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नक्सली नेता कानू सान्याल से बातचीत

यह नक्सलवाद नहीं, आतंकवाद है

 

नक्सल आंदोलन के जनक कहे जाने वाले कानू सान्याल इन दिनों बीमार रहते हैं. कई परेशानियां हैं. कान से सुनाई कम पड़ता है और आंखों की रोशनी भी कम हो रही है. सबसे बड़ी बीमारी तो बुढ़ापा है.

लेकिन नहीं.

कानू सान्याल

" मुझे अभी तक खेद है इस बात का कि रामनारायण उपाध्याय यूपी का सेक्रेटरी था. उन्होंने सही रूप से बोला था कि माने शुरु से अंत तक आपका लाईन गलत है, मार्क्सवाद विरोधी है. I supported you लेकिन बोलने का हिम्मत नहीं आया."

24 मई 1967 को जिस आंदोलन की आग उन्होंने जलाई थी, वो आग आज भी उनके भीतर धधकती रहती है. यही कारण है कि इस उम्र में भी वे गांव-गांव जाते हैं, बैठक करते हैं, सभाएं लेते हैं. दार्जीलिंग के नक्सलबाड़ी से लगे हुए एक छोटे से गांव हाथीघिसा में अपने एक कमरे वाले मिट्टी के घर में रहने वाले कानू सान्याल की नज़र बस्तर से लेकर काठमांडू तक बनी रहती है. हर खबर से बाखबर !

उनकी राय है कि भारत में जो सशस्त्र आंदोलन चल रहा है, उसमें जनता को गोलबंद करने की जरुरत है. अव्वल तो वे इसे सशस्त्र आंदोलन ही नहीं मानते. छत्तीसगढ़, झारखंड या आंध्र प्रदेश में सशस्त्र आंदोलन के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वे इसे “आतंकवाद” की संज्ञा देते हैं. वे नक्सलबाड़ी आंदोलन को भी माओवाद से जोड़े जाने के खिलाफ हैं. वे साफ कहते हैं- There is no existence of Maoism.

पिछले दिनों आलोक प्रकाश पुतुल ने उनसे लंबी बातचीत की. यहां हम बिना किसी संपादन के अविकल रुप से वह बातचीत प्रस्तुत कर रहे हैं.

 

नक्सल आंदोलन शुरु हुए 40 साल हो गए. आप लोगों ने नक्सल आंदोलन की शुरुआत की थी, उसके बाद माओइस्ट मूवमेंट पूरे देश भर में फैला. इसकी उपलब्धि क्या है ?

पहले तो बात ये है कि माओवादी बोल के हम लोग नहीं सोचते हैं. हम लोग बोलते हैं Marxism, Leninism, thoughts of Mao मार्क्सवादी, लेनिनवादी विचार और माओ का चिंतन करना, विचार करना. खुद माओ ज़ेडांग अपने आप को माओवादी नहीं मानते थे. वो खुद ही Marxism, Leninism को मानते थे. इसलिए नक्सलबाड़ी में जो संग्राम शुरु हुआ था वो संग्राम Marxism, Leninism के आधार पर था. इसलिए इसका माओवाद से कोई लेना देना नहीं है.

मैं ये कह सकता हूं कि There is no existence of Maoism. Because Mao did not agree with that. माओ खुद कहते थे कि मुझे अगर सिर्फ टीचर कहा जाए then I would be glad. तो जो उनको माओवादी विचार कहते हैं मैं कहता हूं कि it’s a contribution of Marxism and Leninism. ये मेरा कहना है. तो ये पहली बात का जवाब मिला.

1967 में एक उपलब्धि तो है कि 1967 में नक्सलबाड़ी में जो संघर्ष शुरु हुआ था. ये संघर्ष लंबे दिन तक प्रक्रिया के अंदर में था. उसका पहले भी भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सीपीआई के नेतृत्व में, जब मैं सीपीआई में था 1950 में; तो उस समय तेलंगाना का संघर्ष शुरु हुआ था. तेलंगाना का संघर्ष लंबे दिन तक चला और 1950-51 में जा के ये struggle के प्रति सीपीआई नेताओं ने betray किया, economic betrayal किया. Using the name of comrade Stalin. क्योंकि यहां से कुछ नेता लोग गए थे स्टालिन से मुलाकात करने के लिए. जो सलाह उन्होंने दी थी, वो सलाह हमारे कामरेडों के सामने सही रूप से पेश नहीं किया गया. उन लोगों ने सिर्फ inference draw किया कि स्टालिन बोला है कि ये struggle withdraw करना ही ठीक है. But subsequent days में जब वो सब कागजात हम लोगों को मिलने लगा तब we came to understand that our understanding that the CPI leadership betrayed the struggle ये सही साबित हुआ.

स्टालिन कहीं भी withdraw का बात नहीं बोला था. बोला था, you act according to the situation. हम जिस स्थिति में हैं उस स्थिति को आप और कितना दूर तक आगे बढ़ा सकते हैं. ये आपको तय करना है, काहे कि मैं इतना दूरी से नहीं बता सकता हूं.

