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शरद यादव से बातचीत
संवाद
जाति है तो इस्तेमाल करेंगे ही
शरद यादव
से
आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और एनडीए के संयोजक शरद यादव इन दिनों लगातार चिंतन की मुद्रा में रहते हैं और नाराज़ भी. समाजवादियों के बिखराव पर बात करते-करते वे मिठाई-नमकीन और यूरोप के नृत्य पर बतियाने लग जाते हैं. वे मानते हैं कि लालू यादव और मुलायमसिंह यादव जैसे लोग समाजवादी नहीं हैं. न्यूज चैनलों को डब्बा बता कर बंद करने की बात करने वाले और मीडिया के एक वर्ग से खासे नाराज शरद यादव यह बताना नहीं भूलते कि दिल्ली के अलावा देश के जो पत्रकार हैं, उनमें राजनीतिक दृष्ठि की कमी है, वे कहीं से लूट-फूट करके, धमका-धुमकी कर के पैसे कमाते हैं. वे कहते हैं कि अगर नक्सलियों का नेतृत्व आदिवासी करें तो उनके जैसे लोग भी उनके साथ खड़े हो जाएंगे. यहां पेश है, पिछले सप्ताह उनसे की गई बातचीत.
• जिस दौर में समाजवादी आंदोलन शुरू हुआ और जिन मुद्दों को लेकर आपने राजनीति शुरू
की, वो मुद्दे जस के तस बने हुए हैं. कहीं-कहीं तो सवालों की भयावहता और बढ़ी है.
ऐसे में..
नहीं जस के तस नहीं हैं, और बिगाड़ हुआ है. खास करके हमने जो विकास का मॉडल बनाया
है, वो एक हद तक सफल हुआ है लेकिन वो मुट्ठी भर लोगों की सफलता है. इसका लाभ एक
हिस्से को मिला. जिसे आप समृद्ध वर्ग कहते हैं, उसे फायदा हुआ. बाकी गरीबी,
भ्रष्टाचार और बेकारी बढ़ गई है. और एनआरआई बहुत बाहर गये है तो उसके चलते विदेशी
भंडार में काफी इजाफा हुआ है. वो तो बाद में लोग कमाकर यहां भेजते हैं, लेकिन वो
एक्सपोर्ट सेवर नहीं है. तो बदलाव हुआ है लेकिन यह संपूर्ण देश के हित में न होकर
कुछ वर्ग के हित में हुआ है.
• जिन मुद्दों को लेकर आपलोग एकजुट हुए थे, एक साथ आंदोलन में आए थे, वो सारे मुद्दे
सब तरफ बिखरे हुये हैं और आप लोग भी.
नहीं, पार्टिंयां बिखरी है, विचार नहीं बिखरा है. विचार तो उतना ही तेजस्वी और
ताकतवर तरीके से देश में बढ़ते जा रहा है. जो यूरोप और ग्लोबल मार्केट है उसे आप
रोक नहीं सकते, आप बाजार को तो नहीं रोक सकते लेकिन बाजार के चलते दुनिया पास-पास
आयी है. उसमें कला और संस्कृतियों का मेल और आदान-प्रदान होगा, लेकिन यह एकतरफा हो
गया है. हमारा जो शासक वर्ग है, उसके उठने, बैठने, खाने-पीने, बोली-भाषा में
संपूर्ण तौर पर यूरोप की सभ्यता का प्रभाव है. जबकि हमारे यहां एग्रीकल्चर, बाजार
और साहित्य की भी अपनी संस्कृति है. दुनिया का मेल होना चाहिए था लेकिन उनकी और
हमारी अच्छाईयों का होना था, लेकिन वो नहीं हुआ.
