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राज्य का शत्रु

संवाद

राज्य का शत्रु

जॉन ज़ेरज़न से डेरिक जेनसेन की बातचीत

जॉन ज़ेरज़न

अराजकतावाद का ज़िक्र करें तो ज़्यादातर लोग उथल-पुथल, बलवे और बम फेंकने के बारे में सोचने लगते हैं. लेकिन लेखक और सामाजिक आलोचक जॉन ज़ेरज़न के लिए अराजकतावाद का अर्थ हिंसक होकर सड़कों पर उतर आना नहीं. बल्कि यह हर प्रकार के प्रभुत्व को समाप्त कर देना है. इसमें सिर्फ राष्ट्र-राज्य और निगम ही नहीं बल्कि पितृ सत्ता, नस्लवाद और समलैंगिकों के प्रति घृणा जैसी आंतरिक रूप से रची-बसी संरचनाएँ भी हैं.

ज़ेरज़न पिछले 25 वर्षों से हमारी संस्कृति के सहायक तत्वों की चीर-फाड़ करते रहे हैं लेकिन वे अपनी सबसे नई किताब ‘‘एलीमेण्ट्स ऑफ रिफ्युजल’’ और ‘‘फ्युचर प्रीमीटिव’’ (आटोनोमेडिया) के लिए बेहतर जाने जाते हैं. उन्होंने लगभग सारे विषय ‘‘व्हाई आई हेट स्टार ट्रेक’’ से ‘‘द फेल्योर ऑफ सिमाबॉलिक थॉट’’ पर लेख प्रकाशित किए हैं. अपने हर प्रकार के लेखन में उन्होंने इस बात का भंडाफोड़ करने की कोशिश की है कि किस प्रकार दर्शन, धर्म, अर्थशास्त्र या अन्य आदर्शवादी संरचनाएँ, प्रभुत्व का औचित्य, इसे डार्विनियन सिद्धान्त का चयन या ईश्वर की इच्छा या आर्थिक जरूरत की एक स्वभाविक अभिव्यक्ति बताकर, सिद्ध करना चाहते हैं. बल्कि मूलतः उन्होंने प्रभुत्व का संबंध समय, संख्या और यहाँ तक कि भाषा के साथ भी सामने रखा है.

ज़ेरज़न से उनके घर यूजिन, आरेगॉन पर मेरी बातचीत उतनी ही बन्धनमुक्त थी जैसी कि मैंने दो अराजकतावादियों के बीच बैठक की अपेक्षा की थी. (हालांकि मैं अपने आप को अराजकतावादी कहता हूँ लेकिन किताब के पन्नों के बाहर मैंने कभी भी किसी अराजकतावादी से मुलाकात नहीं की थी. मैंने जिसकी अपेक्षा नहीं की थी, वह था ज़ेरज़न का मृदुभाषी चरित्र. उनका लेखन इतना पैना, अटल और तीक्ष्ण है कि आधे रास्ते तक मैं डर रहा था कि वे व्यक्ति के रूप में वैसे ही उग्र होंगे जैसा कि पन्नों पर है. मुझे एक सुखद निराशा हाथ लगी कि वे अति शालीन और शिष्ट व्यक्तियों में एक हैं, जिनसे मैं अब तक मिला हूँ.) मुझे चकित नहीं होना चाहिए था. अराजकतावाद, जैसा कि वे व्याख्या करते हैं, प्रभुत्व से मुक्त होने की इच्छा भर नहीं बल्कि दूसरों पर प्रभुत्व नहीं कायम करने की इच्छा भी है. जूली मायडा ने भी इस साक्षात्कार में अपना सहयोग दिया है.


क्या कभी ऐसा कोई समाज अस्तित्व में रहा है, जिसमें संबंध प्रभुत्व पर आधारित नहीं थे ?

