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अरुण प्रकाश से पुष्पराज की बातचीत

संवाद

 

राजनीति, होटल और कहानियां

कथाकार अरुण प्रकाश से पुष्पराज की बातचीत

अरुण प्रकाश

1948-2012


अरुण प्रकाश 4 वर्षों से ज्यादा समय से फेफड़े की बीमारी एम्फीसीमिया से ग्रस्त होकर कृत्रिम ऑक्सीजन के सहारे जीवित थे. उनका घर ही अस्पताल हो गया था. पत्नी वीणा प्रकाश अस्पताल की परिचारिका, नर्स की भूमिका में ऑक्सीजन की नली से उन्हें हर वक्त जुड़े रखने और उनकी पल-पल बढ़ती परेशानियों में उनकी निकट सहयोगी थीं. मुझे हर बार ऐसा लगता था कि उनके पास कुछ ऐसी बातें कहने के लिए हैं, जो उनने अब तक किसी से नहीं कही हो और अब वे मुझे बतायेंगे. मैं इसी उम्मीद, मोह के साथ उनके पास दौड़ता रहा. मैं कभी खाली नहीं लौटा, लेकिन कुछ बातें ऐसी थीं, जो वे मुझसे भी कह नहीं पाये. बीमारी के बाद अस्पताल की सुविधा के लिए दिलशाद-गार्डेन का घर छोड़कर मयूर विहार स्थित किराए के घर में वे रहने लगे.

एक दिन उनके घर में ऑक्सीजन सिलेण्डर और किचन का सिलेण्डर दोनों एक ही दिन बाजार से आया. मैंने हँसते हुए उनसे कहा- क्या हो गया, चूल्हे को जलाने के लिए सिलेण्डर, आदमी को जिलाने के लिए सिलेण्डर? एक घर में दो तरह के सिलेण्डर. उनने हँसते हुए कहा- देखो एक ही जलावन चूल्हे की आंच भी है और अर्थी की आग भी. इसलिए सिलेण्डर के प्रकार पर क्या चिंतन कर रहो हो.

10 दिसंबर 2010 की यह बातचीत मयूर विहार स्थित उनके आवास पर हमने लिपिबद्ध की है. उस समय उन्हें रोज 16-18 घंटे ऑक्सीजन की दरकार होती थी. बात करते-करते अचानक वे किसी दूसरे विषय पर चले जाते थे. दरअसल ऐसा ऑक्सीजन की कमी होने पर साँस फूलने से होता था. अरुण प्रकाश की अदम्य जीवन यात्रा पर यह संभवतः उनके जीवन का अंतिम साक्षात्कार है.


n अपने जीवन संघर्ष का वह हिस्सा जो कहीं दर्ज नहीं है? अरुण प्रकाश के कथाकार बनने की संघर्ष गाथा क्या है?

राजनीतिक माहौल में मैं पला-बढ़ा पर राजनीति में मेरी दिलचस्पी नहीं थी. मैंने हायर सेकेण्डरी मंझौल से की थी और ग्रेजुऐशन करने शाहपुर-पटोरी आ गया था. मैं विज्ञान का छात्र था और टायफाइड से लंबे समय तक बीमार रहने के कारण दो पेपर में फेल हो गया था.

अच्छा, मैंने यह नहीं बताया कि मैं शाहपुर-पटोरी कैसे और क्यों पहुँचा था? कर्पूरी ठाकुर ने अपने इलाके में डिग्री कॉलेज खोला था तो मेरे पिता से घरेलू रिश्ते की वजह से मुझे अपने कॉलेज में दाखिला कराया था. इस कॉलेज का नाम आचार्य नरेन्द्रदेव महाविद्यालय था. कर्पूरी जी ने मुझे एक साइकिल खरीद कर दी थी. जब कर्पूरी जी पटना से अपने इलाके आते थे तो मेरी साइकिल से क्षेत्र भ्रमण करते थे और लौटते हुए मछली साथ लाते थे. चाचा-भतीजा साथ-साथ मछली बनाते और खूब चाव से खाते थे.