बाजार या ग्लोबलाइजेशन से हिंदुस्तान की सारी परंपरागत चीजें जैसे एग्रीकल्चर,
बाजार और साहित्य की संस्कृति एक तरह से खतरे में है. अब जैसे हमारे यहां जो मिठाई,
नमकीन और चाट की संस्कृति है, इनके मुकाबले दुनिया में कोई चीज नहीं है. इतनी तरह
के मसालों के साथ भोजन यहां बनता है, इतना मसाले हैं यहां, कई तरह की तो मिठाई ही
बनती है लेकिन बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां प्रचार कर रही हैं. इसी तरह हर क्षेत्र में
है. जैसे संगीत में, हमारे यहां का शास्त्रीय गायन जो है, उसका न्यूमरिकल तो दुनिया
में सब जगह चला गया लेकिन शास्त्रीय संगीत में सात सुरों का जो कमाल है, वह यहीं
है. यहां जो नृत्य होता है, उसमें घुंघरू से लेकर शरीर से लेकर सभी चीजें सुरों पर
लहराती है लेकिन उनका संगीत हमारे यहां के आदिवासी नृत्य, संगीत जैसा है. यानी बहुत
सामान्य. यूरोपीय संस्कृति में नृत्य महज शरीर को हिलाने पर आधारित है जैसे सर्कस
में जो काम होता था, ठीक वैसा ही. हमारे यहां के समृद्ध तबके ने सबसे अधिक उसी को
अपना कर रखा है.
• मैं समाजवादियों की बात कर रहा था. आपने एक बात कही कि दुनिया पास-पास आ गई है,
संस्कृतियों का मेल हो रहा है., लोग आपस में मिल जुल रहे हैं तो क्या समाजवादियों
में ऐसी कोई संभावना बनती है. समाजवादी दल के बारे में कहा जाता है कि इस दल के
टुकड़े हजार हुए कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा. क्या मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद
यादव और आप के बीच मिलने की कोई संभावना बनती है ?
नहीं-नहीं, ये समाजवादी पार्टी में टूट और एका होती थी. आप जिनके नाम ले रहे हैं,
ये समाजवादी लोग नहीं हैं. ये लोग समाजवाद की पार्टी में आ गए थे. इनका पूरी तरह से
संस्कार नहीं बना, दृष्टि नहीं बनी और ये समाजवाद नहीं है, ये तो परिवार की पार्टियां
हैं. इनमें और करूणानिधि, नेहरू खानदान में कोई फर्क नहीं है. वो बड़े हैं, ये छोटे
हैं.
समाजवाद का मतलब है संपन्नता और संपूर्ण समाज को एक तरह से बराबरी की दृष्टि देना,
हौसला देना. ये समाजवादी पार्टी में अपने हितों के लिए अपने करियर के लिए आए हुए
लोग थे. समाजवादी मतलब, जैसे नीतीश कुमार है, समाजवादी आंदोलन की जो दृष्टि है, उसका
जो संस्कार है, वो उसको हासिल है. जनेश्वर मिश्रा थे, मोहन सिंह हैं, ब्रजभूषण
तिवारी हैं, रघु ठाकुर हैं, मोहन प्रकाश आजकल कांग्रेस में हैं,चंद्रभान कांग्रेस
पार्टी में अध्यक्ष हैं, श्रीकांत जेना हैं. ये अलग-अलग पार्टी में बिखर गए लेकिन
जो विचार है, वो बढ़ा है, घटा नहीं है. यानी डा. लोहिया के विचार की चर्चा, उनका
साहित्य व्यापक पैमाने पर लोगों के पास फैला है. पहले वह साहित्य मिलता नहीं था, सो
छपवाया है. मस्तराम कपूर ने उसके 11 खंड निकाले हैं. समाजवाद एक राजनीतिक संगठित
पार्टी नहीं है लेकिन विचार बहुत फैला हुआ है.
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• ये फैले हुये जो लोग हैं, इसके संगठित होने की कोई गुंजाइश है?
नहीं, अभी नहीं.
• लेकिन आपने जिन लोगों का नाम लिया उनके साथ तो आपके बहुत सारे मुद्दों पर सहमतियां
है. जैसे महिला आरक्षण के मुद्दे पर लालू यादव,मुलायम सिंह यादव और आप तो एक साथ खड़े
हैं.
उसमें तो पूरी संसद की सहमति है. हमारा नाम लेते हैं क्योंकि छोटी जात है हमारी.
इसलिए दो-तीन लोगों का नाम लगा देते हैं. जबकि उसमें गोपीनाथ मुंडे हैं, उसमें
कांग्रेस पार्टी में बड़ी संख्या है. जो हमारी पार्टी से निकलकर गए हैं, वे सब इस
राय के हैं कि महिला आरक्षण हो लेकिन बहुसंख्यक जो महिला है, पहले उसका विधेयक हो.
