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राज्य का शत्रु
संवाद
राज्य का शत्रु
जॉन ज़ेरज़न
से
डेरिक जेनसेन की बातचीत
अराजकतावाद का ज़िक्र करें तो ज़्यादातर लोग उथल-पुथल, बलवे और बम फेंकने के बारे में सोचने लगते हैं. लेकिन लेखक और सामाजिक आलोचक जॉन ज़ेरज़न के लिए अराजकतावाद का अर्थ हिंसक होकर सड़कों पर उतर आना नहीं. बल्कि यह हर प्रकार के प्रभुत्व को समाप्त कर देना है. इसमें सिर्फ राष्ट्र-राज्य और निगम ही नहीं बल्कि पितृ सत्ता, नस्लवाद और समलैंगिकों के प्रति घृणा जैसी आंतरिक रूप से रची-बसी संरचनाएँ भी हैं.
ज़ेरज़न पिछले 25 वर्षों से हमारी संस्कृति के सहायक तत्वों की चीर-फाड़ करते रहे हैं लेकिन वे अपनी सबसे नई किताब ‘‘एलीमेण्ट्स ऑफ रिफ्युजल’’ और ‘‘फ्युचर प्रीमीटिव’’ (आटोनोमेडिया) के लिए बेहतर जाने जाते हैं. उन्होंने लगभग सारे विषय ‘‘व्हाई आई हेट स्टार ट्रेक’’ से ‘‘द फेल्योर ऑफ सिमाबॉलिक थॉट’’ पर लेख प्रकाशित किए हैं. अपने हर प्रकार के लेखन में उन्होंने इस बात का भंडाफोड़ करने की कोशिश की है कि किस प्रकार दर्शन, धर्म, अर्थशास्त्र या अन्य आदर्शवादी संरचनाएँ, प्रभुत्व का औचित्य, इसे डार्विनियन सिद्धान्त का चयन या ईश्वर की इच्छा या आर्थिक जरूरत की एक स्वभाविक अभिव्यक्ति बताकर, सिद्ध करना चाहते हैं. बल्कि मूलतः उन्होंने प्रभुत्व का संबंध समय, संख्या और यहाँ तक कि भाषा के साथ भी सामने रखा है.
ज़ेरज़न से उनके घर यूजिन, आरेगॉन पर मेरी बातचीत उतनी ही बन्धनमुक्त थी जैसी कि मैंने दो अराजकतावादियों के बीच बैठक की अपेक्षा की थी. (हालांकि मैं अपने आप को अराजकतावादी कहता हूँ लेकिन किताब के पन्नों के बाहर मैंने कभी भी किसी अराजकतावादी से मुलाकात नहीं की थी. मैंने जिसकी अपेक्षा नहीं की थी, वह था ज़ेरज़न का मृदुभाषी चरित्र. उनका लेखन इतना पैना, अटल और तीक्ष्ण है कि आधे रास्ते तक मैं डर रहा था कि वे व्यक्ति के रूप में वैसे ही उग्र होंगे जैसा कि पन्नों पर है. मुझे एक सुखद निराशा हाथ लगी कि वे अति शालीन और शिष्ट व्यक्तियों में एक हैं, जिनसे मैं अब तक मिला हूँ.) मुझे चकित नहीं होना चाहिए था. अराजकतावाद, जैसा कि वे व्याख्या करते हैं, प्रभुत्व से मुक्त होने की इच्छा भर नहीं बल्कि दूसरों पर प्रभुत्व नहीं कायम करने की इच्छा भी है. जूली मायडा ने भी इस साक्षात्कार में अपना सहयोग दिया है.
• क्या कभी ऐसा कोई समाज अस्तित्व में रहा है, जिसमें संबंध प्रभुत्व पर आधारित नहीं थे ?
लाखों वर्षों से यही मानवीय स्थिति थी. यह केवल दस हजार साल पहले कृषि के आविष्कार के साथ जो हमें सभ्यता की ओर ले चला, बदली. उस समय से ही हमने इस बात पर अपने को तैयार करने के लिए काफी मेहनत की कि ऐसी परिस्थिति कभी नहीं थी और हमें यह मान लेना चाहिए दमन और दासता ‘शैतानी’ मानव स्वभाव के आवश्यक काट हैं. इस विचारधारा के अनुसार प्रभुत्व एक परोपकारी उद्धारक है, जो हमें महरूमी, बर्बरता और अज्ञान के सभ्यता पूर्व अस्तित्व से बचाता है. आप उन बिम्बों के बारे में सोचें, जो निएन्डरथल या गुफा मानव शब्द सुनते आपके मस्तिष्क पर उभरते हैं. हमारे मस्तिष्क में पहले ये बिम्ब बैठाए जाते हैं और फिर इस बात का स्मरण कराया जाता है कि धर्म, सरकार और मेहनत के बिना हम कितनी दयनीय स्थिति में होते. सच तो यह है कि वे सारी सभ्यता के लिए सबसे बड़े सैद्धान्तिक औचित्य हैं.
वास्तविकता में उन बिम्बों की समस्या यह है कि वे गलत हैं. मानव विज्ञान और पुरातत्व विज्ञान के क्षेत्रों में पिछले तीस वर्षों में एक क्रान्ति आई है और तेजी से लोग ये समझने लगे हैं कि कृषि और पशुपालन के पहले पशुओं का और हमारा जीवन मुख्यतः फुर्सत, प्रकृति के साथ तादात्म्य, ऐन्द्रिक समझदारी, लैंगिक समानता और स्वास्थ्य का था.
• इसे हम कैसे जानते हैं ?
अंशतः उन उपलब्ध खानाबदोशों, वे थोड़े जिन्हें हमने अब तक अलग नहीं किया है, को
देखकर और यह देखकर कि किस प्रकार उनकी समानतावादी जीवन शैली उनके प्राकृतिक आवास के
नष्ट हो जाने और अक्सर सीधी जोर जबरदस्ती या हत्या से समाप्त हो जाती हैं. साथ ही
समय-चक्र की दूसरी ओर पुरातात्विक प्राप्ति की व्याख्या से भी. उदाहरण के तौर पर
पुरातन लोगों की रसोई की जगह के अध्ययन से हम यह नहीं पाते कि एक स्थान पर ज्यादा
सामान है, जबकि दूसरी जगहों पर बहुत कम. बल्कि हर समय हम सारी जगहों पर एक ही
मात्रा में सामान पाते हैं- यह ऐसे लोगों का सबूत है, जिनका जीवन समानता और
साझेदारी पर आधारित है.
जानने का तीसरा स्रोत है- प्रारम्भ के यूरोपियन खोजकर्ताओं का विवरण, जिन्होंने
पूरे विश्व भर में फैले वैसे लोग, जिनसे उनका आमना-सामना हुआ की उदारता और विनम्रता
के बारे में बार-बार लिखा.
• आप उन संशयवादी लोगों को
क्या जबाब देते हैं, जो यह कहते है कि ये सब बस ‘बेहतर जंगली’, बकवास है ?
