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प्रशांत भूषण से प्रशांत दुबे की बातचीत

संवाद

आजकल न्याय भी बिकता है

प्रशांत भूषण से प्रशांत दुबे की बातचीत

 

देश में औसतन हर रोज एक नये घोटाले के इस दौर में अधिकांश भारतीय भ्रष्टाचार पर बात करते हैं लेकिन उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ऐसे लोगों से अलग हैं. वे केवल बात करने में यकीन नहीं करते. यही कारण है कि वे पिछले दो दशक से भ्रष्टाचार के खिलाफ हरसंभव लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने न्यायपालिका के अंदर की गंदगी को सार्वजनिक करने का काम किया, आम जनता की वाहवाही बटोरी और न्यायपालिका की आंख की किरकिरी भी बने. भ्रष्टाचार में डूबी न्यायपालिका के एक वर्ग ने आंखें तरेरी और प्रशांत भूषण पर मुकदमे भी दर्ज कराये गये. ये और बात है कि प्रशांत भूषण इन मुकदमों के बाद और उत्साह से अपने काम में जुट गये. यहां पेश है हाल ही में उनसे की गई बातचीत के अंश.

prashant-bhushan


क्या आज के दौर में आम आदमी को न्याय मिलने की उम्मीद आप करते हैं ?

देखिये, यह एक विचित्र दौर है जबकि विकास दर तो 9 प्रतिशत पर पहुंच गई है लेकिन 10 वर्षों में 2 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. विश्व के 10 सबसे अमीर लोगों में 4 हिन्दुस्तानी हैं लेकिन अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश की 77 फीसदी जनता 20 रूपये प्रतिदिन से कम पर जीवन यापन कर रही है. विकास दर और गरीबी में सीधा-सीधा जुड़ाव है. यदि गरीबी इतनी है तो विकास दर बढ़ कैसे रही है? इसका सीधा जवाब यह है कि यह विकास दर इस देश के प्राकृतिक संसाधनों को बेच-बेचकर लाई जा रही है. देश का 1 ट्रिलियन डॉलर पैसा स्विस बैंकों में रखा है.

यह कहना मुश्किल है कि आज के इस दौर में आम आदमी को न्याय मिल ही जाये. आजकल न्याय भी बिकता है, जिसकी जेब में पैसा है, वह न्याय का हकदार है बाकी सभी तो न्याय की आस लगाये रहते हैं. यह अंकल जज का जमाना है. न्यायपालिका भी भ्रष्ट हो रही है, दीमक तो उसमें भी लग चुकी है. पूरी व्यवस्था पर, पूरा कब्जा इन कारपोरेट घरानों का है.

 आप क्या मानते हैं कि नवउदारवाद के बाद या उससे पहले से ही न्यायपालिका का ह्नास हुआ है.

कुछ संवाद और...


इक्का दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो नवउदारवाद के बाद से ही यह ह्नास ज्यादा हुआ है. एलपीजी के आने के बाद से पैसा बढ़ा है और जब पैसा बढ़ा तो फिर स्वाभाविक खरीद फरोख्त भी ज्यादा बढ़ी है तो फिर न्यायपालिका कहां इससे अछूती रह पाती. यह इसलिये भी है क्योंकि न्यायपालिका की कहीं कोई जवाबदेही नहीं है.

 यह कैसे रुकेगा ?

जब तक निचली अदालतें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के प्रति जवाबदेह ना हों तब तक तो कुछ भी नहीं हो सकता है. और उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की भी जवाबदेही तय होनी चाहिये. जब तक यह नहीं होगा तब तक तो न्यायपालिका का भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा. बड़ी विचित्र बात है कि न्यायपालिका सरकारों की जवाबदेही सुनिश्चित करने में लगी होती है लेकिन अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेती है. जिस दिन यह होने लगेगा, अपने आप तंत्र सुधर जायेगा. न्यायपालिका में सुधार के लिए ज्यूडिशियल परफार्मस कमीशन बनाने की आवश्यकता है.

 आप तो सीबीआई और सीवीसी जैसी संस्थाओं को खत्म करने की बात कर रहे हैं तो फिर आपके पास विकल्प क्या है ?

