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थियेटर करने का एक सामाजिक कारण होना चाहिए-प्रसन्ना

संवाद

 

थियेटर करने का एक सामाजिक कारण होना चाहिए-प्रसन्ना

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और साहित्यकार प्रसन्ना से अनीश अंकुर की बातचीत

 

प्रसन्ना रंगमंच के भारतीय मानचित्र पर संभवत: सबसे चितंनशील शख्सीयत के रुप में जाने जाते हैं. उन्होंने न सिर्फ अपने थियेटर से बल्कि थियेटर,समाज व राजनीति से संबंधित अपने विचारों से भी एक बिल्कुल खास पहचान बनायी है. प्रसन्ना से यह बातचीत मार्च 2001 में पटना की गई थी. जाहिर है, रंगमंच और दुनिया के दृश्य पर तब से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है. लेकिन इस बातचीत के सवाल लगातार प्रासंगिक बने हुए हैं. यहां पेश है वह पूरी बातचीत.

प्रसन्ना



 प्रसन्ना जी, अभी बंगलोर में कर्नाटक के रंगकर्मियों के साथ जो खुली बातचीत हुई, उस बातचीत का मुख्य कन्सर्न क्या था?

 

जो बातचीत हुई उसका पहला उद्देश्य था उस समारोह को भारतीय रंगकर्म बनाया जाए, जिसकी 2-3 वजहें हैं. पहला तो यह कि आजादी के बाद हम थियेटर वाले कभी एक साथ मिले ही नहीं. इससे पहले थियेटर ने दूसरे माध्यमों से आगे बढ़कर नेशनल मूवमेंट में भाग लिया था और उस वजह से बहुत सारे कलाकार सामने आए मसलन असम से भूपेन हजारिका,बंगाल से रविशंकर, सलिल चौधरी.

आजादी के बाद थियेटर के लोग कभी एकजुट नहीं हुए. मुझे ये बहुत खला क्योंकि छोटे-छोटे प्रोफेशन चाहे वो बैंक हो या एलआईसी, सबका अपना प्रोफेशनल ऑर्गनाइजेशन है. इससे पहले हम लोगों ने नेशनल कन्वेंशन बुलाने की सोची थी जो नहीं हो पायी, वजह थी केन्द्र सरकार का रुख.

हमने कहा कि बंगलोर में हम अपने खर्चे पर 1000 लोगों को बुलाकर कन्वेंशन करेंगे और उस समय जो रंग महोत्सव दिल्ली में होता है, उसको सरकार बंगलौर में करें.दिल्ली का अपना कोई ऑडियेन्स तो है नहीं, वो आई ए एस अफसरों का शहर है. हो सकता है कि पुरानी दिल्ली में हों लेकिन नई दिल्ली में तो नहीं है. फिल्म महोत्सव आप दिल्ली में कीजिए लेकिन रंग महोत्सव दूसरे शहरों में भी करें. सरकार इसके लिए तैयार भी हो गई लेकिन बाद में यह मामला राजनीतिक वजहों से लटक गया.

बाद में हमने कन्वेंशन तो किया लेकिन पैसों की कमी की वजह से हम देश भर से लोगों को नहीं बुला सकें. वहां हमने तीन मुद्दे उठाए, पहला था राष्ट्रीयता की परिकल्पना का सवाल. संविधान की अनुसूची में जो भी भाषाएं शामिल हैं, उन सबको हम राष्ट्रीय भाषा मानते हैं और उनमें होने वाला रंगकर्म राष्ट्रीय है. दरअसल 20-25 साल से जो राष्ट्रीय रंगभूमि में हैं, वो हिन्दी को उसकी भाषा मानते है. इसका सबसे ज्यादा नुकसान भी हिन्दी थियेटर को हुआ क्योंकि उसका मतलब सिर्फ दिल्ली का थियेटर समझा जाता है बिहार यूपी का थियेटर नहीं. संस्कृति मंत्रालय के ग्रांट का आधे से ज्यादा पैसा दिल्ली को मिलता है. थियेटर की सुविधा के लिए सारे संस्थान दिल्ली में है, बच्चों के रंगकर्म के लिए बनी थियेटर एजुकेशन कंपनी ज्यादातर दिल्ली के स्कूलों में काम करती है.

एनएसडी की बात करें तो पहले वहां से छात्र अपने शहरों में वापस जाते थे मगर 10-15 सालों से कोई वापस नहीं जा रहा. 80 फीसदी लोग मुंबई चले जाते है और जो बचते हैं वो एक दो साल बाद घूम फिरकर वहां चले जाते है. यानी वह ड्रामा स्कूल नहीं रह गया बल्कि टेलीविजान के लिए एक्टर तैयार करने वाला संस्थान है. इसका क्या मतलब रह जाता है? शिक्षा विभाग का दसवां हिस्सा भी नहीं मिलता कल्चर विभाग को और वहां से थियेटर के हिस्से सौवां भाग भी नहीं आता. इतना कम.

पैसा भी थियेटर से टेलीविजन में जा रहा है. टेलीविजन तो उद्योग है करोड़ों कमा रहा है. होना ये चाहिए था कि वो अपना पैसा थियेटर में लगाता.ये ठीक वैसा ही है, जंगल खुद को काटकर कागज उद्योग लगाने वाले को सौंप दे. टेलीविजन और फिल्म आने के बाद थियेटर सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है उसको आमजन की अभिव्यक्ति भी बनना है. वो सब उनकी भाषा में उनकी जगह पर होना चाहिए वरना थियेटर का कोई मतलब नहीं रह जाता. थियेटर के होने का एक सामाजिक कारण होना चाहिए.