मैं विनम्रता से यही सलाह देता हूँ कि वे इस विषय में और पढें. यह अराजकतावादी
सिद्धान्त नहीं है. यह मानवशास्त्र और पुरातत्व की मुख्य धारा है. कुछ विवरणों में
असहमति हो सकती है लेकिन उसकी सामान्य संरचना में नहीं.
• लेकिन मानव आखेट करने वाले
और नरभक्षियों के बारे में आप क्या कहते हैं?
हमारी सभ्यता की परमाणु हथियार और नपाम बम की खोज पर विचार करते हुए हमें नहीं लगता
है कि हम किसी दूसरी सभ्यता में छोटे स्तर पर होने वाली हिंसा पर फैसला कर सकते
हैं. लेकिन यह समझने योग्य महत्वपूर्ण बात है कि कोई भी नरभक्षी या मानव आखेट वाले
समूह असल में शिकारी समूह नहीं थे. उनलोगों ने पहले ही खेती का उपयोग करना शुरू कर
दिया था. यह अब सामान्यतः स्वीकार किया जाने लगा है कि कृषि प्रायः श्रम में तेजी,
बँटवारे में कमी, हिंसा में बढ़ोतरी और अल्प जीवन प्रत्याशा की दिशा में ले जाती है.
ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सभी कृषि आधारित समाज हिंसक हैं बल्कि वैसी हिंसा मुख्यतः
सही शिकारी समूह का लक्षण नहीं.
• अगर पूर्व में स्थिति इतनी
अच्छी थी तो फिर कृषि की शुरूआत क्यों हुई ?
यह एक कठिन प्रश्न है. यह मानवशास्त्रियों और पुरातत्वज्ञाताओं के लिए लम्बे समय से
हताशा का स्रोत रहा है. कई हजार सौ वर्ष से पूरे प्रारम्भिक और मध्य पुरापाषाण काल
में-नहीं के बराबर परिवर्तन हुआ था. तब अचानक पुरापाषाण काल के अन्तिम समय में न
जाने कहाँ से यह विस्फोट हुआ और एकबारगी कला और उसके पीछे-पीछे कृषि और फिर धर्म आ
गए.
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कुछ ने यह अनुमान लगाया कि यह परिवर्तन बौद्धिक स्तर के विकास के कारण हुआ, परन्तु
अब हम यह जानते हैं कि मनुष्य का बौद्धिक स्तर आज भी वही है, जो दस लाख वर्ष पहले
था. ‘नेचर’ प्रत्रिका में आया एक नया लेख है, जो यह कहता है कि कोई आठ सौ हजार
वर्षों से माइक्रोनेसिया के चारों तरफ जो दूर-दूर तक फैले हुए पैसिफिक द्वीप समूह
हैं, उनमें मनुष्य समुद्र यात्रा करते रहे हैं. इसलिए सभ्यता का पहले से विकास नहीं
होने का बौद्धिक स्तर से कोई लेना देना नहीं है. बौद्धिक स्तर वाला सिद्धान्ततः
हमेशा से सुविधाजनक और नस्लवादी औचित्य रहा है. खैर; सुविधाजनक इसलिए क्योंकि इससे
यह बताया जाता है कि कोई भी अपेक्षित बुद्धिमान मनुष्य अपनी जीवन शैली हमारी जैसी
बना सकता है. और नस्लवादी इसलिए क्योंकि यह बतलाता है कि आदिम शैली वाले मनुष्य
प्रायः इतने मूर्ख है कि कुछ अलग कर सकें. तर्क इस प्रकार आगे बढ़ता है कि अगर वे
इतने चुस्त होते तो वे एस्फागल्ट, चेन वाली आरी और पेनिटेन्शरी (एक तरह के कारागृह)
की खोज करते.
हम यह भी जानते हैं कि कृषि की ओर संक्रमण जनसंख्या दबाव की प्रतिक्रिया के कारण
नहीं हुआ. जनसंख्या की एक अन्य बड़ी गुत्थी रही हैः चारा खोजने वाले अपनी जनसंख्या
इतनी कम कैसे रखते थे, जबकि उनके पास संतति नियंत्रण की तकनीक नहीं थी. ऐतिहासिक
तौर पर यह माना जाता है कि वे शिशु हत्या करते थे, लेकिन इस सिद्धान्त पर
प्रश्नचिन्ह है. मैं ऐसा मानता हूँ कि विभिन्न पौधों को गर्भ निरोधक के रूप में
इस्तेमाल करने के अलावा उनका अपने शरीर के साथ ज्यादा-से-ज्यादा तालमेल था.
• फिर मानव जीवन शैली इतने
दिनों तक स्थिर क्यों रही और फिर इसमें इतनी जल्दी क्यों परिवर्तन हुआ ?
मेरे अनुसार यह काम कर रही थी, इसलिए स्थिर रही और मैं नहीं सोचता कि यह परिवर्तन
पूर्णतः एक बार में ही आया. कई हजार वर्षों से शायद श्रम के बँटवारे में एक
हल्की-सी फिसलन थी. यह इतना धीमा, लगभग ध्यान में नहीं आने योग्य हुआ होगा कि लोग
यह खतरा भाँप सकें कि वे क्या खो रहे थे. श्रम बँटवारे के कारण आया अलगाव एक दूसरे
से अलगाव, प्राकृतिक विश्व और अपने शरीर से अलगाव अन्ततः एक नाजुक दौर में जा
पहुँचा, अचानक ही जिसे हम सभ्यता कहते हैं, का विकास हो गया.
सभ्यता ने अपनी पकड़ कैसे बना ली, मैं सोचता हूँ साइमण्ड फ्रायड ने इसे ठीक समझा. वे
कहते है, ‘‘सभ्यता वैसी कुछ थी, जिसे उन अल्पसंख्यकों द्वारा जो यह जानते थे कि किस
प्रकार शक्ति और दमन के माध्यम को हासिल कर प्रतिरोध करने वाले बहुसंख्यकों पर थोप
दिया गया.’’ हम आज भी ऐसा होते देखते हैं. इसलिए ऐसा मानने का कोई कारण नहीं कि यह
शुरूआत में कुछ भिन्न होगा.
• श्रम बंटवारे में क्या गड़बड़ी
थी ?
अगर जीवन में आपका प्राथमिक लक्ष्य वृहत पैमाने पर उत्पादन है, तब कुछ भी गड़बड़ी
नहीं है. श्रम विभाजन हमारी जीवन शैली का केन्द्र है. प्रत्येक व्यक्ति अवश्य एक
बड़े मशीन में पहिए के एक छोटे दाँत के रूप में काम करता है और यदि दूसरी तरफ आपका
प्राथमिक उद्देश्य पूर्णता, समानतावाद और सही सलामत विश्व है तो यह सच में ही गड़बड़
है.