नहीं ! मैं इन संस्थाओं को खत्म करने की बात नहीं कर रहा हूं बल्की इन्हें सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की बात कर रहा हूं. आप उस संस्थान से उन लोगों के संबंध में कैसे न्याय की आस लगा सकते हैं जो कि सरकार में बैठे हैं और उस संस्थान पर सरकारी नियंत्रण है. इन संस्थानों में सरकारी नियंत्रण को खत्म करना होगा, नहीं तो ये सरकार के हाथों की कठपुतलियों से ज्यादा कुछ भी नहीं. बल्कि मैं तो यह कहता हूं कि इन संस्थानों में होने वाली नियुक्तियां भी स्वतंत्र एजेन्सी द्वारा कराई जाये. यदि ऐसा नहीं होगा तो हर बार थॉमस जैसे लोग ही नियुक्त होंगे. यह बदलाव तभी संभव होगा जबकि लोग मांग उठायें, यदि ऐसा नहीं होगा तो फिर हमें इसी व्यवस्था के साथ जीना होगा.

 क्या आप वर्तमान दौर में माओवाद को कोई विकल्प मानते हैं ?

नहीं, माओवाद कोई विकल्प नहीं हो सकता है. राज्य की भूमिका को नजरअंदाज करके कोई भी विकल्प नहीं बचता है. राज्य को खत्म करके जो भी विकल्प बचेगा, उससे बढ़िया समाज की रचना तो नहीं ही की जा सकती है. हिंसा को केन्द्र में रखकर जो भी क्रांति निकलती है, वह लोकतांत्रिक नहीं हो सकती है. इसलिये यह वाद या ऐसा कोई भी वाद, जिसकी नींव में हिंसा है, वो वाद कभी भी स्थाई विकल्प नहीं उपलब्ध करा सकता है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shubham Parashar [shubham.parashar2003@gmail.com] Pithampur(Indore) - 2011-05-03 08:15:58

 
  हम आये दिन देख ही रहे हैं कि कोर्ट में जा-जा कर लोगो के चप्पल जूते घिस जाते हैं.कई लोग न्याय की आस में स्वर्ग सिधार जाते हैं. ऐसी हालत में लोग फूलन देवी की तरह बंदूके न उठायें तो क्या करे???? 
   
 

Ambuj [] - 2011-04-28 03:34:58

 
  I believe that Prashant Bhushan is right in focusing the real issues concerning inclusive devlopment. Jan Lok Pal bill is a dire necessity to fight corruption. State has to reconsider its agendas of development. The concept of development should not be understood in terms of TATAS and AMBANIS but common people who are unemployed, poor and getting exploited at the hands of the rich managements.  
   
 

Rajendra Singh Kunwar Fariyadhi [fariyadhi2000@rediffmail.com] Uttrakhand - 2011-04-20 09:40:22

 
  हमारे देश को सबसे ज्यादा भ्रष्ट नेताओं, सी. बी. आई. एवं वकीलों और न्यायलय के जजों ने किया है, जिससे की आम जन के लिए कानून एक सपना बनकर रहा गया है  
   
 

Ranjit Giri-Advocate [giriranjit@in.com] Bokaro Steel City-Jharkhand -

 
  प्रशांत जी ने सही कहा है कि भारत में न्यायपालिका बिकी हुई है. हमलोग रोज कोर्ट में देख रहे हैं, लोगों को न्याय नहीं मिल रहा है परंतु हम सभी वाकई बेबस और लाचार हैं. 
   
 

भास्कर मिश्र 'पारस' [bapubhaskar23@gmail.com] बिलासपुर,वर्तमान में हैदराबाद टीवी पत्रकार -

 
  प्रशांत भूषण लोकतंत्र की मैली गंगा को साफ करने के भगीरथ प्रयास को मेरा प्रणाम,भूषण जी न केवल साहसी हैं,बल्कि देश के जाने माने कानूनविद भी हैं,दरअसल आज के नेताओं में खुद से अलग होकर सोचने की फुर्सत नहीं है,सरकार बिचौलियों और बनियों के हाथों बिकी हुई है,ईमानदारी ठीक वैसे ही कैद है जैसे भारत का पीएम,जो सब कुछ जानते हुए भी असहाय है,उन्हें केवल अपनी ईमानदारी के लेकर चिंता तो है,लेकिन देश की उन्हें कोई परवाह नहीं है,मै इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि माओवाद किसी का विकल्प हो ही नहीं सकता,लोकतंत्र से ही रामराज्य की कल्पना की जासकती है,इसके लिये जरूरी है गांधी के रास्त पर चलने की,यानि माध्यम की शुचिता बनाये रखने की,लेकिन जब माध्यम में ही जैसे,सीवीसी,सीबीआई तमाम मत्रालय में भ्रष्ट घुसपैठियों की दखल हो तो न्याय की कल्पना नहीं की जासकती,इसे साफ सुथरा बनाने के लिये जनता को आगे आना ही पड़ेगा,जैसा की इन दिनों रामदेव,प्रशांत भूषण जैसे ईमानदार भारतीय इस मुहिम लगे हुए हैं,मैं एक शेर कहना चाहुंगा
रीत लिखता हूं राग लिखता हूं
शांति संगम प्रयाग लिखता हूं
हिमाच्छादित ध्रुवों की छाती पर
जब भी लिखता हूं आग लिखता हूं
 
