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महिला आरक्षण की राजनीति

मुद्दा

 

महिला आरक्षण की राजनीति

डॉ. असगर अली इंजीनियर

महिलाओं के चौदह साल लंबे संघर्ष के बाद, राज्यसभा ने, संविधान संषोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से, महिला आरक्षण विधेयक को अपनी स्वीकृति दे दी. पिछड़ों की राजनीति के सिपहसालारों ने विधेयक को पारित न होने देने की बहुतेरी कोशिश की परंतु वे सफल नहीं हुए. उनके इस तर्क में कोई दम नहीं है कि इस विधेयक का लाभ केवल उच्च जातियों की हिन्दू महिलाएं उठाएगीं और पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्गो की महिलाओं को इससे कोई फायदा नहीं होगा. यह तर्क सतही है. हमें सच को उसकी पूरी जटिलताओं के साथ समझना होगा.

दलितों और पिछड़े वर्गो को पहले ही आरक्षण दिया जा चुका है और यह व्यवस्था पूर्णतः न्यायोचित है परंतु आरक्षण के भीतर आरक्षण, उन्हें आरक्षण पर और अधिक निर्भर बना देगा. जब पिछड़े वर्गो के अल्पशिक्षित पुरूष चुनाव लड़ सकते हैं तो इन्हीं वर्गो की अल्पशिक्षित या अशिक्षित महिलाएं विधानसभाओं या लोकसभा में क्यो नही जा सकतीं? वैसे भी, यह मानना गलत है कि पिछड़े वर्गो की सभी महिलाएं अशिक्षित हैं और उच्च जातियों की सभी महिलाएं, उच्च शिक्षा प्राप्त हैं. उच्च जातियों में भी बड़ी संख्या में अशिक्षित और अल्पशिक्षित महिलाएं हैं.

हमारे देश में महिला शिक्षा का बहुत तेजी से प्रसार हो रहा है और पिछड़े वर्ग तो छोडिए, दलित महिलाएं भी अपनी माँओं से कहीं अधिक शिक्षित हैं.

कटु सत्य यह है कि पिछड़े वर्गो के पुरूष नहीं चाहते कि उनकी महिलाएं संसद और राज्य विधानमंडलों में पहुँचें. वे सत्ता में अपनी हिस्सेदारी नहीं खोना चाहते. अगर महिलाएं सांसद और विधायक बनेंगी तो वे अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक होगीं, ऊँचे स्वर में बात करेगीं और पारिवारिक व सामाजिक मसलों में उनकी राय का महत्व बढ़ जावेगा. यह संभावना पुरूषों के अहं को चोट पहुँचा रही है.

अगर पिछडे़ वर्गो के आलमबरदार अपनी महिलाओं को आरक्षण दिलवाने के इतने ही इच्छुक हैं तो वे अपनी पार्टी के टिकिट बाँटते समय यह क्यों सुनिश्चित नहीं करते कि कम से कम एक-तिहाई उम्मीदवार महिलाएं हों? वे कोटे के अंदर कोटा क्यों चाहते हैं? वे ऐसा इसलिए चाहते हैं ताकि संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व कम न हो. फिर, कौन यह गारंटी दे सकता है कि कोटे के अंदर कोटे का लाभ भी केवल पिछडे वर्गो की “क्रीमी लेयर“ नहीं उठाएगी? अब तक का यह अनुभव रहा है कि आरक्षण का लाभ, दलितों और पिछड़े वर्गो के अपेक्षाकृत अधिक पढ़े-लिखे और समृद्ध वर्ग ने ही उठाया है. पिछड़े वर्गो और दलितों की बहुत बड़ी आबादी आज भी अशिक्षा ओर गरीबी के अँधेरे में जीने को मजबूर है.

पिछड़े वर्गो के सिपहसालार, दरअसल, इस तथ्य का लाभ उठा रहे हैं कि संसद में उनके सदस्यों की अच्छी खासी संख्या. उनके सहयोग के बिना वित्त विधेयक पास कराना संभव नहीं है. यही कारण है कि सरकार को मजबूर होकर अपनी रणनीति बदलनी पड़ी और लोकसभा में विधेयक को पेश नहीं किया गया. संभवतः, वित्त विधेयक को इन दलों के सहयोग से पास करवाने के बाद, मई महीने में, सरकार महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में लाए.

