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सलीम खान से बातचीत

समानांतर सिनेमा बकवास है

 

पटकथा लेखक सलीम ख़ान मानते हैं कि समानांतर सिनेमा को केवल आलोचको ने जिंदा रखा. हालांकि वे इस तरह की विशेषण पर भी आपत्ति दर्ज करते हैं. उनकी राय है कि फिल्म या तो अच्छी होती है या बुरी. यहां पेश है सलीम ख़ान से रविवार की बातचीत के अंश.

आज़ादी के बाद से अब तक के हिंदी फिल्मों के सफर को किस तरह देखते हैं और अपने सफर के साथ इसके रिश्ते को आप किस तरह देखते-परखते हैं ?

सलीम खान

इन दिनों सिर्फ जितना मन करता है लिखता हूं, पढ़ता हूं, घूमता फिरता हूं. ये ही मेरे लिए काफी है.

 

आज़ादी के समय की बहुत-सी यादें मेरे दिमाग में हैं. गिरीश साहब की शहीद है, अशोक कुमार की समाधि है. सब बेहतरीन फिल्में हैं, बहुत ही कमाल की फिल्में थीं उस जमाने में. हमने दो दो तीन तीन बार ये फिल्में देखी थीं. उस फिल्म का ये गाना भी बहुत कमाल का है – गोरे गोरे ओ बांके छोरे, समाधि का ये गाना बहुत मशहूर था.

शहीद का गाना- वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो, वो भी बहुत मशहूर गाना था रफी साहब का बहुत सूपर डूपर हिट गाना था. और इसी का एक वर्सन खान मस्ताना ने भी गाया था, तो ये यादें है.

उस वक्त ये ख्याल नहीं था कि मैं फिल्मों से जुडुंगा, या फिल्मों में आऊंगा. हम लोग इंदौर के हैं तो इंदौर में शनिवार या रविवार को अंग्रेजी पिक्चर आती थी और महू में क्योंकि वहां काफी मिलिट्री मौजूद थी महू में और ब्रिटिश सेना भी थी, एलाइड फोर्सेस.

तो हम लोग महू जाकर देखते थे पिक्चर, इंदौर में देखते थे. उस समय फिल्म से यही ताल्लुक था कि हम फिल्में बहुत देखते थे अंग्रेजी, हिंदी.

शायद कुदरत हमें ट्रेंड कर रही थी कि फिल्में देखो ये काम आएंगी और आज भी वो फिल्में काम आती हैं, जब हम फिल्म की स्टोरी लिखने बैठते हैं. मैंने हमेशा ये कहा है अपने आर्टिकल्स में कि मेरे उपर कोई फाउंटेन नहीं है. मैं फिल्में बहुत देखता था, मेरी मेमोरी बहुत अच्छी है मुझे याद रहती थी फिल्में, सीन याद रहते थे, कैरेक्टर याद रहते थे, डायलॉग याद रहते थे, और मैं संवेदनशील आदमी हूं. इन सारी चीजों का मैं इस्तेमाल करता था सही जगह तो मुझे औरों के मुकाबले फायदा ज्यादा था.

हिंदी तो मेरी मातृभाषा है मेरी जुबान है और अंग्रेजी भी पढ़ता लिखता था. तो अंग्रेजी में भी बहुत किताबें पढ़ी हैं, शायद यह सच हो कि मैं भारतीय फिल्म इंड़स्ट्री में सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा आदमी होऊंगा. तो ये सब करता था मैं उस वक्त. ये जो चीजें हैं, जो फिल्म मैंने देखी है, किताबें पढ़ी हैं, उस सब को मैंने लिखने में इस्तेमाल किया और वे ही काम आईं. ऐसा कभी मैंने दावा नहीं किया कि मैं बहुत ही कोई टैलेंटेड या कोई पैदायशी लेखक हूं.

इसके अलावा भी तो आपके लेखन के कुछ स्रोत रहे होंगे ?

