पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना > Print | Share This  

शर्मिला की जीत होगी

संवाद

 

शर्मिला की जीत होगी

सामाजिक कार्यकर्ता शर्मिला ईरोम के भाई ईरोम सिंहजीत सिंह से आशीष कुमार अंशु की बातचीत

ईरोम सिंहजीत सिंह


बीते पांच नवम्बर को आर्म्स फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट के खिलाफ शर्मिला के भूख हड़ताल को 12 साल पूरा हो गया है. किसी व्यक्ति की जिन्दगी में 12 सालों का क्या अर्थ होता है, यह बात तो हम सब जानते हैं लेकिन इसे शर्मिला और उनके परिवारजनों से बेहतर कौन जान सकता है. 12 सालों के बाद भी शर्मिला का संघर्ष अभी ठहरा नहीं है, जारी है. उनकी इस लड़ाई को हमने उनके परिवार की नजर से जानने की कोशिश की. मां ईरोम सखी देवी, बीमार होने की वजह से अधिक बात करने की स्थिति में नहीं थी. उन्होंने इतना भर कहा- ‘मणिपुर से किसी भी तरह आर्म्स फोर्सेस एक्ट को खत्म कीजिए.’ उनके बडे भाई ईरोम सिंहजीत सिंह से हमने लंबी बातचीत की. जिसके अंश यहां प्रस्तुत हैं. -

शर्मिला का छात्र जीवन कैसा था? क्या वह छात्र जीवन से आन्दोलनों में रूचि रखती थीं?
वह पढ़ने में बेहद होशियार रही है. बारहवीं तक पढ़ाई की. उसका मानना था, पढ़ाई का अर्थ है, लिखने, पढ़ने और बोलने का हुनर आ जाना. इससे अधिक की उसे जरूरत नहीं थी. बारहवीं के बाद उसका आन्दोलनों के प्रति रूझान बढ़ा. उसने कभी एक संगठन के साथ मिलकर काम नहीं किया. किसी भी संगठन में कार्यकर्ता के नाते उसका नाम नहीं है. उसने अकेले दम पर हमेशा विश्वास किया. छात्र संगठनों के आयोजनों में बिना बुलाए जाती थी. गोष्ठीयों को पिछली सीट पर बैठकर ध्यान से सुनती थी. इसी तरह शहर में किसी गोष्ठी-चर्चा की उसे जानकारी मिलती थी तो वह चली जाती थी.

इसी तरह अक्टूबर 2000 में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के एक समूह ने एक जांच समिति बनाई थी, जो अफ्सा (आर्म्स फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट) के पीडि़तों से मिल रहे थे. शर्मिला ने भी इसे अटेन्ड किया. 25 अक्टूबर को जब जांच समिति ने अपनी बात को रखा तो शर्मिला भी उनकी बात सुन रही थी. और 25 अक्टूबर के सात दिनों के बाद दो नवम्बर का कांड हो गया. दो नवम्बर को असम राइफल्स के जवानों ने कई निर्दोष लोगों की जान ले ली. इस घटना के बाद ही खतरनाक कानून को हटाने के मुद्दे को लेकर शर्मिला गंभीर हो गई. घटना के बाद 3-4 नवम्बर को पूरा मणिपुर कर्फ्यू रहा. 05 नवम्बर को शर्मिला भूख हड़ताल पर बैठीं. 06 नवम्बर को शर्मिला गिरफ्तार हुई.

ईरोम शर्मिला ने किन स्थितियों में अनशन का निर्णय लिया?
हमारे यहां 1904-1939 में दो बार महिलाओं ने बडी लड़ाई लड़ी, दोनों बार यह लड़ाई अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी. मणिपुर के किसी भी आन्दोलन में मणिपुर की महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. यहां की महिलाओं ने हमेशा आगे बढ़कर आन्दोलनों का नेतृत्व सम्भाला है. शर्मिला भी इसी समाज से निकली है.

सन 1980 में पूरे मणिपुर को अशांत दिखाकर आर्म्स फोर्स (स्पेशल पावर्स) एक्ट लाया गया. इसी वजह से मणिपुर की महिलाओं की तरफ से विरोध प्रदर्शन प्रारंभ हुआ. जिसमें एक महिला की मृत्यु भी हुई. उस दिन से इस कानून को हटाने के लिए लड़ाई जारी है, लेकिन हमारे राज्य (मणिपुर) की सरकार कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं है.