लाखों वर्षों से यही मानवीय स्थिति थी. यह केवल दस हजार साल पहले कृषि के आविष्कार के साथ जो हमें सभ्यता की ओर ले चला, बदली. उस समय से ही हमने इस बात पर अपने को तैयार करने के लिए काफी मेहनत की कि ऐसी परिस्थिति कभी नहीं थी और हमें यह मान लेना चाहिए दमन और दासता ‘शैतानी’ मानव स्वभाव के आवश्यक काट हैं. इस विचारधारा के अनुसार प्रभुत्व एक परोपकारी उद्धारक है, जो हमें महरूमी, बर्बरता और अज्ञान के सभ्यता पूर्व अस्तित्व से बचाता है. आप उन बिम्बों के बारे में सोचें, जो निएन्डरथल या गुफा मानव शब्द सुनते आपके मस्तिष्क पर उभरते हैं. हमारे मस्तिष्क में पहले ये बिम्ब बैठाए जाते हैं और फिर इस बात का स्मरण कराया जाता है कि धर्म, सरकार और मेहनत के बिना हम कितनी दयनीय स्थिति में होते. सच तो यह है कि वे सारी सभ्यता के लिए सबसे बड़े सैद्धान्तिक औचित्य हैं. वास्तविकता में उन बिम्बों की समस्या यह है कि वे गलत हैं. मानव विज्ञान और पुरातत्व विज्ञान के क्षेत्रों में पिछले तीस वर्षों में एक क्रान्ति आई है और तेजी से लोग ये समझने लगे हैं कि कृषि और पशुपालन के पहले पशुओं का और हमारा जीवन मुख्यतः फुर्सत, प्रकृति के साथ तादात्म्य, ऐन्द्रिक समझदारी, लैंगिक समानता और स्वास्थ्य का था.

इसे हम कैसे जानते हैं ?

अंशतः उन उपलब्ध खानाबदोशों, वे थोड़े जिन्हें हमने अब तक अलग नहीं किया है, को देखकर और यह देखकर कि किस प्रकार उनकी समानतावादी जीवन शैली उनके प्राकृतिक आवास के नष्ट हो जाने और अक्सर सीधी जोर जबरदस्ती या हत्या से समाप्त हो जाती हैं. साथ ही समय-चक्र की दूसरी ओर पुरातात्विक प्राप्ति की व्याख्या से भी. उदाहरण के तौर पर पुरातन लोगों की रसोई की जगह के अध्ययन से हम यह नहीं पाते कि एक स्थान पर ज्यादा सामान है, जबकि दूसरी जगहों पर बहुत कम. बल्कि हर समय हम सारी जगहों पर एक ही मात्रा में सामान पाते हैं- यह ऐसे लोगों का सबूत है, जिनका जीवन समानता और साझेदारी पर आधारित है.
जानने का तीसरा स्रोत है- प्रारम्भ के यूरोपियन खोजकर्ताओं का विवरण, जिन्होंने पूरे विश्व भर में फैले वैसे लोग, जिनसे उनका आमना-सामना हुआ की उदारता और विनम्रता के बारे में बार-बार लिखा.

आप उन संशयवादी लोगों को क्या जबाब देते हैं, जो यह कहते है कि ये सब बस ‘बेहतर जंगली’, बकवास है ?

मैं विनम्रता से यही सलाह देता हूँ कि वे इस विषय में और पढें. यह अराजकतावादी सिद्धान्त नहीं है. यह मानवशास्त्र और पुरातत्व की मुख्य धारा है. कुछ विवरणों में असहमति हो सकती है लेकिन उसकी सामान्य संरचना में नहीं.

लेकिन मानव आखेट करने वाले और नरभक्षियों के बारे में आप क्या कहते हैं?