मई में भी, पिछड़े वर्गो के नेता लोकसभा में इस बिल की राह में अड़ंगे लगा सकते हैं. मुलायम सिंह यादव पहले ही महिलाओं के लिए 33 की बजाय 20 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के “समझौता फार्मूले“ की बात कह चुके हैं. और शायद बिल को लोकसभा में पास कराने की खातिर, सरकार यह समझौता कर भी ले. यदि ऐसा हुआ तो यह निश्चित रूप से महिलाओं के साथ अन्याय होगा परंतु वोट की राजनीति में न्याय-अन्याय का शायद कोई महत्व नहीं है.

अगर सरकार को समझौता ही करना था तो उसने चौदह साल तक इंतजार क्यों किया? संशोधित स्वरूप में तो यह बिल चौदह वर्ष पहले ही पास हो सकता था.

मुझे आशा है कि सरकार दबाव में नहीं आयेगी और महिलाओं के आरक्षण में कमी नहीं करेगी. यह अन्याय होगा.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछड़े वर्ग के जो नेता अपने वर्ग की महिलाओं के सबसे बड़े हितचिंतक होने का नाटक कर रहे हैं, उन्होंने ही अपनी पत्नियों को मुख्यमंत्री बनाने में जरा भी संकोच नहीं किया. लालू प्रसाद यादव ने अपनी पत्नी राबडी देवी को बिहार जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जबकि राबडी देवी को न तो राजनीति और न ही प्रशासन का कोई अनुभव था. इसी तरह, पिछड़े वर्ग की उमा भारती को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया जबकि उनकी प्रसिद्धि मुख्यतः आंदोलनकर्ता व भावनाएं भड़काने वाली वक्ता के रूप में थी.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) GHAZIABAD

 
 असगर अली साहब यद्यपि प्रीतिश बराथ ने आपके विचारों के माकूल प्रत्रिक्रिया की है पर आपसे दो सवाल लाजमी प्रतीत होते हैं -
१- क्या आपदा आ गयी आरक्षण की, चारों तरफ आरक्षण पर विरोध और संसद में लाने के लिए आरक्षण, क्या आपको नहीं लगता कि इस देश की महिलायें इसी की और आपकी अनुकम्पा की पात्र है, सच तो यह है कि जिन्हें आप अपढ़ कह रहे हैं, पढ़ी-लिखियों के प्रकोप झेलने के लिए पुनः अभिशप्त करने का नाटक नहीं तो क्या है ? जिस देश में ६० वर्षों से महिलाएं बिना आरक्षण के आ रही है 'इंदिरा' इस देश की खूंखार और सबसे शशक्त प्रधानमंत्री रही हों, जो किसी आरक्षण की जरुरत के बिना हारती जीतती रही ...............सो इन लताओं पर जुर्म !
२- 'क्रीमी लेयर' का दर्द इंजीनियर साहब आपको जरुर हो रहा है, सारी सजिशों को आपने बखूबी समझा है, लेख से ऐसा लगता है और सच तो यह है कि आपको देश की नहीं देश के कुछ खुबसूरत लोगों की भलाई दिखाई देती है, जिसमें काम से काम राबड़ी नहीं होतीं, पर राबड़ी जीतनी खुबसूरत न तो ब्रिंदा करात है और न ही सुषमा स्वराज और न ही गिरिजा ब्यास लालू ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया था, उन्हें मुख्यमंत्री बनने में सबसे बड़ा योगदान आपके उन्ही बुद्धिनुमा जीवियों का था जिन्होंने लालू को फंसाया था - यह तो आप भी जानते होगें कि राजनीति और राज्य कैसे चलता है, मायावती के कार्यकर्ताओं ने यदि उतनी गालियाँ न दी होती तो खुबसूरत 'द्विज ताकते' उत्तर प्रदेश में उनको राज करने देतीं?
यदि यह सब ठीक नहीं है तो ठीक क्या है. जब तक सत्ता की पूरी बागडोर हाथ नहीं होगी तो सामाजिक बदलाव को बल ही नहीं मिलेगा, आने वाले समय में भी बदलाव की गति शायद उलटी ही हो या यही होने जा रहा है? क्योंकि राजनेताओ की दशा दिशा यही है? जिस तरह से वह गैर राजनैतिक कामों में लगे हैं, उससे सत्ता फिर वहीँ जानी है जहाँ से "सामाजिक न्याय के पुरोधाओ ने निकाला था" दक्षिण से लेकर उत्तर तक के सारे सामाजिक बदलाव के आन्दोलन जिनके हाथों से निकल कर, जिन हाथों में पहुचे है उनकी हालत अब ऐसी नहीं रही कि उसे आगे ले जा सकें यह सब इस कदर बटे हुए है, जिससे बदलाव की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती है.

