नानावटी रिपोर्ट | सच की अनदेखी
विचार
नानावटी रिपोर्टः
सच की अनदेखी
राम पुनियानी
हाल
में जस्टिस नानावटी-मेहता आयोग ने अपनी रिपोर्ट गुजरात सरकार को सौंपी है. रिपोर्ट
में जो कुछ कहा गया है, उससे गुजरात के शासकों की बांछे खिल गई हैं. और क्यों नहीं?
आखिर गोधरा ट्रेन आगजनी और उसके बाद हुए मुसलमानों के कत्लेआम ने ही इन्हें सत्ता
तक पहुंचाया था.
6 सालों की लंबी जांच के बाद आयोग अपनी रिपोर्ट का केवल पहला भाग प्रस्तुत कर सका
है. शायद कानून इस बात की इजाजत देता हो कि कोई जांच आयोग अपनी रिपोर्ट हिस्सों में
दे सके परंतु नानावटी आयोग का ऐसा करने का औचित्य स्पष्ट नहीं है. वैसे, रिपोर्ट
में क्या होगा इसका अंदाजा आयोग की नियुक्ति के कुछ माह बाद ही लग गया था, जब पहले
नानावटी और उसके बाद शाह ने कहा था कि विहिप इत्यादि के खिलाफ कोई विशेष सुबूत नहीं
हैं.
इससे
यह साफ था कि आयोग ने अपना निष्कर्ष पहिले ही तय कर लिया था. गवाहों के बयान और
आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए सुबूतों के चुनिंदा हिस्सों का इस्तेमाल पहिले से तय
किए गए निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए किया गया.
आयोग का कहना है कि गोधरा की घटना स्थानीय मुसलमानों की पूर्व-नियोजित कारगुजारी थी
जिसे उन्होंने आईएसआई के सहयोग से अंजाम दिया था. रिपोर्ट कहती है कि स्थानीय
धार्मिक नेता हाजी उमरजी की अध्यक्षता में हुई मुसलमानों की बैठक में यह षड़यंत्र रचा
गया था. षड़यंत्रकारी केनों में भरकर 140 लीटर पेट्रोल लाए, उन्होंने साबरमती
एक्सप्रेस के एस-6 और एस-7 स्लीपर कोचों को जोड़ने वाले वेस्टिब्यूल को काटकर
पेट्रोल फेंका और आग लगा दी. आयोग इस निष्कर्ष पर इस तथ्य के बावजूद पहुंच गया कि
कोच को जलाए जाने का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है. इन बोगियों में दो सौ से अधिक यात्री
सवार थे परंतु उनमें से एक ने भी आयोग के समक्ष यह गवाही नहीं दी कि मुसलमानों की
किसी भीड़ ने वेस्टिब्यूल को काटकर, पेट्रोल फैलाकर बोगी में आग लगाई.
|
रेलवे एक्ट के अनुसार हर बड़ी
दुर्घटना के बाद उसकी जांच की जाना आवश्यक है. चूंकि घटना के समय
बीजेपी के तत्कालीन साथी नितीश कुमार रेलमंत्री थे इसलिए इस नियम के
विपरीत किसी जांच का आदेश नहीं दिया गया. |
गोधरा ट्रेन आगजनी के पीछे षड़यंत्र होने के निष्कर्ष तक पहुंचने में बहुत सी बाधाएं
हैं. ट्रेन से अयोध्या गए कारसेवक लौट रहे हैं, यह जानकारी सार्वजनिक नहीं थी.
राज्य सरकार के अधिकारी भी यह नहीं जानते थे. केवल विहिप और भाजपा के कार्यकर्ताओं
को मालूम था कि टे्रन से रामसेवक आ रहे हैं. ट्रेन पांच घंटे से अधिक देरी से चल रही
थी और इससे भी षड़यंत्र की बात बेमानी लगती है. अगर षड़यंत्रकारियों को यह पता ही नहीं
था कि ट्रेन में रामसेवक सवार हैं तो वे भला उसमें आग क्यों लगाते और ट्रेन के पांच
घंटे लेट आने से क्या उनका षड़यंत्र विफल नहीं हो जाता? अगर इस घटना के पीछे सचमुच
कोई षड़यंत्र था तो षड़यंत्रकारी कोई दूसरे ही लोग रहे होंगे.
आयोग का कहना है कि वेस्टिब्यूल को बीच से काटा गया था. अगर ऐसा था तो कटे हुए
वेस्टिब्यूल को सुरक्षित क्यों नहीं रखा गया? उसे कबाड़ में क्यों बेच दिया गया?
गवाहों के बयान से यह जाहिर होता है कि गोधरा स्टेशन से रवाना होने के बाद ट्रेन को
जंजीर खींचकर रोका गया क्योंकि कुछ रामसेवक प्लेटफार्म पर ही छूट गए थे. दूसरी बार
ट्रेन किसी तकनीकी गड़बड़ी के कारण रूकी. सवाल यह है कि रामसेवकों की जगह
षड़यंत्रकारियों ने ट्रेन को क्यों नहीं रोका?
