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हथियार के लिये मजबूर करती है सरकार

संवाद

हथियार के लिये मजबूर करती है सरकार

सच्चिदानंद सिंहा से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत-तीन

 

समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिंहा का मानना है कि भारत में चल रहा सशस्त्र आंदोलन कोई विकल्प तो नहीं है लेकिन यह प्रतिक्रियास्वरूप ही है. सच्चिदानंद सिंहा का कहना है कि जब सरकार लोगों की शांतिपूर्ण बातों को, प्रतिरोध को नहीं सुनेगी तो भले ही मनुष्य को अपनी जीत का विश्वास न हो तो भी वह हथियार उठा लेता है. ये सरकार एक तरह से लोगों को हथियार उठाने के लिए मजबूर करती है.पिछले दिनों उनसे की गई बातचीत का तीसरा और अंतिम भाग हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं.

सच्चिदानंद सिंहा


ये जो अधिकारों की लड़ाई है, खासतौर पर जो पूर्वोत्तर के राज्य हैं, कश्मीर हैं, आपको ऐसा लगता है कि राज्यों के पास कुछ भी नहीं रहा या उनकी अनदेखी हुई है, इस कारण ही इस तरह के अलगाववादी आंदोलन चल रहे है?

उसके कुछ और भी कारण है. जैसे कश्मीर का मामला है, उसमें जो विभाजन हुआ, उसमें तो सांप्रदायिक तत्व था पर मूलत: तो यही है कि केंद्र का जो दुराग्रह था कि कश्मीर हमारे हाथ में होना चाहिए, कश्मीर उसी हादसे को झेल रहा है.

इस तरह के हादसों में कभी-कभी व्यक्तियों का हाथ होता है. जैसे कश्मीर की समस्या के मूल में एक तो पंडित नेहरू का मोह है कि उनकी वहां बाप-दादाओं की ज़मीन थी. नहीं तो शुरू में शेख अब्दुल्ला ने भारत में एक्सेशन किया था और उनके दिमाग में था, वे तो लालशाही के खिलाफ लड़ते रहे. लेकिन कश्मीर को लेकर एक तस्वीर थी कि वहां स्वायत्तता रहेगी. लेकिन जब वे प्रधानमंत्री थे तो नेहरू से टकराहट होने लगी. वे चाहते थे कि ज़्यादा से ज़्यादा कश्मीर पर उनका अधिकार हो और नेहरू इस हद तक कश्मीर को अपने कब्जे में रखने के लिए तैयार थे कि इसी कारण शेख अबदुल्ला को दस साल जेल में रखा. उसी के बाद से कश्मीर धीरे-धीरे अलगाववादी शक्तियों के हाथ में आ गया. नहीं तो शेख अबदुल्ला जैसा आदमी, उसने तो एक्सेशन का समर्थन किया था. वहां का जो राजा था, वह तो स्वतंत्र कश्मीर की बात कर रहा था.

कबिलाइयों का हमला नहीं हुआ होता तो शायद वह सफल हो जाता. उसके मंत्री रामचंद्र काक ने अंग्रेजों से मांग की थी कि कश्मीर पर स्वतंत्र अस्तित्व दिया जाए. लेकिन जब कबिलाइयों का हमला हुआ तो राजा को लगा कि राज्य हाथ से निकल रहा है तो उसने जल्दी से एक्सेशन किया. शेख अबदुल्ला तो राजा के खिलाफ भी लड़ता था, वो तो लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहता था.

कुछ संवाद और...

शुरू में नेहरू ने इस्तेमाल किया शेख अब्दुल्ला का और बाद में जब लगा कि ये आदमी कुछ ज़्यादा स्वतंत्र होना चाहता है, ज़्यादा स्वायत्तता मांगता है तो उसे पकडक़र जेल में डाल दिया. अपने हाथ के नीचे रहने वाले लोगों के हाथ में कश्मीर को देकर रखा और ये काम हर जगह इन लोगों ने किया.

मणीपुर की इरोम शर्मीला दस साल से अधिकार के लिए लड़ रही है और ये सरकार कितनी मूर्ख है कि फौज के लोगों को इसने ये अधिकार दे रखा है कि वो जहां चाहे, वहां लोगों को गोली मार दें. इस अधिकार को खतम करने के लिए सरकार तैयार नहीं है. कितनी उपेक्षा है वहां के लोगों के प्रति. और सब जगह इस तरह की चीज चल रही है. मैं समझता हूं कि ज़्यादा से ज़्यादा सत्ता का विकेंद्रीकरण होना चाहिए और असली सत्ता जो छोटे-छोटे राज्य हैं, उनकी हो.

आपने शर्मीला का उदाहरण दिया लेकिन शर्मीला जैसी जो अहिंसक आवाजें हैं, वो लगातार अनसुनी रह जा रही हैं. ऐसी अनसुनी आवाजों के कारण ही कहीं न कहीं सशस्त्र आंदोलन पैदा होते हैं. आपको लगता है कि इस तरह सशस्त्र आंदोलन कोई विकल्प हो सकता है ?

विकल्प तो नहीं लेकिन यह प्रतिक्रियास्वरूप ही है. जब आप लोगों की शांतिपूर्ण बातों को, प्रतिरोध को नहीं सुनेंगे तो अंत में आदमी तो आदमी होता है. भले ही उसे अपनी जीत का विश्वास न हो तो भी वह हथियार उठा लेता है. वो कहते हैं न कि मरता क्या न करता, वही स्थिति है.

ये सरकार एक तरह से लोगों को हथियार उठाने के लिए मजबूर करती है. हालांकि दुनिया भर के इतिहास से पता चलता है कि हथियार उठाने से छोटे समूहों को कुछ खास हासिल नहीं होता. फिर उसमें वो सफल तभी होते हैं, जब अंतरराष्ट्रीय शक्तियां इनके समर्थन में आ जाएं. जैसे तिमूर के अंदर इंडोनेशिया में हुआ. पूरे दुनिया भर की शक्तियां उसके पक्ष में आईं तो अंतत: उनको स्वतंत्रता देना पड़ा. लेकिन ऐसा बहुत न्यूनतम मामलों में होता है.

आज की तारीख में स्टेट की शक्ति इतनी व्यवस्थित है कि इस तरह के प्रतिरोध भले लंबे समय तक चल जायें, लेकिन उसका कोई खास परिणाम नहीं निकलता. उदाहरण के लिये कोलंबिया को ही देख लें. कोलंबिया में 40-50 साल से संघर्ष कर रहे हैं लेकिन अब भी वहां इस तरह के विवाद हैं. एक तरफ केंद्रीय सत्ता दूसरी तरफ विद्रोही लोग हैं. वहां एक तरह से यथास्थिति की स्थिति है. कहीं कुछ निकल नहीं रहा है. एक के बाद दूसरी पीढ़ी लड़ाई लड़ रही है. लेकिन सत्ता का गतिरोध उसी तरह है. तो हिंसा की बहुत ज़्यादा गुंजाइश नहीं रह गई है.
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