पिछले 30-40 सालों में हमने राजनीतिक ढंग से एक सोशल रिकॉगनाइजेशन बनाया. मंडल कमीशन या दूसरे तरीकों से हमारी आवाज केन्द्र तक पहुंची है. अब जो नए लोग आ रहे हैं, वो इस प्रजातंत्र का हिस्सा कैसे बनें, इसको आप यूर्नीवसिटी में नहीं सिखा सकते. थियेटर उसके लिए सशक्त माघ्यम है.

दूसरा मुद्दा था रंगकर्म की शिक्षा से संबंधित. एनएसडी के अलावा देश में 40 संस्थान हैं जो दूसरी भाषाओं में पढ़ा रहे है लेकिन उनके पास उचित नीति नहीं है, पैसे का अभाव है साथ ही कई राज्यों में ये संस्थान भी नहीं है. बिहार में ड्रामा का डिपार्टमेन्ट नहीं है. हम चाहते है कि संस्थानों को प्रॉपर सिलेबस मिले, पैसे मिलें और साथ ही जिम्मेदारी तय की जाए कि उन्हें पैसा कौन देगा. सभी राज्यों में एनएसडी खोलना बहुत खर्चीला है, इसलिए स्थापित संस्थानों का स्तर सुधरना होगा. बाद में इन्हीं को एनएसडी का रिकॉगनाइजेशन और ग्रांट्स देकर चलाना चाहिए.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

abhishek (abhishek.ahhiyyan@gmail.com) patna

 
 अनीश जी ने जो इंटरव्यू लिया है, उसे पढ़कर अच्छा लगा. सारे रंगकर्मी को एक होकर अव्यवस्था से लड़ना होगा. 
   
 

Sehar (naisehar@gmail.com) Delhi

 
 इतने अच्छे इंटरव्यू के लिए अनीश और प्रसन्ना दोनों बधाई के पात्र हैं. पर मुश्किल यह है कि जिन्हें इसे देखना और सीखना चाहिए वो अभी भी किसी प्रोजेक्ट या HRD, Culture Ministry या NSD से पैसा जुगाड़ने में लगे होंगे. NSD पास आउट होते ही उनका एक ही मकसद पैसा कमाना रह जाता है 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad UP

 
 प्रसन्ना जी, कमोबेश यही दशा हर जगह है, क्या थियेटर, क्या साहित्य, क्या कला, क्या....! सब जगह पांव पसारे हैं लोग. उनको खुदा अक्ल दे. 
   
 

lavarnya lucknow

 
 इंटरव्यू में प्रसन्ना ने जिस तरह से एनएसडी के केंद्रियकरण और नाट्यकर्म पर उसके आरोपित एकाधिकार को व्यक्त किया है वो निश्चित तौर पर अचंभित करने वाला है. साथ ही भारतीय ग्रामीण समाज की औरतों के रोटी सेंकने को एक कला के तौर पर देखने वाले प्रसन्ना को हम महिलाओं का सलाम. 
   
 

ajit kumar patna

 
 थियेटर पर जितनी भी सामग्री पढ़ने को मिलती है, उससे बिल्कुल अलग किस्म का लगा ये इंटरव्यू. प्रसन्ना ने जिन सवालों को उठाया है. उस पर हिंदी का नाट्य जगत बात करने से बचता रहा है. हिंदी का पूरा थियेटर अभी माफिया के कब्जे में चला गया है. इन्हीं लोगों ने छियेटर में गंभीर बातचीत को काफी मुश्किल सा बना दिया है. एनएसडी के बारे में प्रसन्ना ने जो कहा, वो बिल्कुल दुरुस्त है. इस संस्था की भूमिका पर नये सिरे से विचार होना चाहिए. थियेटर के तथाकथित मबानुभवों को प्रसन्ना की बातों पर ध्यान देना चाहिए अन्यथा धीरे-धीरे ये लोकप्रिय माध्यम अप्रासंगिक हो जाएगा.
काफी अच्छा इंटरव्यू.
 
   
 

madhuranjan (me_madhuranjan@yahoo.co.in) patna

 
 इंटरव्यु पुराना होते हुए भी प्रासंगिक है... अनीश बधाई के पात्र हैं. क्या इनसे संपर्क हो सकता है. 
   
 

Sudeep Tiwari Toranto, Canada

 
 One of the eminent personality of theatre Usha Ganguli was shareing that she had designed most of her plays for a hindi audience but 99% of the audience is Bengali whereas hardly 20% of the audience is Hindi speaking. So they have never had a language barrier. There is a little difference between theatre in Mumbai and Bengal. There they do not need to popularize any thing. they are not forced to compete with films or Tv serials. There is nothing such as a Saturday or aSunday . The shows keep happening all the time. 
   
 

Ravishankar Pandey Noida

 
 प्रसन्ना से यह सुंदर बातचीत है. जो मुद्दे अनीश जी ने उठाये हैं, उन पर हिंदी जगत बात ही नहीं करता. अचरज है कि हिंदी के महान कहे जाने वाले नामवर सिंह, राजेंद्र यादव की तो इस ओर नजर ही नहीं आती. नाट्य शास्त्र उनके साहित्य और सोच से ही बेदखल है. वैसे भी गाली-गलौच के अलावा उनके पास है ही क्या. काश कि हिंदी के ये महान (?) लोग प्रसन्ना की बात सुन रहे होते. 
   
 

Himanshu Sinha

 
 सलीम खान असल में खुद ही बकवास में विश्वास रखते हैं. इसलिए वे समानांतर सिनेमा को बकवास कह रहे हैं. उनकी फिल्मों में क्या है? सिवाय बकवास के. वे अपनी फिल्मों से न तो मनोरंजन दे पाए हैं और न ही जीवन का सच सामने आता है. वे अधूरी दुनिया की तस्वीर पेश कर के अपने को महान बताने की कोशिश कर रहे हैं. 
   

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