घटना को षड़यंत्र का स्वरूप देने के लिए पहले तो आयोग यह कहता रहा कि जलते हुए कपड़ों
के टुकड़े और कुछ रसायन ट्रेन की खिड़कियों से कोच एस-6 में फेंके गए. बाद में उसने
वेस्टिब्यूल को काटे जाने की बात कहना शुरु कर दिया. यह इसलिए किया गया क्योंकि
फोरेन्सिक वैज्ञानिकों ने पटरी की ऊंचाई और खिड़कियों की ऊंचाई की गणना कर यह स्पष्ट
रूप से कह दिया था कि बाहर खड़े किसी व्यक्ति के लिए खिड़की में से पेट्रोल फेंकना
असंभव था. इसके बाद वेस्टिब्यूल की बात कही जाने लगी. यह स्पष्ट है कि वेस्टिब्यूल
को काटने के लिए षड़यंत्रकारियों को ट्रेन को रोकना पड़ा होगा जबकि तथ्य है कि पहिली
बार ट्रेन रामसेवकों द्वारा जंजीर खींचे जाने के कारण रुकी और दूसरी बार तकनीकी
कारण से. वैसे भी ट्रेन के वेस्टिब्यूल को काटना कोई आसान काम नहीं है.
नानावटी आयोग की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि हमारे देश में जांच आयोगों की
निष्पक्षता पर अब भरोसा नहीं किया जा सकता. कई मुद्दों पर रिपोर्ट पूरी तरह चुप है.
सोफिया बानो का कारसेवकों ने ट्रेन के अंदर जबरदस्ती घसीटा था. उसके इस आशय के बयान
को आयोग ने कोई महत्व नहीं दिया. आयोग के निष्कर्ष पुलिस अधिकारी नवल परमार के बयान
पर आधारित हैं. परमार की रिपोर्ट को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया था और उनकी
जगह आर.के. राघवन को जांच अधिकारी नियुक्त किया था.
जिस
जल्दबाजी में आयोग की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है, उसके पीछे के कारण को समझने के
लिए बहुत सोचने की आवश्यकता नहीं है. लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और यह रिपोर्ट भाजपा
और उसके सहयोगी दलों के लिए चुनावों में उपयोगी साबित होगी. रिपोर्ट ने नरेन्द्र
मोदी के आरोपों पर अपनी मुहर लगा दी है. महत्वपूर्ण गवाहियों को नजरअंदाज किया गया
है और पहले से तय किए गए निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए गवाहियों के चुनिंदा हिस्सों
का इस्तेमाल किया गया है.
रिपोर्ट में जस्टिस यू. सी. बैनर्जी समिति की रिपोर्ट का हवाला तक नहीं है. रेलवे
एक्ट के अनुसार हर बड़ी दुर्घटना के बाद उसकी जांच की जाना आवश्यक है. चूंकि घटना के
समय बीजेपी के तत्कालीन साथी नितीश कुमार रेलमंत्री थे इसलिए इस नियम के विपरीत किसी
जांच का आदेश नहीं दिया गया. जब लालू यादव रेलमंत्री बने तो उन्होंने बैनर्जी समिति
की नियुक्ति की जो इस नतीजे पर पहुंची कि ट्रेन में आग दुर्घटनावश लगी थी.
अगर
नानावटी आयोग का निष्कर्ष इसके विपरीत था तो क्या यह उचित नहीं होता कि वो बैनर्जी
रिपोर्ट से असहमत होने के अपने कारणों को स्पष्ट करता. यह भी समझ से बाहर है कि
आयोग ने मोदी का परीक्षण करने की मांग को क्यों खारिज किया. फोन कालों के रिकार्ड
के आधार पर मोदी से पूछताछ करने का पर्याप्त आधार था. वैसे भी, आयोग के निष्कर्षों
में इसलिए कोई दम नहीं है क्योंकि फोरेन्सिक रिपोर्ट के अनुसार डिब्बे के जले हुए
अवशेषों में पेट्रोल की तनिक भी मात्रा नहीं पाई गई है.
आर. बी. श्रीकुमार नामक एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी ने आयोग के समक्ष दाखिल अपने
शपथपत्र में यह कहा है कि उन्हें यह धमकी दी गई थी कि अगर उन्होंने सच बोला तो उन्हें
उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. श्रीकुमार ने इस धमकी वाले फोन काल को भी रिकार्ड किया
था. आयोग का यह कर्तव्य था कि वो श्रीकुमार के बयान को गंभीरता से लेता. या तो
श्रीकुमार के बयान को स्वीकार किया जाना था और या फिर उसे खारिज किए जाने के
पर्याप्त और समुचित कारण दिए जाने थे.
कुल मिलाकर, नानावटी आयोग की रिपोर्ट न्यायिक जांच के तरीके का मखौल है. इससे यह भी
पता चलता है कि किस तरह बड़े पदों पर बैठे लोग भी या तो अपनी विचारधारा के कारण या
किसी लालच में या डर के चलते निष्पक्षता से सत्य पर पहुंचने के अपने कर्तव्य से पीछे
हट जाते हैं.
04.10.2008,
16.20
(GMT+05:30) पर प्रकाशित