राममनोहर लोहिया जाति-तोड़ो आंदोलन में शाहपुर-पटोरी आये थे. रेलवे मैदान में लोहिया की बड़ी रैली हुई थी. मुझे कर्पूरी चाचा ने लोहिया के साथ लगा दिया था. पहली मुलाकात में ही लोहिया ने मेरे स्वभाव और प्रकृति को देखते हुए पूछा- तुम क्यों आ गये सोशलिस्टों के साथ? मैंने कहा- मैं सोशलिस्ट बनने नहीं, जाति-तोड़ो आंदोलन में सहयोग करने आया हूँ. डॉ. ब्रह्मदेव और शरण जी जाति-तोड़ो आदोलन में स्थानीय संयोजक थे. उस जाति-तोड़ो रैली में 25-30 हजार लोग जुटे थे. कर्पूरी जी सिर्फ नाइयों के नेता नहीं थे, वह इस रैली से साबित हो गया था. मुझे आश्चर्य होता है कि कालांतर में समाजवादी जाति तोड़ने के बजाय जाति में खाद डालने लगे.

n आप क्या आर्थिक संकट की वजह से शाहपुर-पटोरी पढ़ने गये थे?

और वजह क्या हो सकती है? हमारे पास दूसरा विकल्प ही क्या था? पिताजी सोशलिस्ट पार्टी के होलटाइमर थे. उन्हें पूर्णकालिक कार्यकर्ता का मानदेय 40 रुपये मासिक मिलता था. इस 40 रुपये से परिवार चलाना और बच्चों को पढ़ाना कैसे संभव था? कर्पूरी जी खुद मुझे लेकर शाहपुर-पटोरी आये थे तो कॉलेज की फीस माफ कर दी गयी थी. शाहपुर-पटोरी का यह ढेढ़ साल ऐतिहासिक है. बीएससी फेल का तमगा और जाति-तोड़ो आंदोलन में शरीक होने का आत्मगौरव. तब मेरी उम्र 18 वर्ष की थी. कॉलेज में फेल होने से हौसला फेल नहीं हुआ था. मैं शाहपुर-पटोरी का आभारी और ऋणी हूँ. वहाँ विनोद जायसवाल मेरे दोस्त थे.

n आप अपने पिताजी के बारे में कुछ बतायेंगे? उन्होंने आपके जीवन को किस तरह प्रभावित किया है?

मेरे पिताजी का नाम रूद्रनारायण झा था. परंपरागत तौर से पुश्तैनी पंडिताई, पुरोहित उनके जीवन का पेशा होता, अगर वे राजनीति में नहीं आते. वे खूब पैदल चलते थे और फकीरी जिंदगी जीते थे. पिताजी 1967 में मुंगेर जिला संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव और प्रदेश चुनाव प्रभारी थे. मधु लिमये को मुंगेर लोकसभा से प्रत्याशी बनाया गया था. बिहार की सोशलिस्ट पार्टी का एक बड़ा हिस्सा नहीं चाहता था कि महाराष्ट्र के मधु लिमये को मुंगेर से चुनाव लड़ाया जाये. मधु लिमये की जीत को पिताजी ने प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था. मधु लिमये दो बार मुंगेर से सांसद हुए. पिताजी 1968 में राज्यसभा से सांसद हुए. 1970 में एक साजिश के तहत पिताजी की सड़क दुघर्टना में हत्या हुई, जिसे सड़क दुर्घटना में मौत कहकर प्रचारित किया गया. यह सड़क दुर्घटना नहीं, राजनीतिक हत्या थी. सीबीआई जाँच भी हुई पर दोषी कौन, यह रहस्य सार्वजनिक नहीं हुआ. किसी को सजा नहीं मिली. उनकी मौत के बाद पार्टी रैली के लिए रेल बुकिंग का बकाया किराया 38 हजार रुपये और उनके बैंक खाते में 238 रुपये मात्र, यही उनकी जिंदगी थी. उनकी मृत्यु के बाद एसएम जोशी ने पार्टी फंड से रेल किराया का बकाया चुकती कराया और मेरे परिवार को रेल ऋण के बोझ से मुक्ति मिली.

n जब पिताजी की मौत हुई उस समय आप क्या कर रहे थे? आपने खुद को किस तरह खड़ा किया?