श्रम विभाजन, यदि इसे अनदेखा नहीं किया जाए तो आधुनिक जीवन की देन के रूप में लिया
जाता है. हम जो अपने आस-पास देखते हैं, इसके बिना असंभव है. और यही मुश्किल है-
सभ्यता द्वारा की गई अव्यवस्था को साफ करने का अर्थ, श्रम विभाजन को भी हटाना होगा.
मेरे विचार से मूल रूप से एक व्यक्ति तब तक पूर्ण या स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक
वह किसी प्रक्रिया का कुछ पक्ष या कुछ अंश भर हो. एक विभाजित जीवन समाज के मूल
विभाजन को प्रतिबिम्बित करता है. श्रेणियों में बँटवारा, अलगाववाद यह सब यहीं से
शुरू होते हैं. मैं नहीं समझता कि कोई भी इस बात से इंकार करेगा कि समकालीन विश्व
में विशेषज्ञ और दक्ष महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं, या यह नियंत्रण अधिकाधिक तेजी से
बढ़ रहा है.
• जैसा कि अन्न उत्पादन में
होता है, प्रत्येक वर्ष थोड़े से कारपोरेशन हमारे अन्न स्रोत के व्यापक प्रतिशत को
नियंत्रित करते हैं. ऐसा ज़्यादातर इसलिए होता है कि हममें से अधिकतर यह नहीं जानते
हैं कि हमारा अपना अन्न कैसे पैदा किया जाए ?
और यह सिर्फ अन्न ही नहीं है. बहुत समय नहीं बीता है, जब आप अपना रेडियो सेट स्वयं
बना सकते थे. लोग इसे हमेशा करते थे. दस वर्ष पहले आप अभी तक अपने कार पर काम कर
रहे थे लेकिन यह धीरे-धीरे बड़ा ही कठिन होता गया. इसलिए हम ज्यादा से ज्यादा ऐसे
विशेषज्ञ लोगों के बंधक बनते गए और उनलोगों के जो कि विशेष तकनीकी पर नियंत्रण किए
हुए हैं. जब आपको दूसरों पर अधिक से अधिक निर्भर रहना पड़ता है, जब आपके पास वैसे
कौशल नहीं हैं जिसकी दिन बदिन आपको जरूरत है तो आप महत्वहीन हो जाते हैं.
• लेकिन क्या यह जरूरी नहीं है
कि हम एक दूसरे पर भरोसा करें ?
क्यों नहीं! जरूर. अराजकतावाद का लक्ष्य यह नहीं है कि लोगों को बिना एक दूसरे के
सम्पर्क के एक द्वीप में तब्दील कर दें, बल्कि इससे एकदम उलट है. लेकिन कार्यरत
समुदाय के भीतर स्वस्थ रूप से आपस में निर्भरता और आपकी सबसे मूल आवश्यकता के लिए
हुनर वाले दूसरे लोगों पर निर्भरता के बीच के अन्तर को समझना महत्वपूर्ण है. बाद
वाली स्थिति में विशेषज्ञों का आप पर अधिकार होगा. बहरहाल वे शुभचिन्तक हैं या
नहीं, यह एक अलग प्रश्न है.
नियंत्रण में रखने के लिए विशेष हुनर वाले लोग उन हुनर को अवश्य ही सुरक्षित और
रहस्यमय बना देंगे. बात यह है कि विशेषज्ञ के बिना आप पूर्णतः खो जायेंगे, आप कोई
साधारण कार्य करना भी नहीं जान सकेंगे, यहाँ तक कि खुद को खाना खिलाना. हाँ! मनुष्य
कई लाख वर्षों से खाना खाना जानते हैं और यह कार्य अधिक सफलतापूर्वक और
कुशलतापूर्वक कर रहे हैं जैसा कि आज हम कर रहे हैं. वैश्विक खाद्य व्यवस्था पागलपन
से भरी अमानुषिक और अपूर्ण है. हम पूरे विश्व को कीटनाशक और जीवाश्म ईंधन के
उत्सर्जन से बरबाद करते हैं, जबकि अरबों लोग अभी तक बिना पर्याप्त खाना के पूरा
जीवन बीता देते हैं. हालाँकि कुछ कार्य ही अपना अन्न उगाने और जमा करने से शायद
आसान हो.
• मैंने ट्यूपक अमारू,
क्रान्तिकारी आन्दोलन के एक सदस्य के साथ साक्षात्कार किया, जिस दल ने पेरू में
जापानी राजदूत के आवास पर कब्जा कर लिया था. मैंने उससे पूछा, उनका आन्दोलन क्या
चाहता था. उसे जवाब दिया, ‘‘हम अपना खाना स्वयं उगाना और वितरित करना चाहते हैं. हम
पहले से ही जानते हैं, इसे कैसे किया जाए. हम बस चाहते हैं कि हमें ऐसा करने की
अनुमति दे दी जाए.’’
बिल्कुल.
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• आपने अपने लेख में समय और
प्रभुत्व के बीच संबंध की बात रखी है?
समय संस्कृति का एक आविष्कार है. सभ्यता के बाहर इसका कोई अस्तित्व नहीं है. कोई भी
सभ्यता समय के द्वारा किस हद तक नियंत्रित होती है, इसका वस्तुतः सही माप यह है कि
इसका अलगाव कितना हुआ है.
देखिए, हमारे जीवन में सब कुछ समय से ही मापा जाता है. समय कभी भी इतना स्पष्ट और
भौतिक नहीं हुआ जितना कि आज है.
• घड़ी की टिक-टिक उतनी ही
वास्तविक है जितना आप ग्रहण करते हैं.
हाँ! यह समय को ठोस बनाता है, यह इसे मूर्त बनाता है. मूर्तिकरण तब होता है, जब एक
अमूर्त सिद्धान्त मूर्त के रूप में व्यवहृत होता है. मानव विज्ञानी लूसियन लेवी
ब्रुल लिखते हैं, ‘‘समय का हमारा बोध मानव मस्तिष्क का एक प्राकृतिक गुण जान पड़ता
है परन्तु यह एक भ्रम है.’’ ऐसा विचार मुश्किल से ही प्रारंभिक मानसिकता वाले लोगों
के बीच रह सकता है.
प्रारंभिक मनुष्य वर्तमान में रहते हैं, जैसा कि हम भी मौज-मस्ती के समय में रहते
हैं. ऐसा कहा जाता है कि दक्षिणी अफ्रीका के मबुटी इसमें विश्वास करते हैं कि
‘‘वर्तमान को पूर्णता से बिताने से भूत और भविष्य अपनी चिन्ता स्वयं कर लेंगे.’’
उत्तर अमरीकी वाउनी के लिए जीवन में एक लय है, लेकिन क्रम नहीं. आदिम मानवों की
जन्म दिन या उम्र जोड़ने में कोई रूचि नहीं है. भविष्य के लिए उन्हें शायद ही किसी
चीज पर नियंत्रण की इच्छा है, जो अब तक अस्तित्व में नहीं है. ठीक इसी प्रकार
उन्हें प्रकृति पर नियंत्रण की इच्छा शायद ही है. वे मौसम का हिसाब रखते हैं लेकिन
यह उनके वर्तमान को लील नहीं सकता. हमारे लिए इस दृष्टिकोण को समझना मुश्किल है
क्योंकि समय का प्रतीक इतनी गहराई से मन में उतरा हुआ है कि समय अस्तित्व में नहीं
था, यह कल्पना करना असम्भव है.