और इंजिनियर साहब कहीं नोट कर लीजिये, कितनी भी चालाकी बरतिए- जिसकी जीतनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागेदारी तो देनी ही होगी, आज नहीं तो कल !
 
   
 

प्रीतीश बारहठ (pritish1108@gmail.com) जयपुर

 
 इंजीनीयर साहब लेख की अन्तिम पंक्तियों में जो इच्छा जाहिर कर रहे हैं वह तो बिल से पूरी होने वाली नहीं है। बिल में क्रीमीलेयर सीमा का निर्धारण नहीं हैं। समझ में नहीं आता वे कैसे इस बिल का इतना समर्थन कर रहे हैं ! मैं आरक्षण प्रणाली का समर्थक नहीं हूँ, लेकिन आरक्षण का विकल्प भी नहीं है। यदि आर्थिक आधार पर दिया जाये तो उसका समर्थन करूंगा, लेकिन वह भी नहीं होने जा रहा। इसके बाद जाति आधारित आरक्षण का समर्थन करने का ही तो विकल्प बचा है। लालू-मुलायम की मानसिकता कैसी भी हो लेकिन बिल की समीक्षा इस आधार पर होनी चाहिये कि उसके क्या परिणाम आने वाले हैं, दूसरा कोटे में कोटा देने के क्या परिणाम आ सकते हैं ? लालू यादव ने बिना किसी महिला आरक्षण के ही राबड़ीदेवी को मुख्यमंत्री बना दिया था, उनकी दूसरी मजबूरी थी, महिला आरक्षण से जब सीट खाली करने की मजबूरी बाकी स्थापित नेताओं के सामने आयेगी तो निश्चित रूप से उनकी ही पत्नियां उनके पदों को सुशोभित करेंगी ताकि पांच वर्ष बाद सुविधाजनक रूप से वह सीट वापस उनके पतिदेव को हस्तांतरित की जा सके। लालू मुख्यमंत्री हुये या राबड़ी हुईं इससे क्या भला हुआ महिलाओं का ? यह स्थिति अब हर सीट पर हो जानी है। स्थापित नेताओं की सुरक्षा के लिये और किसी महिला को स्थापित न होने देने के लिये ही तो महिला बिल में रोटेशन की प्रणाली अपनाई जा रही है। इसे और अधिक मैंने अपने ब्लाग पर स्पष्ट करने का प्रयास किया है. वर्तमान में जो सीटें दलितों के लिये आरक्षित हैं वे जब महिला आरक्षण के रोटेशन में आयेंगी तो उन पर सिर्फ दलित महिलायें ही चुनाव लड़ सकेंगी, तब आप कैसे महिलाओं में भेद स्वीकार कर लेंगे। क्या यह साजिश नहीं है कि महिला आरक्षण के बावजूद संसद में दलितों का प्रतिनिधित्व एक सीट भी न बढ़े? इंजीनीयर साहब जो आरोप दलित नेताओं पर लगा रहे हैं, वे सही भी हो सकते हैं लेकिन क्या ठीक वे ही आरोप बिल के हिमायतियों पर नहीं लगाये जाने चाहियें। लालू -मुलायम पर तो ये आरोप फिर भी एक शक़ के तौर पर सही हैं लेकिन बिल के हिमायतियों पर तो उसके प्रावधानों से स्वतः प्रमाणित हो रहे हैं। 
   

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