शाहपुर-पटोरी से बीएससी फेल की उपलब्धि के साथ मैं अपने गाँव निपनिया, बरौनी वापस लौट आया था. सातवीं तक के बच्चों को विज्ञान-हिन्दी का ट्यूशन पढ़ाकर मैं खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था. जानकारी मिली कि भुवनेश्वर से बिना बीए किए बीएड करना संभव है. उधर प्रवेश परीक्षा दिया तो भुवनेश्वर में बीएड और पूसा एग्रीकल्चर में बीएससी, कृषि में एक साथ सफलता मिली. बीएड और बीएससी, कृषि दोनों में कंपीट होना उस समय बहुत सहज नहीं था. अब पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि मुझे पूसा या भुवनेश्वर पढ़ने के लिए भेज सकें. वे बेटे को पढ़ाने के लिए ना ही किसी के सामने हाथ पसार सकते थे, ना ही इसे मुद्दा बना सकते थे. उन्होंने सब कुछ सहज तरीके से स्वीकार किया और मुझे हताशा से बचाया.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shreeshroy [shreeshroy@yahoo.com] ranchi - 2013-11-15 14:24:22

 
  बहुत पसंद आया ये मौत को सलाम करते लेखक का साक्षात्कार.  
   
 

sitare hind [sitare.pu@gmail.com] HINDI DEPARTMENT ;E.F.L.UNIVERSITY ,HYDERABAD - 2012-10-15 14:26:42

 
  अरुण प्रकाश बहुत ही समर्थ्य रचनाकार हैं. उनका रचना कपोल कल्पित न होकर अनुभव से संपृक्त है. इसलिए इनकी रचनाएँ सीधे पाठक से संवाद करती है. `राजनीति, होटल और कहानियां` शीर्षक से प्रकाशित ये साक्षात्कार अरुण प्रकाश जी के वक्तित्व का खुलासा लगभग कर देती हैं और यह साक्षात्कार की पहली शर्त है. इसलिए यह साक्षात्कार काफी प्रभावशाली बन पड़ा है. वर्तमान समय में जो साहित्यिक गतिविधियाँ चल रही हैं वह ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं हैं. इस बात की चिंता अरुण प्रकाश ने व्यक्त की है. 
   
 

subh [subhashbhu@gmail.com] delhi - 2012-10-10 19:45:25

 
  मेरे सबसे प्रिय लेखक थे जिनसे मैंने सिखा कि वामपंथ क्या है, जिसे मै वामपंथ की नर्सरी में नहीं सीख पाया. मुझे छदम वामपंथियों से उन्होंने बचाया. बीडी कारखाने में काम करते करते मैं तंग आ गया था लेकिन उन्होंने ढाढ़स बनाये रखा. अभावग्रस्त समय में कैसे जिया जाता है उनसे सिखने को मिला. मुझे प्यार से हनुमान कहते थे. जीवन के आखिरी दिनों में भी ईश्वर कि सत्ता में विश्वास नहीं किया जैसा कि अन्य वामपथी करते है. उस कॉमरेड को लाल लाल लाल सलाम !  
   
 

krishnasoni [krishnasoni.bhu@gmail.com] university of hyderabad - 2012-09-28 15:36:52

 
  जीवन संघर्ष मनुष्य को मानवता से प्रेम करना सिखाता है. कुछ ऐसा ही अनुभव कथाकार अरुण प्रकाश जी से मिल कर और इस साक्षात्कार को पढ़ कर लगा. 
   
 

उमा [umadisplaced@gmail.com] धनबाद - 2012-09-27 04:41:09

 
  भाई, बेहतरीन काम। पुष्पराज भाई ही ऐसा काम कर सकते हैं। आखिरी वक्त जब सांस की सांस से जंग छिड़ी हो और तब साहित्य लेकर बैठ जाएं, क्या यह ऑक्सीजन की नमी (सिलिंडर मे मौजूद नाइट्रोजन) को खत्म करने जैसा नहीं है? मैं नहीं कहता कि पुष्पराज ने कुछ अमानवीय किया है। मैं समझ सकता हूं कि इस काम के लिए उन्हें किस बेदिली से गुजरना पड़ा होगा और वे भी द्वंद्व से लड़े होंगे। खैर है तो यह हिंदी के लिए थाती जैसा महत्व का काम। अरुणप्रकाश का आत्मसंघर्ष उनके रचनात्मक संघर्ष की जमीन बना। अरुण प्रकाश पर अध्ययन के लिए एक रेफरेंस प्वइंट होगा यह। एक बार आलोक जी आपको भी पाठकों को आलोकित करने के लिए शुक्रिया।  
   
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