जहां तक प्रेरणा का सवाल है मैं लाया गया था यहां एक्टर बनने के लिए. इंदौर के अमरनाथ थे, जो कि खुद फिल्म निर्देशक थे जिन्होंने बड़ी मशहूर फिल्में बनाई हैं. जैसे बड़ा भाई, लैला मजनूं और काफी अच्छी- अच्छी फिल्में बनाई हैं उन्होंने.

उन्होंने मुझे ताराचंद बड़जात्या के बेटे कमल बाबू की शादी में देखा था. उन्होंने कहा कि तुम बंबई आ जाओ. मुझे ना तो स्टेज का अनुभव था, ना कभी काम किया था फिल्मों में तो मैंने कहा कि चलो कोशिश करके देखते हैं, तो मैं अपनी एमए की पढ़ाई छोड़ कर बंबई चला आया.

यहां उन्होंने मुझे एक छोटे भाई के रोल में लिया. 1958 से 1965 तक मैंने कोई 25 फिल्में की हैं, सब छोटे मोटे रोल, तीसरी मंजिल, दीवाना, प्रोफेसर. और भी बी ग्रेड, सी ग्रेड फिल्में भी कीं. मगर मुझे उसमें कोई संतोष नहीं मिल रहा था.

हर एक आदमी की ख्वाहिश होती है कि वो अपने काम में श्रेष्ठतम हो. मुझे लगता नहीं था कि इस काम में मुझमें इतनी काबिलियत है कि मैं इस काम मैं श्रेष्ठतम हो सकूं, मैं सबसे टॉप का अभिनेता बन सकूं. तो उससे मैं निराश हो गया था. तो मैं सोचता था कि मैं क्या करूं.

मेरे साथ पढ़ाई का बैकग्राउंड था और फिल्में भी देखता था, तो मैंने सोचा कि मुझे लेखक बन जाना चाहिए. मैं फिल्में देखता था तो मुझे लगता था कि उसमें ऐसा हो सकता था, वैसा हो सकता था. तो हर में बेहतरी ढूंढता था.

अजीत साहब ने कहा कि कहना बहुत आसान है भई, कुछ लिख के तो बताओ, फिर एक स्क्रिप्ट लिखा जो उनको बहुत पसंद आई. फिर वो दादामुनि, अशोक कुमार साहब को सुनाई तो उनको भी बहुत पसंद आई, फिर उन्होने खरीद भी ली. वो उनकी बतौर निर्माता पहली फिल्म थी. फिर उन्होने विक्टोरिया 203 बनाई.

तो जब मैं लेखन के क्षेत्र में आया तो जैसे एक अभिनेता के तौर पर मैंने आत्म अवलोकन किया था मैंने कि मैं एक बहुत बड़ा अभिनेता नहीं बन सकता. तो लेखन में आकर मुझे ऐसा लगा कि अगर में 2 % जानता हूं तो अगले आदमी को 1 % से ज्यादा नहीं आता, ये मुझमें विश्वास था. और यह विश्वास आज भी कायम है.

हिंदी फिल्मों के संदर्भ में मैंने जो किया, बहुत ही मेहनत और सलीके से किया. लेकिन जब सफलता मिली, जैसे जंजीर में सफलता मिली तो उसके पहले तो हम दो तीन हिट बहुत बड़ी लिख चुके थे, मगर किसी ने पूछा नहीं था कि किसने लिखी है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

abhishek (abhishek.ahhiyyan@gmail.com) patna

 
 अनीश जी ने जो इंटरव्यू लिया है, उसे पढ़कर अच्छा लगा. सारे रंगकर्मी को एक होकर अव्यवस्था से लड़ना होगा. 
   
