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ज्योत्स्ना मिलन से अनिरुद्ध उमट की बातचीत

संवाद

 

ज्योत्स्ना मिलन से अनिरुद्ध उमट की बातचीत

हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका ज्योत्स्ना मिलन का यूं एकाएक चले जाना उन्हें जानने वालों को उदास कर गया है. लेखकों और पाठकों का एक विशाल वर्ग उनसे गहरे तक जुड़ा हुआ था और अब उस जगह एक रिक्तता है. लेखक-कवि अनिरुद्ध उमट ने कुछ समय पहले ज्योत्स्ना जी से यह लंबा संवाद किया था. यह संवाद कवि-रचनाकार पीयूष दईया ने रविवार को उपलब्ध कराया है.

ज्योत्स्ना मिलन


अनिरूद्ध उमट: आप लेखन में स्त्रीवादी लेखन के बरक्स ‘मात्र लेखक’ होना पसंद करती हैं, मगर ऐसा कर कुछ छोड़ तो नहीं रही होतीं?

ज्योत्स्ना मिलन: मात्र लेखक होना पसंद करने जैसी कोई बात नहीं है. सबसे पहले तो लेखक लेखक होता है स्त्री या पुरूष या कोई भी वादी-नारीवादी, जनवादी, प्रगतिवादी, रूपवादी, दलितवादी आदि जो कुछ भी होता है वह बाद में होता है. कोई भी लेखक जब लिखता है तो वह यह याद रख कर नहीं लिखता कि मैं अमुकवादी हूं इसलिए मुझे इन इन चीज़ों के बारे में लिखना चाहिए और इस तरह से लिखना चाहिए. इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं कवि शमशेर बहादुर सिंह. उनकी श्रेष्ठ कविताओं में उनकी विचारधारा या वाद का कोई अंतःसाक्ष्य नहीं मिलता. वे किसी भी वाद से परे प्रथमतः कविताएं हैं, बल्कि श्रेष्ठ कविताएं हैं. किसी भी रचना का रचना की कसौटी पर रचना के तौर पर खरा उतरना ज़रूरी है. इस अर्थ में किसी भी लेखन को लेखन और किसी भी लेखक को लेखक होना चाहिए स्त्री या पुरूष नहीं. यह नहीं कि स्त्री-पुरूष के लेखन में फर्क नहीं होता. चीज़ों को देखने का स्त्री का नज़रिया अलग होता है, उसके लेखन में इन्ट्यूशन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. बुद्धितत्व भी अक्सर इन्ट्यूशन के माध्यम से सक्रिय होता है.

सिर्फ लेखक कहलाना चुनने का मतलब स्त्रीत्व का निषेध करना बिलकुल भी नहीं है. कुछ छोड़ने की बात तो तब होती जब मैं अपने स्त्री होने से इंकार कर रही होती. अपने को स्त्रीवादी कह देने या मान लेने भर से मैं कुछ महत्वपूर्ण छोड़ देने से बच नहीं जाती. अपने को स्त्रीवादी लेखक कहकर लेखक समुदाय से मैं अपने को अलगा सकती हूं जैसे कोई अपने को जनवादी, प्रगतिवादी, या रूपवादी कहकर अलगा लेते हैं. यह अलगाना मुझे लेखन को विभाजित करना लगता है, जबकि मुझे सृजन के एक समग्र परिदृश्य से कम कुछ नहीं चाहिए.

मैं अपने को उस अर्थ में नारी वादी नहीं मानती कि सजग स्तर पर, विचार के स्तर पर सोच विचार कर या तय करके इस विचारधारा को अपनाने के उपरांत मैं लेखन कर रही हूं. स्त्रियों के बारे में मैंने शुरू से और सहज ही लिखा है. बिना यह जाने कि स्त्रीवाद जैसी किसी चीज़ का अस्तित्व इस धरती पर है. इससे मेरे लेखन में क्या छूटा क्या कमी रही, पता नहीं.

अनिरूद्ध उमट: बचपन में यदि आपको आज धकेल दिया जाए तो क्या आप अपनी चेतना में रहते लेखक बनना चाहेंगी या उससे बचना. या यूं कहें कि उससे बच गयीं और लेखक न हुईं तो क्या आप इस उम्र में चेतन रूप से लेखक ही बनेंगी?

