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भारत का आश्चर्यलोक

विचार

 

भारत का आश्चर्यलोक

प्रीतीश नंदी


आश्चर्यलोक में एलिस की मुश्किल क्या थी? उसकी मुश्किल यह थी कि वह तय नहीं कर पा रही थी क्या असली है और क्या नहीं. वह एक बहुत सुंदर और सम्मोहक संसार था, जहां हर वो चीज, जो असली नजर आती थी, संभवत: असली नहीं थी और अधिकांश चीजें, जो असली नहीं मालूम होती थीं, वे पूरी तरह असली थीं. ऐसा प्रतीत होता है कि इन दिनों हम भी ऐसे ही आश्चर्यलोक में रह रहे हैं, जहां कोई भी चीज दरअसल वैसी नहीं है, जैसी वह दिखाई देती है.

आइए कुछ उदाहरणों पर गौर करते हैं. हम मुद्रास्फीति के भयावह प्रसार के दौर से गुजर रहे हैं, जिसने सबसे ज्यादा खाद्य सामग्रियों की कीमतों पर असर डाला है. जैसा कि हम सभी जानते हैं, 40 प्रतिशत भारतीयों को तमाम प्रयासों के बावजूद बहुत मुश्किल से ही भोजन मिल पाता है. इनमें से कई तो भूखे पेट सोने को विवश हैं. उनकी स्थिति अब बद से बदतर हो गई है.

यदि पलायन के आंकड़ों पर यकीन करें तो उनमें से अधिकांश लोग नौकरी और रोजी-रोटी की तलाश में अपने घर छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं ताकि उन्हें कुछ भी ऐसा काम मिल सके, जिससे वे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर सकें. फिर भी जिस बजट को लेकर तारीफों के इतने पुल बांधे गए, जिसने विदेशी पूंजी बाजार को गरमा दिया और मीडिया जिसके गुणगान में बावला हो गया, उस बजट ने कीमतों को कम करने के लिए कुछ नहीं किया.

सच्चाई तो यह है कि बजट ने ठीक इसका उल्टा काम ही किया है. इसने ईंधन की कीमतें भी बढ़ा दीं. कोई नौसिखिया अर्थशास्त्री भी आपको यह बता देगा कि ईंधन की कीमत बढ़ने से मुद्रास्फीति की स्थिति और भी भयावह हो जाएगी. हो सकता है कि मैं अनाड़ी होऊं, लेकिन मुझे अभी तक इस बजट में ऐसा कुछ भी नहीं दिखाई दिया, जो भारत को प्रगति की दिशा में लेकर जाता हो, जैसा कि दावा किया जा रहा है. मुझे तो केवल यही दिखाई दे रहा है कि जो आज की सबसे महत्वपूर्ण और गंभीर जरूरतें हैं, उन्हें भयावह तरीके से नजरअंदाज किया गया है. कोई भी मुल्क, यहां तक कि दुनिया का सबसे अमीर मुल्क भी खाद्य पदार्थो की कीमतों में 18 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ नहीं चल सकता.

अर्थव्यवस्था पर एक नजर डालते हैं. मंदी बहुत भयानक थी, बावजूद इसके कोई इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था. सरकार अब तक मंदी से इनकार कर रही है, लेकिन बावजूद इसके मंदी की मार हम पर बदस्तूर जारी है. लेकिन इस मंदी की वजह से हमारी कैबिनेट 2.35 खरब डॉलर का गोर्शकोव सौदा पास करने से नहीं रुकती, जिसके बारे में हम सभी जानते हैं कि यह अब तक का सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण और महंगा रक्षा सौदा है. इस खर्चे के कारण हमारा रक्षा आपूर्ति उद्योग मंदी से नहीं उबर पाएगा.

आईपीएल तमाशा, कृषि मंत्री की ओर से हमारे देश को एक नायाब तोहफा है. यह तोहफा उन तीन वर्षो के दौरान दिया गया है, जिस समय किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं चरम पर हैं.

यह पैसा सीधे उन लोभी रूसियों के हाथों में जा रहा है, जिन्होंने इस पुराने जंगी बेड़े की कीमत वर्ष 2004 के 9.74 करोड़ डॉलर से बढ़ाकर इतनी ज्यादा कर दी है. हम इस धौंस के आगे क्यों झुक गए? कोई भी ठीक-ठीक नहीं जानता. लेकिन ये एक ऐसा खिलौना है, जो हमारे पास होना ही चाहिए ताकि हम पूरी दुनिया के सामने अपनी शेखी बघार सकें.

कृषि मंत्री अपने प्रशासकीय कौशल के लिए जाने जाते हैं. इसके बावजूद हर साल कृषि का उत्पादन घटता चला जाता है. हर साल और अधिक किसान आत्महत्या करते हैं. सिर्फ इसलिए क्योंकि अब वे और बर्दाश्त कर सकने की स्थिति में नहीं हैं. मानसून समय पर नहीं आता. किसानों को अपने उत्पादन की सही कीमत नहीं मिल पाती. इसके बावजूद दिलचस्प बात तो ये है कि खाद्य पदार्थो की कीमतें लगातार बढ़ती रहती हैं, जिससे मध्यवर्ग के एक समूह को मुनाफा होता है.