2 नवम्बर 2000 को मालोंग हवाई अड्डा पर असम राइफल्स ने 10 निर्दोष लोगों को मारा. जिसमें एक महिला और राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त एक युवक की भी उन्होंने हत्या की. इन्हीं हत्याओं के खिलाफ 5 नवम्बर 2000 से शर्मिला ने भूख हड़ताल शुरु किया और 6 नवम्बर 2000 को उसे जेल में डाल दिया गया. 20 नवम्बर तक शर्मिला को जेल में रखने के बाद 21 नवम्बर को अस्पताल में एक सिक्यूरिटी वार्ड बनाकर नोजल फीडिंग करके उसे आज तक रखा गया है. उसे धारा 309 (अटेप्ट टू कमिट सुसाइड) के अन्तर्गत बंद करके रखा गया है. प्रत्येक 15 दिनों में उसे कोर्ट ले जाया जाता है. कोर्ट से फिर आगे के लिए 15 दिनों का रिमांड ले लिया जाता है. और एक साल पूरा होने पर उसे कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है क्योंकि धारा 309 के अंदर एक साल से अधिक किसी को जेल के अंदर रखा नहीं जा सकता. एक साल पूरा होने पर उसे छोड़ दिया जाता है.

जेल से छुटने के बाद पुलिस क्या उन्हें घर पर छोड़ कर जाती है?
शर्मिला ने तय किया है कि जब तक यह कानून खत्म नहीं हो जाता, वह घर नहीं आएगी. बीते 12 सालों में वह कभी घर नहीं आई. उसे पुलिस कस्टडी से छोड़ दिया जाता है लेकिन उसने पिछले 12 सालों में कभी अपनी भूख हड़ताल खत्म नहीं की. भूख हड़ताल जारी रखने की वजह से एक-दो दिनों में शर्मिला की तबियत बिगड़ती है और पुलिस फिर उसे हिरासत में ले लेती है. साल में उसे एक बार छोड़ा जाता है और एक-दो दिनों में फिर पुलिस उसे पकड़ कर ले जाती है. यह सब पिछले ग्यारह सालों से चल रहा है.

जब आप शर्मिला को मिलते हैं, वह आपसे क्या जानना चाहती हैं? मां कैसी हैं? परिवार में सब कैसा है? समाज कैसा है? या फिर मणिपुर कैसा है? देश की राजनीति में क्या चल रहा है?
उसकी बाहर की सारी घटनाओं में रूचि नहीं है. वह कुछ नहीं जानना चाहती, वह सिर्फ कानून के संबंध में पूछती है, वह अपनी आखिरी सांस तक इस कानून को हटाने के लिए तैयार है. जब तक कानून हटता नहीं है, वह वापस जाने को तैयार नहीं है. वह मिलती है तो कानून के खिलाफ चल रहे अभियानों और आन्दोलनों को लेकर चिन्तित नजर आती है, निराश नहीं.

मां ईरोम सखी देवी जब बेटी शर्मिला से मिलती हैं तो क्या शर्मिला अपने जज्बातों पर काबू रख पाती हैं?
मां ने और शर्मिला ने एक दूसरे से वादा लिया है कि कानून हटने तक एक-दूसरे से मिलेंगे नहीं. एक बार 2009 में जिस अस्पताल में शर्मिला को पुलिस कस्टडी में रखा है, वहीं मां ईलाज के लिए रूकी थीं. ईरोम को मां की बीमारी की खबर लगी तो वह खुद को रोक नहीं पाई, जब मां सोई हुई थी, उस वक्त वह पुलिस सुरक्षा में चुपके से आकर मां से मिली. तीन महीने पहले एक बार फिर मां जब उसी अस्पताल में भर्ती थीं, ईरोम उनकी सेहत को लेकर बहुत चिन्तित हो गई. वह मां को मिलने आई, और मां के पैर के पास बैठ कर रोने लगी, इस बार मां की आंख खुल गई. उन्होंने शर्मिला को कहा- ‘वापस जाओ, कमजोर मत होना.’ मां ने शर्मिला को कह दिया है, जब तक कानून वापस नहीं होता, तुम घर में वापस नहीं आना. शर्मिला ने भी वादा किया है, वह नहीं आएगी.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

S R Garg. [Srgarg43@yahoo.com] Sonipat. - 2013-04-19 03:25:56

 
  I am with sharmila and her struggle. I wish her success. State and central government must consider the issue which she is raising for the people of Manipur state.  
   
 

rajneesh tripathi [] GORAKHPUR - 2013-04-07 13:49:35

 
  इतने दिनों से कोई प्रदर्शन कर रहा है, सरकार को इस ओर ध्यान देना ही चाहिए. जब इरोम का स्वास्थ्य गिरता है तो ये राष्ट्रीय खबर बन जाती है. उस समय सरकार की नजर भी तो उस पर जाती होगी. 
   
 

Ranjeet kumar mandal [financebilling@vodafone.com] - 2013-02-15 07:04:06

 
  हम ही नही शर्मिला जी के साथ पूरा देश है. 
   
 

Naresh Tanwar [nareshtanwar2012@gmail.com] Bhiwani - 2013-01-28 11:07:51

 
  Bravo Sharmila we are with you. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in