 

Sehar (naisehar@gmail.com) Delhi

 
 इतने अच्छे इंटरव्यू के लिए अनीश और प्रसन्ना दोनों बधाई के पात्र हैं. पर मुश्किल यह है कि जिन्हें इसे देखना और सीखना चाहिए वो अभी भी किसी प्रोजेक्ट या HRD, Culture Ministry या NSD से पैसा जुगाड़ने में लगे होंगे. NSD पास आउट होते ही उनका एक ही मकसद पैसा कमाना रह जाता है 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad UP

 
 प्रसन्ना जी, कमोबेश यही दशा हर जगह है, क्या थियेटर, क्या साहित्य, क्या कला, क्या....! सब जगह पांव पसारे हैं लोग. उनको खुदा अक्ल दे. 
   
 

lavarnya lucknow

 
 इंटरव्यू में प्रसन्ना ने जिस तरह से एनएसडी के केंद्रियकरण और नाट्यकर्म पर उसके आरोपित एकाधिकार को व्यक्त किया है वो निश्चित तौर पर अचंभित करने वाला है. साथ ही भारतीय ग्रामीण समाज की औरतों के रोटी सेंकने को एक कला के तौर पर देखने वाले प्रसन्ना को हम महिलाओं का सलाम. 
   
 

ajit kumar patna

 
 थियेटर पर जितनी भी सामग्री पढ़ने को मिलती है, उससे बिल्कुल अलग किस्म का लगा ये इंटरव्यू. प्रसन्ना ने जिन सवालों को उठाया है. उस पर हिंदी का नाट्य जगत बात करने से बचता रहा है. हिंदी का पूरा थियेटर अभी माफिया के कब्जे में चला गया है. इन्हीं लोगों ने छियेटर में गंभीर बातचीत को काफी मुश्किल सा बना दिया है. एनएसडी के बारे में प्रसन्ना ने जो कहा, वो बिल्कुल दुरुस्त है. इस संस्था की भूमिका पर नये सिरे से विचार होना चाहिए. थियेटर के तथाकथित मबानुभवों को प्रसन्ना की बातों पर ध्यान देना चाहिए अन्यथा धीरे-धीरे ये लोकप्रिय माध्यम अप्रासंगिक हो जाएगा.
काफी अच्छा इंटरव्यू.
 
   
 

madhuranjan (me_madhuranjan@yahoo.co.in) patna

 
 इंटरव्यु पुराना होते हुए भी प्रासंगिक है... अनीश बधाई के पात्र हैं. क्या इनसे संपर्क हो सकता है. 
   
 

Sudeep Tiwari Toranto, Canada

 
 One of the eminent personality of theatre Usha Ganguli was shareing that she had designed most of her plays for a hindi audience but 99% of the audience is Bengali whereas hardly 20% of the audience is Hindi speaking. So they have never had a language barrier. There is a little difference between theatre in Mumbai and Bengal. There they do not need to popularize any thing. they are not forced to compete with films or Tv serials. There is nothing such as a Saturday or aSunday . The shows keep happening all the time. 
   
 

Ravishankar Pandey Noida

 
 प्रसन्ना से यह सुंदर बातचीत है. जो मुद्दे अनीश जी ने उठाये हैं, उन पर हिंदी जगत बात ही नहीं करता. अचरज है कि हिंदी के महान कहे जाने वाले नामवर सिंह, राजेंद्र यादव की तो इस ओर नजर ही नहीं आती. नाट्य शास्त्र उनके साहित्य और सोच से ही बेदखल है. वैसे भी गाली-गलौच के अलावा उनके पास है ही क्या. काश कि हिंदी के ये महान (?) लोग प्रसन्ना की बात सुन रहे होते. 
   
 

Himanshu Sinha

 
 सलीम खान असल में खुद ही बकवास में विश्वास रखते हैं. इसलिए वे समानांतर सिनेमा को बकवास कह रहे हैं. उनकी फिल्मों में क्या है? सिवाय बकवास के. वे अपनी फिल्मों से न तो मनोरंजन दे पाए हैं और न ही जीवन का सच सामने आता है. वे अधूरी दुनिया की तस्वीर पेश कर के अपने को महान बताने की कोशिश कर रहे हैं. 
   
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