• तो आप सिर्फ सेकेण्ड गिनने
से ज्यादा की बात कर रहे हैं.
समय का अस्तित्व नहीं था, मैं यही कह रहा हूँ. समय एक अन्तहीन क्रम में चलता हुआ
स्वयं स्वतंत्र रह कर सारी घटनाओं को जोड़ता हुआ अस्तित्व में नहीं है. क्रम का
अस्तित्व है, लय का अस्तित्व है, लेकिन समय का नहीं. समय का इस प्रकार मूर्त होना
सामूहिक उत्पादन और श्रम विभाजन से संबंधित हैं. टिक, टिक, टिक जैसा कि आप कह रहे
थे: एक समान सेकेण्ड@ एक समान लोग. समान काम काज की अन्तहीन पुनरावृति. लेकिन जब
आपको स्पष्ट रूप से यह अनुभूति होती है कि दो घटनाएँ समान नहीं हैं और प्रत्येक
क्षण पहले क्षण से अलग है, समय स्वतः ही अदृश्य हो जाता है. यदि घटना अभूतपूर्व हो,
तब न ही सिर्फ रूटीन असंभव हो जाता है, बल्कि समय का बोध भी अर्थहीन हो जाता है.
• और इसके विपरीत भी सत्य हो
सकता है ?
अवश्य. समय को थोपे बिना हम दिनचर्या लागू नहीं कर सकते. फ्रायड ने बार-बार यह
बताया कि सभ्यता को अपनी पकड़ बनाने के लिए सबसे पहले उस समयहीन और उत्पादनहींन
संतुष्टि की पुरानी पकड़ को तोड़ना होगा. मेरा विश्वास है कि ऐसा दो चरण में हुआ
होगा. प्रथम कृषि के उद्भव ने समय के महत्व को बढ़ाया खास कर, चक्रीय समय अपने रोपनी
और कटनी से जुड़े सघन श्रम की अवधियों और फसल की अधिकता से जो पुराहितों को मिलता
था, जो कैलेण्डर रखते थे. यह बेबीलोनियन और मायन के मामले में सही था. फिर सभ्यता
के विकास के साथ चक्रीय समय जो प्राकृतिक विश्व को, कम-से-कम अपने मौसमों की लय से
संबंध के कारण, स्वीकार करता था; ने रेखीय समय को रास्ता दे दिया. एक बार आपके पास
रेखीय समय है, आपके पास इतिहास है, फिर तरक्की, फिर भविष्य की मूर्तिपूजा. अब हम
अपनी जाति, संस्कृति और संभवतः पूरी स्वाभाविक दुनिया को किसी काल्पनिक भविष्य की
वेदी पर कुर्बान करने को तैयार है. पहले कम-से-कम एक काल्पनिक भविष्य था लेकिन एक
समाज के तौर पर हमें वह भी विश्वास करने के लिए नहीं बचा.
यही कायापलट हमारे व्यक्तिगत जीवन में भी होता है, हम भविष्य के किसी स्थल पर खुश
रहने की आशा में वर्तमान में जीना छोड़ देते हैं. शायद जब हम सेवानिवृत होंगे, या
यहाँ तक कि जब मरने के बाद स्वर्ग जाऐंगे. स्वयं स्वर्ग पर इतना बल देना, रेखीय समय
में रहने के कष्ट से निकला होगा.
• मुझे ऐसा लगता है कि रेखीय
समय न सिर्फ प्राकृतिक आवास का ह्रास, बल्कि जब मैं छोटा था, बहुत सारे मेढ़क थे, अब
वहाँ बहुत कम हैं. बहुत सारी गाती हुई चिड़ियाँ थीं, अब काफी कम है. यह रेखीय समय
है.
हाँ! और ताले के प्रयोग में आने के साथ ही रेखीय समय यान्त्रिक समय में परिवर्तित
हो गया. ईसाई चर्च इस प्रयास का केन्द्र था. बेन्डिक्टस जो मध्य युग के चरम में
चालीस हजार मठ पर शासन करते थे; ने लोगों को जबरन घड़ी के अनुसार काम करवाकर मानवीय
प्रयास को मशीन के अस्वाभाविक सामूहिक लय के साथ जोड़ने में मदद किया. 14वीं शताब्दी
में प्रथम सार्वजनिक घड़ी आई और साथ ही साथ घंटे का मिनट और मिनट का सेकेण्ड्स में
विभाजन भी.
तथापि प्रत्येक कदम पर समय को विरोध झेलना पड़ा. फ्रांस में 1830 की जुलाई क्रांति
में जनता ने पूरे पेरिस में स्वतः सार्वजनिक घड़ी पर गोलियाँ बरसाईं. 1960 में बहुत
सारे लोग (मैंने भी) घड़ी पहननी छोड़ दी थी. यहाँ तक कि आज भी बच्चे समय के अवरोध को
अवश्य ही तोड़ देते हैं. यह अधिकतर अनिच्छुक लोगों पर एक अनिवार्य स्कूल व्यवस्था
थोप देने के मुख्य कारणों में एक था. स्कूल आपको एक निश्चित समय में एक निश्चित
स्थान पर रहना सिखलाता है और इस प्रकार आपको रोजगार के लिए तैयार करता है. राऊल
बैनेजेम, क्रान्तिकारी दल सिचुएशनिस्ट इंटरनेशनल के सदस्य इस विषय में एक अदभुत बात
कहते हैं ‘‘वयस्कों का समय बचपन के समय पर हावी हो जाता है. उनका समय व्यक्ति
निष्ठता बर्बाद करती है, भावोत्तेजना और स्वप्न वास्तविकता से आक्रान्त रहते हैं.
बाहर, शिक्षाविद् देखते हैं, प्रतीक्षा करते हैं, हाथ में घड़ी लेकर जब तक कि बच्चा
समय के चक्र में प्रवेश कर उसे आत्मसात न कर ले.
• आपने यह भी कहा है कि संख्या
भी हमें अलग-थलग करती है.
जब एक बड़ा परिवार साथ में खाने बैठता है तो वह तुरंत ही बिना गिनती के यह जान लेता
है कि कौन नहीं है. गिनती आवश्यक तभी होती है, जब चीजें एक ही जैसी हों. सभी लोग
संख्या प्रणाली का उपयोग नहीं करते हैं. उदाहरण के तौर पर यानोमानो दो के बाद नहीं
गिनते हैं. स्पष्ट रूप से वे इतने मूर्ख नहीं हैं कि आगे की गिनती नहीं कर सके,
उनका संसार से एक दूसरे ही प्रकार का संबंध है.
