुर हैं ...यह साक्षात्कार पढकर अच्छा लगा. 
   
 

chandrika [chandrika.media@gmail.com] wardha, maharashtra -

 
  शानदार इन्टरव्यू, हम भी लोदो के साथ हैं और लोदो के संघर्ष को सलाम करते हैं. 
   
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