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सुभाष घीसिंग रा का आदमी है- बिमल गुरुंग

बातचीत

सुभाष घीसिंग रॉ के एजेंट हैं- बिमल गुरुंग

 

बंगाल से अलग गोरखालैंड राज्य बनाए जाने का आंदोलन अपने चरम पर है. मार्च 2010 तक गोरखालैंड नहीं बनने पर खुद को गोली मार लेने का दावा करने वाले बिमल गुरुंग के नेतृत्व में जितनी आक्रमकता के साथ आंदोलन चल रहा है, उससे पहाड़ गरमाए हुए हैं. पहाड़ के देवता कहलाने वाले सुभाष घीसिंग को भी इन आंदोलनकारियों के कारण दार्जिलिंग छोड़ना पड़ा और अब उनके पैतृक घर पर बिमल गुरुंग की पार्टी का कब्जा है. हालांकि बिमल गुरुंग अपने आंदोलन को गांधीवादी आंदोलन कहते हैं.

यहां पेश है आलोक प्रकाश पुतुल के साथ की गई बातचीत के अंश

 

• नया गोरखालैंड राज्य बनाने का आपका आधार है, क्या-क्या मुद्दे हैं ?

गोरखालैंड अलग राज्य आज की मांग नहीं है. 101 साल पुरानी मांग है ये. भारत की आज़ादी की मांग से भी पुरानी. कुछ राजनीतिक दल इसे राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं. इसे वोट मांगने के लिए मुद्दा बनाते हैं. मेरे लिए गोरखालैंड की मांग राजनीतिक मांग नहीं है. हमारे लिए गोरखालैंड हमारी अस्मिता से जुड़ा हुआ मुद्दा है.

सुभाष घीसिंग ने गोरखालैंड आंदोलन के साथ धोखा किया है

 

हम भारत देश में रहते हैं, हमारे गोरखा सैनिक इस देश के लिए शहीद होते हैं लेकिन हम आज भी उपेक्षित हैं. आज तक हम लोगों को कुछ लोग विदेशी बोलते हैं. हमें हमारा हक नहीं दिया जा रहा है.

• आपसे पहले भी आपके जो पुराने साथी रहे हैं सुभाष घिसिंग, वो भी इसी तरह की बातें किया करते थे. वो भी कहते थे कि गोरखालैंड जरूरी है.

1986 में जब हम लोगों ने अलग गोरखालैंड का आंदोलन छेड़ा था, उस समय में मैं एक सिपाही था. लेकिन सुभाष घीसिंग ने आंदोलन को जब बेच दिया और गोरखालैंड काउंसिल की बात मान ली तो हमने उसका साथ छोड़ दिया, सुभाष घीसिंग को खारिज कर दिया. 2005 में जब छठवीं अनुसूची के मुद्दे पर कोलकाता में वार्ता शुरु हुई तो 17 प्रतिनिधि वहां थे लेकिन उनमें से 16 लोगों को कमरे के बाहर बैठा दिया गया और अकेले सुभाष घीसिंग वहां बात करते रहे. क्या बातें हुईं, क्या समझौता हुआ, ये केवल वही जानें.

• आपको ऐसा लगता है कि सुभाष घिसिंग ने केंद्र सरकार या पश्चिम बंगाल सरकार के साथ दबाव या प्रलोभन में कोई समझौता किया ?

समझौता तो किया ही. सुभाष घिसिंग तो रॉ का आदमी है. ये सरकार का आदमी है. वो दृश्य हमलोगों ने देखा है. हमने देखा कि पहाड़ के आदमी के साथ छल कपट हो गया. हमें लगा कि जनता को असली चेहरा बताना पड़ेगा. तो इसी हिसाब से हम लोगों ने जनता को बता दिया कि ये सुभाष घिसिंग ठीक काम नहीं कर रहा है. जनता ने वोट देकर उसको वहां पर चेयर में रखा लेकिन वो चेयर के अधिकारी के मुताबिक वहां पर काम नहीं कर रहा है. तो इसी हिसाब से हम लोगों ने वहां विरोध कर दिया कि हम लोगों को छठवीं अनुसूची नहीं चाहिए. हमें गोरखालैंड चाहिए.

• 1986 में सुभाष घिसिंग ने भी आंदोलन किया था तो उन्होंने भी कहा था कि हम गोरखालैंड ही चाहते हैं कुछ और नहीं चाहते हैं. बिमल गुरुंग ये कहते हैं कि दो साल में अगर गोरखालैंड नहीं बना तो मैं अपने को गोली मार दूंगा या इसी तरह की दूसरी बातें.

देखिए एक बात है कि हमने ये निर्णय लिया है और उस निर्णय के अनुसार हम काम कर रहे हैं. गोरखालैंड अलग राज्य के लिए ये एक अंतिम लड़ाई है और उस अंतिम लड़ाई को हम लोगों को जीतना पड़ेगा. जीतना पड़ेगा, इसी हिसाब से हम लोग एक रणनीति बना कर आगे आ रहे हैं. तो हम लोग जो कर सकते हैं, करेंगे ही. झारखंड बन गया, उत्तराखंड बन गया, इतना विभिन्न राज्य बन गया. तो हमारा गोरखालैंड क्यों नहीं बन रहा है ? हमारे 1200 लोग इस आंदोलन में शहीद हो गए. इन लोगों को बंगाल सरकार ने मारा, तो हमें न्याय चाहिए. इस शोषण का, अत्याचार का बदला हम जरुर लेंगे. हम अपने बच्चों को बोल कर आए हैं कि हम अलग गोरखालैंड ले कर रहेंगे. हम लोग राजनीति नहीं कर रहे हैं. हमें जेल की राजनीति, मंत्री की राजनीति नहीं करनी. हमें तो हमारा गोरखालैंड अलग राज्य चाहिए. अपने शरीर का एक-एक बूंद रक्त बहा कर भी हम लोगों को गोरखालैंड चाहिए.

• झारखंड का जो आंदोलन रहा उसमें लोगों ने हथियार उठा कर लड़ाईयां लड़ीं. इससे पहले गोरखालैंड का भी जो आंदोलन रहा है, 1986 का उसमें भी 1200 लोगों ने अपनी शहादत दी और एक हिंसा का रास्ता इख्तियार किया. आप कहते हैं कि आप गांधीवादी तरीके से लड़ेंगे ?

हां. हम गांधीवादी तरीके से ही लड़ेगे. कितने मारेगी सरकार हमें ? कितनी गोली चलाएगी ? आदमी लोगों को मारकर सरकार को इसका क्या लाभ मिलेगा ? हमारे देश में महात्मा गांधी जन्में, जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं. तो मैं तो उनकी ही नीति जानता हूं. मैं उनकी कद्र करता हूं और उनके ही रास्ते पर चल कर हम अलग गोरखालैंड चाहते हैं.

जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री रहते हैं, वहां दिल्ली में जा कर तो मैं धरन-जुलूस निकाल सकता हूं लेकिन अपने घर में दार्जिलिंग में हमें बंगाल सरकार धरना नहीं देने देती, जुलूस नहीं निकालने देती. ये कौन सा गणतंत्र है ?


ये दंगा फसाद करके, टेरर करके, आदमी का सिर उड़ा के ये नहीं होगा. अभी देखिए इराक का क्या हालात हो गया, अमरीका ने वहां पर बम की बारिश किया. इराक ने भी वहां पर अमरीका के आदमी लोगों को कितना मारा. लेकिन बात क्या हुआ ? आखिर में वार्ता में आना ही पड़ता है.


हम लोग नंदीग्राम नहीं बनाना चाहते. हम लोग गणतांत्रिक हिसाब से आंदोलन करना चाहते हैं. अब ये देश गणतांत्रिक देश है. इस गणतांत्रिक देश में गणतंत्र का हनन हो रहा है. इसलिए हम लोग बोल रहे हैं- ये अन्याय हो रहा है. बंगाल सरकार अभी अन्याय कर रही है. हम लोगों को मीटिंग करने नहीं दे रही है. हम लोगों को नारा, जुलूस करने नहीं दे रही है. ये किस हिसाब की नीति है ?

जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री रहते हैं, वहां दिल्ली में जा कर तो मैं धरन-जुलूस निकाल सकता हूं लेकिन अपने घर में दार्जिलिंग में हमें बंगाल सरकार धरना नहीं देने देती, जुलूस नहीं निकालने देती. ये कौन सा गणतंत्र है ? मैं मार्क्सवाद, लेनिनवाद का विरोध नहीं कर रहा लेकिन उनके नाम पर जो लोग सरकार चला रहे हैं, अशोक भट्टाचार्य जैसा लोग, वे गलत नीति अख्तियार कर रहे हैं.

• आम जनता में जो एक धारणा फैल रही है, खासकर के जो हिंदी प्रदेश है उनके अंदर ये धारणा फैल रही है कि अगर गोरखालैंड बना तो इस इलाके में हिंदी भाषियों का रहना मुश्किल हो जाएगा.

हिंदुस्तान मेरी मां है और हमारा जो भी गोरखालैंड का मानचित्र है, उस मानचित्र के भीतर रहने वाले जितने भी आदिवासी, बंगाली, राजवंशी, बिहारी, मधेशिया और मुस्लिम जितने भी समुदाय हैं हम एकसूत्र होकर लड़ेंगे. एकसूत्र होकर हम लोग उसमें एक दायित्व निभाएंगे. हमारे लिए सभी हमारे हैं और हम एक भी आदमी को बाहर नहीं जाने देंगे.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

thakursaab(thakursaab_1@yahoo.com)

 
 bimal gurang ko meri badhai,gandhi baba ne azadi dila de to unke raste se gorkhaland jaroor banega.bharat desh ka ek deshbhakt nageena hoga gorkhaland.
communiston se bhagwan bachai.neta ji subash bose ko tozo ka kutta kaha tha,bharat chodo andolan ka virodh kiya.aur aj bhi desh ke tarakki main roda atkate hai.
 
   
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