• आपने समाजवादियों के इधर-उधर आने-जाने की बात कही. किसी जमाने में जनसंघ के मुद्दे
पर आप लोगों ने सरकार छोड़ दी थी. फिर कांग्रेस के साथ गए, भाजपा के साथ आए, गये,
आये तो आने-जाने का ये जो सिलसिला है, इसमें आपको लगता है कि विचारधारा की राजनीति
खत्म हो गई है या उसकी कोई गुंजाइश नहीं बची है.
ये गलत बहस चलती है. भारतीय समाज की जो बनावट है, उस बनावट में....आपने बीजेपी का
नाम लिया...उसके साथ मेल और अलग होना, ये कई बार हुआ है. जैसे बाबरी मस्जिद के मामले
में हम और वो आमने-सामने लड़े हैं और जब अटल जी की सरकार बनीं तो उसकी गोलबंदी हम
लोगों ने की. और पांच-छह साल वो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर चली है. जो विवादास्पद
मुद्दे हैं वो परे किए गए. कॉमन सिविल कोड है, मंदिर का मामला है, धारा 370 है, ये
सब को परे किया गया, इन्हें छू नहीं सकते आप. बाकी मुद्दों को मिलाकर साझा न्यूनतम
कार्यक्रम बनाया और सरकार चलाई.
संकट ये है कि देश में चुनाव में नतीजे ऐसे आते हैं. नतीजे साझा सरकार के आ रहे हैं
तो क्या हम फिर इस्तीफा देकर जाएं ?
• आपने तो कई बार इस्तीफा दिया, तीन-तीन बार.
एक व्यक्ति का इस्तीफा देना... और पूरी पर्लियामेंट का इस्तीफा देना, लोकतंत्र की
मौत है.
• इसलिए ये समझौतें जारी हैं !
रहेंगे साझे. जब समाज में समझौते हैं...जिस मोहल्ले में हम रहते हैं, वहां हजारों
समझौते करके रहते हैं, एक हजार मुद्दे आते रहते हैं.
• भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही जा रही है. राजनीति
में दखल रखने वाला देश का बहुत बड़ा वर्ग कह रहा है कि अगर आपकी सरकार बनी तो
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होंगे.
ये निरर्थक बहस है. देश बहुत बड़ा है.पच्चीसों पार्टी है, उसका फैसला, उसकी चर्चा
करने का काम मीडिया का है. ये फुर्सत में है, 24 घंटे इसको न्यूज देना है. इसमें
गैर राजनीतिक लोगों की संख्या ज्यादा है. गैर राजनीतिक दृष्टि वाले पत्रकार हैं.
कुछ ही लोग हैं जो इस मामले में मजबूत हैं. उन्हीं से पत्रकारिता चल रही है. अब उनकी
ये गॉशिप हैं...गप्पबाजी चलती रहती है. ये बीस-पच्चीस आदमी को प्रधानमंत्री बना चुके
हैं. कई तो अपने मुंह से बोलते हैं कि रामविलास पासवान, लालू यादव,मुलायम सिंह,
मायावती... अब ये नया दौर शुरू हुआ है. इस देश में 50-52 पार्टियां है, किसी एक
पार्टी के आदमी का प्रधानमंत्री बनना मुश्किल है, क्योंकि जैसा ये देश था, जैसे-जैसे
आजादी हो रही थी, जैसे कुत्ते की टेढ़ी पूंछ होती है, वो ज्यों का त्यों रहती है.
वैसे ही देश की बीमारियां सामने आ रही हैं.
एक उदाहरण है. तीन आदमी को फांसी की सजा हुई. एक भुल्लर, दूसरा राजीव गांधी की हत्या
करने वाले, अतिवादी लोग हैं, तीसरा कश्मीर के अफजल. कश्मीर मामले में तो गाली देने
लगेंगे लोग, लेकिन तमिलनाडू में क्या हुआ? पंजाब में क्या हो रहा है? सिक्ख सिक्ख
हो गया, तमिल तमिलियन हो गया, कश्मीरी कश्मीरी हो गया तो अकेले कश्मीरी कश्मीरी हो
गया. यानी तीनों जगह बीमारी के अपने-अपने कारण हैं. हमारा लोकतंत्र हजारों-हजार
वर्ष की हिंदुस्तान की बीमारी को सामने ला रहा है.लेकिन अफसोस ये कि यहां का
लोकतंत्र उसको चुनौती से निपटाना नहीं करना चाहता. क्योंकि जो लोग सरकार में हैं,
वो सदियों से बिगाडऩे वाले लोग हैं. उसके चलते वो लाभ लेना चाहते हैं, उसको सुधारना
नहीं चाहते. नहीं सुधारेंगे तो उनका नाश होगा और देश का नाश होगा.
• अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा जो लोग निशाने पर रहे, वो राजनीतिज्ञ
थे. क्या राजनीतिज्ञों की विश्वसनीयता कम हुई है.
बिल्कुल झूठ और गलत है. उन्होंने कौन से सब राजनीतिज्ञों को कहा? उनकी लड़ाई
कांग्रेस पार्टी से थी. फिर उनके आसपास जो लोग आए, वो दिल्ली के रहने वाले थे,
जिन्हें राजनीति आती नहीं. उन्होंने कुछ ऐसे भाषण दिए हैं.
जिस दिन मनीष तिवारी और कपिल सिब्बल ने उन पर हमला किया और दूसरे दिन जब संसद में
बहस हुई तो हम ही थे, जिन्होंने कपिल सिब्बल को चुनौती दी थी. वो बोला कि हम दो ही
मिनिस्ट्री चलाते हैं. हमने कहा गलत है, तुम सारी मिनिस्टी चला रहे हो, और ये जो
सारा गड़बड़ कर रहे हो, इसमें तुम्हारा बहुत बड़ा हाथ है. और मनीष तिवारी जिस तरह
बोला.... मैं अन्ना हजारे को जानता हूं. वो ईमानदार आदमी हैं. उनकी विचारधारा कैसी
और क्या है, मैं इस पर नहीं जाना चाहता. लेकिन मैं जानता हूं कि वे एक ईमानदार आदमी
हैं. कबीर का एक दोहा है- झीनी-झीनी बीनी चदरिया, दास कबीर जतन से ओढ़े, जस की तस
धर दीनी चदरिया. इसी तरह कर्पूरी ठाकुर था, जयप्रकाश नारायण थे, लोहिया थे. बहुत
सारे लोग, हजारों लोग हैं ऐसे. यह आदमी ईमानदारी के मामले में उसी तरह का आदमी है.
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सबसे पहले हमने ही कांग्रेस को ललकारा, उनको डिफेंड किया. अन्ना हजारे सबके खिलाफ
कहां हैं ? विपक्ष ने अगर साथ नहीं दिया होता तो उनके साथ भी वही होता, जो बाबा
रामदेव के साथ हुआ था. विपक्ष के भय के कारण ही लोकतांत्रिक तरीके से उनका आंदोलन
चल पाया.
• अन्ना हजारे के पूरे आंदोलन के दौरान आम जनता में जो माहौल बना, मैं उसकी बात कर रहा
हूं. आम जनता के निशाने पर सबसे अधिक राजनीतिज्ञ ही थे. जनता में यह साफ बात थी कि
राजनीति में भ्रष्ट लोग हैं और इनको हटाया जाए.
ऐसा उन्होंने कभी नहीं कहा.
• आप पहले सवाल सुन लें. मैं अन्ना हजारे की नहीं, आम जनता की बात कर रहा हूं.
आम जनता जो है, वो तो गणपति को दूध पिला देती है. और सारे राजनीतिज्ञ कैसे खराब हो
गए ? अकेले एक बात लाए थे आप, राजनीतिज्ञ लोगों की, जिसमें सबसे ज्यादा ईमानदार लोग
हैं. बाकी जितनी बात आप लाए, उसमें तो बेईमानी का ही पूरा खेल है. उसमें तो आवाज
उठाने वाले लोग भी नहीं हैं.
यहां तो हम अपने साथी को, जो हमारे बाजू में मंत्री बैठा है, उसको जेल भेजते हैं.
27 आदमी हमारी जमात ने ही बंद किए हैं. 11 आदमी 25-30 -50 हजार रुपए स्टींग आपरेशन
में ले लिए तो हमने तेरह दिन के भीतर उनको बाहर निकाला. अभी कैश फॉर वोट में सब बंद
हैं. टीचर एसोसिएशन है, लायर्स एसोसिएशन है, उसमें किसी ने किसी को बंद करवाया ?
बताइए ? हम चर्चा में ज्यादा है. जो विकास है, उसमें लूट हो रही है. तो जो लूट हो
रही है, उसमें हमारे बीच का राजनीतिज्ञ भी कर रहा है और जो बाहर के लोग है वो तो
टोटली लूट रहे हैं. कुछ ही लोग ईमानदार हैं उसमें. लोग राजनीतिज्ञों को क्या कह रहे
हैं, उससे थोड़े ही कुछ हो जाता है...! नेता और राजनीत जो है, वो विचार और अपनी सोच
पर है कि देश ठीक कैसे होगा, उस पर अड़ने से होता है.
