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मनमोहन सबसे बड़ी समस्या हैं

संवाद

मनमोहन सबसे बड़ी समस्या हैं

सच्चिदानंद सिंहा से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत-दो

 

समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिंहा मानते हैं कि देश में सारी विकास प्रक्रिया को लेकर मनमोहन सिंह की शत-प्रतिशत प्रतिबद्धता विश्व बैंक से है और निर्बाध तरीके से उस चीज को चलाने वाले आदमी वही हैं. सच्चिदानंद सिंहा मानते हैं कि मनमोहन सिंह पूंजीवादी विकास के प्रतीक बने हुए हैं. पिछले दिनों उनसे की गई बातचीत का दूसरा भाग हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं.

सच्चिदानंद सिंहा


आप लगातार जिस गांधी की बात करते हैं, वो गांधी आज हाशिये पर हैं. उनका नाम लेने वाले ही गांधी के लगभग खिलाफ खड़े हैं. समाज का बहुसंख्य गांधी के प्रतिपक्ष में खड़ा है. ऐसे में गांधी कितने सफल होंगे ?

हम कोई ज्योतिषी तो हैं नहीं, जो बताएं कि गांधी का रास्ता कितना सफल होगा, कितना नहीं होगा. लेकिन ये तो कह सकते हैं कि अगर वही एक रास्ता है तो फिर जितनी दूर हम चल सकते हैं, चलें.

मनमोहन सिंह कहते हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्या माओवाद है?

एक अर्थ में वे सही हैं क्योंकि माओवाद तो समस्या है लेकिन पूंजीवाद उससे भी बड़ी समस्या है क्योंकि माओवाद तो उसी से पैदा हुआ है. इस अर्थ में मनमोहन सिंह तो सबसे बड़ी समस्या हैं.

इसकी थोड़ी व्याख्या करेंगे?

वैसे तो उन्मुक्त पूंजीवादी विकास की बात पहले से भी देश में होती रही है लेकिन मनमोहन सिंह एक तरह से इसके प्रतीक हैं. इसलिए भी क्योंकि वे तो वर्ल्ड बैंक के कर्मचारी थे. आज भी उनकी मानसिकता वही है. सारी विकास प्रक्रिया को लेकर मनमोहन सिंह की शत-प्रतिशत प्रतिबद्धता विश्व बैंक से है और निर्बाध तरीके से उस चीज को चलाने वाले आदमी वही हैं. वस्तुतः मनमोहन सिंह पूंजीवादी विकास के प्रतीक बने हुए हैं.

लेकिन माओवाद की भी तो अपनी सीमाएं हैं और अब तो ये बात भी होने लगी है कि माओवाद भी पूंजी के ही बुलडोज़र का टूल्स बनता जा रहा है, चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने.

मैं माओवाद को एक बड़े आंदोलन के रूप में देखता हूं. शुरू में समाज को उन्होंने नए तरह से संगठित करने का प्रयास किया और बड़े-बड़े प्रयोग भी किए. लेकिन उस रूप में माओ से इन्होंने एक ही सूत्र लिया है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है. माओ ने और भी प्रयोग किए. उसने सांस्कृतिक क्रांति की बात की. पूंजीवादी, विकसित और विकासशील समाज में माओ ने प्रयास किया कि वे शहर के लोगों को गांव की तरफ भेजें हालांकि इसके बुरे परिणाम भी सामने आये. लेकिन उनमें दृष्टि तो थी कि गांव और शहर के बीच के भेद को मिटाया जाए.

उसने कम्यून का जो प्रयोग किया था, उसकी काफी चर्चा थी हालांकि उसकी समझदारी काफी सीमित थी, जिसके कारण उसके दुष्परिणाम भी सामने आए. उसी समय चर्चा होने लगी थी कि छोटे-छोटे बैकयार्ड स्टील मिल गांव के अंदर बनाए जा सकें. माओ की जो प्रारंभिक दिशा थी, वह गांव की तरफ और छोटे उद्योगों की तरफ जाने की थी.

कुछ संवाद और...


इस आंदोलन की बुनियादी समझ यह थी कि हमें बड़ी सैनिक व औद्योगिक शक्ति बनना है. इस दबाव के चलते उन्हें पूंजीवादी संस्कृति की तरफ जाना पड़ा. चूंकि पूंजी संचय का पूंजीवादी तरीका, ज़्यादा से ज़्यादा प्राकृतिक संसाधनों और आदमी के श्रम का दोहन का है, इसी के आधार पर विकास हो सकता था, इस कारण चीन उस रास्ते गया. उसी का परिणाम है कि चीन आज दुनिया की सबसे सख्त पूंजीवादी व्यवस्था है. आज वहां भारत से भी ज़्यादा तेज गति से विकास हो रहा है. पर आम आदमी की स्थिति बेहद खराब है. खदानों में सुरक्षा का अभाव है, जिसके कारण हर साल हजारों मज़दूर मारे जाते हैं.

लेकिन भारत के माओवादियों का कहना है कि 1974 में जब कम्युनिस्ट इंटरनेशनल भंग हो गया, उसके बाद चीन तो कम से उनका मॉडल नहीं है.

ये वो नहीं सोचते कि माओ-त्से-तुंग के नेतृत्व में विकसित हुआ समाज उस जगह कैसे पहुंच गया, जहां आज चीन पहुंच गया है. मतलब ये कि कुछ तो आंतरिक दबाव उस व्यवस्था के अंदर थी, जो कम्यून की बात से हटकर वैश्विक पूंजीवाद की तरफ आ गए. उनका आदर्श शक्ति के शिखर पर पहुंचना था. आधुनिक मिसाइल और एयरफोर्स ग्रामीण व्यवस्था के आधार पर नहीं बनाया जा सकता, उसके लिए फिर पूंजी का बहुत विस्तार करना होगा. यही कारण था कि 1970 में माओ-त्से-तुंग ने दूसरी राह पकड़ी थी लेकिन उसके बाद तो दूसरे परिवर्तन होने लगे और देंग जियाओपिंग तक तो सब कुछ बदल गया था.

1967 में जो नक्सलबाड़ी का आंदोलन हुआ, उसके बाद नक्सलियों को, माओवादियों को, सशस्त्र क्रांतिकारियों को आप चाहे जिस नाम से इन्हें पुकारें, उन्हें सबसे उर्वर भूमि जो मिली, वह बिहार थी. आप जहां के हैं, वहीं पास का मुसहरी गांव उनका पहला केंद्र बना. 1967 से आज तक तमाम सरकारी दमन की कोशिशों के बाद भी सशस्त्र संगठनों की ताकत लगातार बढ़ती जा रही है. ये जो ऊर्जा और ये खाद-पानी और सब कुछ किस तरह से मिलता है?

1967 में जब यहां शुरूआत हुई थी तो उस समय चीन के अंदर सांस्कृतिक क्रांति का काल था. उस समय उसका आभा मंडल था, यह आंदोलन उसका ही प्रभाव था.
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