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पहली संख्या प्रणाली का विकास निःसंदेह घरेलू पशुओं को गिनने में हुआ होगा, जब
जंगली पशु गुलाम बनाए और इकट्ठे किए गए होंगे. उसके बाद हम देखते हैं कि 5 हजार
वर्ष पहले व्यापार को आसान बनाने के लिए सुमेर में गणित का इस्तेमाल किया गया था.
बाद में यूक्लिड ने ज्यमिति का विकास खास कर जमीन की नाप, खेत की माप, उसके
स्वामित्व, कर, दास श्रम की मंशा से किया. आज यही आवश्यकता विज्ञान को नियंत्रित
करती है, फर्क इतना है कि आज हम पूरे ब्रह्मांड को मापने और गुलाम बनाने का प्रयास
कर रहे हैं. एक बार फिर यह अस्पष्ट अराजकतावादी सिद्धान्त नहीं है. रिनो
डिसकॉट्र्स, जिन्हें अधिकांश लोग आधुनिक विज्ञान का जनक मानते हैं, ने कहा कि
विज्ञान का लक्ष्य है ‘‘हमें प्रकृति का मालिक और उसका स्वामित्व रखने वाला
बनाना.’’ उन्होंने यह भी कहा है कि ब्रह्मांड एक विशाल घड़ी की प्रणाली है, जो बड़ी
निपुणता से प्रभुत्व के इन दो रूपों- संख्या और समय को बाँध रहा है.
• लेकिन क्या नए तकनीकों का
विकास सामान्य जिज्ञासा से उत्पन्न नहीं हुआ है?
आपने लोगों को हमेशा यह कहते हुए सुना होगा कि ‘‘आप किसी जिन्न को बोतल में वापस
नहीं कर सकते,’’ ‘‘आप लोगों को भूलने को कह रहे है.’’ लेकिन यह सनक को मानव स्वभाव
का नाम देकर स्थापित करने का एक और प्रयास है. और यह प्राचीन नस्लवाली बुद्धि
सिद्धान्त का एक रूप हैः चूँकि होपी ने फावड़े का अविष्कार नहीं किया इसलिए वे
जिज्ञासु नहीं होंगे. जरूर लोग स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु हैं लेकिन किस बारे में ?
क्या आपकी या मेरी न्यूट्रान बम को बनाने की इच्छा होगी? बिल्कुल नहीं. मैं
नयूट्रान बम नहीं बनाना चाहता तो इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे अंदर जिज्ञासा नहीं
है. जिज्ञासा मूल्यों से मुक्त नहीं है. विशेष प्रकार की जिज्ञासा विशेष प्रकार की
मानसिक बनावट से उत्पन्न होती है और हमारी सभ्यता की जिज्ञासा अलगाव का अनुसरण करता
है, विस्मय या सीखने की इच्छा का नहीं.
• अलगाव से आपका क्या मतलब है
?
कार्ल मार्क्स ने अलगाव की व्याख्या उत्पादन के माध्यम से अलग हो जाने के रूप में
की थीः अपने इस्तेमाल के लिए चीजों का उत्पादन करने के बजाय हमारे ही श्रम के
उत्पादन व्यवस्था द्वारा हमारे ही विरूद्ध उसका इस्तेमाल किया जाना. मैं इससे एक
कदम आगे की कहूँगा कि अलगाव का होना अपने अनुभव से विमुख होना, अपने होने के
स्वाभाविक ढंग से अलग होना है.
दुनिया जितना अधिक तकनीकी और बनावटी होती है, उतना ही स्वभाविक प्रकृति से दुनिया
खाली होती जाती है, हम उतना ही अलग होते जाते हैं. मेरे ख्याल से प्रागैतिहासिक लोग
इस प्रकार से अपने आप के सम्पर्क में थे, जिनको हम इन्द्रियों के स्तर पर समझ ही
नहीं सकते. उदाहरण के तौर पर लॉरेंस वैंडर पोस्ट दक्षिण अफ्रिका की एक जन जाति सैन
का हवाला देते हैं, जो एक एकल इंजिन हवाई जहाज की आवाज 70 मील दूर से सुन सकते हैं
और नंगी आँखों से बृहस्पति ग्रह के चार चन्द्रमा को देख सकते हैं. वे यह भी कहते
हैं कि सैन जनजाति यह महसूस कर सकती है कि वास्तव में एक हाथी, सिंह या बारहसिंघा
होने पर कैसा लगता है. इससे भी अधिक इस अनुभूति का जानवरों से सीधे-सीधे
प्रत्युत्तर भी मिलता है. प्रारम्भिक यूरोपियन खोजियों के ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जो
यह बतलाते हैं कि किस प्रकार हिंसक जानवर मनुष्यों से बिल्कुल नहीं डरते थे.
• पिछले ही साल मैंने अठारहवीं
सदी के खोजी सैमुअल को पढ़ा, जिसमें उन्होंने जनजातीय इंडियन बच्चों के भेड़ियों के
पिल्लों के साथ खेलने का वर्णन किया है. बच्चे उन पिल्लों के चेहरों को सिन्दूर या
गेरू से रंग देते और जब उनके साथ खेल लेते तो उन्हें सुरक्षित उनके माँद में वापस
कर देते. न तो उन पिल्लों, न ही व्यस्क भेड़ियों को इससे कुछ फर्क पड़ता.
अब हम उन्हें हवाई जहाज पर बैठ कर बन्दूक से मारते हैं. यह आपके लिए विकास है.
• समान रूप से विकास का कया
अर्थ निकला है ?
विकास का अर्थ पर्यावरण का ढह जाना और तकरीबन व्यक्ति का पूर्ण अमानवीकरण होना है.
मेरी समझ से शुरू से अब तक में अभी बहुत थोड़े लोग हैं जो विकास में विश्वास करते
हैं लेकिन अब भी बहुत सारे हैं, जो समझते हैं कि यह अवश्यंभावी है. हमें निश्चित
रूप से इसकी अवश्यंभाविता को स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाता है; यहाँ तक कि
हम इसके गुलाम हो गए हैं. अभी विकास का मतलब है हर आदमी को ज्यादा से ज्यादा तकनीकी
पर निर्भर कर दिया जाए. उदाहरण के तौर पर स्वस्थ रहने के लिए हमें उच्च स्तर की
तकनीकी की दवा की जरूरत होती है लेकिन हमसे यह भूला देने की अपेक्षा की जाती है कि
प्रारंभिक तौर पर तकनीकी ने ही हमारी स्वास्थ्य समस्याओं को शुरू किया है. केवल
कैंसर ही केमिकल्स से नहीं हुआ है बल्कि तकरीबन सारी बीमारियाँ या तो सभ्यता,
विलगाव या प्राकृतिक आवासों के एकदम विनाश का फल हैं.