• आपकी समझ से देश के सामने राजनीति के तीन-चार सबसे बड़े मुद्दे क्या है?
देश में सबसे बड़ा मुद्दा तो गरीबी है. गरीबी को ठीक करने के रास्ते खोजना इस देश
को मजबूत करना है. आज इस देश का दुनिया में कोई दोस्त नहीं है. कोई दोस्त नहीं है.
न यूरोप दोस्त है आपका, न अमरीका दोस्त है. रूस टूट गया है, चीन आपका दोस्त नहीं
है. पाकिस्तान आपका दोस्त नहीं है, नेपाल आपका दोस्त नहीं है,श्रीलंका आपका दोस्त
नहीं है, बर्मा आपका दोस्त नहीं है, कोई दोस्त नहीं है.
दोस्त उसका होता है, जिसकी जनता मजबूत होती है. अर्जुन सेन गुप्ता कहते हैं कि 63
साल की आजादी के बाद भी 80 फीसदी जनता 20 रुपए रोज में गुजारा करती है. हम लोग तो
हमेशा विपक्ष में ही रहे. जो लोग भी देश को चला रहे थे, वो दुष्ट लोग थे. वो दुष्टता
भीतर कर सकते हैं, बाहर उनको पूछने वाला कोई नहीं है. अमरीका एक ललकार लगाएगा तो
अटेंशन हो जाएंगे-हुजूर बोलो क्या करना है ! आपसे कहेंगे कि हम नहीं मानते हैं.
पाकिस्तान हिंदुस्तान में अमरीका जो चाहेगा, वो होगा. इसलिए होगा क्योंकि इनका
आर्थिक, सामाजिक सब तरह का रिश्ता उससे है.
सौ फीसदी आदमी को मजबूत करेंगे तभी हमारा भविष्य ठीक होगा. जैसे चीन है, आज उससे
कोई बोल सकता है? दुनिया डरती है उससे, डर का मतलब उसका लिहाज करती है. आपका दुनिया
में कोई लिहाज नहीं करता. श्रीलंका भी नहीं करता. आपने इस देश को यहां लाकर खड़ा कर
दिया है. इतने साल के हिंदुस्तान की आजादी का उपयोग आपने मुट्ठी भर लोगों को मजबूत
करने के लिए किया, जनता को मजबूत नहीं किया.
हमारे हाथ में एक सरकार है. डाक्टर लोहिया का जो समाजवादी कार्यक्रम है, वो पहली
बार हम लागू कर रहे हैं. और उसमें अपनी बुद्धि.... लेकिन वहां भारत सरकार हमें मदद
करने को तैयार नहीं है.
• प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नक्सलवाद सबसे
बड़ी समस्या है.
वो जानते नहीं हैं. मनमोहन सिंह जो बात बोल रहे हैं, मैं उसे वाजिब नहीं मानता.
नक्सलवाद ज्यादातर आदिवासी इलाकों में है. ज्यादातर गरीब इलाकों में. वहां विकास नहीं
हुआ, लूट हुई है वहां. वहां जंगल कट गए हैं. उनका जो सहज जीवन था, वो पूरी तरह से
बिखर गया है. उन्हें जीने की चिंता हो गई है. उस चिंता में जो गैर आदिवासी लोग हैं,
वो उनके नेता हो गए हैं. वहां का जो पिछड़ापन है, वहां का जंगल,पानी,पशु-पक्षी, आपने
सब नष्ट कर दिया.
भारत का अधिकांश खनिज आदिवासी इलाकों में है, क्योंकि आदिवासी पहाड़ी इलाके में रहता
हैं. उसका जीवन खतरे में हैं, उसकी संस्कृति खतरे में है. उसकी जीवन की आदत खतरे
में है. तो वो खड़ा हुआ है. जिस तरह अफगानिस्तान में लड़ाई कठिन है, उसी तरह यहां
भी पहाड़ी इलाकों में लड़ाई मुश्किल है. सरकार ने कहा था कि फौज उतारेंगे तो मैंने
कहा कि ये कतई न करें. देश के अंदर फौज करने लगे तो एक दिन ये भी होगा कि ये फौज
बंद करो. क्योंकि फौज बाहरी खतरे से निपटने के लिए है, भीतर के खतरों से निपटने के
लिए नहीं.
