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शरद यादव से बातचीत

संवाद

जाति है तो इस्तेमाल करेंगे ही

शरद यादव से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

शरद यादव

जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और एनडीए के संयोजक शरद यादव इन दिनों लगातार चिंतन की मुद्रा में रहते हैं और नाराज़ भी. समाजवादियों के बिखराव पर बात करते-करते वे मिठाई-नमकीन और यूरोप के नृत्य पर बतियाने लग जाते हैं. वे मानते हैं कि लालू यादव और मुलायमसिंह यादव जैसे लोग समाजवादी नहीं हैं. न्यूज चैनलों को डब्बा बता कर बंद करने की बात करने वाले और मीडिया के एक वर्ग से खासे नाराज शरद यादव यह बताना नहीं भूलते कि दिल्ली के अलावा देश के जो पत्रकार हैं, उनमें राजनीतिक दृष्ठि की कमी है, वे कहीं से लूट-फूट करके, धमका-धुमकी कर के पैसे कमाते हैं. वे कहते हैं कि अगर नक्सलियों का नेतृत्व आदिवासी करें तो उनके जैसे लोग भी उनके साथ खड़े हो जाएंगे. यहां पेश है, पिछले सप्ताह उनसे की गई बातचीत.


जिस दौर में समाजवादी आंदोलन शुरू हुआ और जिन मुद्दों को लेकर आपने राजनीति शुरू की, वो मुद्दे जस के तस बने हुए हैं. कहीं-कहीं तो सवालों की भयावहता और बढ़ी है. ऐसे में..

नहीं जस के तस नहीं हैं, और बिगाड़ हुआ है. खास करके हमने जो विकास का मॉडल बनाया है, वो एक हद तक सफल हुआ है लेकिन वो मुट्ठी भर लोगों की सफलता है. इसका लाभ एक हिस्से को मिला. जिसे आप समृद्ध वर्ग कहते हैं, उसे फायदा हुआ. बाकी गरीबी, भ्रष्टाचार और बेकारी बढ़ गई है. और एनआरआई बहुत बाहर गये है तो उसके चलते विदेशी भंडार में काफी इजाफा हुआ है. वो तो बाद में लोग कमाकर यहां भेजते हैं, लेकिन वो एक्सपोर्ट सेवर नहीं है. तो बदलाव हुआ है लेकिन यह संपूर्ण देश के हित में न होकर कुछ वर्ग के हित में हुआ है.

जिन मुद्दों को लेकर आपलोग एकजुट हुए थे, एक साथ आंदोलन में आए थे, वो सारे मुद्दे सब तरफ बिखरे हुये हैं और आप लोग भी.

नहीं, पार्टिंयां बिखरी है, विचार नहीं बिखरा है. विचार तो उतना ही तेजस्वी और ताकतवर तरीके से देश में बढ़ते जा रहा है. जो यूरोप और ग्लोबल मार्केट है उसे आप रोक नहीं सकते, आप बाजार को तो नहीं रोक सकते लेकिन बाजार के चलते दुनिया पास-पास आयी है. उसमें कला और संस्कृतियों का मेल और आदान-प्रदान होगा, लेकिन यह एकतरफा हो गया है. हमारा जो शासक वर्ग है, उसके उठने, बैठने, खाने-पीने, बोली-भाषा में संपूर्ण तौर पर यूरोप की सभ्यता का प्रभाव है. जबकि हमारे यहां एग्रीकल्चर, बाजार और साहित्य की भी अपनी संस्कृति है. दुनिया का मेल होना चाहिए था लेकिन उनकी और हमारी अच्छाईयों का होना था, लेकिन वो नहीं हुआ.

