पहला पन्ना >माओवादियों का कोई भविष्य नहीं है Print | Share This  

अभय कुमार दुबे से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

संवाद

 

माओवादियों का कोई भविष्य नहीं है

अभय कुमार दुबे से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत

Abhay kumar dubey


वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अभय कुमार दुबे का मानना है कि राजनीति की जो मुख्यधारा है, वो भारतीय समाज में अभी भी अहिंसक है. हिंसा की राजनीति 20 प्रतिशत की राजनीति है. अभय कुमार दुबे की राय में मजदूर आदिवासियों में माओवादियों का कोई प्रभाव नहीं है, मैदानी किसानों में उनका कोई प्रभाव नहीं है. जो भूमि का प्रश्न है, उससे माओवादियों का कोई ताल्लुक नहीं है. कुछ महीने पहले हमने रायपुर में उनसे यह बातचीत की.

00 अगर स्वामी विवेकानंद आज होते या फिर ऐसा कहें कि आज के हिंदुस्तान या समाज में उनकी प्रासंगिकता क्या है?

मैंने स्वामी विवेकानंद को जितना पढ़ा और समझा है, उस लिहाज से मुझे लगता है कि वे आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचार के जनक हैं और इस लिहाज से उनके विचारों की प्रासंगिकता है. मुझे यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि अगर स्वामी विवेकानंद नहीं होते तो भारतीय राजनीतिक चिंतन वैसा ही नहीं होता, जैसा आज है.

मैं समझता हूं कि मौजूदा भारतीय राष्ट्रवाद और उसकी अभिव्यक्ति भी उन्होंने बनाई. जो भारतीय सेक्यूलरवाद है, ये जो संविधान सम्मत सेक्यूलरवाद है, उसके सूत्र भी स्वामी विवेकानंद के विचारों में मिलते हैं. यह देख कर ताज्जुब होता है कि स्वामी विवेकानंद के विचारों का जो आंशिक अध्ययन किया जाता है या अपने-अपने राजनीतिक और विचारधारा के उद्देश्यों से उनकी वैचारिकी का जो दोहन किया जाता है, उसकी वजह से उनके बारे में बहुत गलतफहमियां फैलती हैं.

मुझे लगता है कि स्वामी विवेकानंद आज होते तो वही होते, जो कि उस वक्त थे. वे आज की तारीख में भी 19वीं सदी के स्वामी विवेकानंद होते. जो 39 साल का जीवन उन्होंने जीया, उसमें वह एक बड़े सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. स्वामी विवेकानंद की जो राजनीति थी, वो वैसी चुनावी राजनीति जैसी आजकल हम लोग करते हैं या राजनीति की जो लोकप्रिय परिभाषा है; उस रूप में वह नहीं थी. विवेकानंद विचारों की और संस्कृति की राजनीति करते थे और उस बारे में बिल्कुल स्पष्ट थे.

जब एक बार बहन निवेदिता ने बंगाल के कुछ क्रांतिकारियों से संपर्क कर के कुछ राजनीतिक योजना बनाने की कोशिश की तो स्वामी विवेकानंद ने कहा भी था कि निवेदिता, भारत की राजनीति के बारे में बहुत कम जानती है. उससे ज्यादा राजनीति तो मैं कर चुका हूं. जाहिर है, अगर आज विवेकानंद होते तो वह अब भी एक बहुत बड़े सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे होते.

विवेकानंद की विशेषता ये थी कि वो सिद्धांत और व्यवहार को मिलाते भी थे और अपनी व्याख्या में उसको बड़े सुचिंतित रूप से और राजनीति से अलग भी करते थे. चाहे वो आधुनिकता का सिद्धांत हो, आधुनिकता की ज्ञान मीमांसा हो या कुछ और. चाहे इस्लाम का धर्मशास्त्र हो या इस्लामिक थियोलॉजी या जो प्रायोगिक इस्लाम है. इसी तरीके से जो भारतीय दर्शन है और जिस वेदांत की उन्होंने व्याख्या की, उसको हम प्रैक्टिकल वेदांत भी कहते हैं. मतलब ये कि विचार और व्यवहार को मिलाने और उसे अलग-अलग करने; इन दोनों कलाओं में उन्हें एक खास महारत हासिल थी, जो बहुत कम लोगों को होती है.

00 और गांधी ? विवेकानंद और गांधी के रिश्ते को किस तरह देखते-परखते हैं?