जो समाज का सबसे सीधा आदमी है,जो संपत्ति के प्रति सबसे अधिक निरपेक्ष जमात है, वह
आदिवासी है, जिसमें किसी तरह का मोह-माया नहीं है. वहां मातृ संस्कति है. महिलाएं
महत्वपूर्ण है वहां. उनकी जो पूरी संस्कृति है वो जंगल, पहाड़, नदी-नाले, गीत-संगीत,
गाना-बजाना, ये सब खतरे में है. उनको गैर आदिवासी नेता मिल गये हैं.
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इनके जितने नेता
आप देखेंगे, वो गैरआदिवासी ही हैं. अफसोस एक ही बात की है कि उसमें कोई लीडर नहीं
हो रहा है. आदिवासियों के बीच से अगर कोई नेतृत्व संभालेगा तभी उनकी सच्ची समस्या
का समाधान होगा, वो लड़ेगा भी. हमारे जैसे लोग उसके साथ खड़े हो जाएंगे. उसकी मदद
करेंगे हम. आज जो चला रहे हैं, वहां तो आप के जैसे लोग पहुंच गए हैं लीडर बन के. मजे
से जी रहे हैं और नेता बने हुए हैं.
• जब आप गरीबी की समस्या का जिक्र करते हैं, तो 74 के आंदोलन में एक और समस्या को
जोर-शोर से उठाया गया था, वह थी जाति की समस्या. तब नारा चला था- जाति तोड़ो.
मैं कह रहा हूं कि भारतीय समाज को हर तरह की मजबूती तब मिलती है, जब हम बहुत सी
बीमारियों को खत्म करें. उसमें एक है धर्म का. एक है लाखों जातियां हैं. भारतीय
समाज को आपने खंड-खंड कर दिया है. जब खंड-खंड पानी बनता है तो पोखर हो जाता है. जब
पोखर बनता है तो पोखर सड़ता है. पोखर टूटकर जब नदी बन जाती है तब वह पानी पीने लायक
हो जाता है. तो भारतीय समाज खंड-खंड है. जातियों में बंटा हुआ है. इसलिए पाखंड है.
जाति जिस दिन टूटेगी, उस दिन ही क्रांति होगी. उस दिन ही इंसान, इंसान कहलाएंगे. अभी
तो कोई एक्स कहलाता है तो कोई वाई जाति का, कोई जेड जाति का है. इस कमरे में हम
अलग-अलग जात के लोग बैठे हैं. लेकिन न आपकी चमड़ी में अंतर है न मेरी चमड़ी में. न
मेरे खाने में अंतर है न मेरे आंख में. हो सकता है हजारों बरस पहले जाति व्यवस्था
अच्छी रही होगी लेकिन अब तो यह मारक हो गई है.
• राजनीति ने सबसे ज्यादा इसका इस्तेमाल किया है. आप लोगों ने बिहार में भी...
जब है तो करेंगे ही. पांच हजार साल की परंपरा है. आपकी पार्टी पांच साल, दस साल,
पचास साल पुरानी है. हजार साल का जो पुराना ढांचा है, वो तो पीछे काम करेगा ही.
• आप लोगों ने तो इसे खत्म करने के बजाय और उभारने का ही काम किया है.
मैंने कहा न कि ये बिहार की सरकार नहीं कर सकती. भारत की सरकार के हाथ में था ये.
वो रेडिकेट करने का प्रोग्राम लेती. हमारी तो कभी सरकार बनी नहीं. बनी भी तो हम साझा
सरकार में थे. हमने मंडल लगाया. मंडल आरक्षण के लिए नहीं था. मंडल शुद्र, अति शुद्र
एक करने के लिए था. वो एक होकर के लड़ता तो उसे हथियार उठाने की जरूरत नहीं थी. वो
एक जगह खड़ा हो जाएगा तो समस्या का समाधान हो जाएगा. तो वो फेल हो गया.
• ये जो डब्बा बंद करने का जुमला चला, उसको लेकर मीडिया में...