• मुझे क्रॉन्स रोग है, एक
पुरानी पाचन क्रिया की बीमारी जिसका नाम उद्योगविहीन देशों में तकरीबन सुना ही नहीं
जाता और जैसे-जैसे उन देशों का औद्योगिकरण होता जाता है, यह आम होती जाती है.
औद्योगिक सभ्यता ने मेरी पाचन क्रिया को शाब्दिक अर्थ में बर्बाद कर दिया है.
मेरी समझ से बहुत सारे लोग अब समझने लगे हैं कि विकास का मिथक कितना खोखला है.
वास्तविकता तो यह है कि जिनके हाथों में व्यवस्था है, अब विकास शब्द का प्रयोग नहीं
के बराबर करते हैं. वे जड़ता की बात करते हैं जिसका अर्थ है, ‘यही है, इसके साथ
समझौता करो या बर्बाद हो जाओ.’ आजकल आप अपेक्षित स्वप्न या ‘वैभवशाली नवीन कल’ के
बारे में नहीं सुनते. अब यह एकदम अन्तिम तक वैश्विक दौड़ है, जैसा अन्तर्राष्ट्रीय
निगम इस बात की प्रतियोगिता करते हैं कि कौन कामगारों का सबसे अधिक शोषण और
पर्यावरण को सबसे अधिक बर्बाद कर सकता है. व्यक्तिगत स्तर पर प्रतियोगिता भी ऐसे ही
चलती है. यदि आपको कम्प्यूटर की जानकारी नहीं है, आपको नौकरी नहीं मिलेगी. यहीं पर
विकास हमें ले आया है.
लेकिन इन सबके बावजूद मैं आशावान हूँ क्योंकि इसके पहले कभी भी हमारी पूरी जीवन
शैली कम-से-कम उनके लिए जो इसके अन्दर का झूठ देखना चाहते हैं, खुली नहीं थी.
• अगर हम झूठ के आर-पार देख भी
लेते हैं, तो हमें क्या करना है ?
पहली चीज कि हमें यथास्थिति पर सवाल उठाना है, इस बात को पक्का कर लेना है कि
सार्वजनिक बहस जीवन और मृत्यु के मुद्दों पर हो, न कि उनसे कतराने या नकारने पर. यह
अस्वीकृति बहुत दूर तक नहीं रह सकती क्योंकि सच्चाई और जो हमें बतलाया जाता है; के
बीच इतना अप्रिय विरोध है, खासतौर पर इस देश में. या हो सकता मैं गलत हूँ. हो सकता
है, हम हमेशा इसी विरोध के साथ बने रहें.
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यूनेबॉम्बर ने अपने घोषणा पत्र में इस बात
को रखा है कि जनता इतनी अनुकूलित हो जाएगी कि वह इस तथ्य को देख भी नहीं पाएगी कि
अब कोई प्राकृतिक संसार, कोई स्वतंत्रता, कोई तुष्टि बची ही नहीं. वह हर रोज इस
आत्मविस्मृति की दवा को लेती रहेगी. कमजोर पाचन क्रिया और मनोरोग के साथ लँगड़ा कर
आगे बढ़ती रहेगी और जो सामने है, उसे मान लेगी.
यूनेबॉम्बर इस बात का सही उदाहरण है कि क्यों हमें इस समाज में मान्य बहस को फिर से
व्याख्यायित करने की आवश्यकता है. उसके दृष्टिकोण को इस कदर दबाया गया था कि उसने
सोचा, इसे बचाने के लिए उसे लोगों को मारना होगा. इससे पता चलता है कि हमारी
सार्वजनिक बहस में किस स्तर की अस्वीकृति और दमन है. यह अस्वीकृति अब छोटे-मोटे
सुधारों से बदलने वाली नहीं है जैसे कि इस ग्रह की रक्षा पुनर्चक्रण द्वारा हो
जाएगी. यह सोचना कि ऐसा होना, सिर्फ अहमकाना नहीं आपराधिक है. जो हो रहा है, हमें
उसका सामना करना होगा. एक बार हमने सच्चाई का सामना कर लिया तो मिलजुलकर हम सोच
सकते हैं कि इसे कैसे बदलें.
व्यक्तिगत रूप से मैं बाजी लगाता हूँ कि हर स्तर पर प्रदर्शनीय निर्धनता लोगों की
व्यवस्था पर सवाल करने और इसका सामना करने की इच्छा शक्ति को जुटाने के लिए प्रेरित
करेगी. शायद अभी, हम उषाकाल के पहले के अँधेरे में हैं. मुझे याद है, 1964 के
आस-पास हरबर्ट मारकूज की ‘वन डाइमेन्शनल मैन’ प्रकाशित हुई थी. इसमें उसने कहा था
कि आधुनिक उपभोक्तावादी समाज के द्वारा जनता को इतना बरगलाया गया था कि अब परिवर्तन
की कोई उम्मीद बची ही नहीं. और फिर, कुछ ही सालों के अन्दर जनता जाग उठी.
साठ के दशक ने मेरी आशावादिता को रूप देने में सहायता दी है. मैं सही जगह पर, सही
समय में था- स्टेनफोर्ड में कॉलेज में, फिर खाड़ी के पार हेट ऐश बेरी में बर्कले के
साथ. मैं उनलोगों से सहमत हूँ, जो कहते हैं कि जो करने की जरूरत थी, उसकी ऊपरी सतह
भी साठ का दशक खुरच न पाया, लेकिन आपको एक संभावना का भाव मिला, एक भाव कि अगर
चीजें उसी प्रकार चलती रहीं तो समाज के द्वारा एकदम अलग रास्ता पकड़ लेने का खतरा
था.
वास्तविकता में, चीजें उसी प्रकार नहीं चलती रहीं लेकिन तीस साल बाद मैं अभी भी
संभावना के भाव को रखे हुए हूँ, यह मुझे उष्मा प्रदान करता है. हालांकि
परिस्थितियां एकदम ठंडी और भयानक है. कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि आज के युवा
वर्ग में कोई उम्मीद हो सकती है क्योंकि मैं निश्चित नहीं कि उन्होंने कभी किसी
आन्दोलन को अंशतः भी सफल देखा हो.
• कुछ लोग कहते हैं, साठ का
दशक सामाजिक परिवर्तन का आखिरी बड़ा विस्फोट था और उसके बाद यह पतनोन्मुख हैं.
कभी-कभी मैं इसे इस प्रकार से सोचता हूँ, जैसे यह एक बड़ा विस्फोट था और हर चीज तब
से ठंढी पड़ती जा रही है. 1976 का पंक विस्फोट बहुत उत्तेजक था, लेकिन उसका अर्थ यह
नहीं था कि यह परिवर्तन की एक नई श्रृंखला की शुरूआत कर देगा. मुझे लगता है, हम साठ
के दशक से कुछ ज्यादा बड़ी चीज की ओर आ रहे हैं इसलिए नहीं कि हमें जिन्दा रहने के
लिए ऐसा करना ही है बल्कि इसलिए कि अब हमारे पास कम भ्रमजाल हैं. पहले हमारे पास
बहुत ही ऊँचे स्तर का आदर्शवाद था, जिसमें से अधिकांशतः बर्बाद हो गया. हम ऐसा
मानते थे कि परिवर्तन के लिए बहुत अधिक प्रयास करना होगा. हमें संस्थाओं पर एक
बेवजह का विश्वास था और चीजों के आर-पार नहीं देखते थे. हम यथार्थ से जुड़े हुए नहीं
थे. मगर वह क्रान्ति भरी उर्जा वापस आ जाती है, यह कहीं ज्यादा प्रभावशाली होगी.