ज्योत्स्ना मिलन: बचपन में आज फिर से धकेला जा सकता हो और धकेल दिया जाए तो भी होगा तो वह मेरा ही बचपन और परिवेश भी वही होगा. आप जानना शायद यह चाहते हो कि तब तो जिन भी कारणों से मैं लेखक बन गई, बन गई, लेकिन अब अगर मेरा चुनाव हो तो सचेतन स्तर पर भी क्या मैं लेखक बनना ही चुनूंगी? बात इतनी ही नहीं है कि घर में साहित्य का वातावरण था, कि घर में तमाम तरह की पत्र-पत्रिकाएं आती थीं, कि बापूजी के छोटे से पुस्तकालय में हिंदी, अंग्रेज़ी, बंगला की कई सारी पुस्तकें थीं. वो तो सभी लेखकों के यहां होती हैं, लेकिन सभी रचनाकारों के बच्चे इसी वजह से लेखक तो नहीं बन जाते. यह ठीक है कि घर में अपने आसपास इन सब चीज़ों का होना और साहित्यिक वातावरण का मिलना भी एक अहम् तत्व है लेकिन उतना ही पर्याप्त नहीं है.

यहां मुझे गीता की एक बात याद आ रही है कि -आदमी ने कुछ भी अच्छा किया होता है (पिछले जन्म में) वह व्यर्थ नहीं जाता. अगले जन्म में वह फिर वहीं से शुरू करता है. उसे अगले जन्म में उसी के लायक परिवेश मिलता है, कि वह अपने काम को आगे बढ़ा सके. आप साथ तुरंत पूछना चाहेंगे कि क्या मैं जन्मान्तर में मानती हूं? संभवतः निश्चयपूर्वक मेरा जवाब ‘हां’ हो यह नहीं कहा जा सकता. इस उम्र तक भी मैं नहीं जानती कि मैं क्या मानती हूं? क्या सब कुछ पहले से तय है या सब कुछ महज संयोग है कि सब कुछ ऊर्जा का खेल भर है? कभी पलड़ा इस तरफ झुक जाता है कभी उस तरफ. इसी क्रम में कभी कभी गीता की बात मान लेने का लालच होता है कि मेरा जन्म वीरेंद्रकुमार जैन के घर यों ही तो नहीं हुआ होगा. मुझे शब्द का वरदान मिला हुआ था. क्या वह वीरेंद्रकुमार जैन की देन थी या मेरी अपनी कमाई? या ऊर्जा का खेल भर था, पता नहीं.

आप शायद यह जानना चाहते हैं कि आज अगर मुझे चुनना हो तो क्या मैं सचेत स्तर पर लेखक होना चुनूंगी? आंख मूंदकर बिना किसी सोच-विचार के इसका जवाब छोटी सी ‘हां’ के सिवा कुछ और नहीं हो सकता. मनुष्य की कल्पना का सर्वोच्च शिखर! होते होते जो कभी भी अपने न होने में छलांग लगा देता है. शब्द में साकार होकर ‘वह’ वेद में बस जाता है और जो साकार-निराकार दोनों है. ऐसे शब्द के सिवा मेरा चुनाव कुछ और हो यह असंभव ही है. वैसे संगीत भी शब्द यानी ध्वनि से उपजा है और अधिक शुद्ध- चनतम माना जाता है. कइयों के मुताबिक कलाओं में सर्वश्रेष्ठ कला भी. पर मुझसे अगर पूछो तो शब्द की कला से ऊपर कुछ भी नहीं हो सकता ध्वनि का, अर्थ का, दृश्य का, खेल का सब कुछ का मज़ा एक साथ!

अनिरूद्ध उमट: अपने स्त्री होने को भी इसी प्रश्न में लेखन की जगह रखकर देखें. स्त्री होने की अनुभूति क्या वही है, जो आज से बहुत पहले आरंभ में थी, उससे छूटना चाहेंगी या उसी में रहना?

ज्योत्स्ना मिलन: स्त्री होने की अनुभूति में कोई बड़ा अंतर आया है ऐसा नहीं लगता, लगभग शुरूवाली ही अनुभूति है लेकिन इससे छूटना चाहने का प्रश्न क्यों और कहां से उपजा? समझ में नहीं आया. स्त्री होने का अनुभव एक गहरा और संपूर्ण अनुभव है चाहे स्त्री का जीवन जितनी भी जहालतों से, ज़्यादतियों से घिरा क्यों न हो! स्त्री स्वयं प्रकृति है, इसलिए सृजन उसका स्वभाव धर्म है और उसका जीवन एक रचनारत जीवन है. लय-विलय यानी होना- न होना सहज ही उसके स्व-भाव में शामिल है.
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