बाजार या ग्लोबलाइजेशन से हिंदुस्तान की सारी परंपरागत चीजें जैसे एग्रीकल्चर, बाजार और साहित्य की संस्कृति एक तरह से खतरे में है. अब जैसे हमारे यहां जो मिठाई, नमकीन और चाट की संस्कृति है, इनके मुकाबले दुनिया में कोई चीज नहीं है. इतनी तरह के मसालों के साथ भोजन यहां बनता है, इतना मसाले हैं यहां, कई तरह की तो मिठाई ही बनती है लेकिन बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां प्रचार कर रही हैं. इसी तरह हर क्षेत्र में है. जैसे संगीत में, हमारे यहां का शास्त्रीय गायन जो है, उसका न्यूमरिकल तो दुनिया में सब जगह चला गया लेकिन शास्त्रीय संगीत में सात सुरों का जो कमाल है, वह यहीं है. यहां जो नृत्य होता है, उसमें घुंघरू से लेकर शरीर से लेकर सभी चीजें सुरों पर लहराती है लेकिन उनका संगीत हमारे यहां के आदिवासी नृत्य, संगीत जैसा है. यानी बहुत सामान्य. यूरोपीय संस्कृति में नृत्य महज शरीर को हिलाने पर आधारित है जैसे सर्कस में जो काम होता था, ठीक वैसा ही. हमारे यहां के समृद्ध तबके ने सबसे अधिक उसी को अपना कर रखा है.

मैं समाजवादियों की बात कर रहा था. आपने एक बात कही कि दुनिया पास-पास आ गई है, संस्कृतियों का मेल हो रहा है., लोग आपस में मिल जुल रहे हैं तो क्या समाजवादियों में ऐसी कोई संभावना बनती है. समाजवादी दल के बारे में कहा जाता है कि इस दल के टुकड़े हजार हुए कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा. क्या मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और आप के बीच मिलने की कोई संभावना बनती है ?

नहीं-नहीं, ये समाजवादी पार्टी में टूट और एका होती थी. आप जिनके नाम ले रहे हैं, ये समाजवादी लोग नहीं हैं. ये लोग समाजवाद की पार्टी में आ गए थे. इनका पूरी तरह से संस्कार नहीं बना, दृष्टि नहीं बनी और ये समाजवाद नहीं है, ये तो परिवार की पार्टियां हैं. इनमें और करूणानिधि, नेहरू खानदान में कोई फर्क नहीं है. वो बड़े हैं, ये छोटे हैं.

समाजवाद का मतलब है संपन्नता और संपूर्ण समाज को एक तरह से बराबरी की दृष्टि देना, हौसला देना. ये समाजवादी पार्टी में अपने हितों के लिए अपने करियर के लिए आए हुए लोग थे. समाजवादी मतलब, जैसे नीतीश कुमार है, समाजवादी आंदोलन की जो दृष्टि है, उसका जो संस्कार है, वो उसको हासिल है. जनेश्वर मिश्रा थे, मोहन सिंह हैं, ब्रजभूषण तिवारी हैं, रघु ठाकुर हैं, मोहन प्रकाश आजकल कांग्रेस में हैं,चंद्रभान कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष हैं, श्रीकांत जेना हैं. ये अलग-अलग पार्टी में बिखर गए लेकिन जो विचार है, वो बढ़ा है, घटा नहीं है. यानी डा. लोहिया के विचार की चर्चा, उनका साहित्य व्यापक पैमाने पर लोगों के पास फैला है. पहले वह साहित्य मिलता नहीं था, सो छपवाया है. मस्तराम कपूर ने उसके 11 खंड निकाले हैं. समाजवाद एक राजनीतिक संगठित पार्टी नहीं है लेकिन विचार बहुत फैला हुआ है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Anitesh [kumaranitesh@yahoo.co.in] Delhi - 2011-10-31 10:28:36

 
  शरद जी ने कहा सही लेकिन देश की जनता राजनीति से परे है. उसे कुछ समझ में नहीं आता. 
   
 

Prabhat [prabhat_sinha@yahoo.com] Noida - 2011-10-10 13:17:31

 
  The comments given on this article show the irritation they have towards Sharad Yadav. Sharad Yadav is 1 of the few politicians we have who has knows the real India. Hence we can understand the allergy of the urban middle class to Sharad Yadav.  
   