Naturally 1967 में जो struggle शुरु हुआ था ये struggle भी वही था, 1950s के तेलंगाना के failure का जो शिक्षा उसके पहले भी, उसके बाद तेवागा संग्राम के बाद. उसके समय भी बिहार में जो किसान आंदोलन हुई थी, उन सभी से शिक्षा लेकर हम लोगों ने इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि peasant movement को अगर चलाना है तो उसके प्रति सरकार क्या रुख अपनाएंगे, उसी के उपर निर्भर होता है. किसान या कम्युनिस्ट पार्टी को कौन सा रास्ता लेना है.


एक बात तो तय है कि जनता ही केवल देश का शक्ति है. वो जनता अगर आपको साथ ना दे तो आप आगे नहीं बढ़ सकते हैं. और विशेषकर के मजदूर और उनका सबसे दृढ़ सहयोगी जो है किसान, उनकी संख्या भी सबसे ज्यादा है. वो अगर उनका साथ ना दे तो ये संग्राम टिक नहीं पाएगा. इसी के आधार पर नक्सलबाड़ी में हम लोग लंबे दिन तक संघर्ष चलाए. उसको विस्तार से मुझे कहना नहीं है.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

M.Mallick(mallickbilaspur@yahoo.co.in)

 
 alok jee (bhia) is khabar ke lie apko bahut bahut dh dhanyavad. 
   
 

shobhit vajpeyee(skbajpai_bsp@yahoo.co.in)

 
 aisi batchite bahut kuch espasat kar deti hain, ALOKji aapako bahut bahut dhanyavad.bharat ke loktantra ka vikalp loktanra hi hai,bhale usame yuganarup kare. 
   
 

Vikas Singh(vikas_singh@yahoo.co.in)

 
 जस के तस बातचीत छापने का यह एक नया प्रयोग लगा.इससे पाठक की कल्पना शक्ति भी साथ-साथ काम करती है कि कानू सान्याल ने ये वाक्य बोलते हुए कैसा भाव बनाया होगा. 
   
 

piyush daiya(todaiya@gmail.com)

 
 kanu ji ke vaakyon mein pardadarii hain, pardadaarii nahi. is baatcheet se aandolan ke maanviya aadarsh par prakash padta hain vahi filhaal ke vimaanviykrit satta-sansaar ki kroor virooptaon ka bhi. darasal is baatcheet se kayii kism ke vimarsh foote hain--
Alok ji ka yeh kaam mahttvpoorn hain.agar is terah ke saakshaatkaaron ki ek shrankhla ban jaaye to or bhi achcha. baatcheet ke is aayaam ne apna alag asar choda jismin ki yeh baatcheet jas-ki-tas hain,gadhya ka yeh ubadkhaabadpan is poore aandolan ke charitr v vartmaan ka ek vilakshn roopak bhi ban jaata hain.
 
   
 

अंकुर (ankur.abhivyakti@gmail.com)

 
 कानू सान्याल बिलकुल सही कह रहे हैं. छत्तीसगढ़, झारखंड और आंध्र के तथकथित माओवादियों को समझना चाहिए कि जनमानस के मन में भय बैठा कर व्यवस्था को बदलना असंभव है. ये सच्चे रूप में नक्सलवाद नहीं आतंकवाद है. 
   
 

gautam ghosh

 
 Naxalism is pure and simple TERRORISM, which disguises itself with terms like "class struggle" and "social justice". Naxalite's current goal is to destablize India and Sub-Continent by a well coordinated strategy with the help of international revolutionaries and covert support from Pakistan and China . 
   
 

सचिन श्रीवास्तव

 
 कानू सान्याल बहुत कंफ्यूज हैं. वे जिस तरह की बात कह रहे हैं, उस तरह से कोई क्रांति नहीं आ सकती. जब भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बची हुई है तो फिर नक्सली चुनाव के सहारे सामने क्यों नहीं आते. 
   
 

Avinash

 
 Why Mr himanshu talking about mr Prakash Karat ? lotts of people gloryfing these maoist. When Prakash Singh (Former Director-General of BSF) said that " many of them (maoist) are highly motivated.They are convinced that they are fighting for a cause. They are far better than the criminals who have managed to infiltrate assemblies and Parliament and even become ministers" there is something debatable. 
   
 

हिमांशु सिन्हा(patrakarhimanshu@gmail.com)

 
 have you listen Mr Prakash Karat on Naxalism ? He said that the naxalite movement disintegrated into myriad groups and factions in the early seventies within five years of its birth. Along with this organizational disintegration, and preceding it, was the ideological disarray and confusion. In this article, the focus is on the ideological deadend these groups have reached, which is the basis for the continuing derailment of the left-adventurist stream. After continuously grappling with the ideologically bankrupt positions taken at the outset, the naxalite groups are nowhere near resolving the problems, which began when they abandoned their Marxist-Leninist moorings. Every theoretical and political issue, which confronts them, leads of further ideological confusion and consequent organisational splintering. Despite their decade-long struggle to “reorient and rectify” their positions none of these groups have come anywhere near correcting their dogmatic errors. On the other hand, these groups have further degenerated into anti-left anarchic groups subject to the worst forms of petty-bourgeois deviations.  
   
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