ये अपनी भारतीय भाषा में डब्बा ही कहा जाता है. देश के बहुत बड़े इलाके में जो गरीब
आदमी है, वो तो इसे डब्बा ही कहता है-डब्बा खोलो. डब्बा इस देश की भारतीय भाषाओं का
एक सटीक शब्द है. पुराने जमाने में जिस तरह से बाइस्कोप हुआ करता था, उसमें सब चीजें
दिखायी जाती थीं- लो ताजमहल देखो, लो कुतुबमीनार देखो. उसको डब्बा ही कहते थे. आप
अंग्रेजी में टीवी कहते हैं, गांव का आदमी उसको डब्बा कहता है.
• लेकिन आप तो इस डब्बे को बंद करने की बात कह रहे थे.
नहीं, मैंने नहीं कहा. डब्बा जो गलत कर रहा है, मैंने उसको बंद करने के लिए कहा था.
24 घंटे जो न्यूज चैनल के नाम से आप दिन भर मनोरंजन दिखा रहे हैं, वो तो ठीक नहीं
है. आपने न्यूज चैनल का नाम दिया है तो न्यूज दीजिए. उसमें कम से कम 40-50 फीसदी
न्यूज तो होना चाहिए. या राखी सावंत को दिन भर डांस कराएंगे आप ? या तंबू में बंबू
गाड़ेंगे आप? या बच्चों को गाना गवाकर या मसखरों को दिनभर खड़ा करा कर मसखराहट
कराएंगे? दिन भर सिनेमा दिखाएंगे ? ऐसा है, तो फिर आप इंटरटेनमेंट चैनल चलाइए, कौन
आपको रोक रहा है?
• पर्लियामेंट के जिस बहस के दौरान आपने यह कहा था, उस समय का एक सर्वे है कि उस पूरे
दौर में न्यूज चैनलों पर 93 फीसदी लोकपाल, अन्ना हजारे या राजनीति से जुड़ी खबरें
ही प्रसारित हुई हैं.
मैंने इसलिए कहा, क्योंकि देश में केवल एक मुद्दा नहीं है. उस समय पूरे उत्तर भारत
में, खासतौर पर गंगा की घाटी में असम में, बिहार में, यूपी में, बंगाल में 128 लोग
मर गए, वो खबर नहीं है? वो देश है. संसद या किसी जगह पर प्रदर्शन करना और देश का
इतना बड़ा इलाका बाढ़ में डूबा हुआ है, कोई पेड़ पर चढ़ा हुआ है, कोई छत पर रह रहा
है...शर्म नहीं आती है... आप कह रहे हैं कि 99 फीसदी खबर दिखा रहे हैं...यही गलत
कहता हूं मैं? एक ही खबर कैसे दिखा सकते हैं आप? एक बार दिखाइए, दो बार दिखाइए...
इतना बड़ा जो देश है, इस देश का जो गरीब आदमी है, जिसका यह देश है, 80-85 फीसदी आदमी
हैंड-टू-माउथ है, उसकी मौत हो रही है, उसको आप खबर नहीं मानते? आप नहीं मानते, मैं
मानता हूं. बोला मैंने ...दिल्ली में मुझसे कोई ये सवाल नहीं पूछता, क्योंकि मैं
किस संदर्भ में कह रहा हूं ये वो जानते हैं मुझको. हां, जब मैं थोड़ा नीचे आता हूं
तो पत्रकारिता में गैर राजनीतिज्ञ लोगों को भर रखा है लोगों ने. उनकी गलती नहीं है.
बेकारी है, बेरोजगारी है...पत्रकारिता ऐसी है कि तनख्वाह मिले न मिले, कहीं से
लूट-फूट करके, धमका-धुमकी के पैसा मिल जाता है. और नीचे जाएं तो वहां का पत्रकार तो
और भारी कॉम्प्लेक्स में रहता है.