• अपनी किताब ‘एलिमेन्ट्स ऑफ
रिफ्युजल’ में आप वर्णन करते हैं कि किस प्रकार इस सदी के प्रारम्भ में, वातावरण
में बड़ी मात्रा में क्रान्तिकारी उर्जा थी. कई तरीकों से आप कहते हैं कि प्रथम
विश्वयुद्ध उस उर्जा को हिंसा के माध्यम से नष्ट करने का एक राज्य प्रायोजित प्रयास
था.
युद्ध को वास्तविकता में, हमेशा एक अच्छे औचित्य की जरूरत होती है, खासतौर पर जब
राज्य के असली शत्रु इसके नागरिक होते हैं. आर्च डयूक फर्डिनेन्ड की हत्या एक
मृतप्राय आस्ट्रो-हंगेरियन शासन की आवश्यकताओं के अनुरूप थी परन्तु यह किसी प्रकार
से यह युद्ध का कारण नहीं थी. युद्ध का सही कारण, मैं विश्वास करता हूँ कि सारे
यूरोप में व्याप्त असंतोष था. 1913 और 1914 में पूरे रूस में बहुत अधिक हड़तालें
हुईं. आस्ट्रिया-हंगरी गृह युद्ध के कगार पर थे. अमरीका, जर्मनी, फ्रांस, इटली और
इंग्लैण्ड में क्रान्तिकारी आन्दोलन और अतिवादी संघ उत्थान पर थे. यहाँ तक कि
इंग्लैण्ड के राजा जार्ज पंचम ने इसे स्वीकार किया था, जब युद्ध के एकदम पहले 1914
के ग्रीष्मकाल में उसने कहा था- ‘मेरी जनता के सबसे अधिक जिम्मेदार और मर्यादित
लोगों के होठों पर गृहयुद्ध की पुकार है’. चीजों को फटना ही था लेकिन कैसे और किन
लोगों पर इस विस्फोट का निशाना साधा जाए ? इस उर्जा के प्रस्फुटन को बाँधने का
युद्ध के सिवा और क्या अच्छा तरीका हो सकता था. और यह चल गया.
अधिकतर संघों और वाम दलों ने युद्ध को समर्थन दिया, जिन्होंने, जैसे यहाँ अमरीका
में वॉब्लीस ने, समर्थन नहीं दिया, उन्हें राज्य ने सीधे तौर पर नष्ट कर दिया.
युद्ध के बाद क्रान्ति को जारी रखने की हिम्मत कम ही लोगों में रह गई थी, लेकिन
जिन्होंने ऐसा किया, जैसे मुसोलिनीवादी और बॉल्शेविक, वे सच्चे क्रान्तिकारी नहीं
वरन् अवसरवादी थे, जिन्होंने युद्धोत्तर शक्ति शून्यता को अपने फायदे के लिए मोड़ा.
• यह आज का सारा अलगाववाद आपके
विचार से किस ओर जा रहा है?
मैं नहीं जानता. मैं इतना अवश्य जानता हूँ, हम वो प्रसन्न मूर्ख उपभोक्ता नहीं हैं,
जो हमें समझा जाता है. हम समझ सकते हैं कि हम ऐसे हैं लेकिन हमारे शरीर बेहतर जानते
हैं. हाल ही में मैंने एलेन शोवॉल्टर की किताब ‘हिस्टॉरिजःहिस्टेरिकल एपिडेमिक्स
एंड माडर्न कल्चर’ की समीक्षा की. इसमें वह नब्बे के दशक की ‘हिस्टीरिया’ की चर्चा
करती है: क्रॉनिक फेटीग सिन्ड्रोम, गल्फवार सिन्ड्रोम, रिकवर्ड मेमरी, सेटेनिक
कल्ट्स इत्यादि.
कुछ लोग उसकी किताब से नाराज हैं क्योंकि इससे ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वह कर रही
है कि ये सारी समस्याएँ लोगों के दिमाग में हैं. फिर भी मुझे ऐसा लगता है, जैसे वह
कुछ जयादा गूढ़ बात सामने रख रही हो. वह कह रही है कि ये संकट भौतिक कारणों के साथ
या उसके बिना पैदा होते हैं. आप यह तर्क रख सकते हैं कि उदाहरण के तौर पर गल्फ वार
सिन्ड्रोम के मामले में उसका दृष्टिकोण सरकार को फँसने नहीं देना है. लेकिन
वास्तविकता में उसका मत उस मत से कि सरकार ने अमेरिकियों को जहर दिया और ऐसा इतनी
बार किया कि यह घिसी-पिटी बात हो गई है, अधिक उग्र है. यह कहना कि आधुनिक जीवन इतना
विकलांग, पृथक और विचित्र है कि यह मनोरोग से संबंधित असंलुलन पैदा करता है, सिर्फ
सरकार को नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता है.
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• लेकिन इसका क्या मतलब है कि
खुद हमारी सरकार हमें जहर देगी? यह एक ऐसी समस्या है जिस पर हमने अभी तक ध्यान नहीं
दिया है. अगर हम किसी प्रकार अपने को बनाए रखे हुए जीना सीख लेते हैं या फिर से सीख
लेते हैं फिर भी हमें उन ताकतों का सामना करना होगा, जो हमारी नई जीवन शैली को नष्ट
करने के फिराक में होंगे. हम सब जानते हैं कि क्या होगा, अगर हमने टिकने वाले
समुदायों का विकास कर लिया और सशक्त संस्कृति की नजर हमारे संसाधनों पर पड़ गई.
हमारे समुदाय नष्ट हो जायेंगे और हमारे संसाधन चुरा लिए जायेंगे.
यह हकीकत है. हम यह सोचना चाहेंगे कि हिंसा एक जरूरी प्रत्युत्तर नहीं, लेकिन मैं
बहुत निश्चित नहीं हूँ. सच है कि यदि उथल-पुथल विशाल है तो बहुत हिंसा की आशंका
नहीं है. मई 1968 में एक करोड़ फ्रांसीसी मजदूर (खगोल विज्ञानी कारखाना मजदूर आप कह
सकते हैं) एक अचानक की हड़ताल पर चले गए और अपनी-अपनी काम की जगह पर कब्जा करना शुरू
कर दिया. विद्यार्थी प्रदर्शनों ने इसे और प्रेरित किया और एक बार जब यह शुरू हो
गया, सारी शिकायतें एक साथ बाहर आ गईं. पुलिस और सेना तकरीबन असहाय हो गई थी
क्योंकि तकरीबन सारा देश, इसमें शामिल था. एक बार सरकार ने नाटो की सेना भेजने पर
विचार किया. यह दुर्भाग्य था कि यह आन्दोलन नियंत्रित कर लिया गया. मुख्यतः वामदलों
और उन संघों के द्वारा, जो क्रान्तिकारी उर्जा का उपयोग अपनी अपेक्षाकृत कम
सुधारवादी कार्यावली के लिए करना चाहते थे. लेकिन कुछ समय के लिए वास्तविक रूप से
जनता का सारे देश पर नियंत्रण हो गया था. और यह पूरी तौर पर अहिंसक था.
