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किसका देश, किससे देशद्रोह?

संवाद

 

किसका देश, किससे देशद्रोह?

सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद और विश्वविजय से आशीष कुमार अंशु की बातचीत

सीमा आजाद और विश्वविजय


सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय के खिलाफ देशद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप है. 6 फरवरी 2010 को दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले से लौटते समय इलाहाबाद में गिरफ्तार किये गये सीमा और विश्वविजय से उत्तरप्रदेश में बेहद बदनाम स्पेशल टास्क फोर्स ने कथित माओवादी साहित्य बरामद करने का आरोप लगाया था. इस मामले में इलाहाबाद की एक अदालत ने इन दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 6 अगस्त को इन्हें जमानत पर रिहा करने के आदेश दिये. सीमा और विश्वविजय से हमने विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की. यहां पेश है उस बातचीत के अंश.

l सीमा आपने और विश्वविजय ने बीते ढाई साल जेल में गुजारे, इन बीते ढाई सालों को जब आप याद करते हैं तो क्या-क्या याद रह जाता है ?

सीमा: बीता हुआ समय वापस नहीं आता, अब सवाल यह है कि जो नेगेटिव बीत रहा है, उसे पाजीटिव कैसे किया जाए? ऐसा कर लेने से हम समय को पकड़ लेते हैं. मतलब बुरे समय को भी हम सकारात्मक तरीके से पकड़ लेते हैं.

हमलोगों के मामले में हमारा ढाई साल बहुत बुरा गुजरा लेकिन उसे पकड़ने की और बचाने की हमलोगों ने काफी कोशिश की. जेल में पढ़ना-लिखना और जेल को जानना भी अपने आप में महत्वपूर्ण काम है. मतलब किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता को जेल की स्थितियों के संबंध में जानना चाहिए कि कैसे लोग जेल में फंसे हुए हैं. यदि हम जेल नहीं गए होते तो यह सब जान नहीं पाते. जेल की दुनिया कैसी होती है, उससे अनजान रह जाते.

अब जेल में बीते दिनों को बस इस तरह देखते हैं कि ढाई साल बुरा गुजरा, लेकिन बेकार नहीं गया.

l जब आप दोनों जेल में थे, घर-परिवार और समाज का रूख आपके लिए असहयोग का था या उनका नैतिक साथ हमेशा आप दोनों को मिला? आपकी गिरफ्तारी पर परिवार की प्रतिक्रिया क्या थी?

सीमाः गिरफ्तारी की बात सुनकर घर वाले बहुत परेशान रहे. हमारा घर ढाई साल तक वहीं ठहरा रहा, जहां हम छोड़ कर आए थे. हमारे पिताजी सेवानिवृत हो गए हैं. वो साल में घूमने जाते थे. मगर ढाई साल से कहीं नहीं गए. कोर्ट-कचहरी के ही चक्कर लगाते रहे. पिताजी का हार्निया का ऑपरेशन था, वह भी टलता रहा. वो हमारे इंतजार में थे कि एक बार हम बाहर आ जाएं, फिर ऑपरेशन हो. इस तरह यह ढाई साल पूरे परिवार के लिए ठहरा रहा. भाई-बहन एक बार जरूर इलाहाबाद आकर मुझसे जेल में मिलते थे कि मुझे यह ना लगे कि इस मुश्किल की घड़ी में मैं अकेली हूं.

विश्वविजयः इसे संयोग कहिए कि मेरे पिताजी का एक गंभीर ऑपरेशन होना था, वह हो जाने के बाद हमारी गिरफ्तारी हुई. सीमा की बात में थोड़ी बात और जोड़ दूं, हमारे जेल में रहते हुए हमारे कई करीबी लोगों की मृत्यु हुई, जिनकी अंतिम यात्रा में शामिल ना होने को लेकर हम काफी छटपटाए. इन ढाई सालों में कई अजीज लोगों को खोया हमने और दुख है कि अंतिम समय में हम उनके साथ नहीं थे.