काफी विद्वानों ने इस विषय पर काम किया है. कुछ लोगों का मानना है कि विवेकानंद में हम गांधी की आहट देख सकते हैं, गांधी का पूर्वानुमान देख सकते हैं. लेकिन कुछ विद्वानों का मानना यह है कि विवेकानंद और गांधी में बहुत फर्क था. यहां तक कि एक बार गांधी ने विवेकानंद को खारिज कर दिया था. इस लिहाज से विवेकानंद के बारे में कहा जाता है या माना जाता है या ये एक लोकप्रिय धारणा है कि वो भारतीय आध्यात्मिक अतीत का गुणगान करते थे और साथ में भारत की जो गरीबी थी, भारत का जो भौतिक पिछड़ापन था, उसके लिए उनके पास तरजीह ये थी कि हमें पश्चिमी आधुनिकता से काफी कुछ सीखना चाहिए.

अगर इस आइने में हम देखेंगे तो पाएंगे कि गांधी विवेकानंद को खारिज करते हैं. गांधी भारत के आध्यात्मिक अतीत का भी गुणगान नहीं करते और गांधी भारत की समस्याओं के निदान के लिए पश्चिमी आधुनिकता से कुछ सीखने के लिए भी तैयार नहीं हैं. यहां तक कि वो कहते हैं कि पश्चिमी आधुनिकता जो है, वो भारतीय गरीबी का कारण है. जो औद्योगिकरण है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास है, वो भारतीय गरीबी का कारण है. मतलब एक दृष्टि से गांधी को इस तरह से पढ़ा जाता है और ये एक बहुत लोकप्रिय दृष्टि है.

एक दूसरा दृष्टिकोण गांधी और विवेकानंद के संबंधों को देखने का ये है कि विवेकानंद ने समाज, नीति और राजनीति और धर्मनीति, इन तीनों की अलग-अलग व्याख्या की है. तीनों में निरंतरता दिखाई पड़ती है लेकिन उन्होंने साथ-साथ तीनों की अलग-अलग व्याख्या भी की है. इस दृष्टि से जब विवेकानंद राष्ट्र को संकल्पित करते हैं तो उनका राष्ट्र जो है, वो राज्य का मोहताज नहीं है और वो राज्य के ऊपर बहुत कम जोर देते हैं. विवेकानंद ये नहीं मानते कि समाज का जितना भी विकास होगा वो सब राज्य के जिम्मे डाल देना चाहिए और हम राज्य के मुखापेक्ष हो होकर रह जाएं और ये संस्था लगातार विशाल से विशाल होती चली जाए. यहां पर हम देखते हैं कि गांधी और उनके अंदर बड़ी समानता है क्योंकि वो ऐसा मानते थे कि समाज के विकास के लिए स्वयंसेवी भाव से किए गए प्रयास जरुरी हैं. यहां भी हम देखते हैं कि गांधीजी के रचनात्मक कार्यों में और उनके अंदर काफी समानता है.

आप देखें तो पायेंगे कि जो स्वयंसेवी प्रयास है, वो भारतीय राष्ट्र और भारत के समाजिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है. हिंदी भाषा के विकास के लिए स्वयंसेवी प्रयास बहुत महत्वपूर्ण रहा है. अब जैसे उर्दू है. उर्दू के साथ स्वयंसेवी प्रयास नहीं जुड़े हैं, इसीलिए उर्दू का विकास रुक गया. एक हिंदी से पुरानी और कहीं समृद्ध भाषा होते हुए भी उसका विकास रुक गया. आज हिंदी बहुत आगे चली गयी क्योंकि बहुत बड़े पैमाने पर स्वयंसेवी प्रयास हुए. आप इक्कीसवीं सदी के शुरुआत से ही देख लें. हिंदी स्वयंसेवी प्रयासों के दम से सामाजिक क्षेत्र में ही बहुत ज्यादा विकसित हुई है. मैं ये मानता हूं कि सरकारी क्षेत्र में तो हिंदी को नुकसान ही ज्यादा हुआ है. तो इन दो-तीन दृष्टियों से विवेकानंद गांधी के नजदीक हैं. और अगर आधुनिकता को आंशिक रूप से स्वीकार करने और आधुनिकता को खारिज करने के मुहावरों पर हम जाएं तो हम पाते हैं कि गांधी और विवेकानंद में फर्क है.
आगे पढ़ें

Pages: