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सच्चिदानंद सिन्हा से रेयाज-उल-हक की बातचीत

संवाद

 

राजनीति में अब नैतिकता की कोई जगह नहीं

 

सच्चिदानंद सिन्हा से रेयाज़-उल-हक़ की बातचीत

 



मुजफ्फरपुर के मुसहरी प्रखंड में एक छोटे-से गांव मणिका-जो उनका गांव नहीं है, लेकिन 29 वर्षों से रहने के बाद अपने गांव जैसा हो गया है; में रहते हुए सारी दुनिया में चल रही गतिविधियों पर उनकी पैनी नजर रहती है. इस सितंबर में वे अपने जीवन के 80 वर्ष पूरे करेंगे-एक कार्यकर्ता और एक अध्येता-विचारक के रूप में अपने जीवन के 80 वर्ष. हाल में भारतीय समाज में घट रही घटनाओं और सतह के नीचे आ रहे बदलावों पर समाजवादी लेखक-विचारक सच्चिदानंद सिन्हा से एक लंबी बात हुई. प्रस्तुत हैं इसके कुछ प्रमुख अंश.

इस पूरी व्यवस्था में ही फ्रॉड (धोखा) निहित है

 

शुरुआत संसद में कथित तौर पर वोट के लिए दी गयी अवैध रकम को दिखाये जाने से करते हैं. एक संसदीय लोकतंत्र में ऐसी घटना का होना और इस पर समाज की प्रतिक्रिया, या कह सकते हैं कि प्रतिक्रिया की अनुपस्थिति-क्या संकेत देते हैं ?

 

जिस पतन की आजकल इतनी चर्चा होने लगी है, यह पतन कोई नयी चीज नहीं है. दरअसल हमने पूंजीवादी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है, बिना यह देखे कि पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर कितना पतन है, कितनी बुराई है. इसी वजह से इस व्यवस्था की सारी बुराइयां हमारे समाज में आ गयी हैं और सामने दिखती हैं. पूंजीवाद ने अपने विकास के क्रम में जितनी धोखेबाजियां की हैं, दुनिया में कहीं भी-किसी भी व्यवस्था ने इतनी धोखेबाजियां नहीं की हैं. हमारे देश में भी हर स्तर पर जो पतन दिख रहा है, वह भी यही है.

हमारे समाज ही नहीं, दुनिया भर की पूंजीवादी व्यवस्थाओं के भीतर जितनी बुराइयां और पतन दिखता है, उसकी वजह पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में छिपी हुई है. पूंजीवाद पहले की तमाम व्यवस्थाओं से अलग है. इसमें उत्पादन पूर्व की सभी व्यवस्थाओं से व्यापक पैमाने पर होता है, लेकिन इस उत्पादन की सामाजिक उपयोगिता नहीं है. इसमें सिर्फ मुनाफे के लिए उत्पादन होता है. इस क्रम में ऐसी कई वस्तुओं का भी बडे पैमाने पर उत्पादन होता है, जो सामाजिक उपयोग की दृष्टि से किसी महत्व की नहीं हैं, लेकिन उनसे मुनाफा होता है, इसलिए उनका उत्पादन होता है.

 

उदाहरण के लिए सिगरेट को ले सकते हैं. इसका जीवन जीने के लिए क्या उपयोग है ? उल्टे यह तो नुकसान ही पहुंचाता है. लेकिन इसमें मुनाफा है, इसलिए इसका उत्पादन भी होता है. और चूंकि मुनाफे की कोई हद नहीं है, इसलिए उत्पादन की भी कोई हद नहीं है. इस प्रकार हम देखते हैं कि इस पूरी व्यवस्था में ही फ्रॉड (धोखा) निहित है. यह कोई नयी चीज नहीं है.

पहले भी घूस लेकर सरकारें बचायी गयी हैं. झारखंड मुक्ति मोरचा रिश्वत कांड तो सभी जानते हैं. कांग्रेस ने पहले भी ऐसा किया है. इसे लगभग मान लिया गया है कि सरकारें गिराने-बचाने में पैसे का लेन-देन होता है. सभी ऐसा करते हैं. शिबू सोरेन की चर्चा बहुत हो गयी, क्योंकि वे आदिवासी समाज से आते हैं, इसलिए वे इसे छिपा नहीं पाये. दूसरे वर्गों से आनेवाले लोगों में इतनी होशियारी है कि वे ऐसी बातें आसानी से छिपा लेते हैं.


पूंजीवादी व्यवस्था में चूंकि हर बात के पीछे संपत्तिशाली और सत्तासीन वर्ग के मुनाफे की लालसा रहती है, समाज का और जनता का कोई हित उनके सामने नहीं रहता. आप हाल के अमरनाथ विवाद को देख सकते हैं. यहां कोई विवाद नहीं था, लेकिन इतने छोटे-से मामले को इतना बडा कर दिया गया कि अब इससे पूरा कश्मीर और देश प्रभावित हो रहा है. यह केवल पावर (सत्ता) हाथ में रखने के लिए किया गया. और देख कर हैरत होती है कि जो भाजपा राष्ट्रभक्ति की इतनी बातें करती है, वही इस मुद्दे को इतना बढा रही है और कश्मीर के तीन भागों में विभाजन की बातें होने लगी हैं-जो कि कभी पाकिस्तान की मांग हुआ करती थी.

जब पूरी अर्थव्यवस्था इस आधार पर बनी हुई है कि बहुत सारे लोगों को लूट कर कुछ लोगों को मुनाफा दिया जाये, तो यह व्यवस्था हर तरह के कुकर्म करायेगी. दक्षिण अमेरिका में सीआइए ने हर तरह के कुकर्म किया. उसने राष्ट्राध्यक्षों की हत्याएं कीं. पनामा के राष्ट्रपति को पकड कर अमेरिकी ले जाया गया. तो इस व्यवस्था के तहत जो सारे काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहे हैं, वही हमारे देश में राष्ट्रीय स्तर पर भी हो रहे हैं. पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था झूठ, चोरी, लूट, बेइमानी पर टिकी हुई है, भारत में भी यही हो रहा है. इसलिए मुझे नहीं लगता कि हमारे देश में खासतौर से कोई गिरावट आयी है. इस व्यवस्था का आधार अमेरिका है और हम अधिक तेजी से अमेरिका जैसा बनना चाहते हैं. इसलिए अमेरिका जैसे बडे माफिया से भारत जैसा छोटा माफिया परमाणु करार करना चाहता है.

 

अब तक जो बडे रिश्वत कांड राजनीतिक गलियारों में चर्चा में रहे, उनमें अधिकतर लोग दलित-आदिवासी समूहों से आते हैं. बंगारू लक्ष्मण हों या मायावती या फिर शिबू सोरेन. संसद में जिन सांसदों ने नोट लहराये, वे भी पिछडे-दलित समुदायों से ही आते हैं. जैसा आप बता रहे हैं, पैसा तो सभी समूहों के पास आ रहा है, लेकिन सिर्फ वंचित समूहों से आनेवाले ही इसके शिकार अधिक बनते दिख रहे हैं. राजनीतिक हितों की पूर्ति के नाम पर क्या वे पूंजी के आसान शिकार बनाये जा रहे हैं ?

 

किसी दलित-आदिवासी समूह से आदमी आता है तो वह सामाजिक-आर्थिक तौर पर इतना वंचित रहता है कि उसे लुभा लेना आसान होता है. आप देखिए कि संसद में नोटवाली घटना में अगर कोई अपर कास्ट का सांसद होता तो वह ३० करोड लेता. जबकि दलितों-आदिवासियों को बहुत कम राशि भी स्वीकार होती है. इसलिए वे इस फंदे में आसानी से आ जाते हैं.
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Pankaj Tripathi

 
 सच्चिदानंद जी ने आज के समाज का बहुत ही सटीक विश्लेषण किया है. स्वार्थ, बेइमानी और मक्कारी और आज की राजनीति पर्यायवाची हो चुके हैं. ऐसी सुंदर बातचीत के लिए रविवार का आभार. 
   

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