• लेकिन इस विद्रोह से किसी
दीर्घकालीन परिवर्तन की प्राप्ति तो नहीं हुई?
नहीं, लेकिन इसने उद्घाटित कर दिया कि राज्य की दमनकारी शक्तियाँ कितनी कमजोर हैं.
इस प्रकार के जन विद्रोह के सामने राज्य असहाय है. हमने इसे सोवियत संघ और पूर्वी
खण्ड में राज्य पूँजीवाद के पतन में पुनः घटित होते देखा. वहाँ बहुत ज्यादा हिंसा
नहीं हुई. बस सब टुकड़े-टुकड़े बिखर गया. मैं यह नहीं कह रहा कि यह विध्वंस किसी
प्रकार के अतिवादी बदलाव की ओर ले गया. बस इतना ही कह रहा हूँ कि इतिहास में रक्त
विहीन विद्रोह हुए हैं, यहाँ तक कि हमारे समय में भी.
• कैसे कोई संतुलन से और
कुशलता से जवाब दे सकता है जबकि सामने हिंसा हो? आप इस बात से कैसे समझौता कर सकते
हैं कि दमन को समाप्त करने के लिए आपको दमनकारी का दमन करना होगा ?
यह कठिन है. जब क्रिस्टोफर कोलम्बस इन किनारों पर पहुँचा, शांतिप्रिय देशी लोगों ने
उसका खुली बाहों से स्वागत किया. मेरे विचार से चतुराई इस बात में थी कि उसका गला
काट दिया जाता. मैं नहीं समझता कि बहुत लोग इस बात पर बहस करेंगे, या वे करेंगे तो
उन्हें अपने लोग, परिवार या समुदाय पर हिंसा महसूस नहीं की है. लेकिन प्रश्न उभरता
है कि इन शांतिप्रिय लोगों में हिंसा का प्रयोग करने का विचार आया कहाँ से? यह उनका
तरीका नहीं था.
शायद हमें वही होना चाहिए, जिस पर हम विजय कर सकें. जरमन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो
अलगाव पर, अलगाव के द्वारा ही विजय की बात करते हैं. यह कैसे काम करता है, मैं नहीं
जानता लेकिन मैं इसके बारे में सोचता हूँ. मैंने इस बारे में बहुत सोचा है कि किस
प्रकार मैं सबसे अधिक काम आ सकूँ और मैं महसूस करता हूँ कि बहुतों की तुलना में
बहुत अधिक संख्या में मेरे पास विकल्प हैं लेकिन अभी के लिए मैं आलोचनात्मक समीक्षा
से संतुष्ट हूँ. मेरे लिए शब्द, बन्दूक से बेहतर हथियार हैं.
• जाहिर तौर पर मैंने भी वही
रास्ता चुना है. लेकिन फिर भी, हर सुबह जब मैं जागता हूँ, मैं अपने आप से पूछता हूँ
कि मुझे लिखना चाहिए या किसी बाँध को उड़ा देना चाहिए क्योंकि शब्दों की कमी के कारण
यहाँ उत्तर पश्चिम में सालमन नहीं मारे जा रहे, बल्कि बाँध की उपस्थिति से. हम
अकर्मण्यता से निश्चित रूप से उतनी ही हत्या करते हैं, जितनी सक्रियता से.
इससे मुझे पंक रॉक बैण्ड एम्स के गायक एकजीन सरवेन्जा की एक उक्ति की याद आई. वह
कहती हैं, ‘‘मैंने (यूने बॉम्बर टेड) काजिंस्की की अपेक्षा अधिक लोगों की हत्या की
है क्योंकि मैं पिछले पन्द्रह सालों से बहुत अधिक टैक्स देती रही हूँ, जबकि उसने
नहीं दिया है.’’ यह इस बात का सूचक है कि हम सब इसमें शामिल हैं. अपनी एक हाल की
वार्ता में, जो मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ ओरगॉन में दी मैंने इन विषयों पर बहुत बोला.
अन्त के करीब मैंने कहा, मैं जानता हूँ व्यवस्था को पलट देने का आह्वान हास्यास्पद
लग सकता है लेकिन एकमात्र चीज कि व्यवस्था को चलते रहना चाहिए, इससे कहीं अधिक
हास्यास्पद है.
• हमें कैसे पता चलेगा कि
अलगाव, जिसे हम चारो ओर देखते हैं, हमें व्यवस्था तोड़ने और नवनिर्माण में सहायता
देगा?
सवाल इस बात का है कि क्षति की क्षतिपूर्ति किस प्रकार की जा सकती है. कभी-कभी
इतिहास में हम देखते हैं कि जब भौतिक विश्व हमारे संतुलन को बिगाड़ने की नीयत से आगे
बढ़ता है, स्थिति क्षणों में पलट जाती है. एक प्यारी सी सच्ची कहानी है, जो मुझे
बहुत आशा देती है. पावलोव की प्रयोगशाला में कुत्ते इस बात के लिए नामी थे कि
उन्हें एक खास उद्दीपन का प्रत्युत्तर देने के लिए तैयार किया जाता है. वे पूर्ण
रूप से प्रशिक्षित और पालतू भी थे. लेकिन जब तहखाने में, जहाँ वे रहते थे, बाढ़ आई
तो पलक झपकते ही वे सारा प्रशिक्षण भूल गए. हमें कम-से-कम ऐसा ही करना चाहिए.
(अंग्रेजी से अनुवादः मनोज कुमार झा)
12.12.2011, 17.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | shree prakash [samvadik@gmail.com] indore - 2011-12-19 08:26:13 | | | |
thanks for this interview in hindi.. | | | | | | | | ABDUL ASLAM [aslam.media4u@gmail.com] KORBA - 2011-12-17 11:17:26 | | | |
जॉन ज़ेरज़न का साक्षात्कार बेहद रोचक जानकारी का खज़ाना है. रविवार.कॉम को साक्षात्कार के लिए धन्यवाद. | | | | | | | | prashant dubey [dubey.prashant128@yahoo.com] raipur - 2011-12-15 09:18:35 | | | |
ये साक्षात्कार बहुत अच्छा है. पूरा पढ़ने के बाद बहुत सी जानकारियां मिलीं. बहुत-बहुत धन्यवाद. | | | | | | |
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