   
 

ramesh mishra [paryavaranfeatures@gmail.com] Delhi/NCR -

 
  न्याय भी बिके तो फिर लोग बंदूक ना उठायें तो क्या करें? सच कहें तो अपनी हालत सचमुच बहुत खराब है ..एक अच्छा साक्षात्कार पढाने के लिये धन्यवाद 
   
 

soni [cgsamvardhan@gmail.com] thelkadih -

 
  वास्तव में छत्तीसगढ़ में कानून बिकने लगा है. जब एक ईमानदार इंसान कानून के देवता के पास जाता है तो इन सबसे अनजान रहता है जब वकील ही बिकने लगे तो लोग समाज की मुख्य धारा से कटने लगेंगे. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को इस पर ध्यान देना चाहिए. 
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida -

 
  मनोज जी, रविवार पर और बीबीसी पर भी कई विश्लेषण आये थे, राज्य में रमन सिंह सरकार का हाल न्यायपालिका के मामले में कैसा है, इसे जानने के लिये इन पंक्तियों को पढ़ें- दस्तावेज़ बताते हैं कि बाल्को ने 1751 एकड़ की वन भूमि पर कब्ज़ा कर रखा है जिसका भू-स्वामित्व उसके पास नहीं है. इस भूमि पर बिना पूर्व अनुमति के बहुत सी ग़ैर-वन गतिविधियाँ भी चलाई जा रही हैं.
कोरबा के तहसीलदार ने 26 अक्तूबर 2010 को जारी पत्र में और कोरबा के वन मंडलाधिकारी ने दो जून 2008 को जारी पत्र में इसके विवरण दिए हैं.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की वन मामलों की समिति, सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी (सीईसी) की एक रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 फ़रवरी, 2008 को बाल्को के कब्ज़े वाली भूमि पर किसी भी तरह से पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी थी.
लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बाल्को ने सु्प्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए उस भूमि पर भी पेड़ों की कटाई की जो सरकारी रिकॉर्ड में वन भूमि है और वहाँ भी पेड़ों की कटाई की जिसे उसने निजी भू-स्वामियों से हासिल किया था.
इसरो की एक रिपोर्ट कहती है- 29 फ़रवरी 2008 और दो जून, 2010 के बीच वन/वनस्पतियों को नुक़सान पहुँचा है. यह नुक़सान 35.79 हेक्टेयर या लगभग 90 एकड़ के क्षेत्र में हुआ है.

लेकिन छत्तीसगढ़ की रमन सरकार वेदांता पर कार्रवाई करने के बजाये उसके मालिक अनिल अग्रवाल का सम्मान कर रही है, उनके साथ दावतें उड़ा रही है.
 
   
 

Manoj Singh Baghel [] Durg, Chhattiagsrh -

 
  छत्तीसगढ़ में रहते हुये आपकी बात को और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. हमारे यहां वेदांता कंपनी ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया और मामला जब विधानसभा में उठा तो मंत्री ननकी राम कंवर ने कहा कि वेदांता ने कब्जा किय़ा है, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी. कार्रवाई तो नहीं हुई, लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री ने ननकी राम कंवर को उनके पद से चलता कर दिया. बाद में मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो सरकार ने अपना वरिष्ठ वकिल खड़ा ही नहीं किया और फैसला वेदांता के पक्ष में आ गया. वेदांता के हाथों बिक चुकी सरकार ने कहा कि अब क्या फायदा, हम इस मामले में सुप्रीम कोर्ट नहीं जायेंगे. किसी गरीब आदमी का मामला होता तो सरकार कहां-कहां नहीं जाती. लेकिन बेशर्मी तक डूबी हुई छत्तीसगढ़ की सरकार ने वेदांता की पूंजी के सामने किसी पालतू की तरह समर्पण कर दिया. 
   
 

Kumar Anil [kumar.anil@gmail.com] Noida -

 
  अगर हमारी जेब में पैसा है तो न्याय भी हमारी जेब में ही है. गरीब आदमी के लिये तो सारे कानून, उसके खिलाफ खड़े हैं. हमारे लोकतंत्र की इससे अधिक विफलता और कुछ नहीं हो सकती.  
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi -

 
  न्याय भी बिके तो फिर लोग बंदूक ना उठायें तो क्या करें? सच कहें तो अपनी हालत सचमुच बहुत खराब है ..एक अच्छा साक्षात्कार पढाने के लिये धन्यवाद. 
   
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