हम पर जिस तरह के आरोप थे और मिलने पर जिस तरह की बंदिशे थीं, इससे कई मिलने की इच्छा रखने वाले मिल नहीं पाए और कुछ तो हिचकते भी थे. यह भी हुआ कि यूपी पुलिस और एटीएस जिससे पूछताछ करते थे, वे भी मिलने में हिचकने लगे, कहीं सीमा और विश्वविजय से संबंध के कारण हम भी ना फंस जाए. वे लोग जो जेल आकर मिल सकते थे, हिचक के कारण नहीं मिलते थे. वैसे जेल में बाहर से संपर्क बिल्कुल कट जाता है, इसलिए बाहर के लोग क्या सोच रहे हैं, समझना मुश्किल होता है.

वैसे हमलोगों ने जेल में अपने सचेत प्रयासों से लिखने, पढ़ने और जेल की स्थितियों को समझने का प्रयास जारी रखा.

l क्या पुराने रिश्तेदारों और जान पहचान के लोगों के व्यवहार में जेल जाने या फिर जेल से लौटने की वजह से कुछ बदलाव आया?

सीमाः इलाहाबाद में जहां हम रहते हैं, वहां शहरीकरण के प्रभाव के बाद भी पुरानी मोहल्लेदारी कायम है. वहां आस पास के लोगों का पूरा सहयोग मिला. चूंकि आसपास के लोगों को पता था कि हम क्या काम करते हैं. बहुत सारे मुद्दों पर हमने अपने गोविन्दपुर में नुक्कड़ नाटक किए और पर्चे बांटे. सबने सहयोग किया, यह भी कहना पूरी तरह से ठीक नहीं होगा. कुछ लोग परिवार के बहुत नजदीक थे, वे दूर भी गए.

विश्वविजय: हमारे गांव में भी जो लोग सोचने, समझने और पढ़ने, लिखने वाले थे, वे हमारे साथ रहे. समाज के वे लोग, जिनके साथ और जिनके बीच समय-समय पर हम कुछ-कुछ एक्टिविटी करते रहे, वे भी अलग-अलग तरह से हमारे सहयोग के लिए सामने आए. वे हमारे घर वालों को दिलासा देते थे, आपके बेटे, आपके बेटी ने कुछ भी गलत नहीं किया है. रविकिरण जैने ने हमारे वकील से बढ़कर भूमिका निभाई और परिवार के सदस्य की तरह हमारी हरसंभव मदद के लिए हमेशा साथ खड़े रहे. इसी तरह मानवाधिकार के लिए काम करने वाले संगठन हमारे परिवार के साथ खड़े रहे. जब एटीएस और एसटीएफ बहुत डरा रही थी, उस समय इनका संबल मिलता रहा.

l जेल का अनुभव क्या रहा, कुछ बातें जो साझा करना चाहें?

सीमाः जेल में दो बातें सीखने के लिए होती हैं, एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक. जेल के अंदर, जेल का पूरा चरित्र नंगा दिखा. वहां किस तरह भ्रष्टाचार है, वहां किस तरह घूस का सिस्टम है, किस तरह वहां छोटी-छोटी बातों के लिए बंदियों से पैसे लिए जाते हैं. यह सब हमने देखा भी, भोगा भी और जेल के अंदर इसके खिलाफ लड़े भी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Ashok Upadhyay [] Vadodara - 2012-12-13 01:55:37

 
  पता नहीं क्यों, ऐसे लेख पढ़ कर मेरा देश प्रेम कम होने लगता है . 
   
 

ramesh kumar [] delhi - 2012-10-31 14:26:29

 
  हमं ऐसी खबरें पढ़ते और सुनते हैं तो हमारे सिस्टम पर रोना आता है. हम कहां जाएं और किसको ये सब सुनाएं, जिस देश का राजा अंधा बहरा हो उसका राज्य राम के भरोसे ही चलता है. 
   
 

rajani jha [] nagpur - 2012-10-09 08:32:58

 
  पढ़ कर विश्वास ही नहीं होता है, कि हमारे देश के अंदर का ये हाल है. हम तो चैन से घर में अपना डेली रूटीन मैनेज करते रहते हैं. बस जान कर खुशी होती रहती है कि हमारा देश प्रगति कर रहा है. विभिन्न समाचार पत्रों के माध्यम से. पर ये कैसी प्रगति? हम कहां जा रहे हैं? जेल के अंदर का ये हाल... बहुत ही दुखद. 
   
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