20.09.2010, 12.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Anitesh [kumaranitesh@yahoo.co.in] Delhi - 2011-10-31 10:28:36 | | | |
शरद जी ने कहा सही लेकिन देश की जनता राजनीति से परे है. उसे कुछ समझ में नहीं आता. | | | | | | | | Prabhat [prabhat_sinha@yahoo.com] Noida - 2011-10-10 13:17:31 | | | |
The comments given on this article show the irritation they have towards Sharad Yadav. Sharad Yadav is 1 of the few politicians we have who has knows the real India. Hence we can understand the allergy of the urban middle class to Sharad Yadav. | | | | | | | | पारस पाठक [] बिलासपुर, छत्तीसगढ़ - 2011-09-22 04:37:38 | | | |
देश में सिर्फ एक ही आदमी काम का है, जिसमें समझदारी कूट—कूटकर भरी है। वह प्रदेश चला सकता है, देश चला सकता है, दुनिया चला सकता है। ये बात और है कि खुद वह कबूल रहा है कि आज तक जनता ने उसे इस लायक नहीं समझा! वह महानुभाव है शरद यादव उनकी बातों को सुनकर तो कम से कम ऐसा ही लग रहा है। कभी उन्हें लगता है कि सिर्फ दिल्ली के पत्रकार ही समझदार हैं, बाकी पत्रकार यूं ही यहां आ गए हैं, टहलने। तो कुछ ही देर में उन्हें लगने लगता है कि दिल्ली के लोग किसी काम के नहीं। वे खुद ही कहते हैं कि दिल्ली वाले थे, इसलिए अन्ना हजारे का मामला बिगड गया। हम रहते तो सब संभाल लेते! अचानक उन्हें आत्मग्लानि होने लगती है, तभी तो वे कहते हैं हम छोटी जात के हैं, इसलिए महिला आरक्षण बिल रोकते सब हैं और नाम उनका सामने कर दिया जाता है। न्यूज चैनल को डिब्बा कहकर बंद कराने की बात तो वे करते हैं, लेकिन इसी डिब्बे पर पावडर—क्रीम पोतकर झक सफेद पहनावे में अपनी सूरत लोगों को दिखाने से उन्हें गुरेज नहीं है। शायद उनका गुस्सा इसी बात को लेकर है कि इस डिब्बे में उनसे ज्यादा दूसरों के चेहरे दिखते हैं। अपना यह दर्द वे कई बार यह कहकर बयां भी कर चुके हैं कि टीवी वाले माइक टिकाकर पक्ष तो ले जाते हैं लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी कुछ दिखता नहीं है। साहब जब आप टीवी को डिब्बा ही मानते हैं तो फिर कैसा इंतजार!रही बात अपने साथियों को जेल भिजवाने की तो इस बयान पर भी आपकी तथाकथित समझदारी की दाद दी जानी चाहिए। शायद जाति की ओछी राजनीति करने से आपको इतनी भी फुरसत नहीं मिली कि यह समझ पाते कि वकीलों या शिक्षकों के एसोसिएशन को किसी को जेल भेजने का हक हासिल नहीं है, लेकिन संसद को है। इसलिए लोगों की उम्मीद आप से है। जिन लोगों को जेल भेजने की बात कह आप अपनी पीठ ठोंक रहे हैं, उनसे बडे खिलाडी अब भी उसी संसद में हैं, शायद आपकी सीट के अगल—बगल भी। और रही बात नीयत की, तो आपके साथियों की जेलयात्रा में आपकी नेकनीयती से ज्यादा उसी डिब्बे और नासमझ पत्रकारों का हाथ रहा है। अब बात पत्रकारों द्वारा धमका—धुमकी कर कमाई की। तो यादव जी ऐसा है कि धमकी से डरेगा वही जिसने कुछ काला—पीला किया है। आप डर रहे हैं मतलब आपमें खोट है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसे भ्रष्ट पत्रकारों का अनुपात, भ्रष्ट नेताओं की तुलना में तिनके के बराबर भी नहीं है। | | | | | | | | Ravindra kumar Sen [ravindrapatna.2000@gmail.com] Patna - 2011-09-20 14:00:21 | | | |
शरद यादव ये बात क्यों भूल जाते हैं कि चुनाव के समय वह स्थानीय मीडिया के पास ही अपनी बात कहने के लिये आते हैं, न कि दिल्ली के कथित राजनीतिक समझ वाले पत्रकारों के पास. यह साक्षात्कार चकित करता है कि शरद यादव जैसे राजनेता इतने दंभ के साथ सबको मूर्ख साबित करने में लगे हुए हैं. | | | | | | | | Ajay Singh Baghel [ajaysinghbaghel@gmail.com] Jabalpur - 2011-09-20 13:56:26 | | | |
लगता है शरद जी अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं.संसद में बहस के बाद उनका यह साक्षात्कार तो इस बात को और पुष्ट करता है. मेरी पूरी संवेदना उनके साथ है. | | | | | | | | bablu [mgmihirgoswami@gmail.com] bilaspur c g - 2011-09-20 12:03:46 | | | |
पत्रकार ऐसे होंगे तो संपादक क्या कर रहे होंगे...!!! | | | | | | |
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