 

पारस पाठक [] बिलासपुर, छत्तीसगढ़ - 2011-09-22 04:37:38

 
  देश में सिर्फ एक ही आदमी काम का है, जिसमें समझदारी कूट—कूटकर भरी है। वह प्रदेश चला सकता है, देश चला सकता है, दुनिया चला सकता है। ये बात और है कि खुद वह कबूल रहा है कि आज तक जनता ने उसे इस लायक नहीं समझा! वह महानुभाव है शरद यादव उनकी बातों को सुनकर तो कम से कम ऐसा ही लग रहा है। कभी उन्हें लगता है कि सिर्फ दिल्ली के पत्रकार ही समझदार हैं, बाकी पत्रकार यूं ही यहां आ गए हैं, टहलने। तो कुछ ही देर में उन्हें लगने लगता है कि दिल्ली के लोग किसी काम के नहीं। वे खुद ही कहते हैं कि दिल्ली वाले थे, इसलिए अन्ना हजारे का मामला बिगड गया। हम रहते तो सब संभाल लेते! अचानक उन्हें आत्मग्लानि होने लगती है, तभी तो वे कहते हैं हम छोटी जात के हैं, इसलिए महिला आरक्षण बिल रोकते सब हैं और नाम उनका सामने कर दिया जाता है। न्यूज चैनल को डिब्बा कहकर बंद कराने की बात तो वे करते हैं, लेकिन इसी डिब्बे पर पावडर—क्रीम पोतकर झक सफेद पहनावे में अपनी सूरत लोगों को दिखाने से उन्हें गुरेज नहीं है। शायद उनका गुस्सा इसी बात को लेकर है कि इस डिब्बे में उनसे ज्यादा दूसरों के चेहरे दिखते हैं। अपना यह दर्द वे कई बार यह कहकर बयां भी कर चुके हैं कि टीवी वाले माइक टिकाकर पक्ष तो ले जाते हैं लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी कुछ दिखता नहीं है। साहब जब आप टीवी को डिब्बा ही मानते हैं तो फिर कैसा इंतजार!रही बात अपने साथियों को जेल भिजवाने की तो इस बयान पर भी आपकी तथाकथित समझदारी की दाद दी जानी चाहिए। शायद जाति की ओछी राजनीति करने से आपको इतनी भी फुरसत नहीं मिली कि यह समझ पाते कि वकीलों या शिक्षकों के एसोसिएशन को किसी को जेल भेजने का हक हासिल नहीं है, लेकिन संसद को है। इसलिए लोगों की उम्मीद आप से है। जिन लोगों को जेल भेजने की बात कह आप अपनी पीठ ठोंक रहे हैं, उनसे बडे खिलाडी अब भी उसी संसद में हैं, शायद आपकी सीट के अगल—बगल भी। और रही बात नीयत की, तो आपके साथियों की जेलयात्रा में आपकी नेकनीयती से ज्यादा उसी डिब्बे और नासमझ पत्रकारों का हाथ रहा है। अब बात पत्रकारों द्वारा धमका—धुमकी कर कमाई की। तो यादव जी ऐसा है कि धमकी से डरेगा वही जिसने कुछ काला—पीला किया है। आप डर रहे हैं मतलब आपमें खोट है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसे भ्रष्ट पत्रकारों का अनुपात, भ्रष्ट नेताओं की तुलना में तिनके के बराबर भी नहीं है। 
   
 

Ravindra kumar Sen [ravindrapatna.2000@gmail.com] Patna - 2011-09-20 14:00:21

 
  शरद यादव ये बात क्यों भूल जाते हैं कि चुनाव के समय वह स्थानीय मीडिया के पास ही अपनी बात कहने के लिये आते हैं, न कि दिल्ली के कथित राजनीतिक समझ वाले पत्रकारों के पास. यह साक्षात्कार चकित करता है कि शरद यादव जैसे राजनेता इतने दंभ के साथ सबको मूर्ख साबित करने में लगे हुए हैं. 
   
 

Ajay Singh Baghel [ajaysinghbaghel@gmail.com] Jabalpur - 2011-09-20 13:56:26

 
  लगता है शरद जी अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं.संसद में बहस के बाद उनका यह साक्षात्कार तो इस बात को और पुष्ट करता है. मेरी पूरी संवेदना उनके साथ है. 
   
 

bablu [mgmihirgoswami@gmail.com] bilaspur c g - 2011-09-20 12:03:46

 
  पत्रकार ऐसे होंगे तो संपादक क्या कर रहे होंगे...!!! 
   
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