यदि कोई एक चीज वर्तमान सरकार को गंभीरता से परेशान कर रही है तो वह है खाद्य पदार्थो के मोर्चे पर हो रहा भयावह कुप्रबंधन. इसके बारे में कुछ करने की बजाय हमें सरकार के ये प्रवचन सुनने को मिलते हैं कि किस तरह शक्कर (जो 50 रुपए की एक किलो आती है) सेहत के लिए बुरी है और हमें इसका इस्तेमाल कम कर देना चाहिए. आईपीएल तमाशा, जिसकी ब्रांड कीमत 19 हजार करोड़ रुपए है, कृषि मंत्री की ओर से हमारे देश को एक नायाब तोहफा है. यह तोहफा उन तीन वर्षो के दौरान दिया गया है, जिस समय किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं चरम पर हैं.

हम आर्थिक सुधारों की बाबत काफी कुछ सुन चुके हैं, जबकि सरकार के लिए जरूरत इस बात की है कि वह उन जगहों पर व्यवसायों को समाप्त करे, जहां उनकी आवश्यकता नहीं है. सरकार तो सार्वजनिक उपक्रमों में निवेश को समाप्त करने में भी सुस्त ही साबित हुई, जबकि इसी मुद्दे पर उन्होंने कभी वाम मोर्चे से लड़ाई लड़ी थी. सबसे सरल उदाहरण तो नई एयर इंडिया की तड़क-भड़क और उसका नया चमकीला लोगो है.

एक महत्वपूर्ण संसदीय समिति ने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय की आलोचना की है. दोनों के विलय के चलते 5500 करोड़ का घाटा हुआ है. पहले की स्थिति से तुलना कीजिए. विलय से पहले इंडियन एयरलाइंस को महज 200 करोड़ और एयर इंडिया को 400 करोड़ का नुकसान हुआ था. क्या आप इससे हास्यास्पद वित्तीय जोड़ की कल्पना कर सकते हैं, जहां 600 करोड़ रुपए का घाटा रातोंरात 5500 करोड़ हो जाता है? क्यों नहीं इसमें से थोड़े निवेश को समाप्त कर दिया जाता और मंत्रालय की बजाय वास्तविक पेशेवरों को व्यवसाय करने दिया जाता?

कई ऐसे मामले हैं, जहां हम किसी समस्या को किसी चमकदार, बेतुके स्वांग से बदल देते हैं. हमारे पास खाने को भोजन नहीं है? कोई बात नहीं, हम आपके लिए एक सनसनीखेज क्रिकेट तमाशे का आयोजन कर देंगे, जिसमें खूब सारे फिल्मी सितारे और सुंदर चीयरलीडर हैं. आप माओवादियों के 20 प्रदेशों में फैल जाने की खबर से चिंतित हैं, जो जेहादियों से ज्यादा हत्याएं कर चुके हैं?

कोई फिक्र नहीं, हम आपको 2.35 खरब डॉलर का पुराना रूसी जंगी जहाज खरीद देंगे. आपके शहर प्रवासियों के दबाव से जूझ रहे हैं, क्योंकि कृषि अब मुनाफे का सौदा नहीं रहा? निश्चिंत हो जाइए, हम आपके लिए अनोखे पुल, फ्लाइओवर और वॉकवे बनवा देंगे, जिन पर कभी कोई नहीं चल सकेगा. आपको अपनी तमाम शिक्षा के बावजूद कोई रोजगार नहीं मिलता? कोई हर्ज नहीं, हम लोकसभा में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का वादा करते हैं. आतंकी हमलों की बढ़ती घटनाओं से आप डरे हुए हैं? बेफिक्र हो जाइए, हम आपको देंगे एक पूर्ण भारत-अमेरिका परमाणु सौदा. शहरों में सार्वजनिक परिवहन समाप्ति की कगार पर है? कोई दिक्कत नहीं, हम मुख्य जगहों पर हेलीपैड बना रहे हैं.

यही वह आश्चर्यलोक है, जिसमें एलिस ने स्वयं को घिरा पाया था.

18.03.2010, 15.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

arvindpant (arvindpant000@gmail.com) joshimath uttrakhand

 
 प्रीतीश जी, बेवाकी के लिये साधुवाद. मौजूदा समय में दिनकर याद आते हैं कि श्वानों को मिलता दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं, माँ की हड्डी से चिपक ठिठूर, जाड़ों की रात बिताते हैं... कृषिमंत्री को युपीए का बर्दाश्त करना तो समझ में आता है लेकिन हम सब लोगों को, देश को उन्हें क्यों झेलना चाहिए ? 
   

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