हमारी सभ्यता की परमाणु हथियार और नपाम बम की खोज पर विचार करते हुए हमें नहीं लगता है कि हम किसी दूसरी सभ्यता में छोटे स्तर पर होने वाली हिंसा पर फैसला कर सकते हैं. लेकिन यह समझने योग्य महत्वपूर्ण बात है कि कोई भी नरभक्षी या मानव आखेट वाले समूह असल में शिकारी समूह नहीं थे. उनलोगों ने पहले ही खेती का उपयोग करना शुरू कर दिया था. यह अब सामान्यतः स्वीकार किया जाने लगा है कि कृषि प्रायः श्रम में तेजी, बँटवारे में कमी, हिंसा में बढ़ोतरी और अल्प जीवन प्रत्याशा की दिशा में ले जाती है. ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सभी कृषि आधारित समाज हिंसक हैं बल्कि वैसी हिंसा मुख्यतः सही शिकारी समूह का लक्षण नहीं.

अगर पूर्व में स्थिति इतनी अच्छी थी तो फिर कृषि की शुरूआत क्यों हुई ?

यह एक कठिन प्रश्न है. यह मानवशास्त्रियों और पुरातत्वज्ञाताओं के लिए लम्बे समय से हताशा का स्रोत रहा है. कई हजार सौ वर्ष से पूरे प्रारम्भिक और मध्य पुरापाषाण काल में-नहीं के बराबर परिवर्तन हुआ था. तब अचानक पुरापाषाण काल के अन्तिम समय में न जाने कहाँ से यह विस्फोट हुआ और एकबारगी कला और उसके पीछे-पीछे कृषि और फिर धर्म आ गए.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

लाला हुमन [लालाहुमन88@जीमेल.काँम] सज्जनपुरा सीकर भारत - 2013-07-17 17:42:06

 
  हाँ अराजकतावादी समाज हिँसात्मक समाज नहीँ हैँ बल्कि यह एक समानतावादी प्रेमात्मक सहयोगवादी समाज हैँ जिसमेँ किसी का किसी पर शासन. प्रभुत्व नहीँ होगा.सब मिलजुलकर प्रेमपुर्वक रहेँगे.यह ही समाज मानवीय था एँव होगा.राज्य.राज्य सीमा.सरकार सेना.ये पशुता की निशानी हैँ।  
   
 

Sainny Ashesh [sainny.aesh@gmail.com] Manali - 2012-03-15 19:27:35

 
  इस बातचीत में मनुष्य की उस मेधा की आवाज़ है जो जानती है की प्रकृति और चेतना में कुछ भी अधिक सुंदर नहीं जोड़ा जा सकता, उसको सिर्फ बचाया जा सकता है। उसके स्वभाव को समझ कर उसके साथ चला जा सकता है। मनुष्य अभी है नहीं, बन रहा है, जबकि उसने विश्व को संचालित करने का ठेका ले लिया है। बहुत सुलझे हुए तरीके से गिने-चुने लोगों को प्रकृति और उसमें स्वतंत्रता से गुज़र-बसर करना चाहने वाले लोगों का साथ देना है और दबा दी गई चेतना के हक़ में काम करना है। अगर हिमालय के हाल देखें तो यहाँ राजनेताओं और उनके चाटुकारों की कोठियाँ, फार्म हाउस और नदीतटों को घेरते बाग-बगीचे बढ़ रहे हैं, और वनवासी के लिए स्थान बहुत कम रह गया है। 
   
 

shree prakash [samvadik@gmail.com] indore - 2011-12-19 08:26:13

 
  thanks for this interview in hindi.. 
   
 

ABDUL ASLAM [aslam.media4u@gmail.com] KORBA - 2011-12-17 11:17:26

 
  जॉन ज़ेरज़न का साक्षात्कार बेहद रोचक जानकारी का खज़ाना है. रविवार.कॉम को साक्षात्कार के लिए धन्यवाद. 
   
 

prashant dubey [dubey.prashant128@yahoo.com] raipur - 2011-12-15 09:18:35

 
  ये साक्षात्कार बहुत अच्छा है. पूरा पढ़ने के बाद बहुत सी जानकारियां मिलीं. बहुत-बहुत धन्यवाद. 
   
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